आधुनिक विश्व में भारतीय जीवन के लिए भारतीय मानस व काल के अनुरूप कोई नया सन्तुलन ढूंढे बिना तो इस देश का बोझ हल्का नहीं हो पायेगा
१९६५-६६ में जब मैंने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के दस्तावेजों को देखना शुरू किया तो दिल्ली के एक मित्र ने कहा , भई तुम ये क्या गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे हो ? कुछ ढंग का काम क्यों नहीं करते ? और बहुत लोगों ने कहा कि आप अठारहवीं सदी की ये जो बातें करते हैं वे तो ठीक ही हैं
अनेक भारतीय विद्या संस्थान विशेष तौर पर भारतीय ग्रन्थों को देखने- समझने के लिए बने हैं , और अनेक ऊंचे विद्वान लम्बे समय से इस काम में लगे हैं
लेवी स्ट्रॉस धाकड विद्वान हैं , इसलिए वे अपनी बात स्पष्ट कह जाते हैं
पर आधुनिकता के प्रवाह में वे भी ऐसा बहे कि उन्हें पुरुषसूक्त में अंग्रेजी राज्य व्यवस्था का पूर्वाभास दिखाई देने लगा
पिछले बहुत समय से , शायद सौ-एक बरस से , हमारे विद्वान लोग इस देश की विभिन्न विद्याओं की विभिन्न भाषाओं में ज्ञात पांडुलिपियों की उपलब्ध सूचियों का एक संकलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं
इस संकलन को बनाने वाले विद्वानों ने लम्बी मेहनत के बाद यह जाना है कि संस्कृत , प्राकृत , पाली , तमिल , आदि भाषाओं की ज्ञात पांडुलिपियों की दो हजार के लगभग सूचियां या कैटलाग हैं
३ . महत्त्व सही जवाब का नहीं , सही सवाल का है हमारे पैरों के नीचे अपनी कोई जमीन नहीं है
अहिंसा एक व्यापक जीवनदृष्टि का अंग है
अभी पिछले दिनों सारनाथ में एक गोष्ठी हुई थी
अक्षर ज्ञान को ही शिक्षा मानते हैं , और उस दृष्टि से देखकर पाते हैं कि भारत के ६० , ७० , या ८० प्रतिशत लोग अशिक्षित ही हैं
भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बदल जाते हैं , राजनीति विज्ञान की मौलिक परिभाषाएं बदल जाती हैं , दर्शनशास्त्र की दिशा बदल जाती है
मद्रास के श्री शिवरमण तो कहते हैं कि प्रश्न पूछते जाना ही भारतीय सत्य- साधना का मूल है
फिर भरद्वाज पूछते हैं कि कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र कैसे बनता है ? भृगु कहते हैं कि कर्मों और गुणों से ही इस प्रश्न का निर्णय होता है
फिर जो बातें इस साहित्य में बहुत मौलिक दिखाई देती हैं , जो सारे कथ्य का आधार सी लगती हैं , और जो विभिन्न प्रकार के साहित्य में बार बार दोहरायी जाती हैं , वे बातें तो शायद भारतीय चित्त व काल की सहज वृत्तियों की परिचायक ही होंगी
इस गाथा के अनुसार ब्रह्म के तप व संकल्प से सृष्टि का सर्जन होता है , और फिर यह अनेकानेक आवर्तनों से होती हुई , वापस ब्रह्म में लीन हो जाती है
'मधु' पीकर ही सब जीवित रहते हैं
मद , मोह , लोभ , अहंकार , आदि जैसे मनोविकारों की उत्पत्ति भी इसी समय होती है
मात्र 'मधु' से अब काम नहीं चलता
सहज पैदा होने वाले अनाज और फलों आदि को एकत्रित करने के लिए कुछ कला-कौशल चाहिए
कुछ ग्रन्थों के अनुसार , श्रीराम के स्वर्गारोहण के साथ ही त्रेता का अन्त होकर द्वापर का प्रादुर्भाव होता है
धर्म की हानि और क्षत्रियों की ईर्ष्या , लोभ व क्रूरता के इस सन्दर्भ में ही पृथ्वी विष्णु से जाकर प्रार्थना करती है कि इतना अधिक बोझ अब उससे सहा नहीं जाता और इस बोझ को हल्का करने का कोई उपाय होना चाहिए
द्वापर की अवधि कृत युग की अवधि से आधी ही है
कलियुग का मुख्य लक्षण यह है कि इसमें धर्म एक पांव पर टिका रहता है
सृष्टि की इस कथा का दूसरा मुख्य कथ्य सृष्टि के अनादि-अनन्त विस्तार में मानव के प्रयत्न और उसके काल की क्षुद्रता का है
और एक ही सभ्यता कभी अकर्मण्यता की ओर और कभी गहन कर्मठता की ओर अग्रसर दिखाई देती है
उपनिषदों में तो केवल परा ज्ञान की ही बात है , पर वेदों में अन्य स्थानों पर ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो सीधे अपरा से ही सम्बन्धित हैं
विद्वानों के स्तर पर भी इस प्रकार से बात चलती है जैसे भारतीयता का सम्बन्ध तो केवल परा से ही हो , अपरा से उसका कुछ लेना देना ही न हो
पर समय पाकर परा से अपरा के नियमन की यह बात अपरा की हेयता में बदल गई है
हमारा ही ध्यान भारतीय साहित्य के परा वाले अंश पर टिका रहा है
पर यह ऊंच-नीच वाली बात तो बहुत मौलिक नहीं दिखती
श्री ब्रह्मान्द सरस्वती जैसे जोषीमठ के ऊँचे शंकराचार्य तक कह दिया करते थे कि दरिद्रता तो कर्मों की बात है
लेकिन जिस भाव से , जिस तन्मयता से कोई कर्म किया जाता है वही उसे ऊँचा और नीचा बनाता है
जबलपुर जिले में अगरिया , गटना , लमतरा , मंगैला , जौली , इमलिया और बडागांव में; नर्मदा के दक्षिण में डंगराई गांव में; पन्ना जिले में बृजपुर के पास सिमरिया गांव में; केन और धसान नदियों के मध्य के क्षेत्र में पांडव पहाडियों , अमरौनिया , महगांव और मोतिही में; मध्य प्रदेश के कोटा जिले में , सैगढ और चन्द्रपुर में; उससे पश्चिम में पिपरिया , रेजकोई और कंजरा में तथा आगे बजाना में लोहे की खानें हैं तथा उससे आगे सेरवा , हीरपुर , तिघोरा , और मंडवरा में
सागर जिले में तेंदूखेडा में कच्चे लोहे के विविध रूपों गुलकू , सुरमा , पीरा और काला तथा देवी साही कच्चे लोहे का वृत्तान्त लिखते हैं
खैर , इतना तो सभी भारतीयों के बारे में कहा जाता है , साधारण भारतीय ईसाईयों के बारे में भी , कि उनका अपना चित्त व काल आधुनिक यूरोपीय सभ्यता के चित्त व काल से मेल नहीं खाता
इसी ईसाईकरण का दूसरा नाम पश्चिमीकरण है , जिसे करने के प्रयत्न स्वतंत्र भारत की सरकारें भी करती चली आ रही हैं
पश्चिम की पिछले चालीस-पचास बरस की सम्पन्नता और खुशहाली के बावजूद वहां के साधारणजन का मानस तो व्यवस्था के दास वाला ही है , मानस के स्तर पर वह अब भी प्लेटो के आदर्श राज्य और वास्तविक रोम साम्रज्य के गुलामों जैसा ही है
पश्चिम की पिछले चालीस-पचास बरस की सम्पन्नता और खुशहाली के बावजूद वहां के साधारणजन का मानस तो व्यवस्था के दास वाला ही है , मानस के स्तर पर वह अब भी प्लेटो के आदर्श राज्य और वास्तविक रोम साम्रज्य के गुलामों जैसा ही है
लेकिन यह काम यहीं की परम्परा से जुड़े और उसे सम्मान से देखने वाले लोग ही कर सकते हैं
ग्रन्थों के साथ बंधना भारतीय परंपरा का अंग नहीं है
सभ्यताओं की दिशा का निर्धारण तो सभ्यताओं के सहज मानस , चित्त व काल पर विचार करके ही होता है
विश्व हमें अपनी दिशा में चलते हुए और उस प्रयास में सफल होते हुए देखेगा तो शायद उसे भी भारतीयता में अपने लिए और सारी मानवता के लिए महत्त्वपूर्ण कुछ दिखाई देने लगेगा
१९४४ ईस्वी में गांधीजी ने कहा भी था कि जब मैं भारत लौटा तो मैंने उन्ही भावों और विचारों को अभिव्यक्ति दी , जो कि भारतीय अपने मन में स्वयं पहले से जानते थे और अनुभव करते थे
स्थिति स्पष्ट है कि स्वाधीन होने पर भी , हमारी समस्त शासकीय व्यवस्थायें और उनके साथ समस्त आधुनिक अशासकीय प्रवृत्तियाँ , आज भी बहुत कुछ उसी संरचना पर आधारित हैं , जो संरचना-तंत्र अंग्रेजों ने सन् १७६० से १८३० ईस्वी के मध्य , भारतीय व्यवस्थाओं एवं संरचना-तंत्र को नष्ट करने हेतु और उसी प्रकिया में रचे थे या फिर जो उन्होंने १८५७ ईस्वी के बाद अपने राज्य को भारत में और सुदृढ़ बनाने के लिये रचे थे
यहां यह स्मरण किया जा सकता है कि सन् १९२० ई . तक भारत का राज्यकर्ता वर्ग या अभिजनों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा अपने समाज के बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर पर असंबद्ध हो चुका था और परकीयता अपना चुका था
यह भी सत्य हो सकता है कि जिन प्रमुख अभिजनों ने गांधीजी का नेतृत्व स्वीकार किया और उसके द्वारा राज-सत्ता एवं राजनैतिक सत्ता प्राप्त की , वे गांधीजी की भारतीय समाज की समझ को बहुत गंभीरता से नहीं ग्रहण करते थे और वे यह स्वीकार कर पाने में भी असमर्थ थे कि वैसा कोई भारतीय समाज आधुनिक विश्व में व्यवहार्य हो सकता है
अपने समाज और राजनीति तंत्र ( पौलिटी ) को ऐक्यबद्ध करने , साथ-साथ चलने , संवाद और विमर्श करने तथा कार्य करने की एकता उत्पन्न करने में ये दोनों ही राज्य कुछ अधिक सफल नहीं रहे
इतना तो स्पष्ट है कि भारतीय मानस भी यदा-कदा-लड़ाई-झगड़ों तथा अन्य उपद्रवों-अनिष्टों को जीवन का स्वाभाविक अंग मानता है
किन्तु अपना राज्य भिन्न एवं विपरीत प्रकार के विचारतंत्र के प्रति क्या बौद्धिक व्यवहार करे , इस पर पर्याप्त गहरा शास्त्रार्थ विजयनगर राज्य में भी नहीं हुआ
जो सांस्कृतिक-केन्द्र , विद्या-केन्द्र नष्ट कर देने वाली शक्तियां हैं , उन्हें मात्र प्रत्यक्षत: पराजित कर , अपने क्षेत्र भर में मर्यादित रखके , क्षेत्र के चारों ओर वैर-भाव से परिपूर्ण वैचारिक आक्रमकता को यों ही रहने देना है या उससे वैचारिक संवाद करना है , इस पर विगत एक हजार वर्षों में कभी कहीं पर्याप्त गहरा विमर्श हुआ हो , इसके अभी तक सूत्र नहीं मिले हैं
इस वर्ग का एक महत्त्वपूर्ण अंश उत्साहपूर्वक ब्रिटिश जीवन-पद्धति , ब्रिटिश विचार-पद्धति , एवं अभिव्यक्ति-पद्धति को ऐसे अपना रहा था , मानों वह बौद्धिक दारिद्र्य से ग्रस्त हो , उसके पास न अपनी प्रभा हो , न प्रतिभा , न प्रतिमान
उन अवशेषों की , श्री परमहंस के आसन की एवं चित्र की पूजा मठ का नित्य नियम है
पूजा का खर्च दो महान् भक्तों द्वारा उठाया जाता है . . . 
फिर उस पर कुछ आश्रम बनाना होगा
उसमें तनिक भी लज्जा कैसी ? . . . . शायद आप कहें कि संन्यासी को इच्छाएं क्यों ? मेरा उत्तर होगा , भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम , उनका जन्म-स्थल एवं साधना-स्थल विश्व में सर्वत्र प्रसिद्धि पाए , इसके लिए मैं चोरी-डकैती तक करने को तैयार हूं , क्योंकि मैं उनका सेवक दास हूं , मैं इस स्मृति स्थल के निर्माण हेतु ही कोलकता लौटा हूं
 . . . अगर आप कहें कि स्मारक काशी में हो , तो निवेदन है कि उन्होंने साधना तो यहां कोलकते में गंगा-तट पर की थी
कुछ ही दिनों बाद लगा . . . श्री रामकृष्ण परमहंस समुद्र के बीचोबीच हैं और बुला रहे हैं
इन गुणों से संपन्न एक अकेली आत्मा करोडों पाखंडियों और जड क्रूरबुद्धियों के तमसावृत संकल्पों को विनष्ट कर सकती है
वेदों के गहरे अर्थों की तेजस्वी व्याख्या और उनकी परम प्रामाणिकता का प्रतिपादन करने के साथ-साथ ही स्वामी दयानंद ने गो-रक्षा आंदोलन को भी भरपूर समर्थन तथा सहयोग दिया
विवेकानंद और दयानंद जैसे लोगों में भारतीय समाज के प्रति ममत्व का प्रेम था
' रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सन् १९०० के आसपास लिखा , 'अस्तित्व के आंतरिक सत्य से सम्बन्ध विच्छिन्न कर हमारे देशने अविवेक के प्रचंड भार से दब कर परिस्थितियों की भीषण दासता स्वीकार कर ली
वे भारत को इंग्लैंड जैसा तथा भारतीयों को अंग्रेजों जैसा बनते देखना चाहते थे और इसी में देश का गौरव मानते थे
अत: पश्चिम के द्वारा रची गई आधुनिक शिक्षा ही स्वभावत: जवाहरलाल नेहरू के लिए प्रामाणिक ज्ञान का एकमात्र माध्यम थी
सन् १८८० से १८९४ ई . तक देशभर में , विशेषत: उत्तर और मध्य भारत में प्रबल गोरक्षा आंदोलन उठा
स्पष्ट है कि भारत के स्वाधीनताको चाहनेवाले बृहत् समाज की मुख्य टक्कर इन अभिजनों से नहीं थी , अपितु पराधीन बनाने वाले साम्राज्य से थी
सभ्यता का अर्थ है संपत्ति की निरंतर वृद्धि , व्यवस्था और रक्षा अपनी संपत्ति की रक्षा औजारों के द्वारा की जाती है
पहले १८२४ ई . में उन्होंने लिखा - 'यह सुविदित है कि अपनी आवश्यकता के लिए वांछित लोहे के लिए इंग्लैंड पूरी तरह विदेशों पर निर्भर है
फिर १७८० ई . के लगभग से 'संडे स्कूल मूवमेण्ट' शुरू हुए
ब्रिटेन में १७९२ ईस्वी में स्कूलों में पढ रहे बच्चों की संख्या ४० हजार के लगभग बताई गई है
प्रारंभ में शिक्षक बहुत सक्षम नहीं थे
'लिटरेट ह्यूमेनिअर्स' नाम से क्लासिक्स की परीक्षा होती थी , जिसमें ग्रीक व लैटिन भाषा और साहित्य , मॉरल फिलोसॉफी , छन्द अंलकार शास्त्र एवं तर्क शास्त्र सम्मिलित थे
उन्नीसवीं शती के आरंभिक वर्षो में कुल छात्र ७६० थे , १८२०-२४ में यह संख्या १३०० तक जा पहुंची
उसकी पहली प्रतिलिपि पांडिचेरी में १६९९ से १७२० ईस्वी तक पेरिस फारेन मिशन के प्राकूरेटर रहे टेसीयर डे क्वेरले द्वारा १७०९ ई . में पूर्ण की गयी थी
इस पांडुलिपि की प्रतियां इन संग्रहालयों में उपलब्ध हैं - पेरिस में बीबिलयाथिक नेशनल में ३ प्रतियां , बीबिलयाथिक दे ल आर्सनल में एक प्रति , बीकिलयाथिक स्टे जेनेवी में एक प्रति , आर्काइव्स नेशनल्स में एक प्रति , चार्टर्स में बीबिलयाथिक म्युनिसिपेल में एक प्रति , जो कि पहले गवर्नर बेनाइ डूमा के पास थी , लंदन में इंडिया आफिस लाइब्रेरी में दो प्रतियाँ-एक कर्नल मैकेंजी के संग्रह में , दूसरी जान लेडेन के , रोम में एक प्रति ( बीबिलयाटेका केसानटेसा , जिसमें वेटिकन कलेक्शन हैं ) 
ऐसी संचित सामग्री के विशाल संग्रह के कारण यूरोपीय विद्वानों का ध्यान भारत एवं दक्षिणपूर्व एशिया की राजनीति , विधि शास्त्र , दर्शन विज्ञान और भारतीय गणित ज्योतिष की ओर गया
वाल्टेयर , एबे रेनाल , जां सिलवां बैली जैसे यूरोपीय विद्वान लोगों के प्रभाव को ग्रहण कर ब्रिटेन में भी एडम फर्गुसन , विलियम राबर्टसन , जान प्लेफेयर और मैकनोची आदि ने भारतीय राज्य , राजनीति , समाज जीवन , सामाजिक सम्बन्ध आदि का विस्तृत विवरण प्राप्त करने में गहरी रुचि दिखाई
एक तो ब्रिटिश सत्ता की वृद्धि एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर यह जानकारी आवश्यक लगी , ताकि अंग्रेज अपनी राजनीति एवं अपने राजकीय कानूनों को भारतीय परंपराओं , धर्मग्रंथो आदि के अनुरूप बनाएं , भले ही इसके लिए कितनी भी दूर की कौडी लानी पडे
तीसरा प्रकार स्वयं ब्रिटन में अपने लोगों को मार-पीटकर , दबाकर , एक संस्थाबद्ध , औपचारिक , कानून को मानने वाली ईसाइयत के अधीन ले आया गया है , वैसा ही भारत में भी किया जाय और इसमें ईसाई मिशनरियों के लक्ष्य और प्रोपेगण्डा की सहायता की जाए , ताकि ईसाई 'प्रकाश' और 'ज्ञान' भारतीयों में फैलाया जा सके
१३८५ में इंग्लैंड में बहुत बडी मात्रा में किसान विद्रोह हुए
शासकों के विचार एवं व्यवहार ही सभ्यता है
भारत की हीनता की बात गांधीवादियों में सर्वमान्य ही दिखती है
शिक्षा भारत में शिक्षा की आवश्यक नीति क्या अपनाएं , यह निर्णय करने के पहले अंग्रेजों ने तत्कालीन स्वदेशी शिक्षापद्धति के कुछ सर्वेक्षण कराए
मुख्यत:१८२२-२५ में यह सर्वेक्षण हुआ
तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी में वर्तमान पूरा तमिलनाडु , वर्तमान आंध्रप्रदेश का अधिकांश भाग और वर्तमान कर्नाटक प्रांत के कुछ जिले व केरल के मलाबार जिला व उडीसा में गंजाम जिला सम्मिलित थे
विलियम एडम से वर्षों पहले , मद्रास के गर्वनर सर थामस मुनरो ने मद्रास प्रेसीडेन्सी के बारे में यही कहा कि ऐसा लगता है कि वहां हर गांव में एक स्कूल है
मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में जानकारी एकत्र करने हेतु गर्वनर थामस मुनरो ने एक निर्देश राजस्व-कलक्टरों को सन् १८२८ में प्रसारित किया उसके आधार पर राज्य-मुख्य सचिव डी . हील ने बोर्ड आफ रेवन्यू के अध्यक्ष व सदस्यों को एक पत्र लिखा
कलेक्टरों की रिपोर्ट मिलने पर मद्रास प्रेसीडेन्सी की सरकार ने १० मार्च १८२६ को उनकी समीक्षा की और गवर्नर सर थामस मुनरो ने निष्कर्ष-टिप्पणी की कि '५ से १० वर्ष आयु समूह के प्रेसीडेन्सी के कुल लड़कों का लगभग एक चौथाई हिस्सा स्कूलों में शिक्षा पा रहा है
चिंगलपेट में शूद्र माने जाने वाले जाति समूहों के छात्र ७१ . ४७% हैं , तंजौर में ६१ . १७%
जबकि मुस्लिम लडकों की संख्या ३१९६ थी , उस समय मुस्लिम लडकियों की संख्या ११२२
जबकि मुस्लिम लडकों की संख्या ३१९६ थी , उस समय मुस्लिम लडकियों की संख्या ११२२
इनमें ब्राह्मण , राजपूत , क्षैत्री , कायस्थ के साथ साथ कैवर्त , सुवर्णबनिक , ताँती , सुनरी , तैली , मैरा , अगुरी , सद्गोप , गंधबनिक , वैद्य , सुनार , कमार , बरई , स्वर्णकार , नापित , ग्वाला , तमौली , कहार , डोम , कैरी , मागध , कुम्हार , कुर्मी , युगी , दैवज्ञ , चांडाल , जालिया , पासी , धोना , भट्ट , माली , कलवार , लुनियार , खटिक , बढई , माला , अगरदानी , ओसवाल , कांडू , माटिया , धनूका , दुसाध , गरेरी , कलाल , कंसारी , चूडिहार , मुशहर , केवट , पुनरा , केलदार , बहेलिया , भूमिया , कौरी , धूलिया , ब्यौधा , ढांगर , संथाल , तिवाड , कुन्यार , आदि आदि जातियों के छात्र हैं
लोहा और इस्पात भारत में बहुत प्राचीन काल से उत्पादित हो रहा है
सन् १७९४ में डॉ . एच . स्काट ने ब्रिटिश रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जे . बैंक्स को भारतीय 'वुटज' इस्पात का एक नमूना भेजा
' यद्यपि हीथ यह मानने को तैयार नहीं थे कि भारतीयों को रसायन-शास्त्र के उस सिद्धांत का भी ज्ञान हो सकता है , जो कि इंग्लैंड में ताप द्वारा लोहे को इस्पात में ढालने के आधार के रूप में निरूपित किया गया था
डॉ . बेंजामिन हेन ने १७९५ में लिखा कि नूजीद क्षेत्र में अनेक स्थानों पर लोहे की भट्टियाँ हैं , जहां सामान्य प्रयोग हेतु लोहा तैयार किया जाता है
हेन के अनुसार 'रमन का पेठा' में अकाल से पहले ४० लोहे की भट्टियां थी और अनेक संपन्न सुनार तथा तंबेर भी थे
यदि वर्ष में ३०-४० सप्ताह इन पर कार्य होता होगा , तो इनमें से प्रत्येक की उत्पादन क्षमता २० टन बढ़िया इस्पात प्रतिवर्ष की थी
इलाहाबाद जैसे स्थानों पर बर्फ बनाये जाने का विवरण कुछेक तत्कालीन अंग्रेजों ने दिया है
मद्रास प्रेसीडेन्सी और मैसूर राज्य में करीब एक लाख छोटे-बडे सिंचाई के तालाब १८०० ई . के आसपास थे ऐसा माना जाता है
उनकी ब्रिटिश राज में उपेक्षा होने पर बहुत से तालाब १८५० ई . तक समाप्त हो गये
सन् १८०० ई . के आसपास भारतीय खेती की उपजदर इंग्लैंड की कृषि उपजदर से दुगुनी व तिगुनी तक थी
एडिनबर्ग के गणित विभागाध्यक्ष प्रो . जान प्लेफेयर ने विस्तृत जांच पडताल के बाद माना कि ईसा पूर्व ३१०२ सन् में आकाशीय पिंडों की स्थिति के बारे में भारतीयों का गणित ज्योतिषीय कथन हर प्रकार से सही दिखता है
प्लेफेयर ने कहा कि गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत एवं इण्टीग्रल केलकुलस के गणितीय सिद्धातों के ज्ञान के बिना भारतीय गणितज्ञ इतना अचूक गणित ज्योतिषीय आकलन कर ही नहीं सकते थे
एडिनबर्ग के गणित विभागाध्यक्ष प्रो . जान प्लेफेयर ने विस्तृत जांच पडताल के बाद माना कि ईसा पूर्व ३१०२ सन् में आकाशीय पिंडों की स्थिति के बारे में भारतीयों का गणित ज्योतिषीय कथन हर प्रकार से सही दिखता है
प्रारंभ से ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटिश राज्य द्वारा संप्रभुता , विजय एवं राज के अधिकार प्रदान कर दिए गए थे
और जब कोई कंपनी , विशेषत: ब्रिटिश कंपनी सचमुच किसी क्षेत्र को जीतना और उस पर राज करना शुरू कर देती थी , तो व्यवहारत: वास्तविक नियंत्रण उस विजित क्षेत्र पर ब्रिटिश राज्य ही करने लगता था
भारत के संदर्भ में तो १७८४ ई . से आगे वैधानिक रूप में भी ऐसा था ही , १७५० ई . से भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कोई भी महत्त्वपूर्ण कदम ब्रिटिश राज्य के निर्देश या स्वीकृति के बिना नहीं उठाया गया
एडिनबर्ग के प्रोफेसर एडम ने सन् १७८३ ई . में हेनरी डंडास को लिखा था कि कंपनी चरित्र में ( ब्रिटिश अभिजनों से ) घटिया है
क्योंकि इन पदों पर अच्छी आमदनी के साथ ही पद के अनुरूप उस लूट में हिस्सा मिलता था , जो लड़ाई के समय ब्रिटिश सेना पराजित राज्य में करती थी
इसी प्रकार भारत में अंग्रेज अफसर जहां ब्रिटिश समाज द्वारा उन्हें सौंपे गए दायित्वों को चुस्ती से निभा रहे थे , वहीं वे उन व्यवहार प्रतिमानों का भी निष्ठा एवं दृढतापूर्वक निर्वाह कर रहे थे , जो कि स्वयं ब्रिटिश समाज में बनाये गये थे और प्रचलित थे
एक तो वे ब्राह्मणों को बहुत दान देते हैं , दूसरे मंदिरों को
केदारनाथ से तंजावुर एवं रामेश्वरम् तक देश भर में धार्मिक स्थानों में तीर्थयात्रियों के ठहरने आदि के लिए छत्रम् होते थे
सन् १८००-१८०१ ई . के तंजावुर राजा और अंग्रेज सरकार के पत्रव्यवहार से ज्ञात होता है कि तंजावुर से रामेश्वरम् तक के अनेक बन्दरगाहों का राजस्व भी तंजावुर से रामेश्वरम् तक बने छत्रमों के रखरखाव पर सीधे खर्च कर दिया जाता था
इन छत्रमों की कार्यप्रणाली और देश के चारों कोनों से आकर इनमें ठहरने वाले तीर्थयात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में तंजावुर के राजा ने लिखा था , 'समुद्र के किनारे किनारे बने इन छत्रमों में प्रतिवर्ष रामेश्वरम् जाने वाले ४० हजार तीर्थयात्रियों को ठहराने का पूरा प्रबंध है
हर छत्रम् के साथ मंदिर और पाठशालाएं हैं
ऐसी भूमि का कर , विधिविहित राज्याधिकारी व व्यवस्था को देय होता था , फिर वह ग्राम स्तरीय अधिकारी हो , क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय स्तर का हो
गाँवों में से प्रत्येक की कुल कृषि उपज में से गांव की विविध संस्थाओं तथा व्यवस्थाओं के लिए एक निश्चित अंश निकाला जाता था और अन्य संबद्ध ग्रामों , क्षेत्रों से संबंधित संस्थाओं और पदों के लिए निर्धारित अंश निकाला जाता था
हर गांव से कुल कृषि उपज का लगभग २५ से ४० प्रतिशत ( एक चौथाई से दो पंचमांश ) तक अंश स्वतंत्रम् के रूप में निर्धारित था
प्राय: सांस्कृतिक एवं धार्मिक संस्थाओं की सहायतार्थ ये मान्यम निश्चित किये जाते थे
आप सब को यह जानकर शायद आश्चर्य होगा कि देवी मंदिर , धर्मराज मंदिर एवं ग्राम देवता मंदिर , जिनमें साधारणतया ब्राह्मण या अन्य द्विज नहीं जाते थे , तथा जिनके पुजारी ब्राह्मण नहीं होते थे , उनको जो कुछ स्वतंत्रम् मिलते थे , वे शिव , विष्णु एवं गणेश मंदिर ( जिनकी व्यवस्था मुख्यत: द्विज नागरिक करते थे ) को मिलने वाले स्वतंत्रम् से अधिक थे
एक मोटे अनुमान से , १८०० में मद्रास प्रेसीडेन्सी में लगभग एक लाख मंदिर रहे होंगे
इस प्रकार इन आंकड़ों , एवं विवरणों से एक ऐसे राजनीति-तंत्र ( पालिटी ) का रूप उभरता है , जो महात्मा गांधी द्वारा व्याख्यायित उस 'सागरीय वृत्त वाले बोध से मिलता-जुलता दिखता है , जिसमें गांधीजी के विचार से सबसे भीतरी वृत्त सर्वाधिक आंतरिक स्वायतत्ता प्राप्त किये रहता है तथा बाहरी वृत्तों को वैसे वित्तीय , नैतिक तथा अन्य सहायता व समर्थन प्रदान करता रहता है , जो कि उन अन्य बचे हुए कामों की पूर्ति हेतु इन बाहरी वृत्तों के लिए आवश्यक हैं , जो काम स्थानीय स्तर पर संपन्न नहीं किये जा सकते
इस प्रकार इन आंकड़ों , एवं विवरणों से एक ऐसे राजनीति-तंत्र ( पालिटी ) का रूप उभरता है , जो महात्मा गांधी द्वारा व्याख्यायित उस 'सागरीय वृत्त वाले बोध से मिलता-जुलता दिखता है , जिसमें गांधीजी के विचार से सबसे भीतरी वृत्त सर्वाधिक आंतरिक स्वायतत्ता प्राप्त किये रहता है तथा बाहरी वृत्तों को वैसे वित्तीय , नैतिक तथा अन्य सहायता व समर्थन प्रदान करता रहता है , जो कि उन अन्य बचे हुए कामों की पूर्ति हेतु इन बाहरी वृत्तों के लिए आवश्यक हैं , जो काम स्थानीय स्तर पर संपन्न नहीं किये जा सकते
मिरासदार उन्हें कहते हैं , जिनका भूमि पर स्थायी अधिकार हो
उस समय भी ब्रिटिश जिला कलेक्टर को लगभग १५०० रू . प्रतिमाह मिलते थे , ब्रिटिश गवर्नर कौंसिल के सदस्य को ६ से ८ हजार रूपये प्रति माह
उसने यह भी लिखा था कि कुमाऊँ गढवाल में यह प्रथा इतनी प्रसिद्ध हो गई थी कि कुमाऊँ गढवाल के तत्कालीन कमिश्नर टी . एच . बैटन ने सोचा कि इसे समाप्त करना बेतुका तो होगा ही , साथ ही शिमला के शीर्षस्थ अधिकारियों द्वारा अपनायी गयी नीतियों के अनुरूप भी नहीं होगा
इसके अलावा ३००-४०० बैलगाडियाँ व घोडे , खच्चर इत्यादि बेगार में लिये जाते थे
भारत में १५०-२०० वर्षों के ब्रिटिश आधिपत्य के काल में शासन की नीतियों से उत्पन्न व प्रभावित दुर्भिक्षों , महामारियों इत्यादि में ५-१० करोड़ लोग अवश्य अकाल मृत्यु का ग्रास बने तथा गाय , बैल , भैंस एवं अन्य पशु कई करोडों की संख्या में नष्ट किये गये
इसके लिए अपने इतिहास , समाज और परंपरा का गहरा बोध एवं प्रशान्त विश्लेषण आवश्यक है
संभवत: इसी कारण अपने सैन्यबल से विश्वविजय एवं विश्वविध्वंस के लिए तत्पर और सक्रिय समाजों या समुदायों का सामना करने योग्य आवश्यक सैन्यशक्ति का संग्रह और संगठन करने की ओर भारतीय समाज ध्यान नहीं दे पाया
ऐसा लगता है कि अपनी इसी स्थिति के कारण भारतीय समाज आक्रमणकारियों को परास्त कर उन्हें लौटने को विवश कर देना अथवा समाज के एक अंग के रूप में घुलमिलकर रहने देना तो जानता रहा है
दक्षिण यूरोप के अनेक देशों पर एक समय इस्लाम का आधिपत्य रहा और वे उसके द्वारा अधीन रखे गये
फिर सन् १८८४ ईं . में जापान में तीस खंडों वाली एक दसवर्षीय योजना बनी
गांधीजी ने आत्मबल एवं इच्छाशक्ति से समाज को संगठित करना प्रारंभ किया तथा समाज के आत्मबल और इच्छा को जगाया
इसीलिए अपनी पराजय को लेकर क्रन्दन या विलाप या शोक करते रहना बंद करना होगा
उनमें भारतीय लोगों के प्रति गहरा ममत्व था , आत्मीयता थी
यूरोपीय इतिहासदृष्टि का ऐसा ही प्रभाव बंकिम इत्यादि पर भी दिखता है
दयानन्द अपने सीमित परिवेश के प्रभाव से बहुत दिनों बँधे रहे
ये पश्चिमीकृत अभिजन , यूरोप के अधिकाधिक सम्पर्क में आते गए
इन लोगों में राष्ट्रवाद था , वे राष्ट्रको सुदृढ देखना चाहते थे
गांधीजी के पहले कुछेक सौ वर्षों से भारत में मानो क्षेत्र या अंश विशेष के ही प्रतिनिधि नेता उभरते रहे
यही गांधीजी का मुख्य सामाजिक योगदान है कि उन्होंने भारतीय समाज के विश्वास को फिर से प्रतिष्ठा दी , शक्ति दी , प्रत्यावर्तन किया
स्मृति , संकल्प , बोध और लक्ष्य के विशिष्ट लक्षणों द्वारा ही किसी सभ्यता की विशेष पहचान होती है
पुरानी सभ्यताओं में से चीन और भारत का उल्लेख किया जा सकता है , जो अभी भी सक्रिय हैं
ग्रीक काल से ही यूरोपीय सभ्यता इन्हीं आधारों पर टिकी रही है
अनन्तता का बोध जहां अनन्त सागरीय वृत्तों के बोध की ओर ले जाता है , वहीं सत्यदूत द्वारा अनुशासित 'मैटाफिजिक्स' एक विशिष्ट उच्चावच्चक्रम युक्त समाजपद्धति को जन्म देती है
ग्रीक काल से ही यूरोपीय सभ्यता इन्हीं आधारों पर टिकी रही है
यह सुनिश्चित एवं प्रतिष्ठित यूरोपीय दृष्टि है
भारतीय समाज आज दो भागों में विभक्त है , यह यथार्थ स्थिति है
बृहत् भारतीय समाज का तो है ही , पश्चिमीकृत भारतीयों का भी है
आधुनिक राज्य तंत्र के दो-ढ़ाई लाख व्यक्ति पश्चिमीकृत वर्ग की प्रशासनिक शाखा है , जिन्हें यूरोप की भाषा में भारत का 'आफिसर क्लास' कहा जा सकता है
सन् १७५० से १८५० ईस्वी तक तो भारत में व्यवस्थाओं , खेती व शिल्प उद्योग आदि के तंत्र और सामाजिक , शैक्षणिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के बिगड़ने का समय ही रहा
इसी समय कुछ लोहे व इस्पात के यूरोपीय ढंग के कारखाने भी स्थापित हुए , १९४७ ईस्वी तक कपडे व शक्कर बनाने के कारखाने तो भारत में काफी बनाये जा चुके थे
सन् १९३६-१९४५ के यूरोपीय युद्ध के समय कुछ बन्दूक , बारुद , इत्यादि के कारखाने भी बने
यहां तक कि भारत के विश्वविद्यालय भी आक्सफर्ड व कैम्बिज के 'मॉडल' पर न बनकर ईस्वी सन् १८२५-३० में लन्दन युनिवर्सिटी का जो 'मॉडल' बना था , उस पर बनाये गये
सन् १९४७ ई . से अब तक स्वतंत्र भारत में जो हुआ , वह बडी सीमा तक सन् १८५० ई . के करीब अंग्रेजों ने जो यहां आरम्भ किया था , उसी का विस्तार है
भारत में जो दो लाख के करीब परिवार देश की व्यवस्था , औद्योगिक-वाणिज्य और वित्तीय तंत्र , देश के विज्ञान , प्रौद्योगिकी व शिक्षा संस्थाओं , देश की रक्षाव्यवस्था , देश की संसदीय व्यवस्था व न्याय व्यवस्थाओं इत्यादि को संभाले हुए हैं , वे सब इस बरबादी के काम में भागीदार हैं
भारत में १२-१५ करोड़ परिवारों में से केवल दो लाख परिवार ही भारत की हर तरह की व्यवस्था की देखभाल करते हैं , यह कोई निराली बात नहीं है
इसी समझ में से प्लेटो के 'फिलासफर किंग' की व बीसवीं सदी में बर्नार्ड शॉ के 'सुपरमेन' की बात निकली
हो सकता है , भारत के सैकड़ों व हजारों गांवों में जो आग पर चलने की प्रथा आज भी प्रचलित है- आज से सौ वर्ष पहले तो यह उत्सव कम से कम दक्षिण व मध्य भारत के हर क्षेत्र में मनाया जाता था-वह भी दस बीस वर्ष के बाद भारत के अभिजनों के लिये ही रह जाये
तब ऐसा तो शायद अवश्य हो सकता है कि भारत के इस 'फायर वॉकिंग' का सार्वभौमीकरण हो जाये और वह विश्व के औलम्पिक्स का एक बड़ा खेल बन जाये
हमारे संन्यासियों व धर्मगुरुओं के पास तक ऐसी नैतिक व आध्यात्मिक शक्तियों का ह्रास हुआ है
दस बीस बरस में तो सब सरकारी घर ( चाहे उसमें मंत्री रहते हों या सरकारी अधिकारी ) समाप्त होने ही चाहिये
कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र को प्रमुखता दी क्योंकि कार्ल मार्क्स में बहुत गहरा और प्रबल यूरोपीय तथा ईसाई संस्कार , संवेग और बोध था
स्वयं मार्क्स के अपने जीवन में या कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के जीवन में अर्थशास्त्र प्रमुख नहीं होता , राजनीति ही प्रमुख होती है
हमारे अभिजनों और शासक वर्ग को विद्याओं की समझ ही नहीं रही
मिट्टी के विविध रूप , उनकी क्षमताएं , उनकी आवश्यकताएं , ऊपरी पपडी का स्तर , नमी का स्तर , उनकी सम्भावनाएं , भूमि की जुताई की आवश्यकता का स्वरूप व स्तर , मौसम की जानकारी , वर्षा सम्बन्धी भिन्न भिन्न रूपों और सम्भावनाओं की जानकारी , ठंड , पाला , कुहासा , धुंध , ओस , शीतलहर आदि के रूपों और प्रभावों तथा उस सन्दर्भ में आवश्यक व्यवस्थाओं की जानकारी , घास और गर्मी सम्बन्धी जानकारी , हवा के भिन्न भिन्न रूपों , रुखों , वेग और प्रभावों तथा उपयोग की जानकारी , सिंचाई सम्बन्धी विविध रूपों और व्यवस्थाओं की जानकारी , बीज की किस्मों और सामर्थ्य का ज्ञान , फसल के अंकुरण , विकास , वृद्धि और पकने सम्बन्धी विविध दशाओं का ज्ञान , कटाई-गुडाई-बीज और फसल के प्रबन्ध तथा भंडारण का ज्ञान , अलग अलग अनाजों के गुणों और प्रभावों का ज्ञान , कृषि के उपकरणों सम्बन्धी ज्ञान , अपने गाय-बैल , भैंस-बकरी की किस्मों , गुणों , सामर्थ्य , जरुरत , पोषण , रक्षण , प्रेम , अनुशासन आदि सम्बन्धी ज्ञान , कुत्ते , बिल्ली , बन्दर , खरगोश , चिडिया तथा विविध पशुपक्षियों सम्बन्धी ज्ञान , शिष्टाचार और व्यवहार के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अर्थ , उनके प्रभावों का ज्ञान आदि विस्तृत गहरा ज्ञान किसान नरनारियों को तथा अन्य ग्रामीण नरनारियों को रहता है
ये साधनस्रोत स्थानीय स्वायत्त इकाइयों के नियंत्रण में रहने देना चाहिए
विद्या के ये सभी रूप हमारे राष्ट्रीय ज्ञान के विविध अंग हैं
ज्ञान विहीन तो संस्कृति हो ही नहीं सकती
अनिर्णय , अज्ञान और आत्मविरोध की स्थिति किसी भी स्वाधीन समाज को शोभा नहीं देती और इस स्थिति में स्वाधीनता अधिक दिन टिक भी नहीं पाया करती
क्योंकि , जैसी कि महात्मा गांधी ने १४ फरवरी १९१६ को मद्रास में ईसाई मिशनरियों के एक सम्मेलन में दिए गए अपने भाषण में स्वदेशी की परिभाषा की थी ''स्वदेशी वह भावना है , जिससे कि हम आसपास के परिवेश से ही अपनी अधिकतम आवश्यकतायें पूरी करते हैं और उनसे ही अधिकाधिक व्यवहार सम्बन्ध रखते हैं तथा स्वयं को उनका सहज अभिन्न अंग समझते हैं , न कि दूरस्थ लोगों और वस्तुओं से स्वयं को जोडने लगते हैं
महात्मा गांधी द्वारा की गई स्वदेशी की इस परिभाषा को शायद आज और अधिक स्पष्ट करना पडे या शायद उसे कुछ परिवर्तित या परिमार्जित और परिष्कृत करना पडे
स्वदेशी की भावना का उपयोग १७ वीं १८ वीं शती ई . में इंग्लैंड में भी किया गया
भारत में १९०५ ई . में स्वदेशी का एक सशक्त आन्दोलन उभरा जो बंगाल के विभाजन के विरोध में उठा था
इस स्वदेशी आन्दोलन की प्रमुख प्रेरणा स्वामी विवेकानन्द थे और इसके सर्वाधिक सक्रिय नेताओं में थे श्री अरविन्द घोष
फिर कर्मवीर महात्मा गांधी जब जनवरी १९१५ से भारतीय सार्वजनिक जीवन में आये तब से स्वदेशी के भाव और विचार में पुन: वेग आया
बाद में भारत से उन्होंने चेचक के टीके की अधिक परिष्कृत और उन्नत विधि सीखी
१७९०-१८१० के बीच , विशेषत: पुणे क्षेत्र से , अंग्रेजों व यूरोपीयों ने यह विज्ञान सीखा
बढिया लोहा और इस्पात बनाने की तकनीक भारत में प्रचलित थी
बताते हैं कि जब ये २० इंजन जापान पहुँचे तो जापानियों ने उसमें से एक इंजन को पूरी तरह से खोल डाला और उसके सब कलपुर्जे भलीभांति देख-समझ तथा जाँच लिये और फिर उसी रूप में उन्हें जोड दिया
१८९१ से १९३१ के बीच के , भारतीय जनगणना के अंग्रेजों द्वारा तैयार आँकडे उपलब्ध हैं
यह तो होगा कि देसी भाषाओं में किसी को साक्षर , इन जनगणनाओं में , तभी लिखा गया हो , जब वह स्कूली प्रमाणपत्र दिखाए , इसीलिए शायद देसी भाषाओं में साक्षरता का प्रतिशत अंग्रेजी साक्षरता से केवल चौगुना या आठ गुना दिखता है
भारतीय भाषाओं की पढाई में कमी का मुख्य कारण पूरे देश में चलाई जा रही ब्रिटिश नीति ही होगी
जब हम विदेशी भाषा को अपनाते हैं तो प्राय: स्वयं को और विश्व को , व्यक्ति , समाज , संस्थाओं , मान्यताओं तथा लक्ष्यों , रुचियों , आदर्शों आदि को भी हम उसी भाषा परम्परा और संस्कृति परम्परा से देखने लगते हैं
इसमें यह दृष्टि है कि जीवमात्र पवित्र है और आदरयोग्य है
हर समूह की सामाजिक उपभोग की मर्यादायें निश्चित थीं
चीटियों , कौवों , कुत्तों के लिए अंश निकालने , बन्दरों को चने आदि खिलाने , गायों की सेवा करने , सांड़ आदि को मुक्त छोड़ने , मछलियों को खिलाने , नदियों के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव , तालाब , कुएं , बावड़ियाँ बनवाने को पुण्य कर्म मानना , चिड़ियों तथा विविध पक्षियों को चुगने के लिए दाने डालना; शेर , मगर जैसे भयंकर माने जाने वाले जीवों के लिए भी गहरी आत्मीयता तथा परस्परता का भाव रखना और उनसे किसी अतिरंजित भय को न पालना , सांप को दूध पिलाना , शादीविवाह में नदियों-बावड़ियों-कुओं आदि को पूजना और न्यौतना-ये सब इसी भारतीय जीवन दृष्टि के अभिन्न अवयव हैं
इस भारतीयता में मनुष्य कोई सृष्टि का केन्द्र नहीं है , सहज अंश है
समस्त जीवनरूप पूज्य हैं , पवित्र हैं और जीवन रूपों की विविधता सहज है , रक्षणीय है तथा सम्मान योग्य है
जनपदों और कुलों के आधार पर मनुष्यों की समाजिक पहचान ही स्वाभाविक है
स्वराज आने का लक्ष्य यह था कि हम भारत के अपने सन्दर्भ को फिर से पायें तथा बिखरे और रौंदे हुए भारतीयता के लाखों टुकड़ों को भारत के सन्दर्भ से , फिर से जोड़ें
पुराने अवशेषों के अलावा , अब हमारे यहाँ बहुत ही अधिक , पिछले २००- ४०० बरस में बनीं व्यवस्थाओं , कानूनों , तन्त्रों , बीमार मानसिकताओं का ढेर का ढेर कबाड़ इकट्ठा हो गया है
यही कि अब एक और उपवास हो जायेगा
मुसलमानों का कब्जा तो १२०० से शुरू हुआ
काले टीके की बात उन्हें इसलिए नहीं जमती कि उस समय इंग्लैंड में गरम लोहे से दाग कर सजा देने का आम रिवाज था
क्या था अंग्रेजों के जमाने के अठारहवीं सदी के भारत का नक्शा ? यह दलित ( डिप्रेस्ड ) समाज तो अंग्रेजों का किया वर्गीकरण है
पश्चिमी रंग में रंगे नेहरू के लिए तो इस कच्चे मॉडल को आगे बढ़ाने का सवाल नहीं था
देश न स्वदेशी मॉडल पर दृढ रह सका और न विदेशी मॉडल अपना सका
आम लोगों को हिकारत से देखने का नजरिया कलेक्टरों , ऊँचे वर्गों और राजनीतिकों में ही नहीं है , सेवाग्राम और पवनार जैसी ऊंची जगहों में भी आए नवयुवकों को यही सिखाया जाता है कि गांव वालों से ज्यादा सम्पर्क न करो
ऐसा इसलिए किया गया कि जहांगीर का भारत से लगाव नहीं था
जापान की जीत पर गांधीजी बहुत खुश होते हैं
१७५० के पहले मनुस्मृति हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी
इसलिए यह ताज्जुब की बात नहीं कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज जीन्स और स्कर्ट पर जीने लगा है
पर आज भी पश्चिमीकरण को मानने वालों की संख्या हमारे समाज में दो फीसदी से ज्यादा नहीं है
पर बात तो ऐसी बैठी है कि अब सहकारी संस्थाओं का जो साल फसलों से जुड़ा था , ३० जून को पूरा होता था , वह भी अब ३१ मार्च को पूरा होने लगा है
कांग्रेस को खत्म करने की बात इसलिए करते हैं कि जिस काम के लिए उसका ढांचा बना था , वह काम पूरा हुआ
गांधी १९४६ में जब नोआखली जाते हैं तो निर्मल बोस उनके साथ रहते हैं
केदारनाथ मन्दिर की संपत्ति के कागजात लन्दन में पड़े हैं
भारतीय समाज की मूल इकाई ‘कुल’ हैं
हमारा यह विरोध इसलिए है कि कांशीराम और मायावती हम लोगों से ऊंची बात कर रहे हैं
पारम्परिक तकनीकी और स्थानीय मेधा की अवहेलना से अपने लोगों का आत्मविश्वास घटा है और स्थानीय प्रौद्योगिकी द्वारा बुनियादी स्तर पर समस्याओं के समाधान की क्षमता पर भी असर पड़ा है ( देखें ‘हिन्दू' , मद्रास १० जनवरी , १९८३ ) इसी अवधि में अन्यत्र सम्पन्न एक सभा में एक विशिष्ट और राजनैतिक तथा प्रशासनिक सत्ता के बहुत करीब रहे व्यक्ति ने यह अभिमत व्यक्त किया कि मौजूदा न्यायिक पद्धति 'नागरिकों के हित संरक्षण की दृष्टि से बहुत संवेदनाहीन , बेहद धीमी , और बेहद खर्चीली है
उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अब ऐसी संस्थायें बनानी होंगी , जो अपने समाज में अन्तर्निहित प्रवृत्तियों के अनुरूप हों
कुछ ही समय पहले भारत एशियाड १९८२ की मेजबानी कर चुका है
खेलों में ऊँचा स्थान भारत को नहीं पूर्वी एशिया के चीनी गणतंत्र और दोनों कोरिया जैसे देशों को मिला
सामान्यतः यह दावा किया गया है कि इस एशियाड की तैयारी में हमने अपनी उस तकनीकी दक्षता का अनुभव बढ़ाया जो कि विकसित देश ही रखते हैं
सदस्यों का सामान्य अभिमत यह था कि यह मसविदा भारतीय चिन्तन एवं विचार का विरोधी है
किन्तु दिसम्बर १९२९ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश राज्य से पूर्ण स्वतन्त्रता की उपलब्धि का लक्ष्य निश्चित किया और महात्मा गांधी द्वारा तैयार स्वातन्त्र्य प्रतिज्ञा में कहा गया , ‘हमारा विश्वास है कि हर एक समाज की तरह , भारतीय जन का भी यह अहस्तान्तरकरणीय अधिकार है कि वह स्वाधीन रहे और अपने परिश्रम के फल का आनन्द ले तथा जीवन की जरूरतों से इस प्रकार युक्त रहें कि उनके पास विकास के सम्पूर्ण अवसर हों
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक , राजनैतिक , सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया है और पूर्ण स्वराज पाने पर ही भारतीय जन विकास के पूर्ण अवसर पायेंगे , यह मुद्दा एक हद तक उस भारतीय संविधान द्वारा भी पुनः पुष्ट किया गया जो कि भारत ने जनवरी १९५० से अपने पर लागू किया
किन्तु , भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया गया है , और जिसका निहित अर्थ है कि इस समाज को विघटित और विस्थापित किया गया है , और उसके जनसाधारण के आत्मगौरव का अत्यन्त हनन हुआ है , प्रतिष्ठा समाप्त की गई है तथा उनकी पहल की क्षमता रौंदी गई है , प्रतिज्ञा के इस आशय वाले वाक्यांश की उन लोगों के बीच और उनके काम पर कोई अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं परिलक्षित हुई , जिन्होंने १९४६ के बाद आगे भारत में शासन करना शुरू किया
अपने शुभेच्छु विदेशी मित्रों की तरह , जो तब भी ऐसा सोचते थे और अब भी सोचते हैं , हम लोग भी यह मान बैठे कि ये सामान्य भारतीय देशवासी अपनी मानसिक क्षमता पूरी तरह खो बैठे हैं और सांगठनिक मामलों में या तकनीकी के क्षेत्र में किसी सृजनात्मक योगदान की उनमें क्षमता नहीं है
जिन्होंने दिल्ली के शक्ति केन्द्र द्वारा संचालित प्रक्रिया के विरुद्ध व्यापक सार्वजनिक असहमति को वाणी दी थी
इस सन्दर्भ में एक बुनियादी दस्तावेज जो १९५८ में सामने आया वह था-जयप्रकाश नारायण लिखित ‘ए प्ली फॉर द रिकन्स्ट्रक्शन ऑफ इंडियन पोलिटी' ( A plea for the Reconstruction of Indian Polity ) |
आकाशवाणी , दूरदर्शन पर समाचार प्रसारणों के पूर्व अक्सर प्रसारित होने वाले नेताओं के वक्तव्यों और सन्देशों में यह दुहराया जाता रहता है कि १९२१ में भारत की आबादी इतनी थी और अब इतनी है , तथा २००१ में इतनी होगी
‘एडिनबरो रिव्यू' के ही अनुसार उन दिनों गेहूं आदि के बीज की दरें ब्रिटेन में वही थीं , जो कि भारत में थी; किन्तु भारत का उत्पादन बहुत अधिक था
यानी यह कि जो आवासगृह अभी भी बनने हैं , उनमें से जिनमें दो दो शौचालय होने हैं , उनमें से एक भारतीय ढंग का भी होगा
प्रथमतः हमने भारतीय संविधान को मुख्यतः पश्चिमी विचारों व्यवहारों के अनुकूल ढाला
यदि भारत को एक सभ्य समाज के रूप में बचे रहना है तो उसे वर्तमान प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न आज की इस किंकर्तव्य विमूढ़ता की दिशा में से कोई और रास्ता निकालना होगा
१९ वीं शताब्दी में तथा २० वीं शताब्दी के आरम्भ में भी यानि उस सम्पूर्ण अवधि में भी जब भारतीय किसान की अपने खेतों में निवेश की क्षमता निम्नतम बिन्दु तक पहुँचा दी जा चुकी थी , और उसके कृषि औजार तथा मालमवेशी बड़ी मात्रा में बरबाद कर दुर्दशाग्रस्त बनाये जा चुके थे , किसान ने देश को पर्याप्त अनाज देकर जीवित रखा , यह तथ्य उसकी सामर्थ्य और प्रतिभा का पर्याप्त दृष्टान्त है
भारतीय जनगण अपेक्षाकृत सौम्य प्रकृति का है
जैसा कि मार्च १९४४ में किसी ने गांधीजी से कहा था , भारतीय दृश्य पर उनके उदय से पूर्व तक फिरोज शाह मेहता जैसे लोग भी अंग्रेजों से बोलते वक्त दब्बू और विनीत होते थे
इस क्रियाशीलता से हिन्दुस्तान से अभाव , दरिद्रता और पराश्रय के समुद्र के बीचों बीच पश्चिमीपन और अति समृद्धि के कुछ सौ नखलिस्तान तथा परकीय अन्तःक्षेत्र विकसित हो गये हैं तथा समस्त नैतिक आचरण और मानदण्ड क्षतविक्षत हो चुके हैं
इस प्रकार हम दैनन्दिन जीवन में सहभागिता और सृजनात्मकता का प्रवर्तन कर सकते हैं तथा एक या दो दशकों में अपने समाज को पूर्ण स्वस्थ बना सकते हैं
जैसा कि गांधीजी करते थे , तथा हर बार यह भली भाँति देख लें कि जो कदम हम उठा रहे हैं वह ठोस आधार पर टिका है तथा हमारे उद्देश्य की दिशा में है और उसका पोषक है
इसका सबसे ज्यादा असर परिवार पर पड़ा है
भारत और एशिया व अफ्रीका के बहुत से इलाकों में , यहां तक कि यूरोपीय लोगों का नियंत्रण होने से पहले तक , अमेरिका में भी समाज की अवधारणा गहरे स्तर पर रही है
इस तरह हमारे यहां परिवार एक व्यापक और अन्तर्गठित समाज का अंग रहा है
करीब दो सौ साल पहले अंग्रेजी शासन के शुरू होने के साथ साथ हमारे समाज और हमारी राज्य व्यवस्था में एक गहरी दरार पड़ गई थी
समाज की बुनियादी इकाईयां जीवनमरण के संघर्ष में पड़ गईं , और अपने भीतर सिकुड़ती चली गयीं
विशेषकर १८२९ में जब ब्रिटिश गर्वनर जनरल बेंटिक ने यह लिखा था कि पुराने जमाने में जो साधन गरीबों और ब्राह्मणों को बांटने में खर्च किये जाते थे उन्हें अब यूरोपीय लोगों के स्वागत और मनोरंजन पर खर्च किया जाता है
संविधान का यह प्रारूप दो लोगों ने , कानून मंत्री और संवैधानिक सलाहकार ने तैयार किया था
जब १९४२ में रुझवेल्ट ने यह सुझाव दिया कि भारतवर्ष पश्चिमी 'ऑरबिट' में ( छत्रछाया में ) रहे , तो उनका व अंग्रेजों का शायद यह तात्पर्य नहीं रहा होगा कि हम उनकी तरह शक्तिशाली , संपन्न व आधुनिक बन जाएँ
आज देश में जो हो रहा है वह तो एक बहुत निचले स्तर का यूरोप व अमरीका का अनुकरण हो रहा है
यूरोप का वैचारिक प्रभाव तो हमारे यहाँ १८२० से शुरू हो गया था; यह क्रमश: बढ़ता गया और शायद १९०० तक देश का राजनैतिक , शैक्षणिक व व्यापारिक नेतृत्व इससे प्रभावित लोगों के हाथों में चला गया
यूनानी और ईसाइयत के विचार से भी समग्र प्रकृति , उसके पर्वत , नदियां , झरने , समुद्र , वृक्ष , पशु पक्षी , कीडे-मकोडे इत्यादि मनुष्य के उपयोग के लिए ही बने हैं
अपने को समझने और पहचानने के लिए अपने पुराने समाज और जीवन के भौतिक तथ्य जानना भी आवश्यक है
नए भारत की रचना तभी ठीक तरह से सम्भव होगी जब हम अपनी परम्पराओं , मान्यताओं , धारणाओं और स्वभाव को समझ पाएंगे
फिर भी यह सम्भव है कि जिन क्षेत्रों में बौद्ध मत का प्रभाव रहा है और जहाँ भारतीय व चीनी ( इसमें जापान , कोरिया , कंबोज , इंडोनेशिया सभी आ जाते है ) मान्यताओं व परम्पराओं का असर रहा है , वहाँ सब जीवों का आत्मसम्मान उनकी अपने समूहों में पारस्परिकता व स्वतंत्रता काफी हद तक शीघ्र ही वापस लाई जा सकती है
जैसे , अंग्रेजो या उनकी शिक्षा का कहना या उनकी शिक्षा थी कि 'भारत के ऊपर तो सदैव दूसरों ने ही राज किया है , भारत कभी स्वाधीन नहीं रहा |' वे यह भी कहते थे कि उन्होंने हमें बचा रखा है , नहीं तो इस्लाम व पश्चिम के इस्लामी देश भारत को खा जायेंगे
अधिकांश सुधार आन्दोलन भारतीय इतिहास के प्रति ग्लानि का भाव जगाने वाले बन गए
ब्रिटिश काल में इसने अंग्रेजों के आचारव्यवहार और बोली तथा अभिव्यक्ति की विधियों को अंगीकार कर लिया
१९३८ ई . में श्री सुभाषचन्द्र बोस ने ही एक राष्ट्रैय योजना समिति बनाई थी , जिसके संयोजक वे स्वयं थे और अध्यक्ष थे श्री जवाहरलाल नहेरू
सन के पौधे के उपयोग से कागज बनाने तथा इसी तरह अलग अलग वनस्पतियां , आदि से रंगाई के विविध रसायन बनाने की प्रौद्योगिकी भी विकसित थी
विशेषकर इंग्लैंड और अमेरिका तो पिछले पांच सौ बरसों से पूरी तरह हिंसक स्वभाव के रहे हैं
यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा लगता है
१८ वीं शताब्दी के इस यूरोपीय विचार से ही हम भी भरे हुए थे कि यदि अवसर उचित रहे तो हम लोग भी उनके रास्ते पर चलते हुए उनके बीसवीं सदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे
इसी प्रकार , सम्पन्न लोगों और बृहत् समाज के बीच संवाद घटता गया
इस तरह हर क्षेत्र में हमने समाज की अपनी स्वाभाविक आत्माभिव्यक्ति को अवरुद्ध किया , बाधित किया
४०-५० वर्ष पहले हमारे मित्र रामस्वरूप ने अपनी पुस्तक "कम्युनिज्म एंड द पीजैण्ट्री' में आधुनिक उत्पादन ( मॉडर्न प्रोडक्शन ) के विषय में कुछ प्रश्न उठाये थे
रामस्वरूप ने इसको 'साइक्लिक प्रोडक्शन' का नाम दिया था
भारतीय मान्यताओं में तो संसार ने सभी तरह के जीवों को , लोगों को और समाजों को रहना ही है
सन् १७५० से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही , अंग्रेजों ने यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था
इसके साथसाथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी व्यवस्था ने तिगुना चौगुना बढ़ा दिया और सन् १७९० के आसपास जमीन की मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी , जिन्हें जमींदार कहा गया
वैसे इंग्लैंड में ७०० वर्षो से जमींदार होते रहे थे , लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल का ५०-८० प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे , सरकार को कुल फसल का लगभग १० प्रतिशत देते थे
अंग्रेजों ने जो न्यायलय स्थापित किये उनमें अब तक भी यह बात ज्यादा चलती रही कि भारतीय असत्य ही बोलते हैं
पिछले पचास बरस में हमारी राजनैतिक , समाजिक व आर्थिक स्थिति दक्षिण अमरीका व आफ्रीका के देशों जैसी होने लगी है
वैसे जो सदस्य सांसद या विधायक बनता है वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है , न कि किसी दल का भृत्य
वैसे तो आज का सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , सांस्कृतिक ढांचा इन २००-१५० वर्षों में , या और पहले से ही , जर्जर होता गया है , लेकिन पिछले ८-१० बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है
१९३० में ८ वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार गांधीजी को देखा
१९६४-६५ में श्री धर्मपालजी आल इण्डिया पंचायत परिषद के शोध विभाग के निदेशक रहे
फिलिस लन्दन में , बापूग्राम में , दिल्ली में , सेवाग्राम में उनके साथ रहीं
अयूरोपीय देशों के विज्ञान एवं तंत्रज्ञान से सम्बन्धित सामग्री इस ग्रंथ में प्रस्तुत है
इस क्षेत्र की सत्रहवीं अठारहवीं शताब्दी की उपयोगी जानकारी प्राप्त करने की यूरोप की खोजबीन का यह परिपाक है
समुचित समझ के अभाव के दो उदाहरण प्रस्तुत हैं - शीतला प्रतिरोधक टीकाकरण तथा वपित्र के उपयोग से सम्बन्धित हैं
इंग्लैंड में उसका पहली बार उपयोग सन् १७३० में हुआ , परंतु व्यापक मात्रा में उसका उपयोग करने में संभव है और ५० वर्ष लग गये थे
इस कालखण्ड से पूर्व , नये विश्व को समझने की अयूरोपीय विश्व के ज्ञान और संस्थाओं की उपयोगिता भी लगभग १८२० के बाद घटती गई
इसके अतिरिक्त सन् १८२० तक अयूरोपीय विश्व के अधिकतर क्षेत्र अपने स्वत्व को खो बैठे थे
जातिगत यूरोपीय पूर्वाग्रह ( सुशिक्षित और विद्वान वर्ग में भी वे कम न थे ) का प्रसार , भारतीय खगोलविद्या और बनारस की वेधशाला के विवरण में नाटकीय ढंग से प्रत्यक्ष होता है
कुवियर की 'द थियरी ऑफ अर्थ' ( जिसमें कुवियर ने भारतीय कोष्ठकों का मजाक उड़ाते हुए अस्वीकार कर दिया था
 ) में समीक्षा करते समय , परिवर्तित रुख तथा यूरोप एवं अयूरोपीय दुनिया के बीच के संबंधों को ध्यान में रखकर 'एडिनबर्ग रिव्यू'ने लिखा है , "पिछले कुछ वर्षों से प्राच्य विज्ञानों की प्राचीनता विषयक विपरीत अभिप्रायों में वृद्धि होते हुए भी , खगोलविद्या के इतिहासकार ( अर्थात् बेइली ) के प्रमुख तर्कों का कभी भी खण्डन हुआ हो , ऐसा नहीं लगता है
भारतीय विविध क्षेत्रों के अठारहवीं शताब्दी के विद्वानों और विशेषज्ञों के बाह्य संपर्कों के अभाव के मूल में संभवत: दो बातें हैं : एक , ( ज्ञान को ) गूढ़ बनाने की अथवा गुप्त रखने की प्रवृत्ति तथा दो , उनकी ( सत्य अथवा असत्य ) मान्यता अथवा उनके सिद्धान्तों के क्लिष्ट तर्क और जटिलताओं को अधिकांश यूरोपीय समझ सकें ऐसी स्थिति का अभाव
उनमें से कुछ को अध्याय तीन और चार में निष्कर्ष रूप में दिया गया है , जिसमें ऐसी कल्पना व्यक्त हुई है कि अन्यत्र जो कुछ भी अस्तित्व में है उसके मूल भारत में थे
एक दूसरा परिमाण 'हिन्दू धर्म का उद्भव ब्रिटिश टापुओं में हुआ था ' इस प्रकार की सूचनाओं से प्राप्त होता है
खगोलविद्या के यंत्र जयसिंह ने सन् १७३७ के आसपास उसमें रखे थे
वाराणसी की वेधशाला के इस इतिहास के आधार पर एक विचारणीय मुद्दा खड़ा होता है कि पीयर्स तथा ए . केम्पबेल के सहित बार्कर ने सन् १७७२ में वेधशाला में मुलाकात की थी
इसके बाद जॉन प्लेफेर ने १७८९ में पढे गये शोध आलेख 'ब्राह्मणों का खगोलविद्या विषयक निरूपण' ( Remarks on the Astronomy of Brahmins ) की लंबी और विद्वत्तापूर्ण समीक्षा अध्याय-३ में समाविष्ट है
पूर्व के प्रारंभिक संपर्कों के अंतर्गत 'ईस्ट इन्डीज़' से यूरोपीय विद्वानों को प्राप्त कतिपय खगोल के कोष्ठकों द्वारा लेखक आरंभ करता है
परंतु विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें ०° रेखांश श्याम नहीं परंतु बनारस था
कारण कि उसने सामान्य रूप से यूरोप के किसी रूढिगत अंधविश्वास अथवा मान्यता को चुनौती नहीं दी थी
कर्नल कीड के अनुसार "व्रण के उपचार के क्षेत्र में , जिसमें हम उन्हें अति अल्प विकसित मानते हैं , खराब से खराब नासू ( छिद्र ) और फोड़े-फुन्सी के उपचार में , हमारी अपेक्षा से सर्वथा विपरीत , डाम देकर वे प्राय: सफल होते हैं और हमारे शल्य चिकित्सक ( Surgeons ) के कौशल को निस्तेज कर देते हैं
दो वर्ष बाद उन्होंने 'कटी हुई नाक जोड़ने" का उल्लेख किया और 'पशुओं के अंग' जोड़ने हेतु प्लास्टर के रूप में प्रयुक्त किये जानेवाले द्रव्यों का जत्था लंदन भेजा | १८०२-०३ में बंगाल प्रेसीडेन्सी में ( और कदाचित अन्यत्र भी ) प्रतिबंधित हुए , उससे पहले शीतला प्रतिरोधक 'टीके' , समग्र भारत में नहीं तो कम से कम उत्तर और दक्षिण भारत के बहुत बड़े क्षेत्र में व्यापक रूप से प्रचलित थे
'भारतीय खेती में छिटकाव या सिंचाई कोई आश्चर्य की बात नहीं है; बल्कि काफी मात्रा में वह व्यापक और अधिक निष्ठा तथा कुशलता से होती है
परंतु , इतना तो स्पष्ट है कि कृत्रिम सिंचाई के अलावा ( १ ) बारी बारी से ( बदलते हुए ) फसल लेने ( २ ) खाद का उपयोग करने ( ३ ) ( वपित्र से ) जोतने और ( ४ ) वैविध्यपूर्ण अनेक औजारों का उपयोग करने की पद्धति बहुत व्यापक थी
४३ उन्हें वह फौलाद 'उत्तम प्रकार की छुरी और चाकू तथा विशेषकर चीरफाड़ हेतु प्रयुक्त सभी धारदार औजारों के लिए उपयुक्त'लगा था
सन् १७९४ में उसका परीक्षण और पृथक्करण करने के बाद उसकी मांग बहुत बढने लगी थी
शेफील्ड में , उत्तम प्रकार से निर्मित वात भट्टियाँ कच्चा फौलाद पिघलाने में कम से कम चार घण्टे लेती हैं
५१ परंतु अध्याय १४ में दिया गया विवरण कदाचित सबसे पुराने विवरणों में से एक ब्रिटिश विवरण है
हो सकता है कि भारत में जो विनिपात शुरू हो गया था उसी कारण से लोहे के उत्पादन में प्रयुक्त होनेवाले ईंधन का उपयोग बहुत बढ़ गया हो , इस स्थिति के आधार पर अथवा कुछ चयनित क्षेत्रों की आधार सामग्री का उपयोग कर ( १८९० के दशक में ) महादेव गोविन्द रानाडे ने कहा कि भारत की आंचलिक प्रक्रियाओं में ऊर्जा और संसाधनों का बहुत दुर्व्यय होता है , एक टन लोहा बनाने के लिए चौदह टन जितने ईंधन की आवश्यकता पड़ती है
एक भट्ठी वर्ष में औसतन ३५ से ४० सप्ताह चलती होगी ऐसी धारणा करें तो प्रति भट्ठी की वार्षिक उत्पादन क्षमता २० टन रही होगी
एक भट्ठी वर्ष में औसतन ३५ से ४० सप्ताह चलती होगी ऐसी धारणा करें तो प्रति भट्ठी की वार्षिक उत्पादन क्षमता २० टन रही होगी
'लोहे और फौलाद का भारतीय उत्पादकों को ( अन्य प्रसंगों में , दूसरी चीज-वस्तुओं के उत्पादक , अथवा अन्य व्यावसायिकों को ) अपनी कारीगरी विषयक जानकारी नहीं हो पाई थी' यह मंतव्य निश्चित रूप से , निरीक्षक जिस समाज के थे उनके जातिकेन्द्रित विचार और भाव से पैदा हुआ है , अवलोकन और वर्णित विषयों से नहीं प्राप्त हुआ है
उत्तर भारत में सन् १७९० के दशक में उपयोग में लाई जानेवाली नौकाएँ और नदियों में चलनेवाले अन्य यानों के चालीस जितने रेखांकन देकर , उसने कहा कि 'जहाज निर्माण से संबंधित प्रत्येक विषय का बारीकी से ध्यान रखनेवाले अंग्रेजों ने हिन्दुओं से जानकारी प्राप्त कर अपने जलपोतों में बहुत से सुधार एवं परिवर्तन सफलतापूर्वक अपनाये हैं
अध्याय एक , दो , पाँच , और छ: में वर्णित खगोलविद्या और गणितशास्त्र के विषय में प्राय: बहुत से विद्वान जानते हैं
सभी स्वदेशी विषयों के विषय में उदासीनता और एक प्रकार से तिरस्कार की भावना पैदा करनेवाली सोच आज़ादी के बाद भी विद्यमान है
एक के बाद एक भाष्यकारों ने अपने भाष्यों में पैनी बुद्धिमत्ता और निर्णयात्मकता का प्रदर्शन किया है
'एक अत्यंत कठिन कूटप्रश्न का १२०० से अधिक वर्ष पूर्व एक भारतीय बीजगणितकार द्वारा दिया गया हल , यूरोप जिनके लिए गर्व कर सकता है ऐसे १८वीं शताब्दी के अंत के नैसर्गिक लाक्षणिकताओं और शोधवृत्ति रखनेवाले दो अति विख्यात गणितशास्त्रियों के साथ स्पर्धा कर सकता है
पौर्वात्य विशेषज्ञों के संदर्भ में मैकाले लिखता है , 'किसी अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक टाँड भी भारत और अरबस्तान के समग्र देशी साहित्य के बराबर मूल्यवान है
इसी प्रकार से अयूरोपीय विश्व में विज्ञान और तंत्रज्ञान की खोज एवं उसका विकास भी यूरोप की तुलना में भिन्न था | साथ ही भारत जैसे देश में उसका ढाँचा उसके विकेन्द्रीकरण की ओर अधिक झुकाव रखनेवाली राजनीति के साथ सुसंगत था और उनके औजार तथा कार्य के स्थलों को अनावश्यक ढंग से प्रचण्ड और भव्य बनाने का प्रयास नहीं किया जाता था
लोहे और फौलाद की भट्ठियाँ अथवा हलफाल जैसे साधन छोटे और सादे होने के पीछे यथार्थ में सामाजिक और राजकीय परिपक्वता थी और साथ ही उससे जुड़े सिद्धान्तों और प्रक्रियाओं की समझ से उनका उद्भव हुआ था
यूरोप के आक्रमण के समय , ऐसा प्रतीत होता है की भारतीय मानस का झुकाव धीमी गति से पुनरुत्थान की ओर था
गत शतक में और १९४७ के बाद सहज गति से , भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जो कुछ प्रगति हुई है , वह इस समयावधि में यूरोपीय विश्व में हुए विकास की पुनरावृत्ति है
पर दुर्भाग्य यह है कि गत शतक में यूरोप के विज्ञान और प्रौद्योगिकी के भारत में हुए अविवेकपूर्ण अन्धानुकरण ने अभी तक तो स्वदेशी नवरचना तथा सर्जनात्मकता को अपंग तथा भोथरा बना दिया है
परन्तु बीजगणितीय पृथक्करण के इतिहास के तथ्यों को सीधे ग्रहण किया जाए तो ( कोलब्रुल की ) धारणा के लिये कोई आधार नहीं है
२६ . आई ओ आर : एम एस एस इयूआर एफ/९५/१ , "हुगली नदी के पश्चिमी तट की भूमि और कृषि विषयक टिप्पणी ( Some Remarks on the Soil and Cultivation on the Western Side of the River Hoogly' पृ . ८१ २७ . शीतला प्रतिरोधक टीका गाय से डा . एडवर्ड जेनर ने बनाया था
' ३४ . आइ . ओ . आर . : प्रेक्टिस ऑव इनोक्युलेशन इन बनारस डिवीजन: उत्तर पश्चिमी प्रान्त की सरकार के कार्यकारी टीकाकरण अधीक्षक द्वारा , ६ जून १८७० , पृ . ७७ ३५ . वही , आर . एम . मिल्ने का ( Milne ) कार्यकारी टीकाकरण अधीक्षक का विवरण , १ अप्रैल १८७० , पृ . ७२ ३६ . प्रकरण ८ , पृ . १७५ ३७ . प्रकरण १२ , पृ . १९५ ३८ . रमेशचन्द्र मजुमदार , एच . सी . राय चौधरी , कालिकिंकर दत्त , 'भारत का प्रगत इतिहास' ( An Advanced History of India ) , तृतीय संस्करण पृ . ५६४ ३९ . राज्य के द्वारा कृषि उत्पादन के हिस्से का ग्रहण के ब्रिटिश भारतीय अभिलेखागार के अभिलेखों का प्रमुख विषय है
उसके बाद मुझे पाषाण निर्मित प्राचीन भवन की ओर ले जाया गया , जिसके नीचे के भाग का वर्तमान में घुड़साल और विशेषकर ईंधन संग्रह हेतु उपयोग हो रहा था
इतना ही नहीं , इन यंत्रों का स्थापन ( सुव्यवस्थित रचना ) , निर्माण , अलग अलग भागों का मिलान , उनके लिए आवश्यक एवं पर्याप्त आधार , इन पत्थरों को जोड़ने हेतु प्रयुक्त पत्थर और सीसा - आदि प्रत्येक पहलू में एक प्रकार से गाणितिक सतर्कता दृष्टिगत होती थी
इतना ही नहीं , दर्शक काँटे की रेखा भी इतनी अचूक है कि आज भी एक इंच व्यास की लोहे की अँगूठियों में से निरीक्षण करने पर दृष्टिरेखा उसी माप की अन्य तीन अंगूठियों में से बिना किसी प्रकार के अवरोध ही पार होती हुई अड़तीस फुट आठ इंच दूरी तक पहुंचती है
लेफटेन्ट कर्नल आर्किबाल्ड कैम्पबेल जो तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के मुख्य इंजीनियर थे उन्होंने इस यंत्र का यथार्थ दर्शन करानेवाला चित्र किसी एक निश्चित निरीक्षण बिन्दु से बनाया था , परन्तु अत्यन्त दु:ख की बात है कि वे कुछेक विराट चतुर्थ वृत्तांशों - जिसकी त्रिज्या बीस फुट थी - को अपने चित्र में नहीं ले पाये क्यों कि ये वृत्तांश उन्होंने निरीक्षण बिन्दु चयन किया था उसी की ओर थे
साथ ही , इससे स्पष्ट होता था कि अवलोकन लेते समय इस तीन कला के अधिक सूक्ष्म विभाग करने में भी वे निपुण थे
यह घड़ी , जिसे छाया यंत्र कहा जा सकता है , दर्शक की परछाईं वृत्तांश पर जहाँ पड़ती है , उसके आधार पर सौर समय बतलाने का कार्य करती है
अभी भी खगोलविद्या पर उनके एकाधिकार के बहुत से प्रमाण हैं
और उसकी ढलान ५० फुट लम्बी है
नेबुचेदनेझर के समय से खाल्डियन लोगों ने नियमित अवलोकन लेना प्रारंभ किया था
२ . खगोलशास्त्र का सुदूर पूर्व में सिंधु से लेकर पश्चिम में एटलान्टिक महासागर तक के अनेक देशों में हुई प्रगति का इतिहास भी अत्यंत स्पष्ट है
इसीलिए खगोलज्ञान की ऐसी प्रणाली जो सिंधु पार के किसी प्रदेश में अस्तित्व में है और जिसका विज्ञान में कोई विशेष महत्त्व नहीं है , वह केवल प्रबल जिज्ञासा का विषय बन सकती है
वास्तविकता यह है कि 'भारतीय खगोलशास्त्र'" पुस्तक के अध्ययन से उसके कर्ता की शक्ति और विद्वत्ता पर संपूर्ण आदर उत्पन्न होते हुए भी , कुछ ऐसी वैज्ञानिक अश्रद्धा के साथ मैंने अध्ययन करना आरम्भ किया क्यों कि विज्ञान में जो कुछ नया और असामान्य है उसकी गिनती और तर्क के निकष पर पूर्ण सावधानी और सतर्कता से परीक्षा होनी चाहिए ऐसा मुझे लगता है
वह तो केवल अवकाशी ज्योतियों के ( विशेषकर सूर्य और चन्द्र के ) स्थान परिवर्तन की गणना और इस गणना को करने के लिए कोष्ठकों और नियमों को देकर संतोष मान लेता है
दिये गये निश्चित समय में , किसी भी आकाशीय ज्योति का स्थान निश्चित करने के लिए तीन वस्तुएँ आवश्यक हैं; प्रथम , भूतकाल की किसी 'निश्चित क्षण में' अवलोकन द्वारा निश्चित किया गया ज्योति का स्थान
इसी 'निश्चित क्षण' को ही 'ग्रंथकाल' या निर्देश क्षण' कहते हैं , जिसके आधार पर उन समग्र कोष्ठकों की गणना की जाती है
१७ उस पर से ऋतु वर्ष१८ प्राप्त करने के लिए हमें २१ मिनिट ५५ सेकन्ड घटाने पड़ते हैं , जो सूर्य को ५४'' चलने में लगनेवाला समय है
११ . दूसरी एक बात , जिसे ये कोष्ठक हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं , वह है सूर्य के मध्यम स्थान 'मंदफल संस्कार' , जिसके कारण सूर्य क्रमश: धीरे और शीघ्रता से चलता है और उसका निश्चित स्थान वर्ष के आधे भाग में उसके मध्यमान स्थान के आगे और बाकी के आधे भाग में उसके मध्यमान स्थान के पीछे रहता है
२१ यह धारणा पर्याप्त रूप से निश्चित न होने पर भी टोलेमी की अवधारणा कि भूम्युच्य बिन्दु संपूर्णत: स्थिर है - सत्य से अधिक समीप है क्योंकि आधुनिक मूल्य के अनुसार सूर्य का भूम्युच्य बिन्दु वार्षिक १०'' की गति से खिसक रहा है
चन्द्र का बिन्दु प्रचलनशील राशिचक्र के प्रारंभ में होने की धारणा है
इससे हम अधिकृत कथन कर सकते हैं अथवा कह सकते हैं कि हम आवश्यक रूप से ही इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि श्याम के कोष्ठक मूल रूप से हिन्दुस्तान से आये हैं
इन कोष्ठकों का 'ग्रंथकाल' पहले के कोष्ठकों के ग्रंथकाल से बहुत अर्वाचीन है और वह है १० मार्च १४९१ का सूर्योदय , जब सूर्य प्रचलनशील राशिचक्र में प्रवेश कर रहा था और उसकी चन्द्र के साथ युति हुई थी
हां , कोष्ठक स्वयं ही ग्रहों की गति को भी अपने में समा लेते हैं और कृष्णापुरम् के कोष्ठकों के साथ बहुत साम्य रखते हैं
जबिक मार्गग्य अर्थात् दिसम्बर में सूर्य की गति सर्वाधिक वेगमय होने से वह महीना केवल २९ दिन २० घण्टे ५३ मिनिट का होता है
दिये गये समयानुसार सूर्य के स्थान की गणना करने के लिए त्रिवेलोर के ब्राह्मण उस समय से कलियुग के प्रारंभ की क्षण तक के दिन गिनने के लिए वर्ष को ३६५ दिन ६ घण्टे १२ मिनिट ३० सेकन्ड के द्वारा गुणाकार करते हैं और २ दिन , ३ घण्टे , ३२ मिनिट , ३० सेकन्ड घटाते हैं क्योंकि खगोलीय ग्रंथकाल लौकिक वर्षारंभ से इतने विलम्ब से शुरू हुआ होगा
३६ उसके बाद दिनों को महीनों में परिवर्तित करनेवाले कोष्ठक की सहायता से वे इन दिनों को खगोलीय महीने में तथा दिन आदि में परिवर्तित करते हैं , जो राशि-अंश-कला-विकला में सूर्य के भोग के सममूल्य होते हैं
परंतु श्रीयुत् द' ला ग्रान्ज ने दर्शाया है कि उसके अनुसार अयनगति प्राचीन युग में कम थी और उसका सूत्र १०-४५'-२२'' जोड़ना सूचित करते हैं
२४ . कलियुग के प्रारंभ के काल में ( अर्थात् ईसा पूर्व ३१०२ के फरवरी महीने की १७ वीं और १८ वीं तारीख के बीच की मध्यरात्रि को ) चन्द्र का मध्यम स्थान , मेयर के कोष्ठकों के अनुसार - जिसका आधार इस मान्यता पर है कि चन्द्र की गति का दर इस शताब्दी के प्रारंभ में जितना था उतना ही हमेशा रहता है - गिनने पर वह १० राशि - ०-५१'-१६'' मिलता है
इससे यह बात निश्चित होती है कि ब्राह्मणों का खगोलशास्त्र न तो ग्रीकों से , न पर्शियनों से , न अरबों से , न ही तर्तारों से आया है
यह बात श्रीयुत् कोसिनी को बहुत ही अच्छी तरह समझ में आ गई थी
इस महत्त्वपूर्ण योगानुयोग के आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कम से कम एक अवलोकन समूह , जिस पर यह कोष्ठक आधारित है कलियुग प्रारंभ की तुलना में कम पुरातन न हो ऐसी अति उच्च संभावना को भी पूरी तरह से नकारी नहीं जा सकती है
३० . त्रिवेलूर की सारिणियाँ , जिनका ग्रंथकाल कलियुग प्रवेश है वे एक नाक्षत्र वर्ष ३६५ दिन ६ घण्टे १२ मिनिट ३० सेकन्ड का स्वीकार करती हैं इससे ऋतुवर्ष ३६५-५-५०-३५ मानते हैं , जो द ला' केईली के वर्षमान से १'-४६'' लंबा है
ये कोष्ठक जिनका ग्रंथकाल सन् १४९१ है , उनमें मध्यम गतियाँ बहुत सावधानी के साथ दी गई हैं
३९ . ये कोष्ठक , जिसके मूल स्थान हमारे युग के सन् १४९१ के वर्ष के हैं , तब भी उसका मूल संदर्भ तो उस 'कलियुग प्रारंभ' के ग्रंथकाल का ही है
हमारे कोष्ठकों के अनुसार भी शुक्र के अलावा सभी ग्रह सूर्य के साथ युति में थे
इससे कह सकते हैं कि फ्रेन्च और भारतीय दोनों ही कोष्ठक सही हैं
और यदि उन तत्त्वों को वे परिवर्तनशील मान लें तो उनमें प्राप्त विचलन निश्चित करने के लिए उनके पास नियम नहीं थे , क्यों कि इन नियमों की खोज के लिए तो खगोलशास्त्र वर्तमान में यूरोप में जिस स्तर तक पहुँचा है , उस स्तर की पूर्णता के साथ ही गति और प्रस्तार८० की विज्ञानों की उपलब्धियों की आवश्यकता रहेगी
हमारे पास भी फादर ड्यू कैम्प के द्वारा प्राप्त कृष्णापुरम् की गणन पद्धतियों का वृत्त है
इस कला का प्रथम पाठ तो वे बहुत बाद में आर्किमिडिज़ के युग में सीखे हैं
यह पूरी गणना अत्यंत सूक्ष्मतापूर्वक की गयी है और इसके लिए क्रांतिवृत्त की तिर्यकता का कोण चौबीस अंश का ग्रहण किया गया है
४८ . ग्रहण-गणना के दूसरे भाग में भूमिति के एक बहुत ही प्रसिद्ध सिद्धान्त का सीधा ही उपयोग किया गया है
५० . श्रीयुत् ले जेन्टिल की स्मरणिका का वृत्त देते हुए विज्ञान अकादमी के इतिहासविद ने दर्ज किया है कि उसमें वर्णित सूर्यग्रहण के समय वास्तविक और दृश्य युति के बीच का अंतर खोजने के नियम में चन्द्र के लंबन को खोजने की गणना का भी समावेश होता है , परंतु उसमें विषुवांश में लंबन के स्थान पर देशांतर का लंबन लिया है
तथापि यहाँ , कृष्णापुरम् के कोष्ठक अनिश्चितता दूर करते हैं , क्योंकि वे मध्यमगति के प्रत्येक अंश के लिए मंदफल संस्कार या 'छाया' संस्कार देते हैं और वह लगभग भूम्युच्च बिन्दु से अंतर के साइन ( ज्या ) जितना ही है
ये लाक्षणिकताएँ ग्रहों के 'मंद' संस्कार को भी लागू हैं , जहाँ यह संस्कार उनके उपकरणों के ज्या ( साइन ) के गुणोत्तर की अपेक्षा बड़ा होता है और यह वृद्धि ३०° उपकरण के लिए सबसे अधिक है , जो कि गुरु , शनि और मंगल में ये संस्कार कुछ कलाओं तक पहुँचते हैं और मंगल में यह मात्रा सबसे अधिक है
इतना ही नहीं , ये अवलोकन सूर्य और चन्द्र के संस्कारों पर भी चरितार्थ हैं
वास्तव में क्षतिमुक्त नियम प्राप्त करने के लिए नियम का उपयोग तब करना चाहिए जब लंबन शून्य हो और मंदफल वार्षिक संस्कार न हो
वास्तव में क्षतिमुक्त नियम प्राप्त करने के लिए नियम का उपयोग तब करना चाहिए जब लंबन शून्य हो और मंदफल वार्षिक संस्कार न हो
इस बिन्दु को टोलेमी की खगोलशास्त्रीय परिभाषा में 'समकेन्द्र"' कहा गया है
अब , इस योगानुयोग के संदर्भ में निर्णय करना कठिन है , क्योंकि एक ओर इस संयोग को आकस्मिक नहीं माना जा सकता और दूसरी ओर यह सन्देहास्पद है कि यह साम्य इस विषय की प्रकृति के कारण है या फिर भारत और ग्रीस के खगोलशास्त्रियों के बीच किसी अज्ञात आदान प्रदान के कारण है
यद्यपि , हम उन्हें उनके अपने कार्यो में व्याख्यायित किये गये किसी तर्क के स्वरूप में नहीं लेते परंतु उनके द्वारा निर्मित प्रभाव का मूल्यांकन इस बात से कर सकते हैं कि युगों के बाद केप्लर की प्रणाली के साथ उनके प्रतिस्पर्धियों की चुनौती - जिसे केप्लर जैसे महान व्यक्ति ने आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया लगता है - का पुनरावर्तन करते रहे , उसके मूल भी इस वृत्ताकार कक्षा की अवधारणा में निहित हैं
दूसरा , इन कोष्ठकों में मंदफल संस्कार के साधन के रूप में उत्केन्द्र कोणिकांतर का उपयोग यह पूर्णरूप से भारतीय खगोलशास्त्र का वैशिष्टय है
ग्रीकों ने इस विषय में आर्किमिडीज के प्रमेय से अधिक तथ्यपूर्ण कुछ नहीं दिया है और अरब गणितशास्त्रियों ने निकट का कोई आसादन प्रयुक्त किया दिखता नहीं है
प्रथम : जिन अवलोकनों के आधार पर भारतीय खगोलशास्त्र की स्थापना हुई है , वे अवलोकन ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व किये गये थे
इस खगोलशास्त्र में दो अन्य तत्त्व , सूर्य का मंदफल संस्कार और क्रांतिवृत्त की तिर्यकता की जब वर्तमान मूल्यों के साथ तुलना की जाती है तब इस खगोलशास्त्र के प्रारंभ बिन्दु के रूप में १००० से १२०० वर्ष अधिक दूर के बिन्दु की ओर इंगित करते हैं और यह प्रारंभ ईसा से ४३०० वर्ष पूर्व हुआ बताते हैं और इतनी सूक्ष्मता से अवलोकन तथा गणना करने की कला विकसित होने में कलियुग के प्रारंभ होने तक का समय लगा होगा यह तथ्य भी उपर्युक्त निष्कर्ष का समर्थन करता है
त्रिवेलूर के कोष्ठकों से चन्द्र के स्थान की गणना करने के लिये प्रथम कलियुग के प्रारंभ से जो समय बीता है उससे १६ , ०० , ९८४ दिन घटाने पड़ते हैं
इस खगोलशास्त्र के सभी भाग एक समान प्राचीनता नहीं रखते हैं और हम बाद के कोष्ठक के ग्रंथकाल से यह नहीं जान पाते हैं कि वास्तव में वे किस समय प्रयुक्त होते होंगे
हमने यह भी देखा है कि कृष्णापुरम् के कोष्ठक भले ही सन् १४९१ से प्राचीन न होने का दावा करते हों , वे वास्तव में त्रिवेलूर कोष्ठकों-जिनका ग्रंथकाल कलियुग के प्रारंभ का है अथवा उससे भी प्राचीन है
परंतु ऐसा लगता है कि त्रिवेलूर या कृष्णापुरम् के कोष्ठक अथवा तो ऐसे अन्य जिनसे हमारा परिचय अभी अभी हुआ है - भी भारत में उपलब्ध सबसे प्राचीन कोष्ठक नहीं हैं
और यह सब होते हुए भी खगोलशास्त्र की पद्धतियाँ इतनी अधिक वैविध्यपूर्ण हैं जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती है
ज्ञान की यह प्रणाली लोगों की नैसर्गिक मनोवृत्ति के साथ इतनी एकाकार हो गई है और उनके अंदर इतनी गहरे तक प्रसारित हो गई है तथा इतनी वैविध्यपूर्ण हो गई है कि उसे उस देश की प्राचीन धरोहर के रूप में प्रस्तुत होने का अधिकार है
बनारस के संग्रहालय में इन अवलोकनों का समर्थन करनेवाली सामग्री समाहित होगी यह सम्भव है
तब भी , सामान्य रूप से , नियमों में उपयोगी शब्दों के अनुपात में तार्किक है
तब भी , सामान्य रूप से , नियमों में उपयोगी शब्दों के अनुपात में तार्किक है
यह नया केन्द्र टोलेमी के समकेन्द्र जैसा लगता है
' काल्पनिक केन्द्र , जिस की बेइली टोलेमी के समकेन्द्र के साथ तुलना करते हैं वह यह बिन्दु है , जो सूर्य - पृथ्वी अंतर का द्विभाजन करना है और जो कुछ ही अंशों में इस समकेन्द्र से एकदम अलग है
प्रयोगों के बिना प्राकृतिक तत्त्वज्ञान स्वप्नवत् लगता है
ग्रीक , रोमन और मिस्र देशीय ( इजिप्शियन ) अवशेषों में कहीं भी वेधशाला विद्यमान थी इसका उल्लेख तक नहीं है
साथ ही यह भी निश्चित नहीं है कि पिरामिड निर्माताओं ने निर्माण में याम्योत्तर समतल में रखने के लिए विशेष कष्ट उठाया होगा
हां , इतना निश्चित है कि महान गणितज्ञ भी निर्णय विषयक महान मतभेद रखते हैं तथापि यदि पृथ्वी नई धुरा प्राप्त कर ले तो उसके संदर्भ में याम्योत्तर भी बदल जाएगा और यदि बनारस की वेधशाला का वृत्तपाद वेधशाला बनी तब याम्योत्तर से उसके विचलन का प्रमाण सावधानीपूर्वक और सतर्कता से माप लिया जाए तो वह खगोल के अनेक प्रश्नों के उत्तर दे सकता है , और जब यह सिद्धांत संपूर्णता को प्राप्त करेगा तब सचमुच वेधशाला का निर्माण कब हुआ था इस प्रश्न का उत्तर भी प्राप्त किया जा सकता है
फलत: जिसे समझने की वह क्षमता रखता था उन सामान्य विचारों को ही वह ग्रहण कर पाया था , जैसे कि ब्रह्माण्ड का स्वरूप , धूमकेतु विषयक विचार , 'लोक' की अनेकता और परकाया - प्रवेश सिद्धान्त आदि
भारतीय खगोलशास्त्रियों के द्वारा किये गये अवलोकन मुख्यत: उनकी पाण्डुलिपियों में प्राप्त होते हैं , फलत: उनकी जानकारी स्थानीय लोगों के साथ व्यापक संवाद आयोजन कर के ही प्राप्त की जा सकती है
ऐसा लगता है , खाल्डियन खगोलशास्त्रियों , पर्शियन मागी , बेबिलोन के भविष्यवेत्ता , पूर्व के ज्ञानी व्यक्ति , ज्योतिषी , आकाशदर्शकों और जादूगर आदि से बाइबल के पैगम्बर भी डरते थे तथापि उपहास करने का नाटक करते थे; ये सभी ब्राह्मणों अथवा उनके अनुयायियों के समान ही थे
खगोलशास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें सामान्यत: विपुल मात्रा में गणित के ज्ञान की आवश्यकता रहती है; अतएव , यदि बनारस की वेधशाला को आधुनिक मान लिया जाए तो भी उसके निर्माण से पूर्व उसके निर्माता विज्ञान में बहुत प्रवीण होने चाहिए
खगोलशास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें सामान्यत: विपुल मात्रा में गणित के ज्ञान की आवश्यकता रहती है; अतएव , यदि बनारस की वेधशाला को आधुनिक मान लिया जाए तो भी उसके निर्माण से पूर्व उसके निर्माता विज्ञान में बहुत प्रवीण होने चाहिए
वे चित्रकला तो अच्छी जानते थे परन्तु परिशुद्धता अथवा उसकी उपयोगिता के विषय में अज्ञानी थे
चुम्बकीय सुई ( दिशादर्शक यंत्र ) के विचलन के गहन अवलोकन लेने का अवसर केवल सर्वेक्षण में सुधार करने हेतु ही नहीं तो चुम्बकत्व का सिद्धांत ढूँढ़ने में भी उपयोगी रहेगा
वक्रीभवन के गुणधर्म एवं उष्मा , नमी और वायु की घनता के कारण उसमें आनेवाला परिवर्तन - बनारस में अध्ययन का यह भी एक मुद्दा बन सकता है
हम जानते हैं कि अरब बहुत बड़ा विदेश व्यापार करते थे
उसके हाथ में कागज और कलम हैं , सम्मुख स्याही की दवात है , शुक्र एक स्त्री के रूप में है जो आयरिश वीणा के प्रकार का कोई तन्तुवाद्य बजा रही है
उसके हाथ में कागज और कलम हैं , सम्मुख स्याही की दवात है , शुक्र एक स्त्री के रूप में है जो आयरिश वीणा के प्रकार का कोई तन्तुवाद्य बजा रही है
फिर उसने आगे कहा , मैं नहीं जानता कि अल्हाजन ने कहीं भी ऐसे साधनों का उल्लेख किया होगा , परंतु उसने सिद्धांतों के विषय में लिखा है और साधन सदा सिद्धांतों पर आधारित होते हैं
बंदूक में प्रयुक्त होनेवाले विस्फोटक , अतीत की तुलना में नया आविष्कार माना जाएगा , परंतु ग्रे के बंदूकशास्त्र ( गनेरी ) पुस्तक में उल्लेख है कि वह सिकंदर के समय में भी बंदूकों में प्रयुक्त होता था
बंदूक में प्रयुक्त होनेवाले विस्फोटक , अतीत की तुलना में नया आविष्कार माना जाएगा , परंतु ग्रे के बंदूकशास्त्र ( गनेरी ) पुस्तक में उल्लेख है कि वह सिकंदर के समय में भी बंदूकों में प्रयुक्त होता था
श्री हेस्टिंग्स के पास उसकी एक प्रति है जिस पर मैंने हस्ताक्षर किये हैं और वह मुझे कब मिला , उसकी तिथि उसमें अंकित है; जो लगभग जून है और मेरी धारणा है कि भूकंप अगस्त अंत में अथवा सितबंर १७७९ अथवा १७८० में आया था
जब हम संस्कृत का कुछ ज्ञान प्राप्त करेंगे तब हम बहुत से महत्त्वपूर्ण शोध कर पाएँगें तथा उपर्युक्त कथन का समर्थन अथवा खण्डन कर पायेंगे
सौभाग्य से बेड़े के लेख हमें बारह सौ वर्ष पहले की भूमिका में ले जाते हैं , जो ड्रयूइड लोगों के समय से बहुत सन्निकट है और ड्रयूइड लोगों के सम्बन्ध में , उनके अवशेषों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की आशा को जीवित रखते हैं
फिर , पुस्तकें जहाँ सरलता से सुलभ होंगी वहीं उनका परीक्षण होगा और तुलना भी त्वरित होगी; यहाँ मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि 'लीलावती' और 'बीजगणित' नामक हिन्दुओं के दो ग्रंथ-जो क्रमश: अंकगणित और बीजगणित से सम्बन्धित हैं-का अनुवाद तुरंत प्रकाशित करना चाहिए
निस्संदेह , हिन्दुओं के प्रबंध ग्रंथो में से अधिकतर नष्ट हो गये और शेष जो बचे हैं , भय है कि लगभग अधूरे हैं
यहाँ अंतरों को लेने के पीछे प्राथमिक कारण यह दिखाई दे रहा है कि त्रिज्याएँ चाप के निकटस्थ मूल्य को देती हैं और अंतरों को जोड़कर चाप का भी निकटस्थ मूल्य प्राप्त किया जा सकता है
६ दरवाजे एक साथ खोलने की पद्धति ५६ × ३ / ६ = २८ होगी
इस ग्रंथ का काल शक संवत् ११०५ है , अर्थात् सिद्धांत ग्रंथ के ३३ वर्ष बाद प्रयोग ग्रंथ आता है
ग्रंथ की प्रामाणिकता उस पर उपलब्ध असंख्य संस्कृत टीकाओं तथा विशेष रूप से उस ग्रंथ के फारसी संस्करण से पूर्ण सावधानी से प्रस्थापित होती है
अब बाद के घटनाक्रम में बताया जाएगा कि पृथक्करण की पद्धति और विशेष रूप से , प्रथम और द्वितीय कक्षा के अनिश्चित प्रश्नों के हल हेतु प्रयुक्त पद्धति 'बीजगणित' में सिखाई गयी है , जिनमें से प्रथम कक्षा के प्रश्नों को हल करने की पद्धतियों का 'लीलावती' में पुनरावर्तन होता है
ग्रंथ का शीर्षक है , 'ब्रह्म सिद्धांत' अथवा क्वचित् ब्रह्मस्फुट सिद्धांत'- जिसका संक्षिप्त रूप 'ब्रह्म सिद्धांत' है और इसी नाम का उल्लेख भास्कर के भाष्यकारों ने किया है
श्री डेविस हिन्दुओं की खगोलशास्त्रीय गणनाओं को सर्वप्रथम सार्वजनिक रूप से लोगों के समक्ष रखनेवाले व्यक्ति हैं
उनका अभिप्राय है कि ब्रह्मगुप्त सन् सातवीं शताब्दी में हुए
इस आधार पर ब्रह्मगुप्त का समय ईसा की छठी शताब्दी अथवा सातवीं का प्रारंभ निश्चित रूप से होगा , जो कि अन्य गणना से अधिक निश्चित रूप से प्राप्त होगा
क्षति सुधार के इस मार्ग पर उनका अनुसरण एक निश्चित और आवश्यक समय अवधि के बाद दुर्गासिंह तथा मिहिर ने किया था और उनका अनुसरण एक निश्चित अवधि के बाद जिष्णु के पुत्र ब्रह्मगुप्त ने किया था
हिन्दु बीजगणितज्ञ संक्षिप्ताक्षरी या एकाक्षरी का उपयोग संकेतों के लिए करते हैं
धन संख्याओं के लिये ऋणसूचक बिन्दुओं के अभाव के अलावा अन्य किसी चिह्न का उपयोग नहीं करते हैं
एक अपूर्णांक को दर्शाने के लिए भाज्य को भाजक के ऊपर लिखा जाता है
इसी प्रकार प्रथमाक्षर का उपयोग करणमूल दर्शाने के लिए भी होता है
अरबों ने अज्ञात संख्याओं को दर्शाने के लिए 'शाइ' प्रयुक्त किया है
घन के लिए अरबों द्वारा प्रयुक्त शब्द है , 'चब' अर्थात् 'पासों' अथवा 'धन'
इसीलिए पृथक्करण कला की इस शाखा को अरबों ने नाम दिया है - 'तारीक अल जब्रवा अल मुकाबला' अर्थात् पुन: स्थापना एवं तुलना की पद्धति' तथा इसी कारण से अरबों के द्वारा दिया गया संपूर्ण शीर्षक है 'फिरिश्त खराजूल मझहूलत बा तारिक अलजब्र वा अल मुकाबला' जिसका लेटिन में शुद्ध भाषातंर पीजा के लियोनार्डो ने किया 'द सोल्यूशन क्वारन्दम क्वायेश्वानम सेकन्डम मोडम एलजिब्राये एट एल मुकाबलाये'५° जिसके आधार पर वर्तमान नाम 'एलजिब्रा' प्रचलित हुआ
बहुमुखी विकास सिद्ध करने का मूल हेतु खगोलशास्त्र तथा ज्योतिषशास्त्र में उनका उपयोग करना था
इनमें प्रथम है , पायथागोरस के प्रख्यात सिद्धांत का निदर्शन , जिसमें समकोणीय त्रिकोण में कर्ण की लंबाई का वर्ग समकोण बनाने वाली दो भुजाओं की लंबाई के वर्गों के जोड़ जितना होता है
इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि निदर्शनों के विषय में हिन्दू गणितशास्त्रियों ने इन सिद्धांतों को बीजगणितीय तथा भौमितिक दोनों पद्धतियों से सिद्ध किया है
हिन्दू तथा आधुनिक बीजगणित की तुलना को मात्र अमुक ध्यानाकर्षक उदाहरणों तक सीमित रखते हुए , अब विशेष ध्यानाकर्षक बिन्दु है , दूसरी कक्षा के अनिर्णायात्मक प्रश्नों का हल करना , जिनके लिए एक सामान्य पद्धति ब्रह्मगुप्त ने दी है
 ) और विशेष प्रसंगों में भी प्रयुक्त की जा सके और जो इस प्रकार के प्रश्नों के सार्वत्रिक हल के लिए उपयोगी हों , दिये गये हैं . . . और हल सदा पूर्णांकों में ही प्राप्त करने हेतु , प्रथम कक्षा के प्रश्नों में अपनाई गई पद्धति तथा द्वितीय कक्षा के प्रश्नों में अपनाई गई पद्धति-दोनों का मिश्रण , बारी बारी से प्रत्येक पद्धति का प्रयोग करना चाहिए अथवा हिन्दु बीजगणितज्ञ की वह पद्धति जिसे 'वर्तुल में आगे बढ़ना' कहते हैं
अत्यंत सामान्य अर्थ में पृथक्करण की कला , जिस प्रकार हिन्दू लेखक निरीक्षण करते हैं मात्र व्यावहारिक सूक्ष्म बुद्धि का अभ्यास है और वह प्रतीकों से युक्त है , वे प्रतीक कहीं भी कला के नहीं हैं
प्रत्यक्षत: वे इस शास्त्र को उधार में लेनेवाले थे; और उनकी दृढ़ स्वीकृति है कि हिन्दुओं से वे संख्याओं का शास्त्र अर्थात् अंक गणित सीखे थे और जो अरब गणितशास्त्री भारतीय अंकगणित सीखे थे और जिन्होंने अपने देशवासियों को इसे सिखाया , भारतीय शास्त्र की सहायता एवं किसी भी सूचना को लिये बिना ही , स्वयं बीजगणित अन्वेषित करने की जितनी संभावना है इससे भी अधिक तो यह संभवित है कि उन्होंने भारत से बीजगणित प्राप्त किया होगा
जबकि मुहम्मद अबुलवफा अल बुझानी ने डायाफेन्टस के ग्रंथ के रूपान्तर के साथ में भिन्न स्वरूप में , डायोफेन्टस के सिद्धांतो के उदाहरणों को दिया; इसी व्यक्ति ने खारिझामिते मुहम्मद बिन मूसा के बीजगणित विषयक ग्रंथ की टीका लिखी और दूसरे एक अल्प प्रसिद्ध और बाद में हुए अबी याह्या नामक बीजगणतज्ञ-जिनके भाषणों में बुझानी स्वयं उपस्थिति थे , उनके लेखों की टीका भी लिखी
जबकि मुहम्मद अबुलवफा अल बुझानी ने डायाफेन्टस के ग्रंथ के रूपान्तर के साथ में भिन्न स्वरूप में , डायोफेन्टस के सिद्धांतो के उदाहरणों को दिया; इसी व्यक्ति ने खारिझामिते मुहम्मद बिन मूसा के बीजगणित विषयक ग्रंथ की टीका लिखी और दूसरे एक अल्प प्रसिद्ध और बाद में हुए अबी याह्या नामक बीजगणतज्ञ-जिनके भाषणों में बुझानी स्वयं उपस्थिति थे , उनके लेखों की टीका भी लिखी
दोनों ( भारतीयों और ग्रीक ) प्रणालियों में किसी प्रकार का साम्य दृष्टिगत नहीं होता है जो जिससे उनके बीच में किसी प्रकार का संपर्क होने का प्रमाण हो सके
उन्होंने क्रान्तिवृत्त का सत्ताईस और अट्ठाईस भागों में विभाजन किया है
जिस अवलोकन की ओर ध्यान आकर्षित करने से उन्होंने सभी महत्त्वपूर्ण ताराओं के स्थान विषयक ज्ञान प्राप्त किया और धार्मिक कारणों तथा अंधश्रद्धायुक्त मानसिकता से प्रेरित होकर उन्होंने सूर्य सहोदय और उसके जैसी अन्य अनेक खगोलीय घनटाओं का निरूपण किया
सौर मास तथा चान्द्र मास की तरह वे गुरु ग्रह की समय अवधि की भी गणना करते थे
समानता के आधार पर कहा जा सकता है कि हिन्दुओं ने अपनी खगोल प्रणाली के विषय में ग्रीकों से संकेतों को अवश्य प्राप्त किया होना चाहिए
७ . बंगाल में सम्पन्न चेचक का टीकाकरण भारत के इस भाग के कई ब्राह्मणों एवं चिकित्सकों के सहयोग से बंगाल में सम्पन्न चेचक की टीकाकरण कार्यवाही का लेखाजोखा यहाँ दिया जा रहा है
जहाँ तक मुझे ज्ञात हुआ है यहाँ यह प्रथा करीब १५० वर्षों से बदस्तूर जारी है
जिन स्थानों पर सुई चुभोकर छेदन-क्रिया की गई होती है वे स्थान सामान्यत: मवाद से भर जाते हैं , मवाद रिस जाता है और यदि शल्यक्रिया का मरीज पर कोई असर नहीं होता है तथा मरीज चेचक से पीड़ित रहता है या इसके विपरीत उन रध्रों से मवाद रिसता है तथा बुखार भी नहीं आता है या फुसियाँ बढ़ती नहीं हैं तो इससे आगे संक्रमण का खतरा नहीं रहता है
इस प्रज्ञ विशेषज्ञ की टिप्पणी को विशिष्ट संदर्भ में देखकर हैरानी होगी की लगभग इसी हितकर पद्धति का उपयोग अब इंग्लैंड में भी संयोगवश उचित रूप से किया जाता है
एक विद्वान डॉकटर मित्र ने अपने 'गैलन के समय से औषध के इतिहास' में यह विशिष्ट बात लिखी है : 'आरंभ में हमारा चेचक से वास्ता पड़ा , यह बीमारी हमें मुहम्मद के उत्तराधिकारी ओमर के काल में मिस्र में सर्वप्रथम दिखाई दी , यद्यपि निस्संदेह रूप से हम कह सकते हैं कि ग्रीकवासी इस बीमारी के संबंध में कुछ भी नहीं जानते थे
अरबवासी इस बीमारी को अपने देश से अपने साथ लाए थे और शायद यह बीमारी उन्हें मूल रूप से किसी दूर दराज के पूर्वी क्षेत्र से प्राप्त हुई हो
यह तैयारी उन्हें एक महीने तक मछली , दूध और घी के परित्याग के साथ करनी होती है; मछली का निषेध स्थानीय , पुर्तगालियों तथा मुसलमानों में होता है जो साम्राज्य के प्रत्येक प्रदेश में रहते हैं
टीकाकरण किए गए व्यक्ति को हवा से बचने के लिए कहा जाता है
मौसम में पैदा होने वाली मौसमी वस्तु तथा मौसमी फल; जैसे केला , गन्ना , तरबूज , चावल , सफेद खसखस का बना हुआ पतला दलिया , उन्हें सामान्य भोजन के रूप में खाने को कहा जाता है
इसी सिद्धांत तथा तार्किकता की दृष्टि से महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दौरान दूध के सेवन की सख्ती से मनाही की जाती है
चेचक कमोबेश महामारी है , जिसके संबंध में उनका कहना है कि इन जंतुकों से हवा जितनी मध्यम या अधिक मलिन होगी तथा जितना मध्यम या अधिक उन्हें अनजाने रूप में भोजन में लिया जाएगा , महामारी उतनी ही अधिक बढ़ेगी
इस बीमारी में शरीर के अंदर के विकारकारक विषाणु त्वचा पर फुंसियो के माध्यम से मवाद के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं तथा शरीर के अंदर से शरीर के बैरियों का समग्र निष्कासन होना भी स्वास्थ्य के लिए लाभकर होता है क्योंकि यदि उन्हें शरीर से बाहर न निकाला जाए तो ये शरीर के किसी अन्य तंत्र में जाकर गड़बड़ी पैदा करके संकटपूर्ण स्थिति का निर्माण कर देते हैं
अनुभव के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि यह प्राकृतिक औजार कैंची , छुरी , या सुई की अपेक्षा अधिक उपयोगी है
इस काँटे की सहायता से किया गया फुंसी का रंध्र इतना छोटा होता है कि अंदर के मवाद को मसलकर बाहर निकालने के पश्चात यह अपने आप तुरंत बंद हो जाता है ताकि उस के अंदर बाहर की हवा के भरने का अवकाश नहीं रहता
डॉकटर टिसॉट द्वारा चेचक के मवाद को के बाहर निकालने के लिए तीक्ष्ण नुकीली कैंची से काटकर उनकी शल्यक्रिया करने की बात की गई जो कि इस संबंध में निश्चित रूप से आपत्तिजनक हो सकती है क्योंकि इससे किया गया रंध्र काफी बड़ा होगा तथा विशिष्ट संप्रवाही किस्म की नहीं हुई तो वे शरीर के अलग अलग भाग पर कैंची से शल्यक्रिया करते हुए करीब दस इंच की दूरी पर त्वचा को काट देंगे जिससे आरंभिक क्रिया ही अंतिम क्रिया हो जाएगी
इसमें ऐंठन भरकर उँगली जितना मोटा बनाएँ ( इंग्लैंड में इस सन के स्थान पर बैल के बालों का उपयोग किया जाता है ) 
मद्रास में वर्ष में तीन महीने से अधिक वर्षा का मौसम होता नहीं है ( कभी कभी तो इससे भी कम होता है ) अत: वहा सामान्य घरों में इंटों का काम चिकनी दुम्मटी का उपयोग करके ही करते हैं
मौसम की मार को सहने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रकार की चिनम बनाने के लिये और जहां अधिक वर्षा होती है वहां वे घी के स्थान पर उसमें तिली का तेल मिलाते हैं तथा आम अथवा ऐसे ही कठोर पेड़ की छाल एवं यहाँ समुद्र तट पर प्रभूत मात्रा में पैदा होने वाली मुसब्बर मिलाते हैं
गन्नों या भारतीय मक्का के डंठलों की मुलायम गादी कडाहों के नीचे ठंडी हवा के लिए रास्ता देती है जो कि बर्तन के बाह्य भाग से छिद्रों के माध्यम से गर्मी की आनुपातिक मात्रा बाष्पीकृत रूप में निकल जाती है
इस स्थिति में ऐसा लगता है कि पानी को किसी भी अन्य बाह्य पदार्थों के संपर्क से मुक्त स्थिति में रखने पर तथा हवा के लिए बृहत् ऊपरी सतह देने पर तथा अंदर बाह्य हवा के संपर्क न करने देने पर पानी जम सकता है , भले ही वायुमंडल का तापमान फेरनहाइट के थर्मामीटर में हिमांक से कुछ ऊपर क्यों न दर्ज किया जा रहा हो
यहाँ की श्यामवर्णीय महिलाएँ इसके बीजों को पीस कर उसका चूर्ण बनाकर उसमें तेल मिलाकर इस धारणा के चलते अपने बालों में लगाती हैं कि इससे उनके बाल खूब लम्बे बढ़ेगे
सन से छाल निकालने के लिए इसे चार दिन तक पानी में डुबोकर रखा जाता है; बाद में इसे सुखा लिया जाता है तथा उससे छाल उतार ली जाती है जिसे सन के रूप से विविध उत्पादों में उपयोग किया जाता है
भारत में यह सर्दी के मौसम में उगता है , यूरोप में गरमी के
भारत में यह सर्दी के मौसम में उगता है , यूरोप में गरमी के
इस तरह से बनाई गई लुगदी को हौज में पानी के साथ मिश्रित करके रखा जाता है ( आकृति-२ ) जिसके एक कोने पर प्रचालक बैठता है तथा छडी को टिकाकर उसे ( आकृति-३ ) उसके खांचे में फैलाता है ( आकृति-४ ) 
मलबार का कृषि व्यवसाय उनके अपने इतिहास से अधिक प्राचीन है
भूमि पर समुचित कृषि करने के लिए एक प्रणाली स्थापित की है
उनके पवित्र बैल तथा गाय के प्रति सम्मान और श्रद्धाभाव भी कृषि कर्म के प्रति उनकी सेवा एवं श्रद्धा के द्योतक हैं
फाल पर्याप्त गहराई तक जाने से फसल भी प्रभूत मात्रा में होती है
वह अपनी पद्धति को इसलिए नहीं छोड़ता क्योंकि उसके लिए यह पद्धति आसान एवं उपयोगी है , लेकिन उसे आप यह बताइए कि इस विधि के अपनाने से उसका ही फायदा होगा तो वह उस पद्धति को सीखकर अपना भी लेगा
उन्होंने आपत्ति प्रकट की कि हल बहुत भारी था; इससे श्रमिक एवं बैल व्यर्थ ही अधिक थक जाते थे; अत: इससे कार्य कम ही हो पाता था और यह इस उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं था; हमारा अपना हल इससे बढ़िया एवं उपयोगी था अत: हमें उसीका उपयोग करना चाहिए
मैंने देखा है कि ब्राह्मण उसीको भोजन के रूप में खाते हैं
हमारे अधिकांश फल अत्यधिक खट्टे होते हैं या फिर वे इस मौसम में उगेंगे ही नहीं
यही औजार यदि थोडा सा सीधा करके रँग-रोगन करके और अधिक आकर्षक बनाया जाता तो उसका भिन्न विचार एवं मूल्य बताया जाता
खेत के खर पतवार एवं अनावश्यक जडों को उखाडने के लिए भारतीय कृषक खेत में कई बार सीधी जुताई एवं उसके पश्चात् आडी जुताई करते हैं; इसे वे सूर्य की गरमी से शुष्क सूखी जमीन की जुताई करके मिट्टी को ढीला करने के लिए भी करते हैं
दर्या , ज्वार , रतीजा एवं घूघराज्वार को एक साथ बोया जाता है लेकिन अपवाद के तौर पर घूघराज्वार को ही पकने दिया जाता है
भारत के कुछ भागों में घास नहीं पाई जाती जबकि दूसरे भागों में प्रचुर मात्रा में घास पाई जाती है जिसे कृषक किसान सूखी घास के रूप में पर्याप्त मात्रा में संरक्षित करके रख लेता है जो कि कमी के समय में पशुओं को खिलाने के लिए काम आती है
भारत के कृषि व्यवसाय के समस्त ब्यौरे को प्रस्तुत करने के लिए एक ग्रन्थ की आवश्यकता होगी
देशी शासन के समय भी किसान को भू-राजस्व के मामले में भी संरक्षित किया जाता था; युद्ध होने या मौसम की मार के कारण वह कर नहीं भार पाता था तब 'आसमानी सुल्तानी' का नाम देकर उसे भू-पट्टे की रकम से मुक्ति दी जाती थी
गुजरात में संपत्ति की सुरक्षा को कभी नजरंदाज नहीं किया जाता था
कुछ स्थान उनकी मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता के कारण से बहुत अच्छी फसल पैदा करने के लिए सर्वथा उपयुक्त होते हैं तो कुछ में कृत्रिम श्रम एवं दक्षता का समुचित उपयोग करने के उपरांत भी सकारात्मक परिणाम नहीं मिलते
फिर भी , मैं ने भारत के कई भागों में जाकर कृषकों को भूमि के अनुसार खाद का चयन एवं उपयोग करते हुए देखा है
सूर्य की गर्मी , प्राकृतिक एवं कृत्रिम नमी तथा नदियों की बहुलता से भारत की जमीन वर्षों वर्ष लगातार अत्यंत उर्वर स्थिति में रहती है; जैसी कि ऐसी ही स्थितियों में मिस्र की भूमि थी
भारत के कृषि कार्य के कई विवरण विलक्षण एवं मौलिक हैं
पानी देने की एवं सिंचाई की प्रथा भारत के कृषि कर्म में विशिष्ट रूप से समाहित नहीं है लेकिन इस क्षेत्र में इसके व्यापक उपयोग की संभावनाएँ बरकरार हैं तथा जो भी हैं वे किसी भी अन्य देश की पद्धति की तुलना में अधिक श्रमसाध्य प्रकृति की हैं
गर्मी की ऋतु से पूर्व यहाँ के लोग जमीन को मोटा-मोटा जोतते हैं क्योंकि गर्मी की ऋतु में अपनी उर्वर जमीन को जोतने से उसके आवश्यक उर्वरक घटक सूर्य की गर्मी से अंदर तक प्रभावित होंगे
स्थानीय लोगों की कृषि पद्धतियां उनके व्यापक एवं परंपरागत अनुभव पर आधारित होती हैं अत: उन्हें सहज रूप से ऐसे ही विरोध का स्वर छेड कर खंडित नहीं किया जा सकता
भारत में कृषि कार्य को बडा ही उत्तम कार्य माना गया है कृषि कार्य की यहाँ बड़ी प्रतिष्ठा एवं सम्मानजनक स्थिति है
जब बीज उगकर जमीन से कुछ इंच ऊपर तक बढ जाते हैं तब उन्हें उखाडकर छोटे छोटे गट्ठर बना लिए जाते हैं
मलबार में धान की पचास से भी अधिक किस्में पैदा की जाती हैं
मलबार के कृषि कर्म में कृषक का कृष्य कौशल इससे सिद्ध होता है कि वह विशिष्ट पद्धति से विशिष्ट अच्छी भूमि को तैयार करता है
पहाडी भाग की धान की फसल को काटने के लिए आठ से नौ महीने लग जाते हैं
पहाडी भाग की फसल भाग्य के अधीन होती है क्योंकि यह वर्षाऋतु पूर्णत: अनुकूल होने पर ही की जा सकती है
दक्षिण फ्रान्स में तथा गर्म देशों में इसी प्रकार के हल प्रयुक्त होते हैं
इसे खेत के एक भाग में डालकर पुरानी साधारण पद्धति से इसके ऊपर बैलों को चलाकर दानों को अलग निकाल लिया जाता है
मलबार में स्थानीय लोग पहिएवाली गाड़ियों का उपयोग नहीं करते
पहली में मिट्टी में उर्वरता की मात्रा कम होती है; इसमें हाथ से समतल करने पर गड्ढे के वे निशान गायब होकर उस खेत के समतल के साथ वे ऐसे समतल हो जाते हैं जैसे वहाँ थे ही नहीं
'२६ साथ ही , यह भी समान रूप से उल्लेखनीय है कि मलबार के किसान का यह प्रयोग सर एच . डेवी के दार्शनिक पर्यवेक्षण के समान ही सिद्ध होता है कि , जमीन की उर्वरता उसके द्वारा नमी को अवशोषित करने की शक्ति के ऊपर आनुपातिक रूप से आधारित होती है , जिसे एलुमिना या शुद्ध मिट्टी कहा जाता है
इसी में जोडते हैं कि 'जिस जमीन की मिट्टी में बालू की मात्रा अधिक होती है वह पूर्णत: अनुर्वर होती है
वे ऋतु और मौसम के परिवर्तन को बड़ी सावधानीपूर्वक ताड़ लेते हैं
यह निरा अंधविश्वास नहीं है अपितु उनकी भविष्यवाणी के आधार पर चलने पर तथा मौसमी परिवर्तनों को ध्यान में रखकर की गई फसल बड़ी ही अच्छी होती है
मलबार के लोग अपने आंचलिक रंग में पूरी तरह से रंगे हुए होते हैं
१० . दक्षिण में गुजरात की तुलना में भी अच्छी खेती की जाती है तथा इस प्रांत के लोग प्रत्येक दृष्टि से बड़े ही बुद्धिमान , स्वाभिमानी आत्मनिर्भर एवं नैतिक गुणों से परिपूर्ण होते हैं
१० . दक्षिण में गुजरात की तुलना में भी अच्छी खेती की जाती है तथा इस प्रांत के लोग प्रत्येक दृष्टि से बड़े ही बुद्धिमान , स्वाभिमानी आत्मनिर्भर एवं नैतिक गुणों से परिपूर्ण होते हैं
मद्रास के पश्चिमी भाग में कर्नाटक के एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि सामान्य रूप से धान के बीज बोकर उनसे गट्ठर बनाने तथा उन्हें हाथों से खेत में रोपे जाने की सामान्य पद्धति कि तुलना में वहाँ अत्यंत उत्कृष्ट पद्धति का प्रयोग किया जाता है
यह जमीन कंकड और मिट्टी मिलकर बनी है जो कि प्राय: इस तरह की है जिसे लोग रावडा अर्थात् कंकड मिश्रित मिट्टी कहते हैं
कोयले के चार बोरे एक रूपए दो आने में बिकते हैं
इस गाँव के अतिरिक्त नूजीद में ऐसी छह अन्य खदानों युक्त स्थान हैं जिनका लोहा अत्यंत गढा हुआ होता है जिनके बारे में अभी मैं नाम से अधिक कुछ जानता नहीं हूं लेकिन जैसे ही मुझे इनका परीक्षण करने का अवसर प्राप्त होगा तथा इसी प्रकार के अन्य कार्यों के बारे में पता चलेगा तो मैं अपनी शक्ति का पूरा उपयोग कर इस विषय पर लोगों का ध्यान आकर्षित करूंगा ताकि मैं अपनी जानकारी से प्राप्त सूचनाएँ आपके समक्ष रख डा . बेन्जामिन हेईने , १ सितम्बर १७९५ अकाल के कारण जो अनवस्था हुई उसके परिणाम स्वरूप यह ठेका-प्रंबधन की व्यवस्था हुई
इस गाँव के अतिरिक्त नूजीद में ऐसी छह अन्य खदानों युक्त स्थान हैं जिनका लोहा अत्यंत गढा हुआ होता है जिनके बारे में अभी मैं नाम से अधिक कुछ जानता नहीं हूं लेकिन जैसे ही मुझे इनका परीक्षण करने का अवसर प्राप्त होगा तथा इसी प्रकार के अन्य कार्यों के बारे में पता चलेगा तो मैं अपनी शक्ति का पूरा उपयोग कर इस विषय पर लोगों का ध्यान आकर्षित करूंगा ताकि मैं अपनी जानकारी से प्राप्त सूचनाएँ आपके समक्ष रख डा . बेन्जामिन हेईने , १ सितम्बर १७९५ अकाल के कारण जो अनवस्था हुई उसके परिणाम स्वरूप यह ठेका-प्रंबधन की व्यवस्था हुई
ये भारत के मध्यभाग में अवस्थित हैं
अन्य स्थानों से प्राप्त कच्चे लोह खनिज की अपेक्षा मगेला से प्राप्त कच्चा लोह अयस्क कम आक्सीकरण युक्त होता है
जावली का लोह अयस्क ( सं . १५ ) लाल ऑक्साइड का गेरुई किस्म का होता है तथा अच्छा रंजक होता है
इन में से पहली दो खदानों में लोह अयस्क दानेदार , लगभग मटर के आकार का गोलाकार मृत्तिकामय ( सं . २० ) होता है जो कि लोहमय मिट्टी द्वारा ठोस पदार्थ में जुडा हुआ होता है; दूसरे प्रकार का लोह अयस्क टुकडों के आकार एवं चपटे रूप में पहले प्रकार के लोहअयस्क जैसा ही होता है ( सं . २१ ) लेकिन कुछ कम सख्त होता है तथा इसके पिंडों को अधिक आसानी से अलग किया जा सकता है
पन्ना जिले की लोह खदानें पन्ना की उत्कृष्ट खदानें ब्रजपर के समीपवर्ती इलाकों में हैं
पश्चिम दिशा में लगभग और पाँच मील आगे कोटा की खदानें हैं लेकिन इनका लोह अच्छा नहीं है
अत: मैं इस जिले की और अच्छी खदानों , जैसे साईंगढ एवं चंद्रपुरा की खदानों का विवरण प्रस्तुत करूँगा जो कि विंध्याचल पर्वतमाला की चोटी पर हैं तथा उस स्थान के समीप है जहाँ से नदियों का जल अलग होता है
पश्चिम दिशा में और आगे बढ़ने पर बजना नगर के पास छापर पहाडियाँ हैं जिनमें प्रचुर मात्रा में लोह अयस्क है
इसके लोह अयस्क ( सं . - ३५ ) पर किसी का ध्यान नहीं जाता
कटोला खदानें केन से देसान नदी तक फैली हुई हैं
सागर जिले की लोह खदानें कटोला खदानों से आगे हीरापुर तक बढना चाहिए जो कि वालुकाश्म एवं धातु चट्टानों से निर्मित है
ये लोह अयस्क की दृष्टि से समृद्ध नहीं होती
इसका सामान्य गुण तथा दिखावट अपारदर्शी एवं मृण्मय होती है लेकिन इसमें धातुमय चमक होती है तथा यह सतत विकीर्णित होता है
काला ( सं . ५ ) अर्थात् काला लोह अयस्क सघन , मटमैला , भूरा ऑक्साइड होता है
भट्टियाँ उनकी पिघलाने वाली भट्टियाँ ऊपर से देखने में बडी अनगढ सी दिखती हैं; परन्तु , आंतरिक संरचना में आनुपातिक दृष्टि से बिल्कुल निश्चित होती हैं
'सी' से 'ई' रेखा छह भागों से आगे बढती है
भट्ठी की व्यावहारिक संरचना इसे व्यावहारिक रूप से निर्मित करने के लिए संलग्न सूची के आकार का ३ फीट गहरा गट्ठा खोदा जाता है जिसके अर्धावृत्ताकार भाग में भट्ठी ( बी ) की दीवारों ( सी सी सी ) को बडी , कच्ची इंटों से दीर्घ आकार में निर्मित करें; पहला ढाँचा थोडा अनगढ सा दिखेगा जो कि वांछित रूपाकृति के आनुपातिक आकार का होगा
मैं ने लगातार प्रयोग करने पर पाया कि इसकी लम्बाई ४ १/२ भाग , औसत चौडाई ३ भाग एवं औसत मौटाई १ १/२ भाग होनी चाहिए
अब और कुछ करना शेष न रहकर इसे मिट्टी से पूरी तरह से अवलेपित किया जाता है तथा हवा की नली को धोंकनी से हवा भरने के लिए खुला छोड़ा जाता है
लकङी के नौजल से हवा भट्ठी के तल में अकैरा पर आडी टेढी होकर जाती है
अत: इस के पश्चात् भट्ठी का पुन: उपयोग करने के लिए उसकी मरम्मत की जाती है
मैं वास्तविक प्रयोग के माध्यम से निष्कर्ष पर पहुँचना पसंद करता हूँ तथा इनकी तुलना करने का कार्य उन लोगों पर छोड देता हूँ जो इसे और अच्छी तरह से कर सकते हैं
प्रत्यक्ष प्रयोगों , साक्ष्यों एवं आंशिक परीक्षणों के आधार पर मैं निष्कर्ष रूप में निम्नलिखित टिप्पणी कर सकता हूँ : भारतीय लुहार की भट्ठी कच्ची धातु को दो एवं छह शिलिंग तथा अच्छे पिटवाँ ढले हुए लोहे को पाँच दस शिलिंग में अंग्रेजी टन लागत से बनाने के लिए पूर्णरूप से सक्षम है
इसमें केवल भट्ठी का ही नुकसान है जिसकी कींमत केवल ६ शिलिंग होती है
मेजर जेम्स फ्रेंकलिन , बंगाल सेना , एफ . आर . एस . , एम . आर . ए . एस . , सन् १८२० सन्दर्भ १ . मखरला ( लैटेराइट ) शब्द का प्रयोग डॉ . बछानन ने भारत में बहुतायत से पाए जाने वाले लोह अयस्क की एक प्रजाति के लिए किया है
१६ . दक्षिण भारत में लोहे की सलाखों का निर्माण १ . भारत और इंग्लैण्ड के बीच व्यापार में भारत को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है
इंग्लैण्ड ने भारत का सूती कपडे का व्यापार छीन लिया है
वास्तव में हमें तो कैप्टन ड्रमंड से बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका से इस संबध में जानकारी प्राप्त हुई कि केन्नोन में बनाए गए झूलापुल के लिए मात्र का खर्च ८० रू . प्रति टन किया गया जब कि इतने रूपए में तो स्थल पर ही इससे अधिक लोहा बनाया जा सकता था
अंग्रेजी पद्धति से लोहे का उत्पादन इंग्लैंड में अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ है; अत: भारत में भी इसी प्रक्रिया के अनुरूप वैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है
कच्चे लोह अयस्क से बाष्पशील अशुद्धता को दूर करने के लिए पहले इसे सेंका जाता है और बाद में इसे प्रगलन हेतु भट्टियों में डाला जाता है
८ . एक टन लोह सलाख बनाने में इंग्लेंड में औसतन नौ टन कोयला उपयोग में लाया जाता है
९ . फ्रांस , स्वीडन , नोर्वे तथा जर्मनी के कुछ भागों में ईंधन के रूप में मुख्य रूप से कोयले का उपयोग किया जाता है
कच्चे लोह अयस्क में लोहे के विशुद्ध ऑक्साइड होते हैं
चमड़े की धोंकनी का उपयोग हवा धोंकने के लिए किया जाता है
१२ . फ्राँस के कुछ भागों में लोहे के खनिज ऑक्साइड से तुरंत पिटवाँ लोहा बनाया जाता है जो कि १६ इंच आयताकार तथा दो फीट गहरी जगह में गट्ठे में कारखाने के तल में बनाया जाता है
चार्ज की इस प्रक्रिया को सात बार किया जाता है
इस तरह अच्छी किस्म के लोहे की एक इंच की भी सलाख बडे़ भारी हथौड़े की दर्जनों चोटें खाने के बाद में ही टूटती है
क्योंकि बाँस के कोयले में अत्यंत उत्कृष्ट रुप से विभक्त सिलिका के तत्त्व होते हैं
वर्षों के अनुभव से परिपक्वता को प्राप्त उनकी कला से यूरोप के विद्वान दार्शनिकों को बहुत ज्ञान तथा आनंद मिल सकता है परन्तु किसीने भी उनका अध्ययन करके लाभान्वित होने का विचार नहीं किया है
उनकी यह कला स्वभात: अत्यंत मसृण है तथा युद्धों या अत्याचारों तथा सरकारों की क्रांतियों को झेल नहीं पातीं
समुद्री वनस्पति को जलाकर उसमें से उच्च कोटि का अश्मीभूत क्षार तैयार करते हैं
यह संकोचक पदार्थ एक वृक्ष से प्राप्त होता है जो इस द्वीप में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है
कुछ रंगों को और अधिक चटखदार बनाने में इसकी गजब की भूमिका होती है जो वृक्ष के व्रण से बने रंगों में बिल्कुल भी नहीं होती क्योंकि मैं ने इस देश के रंगाई कार्य में इसका उपयोग होते हुए देखा है
इसका उपयोग चकमक बंदूक को ढकने के लिए , लोहे को खराद पर चढाकर काटने के लिए , छेनी से पत्थर काटने के लिए , रेतना और कुहाडी आदि अधिक कठोरतायुक्त साधन बनाने के लिए किया जाता है
आप ध्यानपूर्वक देखेंगे कि यह हल्के से लाल ताप के सिवाय कुछ भी सहन नहीं कर पाता अत: लोहार को यह अत्यंत श्रमसाध्य ढंग से कुशलतापूर्वक बनाना पडता है
मलबार के लोग बहुत पहले से लोहा बनाते रहे हैं
अत: मैं आपका ध्यान थोडी देर के लिए डामर की ओर आकर्षित करना चाहूँगा जिसकी उपयोगिता वैश्विक है तथा समग्र पूर्वी दुनिया में इसका अत्यधिक उपयोग हो रहा है
तेल में घुली हुई डामर गर्म करके जहाजों की तली में लगाई जाती है
इस लेख का मूल शीर्षक था 'हिंट्स कंसर्निंग सम ऑफ द एडवांटेजेज डिराइव्ड फ्रॉम एन एग्झामिनेशन ऑव ऑस्ट्रानोमिकल आब्जर्वेटरी ऑफ बनारस'
अध्याय ७ . 'बंगाल में चेचक की टीकाकरण कार्यवाही' रो कोल्ट द्वारा डॉ . ऑलीवर कोल्ट को कोलकता १ से १० फरवरी , १७३१ को लिखे गए पत्र में 'बंगाल की बीमारियों का लेखाजोखा' से सार संक्षेप के रूप में लिया गया है
अध्याय १३ . कैप्टन थोस हाल्कोट द्वारा लिखित 'दक्षिण भारत का बुबाई कृषि कर्म' मूल दो पत्रों के रूप में था जिसे 'कृषि बोर्ड के पत्राचार' के खंड १ के पृ . ३५२-६ पर सन १७९७ में प्रकाशित किया गया
अध्याय १७ . 'पश्चिमी भारत में तकनीकी के परिप्रेक्ष्य' में मूलत: मुम्बई से डॉ . एच . स्कॉट द्वारा लंदन की रॉयल सोसायटी के अध्यक्ष सर जॉसेफ बैंक्स को लिखे गये पत्रों के संक्षेप समाहित हैं
वे भारत में पहली बार सन् १७४९ के करीब आए
रूबेन बरो , ( १७४७-९२ ) गणितशास्त्री थे
भारत में वे वारेन हैस्टिंग्स के प्रबल समर्थकों में से एक थे
उनका जन्म १२ मई १७६४ को हुआ था
उनकी शिक्षा डी . ए . वी . कालेज , लाहौर में हुई
धर्मपालजी एवं फिलिस के एक पुत्र एवं दो पुत्रियां हैं
पुत्र डेविड लन्दन में व्यवसायी है , पुत्री रोझविता लन्दन में अध्यापक है और दूसरी पुत्री गीता धर्मपाल हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय , जर्मनी में इतिहास विषय की अध्यापक है
यद्यपि विगत अर्धशतक में नम्रता और सरलता की इस छवि के सत्य होने के प्रमाण नहीं मिलते
२०वीं शताब्दी में सरकार के अन्याय , निर्दयता और क्रूरता का भारतीयों का विरोध दो प्रकार से व्यक्त हुआ है
२०वीं शताब्दी में सरकार के अन्याय , निर्दयता और क्रूरता का भारतीयों का विरोध दो प्रकार से व्यक्त हुआ है
यद्यपि यह सत्य है कि गांधीजी ने इन शस्त्रों का उपयोग पहले दक्षिण अफ्रिका में और फिर भारत में किया
एक विद्वान के मतानुसार , सरकार की अन्यायपूर्ण सत्ता के विरुद्ध प्रतिकार के कर्तव्य का स्वनिवेदन थोरो के निबन्ध 'रेजिस्टेन्स टु सिविल गवर्नमेन्ट' : Resistence to Civil Government में मिलता है
एक आधुनिक लेखक के मतानुसार गांधीजी को थोरो से असहयोग और रस्किन से सहयोग की प्रेरणा मिली थी
' पाठ यह था कि यदि ब्रिटिश सत्ता को प्राप्त भारतीयों का सहयोग वापस खींच लिया जायेगा तो उनकी सत्ता का पतन होगा
आर . आर . दिवाकर के अनुसार प्रह्लाद , सोक्रेटिस आदि से प्रेरणा लेकर गांधीजी ने नित्यप्रति की समस्याओं के समाधान के लिए एक व्यापक , अर्ध धार्मिक सिद्धान्त अपनाया और उस प्रकार दुष्टता और अन्याय के विरुद्ध अहिंसक रूप से लडने के लिए लोगों को एक नया शस्त्र दिया
६० वर्ष बाद , महात्मा गांधी के लिये सविनय कानूनभंग राजकीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक क्रांति का एक साधन बन गया था
राजा का प्रत्येक अधिकार कर्तव्य से ही आता था
ब्रिटेन के शासन में हुए पत्रव्यवहार में विशेष रूप से अधोरेखांकित किया गया है
कल पैनूर में लगभग ११ , ००० लोग एकत्रित हो गए थे
जैसे कि महाराष्ट्र में १८२० से ४० के समय में विभिन्न प्रकार के 'बंद' हुए थे
 ) उस समय ( बंगाल , बिहार , बनारस आदि में ) जिला समाहर्ता का कार्य मुख्य रूप से राजस्व लगाने और वसूलने से संबंधित ही था
विभिन्न सरकारी अधिकारियों के बीच हुए पत्रव्यवहार से सम्बन्धित अभिलेख इस पुस्तक में दिए गए हैं
समाहर्ता को 'शुद्ध आय पर ५ प्रतिशत कमिशन' मिलता था
'कलेक्टिव वायलन्स , इन यूरोपियन पर्स्पेक्टिव ( Collective Violence in European Perspective ) में चार्ल्स टिलि के अनुसार , 'अधिकांश दंगे उस समय हिंसक बन गये जब शासकों ने गैरकानूनी किन्तु अहिंसक आंदोलन को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया . . . आन्दोलन कर्ताओं की अपेक्षा सैन्य अथवा पुलिस द्वारा हत्या और पिटाई अधिक हुई थी
 ( सौजन्य : एसेज ऑन डिसओबिडियन्स , वॉर एन्ड सिटीजनशिप ( Essays on Disobedience , War and Citizenship १९७० , पू . ३२ ) महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिशों के विरुद्ध किए असंख्य 'बंध' के विषय में प्रेसिडेन्सी के राजकीय और न्यायिक अभिलेखों में बहुत सी सामग्री १८२०-४० के समय में मिलती है
उनमें एक "पुरन्दर बंद' है जो रामोशीओं ने १८२६-२८ में बड़े पैमाने पर आयोजित किया था
बनारस की घटनाएं विरोध बनारस से शुरू हुआ
१ . भूतपूर्व मुल्तानों ने ( सामान्यत: मालगुजारी कहे जानेवाले ) सरकार के अधिकारों को उसकी प्रजा द्वारा , वंशपरम्परागत रूप से अथवा हस्तान्तरण द्वारा प्राप्त निवास स्थानों पर लागू नहीं किया था
बंगाल और बिहार प्रांतो में तो , पुलिस के लिए खर्च स्टैम्प ड्यूटी और अन्य करों में से किया जाता है , और बनारस में वह भू राजस्व से किया जाता है , तो फिर यह घर कर लागू करने का उद्देश क्या है ? ३ . यदि , शास्त्रों का आधार लिया जाए तो , बनारस शहर और उसके आसपास के पाँच कोस का क्षेत्र धार्मिक स्थल माना जाता है और सरकार के अधिनियम १५ १८१० अनुसार धार्मिक स्थलों को कर से मुक्ति दी गई है
बंगाल और बिहार प्रांतो में तो , पुलिस के लिए खर्च स्टैम्प ड्यूटी और अन्य करों में से किया जाता है , और बनारस में वह भू राजस्व से किया जाता है , तो फिर यह घर कर लागू करने का उद्देश क्या है ? ३ . यदि , शास्त्रों का आधार लिया जाए तो , बनारस शहर और उसके आसपास के पाँच कोस का क्षेत्र धार्मिक स्थल माना जाता है और सरकार के अधिनियम १५ १८१० अनुसार धार्मिक स्थलों को कर से मुक्ति दी गई है
५ . अनेक मकानमालिक तो ऐसे हैं कि वे अपने मकानों का जीर्णोद्धार भी नहीं करा सकते या फिर से चिनवा नहीं सकते
६ . आपको तो आपके गरीब आवेदकों का कल्याण और सुख में वृद्धि हो ऐसा करना चाहिए , इसके स्थान पर हमें फायदा होना या लाभ मिलना तो एक ओर रहा , उसके विरुद्ध हमारे सर पर सतत एक या दूसरा बोझ लादा जा रहा है
' भूमिका प्रस्तुत करते हुए उन्होंने लिखा था , 'लोगों में भारी जोशखरोशी , रोष और हंगामा प्रवर्तित है; वे दूकानें बंद कर अपने दैनिक व्यापार धंधे को छोड़ कर भारी संख्या में एकत्रित हो रहे हैं और अपनी मांग तत्काल पूरी करने के लिए मुझ पर दबाव बढ़ा रहे हैं
दिनांक ४ जनवरी तक परिस्थिति इस हद तक सुधर गई कि कार्यवाहक न्यायाधीश बहुत संतोषपूर्वक स्पष्ट कर सका कि 'इस शहर के निवासी अब सरकार की सत्ता के सामने की स्थिति बनाए रखने के खतरों और आंदोलन की अनुपयोगिता को समझ गए हैं' इसके साथ किस भयावह स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण पाया है इसका निरूपण करते हुए उसने लिखा , 'नगर के सभी प्रकार के लोग अपने अपने वर्गों में नगर के किसी स्थान पर इकट्ठे हो गए थे , अपने अपने वर्गो में विभाजित हो गए थे , उद्देश्य सिद्ध नहीं होने तक वहां से न हटने की सौगंध उन्होंने खाई थी और दिनप्रतिदिन उनकी संख्या बढ़ रही थी और संकल्प दृढ़ होता जा रहा था
उसलिए मुझे ढिंढोरा पिटवाने की जरूरत पड़ी कि नाववाले यदि नाव बंद रखेंगे तो सरकार नावों को जप्त कर लेगी
सरकार को लगता था कि 'सरकार के सत्ताधीशों द्वारा सीधी घोषणा होते ही लोग सही मार्ग पर आ जाएँगे' अथवा तो उन्हें 'ऐसे गैरकानूनी कृत्य जारी रखने से उनपर वे कितनी कठिनाई आ सकती है इसकी समझ आयेगी'
सरकार प्रत्येक आवेदन पर पर्याप्त ध्यान दे रही है तथा समाज के प्रत्येक वर्ग को पर्याप्त सुरक्षा देने के लिए प्रयत्नशील है यह बात सर्वज्ञात है , परन्तु यह नहीं चलाया जा सकता कि अधिकारियों के सभी उचित प्रयासों की अवमानना कर लोग ऐसे गैर कानूनी जमाव निर्माण करके उपद्रव मचाएं
' परिणामस्वरूप , दिनांक ४ जनवरी को न्यायाधीश की ओर से कुछ उत्साहप्रेरक रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार ने उसके दिनांक ११ के दो पत्रों द्वारा बनारस के सत्ताधीशों का धार्मिक स्थानों से संबंधित कानून की धारा के प्रति ध्यान आकर्षित किया था और एकदम निचली कक्षा के लोगों के निवास स्थानों को , उस कर से मुक्ति देने का निर्णय भी स्पष्ट कर दिया था | और जिसकी कीमत लगभग न के बराबर है , ऐसे निवास स्थानों से सरकार का आय प्राप्त करने का हेतु हो ही नहीं सकता
इसके बाद १४ जनवरी से जनता फिर एकत्रित होने लगी
उस बीच दिनांक ११ के ( धार्मिक संस्थानों को कर मुक्ति देने संबंधी ) सरकार के आदेश बनारस के सत्ताधीशों तक पहुँच गए थे , परन्तु कार्यवाहक न्यायाधीश को लगा कि 'जो लोग इस प्रकार के अनुचित और अन्यायी कार्यकलापों में लगे हैं , वे प्रसन्न तो नहीं ही हैं
इस प्रकार सत्ताधीशों के द्वारा किए गए अमाप प्रयासों के कारण जनता की एकता और विश्वास क्रमश: टूटते गए
इसके बाद न्यायाधीश ने बताया कि ( बनारस के ) लोगों ने एक समूह में मिलकर कोलकता जाने का विचार किया है और मार्ग में उन शहरों को शामिल कर लेने की योजना है जहाँ मकान कर लागू किया गया है
उसके बाद भी कार्यवाहक न्यायाधीश ने अपने दिनांक २८ जनवरी के रिपोर्ट में , उस सामान्य माफी के बारे में सुझाव दिया था , क्योंकि नगर में रहनेवाले प्रत्येक नागरिक का हृदय उसके साथ जुड़ा है और 'सत्ता को पुष्टि प्रदान करनेवाला कदम तो शायद , बहुत पहले ही लिया जा चुका है'
' परन्तु साथ ही , न्यायाधीश को यह भी बताना जरूरी है कि उस प्रकार की कानूनी कार्यवाही मर्यादित संख्या में ही होनी चाहिए
फिर भी सरकार ने अपने जनवरी ११ के आदेश की मर्यादा से जरा भी न हटते हुए ( बनारस के ) निवासियों के आवेदन की ओर ध्यान देना उचित नहीं समझा
फिर भी सरकार ने अपने जनवरी ११ के आदेश की मर्यादा से जरा भी न हटते हुए ( बनारस के ) निवासियों के आवेदन की ओर ध्यान देना उचित नहीं समझा
मुर्शिदाबाद की घटनाएँ इसी प्रकार के अत्याचार , उसके विरुद्ध मनोभाव , और उसके लिए सरकार द्वारा दी गई सूचनाओं का मुर्शिदाबाद में दिनांक २ मार्च को पुनरावर्तन हुआ था , परन्तु यहाँ की स्थिति अधिक गम्भीर थी
आपत्तिजनक शब्दों से युक्त आवेदन इस प्रकार था' 'ईश्वर की कृपा से एक अंग्रेज सज्जन जानता है कि दुनिया के किसी भी राजा ने अपनी प्रजा पर अत्याचार किया नहीं है
इस के कारण कोई दंगा भड़क उठता है तो , इस स्थिति में क्या कदम उठाया जाए , इस संबंध में सरकार से सूचनाएँ भी मांगी थीं
न्यायिक और राजस्व विभाग के सचिव के रूप में दायित्व निभानेवाले बोर्ड ऑव् रेवन्यू के एक वरिष्ठ सदस्य , जो सेवा निवृत्त होने वाले थे , उन्होंने निवृत्ति पूर्व दिनांक १९ अक्टूबर को एक अन्य संदर्भ में यह प्रश्न फिर से उठाया था
सरकार को दिनांक ११ अक्टूबर को उस संबंध में विचार कर न्यायाधीश की कार्यवाही को अस्वीकार्य बताते हुए समाहर्ता के मंतव्य के साथ सहमति बताई और कहा कि कर वसूल करना स्थगित करने की कार्यवाही भागलपुर की जनता को और मुर्शिदाबाद तथा पटना की और अन्य स्थानों की जनता को समूह बनाने के लिए उत्तेजना देने जैसी है
सरकार का यह आदेश दिनांक २० अक्टूबर के आसपास भागलपुर पहुँचा
न्यायाधीश ने अपने १५ नवम्बर के पत्र में लिखा था कि यह मानने के लिए उनके पास पर्याप्त कारण हैं कि ( इन कारणों की बाद में शहर के प्रतिष्ठित नागरिकों ने पुष्टि की थी ) उसने ( समाहर्ता ने ) यदि भीड़ को उकसाया न होता , तो इस प्रकार का हमला नहीं होता
दिनांक २१ अक्टूबर रात्रि के १० बजे समाहर्ता ने सरकार को बताया , 'मुझे आपको सूचित करते हुए अत्यन्त दु:ख हो रहा है कि मकान कर वसूल करने की कार्यवाही हाथ में लेते ही कल शाम मुझ पर भारी हमला हुआ
इस संबंध में हिल रेन्जर्स के कमाडिंग अफसर ने लिखा , 'जब प्रमुख लोग , कल शाम को वहाँ से वापस लौट गये तब महिलाएँ और बच्चे वहीं खडे़ रहे
मकान कर के विरोध के विषय में इंग्लैण्ड को सर्व प्रथम जानकारी बंगाल सरकार ने अपने राजस्व पत्र , दिनांक १२ फरवरी १८११ द्वारा भेजी थी
क्योंकि ( वह कर ) सरकार की जरूरत पूरी करने के लिए लोगों के विरोध की भावना को दबाकर सरकार का आधिपत्य मान्य करवाने जैसा था
४ . लोहार उस समय शक्तिशाली और सुसंगठित समूह था
' 'जो भी ऐसा फलक या पत्रक खोज कर लायेगा उसे ५०० रूपए का पुरस्कार' उसने घोषित किया था
यह साक्षात्कार या तो उन्हें हिंसा की ओर मोड़ सकता था या फिर वे अधिकाधिक निष्क्रिय और अन्तर्मुख बन जाते थे
सन् १८१०-११ में लोग स्वयं प्रेरणा से व्यवहार करते थे परन्तु एक शतक के बाद भारत के लोग ऐसा नहीं कर सकते थे
महात्मा गांधी ने इस स्थिति से लोगों को बाहर निकाल कर उनमें साहस और विश्वास पैदा किये थे
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के ( और यदि उससे भी पूर्व के अस्तित्व में हों और प्राप्य भी हों ) अभिलेखों का सुव्यवस्थित ढंग से अध्ययन करने पर विरोध के अन्य स्वरूप और उसके प्रमुख लक्षणों की जानकारी मिल सकती है
सन् १९४७ से ही स्वतंत्र भारत में असहयोग और नागरिक अवज्ञा का क्या प्रयोजन है इस विषय पर विवाद चल रहा है
सरकार के तन्त्र में जुडे़ हुए लोगों के अतिरिक्त इसका विरोध करनेवालों में प्रमुख व्यक्ति थे श्रीनिवास शास्त्री और रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उखाड़ फैंकने की , विस्थापित करने की , देश में अराजकता की स्थिति निर्माण करने की , कानून की अवमानना करने की , व्यवस्था और नियुक्त सरकार को नष्ट करने की किसी भी प्रकार की प्रवृत्ति के प्रति श्रीनिवास शास्त्री आशंकित थे
परन्तु भारत में ब्रिटिश शासन के अन्त के साथ शास्त्री , ठाकुर , परांजपे आदि के दृष्टिकोण फिर से उभर कर सामने आ गए
और जैसे कि स्वाभाविक अपेक्षा की जा सकती है विरोध या असहमति ऐसे लोगों के द्वारा जताई जाती है जो शासनतन्त्र से जुडे़ होते हैं
वह तो विगत दो सौ वर्षों की उपज है
अत: लोगों के विरोध या मांग के समक्ष झुकना या उसके अनुसार अपनी व्यवस्था को बदलना यो छोड़ना अपने शासन की वैधता के प्रति चुनौती है ऐसा वे नहीं मानते थे
' मैटकाफ आगे लिखता है , 'इतनी क्षणभंगुरता का कारण यह है कि हमारा आधिपत्य वास्तविक ताकत पर नहीं अपितु केवल धारणा पर आधारित है
कुछ मास पूर्व मैटकाफ ने परामर्श दिया था , 'भारतीय जनसमाज का प्रभावशील तबका समान हित और समान भावनाओं के साथ हमारी सरकार में नहीं जुड़ता तब तक भारत में हम जड़ें नहीं जमा सकते , परिणामत: हमारा शासन अत्यन्त असुरक्षित ही रहेगा ऐसा मेरा निश्चित मत है' और उसने 'हमारे देशवासियों को भारत में स्थिरतापूर्वक स्थापित करने में सहूलियत हो इस हेतु से योजनाबद्ध पद्धति से' जो भी हो सकता है वह सब करने का आग्रह किया था
इस प्रकार राज्य की कभी गलती नहीं होती इस सिद्धान्त का वास्तव में त्याग करने के बाद भी उसे ऐसा बनानेवाले नियम , विनियम और कानून उसी रूप में अभी भी अवस्थित हैं
१९४७ से पूर्व का परांजपे , रवीन्द्रनाथ और श्रीनिवास शास्त्री जैसे लोगों का अथवा राज्य के ढांचे से जुडे़ लोगों के असहयोग और नागरिक अवज्ञा के विरोध और सैद्धान्तिक निषेध के मूल राज्य का ढांचा गलत न होने के ब्रिटिश सिद्धान्त में हैं
कुछ समकालीन सिद्धान्त 'क्रान्ति' के विषय में ऐसा कहते हैं
पूर्व में बताया गया है इस प्रकार से इन दो को यशस्वी होने के लिये दो विरोधी पक्षों में मूल्यों की कुछ समानता होनी चाहिये
आपखुदशाही , संवेदनहीनता और अन्याय के विरुद्ध जो लोग असहयोग और नागरिक अवज्ञा का अवलम्बन करते हैं वे वास्तव में अपने समाज और राज्य के रक्षक होते हैं
बहुत लोगों के मतानुसार तो जिन का जीवन आश्रम से तालीमबद्ध न हुआ उनके द्वारा तो किया ही नहीं जा सकता , परन्तु समान्यत: बनारस के १८१०-११ के कार्यक्रमों की दृष्टि से तो , सत्याग्रह का सर्वमान्य अर्थं , असहयोग और सविनय कानूनभंग हो सकता है और जब गांधीजी ने जेक्स और पोल्स को सत्याग्रह करने के लिए बताया तो उनकी समान्य योजना बनारस जैसै ही विरोध की ( जो वे उनकी बुद्धि के अनुरूप कर सकें ऐसा था ) थी
३ . घटनाओं का अधिकृत वृत्तांत क . बनारस की घटनाएं १ . क . १ बनारस के समाहर्ता का कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र २६-११-१८१० डबल्यू , डबल्यू , बर्ड एस्क . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस महोदय , विनियम १५ , १८१० के तहत बनारस के मकानों और दूकानों पर कर लागू किया गया है उसकी वसूली के लिये आपके सहयोग की अपेक्षा है , जिससे इस कर के विषय में यथासंभव अधिक मात्रा में प्रचार किया जा सके
उसके साथ नगर और उपनगर के कुछ थानों के लिए पूर्वोक्त विनियम की लगभग दस भाषांतरित प्रतियां भेजना चाहता हूँ
१ क . २ बनारस के समाहर्ता का कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र ६-१२-१८१० डब्लयू . डबल्यू , बर्ड एस्क . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस महोदय , गत दिनांक २६ के मेरे पत्र के संदर्भ में आपको सूचित कर रहा हूं कि मकानों को क्रमांक देने का काम शुरू कर दिया गया है
४ . उस संबंध में मैं सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि रोजगार मिलना मुश्किल होने और उपयोगी वस्तुओं के भाव गिर जाने के साथ उस नगर के लोगों पर लागू किए गए कर से विशेष रूप में माफी देने का कोई उचित कारण न होने पर भी उस विनियम से अन्य नगरों को दी गई माफी को सम्मुख रखकर समान न्याय के अनुरूप माफी चाहने का आवेदन भी आ सकता है
६ . लोगों में भारी जोशखरोशी , रोष और हंगामा प्रवर्तित है; वे दूकानें बंद कर अपने दैनिक व्यापार धंधे को छोड कर भारी संख्या में एकत्रित हो रहे हैं और अपनी मांग तत्काल पूरी करने के लिए मुझ पर दबाव बढा रहे हैं
साथ ही मुझे कर निर्धारण करनेवाले कर्मचारियों को सरकार से आदेश मिलने तक रोके रखने के लिए समाहर्ता को निर्देश देने के लिए कह रहे हैं
७ . आज सायंकाल के संघर्ष और विरोध की स्थिति इतनी खराब थी कि मुझे लगा कि मुझे सैन्य सहायता के लिए मेजर जनरल मेक्डोनाल्ड को सूचना देनी ही पड़ेगी
यद्यपि अपने रक्षक दल को तत्काल जमा होते देखकर ही उपद्रव थमने लगा था
उन्होंने निर्धार किया है कि सरकार का आदेश कुछ भी हो , बलप्रयोग के बिना वे कर नहीं भरेंगे
ऐसी ही एक आचार संहिता बनाकर विभिन्न वर्ग के अग्रणियों को भेजने का भी इरादा है और जो कोई उस पर हस्ताक्षर नहीं करता उसे दण्ड देने का भी प्रस्ताव है
१ . क . ६ . कार्यवाहक न्यायाधीश बनारस का सरकार को पत्र ३१-१२-१८१० महोदय , आपको भेजे मेरे विगत पत्र के बाद मैंने मेरा समग्र ध्यान जरा भी शिथिल न होकर बनारस के निवासियों कें रोष को शांत करने पर और उन्हें सरकार की ओर से उनके इस विषय संबंधी आवेदनों के प्रति कोई निर्णय आने तक अपने अपने दैनन्दिन व्यवसायों में लग जाने के लिए समझाने पर केन्द्रित किया है
उस विषय में मैं मानता हूँ कि स्थल पर अभी तैनात दल अपर्याप्त और असक्षम है
३ . समग्र प्रांत में इस तरह लोग संगठित हो रहे हैं ऐसा मानने के लिए एक से अधिक कारण हैं
खेती पर इसका गम्भीर परिणाम होगा और असन्तुष्टों की संख्या बढेगी
१ . क . ८ . बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र ४-१-१८११ महोदय , महामहिम गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को आदरपूर्वक सूचित कर रहा हूं कि गत दिनांक २ के मेरे पत्र के बाद नगर की स्थिति में लगभग कोई अन्तर नहीं है
मुझे जैसी खबर मिली कि आसपास के परगनों से लुहार एकत्रित हो रहे हैं , तत्काल ही मैंने जमीनदारों को , उनके ही उपर आपत्ति आनेवाली है यह समझकर अपने अधिकार का उस उत्पात के विरुद्ध उपयोग करने के लिये बताया
मुझे इस मामले में , सईदपुर के जागीरदार बाबू शिवनारायण सिंह की जो सहायता मिली है उसके लिए मैं उनका ऋण स्वीकार करता हूँ
उनके प्रभाव से नगर के बाजार को बचाने में जो सहयोग मिला है उस के लिए मैं उनका ऋणी हूँ
उन्होंने प्रान्त के हर गांव में धर्मपत्री पहुँचाने के लिए खास दूतों की नियुक्ति की , और प्रत्येक परिवार से एक-एक व्यक्ति को बनारस भेजने का सन्देश दिया
३ . इस प्रकार इकट्ठे हुए लोगों के लिए ईंधन , तेल और अन्य उपयोगी सामग्री पहुंचाई जाती रही थी , परन्तु तब नगर में अनाज के अतिरिक्त कोई वस्तु उपलब्ध नहीं थी
धार्मिक नेता धर्मभीरू लोगों पर के अपने प्रभाव से उन्हें एकजुट रखने का प्रयास करते थे
दूसरी ओर धर्मपत्री पहुँचाने वालों में से कई लोगों को पुलिस ने पकड़ लिया और उस प्रकार के उपद्रव नियंत्रण में लेने के लिए उन्हें बंदी बनाने का दौर जारी रखा
अर्थात बडी संख्या में इकट्ठे होकर बनारस के लोग उस कर का अच्छा विरोध दिखा सके हैं और यदि वे लोग अमीनाबाद के लिये माफी प्राप्त करने में सफल होंगे तो पटना भी इस पद्धति का अनुसरण करेगा
१ . क . ११ . सरकार का कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस को पत्र लु-१-१८११ महोदय , मुझे मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की ओर से आप से प्राप्त गत दिनांक २५ , २८ तथा ३१ के पत्रों तथा उसके साथ के संलग्नकों की रसीद भेजने की सूचना मिली है
गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की इच्छा है कि आप ठीक से समझ लें कि उपरोक्त आदेश का प्रयोजन यही है कि आप सेना की मदद लेकर ऐसे लोगों को खास गिरफ्तार कर लें जो बिखर जाने के आपके अनुरोध के प्रति ध्यान नहीं देते हैं और राजद्रोह जैसी स्थिति निर्माण करने में आगे रह कर भाग ले रहे हैं
आपसे अपेक्षा है कि आप मेजर जनल मैकडोनाल्ड को पूर्व आदेश की सूचना दें ताकि वर्तमान स्थिति में आवश्यकता पडने पर तुरन्त उचित कार्यवाही के लिये वे अपनी सेना के साथ तैयार रहें
गवर्नर जनरल इन काउन्सिल पूरी संवेदना और सहानुभूति के साथ , कानून का उल्लंघन करने वाले हठी या जिद्दी लोगों को चेतावनी देना चाहते हैं कि उनका ऐसा व्यवहार जारी रहेगा तो वह राजद्रोह माना जाएगा और वे अपने लिए गंभीर स्थिति को निमंत्रित करेंगे
मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड अपना विरोध व्यक्त करते हुए बतातें है कि चौथी रेजिमेण्ट नेटिव इन्फण्ट्री की चौथी कुमक न पहुंचे तब तक सरकार का आदेश जल्दबाजी में लागू न करें जबतक मि . बर्ड आश्वासन न दें कि सेना उस संबंध में आपत्ति नहीं उठाएगी और वे खुद ( मि . बर्ड ) अपनी जवाबदारी पर , मेजर जनरल के पास अभी जो है वह सब तैनात करने के लिए कहे तब तक आदेश लागू न करें
७ . इस प्रकार के अनुकूल वातावरण में सैयद अकबर अलीखान नामक एक संनिष्ठ बुजुर्ग सरकारी सेवक की उत्साहपूर्ण मेहनत और मि . ब्रुक और महाराजा अमृतराव के बीच के सम्पर्कसूत्र मौलवी अब्दुल कादिरखान के सहयोग से भीड की योजना असफल बन गई और उनकी उलझन अधिक गहरी हुई
इस आवेदन की शैली और मायना अवमानना युक्त है
उन्हें निर्णय की जानकारी भी हो चुकी है , फिर भी इस समय आवेदन को वापस कर देना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं माना जाएगा
देश और प्रांत के हित में किसी भी सरकार को इस प्रकार का कर लागू करने का अधिकार नहीं है और यदि लोग इसका विरोध नहीं करेंगे तो कर बढता ही जाएगा और फिर तो लोग जिसे अपना समझते हैं उसे भी धीरे धीरे कर के दायरे में सम्मलित कर लिया जाएगा
साथ ही मान्यवर काउन्सिल को आपके द्वारा बताई गई स्थिति के संबंध में कोई ऐसा कारण नहीं दिखता है जिसकी वजह से इस समय कर में सुधार संबंधी कोई बातचीत रोक देनी चाहिये
इस आवेदन पर सरकार का आदेश जारी हुआ है कि गवर्नर जनरल इन काउन्सिल बनारसवासियों का आवेदन मान्य नहीं कर सकते हैं
तीसरा , दिनांक ५ जनवरी , १८११ के प्रस्ताव में निश्चित किया गया है कि बनारस के निवासियों को फाटकबंदी , चौकीदार और उसके मरम्मत आदि खर्च में बहुत अधिक रकम चुकानी पडती थी , उसमें से मुक्ति दी जाए और उस खर्च को सार्वजनिक फंड से भरपाई किया जाए
इस विषय में प्रस्ताव पारित होते ही उसकी जानकारी उस मास की दिनांक १३ के प्रचार पत्र में दी गई थी
उनकी धारणा थी कि निर्धारक और कार्यकारी अधिकारी सम्पत्ति आदि सब देखकर , समझकर करनिर्धारण करेंगे
ख . पटना की घटनाएँ १ . ख . १ . पटना के कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र महोदय , पटना शहर के निवासियों में कुछ लोगों की ओर से , विनियम १५ , १८१० के प्रावधान के अनुसार जो मकान कर लागू किया जानेवाला है उससे मुक्ति प्राप्त करने के बारे में मुझे प्राप्त १२ आवेदन पत्र को भेज रहा हूँ , जिसे आप मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को विचार तथा उचित आदेश हेतु अग्रेषित करें यही निवेदन है
बनारस में जब मंत्रणा हुई और उनके विचार के प्रति असहमति और विरोध व्यक्त हुआ तब स्थानिक सभी वर्गों के साथ सौम्यतापूर्वक व्यवहार करते हुए इस व्यवस्था के प्रति आवेदन देने का प्रावधान होने की सांत्वना देकर स्थिति से निपटा गया था
आपका आज्ञाकारी काउन्सिल कक्ष जी . डोड्स्वेल १८ जनवरी १८११ सरकार के सचिव घ . मुर्शिदाबाद की घटनाएँ १ . घ . १ . मुर्शिदाबाद के कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र २५-२-१८११ जी . डोड्स्वेल सरकार के सचिव , न्यायतंत्र विभाग फोर्ट विलियम महोदय , मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को सूचना देना मेरा कर्तव्य है कि हाल ही में नियम बनाकर मकान कर वसूल करने के प्रावधान के तहत , वसूली कार्यवाही का प्रारम्भ करते ही नगर में भारी असंतोष फैल गया है
वास्तव में सरकार का यह आदेश वज्राघात ही है . . . १ . घ . २ . कार्यवाहक न्यायाधीश , मुर्शिदाबाद को सरकार का पत्र २-३-१८११ कार्यवाहक न्यायाधीश , मुर्शिदाबाद महोदय , मुझे मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की ओर से गत दिनांक २५ का आपका पत्र तथा उसके साथ संलग्न कागजात की रसीद देने की सूचना मिली है
४ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि मुर्शिदाबाद के लोग इस कर के प्रावधान का विरोध करने का प्रयास चालू रखेंगे
२ . परसों ३० सितम्बर और सोमवार होने से , कर वसूली का काम शुरू करना था , किन्तु तहसीलदार के आते ही सभी ने दूकानें और घर बंद कर दिये
२ . परसों जब मैं भागलपुर शहर में निकला तब मैंने देखा कि सभी दूकानें बन्द थीं और हज़ारों की संख्या में लोग इकठ्ठा होकर हो हल्ला मचा रहे थे , गलियों में घूम कर उचित करने की मांग कर रहे थे
उन लोगों ने एक आवाज़ में बताया कि सब घरबार और शहर छोड़ देंगे किन्तु जिस के विषय में वे कुछ भी नहीं समझते हैं ऐसा कर स्वैच्छिक रूप से नहीं भरेंगे
लगभग आठ हजार लोग वहाँ आ गए , उनके हाथ में हथियार जैसा कुछ नहीं था
सवेरे शाहजुंगी के पास कुछ लोग इकट्ठे हुए , किन्तु कोतवाल और उनके लोगों ने उन्हें भगा दिया
जिला भागलपुर आपका आज्ञाकारी फौजदारी अदालत जे . सेनफोर्ड २४ अक्टूबर १८११ न्यायाधीश नोट : १ . मैंने समाहर्ता पर हमला करने वाले की खबर देने वाले को ५००/- रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा भी की है , जिसका उल्लेख मेरे इस पत्र में किया गया है
वास्तव में देखा जाए तो न्यायाधीश की ओर से समाहर्ता को कर वसूल करने में आवश्यक मदद और समर्थन मिलना चाहिए था किन्तु ऐसा न करके उसने , सार्वजनिक सेवा के प्रति अशोभनीय व्यवहार किया है
४ . समाहर्ता पर हमला होने से पहले मैंने लश्कर की मदद किन कारणों से नहीं लीं , उस विषय में मैं मेरे गत दिनांक २२ और २४ के पत्र में बता चुका हूँ
१ . च . २१ न्यायाधीश भागलपुर को सरकार का पत्र १९-११-१८११ प्रस्ताव : ( समाहर्ता तथा कार्यकारी न्यायाधीश , जे . यूविंग के आरोप और प्रत्यारोप रूपी ढेर सारे पत्र व्यवहार को ध्यान में रखने के बाद ) गवर्नर जनरल इन काउन्सिल मि . सेनफर्ड चाहें तो भागलपुर के न्यायाधीश और न्यायाधीश के पद का चार्ज वे सस्पेन्ड हुए उस दिन से सम्हाल लें ऐसा बताते हुए आनन्द का अनुभव कर रहे हैं
१ . च . २४ . भागलपुर के समाहर्ता का सरकार को पत्र १९-२-१८१२ जी . डोड्स्वेल सरकार के सचिव न्यायतंत्र विभाग , फोर्ट विलियम महोदय मुझे पता चला है कि न्यायाधीश , भागलपुर ने उनके दिनांक ५ नवम्बर के पत्र में सरकार को ऐसा बताया है कि ता . २१ अक्टूबर की शाम को मैंने भीड़ पर कोडे बरसा कर उत्तेजित किया
४ . नीति से पलायन की पद्धति २ . १ . जी . डॉड्स्वेल , पूर्व सीनि . मेम्बर बोर्ड ऑफ रेवन्यूका सरकार के मुख्य सचिव एन . बी . एड्मॉन्स्टोन को पत्र ( सारांश ) १८-१०-१८१९ ११ . मकान कर निश्चित करने के कार्य में अच्छी प्रगति हुई है , इससे लगता है कि बंगाल , बिहार और उड़ीसा में अल्प समय में ही कार्य पूरा हो सकेगा
४ . नीति से पलायन की पद्धति २ . १ . जी . डॉड्स्वेल , पूर्व सीनि . मेम्बर बोर्ड ऑफ रेवन्यूका सरकार के मुख्य सचिव एन . बी . एड्मॉन्स्टोन को पत्र ( सारांश ) १८-१०-१८१९ ११ . मकान कर निश्चित करने के कार्य में अच्छी प्रगति हुई है , इससे लगता है कि बंगाल , बिहार और उड़ीसा में अल्प समय में ही कार्य पूरा हो सकेगा
२ . जब हिज़ मेजेस्टी के प्रजाजनों को पूरे हिन्दुस्तान में सिविल अथवा क्रिमिनल किस्सों में सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्षेत्र में भी नहीं रखा है तब अधिकारियों को अब एक ही सरकार के अधीन रहनेवाले लोगों के विषय में निर्णय लेने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए
जिसमें विनियम १५ , १८१० और ४ , ८११ में व्यवस्था है कि बंगाल , बिहार , उडीसा और बनारस प्रांतों के अनेक शहर और नगर के मकान पर कर लागू किया जा सकता है , और गवर्नर जनरल इन काउन्सिल वहाँ के निवासियों की सरलता और सुगमता चाहते हैं
अत: हमें आशा है कि आगे वर्णित आदेश से बनारस के निवासी , उन्हें प्राप्त मुक्ति से संतुष्ट होंगे और अब बाद में राजद्रोह की गतिविधियों को छोड़ कर अधिकारियों के उचित आदेश को मानेंगे
इसके साथ कर प्रस्ताव में जो कुछ सुधार करना आवश्यकता लगता है उस विषय में बोर्ड ऑव रेवन्यू के साथ विचारविमर्श से कार्य किया जाएगा
बिना किसी प्रकार के विरोध अथवा असंतोष के लोगों पर कर थोपना सरकार के सद्भाग्य के बिना संभव नहीं होता है
तब सरकार के पास कानून और व्यवस्था स्थापित करने के लिए देश की सेना को लगाने के सिवाय कोई चारा नहीं है
५० . अंतत: लोगों के समझ जाने से , अंतिम सूचित उपाय करने से ( अभी तो ) बच गए , किन्तु हम जब लोक आन्दोलन की प्रेरणा या कारणों का विचार करते हैं अथवा सेना की प्रत्यक्ष कारवाई के परिणामों का विचार करते हैं तब इसी निष्कर्ष पर आने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि प्रशासन ने कोई भी नया कर लगाने से पूर्व लोगों के मिजाज को सावधानी और बुद्धिमानीपूर्वक पहचान लेना अत्यंत आवश्यक होगा
३ . २ . बंगाल से प्राप्त न्यायिक पत्र २९-१०-१८११ ( सारांश ) ६२ . आप मान्यवर कोर्ट को चिंता के साथ लिख रहे हैं कि विनियम १५ , १८१० के तहत मकान कर वसूल करने पर भागलपुर में विरोध और उपद्रव की स्थिति उत्पन्न हो गई है
ऐसे समय में न्यायाधीश और न्यायाधीश ने बिना पूरा विचार किए ही कलेक्टर को कर वसूली रोक देने का आदेश दिया और वह भी इस कारण से कि पटना और मुर्शिदाबाद जैसे शहरों में अभी वसूली शुरू नहीं हुई थी
ऐसे समय में न्यायाधीश और न्यायाधीश ने बिना पूरा विचार किए ही कलेक्टर को कर वसूली रोक देने का आदेश दिया और वह भी इस कारण से कि पटना और मुर्शिदाबाद जैसे शहरों में अभी वसूली शुरू नहीं हुई थी
उसकी तुलना में जो असंतोष और उसके कारण उत्तेजना की सभावनाएँ थीं ( ऐसा हुआ भी था ) उसे सरकार तीन गुना नुकसान के रूप में देखती थी , इसलिए केवल बनारस और भागलपुर में ही नहीं अपितु अनेक स्थानों पर भी ऐसा हो सकता है ऐसा विचार किया गया था
२ . यह कर फ्राईनेन्स कमिटी के साथ मिल कर शुरू किया गया लगता है जिसमें कर के विविध माध्यम उनके विचाराधीन थे
३ . कमिटी द्वारा किए गए अनुमान के अनुसार बनारस , पटना , मुर्शिदाबाद , ढाका , मिर्जापुर , बर्दवान , गया और बंगाल के बडे नगरों सहित बिहार , बनारस तथा कोलकता के उपनगरों से लगभग तीन लाख रूपए की राशि आने का अनुमान है
लोकज्वाला अधिक जोर पकङ रही थी
१४ . फोर्ट सेन्ट ज्यार्ज की सरकार ने टाउन ड्यूटी लगाई थी
हम मानते हैं कि हमारे प्रांत के लोग अपवाद रूप मानी जानेवाली उन्नति की स्थिति का उपभोग ले रहे हैं
ये शौकिया वस्तुएँ मानी जाती हैं , अत: उन पर समग्र प्रांत में आवश्यक कानून के साथ कुछ कर लगाने से राजस्व आय के लिए अच्छा स्रोत बनेगा
लेखक परिचय श्री धर्मपालजी का जन्म सन् १९२२ में उत्तर प्रदेश के मुझफ्फर नगर में हुआ था
१९४२ में 'भारत छोडो' आन्दोलन में भाग लिया
उनके साथ मिलकर रुङकी एवं हरिद्वार के बीच सामुदायिक गाँव के निर्माण का प्रयास किया
पुत्र डेविड लन्दन में व्यवसायी है , पुत्री रोझविता लन्दन में अध्यापक है और दूसरी पुत्री गीता धर्मपाल हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय , जर्मनी में इतिहास विषय की अध्यापक है
धर्मपालजी अध्ययनशील थे , चिन्तक थे , बुद्धि प्रामाण्यवादी थे
अभिलेख प्राप्त करने के लिये प्रतिदिन बारह चौदह घण्टे लिखकर लन्दन तथा भारत के अन्यान्य महानगरों के अभिलेखागारों में बैठकर नकल उतारने का कार्य उन्होंने किया
इस ग्रन्थश्रेणी में प्रकाशित पुस्तकें १९७१ से २००३ तक की समयावधि में लिखी गई हैं
ऐसी पुस्तकें विशेष कर सन् १९३० से १९५० के वर्षों में बड़ी मात्रा में प्रकाशित हुई थीं
श्री ए . एस . अलतेकर लिखित पुस्तक में प्राचीन समय की शिक्षाव्यवस्था के बारे में विस्तृत विश्लेषण हुआ है
तथापि मुस्लिम शिक्षा पद्धति के बारे में एस . एम . जफर्र तथा और कुछ लेखकों की पुस्तकें प्राप्य हैं , किन्तु अधिकांशत: इस प्रकार के साहित्य में , अंग्रेज समय से लेकर १९वीं शताब्दी के आरंभ के समय तक भारत की परंपरागत शिक्षा पद्धति की हुई दुर्दशा का वर्णन केवल एक-दो अध्यायों में समाविष्ट कर दिया जाता है
उसके विवरण में वह पंजाब में भारत की बुनियादी परंपरागत शिक्षा की अवनति के लिये अंग्रेजों की नीति को ही जिम्मेवार मानता है
२० अक्तूबर १९३१ के दिन लंदन की 'रॉयल इन्स्टिट्यूट ऑफ इन्टरनेशनल अफेर्स ( Royal Institute of International Affairs ) में महात्मा गांधी ने एक ऐतिहासिक प्रवचन दिया था और स्पष्ट रूप से कहा था कि 'विगत ५०-१०० वर्षों में भारत में साक्षरता का अत्यंत ह्रास हुआ है और इसके लिए अंग्रेज ही जिम्मेवार हैं
' गाँधीजी का यह कथन एडम , लिटनर आदि ने दिये हुए निष्कर्ष तथा वर्षों तक भारतीयों के मानस में अवस्थित संवेदनाओं का प्रतिबिंब था , फिर भी गाँधीजी के इस कथन को सर फिलिप हार्टोग नामक अंग्रेज ने वैयक्तिक रूप से तथा अंग्रेज सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर चुनौती दी
चेन्नई प्रान्त से संबंधित सामग्री प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम तो मैंने 'इण्डिया ओफिस लाइब्रेरी' ( Indian Office Library:IOL ) का सम्पर्क किया था , किन्तु मुझे यह सामग्री तमिलनाडु स्टेट आर्काइव्ज ( पूर्व की चेन्नाई रेकोर्ड्स ऑफिस ) ( Tamil Nadu State Archivess: TNSA ) द्वारा प्राप्त हुई थी
 ? साथसाथ इंग्लैण्ड के एक कानून के प्रावधान के अनुसार 'जिस व्यक्ति के पास जमीन नहीं है तथा वर्ष में २० शिलिंग किराया नहीं चुका सकता है , ऐसा कोई व्यक्ति अपनी संतानों को कहीं भी काम सीखने के लिए नहीं रख सकता था , परन्तु साहित्य के अध्ययन के लिए पाठशाला में भेज सकता था
 ? इसी समय में जोसेफ लैन्केस्टर और एन्ड्रयू बेल के द्वारा प्रचलित की ( और भारत की शिक्षा पद्धति के रूप में जानी जाने वाली ) वरिष्ठ छात्र पद्धति ( Monitorial Method ) के कारण शिक्षा के प्रसार को प्रोत्साहन मिला
१६वीं शताब्दी के अंत से लेकर १७वीं शतादी के आरंभ के वर्षों में जब अंग्रेज एवं अन्य यूरोपीय प्रजा , प्रत्यक्ष रूप में या तो व्यापार के माध्यम से भारत में अपना साम्राज्य विस्तार करने में व्यस्त थी , तब समूचे यूरोप के विद्वान यहाँ की संस्कृति के विभिन्न आयामों के अध्ययन में प्रवृत्त थे
इन अध्येताओं में ईसाई पादरियों के संघो का भी समावेश था
वह बताता है , 'गंगा के प्रदेश के हमारे राजाने , हिन्दुओं के प्राचीन ग्रंथों को खोजकर , इकट्ठे कर उन सभी का अनुवाद करने के लिए जो भी व्यवस्था आवश्यक है करनी चाहिए
वह जानता था कि 'हिन्दुओं की ये सब प्राचीन रचनाएँ प्राप्त करके अंग्रेज समूचे यूरोप में खगोलशास्त्र और विज्ञान के क्षेत्र में बहुत कुछ कर पाएगा
' मेकनोशी विशेष में कहता है , प्राय: सभी विद्याओं का केन्द्र वाराणसी नगरी थी
ऐसे अंग्रेज अधिकारियों में चार्ल्स विल्किन्सन , विलियम जोन्स , एफ डबल्यु एलिस तथा विल्फ्रेड आदि ने संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं का गहन अध्ययन किया था
इन विद्वानों को अपने अनुभव एवं चिंतन के परिणाम स्वरूप लगातार यह भय सता रहा था कि किसी भी संस्कृति पर आक्रमण करके उसका विनाश करने से केवल संस्कृति का ही नाश नहीं होता अपितु उनके ज्ञान भण्डार भी नष्ट होते हैं
सन् १८१३ में इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत की मूल शिक्षा परंपरा के विषय में विस्तार से चर्चा हुई थी
भारत के अधिकांशत: राष्ट्रवादियों ने , कीर हार्डी जैसे अंग्रेजों ने तथा मॅक्समूलर जैसे विद्वानों ने भारत के शिक्षा के परिदृश्य के इन निरीक्षणों को प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया
साथ ही , १८वीं शताब्दी के अंत और १९वीं शताब्दी के शुरूआत के वर्षों में कई अंग्रेजों ने भारत तथा इंग्लैण्ड की शिक्षा , उद्योग , हस्तकला , कृषि जैसे विषयों की तुलना की , तब उनके मानस में यह परिलक्षित हुआ कि , भारत के कृषि मज्रदूर को इंग्लैण्ड के कृषि मजदूर की अपेक्षा अधिक वेतन प्राप्त होता था
' इस स्थिति में 'भारत के प्रत्येक गाँव में पाठशाला होने की बात सही हो या गलत इंग्लैण्ड में तो निरी विपरीत स्थिति ही दिखाई देती थी
चेन्नई प्रांत और बंगाल एवं बिहार से प्राप्त जानकारी शिक्षकों और छात्रों से सम्बन्धित अनेक तथ्य उद्घाटित करती है
किन्तु अंग्रजों का शासन आते ही शासकीय आय का केन्द्रीकरण हो गया और लोककल्याण के लिए खर्च करने की व्यवस्था टूट गई
इस सर्वेक्षण के लिए निर्धारित किए गए पत्रक में , जिलों में विद्यालय एवं महाविद्यालयों की संख्या तथा उसमें अध्ययन करनेवाले कन्या एवं कुमार छात्रों की संख्या आदि माँगी गई थी
छात्रों की संख्या नीचे बताए गए पाँच वर्गों में बतानी थी - ( १ ) ब्राह्मण ( २ ) वैश्य ( ३ ) शूद्र ( ४ ) अन्य जातियाँ ( ५ ) मुस्लिम
यहाँ एक बात का संकेत कर देना आवश्यक होगा कि सन् १८०० से १९६० के वर्षों में कनारा जिला अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन करनेवाला तथा किसान आंदोलनों का प्रमुख केन्द्र रहा था; दूसरा ऐसी अनेक प्रकार की जानकारी इकट्ठी करने का कार्य और जिलों में तो बार-बार होता था तथा जिले के समाहर्ता अपने जिलों के बारे में जो भी जानकारी भेजते उसकी गुणवत्ता तथा उसका महत्त्व प्रत्येक जिले में अलग अलग रहता था
एक कारण यह भी था कि जिलों के समाहर्ता और उनके सहयोगियों का बार बार स्थानांतरण होता रहता था , इससे कई बार तो वे अपने जिले की स्थिति के बारे में अज्ञान ही रहते थे
इन सर्वेक्षणों में कई जिलों ने तहसीलश: जानकारी दी है
मलाबार जिले के समाहर्ता ने तो धर्मशास्त्र , खगोलशास्त्र , विधि , अध्यात्मविद्या , नीतिशास्त्र और वैद्यकशास्त्र जैसे विषयों की शिक्षा निजी तौर पर प्राप्त करनेवाले छात्रों की संख्या २ , ५९४ बताई है; और चेन्नई के समाहर्ता ने बताया था कि , उस जिले में २६ , ९६३ छात्र शाला में जाने की अपेक्षा घर पर रहकर अध्ययन करते थे
कन्नड भाषी बेल्लारी जिले में ब्राह्मण और वैश्य छात्रों का कुल प्रतिशत ३५ जितना था , जबकि यहाँ शूद्र और अन्य ज्ञातियों का अनुपात ६३ प्रतिशत था
विद्यालयमें प्रवेश के लिये छात्रकी योग्यता एवं विद्यालय का समय जैसा पूर्व में बताया है विभिन्न जिलों के समाहर्ताओंने जो जानकारी भेजी है उसमें बहुत असमानता दिखाई देती है
राजमहेन्द्री के समाहर्ता दर्शाते हैं कि छात्र पांच वर्ष पांच मास एवं पांच दिन की आयु का होता है वह दिन विद्यालय प्रवेश के लिये शुभ माना जाता है
जिन जिलों में उच्च शिक्षा की एक भी संस्था नहीं थी , उन जिलों के समाहर्ताओं ने ऐसा बताया था कि उनके जिलों में वेद , गणित , नीतिशास्त्र , खगोलशास्त्र आदि विषयों की शिक्षा घरों में ही दी जाती थी
घर में शिक्षा देने की प्रथा को 'अग्रहारम्' नाम से पहचाना जाता था
तथापि वैद्यक तथा खगोलशास्त्र जैसे विषयों में भिन्न भिन्न जाति के छात्र थे
उन में ये पुस्तकें पढाई जाती थीं : ( १ ) करीम आमदुन्नामा ( २ ) हकरुम ( ३ ) इन्सा खलीफा और गुलस्ता ( ४ ) बहुरदनीश और बोस्तान ( ५ ) अबुल फल इन्सा ( ६ ) खलीफा ( ७ ) कुरान घर पर निजी तौर पर दी जानेवाली शिक्षा कुछेक समाहर्ताओं ने , विशेष रूप से कन्नड जिले के समाहर्ता ने , इन सर्वेक्षणों के लिए किसी भी प्रकार की आंकडों से संबंधित जानकारी नहीं भेजी थी और बताया था कि कई कुमार और कन्या छात्र घर में रहकर माता पिता के पास या रिश्तेदारों के द्वारा वेतन देकर रखे गए शिक्षक के पास या तो 'अग्रहारम्' में रहकर अध्ययन करते थे
केवल मलबार जिले के तथा चेन्नई के समाहर्ताओं ने ही इस विषय पर आंकडों में जानकारी भेजी थी जो सारिणी ७ क और ७ खर में प्रस्तुत की गई है
चेन्नई नगर के जिस क्षेत्र में भारतीय रहते थे वह क्षेत्र अत्यंत पिछडा और गंदा था
कन्याशिक्षा सारिणी ९ में बताया है उस प्रकार पाठशालाओं में कन्या-छात्राएँ बहुत कम रहती थीं
किन्तु सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी का अध्ययन देखकर अंग्रेज सरकार ने अपना अभिमत पलट दिया और चेन्नई सरकार की इस कार्यवाही का मजाक उड़ाया
इन सर्वेक्षणों के परिणाम 'एडम का ब्यौरा' ( Adam's Reports ) के नाम से प्रसिद्ध हैं
एडम की शब्दावली और प्रस्तुति एडम के विवरण ने पर्याप्त विवाद निर्माण किया था
इस क्षेत्र की कुल जनसंख्या १ , २० , ९२८ थी , और कुल परिवारों की संख्या ३० , ०२८ थी , जिसमें हिन्दू मुसलमान का अनुपात १२ का था
इस क्षेत्र की कुल जनसंख्या १ , २० , ९२८ थी , और कुल परिवारों की संख्या ३० , ०२८ थी , जिसमें हिन्दू मुसलमान का अनुपात १२ का था
इन विद्यालयों की औसत शिक्षा अवधि १६ वर्ष थी
भाषा आधारित विभाजन जिन पांच जिलों में सर्वेक्षण किया गया था उससे यह ज्ञात होता है कि शैक्षणिक संस्थाओं की कुल संख्या २ , ५६६ थी जिसका भाषा आधारित विभाजन इस प्रकार है- बंगाली १०९८ , हिन्दी ३७५ , संस्कृत ३५३ , फारसी ६९४ , अरबी ३१ , अंग्रेजी ८ , कन्या ६ और शिशु १
सामान्यत: ५ से ८ वर्ष की आयु में शाला प्रवेश होता था और १३ से १६ वर्ष की आयु में छात्रों का अध्ययन पूर्ण होता था
और शिक्षकों की आयु ३० वर्ष से अधिक ही रहती थी
" डॉ . लिटनर लाहौर के सरकारी कॉलेज में प्रिन्सिपल थे
इसके विपरीत इंग्लैण्ड में ऐसे हुनरों की शिक्षा किसी तज्ञ के पास वर्षों तक अत्यंत परिश्रमपूर्वक प्राप्त किए बिना कोई भी व्यक्ति तथाकथित व्यवसाय में प्रवेश नहीं पा सकता था
इस प्रकार की शिक्षा का उल्लेख और कहीं न होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि भारत में निश्चित प्रकार का कला कौशल या तंत्रविद्या परंपरागत रूप से किसी निश्चित जाति के पास ही रहती थी
सन् १७६९-७० में बंगाल में पडे़ भयानक अकाल को आनेवाले कठिन समय का संकेत ही कहेंगे , क्योंकि अकाल के लिए अंग्रेजों ने जो आंकडे़ बताए थे , उसके मुताबिक बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या मृत्यु को प्राप्त हो गई थी
अमेरिका तथा अफ्रीका के कई प्रदेशों में तो अंग्रेजों का आतंक छा गया था
तात्पर्य यह है कि विश्व के विभिन्न देशों पर अपना अधिकार स्थापित करने के साथ साथ यूरोपीय उन देशों की परंपराओं एवं प्राचीन सभ्यताओं पर भी कुठाराघात करते रहे हैं
१९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तो भारत के लोगों को उनके समाज में व्याप्त अव्यवस्था , पतन और ह्रास की स्थिति का अनुभव होने लगा था
१९वीं शताब्दी के अंत में तो भारत के जनसामान्य को प्रतीति हो गई थी कि अब सारा देश अंग्रेजों का गुलाम बन गया है और वे सभी अधिकाधिक दरिद्र होते जा रहे हैं
भारतीयों के मन में एक बात स्पष्ट हो गई थी कि भारत में फैली निरक्षरता का कारण अंग्रेज ही हैं
वहाँ लंदन की 'रॉयल इन्स्टिट्यूट ऑव इन्टरनेशनल अफेर्स ( Royal Institute of International Affairs ) नाम की संस्था में व्याख्यान देने कि लिए गांधीजी को निमंत्रण मिला था
शिक्षा के बारे में चर्चा करते हुए गांधीजी ने दो बातों पर सबका ध्यान आकर्षित किया ( १ ) भारत में आज ५० या १०० वर्ष पूर्व जो थी उससे अधिक निरक्षरता दिखाई देती है और ( २ ) अंग्रेज अधिकारी शिक्षा और संबंधित विषयों पर ध्यान देने के बजाय शिक्षा पद्धति को नष्ट भ्रष्ट कर रहे हैं , उन्होंने भारत की शिक्षा परंपरा के प्राण ले लिए हैं
गांधीजी का प्रचवन पूरा होते ही उसने उनसे अनेक प्रश्न किए
तथापि फिलिप हार्टोग को गांधीजी के दिए स्रोत अपूर्ण ही लगे और उन्होंने गांधीजी को उनका कथन वापस लेने का आग्रह किया
गोल मेज परिषद ( Round table Conference ) पूरी होने पर गांधीजी भारत वापस लौटे और उसके कुछ दिनों बाद ही उनकी गिरफ्तारी हुई
हार्टोग को कैसे प्रमाण चाहिए वह प्रा . के . टी . शाह समझ गए थे इसलिए उन्होंने हार्टोग को लिखे पत्र में प्रारंभ से ही स्पष्टता की थी कि 'जिस समयावधि के संदर्भ में हमारी बहस चल रही है , उस समयावधि के लिए आपको जिस प्रकार के प्रमाण चाहिए वैसे प्रमाण तो विश्व के किसी भी देश के संदर्भ में प्राप्त नहीं हो सकते
व्यक्ति तथा उसकी मानसिकताओं की तुलना करना ठीक नहीं है , तथापि यहाँ एक बात तो स्पष्ट दिखाई देती है कि विन्सेन्ट स्मिथ लिखित 'अकबर , द ग्रेट मोगल' ( Akbar , the Great Mogal ) नामक पुस्तक पढ़ने के बाद डबल्यू , एच . मार्लेन्ड को जिस प्रकार के मनोभाव जागे , उस प्रकार के मनोभाव सर फिलिप हार्टोग को प्रा . के . टी . शाह का पत्र पढ़कर जागे होने चाहिए
उसी प्रकार हार्टोग ने भी गांधीजी के प्रवचन को गलत सिद्ध करने के प्रयास शुरू कर दिए थे
हार्टोग ज्ञानी और अनुभवी था , फिर भी उसके द्वारा की गई स्पष्टताओं में कल्पनाशक्ति की कमी तथा इतिहास को समझने की असमर्थता दिखाई देती है क्योंकि वह सन् १९३९ से पूर्व के इंग्लैण्ड में प्रचलित बातों को ही जड़ता से पकडे़ रहता है
फिर भी यूरोप में चलनेवाले युद्ध के बारे में गांधीजी के विचार पढ़कर हार्टोग प्रभावित हुआ और गांधीजी के प्रति कृतज्ञता भाव व्यक्त करते हुए दिनांक १०-९-१९३९ के दिन उसने जो पत्र लिखा था उसका सारांश है , 'वाइसरॉय के साथ आपकी भेंट और अभी चल रहे युद्ध के बारे में 'टाइम्स' में प्रकाशित आप के विचारों को पढ़कर मैं आपके प्रति कृतज्ञता का भाव रोक नहीं सकता
सन् १८२०- ३० के वर्षों में भारतीय शिक्षा पद्धति की बड़े पैमाने पर दुर्गति हो गई थी
कुमार छात्रों की संख्या बढ़कर ३४ . ४ प्रतिशत हुई , जो टोमस मनरो के सन् १८२६ के सर्वेक्षण में ३३ . ३ प्रतिशत कुछ समीप है
इस प्रकार यहाँ यह स्पष्ट है कि वर्ष १८२२- '२५ के बाद भारतीय शिक्षा पद्धति का ह्रास तब से लेकर छ: दशकों तक होता रहा
आज तो किसी भी विषय पर कुछ भी कहना है तो प्रथम किसी विदेशी व्यक्ति के उद्धरण प्रस्तुत करने का हम भारतीयों में एक अनिवार्य फैशन हो गया है
भारत की शासनव्यवस्था में एक ध्यान आकर्षित करनेवाली बात यह थी कि यहाँ राजस्व आय से किए जानेवाले खर्च में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी जाती थी
इस प्रकार शासकीय आर्थिक सहयोग के आधार पर भारत में प्राथमिक तथा उच्च शिक्षा की संस्थाओं का निभाव होता था
बंगाल के हुगली जिले के वर्ष १७७० की टिप्पणी में इस प्रकार के खर्च के लिए बताया गया है कि 'बाजी' श्रेणी से दी जानेवाली सहायता के कारण ही लगभग आधा प्रदेश संबल प्राप्त कर रहा था
अप्रैल १८१३ में तंजावुर जिले से भेजी हुइ जानकारी में बताया गया था कि जिले के छोटे बडे़ कुल मिलाकर १०१३ मंदिरों को तथा ३५० से ४०० व्यक्तियों को ऐसी सहायता दी जाती थी
इन विद्याधामों को अन्य स्रोतों से प्राप्त न हो सकनेवाली सभी सहायताएँ पहुँचाने का काम सत्ताधीशों का दायित्व रहता था
बेल्लारी के समाहर्ता ए . डी . केम्पबेल के उपर्युक्त अति प्रसिद्ध पत्र का आधार लेकर अंग्रेजों ने ऐसा रौब जताने का प्रयत्न किया था कि भारत में अक्षरज्ञान केवल व्यावसायिक व्यवहार चलाने के लिए' ही दिया जाता है
मिल के मतानुसार 'भारतीयता' त्यागने से , विल्बरफोर्स के मतानुसार 'ईसाई मत अपनाने से , मॅकोले के मतानुसार 'अंग्रेजियत' अपनाने से और मार्क्स के मतानुसार 'पाश्चात्यीकरण' का स्वागत करने से ही भारत एक सभ्य , सुसंस्कृत देश बन सकता है
भारतीय शिक्षापद्धति का यथाशीघ्र अन्त हो जाए उस हेतु से उसका अनवरत मजाक उड़ाते रहना , उसे धिक्कारना तथा उस अस्तित्व के लिए आवश्यक सभी स्रोतों का लोप हो जाने की व्यवस्था करना अंग्रेजों के लिए आवश्यक था
भारतीय शिक्षा पद्धति के स्थान पर लादी गई विदेशी शिक्षा पद्धति , जिसकी जड़ें इस भूमि में न होने से भारत में उसका विचित्र असर देखने को मिलता है
ब्राह्मणों की तथा सामान्यत: हिन्दुओं की स्त्रियाँ इससे अपरिचित हैं , क्योंकि वह इन स्त्रियों के लिए प्रतिबंधित है
कनारा में उद्योग नहीं है
इस कनारा प्रदेश में कलाओं और शास्त्रों के ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं था , अत: उनकी शिक्षा यहाँ नहीं थी
शाला के संचालक अपने वेतन के लिए पूर्ण रूप से छात्रों के माता-पिता के ऊपर ही निर्भर थे और यह प्रथा आज भी चालू है
वार्षिक शुल्क प्रति छात्र प्रति वर्ष ३ से लेकर १४ रूपये होता है
यह एक जुलाहा जाति है
कोइम्बतूर हस्ताक्षर २३ नवम्बर १८२२ जे . सलीवान प्रधान समाहर्ता ९ . मदुरा के समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति ( टी . एन . एस . ए . : बी . आर . पी . खण्ड ९४२ का . १३-२-१८२३ , पू . २४०२-६ , क्र . २१ ) १ . सरकार की ओर से सूचना मिलने से पूर्व ही इस जिले की शिक्षा की स्थिति के बारे में मैंने थोड़ी जाँच की थी
तंजावुर , नागपट्टम् जे . कोटन २८ जून १८२३ प्रधान समाहर्ता विशेष : छात्र सामान्य रूप से पांच वर्ष विद्यालय में रहते हैं | औसत से मासिक ४ डी फेनम का शुल्क उनसे लिया जाता है | निःशुल्क चलनेवाले विद्यालयों में से १९ मिशन से संलग्न हैं , २१ विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन राजा देते हैं , १ विद्यालय के शिक्षकों का वेतन त्रिवलूर धर्मस्थान देता है , तीन विद्यालयों के शिक्षक बिना वेतन लिए पढ़ाते हैं| व्यक्तिगत रूप से सरकारी अनुदान प्राप्त विद्यालय एक भी नहीं है | केवल मिशन से सहायता प्राप्त होती है | उसके अतिरिक्त एक गांव का सर्वसामान्य होता है जिसका मूल्य १ , १०० रुपये अनुमानित है |
तंजावुर , नागपट्टम् जे . कोटन २८ जून १८२३ प्रधान समाहर्ता विशेष : छात्र सामान्य रूप से पांच वर्ष विद्यालय में रहते हैं | औसत से मासिक ४ डी फेनम का शुल्क उनसे लिया जाता है | निःशुल्क चलनेवाले विद्यालयों में से १९ मिशन से संलग्न हैं , २१ विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन राजा देते हैं , १ विद्यालय के शिक्षकों का वेतन त्रिवलूर धर्मस्थान देता है , तीन विद्यालयों के शिक्षक बिना वेतन लिए पढ़ाते हैं| व्यक्तिगत रूप से सरकारी अनुदान प्राप्त विद्यालय एक भी नहीं है | केवल मिशन से सहायता प्राप्त होती है | उसके अतिरिक्त एक गांव का सर्वसामान्य होता है जिसका मूल्य १ , १०० रुपये अनुमानित है |
साधारणत: देखा गया है कि तेरह वर्ष के होने तक उनमें भिन्न भिन्न विषय सीखने की क्षमता का असाधारण विकास होता है
५ . गरीब ब्राह्मणों को खगोलविज्ञान और ज्योतिषशास्त्र पढ़ाया जाता है
अनुदान से चलनेवाली शालाएँ केवल मिशनरियों के नियंत्रण में हैं
८ . शिक्षकों को प्रति वर्ष प्रत्येक छात्र के हिसाब से १२ पेगोडा से अधिक राशि मुश्किल से ही प्राप्त होती है
कावेरीपाक तेहसील के एक कॉलेज को ५ रुपए , ८ आने और ४ पाई जितनी साधारण 'मायरा' मिलती है
७ . तमिल , तेलुगु और हिन्दी शालाओं की संख्या सबसे अधिक है
२ . कोई व्यवस्थित कॉलेज यहाँ नहीं है , किन्तु उच्च शिक्षा के केन्द्र हैं और वहां छात्र पढ़ते भी हैं
प्रत्येक छात्र के घर की स्थिति के अनुरूप १ फेनम से १ पेगोडा तक का शुल्क निर्धारित किया गया है
अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उत्सुक कुछ लोग , पढ़ेलिखे लोगों को अपने घर बच्चों को पढ़ाने हेतु निमंत्रित करते हैं
२ . संपूर्ण जानकारी शालाओं और महाविद्यालयों के शीर्षक के अंतर्गत , जिनमें विविध भाषाएँ और विज्ञान को अलग करके एक विशेष कोलम द्वारा क्षत्रिय छात्र , जो ब्राह्मणों से भिन्न श्रेणी में आते हैं , उनके लिए प्रस्तुत है
३ . प्राथमिक शिक्षा में उन्हें वर्तनी , शब्द तथा सामान्य एवं वैयक्तिक नाम सिखाए जाते हैं
५ . वेदपाठी ब्राह्मण छात्रों को इसमें कौशल प्राप्त करने पर वैदिक और शास्त्रोक्त महाविद्यालय में प्रवेश दिया जाता है
९ . नृत्यांगना के अतिरिक्त शायद ही अन्य जाति की महिलाओं को सार्वजनिक रूप में शिक्षा दी जाती है
८ . इसके लिए कोई अलग शाला अथवा महाविद्यालय बनाया गया नहीं लगता है
सार्वजनिक अनुदान से चलनेवाली एक भी शाला या कॉलेज इस जिले में नहीं है
सार्वजनिक अनुदान से चलनेवाली एक भी शाला या कॉलेज इस जिले में नहीं है
२ . इस जिले की पंजीकृत जनसंख्या ९ , २७ , ८५७ है
अध्ययन शुरू करने वाले बच्चे को गणेशजी के सम्मुख बिठाया जाता है
शाला का प्रारंभ प्रात: छ: बजे से होता है
९ . सभी छात्रों को उनकी कक्षा के अनुसार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है
ऊंगली से रेतमें लिखना वह कुशलता पूर्वक करने लगता है तब वह ताडपत्र पर लोहे की सलाख से अथवा बोरू से कागज अथवा भूर्जपत्र पर लिखने का सम्मान पाता है या पेन अथवा पेन्सिल से 'हलीगी' अथवा कडाटा ( स्लेट का काम देनेवाली लकडी ) पर लिखता है
प्रथम उसको चावल के मांड से कडा बनाया जाता है , पुस्तक की तरह मोडा जाता है और बाद में गोंद और कोयले के बुरे से पोता जाता है
जब वह पर लिखना सीखता है और अंक गणित के हिसाब सीखता है तब पचास पैसे दक्षिणा देने की प्रथा है
२७ . ऐसी संस्था चलाने के लिए प्रति मास कम से कम १५४ रु . और अधिकतम २७३ रु . जितना खर्च आता है और यह खर्च तो सरकार को ही उठाना चाहिए किन्तु इस कार्य के लिए समाज के धनिक लोगों का सहयोग भी लिया जा सकता है
३ . शाला के शिक्षकों को प्रति छात्र प्रतिमास चार आने से लेकर चार रुपए तक पारिश्रमिक मिलता है
अत: जमीन का एक टुकडा जो नदी के पास था वह कॉलेज के निर्माण हेतु अलग रखा गया
यह ऊचिपोरा एरकारा , नाम्बूरी पद्धति सर्वसम्मति से स्थापित की गई थी
प्राचीन समय में शानूर के तालवल्लीनाड में एक कॉलेज था
उसकी सहाय हेतु भूमि भी अलग रखी गई थी , जहाँ कई ब्राह्मण शास्त्रों का अध्ययन करते थे
हिन्दू शाला में शिक्षा के लिए वार्षिक खर्च तीन रुपया तथा मुस्लिम शाला में वार्षिक खर्च १५ से २० रुपये होता है
२ . इस पत्रक से यह स्पष्ट हो जाता है कि दस लाख से अधिक जनसंख्या में ४ , ६५० व्यक्तियों ने शिक्षा प्राप्त की थी , जो प्रति एक हजार पर सवा चार से कुछ अधिक है और इस सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब और कुंठित दर्शाती है
सुबह का और संध्या का समय सामान्यत: पढने के लिए रहता है , जबकि अपरान्ह का वक्त लिखाई के लिए रहता है
३ . शालाएँ सामान्यत: प्रात: ६ बजे शुरू होती हैं और संध्या के ५ बजे तक चालू रहती हैं
३ . शालाएँ सामान्यत: प्रात: ६ बजे शुरू होती हैं और संध्या के ५ बजे तक चालू रहती हैं
सामान्यत: छोटे परिवारों में धर्म , तत्त्वज्ञान , कानून , खगोल आदि निजी तौर पर पढ़ाए जाते हैं
देशी लोगों में शिक्षा प्राप्त करने का मुख्य आदर्श आर्थिक उपार्जन ही हो सकता है
विद्यार्थी शाला में विद्या प्राप्त करता है वह अवधि ( जो पूर्ण होने पर पढाई पूरी हुई मानी जाती है ) लगभग २ वर्ष है
राजमुंद्री में विज्ञान के लगभग ६९ शिक्षकों के पास दान में प्राप्त जमीन है और इससे पहले जमीनदारों ने दिए धन से १३ को भत्ते मिलते थे
तंजावुर में ४४ शालाओं और ७१ कॉलेजों को राजा का दान मिलता है
तत्पश्चात् , उसका उत्पादन सरकारी राजस्व में जोड दिया गया है
कोइम्बतूर के प्रधान समाहर्ता बताते हैं कि पूर्व के समय में कॉलेजों के निर्वाह के लिए दान में प्राप्त मान्यम् आदि की कीमत २ , २०८ रु . होती है
८ . अभी लिखे गए श्री कैम्पबेल के निर्देश के बारे में ऐसा तय करने का बोर्ड सोच रहा है कि इस समय उनको बताई योजना और इसके बारे में सामान्य विचार या शिक्षासुधार के बाद में बहस अनावश्यक है क्योंकि फिलहाल तो सरकार की यह इच्छा है कि शिक्षा की वास्तविक स्थिति कैसी है , उसी की जानकारी प्राप्त करें , जिससे कौन-सी क्षति दूर करने के लिए क्या किया जाए वह ज्ञात हो सके
उपर्युक्त वर्णनयुक्त संस्था का एक भी प्रमाण नहीं है , जिसे किसी भी प्रकार से सरकार की सहायता प्राप्त हुई हो
शाला के शिक्षकों को , छात्रों की ओर से चार आने से एक रुपया तक की राशि प्रतिछात्र प्रतिमास मिलती रही है
प्रतिष्ठित परिवारों से परिवार की स्थिति और स्थान के अनुरूप निजी शिक्षकों को उनकी हैसियत और आवश्यकता के अनुसार मासिक या वार्षिक निश्चित राशि मिलती रही है
छात्र को पाँच वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश दिया जाता है और तब से लेकर ५ से ७ वर्ष तक उसका अध्ययन चलता है
छात्र को सामान्य तौर पर पाँच वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश दिया जाता है और १२ से १६ वर्ष तक वह वहाँ अध्ययन करता है
शिक्षकों का वेतन सवा रुपए से एक रुपए तक का है
महाशालाओं में अलग अलग विषय ब्राह्मणों द्वारा छात्रों को नि:शुल्क सिखाये जाते हैं
जब छात्र कॉलेज में अलग अलग विषय पढता है तब साधन सामग्री आदि के लिए मासिक तीन रूपयों की राशि पर्याप्त होती है
नेल्लोर टिप्पणी दर्शाती है कि समाज के आर्थिक सहयोग के बिना अनेक शालाएँ जिले में चलती हैं
प्रगत अध्ययन के लिए माता पिता के आर्थिक साधन की अपेक्षा अधिक शुल्क की मांग होती है और उनके बच्चों को पढाई अधूरी छोडनी पडती है
ब्राह्मण जातिमें बालक को ५ से ६ वर्ष की आयु में शाला में भेजा जाता है | शूद्र जाति में ६ से ८ वर्ष की आयु में शाला में भेजा जाता है
दक्षिण आर्कोट स्थानीय राज्य संस्था की ओर से जिले की किसी भी शाला को अनुदान नहीं मिलता
दक्षिण आर्कोट स्थानीय राज्य संस्था की ओर से जिले की किसी भी शाला को अनुदान नहीं मिलता
दक्षिण आर्कोट स्थानीय राज्य संस्था की ओर से जिले की किसी भी शाला को अनुदान नहीं मिलता
ऐसा लगता है कि इस सूची में बहुत सी शालाओं की संख्या का समावेश नहीं किया गया
तीन शालाएँ निजी दान दाताओं की ओर से चलती हैं
इस प्रकार प्रत्येक शिक्षक को ३० से ६० फेनम या ३३/४ पेगोडा जितनी मासिक राशि बडे गाँवों से मिल जाती है तथा छोटे गाँवों से १० से ३० फेनम राशि प्राप्त होती है
लोगों की स्थिति के अनुरूप हर छात्र से वार्षिक अधिकतम १४ रुपये से लेकर ३ रुपए न्यूनतम शुल्क लिया जाता है
जो धर्मशास्त्र या कानून का अध्ययन करना चाहें वे १५ वर्ष की आयु में पाठशाला में जाते हैं
प्रत्येक छात्र से शिक्षक को वार्षिक १२ पेगोडा से अधिक वेतन शायद ही मिलता है
गरीब ब्राह्मणों के बच्चों को अलग अलग विषयों की शिक्षा नि:शुल्क दी जाती है
इस विवरण के आधार पर पता चला कि इस इलाके की शालाएँ जिन्हें लोग महाशालाएँ मानते हैं उनकी संख्या १२ , ४९८ है
२ . रेवन्यू बोर्ड ने लिखा है कि १२ करोड , ५० लाख की जनसंख्या में केवल १ , ८८ , ००० व्यक्तियों ने अर्थात् प्रति ६७ व्यक्तियों में केवल एक व्यक्ति ने शिक्षा प्राप्त की है
सर टॉमस मनरो की टिप्पणी मार्च १० , १८२६ ( फोर्ट सेंट ज्योर्ज , राजस्व विभाग ) १ . २ जुलाई १८२२ के दिन सरकार के राजस्व विभाग के सदस्यों को सूचित किया गया कि प्रांतों में शिक्षा की स्थिति तथा शालाओं की संख्या की जानकारी प्राप्त करें
५ . इस प्रकार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के लिए एक शाला शुरू करनी होगी
इस प्रकार , सब मिलाकर ३०० तेहसीलें होती हैं
समाहर्ता के अधिकार में राज्य की शालाओं में शिक्षक का वेतन १५ रुपए और तहसील कक्षा की शालाओं में ९ रुपए प्रत्येक शिक्षक को मिलेंगे
ज्ञान के प्रसार के साथ अच्छी आदतें , उद्योगों का विश्वास , जीवन में सुखसंपत्ति के लिए लोगों की विशेष रुचि और उसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न होगा और लोगों को समृद्धि का विश्वास होता रहेगा
९ . स्कूल बुक सोसायटी के इस परिश्रम से तत्काल लाभ हो जाएगा इस भ्रम में रहने की आवश्यकता नहीं है
वह शालाओं तक सीमित रहेगा और क्रमश: उसकी माँग ( शिक्षा व शाला ) बढने से उसका प्रसार भी होगा
यहाँ अर्धनग्न बच्चे नारियेल के पेड के नीचे इकट्ठे होते हैं , जमीन पर पंक्ति में बैठ जाते हैं और उन्हें दाँये हाथ की ऊँगली से बालू में अक्षरों की लिखावट करवाई जाती है
कई शिक्षक छात्रों को बिना दक्षिणा लिये पढ़ाते हैं
यहाँ वे ताड़पत्र पर लिखना आरंभ करते हैं
शिष्य भी आज्ञाकारी होते हैं
उद्यान में या जहाँ पवित्र स्थान है वहाँ बच्चों को पढाया जाता है
वहाँ शिवलिंग की स्थापना होती है
वे मानते हैं कि समूचा संसार उसकी सृजनशक्ति से निर्मित हुआ है
जिन युद्धों में और जिसमें कौशल की विशेष आवश्यकता रहती है वैसे युद्ध में उनका अभ्यास बना रहे , फुर्ती लौटे और सुदृढ युवा मिले इस हेतु से भाले , तलवार , गेंद के खेल और टेनिस जैसे विषय शिक्षा में जोड लिए गए हैं
गुरुजन के प्रति विशेष सम्मान का व्यवहार होता है
दूसरी ओर वैश्य अपने लडकों को कृषि विषयक ज्ञान देते हैं तथा क्षत्रियों को राज्यप्रशासन और सेना प्रशिक्षण के लिए शस्त्रविद्या का अध्ययन करना होता है; शूद्रों को यंत्रविद्या , मछली पकडने का कार्य , बागवानी तथा बनियों के बच्चों को व्यवसाय का ज्ञान करवाया जाता है
मलबार के साहित्य के मूल में हिन्दू राज्यों में जो विषयवस्तु स्थित है वह वही की वही है
५ . एलेकझांडर वॉकर भारत की शिक्षा और साहित्य के विषय में मलबारी साहित्य का अथवा भारत में अलग अलग विद्याओं के स्रोत और उनकी प्रगति किस प्रकार हुई उसका इतिहास यहाँ प्रस्तुत करने का मेरा आशय नहीं है
साधनों का आधिक्य और मन की शांति प्राप्त होने से लोगों को ज्ञान अर्जन करने की प्रेरणा तथा पुस्तकों में खो जाने की और सीखने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है
खास करके वे अपने बच्चोंको लिखाई-पढाई की शिक्षा देने के लिए अत्यंत उत्सुक और सतर्क हैं
ब्राह्मण तो सामान्यत: शाला के शिक्षक होते ही हैं तथापि कोई भी प्रतिष्ठित जाति का व्यक्ति शिक्षा का व्यवसाय कर सकता है
इससे कागज का अपव्यय नहीं होता था
मलबार में अभी भी पूर्व में उपयोग में ली जानेवाली पद्धति ही प्रयुक्त होती है
इन पत्रों को डोरी से बांध दिया जाता है और उसे पुस्तक का रूप दिया जाता है
नोर्वे और स्वीडन में पहले लोग लकड़ी की पट्टियों पर लिखते या नक्काशी करते थे
अगर विवेक से काम लिया जाए तो हमें अपने ग्रंथ पढाने में कोई कठिनाई नहीं आएगी
उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलती है तो वे संपत्ति , परिवार का गौरव या जाति के गौरव के बदले में भी यह प्राप्त करने को तैयार हैं
ताडपत्र को सुखाकर खास प्रकार से उसे तैयार करते हैं
पुरातन समय के स्टाइल्स के समान पैने नुकीले लोहे के साधन का वे कलम के स्थान पर प्रयोग करते हैं
लिखने के लिए पत्थर , चमडा , पत्ते और वृक्ष के छिलके आदि पुराने समय में उपयोग में लाए जाते थे
मलबार में बहुत से नाटक होते हैं तथा मलबारी लोग नाटक देखने के बड़े शौकीन हैं
यह नाट्यगृह या तो खुले आकाश के नीचे या अस्थायी छत के नीचे होता है
इस से अनुमान किया जा सकता है कि केवल बंगाल और बिहार में ऐसे १ लाख विद्यालय हैं और यदि दोनों प्रान्तों की संयुक्त जनसंख्या ४ करोड़ है तो प्रति ४०० व्यक्ति एक विद्यालय होगा
यदि बालक-बालिकाओं की संख्या समान मानें तो प्रति ३१ या ३२ छात्रों पर एक विद्यालय है
शिक्षकों की अल्पज्ञता और मातापिता की गरीबी के कारण बालकों को अत्यंत छोटी आयु में ही विद्यालय से उठा लेने के कारण शिक्षा से उन्हें प्राप्त लाभांश बहुत छोटा है
पहले बताए गये अनुसार बंगाल के बच्चों की शिक्षा ५-६ वर्ष की आयु से प्रारम्भ होती है और ५-६ वर्ष के बाद स्थगित हो जाती है
शिक्षक भी अपने चरित्र से , उपदेश या डांटडपट के द्वारा अपने छात्रों के चरित्रनिर्माण हेतु कोई नैतिक प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते
इससे शिक्षा केवल हिसाब किताब तक सीमित , काफी संकुचित और निम्न स्तर की है जिससें न हृदय की भावनायें प्रभावित होती हैं और न व्यापक समझदारी आती है
वर्ष के कुछ मास , महिनों के कुछ सप्ताह और सप्ताहों के कुछ निश्चित दिन इस हेतु तय किये जाते हैं
प्रत्येक नई कक्षा के प्रारम्भ के साथ अधिक शुल्क लिया जाता है
उसमें विद्यालय जाने वाले छात्रों के मातापिता की सम्पन्नता को ध्यान में रखा जाता है
गरीब मातापिता के बालकों से सम्पन्न मातापिता के बालकों की अपेक्षा आधा , एक तिहाई या एक चौथाई शुल्क लिया जाता है और आगे की कक्षाओं में भी यही स्वरूप बनाये रखा जाता है
शिक्षकों के वेतन और अधिकारों का ढांचा वैविध्यपूर्ण है | शिक्षक को चार आने से लेकर ५ रूपये तक प्रति मास दिया जाता है
शिक्षकों के वेतन और अधिकारों का ढांचा वैविध्यपूर्ण है | शिक्षक को चार आने से लेकर ५ रूपये तक प्रति मास दिया जाता है
यह इस बात का भी प्रमाण है कि लोग अत्यंत अल्प साधनों के द्वारा भी अपने बच्चों को बंगाली शिक्षा देने को उत्सुक हैं
जो लोग समाज में समान स्तर के ऐसे ही कार्य करते हैं उनकी तुलना में इनकी वास्तविक सामाजिक स्थिति जानी जा सकती है
खमार नवीस फसल का निरीक्षण कर उसका मूल्यांकन करता है जिस पर जमीनदार का अधिकार होता है
३०-४० विद्यार्थियों के बीच ऐसे ५-६ मंडप होते हैं
३०-४० विद्यार्थियों के बीच ऐसे ५-६ मंडप होते हैं
अपवाद स्वरूप कुछ अधिकारी और सम्पन्न ग्रामवासी कोलकता से प्राप्त पंचांग का उपयोग करते हैं , तो भूला भटका कोई मुर्शिदाबाद से नदी पार कर आ बसा मिशनरी छपी पुस्तकों का उपयोग करता है
दी जा रही शिक्षा का ब्यौरा देखने से पता चलता है कि समग्र जिले में कोई नहीं जानता कि ग्रामवासियों के लिये प्रादेशिक भाषा में छपी पुस्तकों का उपयोग किया जा सकता है
इस वंदना की बार बार पुनरुक्ति कर उसे कंठस्थ कर लिया जाता है और प्रत्येक छात्र विद्यालय छूटने से पूर्व जमीन पर बैठकर और मस्तक झुकाकर , वरिष्ठ छात्र जो दो दो पंक्ति गवाता है उसका अनुसरण करते हैं
इन विद्यालयों में शिक्षकों द्वारा लिखी हुई और शुभंकर के नियमों के अनुसार शब्दरचना वाली एक अन्य उक्ति भी वंदना के लिये उपयोग की जाती है
दी जा रही शिक्षा का ब्यौरा देखने से पता चलता है कि समग्र जिले में कोई नहीं जानता कि ग्रामवासियों के लिये प्रादेशिक भाषा में छपी पुस्तकों का उपयोग किया जा सकता है
बालक की क्षमता के अनुसार दूसरा स्तर ढाई से चार वर्ष का होता है और वे ताडपत्र पर लिखने में समर्थ हों , इस प्रकार समय तय किया जाता है
कृषि से संबंधित हिसाब किताब की अन्य बातें इस जिले में नहीं सिखाई जातीं
कृषि से संबंधित हिसाब किताब की अन्य बातें इस जिले में नहीं सिखाई जातीं
जिस प्रथा का मैंने वर्णन किया है उसका जोर व्यावहारिकता पर ज्यादा है और यदि योग्यरूप से समग्रता में शिक्षा कार्य होता है तो वह छात्र को गाँव के कामधंधों के लिये पूर्ण रूप से योग्य बना सकती है
फारसी शालायें छपी हुईं पुस्तकों से अपरिचित हैं , परंतु हस्तलिखित साहित्य का निरंतर उपयोग होता है
हिन्दुओं की भांति मुसलमान भी अपने बालकों की शिक्षा का प्रारंभ अक्षरज्ञान से करते हैं
इस 'पढनामा' में नैतिक मूल्यों की चर्चा होती है और वह बालक की समझ से बाहर होता है
इस विधि में पहले एक अक्षर , फिर दो अक्षर , तीन अक्षर , संयुक्त अक्षर , शब्द आदि लिखे जाते हैं और जब कलम से लिखने में कुशलता आ जाती है तब कागज के एक ओर वे लिखना शुरू करते हैं
बालक उसे समझे ही यह आवश्यक नहीं होता
शुक्रवार को , जो मुसलमानों का पवित्र दिन माना जाता है , विद्यालय में अवकाश होता है
उसका कार्य बालकों को सुव्यवहार सिखाना होता है
मौलवी गाँव में खटीक ( कसाई ) का कार्य भी करते हैं
इन मकानों का उपयोग प्रार्थना ( नमाज ) , महेमानों के स्वागत और सभाओं आदि के लिये भी होता है
अरबी शालाओं जैसी महत्त्वहीन , बेकार और नजरअंदाज की जा सकनेवाली संस्था अन्य कोई नहीं है
अरबी शालाओं जैसी महत्त्वहीन , बेकार और नजरअंदाज की जा सकनेवाली संस्था अन्य कोई नहीं है
कोलकता का औसत सबसे नीचा ६ विद्यार्थी का है और मैं इसे अधिक विश्वसनीय मानता हूँ क्योंकि ऐसे उदाहरण हैं कि विद्वान हिन्दू शिक्षकों के पास तीन या चार से अधिक छात्र नहीं होते
सन् १८३० में श्री एच . एच . विलसनने व्यक्तिगत जाँच के आधार पर बताया कि वहाँ २५ शालायें थी जिनमें ५ से लेकर ६०० तक छात्र अध्ययन करते थे
हिन्दू महाविद्यालय , जिनमें उच्च शिक्षा दी जाती है , सामान्यत: मिट्टी से बने ( कच्चे मकान ) हैं
शाला का कक्ष और निवास का कक्ष तय हो जाने के बाद उसकी सफलता के लिये शिक्षक ब्राह्मणों और गाँव के प्रभावशाली व्यक्तियों को मनोरंजन हेतु आमंत्रित करता है और अंत में ब्राह्मणों को साधारण भेंट देकर विदा करता है
व्याकरण का अध्ययन , दो , तीन या छ वर्ष तक चलता है और जहाँ पाणिनि का व्याकरण भी पढाया जाता है वहाँ यह समय दस वर्ष से कम नहीं होता
एक शिक्षक से प्राप्त समस्त ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद , उससे सम्मानपूर्वक क्षमायाचना कर अन्य शिक्षक के पास जाता है
३०० छात्रों ने न्यायशास्त्र का अध्ययन किया है किन्तु पांच या छह लोगों ने मीमांसा , सांख्य , वेदांत , पतंजलि , वैशेषिक या वेदों का अध्ययन किया होता है
इन हजार में से लगभग पचास भागवत और अन्य पुराणों का अध्ययन करते हैं
महाविद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों की संख्या १७३ दर्शाई गई है , जिनमें कम से कम तीन और ज्यादा से ज्यादा पंद्रह छात्र एक शिक्षक के पास पढते थे
इनमें हिन्दू कानून , व्याकरण और आध्यात्मिक विषयों की शिक्षा दी जाती थी
मुझे बताया गया है कि ऐसे ४० विद्यालय हैं
कटक श्री स्टर्लिंग के जिले से प्राप्त शिक्षा की प्रवर्तमान स्थिति के विवरण को संक्षेप में देखें तो यहाँ के मूल निवासियों द्वारा संचालित प्राथमिक या महाविद्यालयीन शिक्षा की कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई
सन् १८२४ की जाँच से पता चला कि कुछ शालाओं में २४ तक विद्यार्थी थे
एक ओर तो वे शिक्षक पर आश्रित होने से उस पर आर्थिक बोझ बनते हैं , दूसरी और वे उसकी प्रतिष्ठा वृद्धि कर उसकी आमदनी बढाते हैं
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
रामवल्लभ भट्टाचार्य और उनके दिवंगत भाई के संयुक्त नाम से सरकार ने यह सहायता मंजूर की थी
मार्च १८१९ में बर्दवान के जिलाधीश ने रेवेन्यू बोर्ड को आवेदन दिया था
यह आवेदन जिले में मौजूद मस्जिदों और मदरसों में दी जानेवाली शिक्षा हेतु धन राशि देने के लिये था
परंतु उसके विवरण के समर्थन में कोई दस्तावेज उसने प्रस्तुत नहीं किया
सन् १८११ में गवर्नर जनरल लोर्ड मिन्टो ने नदिया और तिरहत में हिन्दू महा विद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की और इस हेतु अलग धन राशि की व्यवस्था की
उभयानन्द तर्कालंकार के पास २० छात्र थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
काशीकान्त तर्कचूडामणि के पास ३० छात्र थे
जहाँ काव्य शिक्षा दी जाती थी वैसे महाविद्यालय कालीकान्त तर्कचूडामणि के पास ५० छात्र थे
गंगाधर शिरोमणि के पास २५ छात्र थे
सामान्य उपस्थिति पत्रक में उनकी संख्या बीस से पच्चीस होती थी
अनेक स्थानों पर प्रतिष्ठित शिक्षकों के पास पचास साठ विद्यार्थी भी होते थे
सन् १८२९ में २५ विद्यालय और ५००-६०० विद्यार्थी थे
इस याचिका में कुछ विद्यार्थियों ने माँग की थी कि उन्हें जो १०० रुपये मासिक भत्ता ( छात्रवृत्ति ) मिलता था उसे पुन: प्रारंभ किया जाए
श्री विल्सन ने विद्यार्थियों तथा उनके बीच बाँटे जा रहे भत्ते की सावधानीपूर्वक जाँच की और इस विषय में सबने पूर्ण संतोष व्यक्त किया था
वे धर्मशास्त्र और कानून पढाते थे , परंतु रेवेन्यू बोर्ड को यह जाँच विश्वसनीय नहीं लगीं
संपूर्ण जिले को १९ परगना और छ टप्पों में बाँटा गया था और इन २५ विभागों में हिन्दू शास्त्र की शिक्षा देने वाले ५०-६० विद्यालय होंगे
हेमिल्टन के अनुसार यहाँ हिन्दू अथवा मुस्लिम कानून की शिक्षा देनेवाले विद्यालय या गुरुकुल नहीं थे
दिसंबर १८१८ में मुर्शिदाबाद के जिलाधीश के माध्यम से कालिकान्त शर्मा की ओर से रेवेन्यू बोर्ड को एक याचिका दायर की गई जिसमें ५ रूपये मासिक पेन्शन चालू रखने की प्रार्थना की गई थी
सन् १८२३ में कार्यकारी प्रतिनिधि और जिलाधीश ने विचार किया कि मंदिर की राशि का उपयोग सार्वजनिक संस्थाओं की स्थापना हेतु होना चाहिए , परंतु इस विचार का आधार ज्ञात नहीं है
यह जमीन , ८ , ३४८ बीघा है तथा ३९ गावों से देवदान में प्राप्त हुई है
इस प्रकार ३९ देवदान के गाँवों के अलावा कुल ३२ , ८७७ बीघा जमीन है
राजाशाही इस जिले में हिन्दू शास्त्रों की शिक्षा के लिए निस्संदेह अनेक विद्यालय हैं
सन् १८१३ में राजाशाही के जिलाधीश ने काशीश्वर वाचस्पति , गोविंदराम सिरहट और हरिशर्मा भट्टाचार्य की ओर से एक याचिका रेवेन्यू बोर्ड में दायर की थी जिसमें बताया गया था कि महाविद्यालय की सहायतार्थ ९० रूपये वार्षिक धनराशि रानी भवानी की ओर से उनके पिता को मृत्यु पर्यत मिलती थी और वही उनके बडे भाई की मृत्यु तक भी जारी रही
लगभग दस छात्र ऐसे हैं जिनकी शिक्षा का निभाव उन्हें प्राप्त छोटे-छोटे जमीनदान से होता है
विशेष तौर पर जब शिक्षक ने प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली हो तो उसे जमीनदान के रूप में बड़ी सहायता प्राप्त होती है और उनके वारिस भी प्रसन्नता से उसका उपयोग करते हैं
यह प्रथा कितनी ही मुक्त दिखती हो और कितने ही विद्वान शिक्षक प्राध्यापक हों तो भी इतना तो स्पष्ट दिखाई देता है कि शिक्षण कार्य काफ़ी मंद गति से होता है और यह भय भी रहता है कि वह कभी भी बंद हो सकता है
परंतु इन्हें दैवी या अन्य प्रभावी साहित्य नहीं पढाया जाता है
उच्च वर्ण के शूद्रों के लिये ( ये ) दशाकर्मी ब्राह्मण थे
पहले किस्से में स्थानीय शासक की देखरेख में सारा कार्य चलता है तथा आसपास के प्रदेश में प्रशासक की बहुत बडी संपत्ति होती है
जिले के पश्चिम भाग में छोटे से स्थान पर ३३ शिक्षक हैं | यहाँ अध्यात्म और ज्योतिष पढाये जाते हैं
दो लोग भागवत और आधुनिक कर्मकांड सिखाते थे , एक व्यक्ति व्याकरण , तर्कशास्त्र तथा पौराणिक काव्य पढाता था तथा दूसरा तर्कशास्त्र के स्थान पर आधुनिक कर्मकांड पढाता था
देशी वैद्यक व्यवसाय से संबंधित विलियम एडम का विवरण राजाशाही जिले में चिकित्सा की प्रणाली लोगों के स्वास्थ्य और सुख के साथ इतनी घुल मिल गई है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती
वैद्य बेलधारिया का चिकित्सा विद्यालय महत्त्वपूर्ण संस्था मानी जाती है
हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि चिकित्सक को नीची दृष्टि से देखा जाता है
नातोर में और भी दो-तीन शिक्षित चिकित्सक हैं
उपरोक्त चिकित्सकों का वर्ग विविध व्यक्तियों का है और उपचार एक शास्त्र या विद्या है ऐसा वे बिलकुल नहीं जानते
ऐसे २५० वैद्य तो नातोर में हैं
उनका कहना है कि वे मंत्रों से साँप का जहर उतार सकते हैं
किसी एक व्यक्ति को इसके लिये दोषी नहीं माना जा सकता
मैंने मूल पत्र के स्थान पर प्रतिलिपि पर हस्ताक्षर किये होंगे ऐसा लगता है
हो सकता है कि मेरा पत्र आपको न मिला हो यह समझकर मैं उसकी नकल पंजीकृत डाक से फिर से भेज रहा हूं
'यंग इण्डिया' के लेख की प्रतिलिपि ८ डिसम्बर १९२० भारत में जनसामान्य की शिक्षा की अवनति लेखक : दौलत राम गुप्ता , एम . ए . यह आम धारणा बनी हुई है कि सन् १८५४ के संसद के निर्णय के तहत अंग्रेज सरकारने भारत के लोगों की शिक्षा का कार्य अपने जिम्मे लिया है तब से विद्यालयों की संख्या की दृष्टि से , छात्रों की संख्या की दृष्टि से और शिक्षा की गुणवत्ता की दृष्टि से लक्षणीय प्रगति हुई है
प्रत्येक द्विज परिवार में , प्रत्येक जाति के प्रत्येक व्यवसाय में , प्रत्येक प्रतिष्ठित गांव में अपना एक पुरोहित होता था और एक ओर तो वह धार्मिक विषयों को देखता था परन्तु दूसरी ओर वह अध्यापन भी करता था
सन् १८२६ में सर टॉमस मनरो ने मद्रास में जो सर्वेक्षण करवाया था उसमें दर्ज था कि सन् १८२६ में मद्रास ( चैन्नई ) में ११ , ७५८ देशी विद्यालय और ७४० महाविद्यालय थे जिनमें १ , ५७ , ६६४ छात्र और ४ , ०२३ छात्राएँ शिक्षा प्राप्त कर रहे थे
पढने , लिखने और गिनने की क्षमता रखनेवालों की न्यूनतम संख्या भी ३ , ३० , ००० जितनी मिलतीहै , जो विभिन्न प्रकार के विद्यालयों में पढनेवाले छात्रों की है
' इसलिए , प्रमाणभूत ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर हम कह सकते हैं कि अंग्रेज शासन से पूर्व पंजाब के एक एक गांव में उसका अपना विद्यालय था
भारत के अन्य प्रान्तों में ब्रिटिश शासन पुरानी पद्धतियों और व्यवस्थाओं में परिवर्तन कर उन्हें अपनी संकल्पनाओं के अनुकूल बना रही थी , परन्तु पंजाब में सिख सरदार को केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाला राजस्व जब तक मिलता था कहीं किसी को छेडने की इच्छा नहीं थी
अब तक गांवों में दो पारंपरिक शिक्षक थे , अब तीन हो गये
गांव के खर्च में इसके लिये प्रावधान होता था
देशी शिक्षा के कटु आलोचक भी इतना तो मान्य करते ही थे कि इन देशी विद्यालयों और महाविद्यालयों ने सम्पूर्ण समाज का बहुत भला किया था
संस्कृत के पाठ और विद्यालय पूरा होने के समय समूह में किया जानेवाला पुनरावर्तन सामूहिकता का वातावरण निर्माण करते थे , जब कि एक छात्र को व्यक्तिगत शिक्षा और वह जो पढता था उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और अपनी जिम्मेदारी पर पढने की व्यवस्था से उसे चिन्तन और स्वाध्याय की प्रेरणा मिलती थी
मैं निश्चित रूप से मानता हूं कि आपने जब इस पुस्तक को अपना आधार बनाया तब आपको मालूम नहीं होगा कि यह पुस्तक पचास वर्ष पूर्व , सन् १८८२ में लिखी गई है
अब यदि आपको लगता है कि आपने गलत संदर्भ दिया था तो आपने दिये हुए वचन के अनुसार आप अपना वक्तव्य वापस लें यही मेरा सुझाव होगा
परन्तु मैं वचन देता हूं कि मैं इसे भूल नहीं जाऊंगा , और चैथम हाउस मैं मैंने जो कहा था वह गलत था ऐसा जब मुझे विश्वास हो जाएगा तो मैं न केवल मेरा कथन वापस लूंगा अपितु उस वक्तव्य को प्रसिद्धि प्राप्त हुई उससे भी अधिक प्रसिद्धि इस वापस लेनेवाले वक्तव्य को मिले यह देखूंगा
आप मुझसे सहमत हैं ? कोलकता युनिवर्सिटी तो एकदम बेकार थी
मुझे उसका लिखित उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था , परन्तु श्रीमती सरोजिनी नायडू , जिनसे मैंने उस विषय में बात की थी , ने आज टेलीफोन कर के मुलाकात की व्यवस्था कर दी
तदनुरूप मैं अपराह्न ४ बजे ८८ , नाईट्सब्रिज में उनसे भैंट करने गया और ५ बजे तक वहां रुका
मैंने यह भी कहा कि विद्यालय जानेवाले बच्चों की संख्या से शिक्षा की स्थिति के विषय में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते
मैंने कहा कि मुझे खेद है कि बंगाली स्थानीय मिडल स्कूल के स्थान पर अंग्रेजी मिडल स्कूल ही अधिक पसंद करता है
श्री गांधीने कहा कि वे पूर्ण रूप से सहमत हैं परन्तु उन्होंने पूछा कि क्या प्राथमिक शिक्षा बालिकाओं को अच्छी माता बनायेगी
उन्होंने कहा , हां , मैंने उन्हें उसकी प्रति भेजने का वचन दिया
भारत में ऐसे कई गरीब लोग हैं जो कभी किसी विद्यालय में नहीं गये फिर भी पढ सकते हैं
भारत में ऐसे कई गरीब लोग हैं जो कभी किसी विद्यालय में नहीं गये फिर भी पढ सकते हैं
यदि यह सत्य नहीं है तो बंगाल के बाजारों में भयंकर चित्रोंवाले परन्तु सस्ते रामप्रसाद , चंडीदास , कृतिवास रामायण कैसे बिकते हैं ? ( दिनेश सेन के अनुसार युद्ध से पूर्व प्रति वर्ष उसकी दो लाख प्रतियां बिकती थीं | ) यही नहीं तो केवल दो विभागों में ही गाये जाने वाले भादों गीत भी बिकते हैं
 ( इस टंकित पत्र के बाद हाथ से लिखा गया पत्र ) पुनश्च : ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अभिलेखों में 'बनिया' को सामान्य रूप में 'बनयान' लिखा जाता है
युद्धपूर्व का भारत का प्रशासन अनेक दृष्टि से भयंकर आघात पहुंचानेवाला ही था
४५ , चौपाटी रोड , मुंबई ७ २० फरवरी १९३२ प्रिय श्री फिलिप , मुझे महात्मा गांधी से जानकारी मिली है कि वे जब लन्दन में थे , तब एक सभा में भाषण में भारत में ब्रिटिशरों के आगमन से पूर्व की शिक्षा की स्थिति के विषय में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि शिक्षा का प्रसार वर्तमान में है उससे पूर्व में अधिक था
अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों विद्यार्थी थे , जहाँ पौर्वात्य साहित्य , कानून , तर्कशास्त्र , दर्शन , फारसी वैद्यक आदि विषय पढ़ाये जाते थे और उनका स्तर काफी ऊँचा था
अब मैं मद्रास ( चैन्नई ) की बात करूंगा
सन् १८२६ में मुंबई प्रेसीडेन्सी में कुल जनसंख्या ४६ , ८९ , ७३५ दर्ज हुई थी
वर्तमान और एक शतक पूर्व के तुलनात्मक आंकडे उपयोगी रहेंगे
१९२१ में और १०० वर्ष पूर्व के विद्यालय जाने योग्य जनसंख्या के प्रतिशत १०० वर्ष पूर्व १९२१ मद्रास ४२ . ५ ३३ मुम्बई ४५ . १ १४ ( कुछ हिस्सों में अधिक २८ ) कोलकता ३७ . २ १६ ( '' "" ३२ ) मैंने पहले ही कहा है कि इतने समय पूर्व के आंकडे विश्वसनीय नहीं होते हैं क्योंकि ( १ ) निजी तौर पर पढनेवाले छात्रों की संख्या उपलब्ध नहीं है , ( २ ) लोगों को जो अन्यायपूर्ण लगता था ऐसा कुछ भी उद्घाटित करना उन्हें ठीक नहीं लगता था; ( ३ ) इस प्रकार की जानकारी एकत्रित करनेवाले लोग बहुत बुद्धिमान या क्षमतावान नहीं थे; ( ४ ) जनसंख्या का एक बडा हिस्सा इस गिनती से बाहर ही रखा गया था इसलिये केवल प्रतिशत कोई उपयोग के नहीं हैं
आपके पत्र के साथ ही मुझे प्रा . के . टी . शाह का २० फरवरी का लम्बा पत्र भी प्राप्त हुआ है
मैंने उन्हें पूछा था कि गत पचास वर्षों में शिक्षा का ह्रास हुआ है ऐसा कहने के लिये उनके पास क्या प्रमाण हैं ? आप जिन प्रमाणों को उद्धृत कर रहे हैं वे हैं लिटनर , परन्तु उनकी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑव इण्डिजीनस एज्यूकेशन इन पंजाब' १८८२ में प्रकाशित हुई थी , अर्थात् ५० वर्ष पूर्व
अत: आपके निष्कर्षों का मैं स्वीकार नहीं कर सकता क्यों कि गत १०० वर्षों की बंगाल की शिक्षा की स्थिति के विषय में अभी कोई चर्चा हुई नहीं है
आप देखेंगे कि उसकी प्रस्तावना में मैंने हमारे विवाद का तो उल्लेख किया ही है , साथ में आपकी वर्धा योजना का भी किया है क्यों कि मेरी उसमें गहरी रुचि है
गोपनीय सर फिलिप हार्टोग को महात्मा गांधी के पत्र की प्रतिलिपि ( १६ अगस्त १९३९ की डाक की मुहरवाले लिफाफे में भेजी हुई; पत्र में लिखा दिनांक पढा नहीं जाता
१८वीं शती के अन्त और १९वीं शती के प्रारम्भ की पृष्ठभूमि ( अध्याय पाँच में निर्दिष्ट ) से सम्बन्धित , भारत के अधिकांश हिस्से की सामग्री ब्रिटिश दस्तावेजों में उपलब्ध है
स्वन्तत्र भारत के संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव १३ दिसम्बर १९४६ को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया था
इस समिति में निम्न सदस्य थे : १ . श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर २ श्री एन . गोपालस्वामी आयंगर ३ . डॉ . बी . आर आम्बेडकर ४ . श्री क . मा . मुनशी ५ श्री सैयद महंमद सादुल्ला ६ . श्री बी . एल मित्तर ७ . श्री डी . पी . खैतान अन्वीक्षण समिति ( 3 0088 ) द्वारा संशोधित प्रारूप ४ नवेम्बर १९४८ को पुन: संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया
इसमें सन्देह नहीं है कि यह दायित्व उनके द्वारा प्रशंसनीय रूप से निभाया गया
परन्तु हमें स्वीकार करना चाहिए कि जिस समय समिति द्वारा वृतान्त प्रस्तुत किया जाता है उसी क्षण से वह अधिकृत रूप से विसर्जित होती है और मुझे याद नहीं है कि आपके द्वारा समिति का पुनर्गठन किया गया है या नहीं
पाण्डुलिपि के द्वितीय पठन के आरम्भ से , अन्वीक्षण समिति की ओर से वक्तव्य देते हुए नवम्बर १९४८ को श्री टी . टी . कृष्णमाचारी ने कहा था कि , 'इसके साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय जो महत्त्वपूर्ण बात थी कि - संविधान की रचना करने के लिए प्रारूप समिति ने ( 09 007168 ) आवश्यक ध्यान नहीं रखा है - इस सदन को सम्भवत: जानकारी है ही कि आपके द्वारा नियुक्त किये गए सात सदस्यों में से एक ने त्यागपत्र दिया था इसलिए उसके स्थान पर नई नियुक्ति हुई थी
२२ नवम्बर को संविधान में एक नइ धारा जोडी गई जो निर्विरोध पारित हुई
ग्रामीण भारत ( Village India ) के विषय पर अपने आरम्भिक वक्तव्य में प्रारूप के नायक और अन्वीक्षण समिति के अध्यक्ष , डॉ . आम्बेडकर द्वारा किये गये विधान के कारण ऐसा आक्रोश विशेष रूप से व्यक्त हुआ था
कुछ लोग ( बचाव करते हुए ) कहते हैं कि रूस में निष्ठर व्यवहार होता है , लेकिन उसका प्रयोग बिल्कुल ही निम्नस्तरीय , गरीबों के हित में होता है इसलिए अच्छा है
यह सत्य है कि भारतीय बौद्धिकों का ग्रामसमूहों के प्रति प्रेम अपरिमित और कारुण्यपूर्ण है
 . . . मैं यह पूछना चाहता हूँ कि क्या इस संविधान में कहीं भी गाँव का उल्लेख है ? क्या संवैधानिक ढाँचे में उसका कोई स्थान है ? नहीं , ऐसा कहीं पर भी दीखता नहीं है
ऐसे स्वायत्त जनतन्त्रों का प्रबन्ध किया गया होता तो न भाषानुसार रचना का प्रश्न उत्पन्न हुआ होता न ही जाति के आधार पर बहुमत , अल्पमत या पिछडे वर्गो की समस्या उत्पन्न होती
केन्द्रीकरण अच्छी व्यवस्था है और समय समय पर उपयोगी भी सिद्ध होती है , परन्तु हम भूल गये हैं कि महात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में आग्रहपूर्वक कहा है कि सत्ता का अधिक केन्द्रीकरण सत्ता को स्वयं को और अधिक असहिष्णु बनाता है तथा उसे फासिस्ट विचारधारा की ओर धकेलता है
मैं स्पष्ट रूप से कहूँगा कि ऐसी स्थिति मेटकाफ के कारण नहीं अपितु अभी अभी देश को स्वतन्त्रता दिलानेवाले एक बहुत महान व्यक्ति - हमारे पथदर्शक और राष्ट्रपिता - के कारण गाँवों के प्रति प्रेम , ग्रामीण प्रजातन्त्र एवं ग्रामसमूहों के प्रति श्रद्धा प्रकट हुई है और हमने इसे हृदय से अपनाया है
मेरी समझ में नहीं आता कि गाँव एवं ग्रामीण प्रजा के प्रति सहानुभूति , स्नेह और सद्भाव के बिना देश का पुनरुत्थान कैसे हो सकेगा ? महात्मा गाँधी ने अपने श्रेष्ठ समय में पंचायत राज्य के लिए सदा जूझते रहने का अमर मन्त्र हमें दिया
अन्य एक महापुरूष की पुस्तक - श्री अरविन्द लिखित 'द स्पिरिट एण्ड फार्म ऑव इन्डियन पॉलिटी ( भारतीय राजनीतितंत्र की भावना और स्वरूप ) पुस्तक भी उन्होंने पढी है या नहीं इसका भी मुझे पता नहीं हैं
ग्राम जनतान्त्रिक पद्धति के विषय में शान्ति , सुरक्षा , जनसंख्या एवं सुख की कामना हो तो न केवल भारत बल्कि समग्र विश्व को ग्राम एवं नगर के जनतन्त्र की रचना त्वरित करनी होगी
 . . . मैं अपना कुछ समय डॉ . आम्बेडकर के वक्तव्य का 'एक्स-रे' दर्शाने के लिए लूँगा
मुझे आश्चर्य इस बात का है कि ऐसा विद्वान व्यक्ति , भारत का ऐसा महान सपूत भी भारत के विषय में सीमित जानकारी रखता है
मुझे लगता है कि हम ग्रामपंचायतो के आधार पर , लोगों के स्वैच्छिक सहयोग की नींव पर संपूर्ण ढाँचा बनाएँगे तो केन्द्र अपने आप शक्तिशाली होगा
जहाँ तक संविधान की रचना का प्रश्न है , उसके प्रति ध्यान देते हुए , डॉ . आम्बेडकर के प्रति पूरा आदर दर्शाते हुए , मुझे कहना पड रहा है कि स्वतन्त्रता की लडाइ लडनेवालों के साथ वे अपने आपको जोड नहीं पाएँ हैं
बडे गाँव भी हैं , इसलिए पंचायतों के गठन के लिऐ उनके समूह बनाने पडेंगे
श्री आर . के . सिधवा ( मध्य प्रान्त एवं वराड : सामान्य ) . . . इस संविधान की रचना जनतन्त्र के लिए हो रही है और डॉ आम्बेडकर ने स्थानिक सत्ताधिकरण एवं गाँवों की उपेक्षा करते हुए जनतन्त्र की विचारधारा को ही नकारा है
श्री आर . के . सिधवा ( मध्य प्रान्त एवं वराड : सामान्य ) . . . इस संविधान की रचना जनतन्त्र के लिए हो रही है और डॉ आम्बेडकर ने स्थानिक सत्ताधिकरण एवं गाँवों की उपेक्षा करते हुए जनतन्त्र की विचारधारा को ही नकारा है
स्थानीय सत्ताधिकरण देश के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की धुरी नहीं बनती है तो संविधान विचार करने योग्य भी नहीं है
हमारे देश में करों की सभी आय प्रदेश ले जाते हैं तब स्थानीय संस्थाओं एवं गाँवो का उत्कर्ष होगा ऐसी अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं ? गवर्नर ने अभी अभी अपने अभिभाषण में , और एक उपमन्त्री ने भी मुंबई में बताया कि प्रत्येक ग्रामजन को - महिला या पुरुष सभी को - ऐसी अनुभूति करवानी चाहिए कि देश के संचालन में उनका भी हिस्सा है
पंडित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . . नि:संदेह , कहा जा सकता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों के लिए किसी धारा का प्रावधान नहीं है
उन्होंने उसमें सूचित किया था कि गाँव ही मतदाता इकाई होनी चाहिए
उन्होंने कहा था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है
परन्तु शास्त्रों एवं पुराणों के द्वारा प्रकृति की समझ एवं वैचारिक विवेक के सन्दर्भ में गाँव , आधुनिक नगरों की तुलना में अधिक समझदारी एवं विवेक से युक्त हैं
चौधरी रणवीरसिंह ( पूर्व पंजाब : सामान्य ) . . . मैं केन्द्रीकरण या विकेन्द्रीकरण के विषय की गहराई में उतरना नहीं चाहता परन्तु एक बात के प्रति सदन का ध्यान अवश्य आकर्षित करना चाहता हूँ
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हमेशा हमें सिखाया है कि राजनीतिक या आर्थिक किसी भी क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण अन्य किसी की भी तुलना में शक्ति का बीजारोपण अधिक करता है
मुझे लगता है कि देश के पुनर्गठन में ग्रामवासियों को अपना अपेक्षित भाग मिलना चाहिए , हर क्षेत्र में ग्रामवासियों का प्रभाव निर्माण होना चाहिए
ग्रामपंचायतें अत्यन्त निरंकुश या आपखुद हो सकती हैं
उन्होंने बताया कि संविधान की पाण्डुलिपि में , विश्व के कई देशों के संविधानों से बहुत कुछ लिया गया है , परन्तु हमारी भूमि से , हमारी सांस्कृतिक धरोहर से कुछ भी नहीं अपनाया गया है
उन्होंने मान लिया है कि यह संविधान एक व्यक्ति ने रचा है , वे भूल गए हैं की संविधान की रचना में मार्गदर्शन करने के लिए एक संस्था - प्रारूप समिति के सभी सदस्य संविधान में ग्रामपंचायतों को समाविष्ट करना भूल गए हैं
गाँवों के जमींदार , जागीरदार , महाजन एवं आर्थिक लेनदेन करनेवाले सूदखोर वर्ग के लिए तुलना में कम सुसंस्कृत , अशिक्षित , गरीब समुदाय को लूटने एवं उनका शोषण करने के लिए यह पद्धति सहायक बनेगी
परन्तु पाण्डुलिपि में कही भी जनतन्त्र की झलक नहीं दिखाई देती है और विकेन्द्रीकरण तो सर्वथा ही अदृश्य है
परन्तु मैं विनम्र व्यक्ति हूँ और मुझे किसी प्रकार का विशेष अनुभव भी नहीं है
मेरा निवेदन है कि इस संविधान में वे भारत की आत्मा को उचित स्थान दें
श्री अलादी कृष्णस्वामी आयंगर ( मद्रास : सामान्य ) . . . मुझे स्वीकार करना पडेगा कि भारतीय ग्रामसमाज की व्यापक रूप से अवमानना करने के कारण मेरे आदरणीय मित्र ( डॉ आम्बेडकर ) के विचारों का समर्थन मैं नहीं कर सकता
 . . . ( ऐसी आलोचना हुई है कि ) भारत के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के एक आवश्यक लक्षण के रूप में संविधान में ग्रामसमूहों को उचित महत्त्व प्रदान नहीं किया गया है , परन्तु प्रादेशिक एवं राज्य की विधानसभाओं को , स्थानीय स्वराज्य एवं अन्य प्रावधानों में , जो अत्याधिक शक्ति दी गई है , इसे देखते हुए , राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में संचालन के लिए गाँवों को उसकी इकाई बनाने में राज्य सरकार को कोई आपत्ति नहीं हो सकती
 . . . ( ऐसी आलोचना हुई है कि ) भारत के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के एक आवश्यक लक्षण के रूप में संविधान में ग्रामसमूहों को उचित महत्त्व प्रदान नहीं किया गया है , परन्तु प्रादेशिक एवं राज्य की विधानसभाओं को , स्थानीय स्वराज्य एवं अन्य प्रावधानों में , जो अत्याधिक शक्ति दी गई है , इसे देखते हुए , राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में संचालन के लिए गाँवों को उसकी इकाई बनाने में राज्य सरकार को कोई आपत्ति नहीं हो सकती
ग्रामपंचायतों की ऐसी सुदृढ आधारशिला तैयार किए बिना जनतन्त्र में लोग अपनी भूमिका निभाने की क्षमता कैसे अर्जित कर पाएँगे ? हम व्यवस्थातन्त्र का केन्द्रीकरण चाहते हैं या विकेन्द्रीकरण ? महात्मा गाँधी निरन्तर तीस वर्ष तक विकेन्द्रीकरण की बात समझाते रहे थे
परन्तु ऐसा जनतन्त्र है कहाँ ? उसका तो अभी हमें निर्माण करना है . . . इसीलिए मेरा सुझाव है कि मार्गदर्शक सिद्धान्तों में एक धारा का प्रावधान किया जाए जिसके द्वारा भविष्य में गठित होनेवाली सभी सरकारों के अन्तर्गत ग्रामपंचायतों की रचना करने और उन्हें स्वायत्तता देने के लिए और वे अपने कार्य स्वयं कर सकें इस उद्देश्य से आर्थिक स्वतन्त्रता देने का उसमें स्पष्ट निर्देश हो
परन्तु ऐसा जनतन्त्र है कहाँ ? उसका तो अभी हमें निर्माण करना है . . . इसीलिए मेरा सुझाव है कि मार्गदर्शक सिद्धान्तों में एक धारा का प्रावधान किया जाए जिसके द्वारा भविष्य में गठित होनेवाली सभी सरकारों के अन्तर्गत ग्रामपंचायतों की रचना करने और उन्हें स्वायत्तता देने के लिए और वे अपने कार्य स्वयं कर सकें इस उद्देश्य से आर्थिक स्वतन्त्रता देने का उसमें स्पष्ट निर्देश हो
चिमूर में , इन कूपमण्डूकों को ही परेशान किया जाता था
 . . . उसके बाद सीमापार के आक्रमणों के कारण राजनीतिक विकासयात्रा में बाधा पहुँची है इसमें कोई सन्देह नहीं है
उन्हें इस बात की भी अच्छी तरह जानकारी है कि यह संविधान उनके लिए निर्मित हो रहा है परन्तु संविधान की रचना में , राष्ट्रीय या स्वराज्य का , या तो फिर ग्रामवासियों का भी दृष्टिकोण का स्वीकार न होकर आन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को आधार बनाया गया है
संविधान लोगों के लिए होना चाहिए ताकि उन्हें अन्न एवं वस्त्र का भरोसा प्राप्त हो , क्योंकि ऐसी बुनियादी आवश्यकताओं के अभाव के कारण ही स्वराज्य की माँग उठी थी . . . 
संविधान लोगों के लिए होना चाहिए ताकि उन्हें अन्न एवं वस्त्र का भरोसा प्राप्त हो , क्योंकि ऐसी बुनियादी आवश्यकताओं के अभाव के कारण ही स्वराज्य की माँग उठी थी . . . 
संविधान लोगों के लिए होना चाहिए ताकि उन्हें अन्न एवं वस्त्र का भरोसा प्राप्त हो , क्योंकि ऐसी बुनियादी आवश्यकताओं के अभाव के कारण ही स्वराज्य की माँग उठी थी . . . 
हम अपने प्रदेशों को सुदृढ रखना चाहते हैं या शिथिल , हम सुदृढ केन्द्र चाहते हैं या निर्बल . . . इसके विषय में सोचना पड़ेगा
जो सफलता प्राप्त हुई है वह , अधिकांश गाँव के कुशल मुखिया - सरपंच या प्रतिष्ठित जमीदारों के नेतृत्व के कारण हुई है
इस सदन के सदस्य जानते हैं कि गाँवों में रचनात्मक कार्यों के सन्दर्भ में गाँधीजी का अपना एक निश्चित मत था
श्री टी . प्रकाशम ( मद्रास : सामान्य ) . . . श्री माधवराव ने बताया कि हमारे पूर्वज मतपेटिका एवं मतपत्र से अनभिज्ञ थे
कहीं कहीं सीमित जनसंख्या वाले छोटे इक्के दुक्के गाँव भी होंगे , जहाँ केवल पचास परिवारों के लिए ग्रामपंचायत की रचना आवश्यक होगी
हमारा उद्देश्य ग्रामपंचायतों के गठन के लिए राज्य को निश्चित रूप से कदम उठाने एवं स्थानीय स्वराज्य के लिए कार्यरत होने के लिए उन्हें आवश्यक अधिकार एवं सत्ता प्रदान करने हेतु निर्धारित एवं स्पष्ट आदेश देने का है
श्री टी . प्रकाशम ( मद्रास : सामान्य ) सम्माननीय उपाध्यक्षजी , मुझे प्रसन्नता है कि सरकार ने इस संशोधन को सद्भावपूर्वक स्वीकार किया है और संविधान में इसे समाविष्ट करने की अनुमति दी है
डॉ . राजेन्द्रप्रसाद ने सूचित किया था कि ( संविधान का ) ढाँचा नींव से आरम्भ होकर ऊपर की ओर जाना चाहिए
हमारे और विश्व के इतिहास से विमुख हो जाने के कारण हम इस बात को घृणा की दृष्टि से देखें यह ठीक नहीं है
आज सरकार विदेशों से अन्न प्राप्त करने और उसका वितरण करने के लिए उच्च स्तरीय प्रयास करती है , परन्तु हमारी एजन्सियाँ केन्द्रीय या प्रान्तीय स्तर पर होने के कारण अधिकांश रूप में जनसामान्य तक उसका वितरण नहीं होता है
चीन में जो कुछ हुआ इसे हमने देखा है और ब्रह्मदेश ( आज का म्यांमार ) की स्थिति से हम परिचित हैं
सम्माननीय मित्र श्री सन्तानम और आदरणीय डॉ . आम्बेडकर का इस लिए आभार एवं धन्यवाद कि वे ऐसा संशोधन लाए
ब्रिटिश शासन में गाँवों की उपेक्षा हुई और उनका महत्त्व नहीं रहा
श्री एल . कृष्णस्वामी भारती ( मद्रास : सामान्य ) माननीय उपाध्यक्षजी , यह संशोधन प्रस्तुत करने के लिए श्री सन्तानम को और उसकी स्वीकृति प्रदान करने के लिए डॉ . आम्बेडकर को धन्यवाद देता हूँ
साथ ही मैं स्वीकार करता हूँ कि इस संशोधन से मुझे पर्याप्त संतोष नहीं है
मार्गदर्शक सिद्धान्त के पीछे जो विचार रखा गया है वह इस बात पर बल देता है कि देश का संचालन किस प्रकार करना चाहते हैं , और इसलिए समग्र विश्व के सामने स्पष्ट कर देना चाहिए कि आर्थिक स्वातन्त्र्य एवं आर्थिक जनतन्त्र महत्त्वपूर्ण है , और इसीलिए आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण अपना महत्त्व रखता है
मैं चाहता हूँ कि 'स्वायत्तता' उस अर्थ में होनी चाहिए जिस अर्थ में गाँधीजी को अभिप्रेत थी
मा . श्री के . संतानम आदरणीय सदस्य का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि स्वराज्य केवल राजनीतिक नहीं है , वह आर्थिक एवं आध्यात्मिक भी हो सकता है
मुंबई सरकार ने पंचायत कानून की रचना की है , मध्य प्रदेश सरकार ने जनपद कानून बनाया है , संयुक्त प्रान्त सरकार ने गाँव पंचायत कानून और बिहार सरकार ने ग्राम पंचायत राज बनाया है
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
श्री अनंतशयनम आयंगर ( मद्रास : सामान्य ) . . . मेरा बस चले तो , मै गाँवों को एक इकाई बनाने का एवं स्थायी मताधिकार के आधार पर स्थानीय परिषदों समेत ग्राम पंचायतों का गठन करना अधिक पसन्द करूँगा
 . . . महात्मा गाँधी और सभी धर्माचार्यो एवं ऋषिमुनियों की संकल्पना से युक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें एकमत होना चाहिए ! मैं इस लक्ष्य को 'साधुनाम् राज्यम्' या 'धरा पर का ईश्वरी राज्य' नहीं कहूँगा , मैं तो केवल पंचायत राज्य ही कहूँगा
सेठ दामोदर स्वरूप ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) अर्वाचीन राज्य का ढाँचा प्रमुख रूप से दो विभाग - प्रान्त एवं केन्द्र - के बीच सत्ता के विभाजन पर आधारित है
सेठ दामोदर स्वरूप ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) अर्वाचीन राज्य का ढाँचा प्रमुख रूप से दो विभाग - प्रान्त एवं केन्द्र - के बीच सत्ता के विभाजन पर आधारित है
इस पत्र को आपने संविधान परामर्शक श्री बी . एन राउ को भेजा था
अंग्रेज आज भारत छोडकर चले गए हैं , इसके पश्चात् भी उनकी उपेक्षा हुई है
श्री शंकरराव देव ( मुंबई : सामान्य ) संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाले सदस्यों की नियुक्ति करते समय हम संविधान के पंडितों का ज्ञान और बहुश्रुत संवैधानिक विशेषज्ञों की सटीकता की अपेक्षा उत्सुकता से करते थे और यह बात उसमें विपुल मात्रा में है . . . परन्तु हमने बुद्धिचातुर्य से युक्त और व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञों का चयन नहीं किया , और न हीं संविधान में क्रान्ति की भावना को साकार रूप देना स्वीकार किया , क्योंकि संविधान सभा १९४६ में गठित हुई , उस के पूर्व क्रान्तिकारी संघर्ष के निकष पर संविधान के वर्तमान रचनाकारों में से कोई भी परखे नहीं गये हैं
हमने अमेरिका , इंग्लैड , ऑस्ट्रेलिया , केनेडा , आयलैन्ड , जर्मनी आदि विभिन्न देशों के सविधानों से मुक्त रूप से बहुत कुछ अपनाया है
हमें सखेद स्वीकार करना चाहिए कि हमारे लिए और विश्व के लिए अहिंसक समाज व्यवस्था प्रदान करने के लिये सक्षम संविधान देने की स्थिति में ग्राम पंचायतों से सम्बन्धित , चार पंक्ति की धारा ४० और कुटिर उद्योंगो के अत्यल्प उल्लेख को छोड गाँधीमार्ग को - गाँधी द्वारा दर्शाया गया ऐसा मार्ग जिसमें पिरामिड-सा संवैधानिक ढाँचा , जनसामान्य की गहरी समझ और रचनात्मक क्षमता से युक्त लाखों पंचायतों की विशाल आधारशिला को - कोई स्थान नहीं मिला है
आज केन्द्रीकृत समाज में एक ही बम सभी दीपकों को बुझा देने के लिए पर्याप्त है , और आज तिमिरहरण के लिए भी दीपक नहीं बचा है
आज केन्द्रीकृत समाज में एक ही बम सभी दीपकों को बुझा देने के लिए पर्याप्त है , और आज तिमिरहरण के लिए भी दीपक नहीं बचा है
मैं जानता हूँ कि यह प्रावधान हमारी इच्छा के अनुसार नहीं है , फिर भी मुझे विश्वास है कि हम उसके पीछे पूरी शक्ति लगा देंगे और मन लगाकर काम करेंगे
यह केवल एक कानूनी अंश हैं , जिस प्रकार 'मोटर विहीकल एक्ट' है
हमने इसका प्रावधान क्या सही अर्थ में नहीं किया है ? व्यक्ति मताधिकार का अन्य क्या अर्थ हो सकता है ? व्यापक मताधिकार प्रदान करने का साहसिक कदम हमने उठाया है
संविधान की रचना करने के लिए तो हम गर्व का अनुभव कर रहे हैं तो भी जब हम सार्वभौमत्व को ग्रहण कर रहे हैं तब मूल अधिकारों के अध्याय में दृढतापूर्वक खुलकर घोषित करना चाहिए था कि हम रोटी , कपडा , मकान एवं मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करेंगे
हमारे नगरों की सभी आवश्यकताओं को ग्रामीण क्षेत्र पूरा करता है
मैंने इससे पूर्व बताया ही है कि हमने अस्पृश्यता को दूर करना , राष्ट्रभाषा , सामाजिक बंधुत्व एवं सद्भाव के लिए प्रावधान किया है
मेरा संकेत ग्राम पंचायत संगठन की ओर एवं उसके साथ साथ १४ वर्ष की आयु तक के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने के मार्गदर्शक सिद्धांतो की ओर है
शासकीय कर्मचारी से प्रजा का दायित्व लेने की अपेक्षा जब तक रखी जाएगी तक तब प्रजा असावधान रहेगी और सरकार के प्रति असन्तोष जताती रहेगी
परन्तु , एक बार उसे स्थानीय संचालन का दायित्व सौंप दिया जाए तो वह अपना कार्य करने के लिए तत्पर रहेगी
श्री पी . कक्कन ( मद्रास : सामान्य ) . . . संविधान में पंचायत पद्धति को स्थान दिया गया इसकी मुझे प्रसन्नता है
साथ ही महात्मा गाँधी की इच्छानुसार जाति , धर्म या रंग के भेदों से रहित ग्रामस्वराज्य का विकास करेगी
श्री पी . के . सेन ( बिहार : सामान्य ) राष्ट्रपिता द्वारा अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की हुई पुरानी विचारधारा को मानते हुए आधारभूत रूप से पंचायत पद्धति को कार्यान्वित करना चाहिए , इस विषय पर अपेक्षित चर्चा हुई है
इससे पूर्व मैंने कहा है कि व्यापक मताधिकार असुरक्षित है , और सुरक्षा रूपी स्वर्ग को खोजने के लिए हमें बहुत परिश्रम करना है
श्री बी . पी . झुनझुनवाला ( बिहार : सामान्य ) . . . अन्य समी सत्तायें , यथासम्भव विकेन्द्रीकरण करते हुए ग्राम्य इकाइयों या ग्रामसमूहों को देनी चाहिए
इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के आमुख में संशोधन करने की सूचना मैने दी थी , और सूचित किया था कि 'जनतन्त्र' शब्द के पश्चात् 'आत्मनिर्भरता के सिद्धांत के अनुसार गठित स्वायत्त ग्रामसमूहों के आधार पर उसे आकार देने का प्रयास किया जाए' ऐसे शब्द जोडे जाएँ . . . संशोधन का उद्देश्य यह था कि हम जनतांन्त्रिक सरकार स्थापित कर रहे हैं तब यथासम्भव मात्रा में छोटी इकाइयों को यथोचित अधिक सत्ता प्रदान करते हुए यथासंभव वास्तवलक्षी जनतन्त्र बनाएँ ताकि ऐसी लघु ईकाई बनानेवाले व्यक्तियों का यथोचित सुलभ एवं तैयार साधन प्राप्त हो सके
मैं तो इतना ही कहना चाहता हूँ कि ग्रामजनों के लिए डॉ . आम्बेडकर द्वारा प्रयुक्त शब्दों से अधिक कठोर और अन्यायपूर्ण कुछ हो ही नहीं सकता
गाँवों में जो सम्पति थी उसे या तो छीन ली गई है , या भूमि के साथ पशुसम्पदा के रूप में जो सम्पति थी उसकी गुणवत्ता कम हुई है या नष्ट हुई है
स्वाधीनता के आन्दोलन में ग्रामजनों ने अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी
श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर ( मद्रास : सामान्य ) . . . व्यापक मताधिकार का स्वीकार करने के लिए सदन अभिनन्दन का अधिकारी है
परन्तु ऐसे आलोचकों से मेरा विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि आज हमारे प्राचीन राजनीति तन्त्र का एक धुंधला और अधूरा चित्र ही हमारे सामने है इसे भी हम स्मरण में रखें
 . . . जन सामान्य के लिए तो अन्न , वस्त्र , आश्रयस्थान और शिक्षा प्राप्त हो तभी स्वाधीनता एवं संविधान सार्थक सिद्ध हो सकता है
वे भारत के ऐसे स्वायत्त सामाजिक समूह थे जिनमें कृषि एवं हाथनुबाई के उद्योगों का समावेश था
उन्हें ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने पूर्णरूप से नष्ट कर दिया था
श्री कमलापति त्रिपाठी ( संयुक्त प्रान्त: सामान्य ) . . . संविधान की पहली आधारभूत न्यूनता यह है कि वह अति केन्द्राभिमुखी है
सब जानते हैं कि केन्द्र के हाथ में प्रभावी सत्ता का आधार सैन्यशक्ति होता है , और सैन्य के सामर्थ्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करने का अर्थ लोगों के अधिकारों को पूर्णत: निर्मूल करने का मार्ग खुला करना ही होगा
इसके उपरांत मुझे यह भी अनुभव होता है कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है
मैं कह सकता हूँ कि विश्व के अनेक देशों में आज नगरों का आधिक्य है , परन्तु मेरा भारत गाँवों का देश है
हमारे गाँव का भविष्य में कैसा स्वरूप बन पाएगा और वे कैसा स्थान प्राप्त करेंगे इस विषय में हमारा संविधान मौन है
श्री ओ . पी . अलगेसन ( मद्रास : सामान्य ) . . . एक ऐसी आलोचना हुई है कि गाँव को राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता नहीं दी गई है
श्री रामचन्द्र गुप्त ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) . . . मुझे ऐसी आलोचना से सन्तोष नहीं है कि केन्द्रीकरण कम और विकेन्द्रीकरण अधिक होना चाहिए
ग्रामवासियों की समझ में आनेवाला कोई तर्क प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हूँ कि २६ जनवरी , १९५० के पश्चात् उनकी स्थिति बेहतर होगी
संविधान के प्रति यदि इस दृष्टि से देखेंगे तो मुझे लगता है कि अस्पृश्यता निवारण और व्यापक मताधिकार जैसे दो अति श्रेष्ठ तत्त्वों को संविधान में समाविष्ट किया गया है
८ . भारत के संविधान में पंचायतों के स्थान के विषय में संविधान परामर्शदाता की टिप्पणी मई १९४८ इस समय पंचायतों की अवधारणा को पाण्डुलिपि में सम्मिलित करने का कार्य कदाचित सरल नहीं है
यदि पंचायत योजना को अपनाना है तो प्रत्येक प्रान्त एवं देसी रियासतों के लिए नगरों के लिए सानुकूल परिवर्तनों के साथ सुविचारित एवं विस्तृत आयोजन करना पड़ेगा
प्रत्याशियों के लिए शिक्षा की योग्यता निर्धारित करने का कार्य अत्यन्त सरल है , परन्तु वे आवश्यक या अपेक्षित हैं ऐसा नहीं लगता
प्रत्याशियों के लिए शिक्षा की योग्यता निर्धारित करने का कार्य अत्यन्त सरल है , परन्तु वे आवश्यक या अपेक्षित हैं ऐसा नहीं लगता
९ . स्वतंत्र भारत के संविधान के हेतु एवं उद्देश्यों का प्रस्ताव २२ जनवरी १९४७ को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत इसके साथ , यह संविधान सभा दृढता एवं गम्भीरतापूर्वक भारत को स्वतंत्र सार्वभौम प्रजासत्ताक घोषित करती है और उसके भावि शासन के लिए संविधान की रचना करने का भी निर्णय करती है . . . जिसके अन्तर्गत जो प्रदेश इस समय ब्रिटिश भारत के अन्तर्गत हैं , जो प्रदेश देसी रियासतों के रूप में हैं और भारत के अन्य ऐसे प्रदेश जो ब्रिटिश भारत के दायरे के बाहर हैं तथा स्वतंत्र सार्वभौम भारत में समाविष्ट होना चाहते हैं वे सब मिलकर एक संघ बनेंगे , और जिसमें उनकी प्रवर्तमान सीमाएँ या संविधान सभा इसके पश्चात् संविधान के नियमों के अनुसार तय करेगी ऐसी सीमाओं के साथ उपर्युक्त प्रदेश तथा शेष सत्ताओं समेत स्वायत्त इकाइयों का स्थान बना रहेगा और वे उसे बनाए रख सकेंगे
संघ राज्य में समाविष्ट या निर्दिष्ट ऐसी सभी सत्ताएँ और कार्य या संघ राज्य की जन्मजात या निहित या उसमें से उत्पन्न होनेवाले शासन और प्रशासन के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे; और जिसमें सार्वभौम स्वतंत्र भारत की सभी सत्ताएँ और अधिकार , उसके घटक और सरकारी विभाग प्रजा से प्राप्त होंगे; और जिसमें कानून तथा सार्वजनिक नीतिमत्ता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठ , अवसरों और कानून के समक्ष समानता; विचार अभिव्यक्ति , मान्यता , आस्था , पूजापद्धति , व्यवसाय , संगठनों की रचना करने और काम करने का स्वातंत्र्य संरक्षित एवं सुरक्षित होगा; जिसमें अल्पमतावलम्बियों , पिछडे और आदि जाति क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछडे वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त होगी; और जिसमें जनतांत्रिक एकता और अखण्डितता तथा भूमि , समुद्र और आकाश क्षेत्र के उसके अधिकारों की न्यायोचित एवं सदस्य राष्ट्रों के कानून द्वारा देखभाल की जाएगी; और यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना न्यायपूर्ण आदरयुक्त स्थान प्राप्त करेगी तथा विश्वशांति और मानवकल्याण के लिए अपना स्वैच्छिक योगदान देगी
मद्रास राज्य में पंचायत पद्धति के विगत आठ दशक के दौरान किये गए तीन सघन परीक्षण नये ढाँचे और इन संस्थाओं के पुनर्गठन की दिशा स्पष्ट कर देते हैं जिनका विवरण प्राप्य है ऐसे १८८० , १९०७ और १९८६ के प्रमुख तीन प्रयासों में इस स्थानीय संस्थाओं की संरचना के पीछे अमूर्त कल्पनायें और विचारधारायें थी
ऐसा होते हुए भी कहीं कहीं स्थानीय संस्थाएँ और प्रेसिडेन्सी सरकार , या उसके अध्यक्ष ( जो सरकारी अधिकारी थे ) और सामान्य सदस्यों के बीच इन संस्थाओं के कार्यों को लेकर मतभिन्नता निर्माण होने लगी
सन् १८५० में सरकार ने जिलाधीश या अध्यक्ष , जिला परिषद के इस प्रकार के निर्णय के विरूद्ध , गवर्नर- इन- कौन्सिल के समक्ष निवेदन कर सकें ऐसा प्रावधन बना
इस प्रकार के तर्क के कारण ऐसी धारणा बनी कि स्थानीय संस्थाओं की गतिविधियों को कानूनी प्रावधान के द्वारा सीमित कर दिया जाए , इसके अन्तर्गत निश्चित क्षेत्रों के विषय में लोकल बोर्ड का लचीला ढाँचा तैयार किया जाए , नियंत्रण केन्द्रीय सत्ता के पास रहे जिससे ये संस्थाएँ अर्थाभाव के कारण टूट कर बिखर न जाए
तब से अर्थात् सन् १९२० से कानूनों के अन्तर्गत संस्थाओं की गतिविधियों में वैधानिक नियम और विस्तृत विभागीय आदेशों का 'शासन' आरम्भ हुआ
सन् १९३१-३२ में जो कानून की धारा ११६ का खंडन करनेवाला प्रतीत होता था वह सन् १९३५ में वैसा नहीं लगा
पहला , ३१ अगस्त १९३९ के दिन और दूसरा कुछ महिनों के पश्चात् २ फरवरी १९४० के दिन
आरम्भ में ही इन संस्थाओं को तकनीकी रूप से मान्य करने का अधिकार उनके तकनीकी कर्मचारियों को दिया गया , परन्तु बाद में उन्हीं कर्मचारियों को स्थानीय समितियों की सेवाओं से निकाल दिया गया
सन् १९६१ में प्रवर्तमान ढाँचा पूर्णरूप से विकसित हुआ , और तब से व्यय रू . २९ करोड से ३० करोड के मध्य रहता है , जब कि राज्य का खर्च , १९६४-६५ में बढकर रू . १९५ करोड तक पहुँचा था
अध्ययन हेतु कुछ जिलों की व्यापक यात्रा के दौरान प्राप्त जानकारी और धारणाओं पर आधारित यह मूल्यांकन है
 ) इस प्रकार संपूर्ण राज्य में लगभग ३७४ पंचायत संघों के द्वारा राज्य की १२ , ८९५ ग्राम पंचायतों की रचना की गई है
उसका क्षेत्रफल केवल ६२ . ०५ वर्ग मील ही है
ध्यान आकर्षित करनेवाली बात यह है कि ऐसे ३७४ संघों में से लगभग आधे से कम में रेल्वे स्टेशन की सुविधा है और टेलिग्राफ कार्यालय भी हैं
परंतु प्रत्येक संघ में कम से कम एक माध्यमिक विद्यालय अवश्य है
सारिणी ४ नगर जिला रचना की तिथि अरुवनकाडु नीलगिरि १४-४-१९६३ मदुक्कराई कोयम्बतूर १४-४-१९६३ अन्नामलाई युनि . परिसर दक्षिणी आर्कोट १४-४-१९६३ शंकरनगर तिरुनेलवेली १४-४-१९६३ हरवईपट्टी मदुराई १४-४-१९६३ मणिमुतार तिरुनेलवेली १४-४-१९६३ वलपरई कोयम्बतूर १४-४-१९६३ हाईवे मदुराई १-१०-१९६४ महाबलिपुरम् चेंगलपट्ट १-११-१९६४ अम्बत्तूर चेंगलपट्ट १-१०-१९६५ कन्याकुमारी कन्याकुमारी १-१०-१९६५ प्रत्येक जिले के गाँव और ग्राम पंचायतों की संख्या में इतनी अधिक असमानता है कि , उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती
सम्बन्धित क्षेत्र के भूमिकर की मात्रा का आधार कई बातों पर है , जैसे कि भूमि का उपजाऊपन और उस क्षेत्र का अपेक्षाकृत विकास , नगरीय क्षेत्रों से उसकी दूरी एवं क्षेत्र की ऐतिहासिक पार्श्वभूमि , आदि को भी इसमें समाविष्ट किया जाता है
सारिणी ५ में गाँवों से प्राप्त होनेवाले राजस्व के विषय में राज्य में स्थित पंचायत संघों का आर्थिक वर्गीकरण किया गया है
वित्तीय वर्गीकरण के विषय में यह सूचित किया गया कि ( १ ) समय समय पर या तो हमेशा के लिए पंचायत आर्थिक निगम की रचना करना ( २ ) पंचायत आर्थिक निगम द्वारा निश्चित किए गए अनुदान के अतिरिक्त , प्रत्येक पंचायत को प्रति व्यक्ति रू . २ का अधिक राजस्व भी दिया जाए
साथ ही सरकार के ध्यान पर यह तथ्य भी लाया गया कि 'अ' और 'ब' वर्ग के कुछ गाँव संघों में स्थित अन्य कुछ गाँवों की तुलना में अधिक निर्धन हैं
१९६३-६४ में सम्पूर्ण आय रू . ५८७ . १५ लाख हुई थी जिसमें व्यवसाय कर तो केवल ५ . २० लाख ही था
इस व्यय की राशि १९६१-६२ में १ करोड थी , वह १९६४-६५ में बढ़कर रू . १ करोड ३५ लाख हुई थी
इसके लिए १९६५-६६ में रू . २२ लाख दिये गए थे
पशुपालन पशुपालन का कार्य भी पंचायत संघ करते हैं
संघो के द्वारा किये जा रहे पशुपालन के लिए पाँच वर्ष में लगभग रू . १ करोड का प्रबन्ध किया गया था
लघु सिंचाई लघु सिंचाई के लिए अक्तूबर १९६४ तक राज्य में २१ , ७०० तालाब तैयार किये गए
मस्त्योद्योग कार्यक्रम ३१ अक्तूबर १९६४ तक तंजावु जिले में और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ४६ संघों में कुल १८३ मत्स्य पालनकेन्द्र भी शुरू किये गए हैं जब कि अन्य संघों में इसे शुरू किया जाना था
इन संघों ने लगभग १०० विद्यालयों मे पर्यावरणीय स्वच्छता के लिए परियोजना भी शुरू की थी जिसके लिए रू . २ , ०० , ००० का व्यय भी किया गया था
मद्रास शहर के निकट पूनामल्ली पंचायत संघ की लगभग १५ पंचायतों में संकलित बालकल्याण एवं बालविकास परियोजना भी शुरू की गई थी
प्रत्येक पंचायत को दिये गए रेडियो सेट के लिए रू . १८० सहायता निधि दी गई थी जब कि पंचायत क्षेत्र सहाय के छोटे कस्बों को तो दूसरे सेट के लिए भी रू . १०० सहायता राशि दी गई थी
इन पंचायत संघों के द्वारा जमा किये जा रहे कर का औसत लगभग ३१ पैसे था , जिसके प्रति सरकार ने १९६१-६२ में रू . ८५ , २४ , ००० अनुदान भी दिया था , जो १९६५-६६ में बढकर रु . १ करोड ७० लाख हुआ था
इन पंचायत संघों के द्वारा जमा किये जा रहे कर का औसत लगभग ३१ पैसे था , जिसके प्रति सरकार ने १९६१-६२ में रू . ८५ , २४ , ००० अनुदान भी दिया था , जो १९६५-६६ में बढकर रु . १ करोड ७० लाख हुआ था
पंचायत से सम्बन्धित विभिन्न विषय , यथा चुनाव , अध्यक्ष , सदस्य एवं पंचायतों की कार्यवाही तथा अधिकारों के सम्बन्ध में उनका प्रश्न उठाना सहज है
अप्रैल १९६३ तक पंचायतों के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों को मिलाकर कुल २१ , ७३५ प्रशिक्षार्थी ( कुल संख्या ८० प्रतिशत ) इस से लाभान्वित हुए थे
क्षेत्रीय अधिकारियों को तिरूपति में ( केन्द्रीय मंत्रालय और रिझर्व बेंक द्वारा ) चलनेवाले प्रशिक्षण केन्द्रों में साडे तीन मास का प्रशिक्षण लेना पड़ता है जब कि विस्तरण अधिकारी ( प्रशिक्षण ) के लिए यह समयावधि छह महीने की है
इस के अलावा चयन किये गए विकास खण्ड अधिकारी और विस्तरण अधिकारी के लिए मैसूर के भवानी सागर में , हैदराबाद स्थित हैदराबाद अभिविन्यास एवं प्रशिक्षण केन्द्रों में २२ या ४५ दिन का 'अभिविन्यास' पाठ्यक्रम भी चलाया गया था
१९६५ के प्रारम्भ तक तो लगभग ४२ प्रतिशत विकास खण्ड अधिक प्रशिक्षित नहीं थे
यद्यपि यह संघ असंवैधानिक और अशासकीय है परन्तु वह पंचायत संचालन की कारवाई के संदर्भ में विचारविमर्श करता है
इस टीएनयुपी में तालुका पंचायत संघों को भी संलग्नित संस्थाकीय सदस्य के रूप में जोड़ा गया है
पंचायत द्वारा किये गए निवेदनों के प्रकार पंचायतों के संचालन के अलावा राज्य सरकार के कानूनी एवं प्रशासनिक नियंत्रण के संदर्भ में इससे पूर्व चर्चा हो ही चुकी है
पंचायत ने जो कारण दर्शाए थे कि उनके क्षेत्र में नियमविरुद्ध शराब बनाने की गतिविधि के साथ जूए की आपराधिक गतिविधियों के सामने सरकार ने किसी भी तरह के कदम नहीं उठाए हैं , उसके विरोध में पंचायत के अध्यक्ष , उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों के साथ सभी ने त्यागपत्र दिया है यह भी बताया
 ( ३ ) एक पंचायत संघ के अध्यक्ष का यात्रा भत्ता यह बताते हुए रोक दिया गया था कि बिल समय समाप्त हो जाने के पश्चात् प्रस्तुत किया गया है
 ( ३ ) एक पंचायत संघ के अध्यक्ष का यात्रा भत्ता यह बताते हुए रोक दिया गया था कि बिल समय समाप्त हो जाने के पश्चात् प्रस्तुत किया गया है
 ( ६ ) राज्य के या केन्द्र के मंत्रियों के स्वागतार्थ किये जानेवाले व्यय को अस्वीकृत किया जाता था परन्तु उस आदेश को निरस्त करने के निवेदन पर ध्यान देते हुए सरकार ने इसके लिए ग्राम पंचायतों के द्वारा र . २० और नगरपालिकाओं के द्वारा रु . ५० की सीमा तक होनेवाले खर्च को मान्य रखा था
 ( ६ ) राज्य के या केन्द्र के मंत्रियों के स्वागतार्थ किये जानेवाले व्यय को अस्वीकृत किया जाता था परन्तु उस आदेश को निरस्त करने के निवेदन पर ध्यान देते हुए सरकार ने इसके लिए ग्राम पंचायतों के द्वारा र . २० और नगरपालिकाओं के द्वारा रु . ५० की सीमा तक होनेवाले खर्च को मान्य रखा था
 ( ६ ) राज्य के या केन्द्र के मंत्रियों के स्वागतार्थ किये जानेवाले व्यय को अस्वीकृत किया जाता था परन्तु उस आदेश को निरस्त करने के निवेदन पर ध्यान देते हुए सरकार ने इसके लिए ग्राम पंचायतों के द्वारा र . २० और नगरपालिकाओं के द्वारा रु . ५० की सीमा तक होनेवाले खर्च को मान्य रखा था
ऐसे मानचित्रों के प्रत्येक संच के लिए जिलाधीश ने रु . ८०/- के व्यय की अनुमति माँगी
 ( १३ ) एक पंचायत संघ की परिषद ने अपनी नवम्बर १९६१ की बैठक में ( ऐसी बैठक में संबंधित क्षेत्र के उप समाहर्ता अध्यक्षपद पर रहते हैं ) कार्यसूची में निर्धारित भूमिकर पर प्रति रुपया ५० पैसे का स्थानीय उपकर लेना घोषित किया था
जैसे , राज्य कृषि परामर्शक निगम ने ( स्टेट एग्रीकल्चर एडवाजरी बोर्ड ने ) ३ जनवरी १९६४ में आयोजित पाँच बैठकों में पंचायत संघ के स्तर पर कृषि उत्पादन समिति की रचना करने के लिए सूचित किया था
इसके अतिरिक्त इस समिति की बैठक हर माह आयोजित होती रहे और ब्लोक क्षेत्र में कृषि से संबंधित उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए ध्यानाकर्षण करने को बताया गया था
इस प्रकार वे सभी गाँवों के समान ही हैं , क्योंकि उनके अधिकांश निवासी कृषि पर निर्भर हैं और अन्य ग्रामीण व्यवसाय या अर्थाजन में प्रवृत्त हैं
इनमें से दो सबसे बडे क्षेत्र अझाकीयापांडीपुरम् ( ८२ . ३५० वर्ग मील ) और पुनामान आरुविकारा ( ६७ . ९४३ वर्ग मील-इन में से ४० वर्ग मील के क्षेत्र में जंगल ) हैं
अन्य अधिकांश पंचायतों की जनसंख्या १० , ००० से २० , ००० के बीच है और उनका क्षेत्र ३ से १५ वर्ग मील के मध्य है
इसके परिणाम स्वरूप संघ के बजट भी छोटे हैं
इस संदर्भ में पंचायत संघ के प्रबंधक बताते हैं कि व्यय लेखा द्वारा जमा-उधार निश्चित करना कठिन है
कन्याकुमारी एवं नीलगिरि जिलों को तुलना में भूमिकर कम मिलता है इसलिए इन जिलों में स्थित संघों के द्वारा इस प्रकार का अधिक अनुदान पाने के वे अधिकारी बनते हैं
इस व्यवस्था से संघ की सामान्य समस्याओं के संदर्भ में सर्वग्राही अभिगम अपनाया जा सकता है , जो केवल पंचायत अध्यक्षों की बनी हुई संघ परिषद में संभव नहीं है
इसके लिए उन्हें किराया देना पड़ता है
कृषि एवं नगर दोनों की आवश्यकताओं को हमें एक ही संस्था द्वारा पूर्ति का प्रबंध करना पडेगा
इतना ही नही , सडकें , पुल , सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश की व्यवस्था , सार्वजनिक भवन , कुँए , तालाब , नालियाँ जैसी सुविधाओं की देखभाल के पीछे हर वर्ष व्यय बढ़ता रहेगा
फिर भी कृषि विषयक विस्तृत आवश्यकताएँ और जो लोग अन्य व्यवसाय अपनाना चाहते हों उन्हें उचित मार्गदर्शन देने के प्रति हमने ध्यान नहीं दिया है
इस चुनाव के परिणामों में बहुत समानता भी सामने आई
इतना ही नहीं पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में तो प्रतिस्पर्धा सर्वथा नहीं थी
इसमें कोयम्बतूर जिले को समाविष्ट नही किया गया है , क्योंकि इस समय तक उसके परिणाम घोषित नहीं हुए हैं
उधर पंचायत संघ के ३६७ अध्यक्षों में से केवल ८१ अध्यक्ष ( २२ प्रतिशत ) ही सर्वसम्मनि से निवार्चित हुए थे , चालू अध्यक्षों में से ३८ प्रतिशत पुन: निर्वाचित हुए थे
 ( ३६७ में से १४० ) १२ , ८७८ पंचायत अध्यक्षों में से ५२३ अनुसूचित जाति के हैं और ५७ अनुसूचित जनजाति के हैं
 ( ३६७ में से १४० ) १२ , ८७८ पंचायत अध्यक्षों में से ५२३ अनुसूचित जाति के हैं और ५७ अनुसूचित जनजाति के हैं
इस विकास आयुक्त के पद पर सरकार के सचिव की नियुक्ति होती है
 ( २ ) उत्पादन कार्यक्रम के लिये पंचायत विकास परामर्शक समिति , ( उत्पादन ) ( ३ ) ठीक इसी प्रकार समाज कल्याण सेवाओं के लिए भी पंचायत विकास परामर्शक समिति ( समाज कल्याण ) है
इन समितियों की रचना एवं कार्यवाही ग्रामीण विकास एवं स्थानीय संचालन कार्यवाही क्रमांक ७९७ , ३१-३- १९६२ में प्राप्त होती है
इसमें विकास कार्यों का दायित्व खण्ड विकास अधिकारी संभालता है
वैसे समूची कार्ययोजना जिस उद्देश्य के साथ आरम्भ की गई थी उस उद्देश्य में कई काणरों से सफलता संभव नहीं हो पाई थी
इसके उपरांत सक्कोताई में स्थित तीनों पंचायतों , तिपुवानम् में स्थित एक ( ग्राम ) पंचायत , और एक चैय्युर में स्थित ( ग्राम ) पंचायत का भी गहन अध्ययन किया गया था
प्रत्येक पंचायत से पंचायत परिषद के अध्यक्ष , और ८ से १० सदस्य तथा ( ग्राम ) पंचायत स्तर के तीन अध्यक्षों के साक्षात्कार किये गये थे
इस साक्षात्कार में उत्तर देनेवाले अधिकारी एवं निर्वाचित सदस्यों में अधिकांश पुरुष ही थे , जब कि ग्रामीण स्तर पर लगभग ( ७१७ में से २५३ ) महिलाओं के भी साक्षात्कार किये गये थे
यद्यपि , इस बात को स्वीकार करना पडेगा कि ग्रीण स्तर पर साक्षात्कार देनेवालों में से लगभग ४० से ५० प्रतिशत गाँव के लोगों ने या तो उत्तर ही नहीं दिये थे , या उत्तर देने से दूर रहे थे
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनमें से लगभग सभी का कहना था कि पंचायतों के कार्यक्रमों में सब से अधिक प्राथमिकता सडकें , पेय जल एवं विद्यालयों को ही देनी चाहिए और वह दी जा रही है
सामान्य ग्रामजन या पंचायत के निर्वाचित सदस्य और जिला स्तरीय अधिकारी भी इन तीनों प्रश्नों के संदर्भ में सहमत तो थे ही परंतु साथ ही सबने बताया था कि कृषि के प्रति भी अधिकारियों को अधिक ध्यान देना चाहिए
ऐसा होते हुए भी वेल्लाकोईल पंचायती संघ की ३ पंचायतों को इनमें से अपवाद स्वरूप माना जा सकता है
इसके उपरांत पासवाने मोदककुरिची के पंचायती संघ में बनी तीन पंचायतों ने अपने ढंग से ही विकास कर अपने अपाको अपवाद सिद्ध किया है
सब से अधिक व्यय तो सडकों के निर्माण में , पुलों के निर्माण में , पानी की टंकी के लिए और पेय जल की अन्य सुविधाओं के लिए ही हुआ था
इसी प्रकार विद्यालय के भवन एवं सार्वजनिक केन्द्रों के निर्माण में भी समुचित खर्च होता था
इन हाईस्कूलों में अधिकांश उच्च विद्यालयों में सामान्य रूप से २५ से ३० अध्यापक रहते ही हैं
साक्कोताई एवं पोल्लाची पंचायत संघों को छोड़ अन्य संघों में बड़े पोलिटेकनिक एवं कोलेज भी हैं
ऐसा होते हुए भी इस संघ की पाँच नगरपंचायतों में भव्य महालय सबसे अधिक मात्रा में हैं
पंचायत संघो की बैठकें प्रति दो महीने या उससे कम समयावधि में सामान्य सभा या विशेष सभा या आपातकालीन सभा के रूप में भी आयोजित होती हैं
ऐसी तत्काल या विशेष सभाओं में कार्यसूची पर ३० से ४० विषय रहते हैं
सामान्य रूप से प्रत्येक निर्णय सर्वसम्मति से ही किया जाता है जब कि कुछ विषयों को विचारविमर्श के लिए आगे के लिए छोड दिया जाता है
अंतिम दो समितियाँ विशेषरूप से अधिकारियों की बनी होती है जब कि विद्यालय परामर्शक समिति के अध्यक्ष के पद पर पंचायत संघ के आयुक्त रहते हैं
खण्ड विकास अधिकारी ( ब्लॉक डेवलपमेन्ट ऑफिसर ) और पंचायत संघ आयुक्त के कार्यों के विषय में टिप्पणी खण्ड विकास अधिकारी के रूप में : राज्य द्वारा प्राप्त होनेवाली निधि से , संचालन व्यय के भुगतान के लिए खण्ड विकास अधिकारी सक्षम अधिकारी है
आयुक्त के अधिकार में स्थित पंचायत संघ के कर्मचारियों की संख्या एवं स्तर दोनों को परिशिष्ट-२ में दर्शाया गया है
कर्मचारियों की नियुक्ति - विशेषकर सरकार द्वारा जिन्हें वेतन दिया जाता है ऐसे विस्तार अधिकारी , ग्रामसेवक और सेविकाएँ , प्रबंधक आदि की नियुक्ति अधिक कठिनाइयाँ पैदा करती है
इन पंचायत संघों के खर्च में भी बहुत बडा भेद पाया जाता है
इसके अलावा प्रति माह भी संघों के व्यय में परिवर्तन होता दिखाइ देता है
कार्यक्रम सडकों का निर्माण , पेय जल की परियोजनाएँ और विद्यालय के भवन , नई सडकों का निर्माण किस स्थान पर कितना करना , पेयजल की सुविधाएँ किस तरह पहुँचाना , और विद्यालयों के नये भवनों के निर्माण आदि के लिए पंचायत संघ स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं
ऐसे स्वतंत्र निर्णय लेने पर भी संघ के कर्मचारी , विशेष रूप से आयुक्त एवं संघ के इन्जिनियर का अभिमत महत्त्वपूर्ण बनता है
इसलिए जो क्षेत्र स्थानीय आर्थिक योगदान नहीं दे पाते उन्हें इसका लाभ तुलना में कम मिलता है या बिल्कुल नहीं मिलता
यद्यपि सर्वेक्षक इसकी जानकारी नही पा सके हैं कि गाँव या कस्बे स्वयं को प्राप्त धनराशि का किस सीमा तक उपयोग कर पाते हैं
महत्त्वपूर्ण हरी खाद की परियोजना के पीछे जानबूझकर व्यय कम किया गया है , क्योंकि , यह बडा कठिन कार्य है
इसलिए अगर प्रशिक्षकों को पाठ्यक्रम के संदर्भ में अधिक स्वतंत्रता एवं सुविधाएँ दी जाएँ तो ये केन्द्र ग्रामीण जीवन में अधिक योगदान दे सकेंगे
इस समय अधिकांश केन्द्र , पंचायत संघों के कार्यालय एवं पंचायतों के द्वारा चलाए जा रहे विद्यालय आदि संस्थाओं के लिए उपस्कर बनाते हैं
इसके साथ यह स्मरण में रखना चाहिए कि मिट्टी के कामका उद्योग , कुम्हारों के लिए सामान्य सुविधाकेन्द्र , बैलों से चल रहे कोल्हू के लिए सहकारी संस्थाएँ और धान कूटने के उद्योगों की समस्याएँ भी भिन्न होती हैं
इसके अलावा रोजगारी देनेवाले उद्योगों को अन्य कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है , जैसे धान कूटने के उद्योग में कच्ची सामग्री की कमी , क्योंकि इस समय तो चावल पर ही कई क्षेत्रों में सरकारी नियंत्रण है
इसे छोडकर अन्य सभी नौ पंचायत संघ तंजावुर , कोयम्बतूर एवं उत्तरी आर्कोट जिले की दोनों ओर स्थित है
एक विशेष नियम द्वारा जिला विकास परिषदों का गठन हुआ है फिर भी मूलत: ये , परामर्श देनेवालीं एवं अभिशंसा करनेवाली संस्थाएँ हैं
