तब रास्ते में वे ब्रिटेन में भी रुके थे
उस समय के सम्पादकीय आलेखों से लगता है कि तभी से उन्हें कुछ अवतारपुरुष सा समझा जाने लगा था
समारोह में बोलते हुए गांधीजी ने कहा कि उन्होंने सोचा था कि देश आकर उन्हें दक्षिण आफ्रिका से कहीं अधिक आत्मीयता का अनुभव होगा
और देश के साधारण जन के मानस में उनकी ऐसी पैठ हुई कि जनवरी के अन्तिम सप्ताह में , उनके मुम्बई उतरने के एक पखवाडे के भीतर , सौराष्ट्र में लोग उन्हें 'महात्मा' कहकर सम्बोधित करने लगे
उसके केवल तीन महीने बाद , लगभग एक हजार मील दूर , हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगडी में भी उन्हें 'महात्मा' कहा जा रहा था
लेकिन फिर भी शायद सभी भारतीयों को उनमें एक अवतार पुरुष और एक दिव्य आत्मा के दर्शन होते रहे
पृथ्वी के कष्टों का निवारण करने के लिए अवतार पुरुष जन्म लिया करते हैं , यह मान्यता भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन समय से चली आ रही है
इसलिए १९१५ में भारत के लोगों ने सहज ही यह मान लिया की भगवान ने उनका दु:ख समझ लिया है , और उस दु:ख को दूर करने के लिए व भारतीय जीवन में एक नया सन्तुलन लाने के लिए महात्मा गांधी को भेजा गया है
लेकिन भारतीय जीवन में कोई सन्तुलन नहीं आ पाया
हमें उसे पाने के लिए अनेक बौद्धिक प्रयत्न करने पडेंगे
वह तो एक साफ स्लेट है , जिस पर हम भद्र लोगों को आधुनिकता से सीखकर एक नया आलेख लिखना है
भारत में अंग्रेजों ने प्रथम तमिल और तेलुगू क्षेत्र और बाद में बंगाल तथा अन्य प्रदेशों पर आधिपत्य स्थापित किया
भारत में अंग्रेजों ने प्रथम तमिल और तेलुगू क्षेत्र और बाद में बंगाल तथा अन्य प्रदेशों पर आधिपत्य स्थापित किया
आज से आठ दस पीढ़ी ( पीढ़ी अर्थात् अनुमानत: तीस वर्ष की अवधि ) पूर्व के अर्थात् सन् १७५० के आसपास के भारत की राज्य व्यवस्था और सामाजिक गतिविधियों को समझने का प्रयास किया गया है
इन दस्तावेजों को लिखनेवाले व्यक्ति भारत में अलग अलग हैसियत से आये थे - यूरोपीय सरकार के सैनिकों के रूप में , वैद्यकीय अथवा मुल्की कर्मचारी के रूप में , प्रवासी के रूप में , ये व्यक्ति कभी स्व खर्च से और अधिकतर धनिक आश्रयदाताओं अथवा नई स्थापित की गई विद्वत् सभाओं ( रॉयल सोसायटीज़ ऑफ पेरिस एण्ड लंडन; द सोसायटी ऑफ आर्ट्स , लंडन आदि संस्थाओं ) द्वारा भेजे गये थे
अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में बिताया था
पर भारतीय राज-समाज की भौतिक व्यवस्थाओं को समझने का मेरा वह प्रयास भी अधिकतर लोगों को विचित्र ही लगा था
यह सब जानकारी आज किस काम आने वाली है ? यह सब जानने का लाभ क्या है ? ऐसा अक्सर लोग पूछते रहते हैं
जवाहरलाल नहेरू की मानें तो वे साधारण लोग तो अभी सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में ही रह रहे हैं
हममें से कुछ लोग शायद मानते हों कि वे स्वयं भारतीय मानस , चित्त व काल की सीमाओं से सवर्था मुक्त हो चुके हैं
अपने स्वाभाविक देश काल की सीमाओं-मर्यादाओं से निकलकर किसी और के युग में प्रवेश कर जाना असाधारण लोगों के बस की भी बात नहीं होती
भारत के बड़े लोगों ने आधुनिकता का एक बाहरी आवरण सा जरूर ओढ़ रखा है
यह तो अस्सी करोड़ लोगों की कथा है
भारतीयता की मर्यादाओं से मुक्त हुए ये लाखेक आदमी जाना चाहेंगे तो यहां से चले ही जाएंगे
जिनका भारतीयता से नाता पूरा टूट चुका है , वे तो बाहर कहीं भी जाकर बस सकते हैं
अठारहवीं सदी के स्वदेशी राज-समाज को समझने का मेरा प्रयास एक मार्ग था
अपनी दृष्टि से अपने और आधुनिक विश्व को समझने की बजाय आधुनिकता की दृष्टि से अपने साहित्य को पढ़ा जा रहा है
पिछले दो-एक सौ साल में पश्चिम वालों ने भारत के बारे में जानने की कोशिश की है
भारतीय विद्याओं को पढ़ने-पढ़ाने की जो पारम्परिक व्यवस्थाएं हुआ करती थीं उनके साथ इनका कोई सम्बन्ध नहीं था
पश्चिम व विशेषत: लन्दन के उस समय के विद्या संस्थानों के अनुरूप ही भारत के इन नए विद्या संस्थानों का गठन किया गया था , और वहीं की विद्या धाराओं से किसी प्रकार अपनी विद्याओं को जोड़ना ही शायद इनका प्रयोजन था
उदाहरण के लिए , वाराणसी में 'क्वीन्झ कॉलेज' नाम का एक संस्थान वारेन हेस्टिंग्ज के समय में बना था
पश्चिम व विशेषत: लन्दन के उस समय के विद्या संस्थानों के अनुरूप ही भारत के इन नए विद्या संस्थानों का गठन किया गया था , और वहीं की विद्या धाराओं से किसी प्रकार अपनी विद्याओं को जोड़ना ही शायद इनका प्रयोजन था
लेवी स्ट्रॉस धाकड विद्वान हैं , इसलिए वे अपनी बात स्पष्ट कह जाते हैं
गीताप्रेस गोरखपुर वाले तो बहुत सारे प्राचीन साहित्य का सरल हिन्दी अनुवाद कर उसे सामान्यजनों तक पहुंचाने का अथक प्रयास किए जा रहे हैं
उदाहरण के लिए श्री श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के पुरुष-सूक्त के अनुवाद व भाष्य को देखिए
श्री सातवलेकर तो आधुनिक भारत के महर्षि जैसे माने जाते हैं
उनका परिश्रम , उनकी विद्वत्ता और भारत की प्रज्ञा में उनकी निष्ठा सब उंची कोटि की थी
अपने पूर्वजों और उनका साहित्य तो अपने भारतीय चित्त व काल के ही साक्षी हो सकते हैं
मान लिया जाए कि प्रत्येक सूची में सौ-दो सौ के लगभग पांडुलिपियां होंगी तो इन सूचियों में दर्ज पांडुलिपियों की गिनती दो-चार लाख बैठती है
इन पांडुलिपियों को पढ़ा ही नहीं जा सकता तो उनकी ये सूचियां हम किस लिए बना रहे हैं ? वैसे तो ऐसा भी माना जाता है कि भारतीय भाषाओं की कुल पचास करोड़ के आस-पास पांडुलिपियां इधर-उधर पड़ी होंगी
लेकिन उन समाजों में भी अधिकतर काम तो मुख्य धारा में , एक विशेष दिशा में , एक-दूसरे को समर्थन देते हुए , एक-पर-एक को जोड़ते हुए ही किए जाते हैं
हमारे यहां तो भारतीय विद्या पर होने वाले कामों की कोई मुख्य धारा ही नहीं हैं , कोई दिशा ही नहीं है
हमें अपने चित्त व काल को समझना है , अपने दो पैरों पर खड़े होने के लिए कोई धरातल बनाना है , तो इस तरह की दिशाहीन विद्वत्ता से कुछ नहीं बनेगा
ये काम तो दो-चार साल में ही पूरे किए जाते हैं , और ऐसे किए जाते हैं कि छह-सात महीनों में ही अपनी कोई रूपरेखा उभरने लगे
लेकिन संस्कृत जानने वाले कितने लोग हैं इस देश में ? यहां तो अब संस्कृत में डाक्टरेट भी संस्कृत सीखे बिना ही मिल जाती है , अंग्रेजी में प्रबन्धग्रन्थ लिखकर ही संस्कृत की डाक्टरेट हो जाती है
अब संस्कृत पढने वाले विद्वान तो शायद जर्मनी में ही मिलते हैं
अपनी दिशा ढूंढने के काम कोई सदियों में नहीं किए जाते
पिछले दिनों तमिल पत्र 'दिनमणी' के पूर्व सम्पादक और वयोवृद्ध विद्वान श्री शिवरमण से भेंट हुई
जिस अवस्था में हम हैं , वहीं से चलना पड़ेगा
अपने चित्त व काल का अपना कोई चित्र नहीं है
सही गलत का जैसे कोई विवेक ही न बचा हो
तब आंध्रप्रदेश के उस समय के राज्यपाल शृंगेरी के शंकराचार्य से मिलने गए थे
इस पर राज्यपाल ने आचार्य से कहा कि वर्णव्यवस्था की बात तो आप मत ही करें
बाद में वे अपने अनुज आचार्य से बोले कि देखो कैसा समय आ गया है ? वर्ण पर अब बात भी नहीं की जा सकती
लेकिन वर्जित करराज्यपाल का इस विषय पर चर्चा होना तो अजीब है
राज्यपाल इतना भी नहीं समझते थे कि समाज संरचना के बारे में धर्माचार्यों को अपने मन की बात कहने से रोका नहीं जाता
उनका उत्तरदायित्व तो अपनी परम्परा और अपने समाज तक ही सीमित है
अपनी परम्परा और अपने समाज के चित्त को अपनी समझ के अनुसार अभिव्यक्त करते रहना उनका कर्तव्य है
अहिंसा में उनका अटूट विश्वास था
और अहिंसापालन की दृष्टि से वे किसी मोची के हाथ के गढ़े चमड़े के जूते पहनने की बजाय बाटा के बने रबड़ के जूते पहनते थे
लेकिन शायद हम आचरण , व्यवहार और काम-धंधे चलाने की क्षमता को भी शिक्षा नहीं मानते
अक्षर ज्ञान को ही शिक्षा मानते हैं , और उस दृष्टि से देखकर पाते हैं कि भारत के ६० , ७० , या ८० प्रतिशत लोग अशिक्षित ही हैं
ये सब तो व्यक्ति के अपने उपक्रम हैं , परमात्मा के दिए सनातन सत्य जैसे तो वे नहीं हो सकते
पर सैद्धांतिक ढांचे तो सब ऐसे ही होते हैं
भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बदल जाते हैं , राजनीति विज्ञान की मौलिक परिभाषाएं बदल जाती हैं , दर्शनशास्त्र की दिशा बदल जाती है
भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बदल जाते हैं , राजनीति विज्ञान की मौलिक परिभाषाएं बदल जाती हैं , दर्शनशास्त्र की दिशा बदल जाती है
प्रश्न उठने लगेंगे तो उत्तर भी निकलते आएंगे
रामचंद्रजी जब चित्रकूट से आगे बढ़ते हैं तो रास्ते में खूब अस्त्र-शस्त्रों से लैस होते चले जाते हैं
तब सीता उन्हें कहती हैं कि यह क्या हो गया है आपको ? वन में तो ऐसे नहीं रहा जाता
भरद्वाज पूछते हैं कि आपके अनुसार चतुर्वर्ण-व्यवस्था में एक वर्ण दूसरे वर्ण से सर्वथा भिन्न होता है
प्रश्न उठाते रहने के उस तरीके को हमने कहां खो दिया है ? उन बड़े प्रश्नों को उठाना ही हम एक बार फिर शुरू कर दें तो हमारा सहज विवेक लौट ही आएगा
४ . अपने चित्त को समझे बिना हमारा काम नहीं चलेगा अपने चित्त , मानस व काल का सहज धरातल हमसे छूट गया है
४ . अपने चित्त को समझे बिना हमारा काम नहीं चलेगा अपने चित्त , मानस व काल का सहज धरातल हमसे छूट गया है
फिर जो बातें इस साहित्य में बहुत मौलिक दिखाई देती हैं , जो सारे कथ्य का आधार सी लगती हैं , और जो विभिन्न प्रकार के साहित्य में बार बार दोहरायी जाती हैं , वे बातें तो शायद भारतीय चित्त व काल की सहज वृत्तियों की परिचायक ही होंगी
जैसे पुराणो में सृष्टि के सर्जन और विकास की कथा है
वैसे हर सभ्यता की सृष्टि की अपनी एक गाथा होती है , और वह गाथा शायद उस सभ्यता की मूल वृत्तियों को बहुत गहराई से प्रभावित किया करती है
पर प्रत्येक बड़े आवर्तन के भीतर अनेक छोटे आवर्तन-प्रत्यावर्तन होते रहते हैं , बार बार सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश होते रहते हैं
ब्रह्म की वह अभिव्यक्ति ही सृष्टि है और उस अभिव्यक्ति का संकुचन ही प्रलय है
ब्रह्म की वह अभिव्यक्ति ही सृष्टि है और उस अभिव्यक्ति का संकुचन ही प्रलय है
पर ब्रह्म की यह लीला अनादि और अनन्त है यह विचार प्राय: भारतीयों के चित्त में रहता ही है
और सृष्टि का यह आरम्भिक काल आनन्द का काल है
इस युग में सृष्टि अभी बहुत सहज रूप में है
मद , मोह , लोभ , अहंकार , जैसे भाव उत्पन्न ही नहीं हुए
इस सहज आनन्दमयी सृष्टि में ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं है
आनन्द का यह युग बहुत लम्बे समय तक चलता है
और इस तरह चलते चलते कृत का अन्त होता है और त्रेता का आरम्भ
त्रेता में उसके तीन ही पांव रह जाते हैं
अपेक्षाकृत अस्थिरता की इस स्थिति में धर्म पर टिके रहने के लिए मानव को एक राजा और एक वेद की प्राप्ति होती है
पर अभी ये विकार प्राथमिक अवस्था में ही हैं और उन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है
हल चलाने , बीज बोने , निराई-गुड़ाई आदि जैसी क्रियाओं की अभी जरूरत नहीं
उस अनाज से , और वृक्षों के फलों और मेवों आदि से जीवन चलता है
सीमित आवश्यकताओं के इस युग में मानव कुछ कला , कौशल व तकनीकें सीखने लगता है
त्रेता में मानव तीन वर्णों में बंट जाता है
ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों त्रेता में उपस्थित हैं
पर त्रेता का काल कृत के काल का तीन चौथाई ही है
भारतीय दृष्टि से जिसे इतिहास कहा जाता है उसका आरम्भ भी द्वापर से ही होता दीखता है
सृष्टि की इस जटिलता में जीवन यापन के लिए अनेक कलाओं और तकनीकों की जरूरत पड़ती है
रामायण में धर्म का ही साम्राज्य है
क्रूरता उनके स्वभाव में निहित है
धर्म की हानि और क्षत्रियों की ईर्ष्या , लोभ व क्रूरता के इस सन्दर्भ में ही पृथ्वी विष्णु से जाकर प्रार्थना करती है कि इतना अधिक बोझ अब उससे सहा नहीं जाता और इस बोझ को हल्का करने का कोई उपाय होना चाहिए
वह भी कुछ ही सालों में सर्पविष से मारा जाता है
उनका पोता परीक्षित महाभारत युद्ध में हुए सर्वनाश से किसी तरह बच गया था
पौराणिक गणना के अनुसार श्रीकृष्ण के अवसान के साथ द्वापर का अन्त होकर कलियुग आरम्भ होता है
कहा जाता है कि महाभारत का युद्ध द्वापर के अन्त और कलियुग के आरम्भ से ३६ साल पहले हुआ
कलियुग को कुल ४ , ३२ , ००० साल तक चलना है , ऐसा कहा गया है
गिरावट की ओर , विभाजन की ओर चलते जाने की मूल वृत्ति को तो कर्ता के अंशावतार भी नहीं बदल पाते
वे भी सृष्टि की गिरावट की अवस्था में जीवन को सम्भव बनाने , धर्म का कुछ सन्तुलन बनाए रखने की व्यवस्था मात्र करते हैं
पूरे ४३ , २० , ००० साल इसे पूरा होने में लगते हैं
पर प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्मा के तो एक दिन में ऐसे १००० चतुर्युग होते हैं
हर नए आवर्तन में सृष्टि के सतत गिरावट की ओर ही बढ़ते जाने की बात भी आधुनिकता की विश्वदृष्टि में जमती नहीं
इसलिए इस बात पर भी विचार करना पडेगा कि व्यवहार में भारतीय मानस पर छाए विचारों और काल की भारतीय समझ के क्या अर्थ निकलते हैं ? किस प्रकार के व्यवहार और व्यवस्थाएं उस मानस व काल में सही जंचते हैं ? सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि मानवीय जीवन और मानवीय ज्ञान की क्षुद्रता का जो भाव भारतीय सृष्टिगाथा में स्पष्ट झलकता है , वह केवल अकर्मण्यता को ही जन्म दे सकता है
भारतीय परम्परा में किसी समय विद्या और ज्ञान का इन दो धाराओं में विभाजन हुआ है
जो विद्या इस नश्वर , सतत परिवर्तनशील , लीलामयी सृष्टि से परे के सनातन ब्रह्म की बात करती है , उस ब्रह्म से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है , वह परा विद्या है
क्योंकि त्रेता में एक ही वेद है और उसका कोई विभाजन नहीं हुआ है
उपनिषदों में तो केवल परा ज्ञान की ही बात है , पर वेदों में अन्य स्थानों पर ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो सीधे अपरा से ही सम्बन्धित हैं
इस सबके बावजूद सामान्य भारतीय चित्त में परा और अपरा के बीच की विभाजन रेखा बहुत गहरी दिखती है
साधारण बातचीत में पुराणों का प्रसंग आने पर लोग प्राय: कह देते हैं कि इन किस्से-कहानियों को तो हम नहीं मानते , हम तो केवल वेदों में विश्वास रखते हैं
अपरा विद्याएं सब निकृष्ट ही हैं और वास्तविक ज्ञान तो परा ज्ञान ही है ऐसा कुछ भाव भी भारतीय चित्त में बना रहता है
इस सृष्टि में दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए परा के बारे में चेतन रहना चाहिए
इस समय साधारण भारतीय चिन्तन में परा और अपरा के बीच कुछ असन्तुलन सा है
विद्वत्ता की शायद यह सामान्य प्रवृत्ति ही है कि साधारण जीवन से परे की अमूर्त व गूढ़ बातें उसमें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं
परा के जो जितना नजदीक है उतना वह ऊँचा है , और जो अपरा से जितनी गहराई से जुड़ा है , उतना वह नीचा है , इसलिए वेदाध्ययन , वेदपाठ आदि करने वाले ब्राह्मण सबसे ऊँचे हो गए , और सामान्य जीवन के लिए आवश्यक विभिन्न विद्याओं , कलाओं और शिल्पों का वहन करने वाले शूद्र सबसे नीचे
एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते हैं कि यह ऊंच-नीच वाली बात कहां से आ गई ? मनुष्य तो सब एक से ही लगते हैं , वे अलग-अलग कैसे हो गए ? महात्मा गांधी भी यही कहा करते थे कि वर्णों में किसी को ऊंचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता
एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते हैं कि यह ऊंच-नीच वाली बात कहां से आ गई ? मनुष्य तो सब एक से ही लगते हैं , वे अलग-अलग कैसे हो गए ? महात्मा गांधी भी यही कहा करते थे कि वर्णों में किसी को ऊंचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता
पुरुष सूक्त में यह अवश्य कहा गया है कि ब्रह्मा के पांवों से शूद्र उत्पन्न हुए , उसकी जंघाओं से वैश्य आए , भुजाओं से क्षत्रिय आए और सिर से ब्राह्मण आए
पर इस सूक्त में यह तो कहीं नहीं आया की शूद्र नीचे हैं और ब्राह्मण ऊंचे हैं
एक स्तर पर कर्म फल का विचार भारतीय मानस में बहुत गहरे अंकित है
करुणा , दया , न्याय , आदि जैसे भावों को भूल जाना तो कर्मफल के सिद्धांत का उद्देश्य नहीं हो सकता
ये सभी काम यदि उसी तरह ध्यान से , तन्मयता के साथ किए जाते हैं तो ऊँचे कर्म बन जाते हैं
उन्होंने पाया कि कोई चिड़िया उनके सिर पर बीट कर गई है
चिड़िया वहीं भस्म हो गई
गृहिणी ने कहा , 'महाराज , अकारण रुष्ट मत होइए
यह पौराणिक कथा कर्मफल के सिद्धांत की एक व्याख्या प्रस्तुत करती है
ब्रिटिश बंगाल सेना के मेजर जेम्स फ्रेंकलिन ने ई . १८२९ के आसपास मध्य भारत में लोहा बनाने की विधियों के बारे में लिखा
साथ ही , इन इलाकों में लोहे की भट्टियों की शृंखला होने की भी सूचना देते हैं
इसमें कच्चा माल , भट्ठी ईंधन , निर्माणविधि आदि का विवरण था , ताकि ब्रिटिश लोहानिर्माता एवं लोहाव्यापारी उस ज्ञान का लाभ उठा सकें
कलियुग की , शूद्रों की और स्त्रियों की जय बुलाते हुए महर्षि व्यास कलियुगी काल की एक व्याख्या कर रहे हैं
और उस व्याख्या के माध्यम से धर्म की ग्लानि के इस काल को साधारणजन के लिए कुछ सहज , कुछ सहनीय बनाए दे रहे हैं
गांधीजी भी कुछ ऐसी ही बात किया करते थे कि इस काल में तो हम सबका शूद्रों जैसा होना ही सही है
प्राणिमात्र के लिए मन में करुणा , दया व सम्मान का भाव रखने की है
आज के सन्दर्भ में भारतीय मानस व काल को प्रतिष्ठापित करना ही विद्वत्ता का , या भारतीय राजनीति का , या भारतीय कला-कौशल का कार्य है
ऐसा हो सकता है कि आज भारत के सभी वासी भारतीय चित्त , मानस व काल की परम्परागत समझ में विश्वास न रखते हों
पर जो लोग पुराणों आदि को न मानने का दावा करते हैं उनमें से बहुतेरे प्राय: अपने अपने जाति पुराणों में तो विश्वास रखते ही हैं
ऐसा माना जा सकता है कि भारत के अधिक से अधिक आधा प्रतिशत लोगों को छोडकर बाकी का आधुनिकता की बीसवीं-इक्कीसवीं सदी से कुछ लेना देना नहीं है
उनकी अपनी पहचान खो-सी गई है और अपनी अस्मिता की इस हानि से भारत के सभी साधारणजन पीड़ित हैं
इन सब प्रयत्नों से भारतीय मानस का ऐसा पश्चिमीकरण हो पाता जिससे भारत के साधारणजन सहजता से यूरोप की २१ वीं सदी से जुड़ सकते , यह भारत की समस्याओं का एक समाधान तो होता
भारत के लोग भी पश्चिम के लोगों की तरह अपने आपको एक सर्वशक्तिमान व्यवस्था के दास जैसा मानने लगते
भारतीय सभ्यता का पश्चिमीकरण संभव नहीं तो फिर हमें अपने चित्त व काल के धरातल पर ही खड़ा होना पड़ेगा
या जैसे श्रीकृष्ण अर्जुन को विश्वदर्शन करवा रहे हैं और उस विश्वदर्शन के आधार पर अर्जुन को अपनी दुविधा से निकलने का रास्ता बता रहे हैं
लेकिन निर्धारित दिशा में सभ्यता को चलाने का काम गृहस्थों का होता है
जो पांडित्य में ऊँचे हैं , या पाकशास्त्र में निपुण हैं , या खेती में लगे हैं या विभिन्न शिल्पों में दक्ष हैं , या आज के विज्ञान और आज की तकनीकों में दक्ष हैं , या राज्य व दंड व्यवस्था चलाना जानते हैं , या वाणिज्य में लगे हैं , ये सब गृहस्थ मिलकर ही सभ्यता को चलाते हैं
आज के समय को भारतीय सभ्यता के लिए संकट का काल माना जाना चाहिए
समय समय पर विभिन्न सभ्यताओं को अपनी मौलिक मान्यताओं को फिर से समझकर अपने भविष्य की दिशा ढूंढने का काम करना ही पड़ता है
अपने इतिहास व अपने साहित्य का एक सिंहावलोकन-सा करके अपने चित्त व काल की एक प्रारम्भिक समझ बनानी है
अपने आप में , अपने चित्त व काल में स्थित और अपनी दिशा में अग्रसर भारतीय सभ्यता का आज के विश्व के साथ क्या सम्बन्ध होगा और उस सम्बन्ध को कैसे स्थापित किया जाएगा , उसकी कुछ अल्पकालीन योजना भी हमें बनानी पड़ेगी
आरम्भ में तो कोई ऐसा मार्ग निकालना ही पड़ेगा कि विश्व हमारे कामों में आड़े नहीं आए , और आज के विश्व के साथ कोई अकारण का झगड़ा नहीं हो
अपने ही समय में , अभी पचास-साठ वर्ष पहले जब महात्मा गांधी इस देश को अपनी ही एक दिशा में ले चले थे , तब विश्व के बहुतेरे लोगों को लगने लगा था कि भारत पूरी मानवता को एक नया मार्ग दिखा देगा
लक्ष्य क्या हैं और कौन - से हो सकते हैं और उनमें कुटिल पथ कौन-सा है और ऋजु पथ कौन-सा है , यह विचार करते रहने की अपनी परंपरा रही है
स्वयं वाणी को भी द्वार एवं पथ कहा गया है , अत: विचार एवं वाणी के स्तर पर हम पथ का अन्वेषण करें और उसी प्रक्रिया में कर्म पथ की भी खोज होती चले , यही हमारे यहां प्रत्येक विद्या प्रक्रिया का लक्ष्य रहा है
स्वयं वाणी को भी द्वार एवं पथ कहा गया है , अत: विचार एवं वाणी के स्तर पर हम पथ का अन्वेषण करें और उसी प्रक्रिया में कर्म पथ की भी खोज होती चले , यही हमारे यहां प्रत्येक विद्या प्रक्रिया का लक्ष्य रहा है
स्वयं वाणी को भी द्वार एवं पथ कहा गया है , अत: विचार एवं वाणी के स्तर पर हम पथ का अन्वेषण करें और उसी प्रक्रिया में कर्म पथ की भी खोज होती चले , यही हमारे यहां प्रत्येक विद्या प्रक्रिया का लक्ष्य रहा है
इतिहास और वर्तमान का विचार और स्मरण करते हुए हमें भविष्य की संभाव्यताओं के बारे में सोचना होगा
अपने बृहत समाज से और अपनी समष्टि चेतना से , बृहत् ऋत से , विराट भाव से अपने सम्बन्ध की सम्यक पहचान की व्यग्रता ही तो वास्तविक बौद्धिक व्यग्रता है
महात्मा गांधी ने सन् १९०९ ईस्वी में 'हिन्द स्वराज' लिखा था , जिसमें भारत और योरप की टकराहट को दो सभ्यताओं की टकराहट के रूप में देखा-बताया गया था
१९२० और १९३० ईस्वी वाले दशकों में गांधीजी ने भारतीय समाज की दशा के बारे में और योरप , विशेषत: इंग्लैंड से विभिन्न क्षेत्रों में उसकी तुलना के बारे में प्रभूत सामग्री लिखी ही थी , अन्य लोगों ने भी ऐसी सामग्री बडी मात्रा में प्रकाशित की थी
उहारणार्थ 'यंग इंडिया' में ई . १९२० के दशक के प्रारंभिक वर्षो में ही गांधीजी ने इन विषयों पर बहुत से लेख लिखे व प्रकाशित किये थे - १८ वीं शती ईस्वी के उत्तरार्द्ध और १९ वीं शती ईस्वी के प्रारंभिक काल में स्वदेशी भारतीय शिक्षा की दशा , अंग्रेजों के आने से पूर्व की भारतीय सामाजिक जीवन दशाएँ और उनके प्रभुत्व-काल में बढी भारतीय समाज की दरिद्रता और दुर्दशा , १८०० ईस्वी तक दक्षिण भारत में तथाकथित अन्त्यज लोगों ( जिसमें दो चार जातियाँ ही आती थी ) की अथवा महाराष्ट्र में महारों की अपेक्षाकृत अधिक अच्छी स्थिति जो ब्रिटिश आधिपत्य होने पर बिगड़ती चली गयी तथा अन्य ऐसे ही विषय
सर शंकरन नायर ब्रिटिश वायसराय की कौंसिल के एक सदस्य थे
सर शंकरन नायर ने ईस्वी १९१९ में लिखा था कि अन्त्यज आदि की सामाजिक आर्थिक दशा में मुख्य गिरावट विगत डेढ सौ वर्षों में ही हुई है तथा भारतीय समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में उल्लेखनीय ह्रास इसी अवधि में हुआ
परंतु गांधीजी ने १९०९ ईस्वी में ही 'हिन्द स्वराज' लिखा और हम सब भलीभाँति जानते हैं कि उसमें तथा अपनी अधिकांश कृतियों में गांधीजी ने सदा संतुलित रूप में भारतीय समाज एवं राजनीति-तंत्र की एक ऐसी समग्र छवि , एक ऐसा रूप संकेत प्रस्तुत करने का उद्यम किया , जो कि उन्होंने इस समाज के सुदीर्घ अतीत से गतिशील जीवन के बारे में समझा था
हम यहां स्मरण करें कि 'हिन्द स्वराज' में असहयोग पर लिखते हुए गांधीजी ने संकेत दिया था कि यह परंपरा भारत की स्वाभाविक परंपरा है और यह भारत में सदा से विद्यमान रही है
निश्चित ही , गांधीजी के नेतृत्व में भारत जो कुछ कर पाया और प्राप्त कर सका , उसके मूल में गांधीजी की भारतीय समाज से यह सहज एकात्मता ही नहीं थी , उनकी संगठन क्षमता तथा आध्यात्मिक व बौद्धिक सामर्थ्य भी इस सफलता व उपलब्धि का आधार रही
इस वर्ग ने अंग्रेजों के आचार-व्यवहार को और बोली या अभिव्यक्ति की विधियों को अंगीकार कर लिया था तथा ब्रिटिश संकल्पनाओं या अवधारणाओं एवं जीवन-रूपों के अनुरूप अपने निजी एवं सामाजिक जीवन को ढालने के लिए अग्रसर था
यह भी सत्य हो सकता है कि जिन प्रमुख अभिजनों ने गांधीजी का नेतृत्व स्वीकार किया और उसके द्वारा राज-सत्ता एवं राजनैतिक सत्ता प्राप्त की , वे गांधीजी की भारतीय समाज की समझ को बहुत गंभीरता से नहीं ग्रहण करते थे और वे यह स्वीकार कर पाने में भी असमर्थ थे कि वैसा कोई भारतीय समाज आधुनिक विश्व में व्यवहार्य हो सकता है
इसमें तो आज कोई संदेह नहीं है कि यह अभिजात वर्ग भारतीय अतीत को आत्मसात् नहीं कर सका और भारत का भविष्य उसके अनुरूप रचने की नहीं सोच सका
किन्तु यदि उसमें तनिक भी सृजनात्मक सामर्थ्य होती , तो वह उस जानकारी को तो आत्मसात् कर ही सकता था , जो उसने पश्चिम से ग्रहण की थी और फिर इस जानकारी या सोच को वह भारतीय प्रत्ययों एवं अभिव्यक्ति रूपों में ढाल सकता था
लेकिन यह सृजनात्मक अक्षमता हमारे शक्तिशाली वर्ग या अभिजात वर्ग में ब्रिटिश काल में ही आई दिखती हो , ऐसा शायद नहीं है
इसमें तो आज कोई संदेह नहीं है कि यह अभिजात वर्ग भारतीय अतीत को आत्मसात् नहीं कर सका और भारत का भविष्य उसके अनुरूप रचने की नहीं सोच सका
संभवत: ऐसा ही होता हो कि प्राय: सभी सभ्यताओं में ऐसे अंतराल आते होंगे जब बृहत समाज और राज्य से उसके सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो जाते हों अथवा निष्प्रभावी या व्यर्थप्राय हो जाते हों - या प्रसुप्ति की दशा में जा पड़ते हों
पर इसके साथ ही , वह वैर-भाव या युद्ध-भाव को नित्य मानने की कल्पना भी नहीं कर पाता
सबका सह-जीवन , सह-अस्तित्व , अपने संपूर्ण वैविध्य , समस्त बहुरूपता एवं रूप- भेद , गुण-लक्षण-क्रिया भेद के साथ अपने-अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हो सकेगा , यह शायद भारतीय मानस का स्थायी भाव है
उस स्थिति में यदि पराजित , तेजहत भारतीय चित्त अपने समय और अपने सम्मुख उपस्थित संसार के इस स्थायी वैरभाव को समझ पाने को तैयार न हो , तब उसका स्थायी शांति-भाव तेजहीन होकर एक तरह से स्वयं को ठगने का विचार-जाल रचता है
सत् और असत् में , स्व और पर में , स्वधर्म और विधर्म में , धर्म और अधर्म में भेद करने का सामर्थ्य ही विवेक है
परमार्थत: अद्वैत जो सत्ता है , उसका ज्ञान इस भेद-बोध सम्पन्न विवेक के बिना असंभव है
विवेक के अभाव में अद्वैत ज्ञान नहीं होता , किन्तु अद्वैतवाद का शब्दजाल , जिसे आदि शंकराचार्य ने चित्त को भटका डालने वाला महावन कहा है , प्रबल हो उठता है
अद्वैत-बोध सात्विक तेज है , अद्वैतवाद तामसिक प्रमाद
पराजित समाज में जब अपनी विद्या-संस्थाएं नहीं रह जातीं , जब बोध की साधना का पथ विलुप्त हो जाता है और पंथ नहीं सूझता , चित्त-भूमि जब बाहरी खरपतवारों से संकुल हो उठती है , तब अद्वैतवादी प्रमाद अपने समय के संसार के सत्य को जानने में बाधक बनता है
प्रमादपूर्ण अद्वैतवाद से भरे मानस में संसार को ठीक से जानने के प्रति अनिच्छा का उभार हो जाना विशिष्ट भारतीय विकृति है
पराजित भारतीय चित्त की बात उठने पर , उसके स्वरूप को तथा पराजय से उभरने की उसकी सतत चेष्टाओं के इतिहास को स्मरण करना आवश्यक है
भारतीय समाज के पास ११ वीं शती से १७ वीं शती ईस्वी तक लगातार संग्राम और बलिदान के उपरांत भी उल्लेखनीय शक्ति बची रह गई
खुदा' और 'ईश्वर' की , एकपंथवाद और सर्वपंथ-मान्यता की अवधारणाओं में तात्विक अंतर क्या है , और एकता का आधार क्या है , इस पर आध्यात्मिक-बौद्धिक विमर्श न आचार्य विद्यारण्य के संरक्षण में या नेतृत्व में कहीं हुआ , न ही समर्थ गुरु रामदास के
पंचदशी और दासबोध को पढ़ने पर यह रंचमात्र नहीं पता चलता कि इस्लाम की किन्हीं आधारभूत अवधारणाओं को कोई चुनौती समझा जा रहा है
वह सजगता होती तो विदेशी भाषा के कितने शब्दों को और किन विचारों को आत्मसात् करना है और क्यों करना है , मनुष्य के रूप में कहां उनसे हमारी एकात्मता है तथा एक भिन्न सांस्कृतिक प्रजाति या समाज के रूप में कहां नितांत विरोध , विभेद या विपरीतता है , क्या ग्रहण करना धर्म है , क्या अधर्म , किन-किन रूपों में प्रतिरोध व स्वाधीन सृजन-साधना धर्म है , आदि विषयों पर विस्तृत विचार होता , जैसे कि उन दिनों इस पृथ्वी पर अन्यत्र हो रहा था
समाज में तो भावोद्वेलन , प्रतिरोध भाव , प्रतिशोध-भाव आदि देखने को मिलते हैं , किन्तु राजनीति-तंत्र के शीर्ष नों में ये भावज पर्याप्त नहीं दिखते
अठारहवीं शती ईस्वी के आरंभ में , औरंगजेब की १७०७ ई . में मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य समाप्त हुआ , ऐसा माना जा सकता है
शिवाजी के राज्याभिषेक से लेकर १७५० ई . तक मराठे ही भारत की सबसे शक्तिशाली व विस्तृत राज्य शक्ति थे
सन् १८०३ ईस्वी तक हमारा प्रभावशाली वर्ग मानसिक पराजय स्वीकार कर चुका था
बाहरी विचार और व्यवहार को किस रूप में लेना है , उसका संपूर्ण समाज पर क्या-क्या प्रभाव पडेगा , उस प्रभाव को कैसे संतुलित रखना तथा अर्थवान बनाना है , इस पर शास्त्र-चिंतन , कोई सृजनात्मक प्रयास नहीं दिखते
ऐतिहासिक राजनैतिक घटनाओं को समझने के प्रति राजनीति तंत्र के शीर्ष जनों में या तो प्रमाद और उपेक्षा-भाव दिखता है , या फिर एक अस्पष्ट अपेक्षा-भाव
स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व कई अर्थों में इससे भिन्न था और प्रतिभा , शास्त्र-ज्ञान एवं संवेदना में भी वे अधिक उन्नत थे
स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व कई अर्थों में इससे भिन्न था और प्रतिभा , शास्त्र-ज्ञान एवं संवेदना में भी वे अधिक उन्नत थे
श्री रामकृष्ण का शरीरान्त १५ अगस्त १८८६ ईस्वी को हुआ
२६ मई १८९० को विवेकानंद ने वाराणसी के श्री प्रमदादास मित्र को एक लंबा पत्र लिखा
उसमें कहा . . . . 'यह निश्चय ही अपराध हो गया कि भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस के शरीर को चिताग्नि में समर्पित कर दिया गया , जबकि उसे समाधिस्थ किया जाना उचित होता
अच्छा हो , यदि वे पवित्र गंगा तट पर जहां पर वे साधना किया करते थे वहीं स्थल निर्मित कर सुरक्षित भूमिस्थ कर दिये जायें , इससे उस अपराध का कुछ मार्जन हो जायेगा
' . . . स्मृति-स्थल हेतु अपेक्षित भूमि लगभग पांच-सात हजार रूपयों में मिलेगी
 . . . . मेरी बुद्धि के अनुसार , कुलीन घरों के ये अच्छे , सुशिक्षित मेरे साथी युवा संन्यासी यदि श्री रामकृष्ण के आदेशों को पूर्ण करने हेतु जीवन समर्पित करने पर भी उस कार्य में आश्रय और सहायता के अभाव में विफल रहे तो यह हमारे देश का दुर्भाग्य है
परिव्राजक , यायावर , संन्यासी विवेकानंद निरंतर घूमते रहे
परिव्राजक , यायावर , संन्यासी विवेकानंद निरंतर घूमते रहे
धर्म के मामले में वे अमेरीकियों को अव्यावहारिक बताते हुए ६ मार्च १८९५ को अमरीका के अलासिंघा पेरूमल को लिखते हैं - 'धर्म में मात्र हिन्दु व्यावहारिक हैं , यांकी ( अमेरिकी ) लोग धन कमाने में व्यवहारपटु हैं
 . . . . . धीरे-धीरे शुरु करो , अपना आधार पहचानो और बढो , बढते जाओ , मेरे वीर बच्चों ! एक दिन हमें प्रकाश दिखेगा
उनके निजी अनुभवों से निकला निष्कर्ष यह है कि भारत का उद्धार तभी संभव है , जब इसकी सेवा हेतु बाहर से समर्पित व्यक्ति आएं और बाहर से धन आए
श्री रामकृष्ण परमहंस को वे क्षण भर भी नहीं भूलते
किन्तु व्यवहार-कुशल बुद्धि से वे देखते हैं कि कहां किस तरह का संवाद अर्थमय होगा , सम्प्रेष्य होगा
इन गुणों से संपन्न एक अकेली आत्मा करोडों पाखंडियों और जड क्रूरबुद्धियों के तमसावृत संकल्पों को विनष्ट कर सकती है
ऐसे तथ्यों से कम से कम हमारे भद्रलोक , हमारे अभिजात वर्ग के बारे में यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने समाज की प्रतिभा व शक्ति को पहचानने और आगे बढाने का सामर्थ्य वे खो चुके हैं
विश्व का कोई भी स्वस्थ समाज अपने महत्त्वपूर्ण मौलिक सृजनात्मक कार्य विदेशियों की सहायता से संपन्न नहीं किया करता
तुलसीदास को अवश्य अपने ही पंडित बंधुओ से सर्वाधिक प्रताडना सहनी पडती है
देश के जन साधारण में तो मौलिक दारिद्र बढ़ता ही गया किन्तु नए अभिजात वर्ग के पास कुछ धन व शक्ति तो रही ही होगी
लेकिन ऐसा लगता है कि यह वर्ग मानसिक दारिद्र से त्रस्त और मलिन हो गया था , जिसका अनुभव विवेकानंद को हुआ
उनका मत बन गया था कि ये भाषाएं मात्र स्मृति की , अतीत के ज्ञान की वाहक हो सकती हैं
राजेन्द्रलाल मित्र एक देशभक्त थे
भारत की छवि नई 'इंडोलॉजी' की रचना थी
रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसी सर्जनात्मक प्रतिभाओं ने एक विचित्र आत्मग्लानि , आत्मदैन्य और उसी के साथ योरपीय लक्ष्यों की पूर्ति में ही भारत का आत्मगौरव देखने का बौद्धिक परिवेश रचा , उसमें ही जवाहरलाल नेहरू जैसे पश्चिमीकृत व्यक्तियों का उभरना और प्रतिष्ठित होना संभव हुआ
विनोबा भावे 'गीता प्रवचन में कह गये कि वैदिक ऋषि गोमांस खाते थे और फिर इस कथन के लिए प्रमाण दिया सातवीं शताब्दी ईस्वी में भवभूति रचित उत्तर रामचरितम्' नाटक के उस अंश का , जिसका अर्थ भी अस्पष्ट है
अपनी नृतत्त्वशास्त्रीय एवं राजनैतिक मान्यताओं के कारण अंग्रेज मानते थे कि उनसे भिन्न अन्य समाज सभ्यता के विकास की पूर्व अवस्था में हैं और अपने इतिहास के कारण वे मानते थे कि आदि दशा में मनुष्य नरमांस खाते थे , तो यहां राजेन्द्रलाल मित्र जैसे परिश्रमी विद्वान यह सिद्ध करने में भी जुट गये कि हमारे यहां नरबलि प्रथा थी एवं नरमांस खाया जाता था
गोरक्षिणी सभाओं की व्यापक शृंखला स्थापित हुई , जिसमें हिन्दू , मुसलमान , ईसाई , धनी , निर्धन , नर-नारी , बाल-वृद्ध सभी सम्मिलित हुए
महात्मा गांधी में ऐसा हीनता और ग्लानि का भाव लेशमात्र नहीं था और उनके नेतृत्व में पूरा देश एक होकर उमड पडा
एक धारा बृहत समाज की थी , जिसके सबसे सशक्त नेता गांधीजी हैं
दूसरी धारा भारत में क्रमश: पराये होते जा रहे अभिजन एवं शक्तिशाली जन हैं , जो आक्रमकों के प्रति विशेष समर्पण एवं दास्य भाव की एक लंबी परंपरा के वाहक हैं
आक्रमक अंग्रेज और उनका समाज तथा सभ्यता सन् १५०० ई . के बाद से विश्वभर में यूरोपीय जातियां अपना प्रभाव बढाने लगीं और लगभग संपूर्ण गैर यूरोपीय विश्व को किसी न किसी रूप में अपने नियंत्रण या प्रभाव में लाने में सफल हुईं
इसलिए शक्ति का केन्द्रीकरण अत्यावश्यक है
सभ्यता का अर्थ है संपत्ति की निरंतर वृद्धि , व्यवस्था और रक्षा अपनी संपत्ति की रक्षा औजारों के द्वारा की जाती है
यहीं प्रसंगवश स्मरणीय है कि कार्ल मार्क्स ने भी यही माना था कि एशिया अफ्रिका के देशों के समाजों का उद्धार तो यूरोप का वर्किंग क्लास' - औद्योगिक श्रमिक वर्ग करेगा
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के संदर्भ में सर्वप्रथम तो यही स्मरणीय है कि आधुनिक विज्ञान की अधिकांश उपलब्धियां मात्र एक सौ वर्ष पुरानी हैं - कार , वायुयान , मोटरलारी , बिजली आदि एक सौ वर्ष पहले नहीं थे
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के संदर्भ में सर्वप्रथम तो यही स्मरणीय है कि आधुनिक विज्ञान की अधिकांश उपलब्धियां मात्र एक सौ वर्ष पुरानी हैं - कार , वायुयान , मोटरलारी , बिजली आदि एक सौ वर्ष पहले नहीं थे
ब्रिटेन का कच्चा लोहा हल्के किस्म का था और १७०० ईस्वी के आसपास से पत्थर के कोयले का प्रयोग वे इस्पात बनाने के काम में करने लगे थे , पर वह कोयला भी घटिया किस्म का था
जे . एम . हीथ ब्रिटेन के एक उद्योगकर्मी थे
इंग्लैंड में 'ड्रिल प्लाऊ' का पहला प्रयोग १७३० ईस्वी में हुआ , पर प्रचलन लगभग ५० वर्ष बाद सन् १७८० में हुआ
ए . ई . डाब्स के अनुसार प्रोटेस्टेंट क्रांति के पहले इंग्लैंड के गरीबों को पढने के लिए स्कूल की सुविधा थी
ए . ई . डाब्स के अनुसार प्रोटेस्टेंट क्रांति के पहले इंग्लैंड के गरीबों को पढने के लिए स्कूल की सुविधा थी
उसमें भी लोकशिक्षण का मुख्य लक्ष्य ईसाइयत के प्रचार के ग्रहण करने योग्य अधिकाधिक लोगों को बनाना और हर बच्चे को बाइबिल पढने योग्य बनाना था
१८०२ के एक कानून में यह विधान बना कि छोटे बच्चों को काम पर रखने वाले स्वामी लोग सात वर्षों की एप्रेण्टिसशिप की अवधि में सेवा लेने के साथ-साथ पहले चार वर्ष उन्हें पढना , लिखना और अंकगणित सिखाएं तथा धार्मिक निर्देश ग्रहण करने के योग्य बनाएं
उन्हीं दिनों यह माना गया कि यह विधि भारत से ग्रहण की गई
१८१८ ई . में यह संख्या ६ , ७४ , ८८३ तथा १८५१ ईस्वी में २१ , ४४ , ३७७ थी
१८५१ ईस्वी तक स्कूलों में गणित का नियमित अध्यापन नहीं होता था
सार्वजनिक स्कूलों की चाहे जो दशा थी , किन्तु आक्सफोर्ड , कैम्बिज एवं एडिनबर्ग इंग्लैंड के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय थे
उन्नीसवीं शती ईस्वी के आरंभ में जो मुख्य विषय पढाये जाते थे , वे थे ईसाई पंथ विद्या ( थिओलॉजी ) एवं क्लासिक्स
इनमें विविध ईसाई मठों के पंथ प्रचारक एवं पंथाधिकारी प्रमुख थे , विशेषकर जेसुइट लोग
उन्नीसवीं शती के आरंभिक वर्षो में कुल छात्र ७६० थे , १८२०-२४ में यह संख्या १३०० तक जा पहुंची
यूरोपीय अभिजातवर्ग में इस तरह की लिखित सामग्री की इतनी मांग बढी कि शीघ्र ही एक या एकाधिक यूरोपीय भाषाओं में ऐसे साहित्य का प्रकाशन प्रारंभ हो गया
जो वृत्तांत और विमर्श सीमित किन्तु विशिष्ट विद्वञ्जनोचित उपयोग के थे , अथवा धार्मिक अभिप्राय के काम के थे , उनकी लगे हाथ अनेक प्रतिलिपियां तैयार होती थीं
इसी प्रक्रिया में चार्ल्स विलकिन्स , विलियम जोंस , एफ . डब्लयू . एलिस , लेफ्टिनेंट विलफोर्ड आदि ने भारतीय साहित्य का भी अध्ययन किया
शताब्दियों तक ब्रिटिश भूमि पर बार बार आक्रमण होते रहे और प्रत्येक आक्रमणकारी समूह पहले के समुदायों को दास बनाता तथा नष्ट करता रहा
१८ वीं १९ वीं शती ईस्वी में संयुक्त राज्य अमेरिका में भी ब्रिटिश राज्य के उत्तराधिकारियों ने वे ही सब तरीके अपनाए
इसी प्रकार लगभग १८३० तक ब्रिटिश सैनिकों को कोई गंभीर मानी जाने वाली गलती करने पर ( विशेष रूप से तैयार ) ४००-५०० कोडे लगाये जाने की बात सामान्य थी
इसी प्रकार सोलहवीं शती ई . के आंरभ में वहां 'एनक्लोजर मूवमेंट' चला
हजार-पांच सौ एकड के क्षेत्र के बाडे घेरकर उस दायरे से छोटे किसानों को भगा दिया जाता था तथा बडे फार्म स्थापित किये जाते | भगाये हुए किसान मुक्त बाजार में सस्ती मजूरी के लिए सुलभ होते और दर-दर भटकते
इस प्रकार अंग्रेज इंग्लैंड और आयरलैंड में अपनी सभ्यता के आदर्शों के अनुरूप व्यवस्था रचते रहे
किसानों की कृषि भूमि छीन लेना , उन्हें विस्थापित करना , सेवकों को ३-४ सौ तक कोडे बात-बात में फटकारना , छोटी-छोटी चूकों के लिए कठोर दंड देना , मजदूरी की दरें बहुत कम रखना , किसानों से कुल उपज का ५० से ८० प्रतिशत राजस्व के रूप में लेना , शिक्षा को विशिष्ट वर्ग का अधिकार मानना , राजनीति पर और शासन पर कुलीनों भर का अधिकार करना , फौज के पदों की भर्ती सरकारी रेट या बोली के अनुसार धन लेकर करना आदि १९ वीं शती ई . तक ब्रिटिश समाज व्यवस्था के मुख्य लक्षण थे
राष्ट्र के समस्त साधन स्रोत राज्यकर्ता वर्ग की संपत्ति हैं
अपने समाज को सभ्य बनाने के साथ ही विश्व को भी सभ्य बनाना है - यह उनका लक्ष्य था
उसी सभ्य बनने की प्रक्रिया में भारतीय स्वाधीनता खो दी गई
मुख्य धारा बिखराव , असंगठन , परस्पर भेदभाव , शोषण और गतिहीनता की ही रही
वहां गतिशीलता थी , अपेक्षाकृत समता एवं समृद्धि थी , इसी से संगठन था और इसी से वे जीत गए , हम हार गये
जैसा हम पहले स्मरण कर चुके हैं , यह मान्यता बहुत गहराई तक प्रविष्ट कराई जा चुकी थी और ब्रिटिश राज में जिन लोगों को शक्तिशाली रहने दिया गया या जो किसी भी रूप में शक्तिशाली बन पाए , उनमें ऐसा एक भी संगठित समूह नहीं दिखता , जो सोलहवीं , सत्रहवीं या अठारहवीं शताब्दी ईस्वी के भारत को उस समय के यूरोप से अधिक अलोकतांत्रिक , विषमताग्रस्त , पिछड़ा , गतिहीन , मानवीय गुणों में घटकर और अज्ञानता से त्रस्त न मानता हो
जिन लोगों ने भारतीय शिल्प , उद्योग या शिक्षा की दिशा के विनाश के बारे में लिखा , वे भी इसके निहितार्थों को बहुत स्पष्ट नहीं समझ पाए
परंतु हार के मूल में हमारी हीनता और विषमता ही कारण थी , इस पर नये प्रबुद्ध समूहों में लगभग सर्वानुमति है
श्री विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय पराजय का कारण सद्गुण विकृति को बताया
कुछेक यूरोपीय दुर्गुण हम भी अपना लें , तो बात बन जाए , ऐसा उनका प्रतिपादन दिखता है
अठारहवीं शती के पूर्वार्द्ध तक भारतीय समाज में शिक्षा , विज्ञान , प्रौद्योगिकी , व्यापार , श्रम , वेतन , मजूरी , सामाजिक संबंध समेत संपूर्ण सामाजिक संगठन की क्या स्थिति थी , इसे समेटने के कुछ प्रयास मैंने विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं शिक्षा से संबंधित अपनी पुस्तकों 'इंडियन साइन्स एंड टेक्नोलोजी इन दी एटीन्थ सेंचुरी और 'ब्यूटीफुल ट्री' में तथा कुछेक लंबे आलेखों- निबंधो में एवं व्याख्यानों में किये हैं
युद्धरत समाज की समाज व्यवस्था , शिक्षा व्यवस्था तथा अर्थ व्यवस्था बहुत अस्तव्यस्त होती , बिखरती और अस्वस्थ होती रहती है यह सर्वविदित है
एडम का यह सर्वेक्षण इस अनुमान को मानकर चला कि बंगाल और बिहार की उन दिनों कुल जनसंख्या लगभग ४ करोड़ थी और विद्यमान स्कूलों की संख्या एक लाख थी
इस पर अनुमान लगाते हुए एडम ने लिखा कि औसतन हर ६३ लड़कों के लिए एक स्कूल बंगाल-बिहार में है
उसका कहना था कि इन दोनों प्रांतो में सरकारी आंकड़ों के अनुसार १ , ५० , ७८४ गांव हैं
एडम ने इस शिक्षा की विधि का विवरण भी दिया कि पहले ८-१० दिन स्लेट पर या भूमि पर अंगुलियों से स्वर-व्यंजन लिखना सिखाया जाता है
एडम का यह सर्वेक्षण इस अनुमान को मानकर चला कि बंगाल और बिहार की उन दिनों कुल जनसंख्या लगभग ४ करोड़ थी और विद्यमान स्कूलों की संख्या एक लाख थी
१८८२ ईस्वी में डॉ . जी . डब्ल्यू , लिटनर ने पंजाब की सन् १८५० की स्थिति के बारे में लिखा कि अंग्रेजी आधिपत्य में आने से पहले पंजाब में भी लगभग हर गांव में एक स्कूल था
फरवरी , १८२६ में मद्रास के कलेक्टर ने रिपोर्ट भेजी की उसके क्षेत्र में २६ , ९६३ विद्यार्थी अपने घरों में पढ रहे हैं
१८८२ ईस्वी में डॉ . जी . डब्ल्यू , लिटनर ने पंजाब की सन् १८५० की स्थिति के बारे में लिखा कि अंग्रेजी आधिपत्य में आने से पहले पंजाब में भी लगभग हर गांव में एक स्कूल था
'लडकियों की स्कूली शिक्षा की कमी के बारे में थामस मुनरो ने यह स्पष्टीकरण दिया कि उनकी पढ़ाई मुख्यत: घरों में होती है
विद्यार्थियों की जातिवार संख्या का विवरण उस बहुप्रचारित एवं प्रतिष्ठित मान्यता को ध्वस्त करता है , जो हमारे नवप्रबुद्ध वर्ग में विगत १०० वर्षों से अधिक समय से गहरी होती गई है कि भारत में शिक्षा हिन्दुओं में मुख्यत: द्विजों तक सीमित थी और मुसलमानों में प्रतिष्ठित घरों तक ही
वही शूद्र कही जाने वाली जातियों के स्कूल में पढ रहे छात्रों की संख्या क्रमश: ७६ . १९ एवं ६८ . ६२ प्रतिशत है
मलाबार में तथाकथित द्विज छात्र २०% से भी कम हैं और तथाकथित शूद्र तथा अवर्ण जातियों के ५४ प्रतिशत के लगभग
मात्र तेलुगुभाषी क्षेत्र में द्विज छात्रों की संख्या तथाकथित शूद्रों एवं अवर्ण के पढ रहे बच्चों की संख्या से कुछ अधिक है
उससे बंगाल में शिक्षकों की जातियों का परिचय भी मिलता है और फिर यह स्थापना ध्वस्त होती है कि अध्यापन पर ब्राह्मणों का एकाधिकार है
फारसी-अरबी स्कूलों में मुसलमान शिक्षकों के साथ ब्राह्मण , कायस्थ , दैवज्ञ और गंध बनिक जाति के भी शिक्षक हैं और छात्र भी विविध हिन्दू जातियों के तथा मुसलमान हैं
ऐसा एक भी मंदिर , मस् जिद या धर्मशाला नहीं , जहां एक स्कूल न हो
लिटनर ने हिसाब लगाकर लिखा कि १८५० ईस्वी में पंजाब पर ब्रिटिश आधिपत्य से पूर्व कम से कम ३ लाख ३० हजार छात्र- छात्राएं पंजाब में पढ़ रहे थे
शिक्षा के ये विवरण स्पष्ट करते हैं कि भारत उन दिनों शिक्षा की दृष्टि से हीन नहीं था और महात्मा गांधी का सन् १९३१ में लंदन की एक विशिष्ट सभा में कहा गया यह कथन पूर्णत: प्रामाणिक था कि अंग्रेजी राज्य में भारत में शिक्षितों की संख्या घटी है क्योंकि अंग्रेजो ने स्वेदशी विद्या के 'सुंदर वृक्ष' की जडों को खोदकर देखा और फिर वे खुदी हुईं जडें खुली ही रहने दीं
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी यह एक बहुप्रचारित मान्यता हो गई है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में हमारे पिछड़ेपन और ब्रिटेन के आगे बढे होने के कारण हम ब्रिटेन से हार गए और इस प्रकार ब्रिटेन की जीत दूसरों को नष्ट कर डालने और रूपांतरित कर अपने अनुकूल बनाने को सन्नद्ध राजनीति और दृष्टि की जीत नहीं रह जाती , अपितु अधिकांश नवप्रबुद्ध भारतीयों की दृष्टि में वह सत्य और प्रगति की खोज में समर्पित विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मानवीय विजयगाथा बन जाती है
उत्तर प्रदेश के अतिरंजन खेडा जैसी जगहों में कम से कम १२ वीं शती ईसा से पूर्व से लोहा ढाला जा रहा था , यह अब अनेक लोगों को ज्ञात है
सन् १७९४ में डॉ . एच . स्काट ने ब्रिटिश रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जे . बैंक्स को भारतीय 'वुटज' इस्पात का एक नमूना भेजा
१७६०-६२ में वहां अकाल पडा और जनसंख्या लगभग आधी , ५७ हजार के करीब रह गयी
१७६०-६२ में वहां अकाल पडा और जनसंख्या लगभग आधी , ५७ हजार के करीब रह गयी
मद्रास के असिस्टेंट सर्वेयर जनरल कैप्टेन जे . कैम्पबेल ने दक्षिण भारत में तैयार किये जाने वाले चार तरह के भारतीय लोहे का विवरण इंग्लैंड को भेजा
मद्रास के असिस्टेंट सर्वेयर जनरल कैप्टेन जे . कैम्पबेल ने दक्षिण भारत में तैयार किये जाने वाले चार तरह के भारतीय लोहे का विवरण इंग्लैंड को भेजा
इसमें कच्चा माल , भट्ठी ईंधन , निर्माणविधि आदि का विवरण था , ताकि ब्रिटिश लोहानिर्माता एवं लोहाव्यापारी उस ज्ञान का लाभ उठा सकें
इसमें कच्चा माल , भट्ठी ईंधन , निर्माणविधि आदि का विवरण था , ताकि ब्रिटिश लोहानिर्माता एवं लोहाव्यापारी उस ज्ञान का लाभ उठा सकें
मेरा अनुमान है कि १८०० ईस्वी के आसपास में लगभग १० , ००० भट्टियां थीं जिनमें लोहा और इस्पात बनता था
सन पौधे के उपयोग से कागज बनाये जाने का विवरण भी मिलता है
खेती और सिंचाई की व्यवस्था में भारत अति प्राचीन काल से समुन्नत रहा है तथा १८ वीं शती ई . में फसलचक्र , खादप्रयोग , वपित्र से बुवाई तथा अन्य उन्नत कृषिप्रौद्योगिकी का भारत में प्रचुर उपयोग होता था
खेती और सिंचाई की व्यवस्था में भारत अति प्राचीन काल से समुन्नत रहा है तथा १८ वीं शती ई . में फसलचक्र , खादप्रयोग , वपित्र से बुवाई तथा अन्य उन्नत कृषिप्रौद्योगिकी का भारत में प्रचुर उपयोग होता था
हमारे गाय-बैल पर्याप्त हृष्टपुष्ट होते थे
अकाल , सुकाल , वर्षागम , शरदागम आदि कालज्ञान , ऋतुज्ञान , वायुप्रवाह का ज्ञान , उसके परिणामों का ज्ञान , फसल के लक्षणों , रोगों , रोग के उपचारों का ज्ञान , फलों और अनाजों की विविध किस्मों और उनके गुण-धर्म प्रभावों का ज्ञान , बीजों की पहचान , पशुओं की नस्ल व क्षमता की पहचान , पशुपालन एवं पशुआहार का ज्ञान , यह सब भी १८ वीं शती ईस्वी के भारत में पर्याप्त समृद्ध था
कृषि और बागवानी के उत्कृष्ट उपकरण विद्यमान थे
रहट , ढेंकुरी , विविध तरह के हल , पवनचक्की , हंसिया , खुरपी , खुरपा , गोदना , ओखल , मूसल , ढेंकर , बरवर , पाटा आदि व्यापक रूप से प्रचलित उपकरण थे
लकड़ी और लोहे के कारीगरों-बढई और लुहार के यंत्रो की स्थिति भी अच्छी थी
निराई-गुडाई , कटाई-गहाई , उडावनी आदि की तकनीकी का यहां विस्तृत ज्ञान था
तालाब तथा अन्य सिंचाई स्रोतों की देखभाल तथा मरम्मत के लिए दक्षिण में कुल कृषिउपज का एक अंश सुरक्षित रखने की परंपरा रही थी
भारत में कृषि का अधिकांश काम किसान स्वयं करते थे , जबकि इंग्लैंड में अधिकतर खेती का काम कृषिदासों और मजदूरों से ही लिया जाता था
भारत में कृषि का अधिकांश काम किसान स्वयं करते थे , जबकि इंग्लैंड में अधिकतर खेती का काम कृषिदासों और मजदूरों से ही लिया जाता था
जैसा कि हम सब जानते हैं , कपडा बनाने का उद्योग भी भारत में पुरातन काल से है
भारत के सूती कपडों से जब इंग्लैंड का बाजार भरने लगा , तब वहां भारतीय कपड़ों के आयात के विरुद्ध आंदोलन हुए
भारतीय बुनकरों का कौशल विश्व प्रसिद्ध था
भारत के गांवों व कस्बों-शहरों में कपास की धुनाई , सूत आदि की कताई , कपड़ों की बुनाई , छपाई , रंगाई आदि के काम व्यापक स्तर पर होते थे , यह भी सर्वविदित ही है
चेचक का टीका लगाने की देशी प्रथा भारत के कई हिस्सों में व्यापक थी जब कि इंग्लैंड में चेचक का टीका १७२० ई . के बाद ही चला
चेचक का टीका लगाने की देशी प्रथा भारत के कई हिस्सों में व्यापक थी जब कि इंग्लैंड में चेचक का टीका १७२० ई . के बाद ही चला
जिस तरह अंग्रेजों ने सुनियोजित ढंग से भारतीय वस्त्रोद्योग एवं कारीगरों को विनष्ट किया , उसी तरह टीका लगाने के एवं चिकित्सा कौशलों का भी हनन किया
शल्य चिकित्सा में निपुणता भी भारतीय ग्रामीण वैद्यों में १८ वीं शती तक शेष थी
क्योंकि गणित में तो उतने विकसित वे हो ही कैसे सकते हैं ? देश और काल की दूरस्थ गणना का सामर्थ्य भारतीयों में कैसे आ सकता है ? अब , यह अलग बात है कि अठाहरवीं शती में भारत में बनारस में दशाश्वमेध घाट के पास मानमंदिर वेधशाला विद्यमान थी , जो कि १६ वीं शती ई . में बनी बताई जाती है
गणित और रेखागणित के ज्ञान में भारतीयों के अधिक उन्नत होने का तथ्य स्वीकार करने की मनोदशा में विदेशी विजेता नहीं थे
भारतीय समाज व्यवस्था में अंग्रेजों को क्या परिवर्तन उद्दिष्ट थे , इसका ध्यान रखने पर ही हमें उनके अनेक कामों और योजनाओं का सही अभिप्राय समझ में आयेगा
पहले कहा ही जा चुका है कि अमरीका , आयरलैंड , अफ्रिका या भारत के समाजों को ब्रिटिश राज्य या अन्य यूरोपीय राज्य के औजार के रूप में विकसित किया गया
दक्षिण के राजाओं में विद्रोह और अधीनता न मानने की जो प्रवृत्ति प्रबल है , उसका दमन किये बगैरे वहां कोई व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती
दक्षिण के राजाओं में विद्रोह और अधीनता न मानने की जो प्रवृत्ति प्रबल है , उसका दमन किये बगैरे वहां कोई व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती
हेनरी डंडास के वंशज सन् १९४७ के भारत छोडने तक , ६-८ पीढियों तक भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य से विविध स्तरों पर संबंधित रहे
सन् १७८० से १९४७ तक इसी प्रकार कई हजार ब्रिटिश परिवार भारत में ब्रिटिश राज से ऐसे ही उच्च स्तरों से जुडे रहे
यहां यह भी याद करना आवश्यक है कि यह मानना नितांत असत्य है कि पहले तो भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी , ब्रिटिश राज्य नहीं , अत: १८५७ तक जो कुछ भारत में हुआ , वह कुछ ब्रिटिश व्यापारियों का काम था , ब्रिटिश राज्यकर्ता वर्ग का नहीं
यहां यह भी याद करना आवश्यक है कि यह मानना नितांत असत्य है कि पहले तो भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी , ब्रिटिश राज्य नहीं , अत: १८५७ तक जो कुछ भारत में हुआ , वह कुछ ब्रिटिश व्यापारियों का काम था , ब्रिटिश राज्यकर्ता वर्ग का नहीं
उदाहरणार्थ , मराठा नौसेनापति आंग्रे पर १७५० ई . के दशक में ब्रिटिश आक्रमण , ब्रिटिश राज्य की नीति एवं निर्देश के अधीन किया गया था और इस पहल का ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से नाम मात्र का ही सम्बन्ध था
वैसे भी , कंपनी को आरंभ से ही ब्रितानी नौसेना की पूरी सहायता प्रदान की गई तथा बाद में स्थल सेना की भी
किसी पर अकारण आक्रमण का या किसी को पूर्णत: अधीन बनाकर अपने अनुरूप रूपांतरित करने का कोई भारतीय राज्य विचार तक नहीं कर सकता था
ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में जो कर रही थी , वह ब्रिटिश अभिजात वर्ग के आदर्शों एवं निर्देशों के अनुरूप ही था
पर इसी कारण उसमें ऐसे लोगों को भर्ती किया जा सकता है , जो ऊंचे और भव्य कामों के योग्य नहीं हैं
यहां तक की मैकाले या विलियम जोंस जैसे राजनैतिक सांस्कृतिक व्यक्तित्व वाले लोगों के भारत आने के पीछे मुख्य अभिप्राय यही था कि यहां कुछ वर्ष रहकर वे इतनी बचत कर लेंगे कि ब्रिटेन वापिस जाकर वहां के समाज में अपनी हैसियत के अनुरूप आराम से आजीवन रह सकें
अधिकांश गवर्नर जनरलों एवं बाद में वायसरायों ने इंग्लैंड से भारत आते समय यह हिसाब लगाया था कि अपने कार्यकाल में वे कितनी बचत कर सकेंगे
उनके मित्र स्ट्रेची ने सुझाव दिया कि ६० हजार बचत करने तक गवर्नर बने रहो
विदेशी लूट , ब्रिटिश देश सेवा की एक बहुमान्य अवधारणा रही है
अंग्रेजों द्वारा भारत में मुनाफा कमाने का एक यही तरीका था कि अपने राज्य में भी किसी इलाके में नमक बनाने का एकाधिकार प्राप्त कर लो , या बुनकरों पर पूर्ण नियंत्रण के अधिकार प्राप्त कर लो , अथवा किसी व्यापार में जुटो और सरकार से कर वगैरह में रियायत या माफी प्राप्त कर लो
इसी प्रकार भारत में अंग्रेज अफसर जहां ब्रिटिश समाज द्वारा उन्हें सौंपे गए दायित्वों को चुस्ती से निभा रहे थे , वहीं वे उन व्यवहार प्रतिमानों का भी निष्ठा एवं दृढतापूर्वक निर्वाह कर रहे थे , जो कि स्वयं ब्रिटिश समाज में बनाये गये थे और प्रचलित थे
उससे भारत के शीर्षस्थ लोगों के जीवन में भी , विशेषकर हिन्दू राज्यों में , सादगी और संयम की ही झलक मिलती है
मुस्लिम शासित हैदराबाद तक में , १७८० ई . में , एक निरीक्षण निपुण ब्रिटिश अधिकारी ने अनुभव किया कि वहां के अभिजनों और उनके सेवकों के बीच देख कर भेद कर पाना बहुत कठिन है
ब्राह्मणों से अभिप्राय उन सभी लोगों से है जिन्हें , किसी प्रकार के विद्याध्ययन एवं विद्याभ्यास ( साहित्य , कला , संगीत , शिल्प , वैद्यक , ज्योतिष आदि ) हेतु अनुदान दिया जाता है
इसी प्रकार मंदिरों से आशय ऐसी समस्त संस्थाओं से है , जो न केवल धार्मिक उपासना आदि की व्यवस्था करती हैं , अपितु जो विद्या , संस्कृति , उत्सव एवं सामाजिक विनोद , विश्राम आदि की व्यवस्थाएं संचालित करती हैं
स्पष्ट है कि जानकार यूरोपीयों द्वारा उस अवधि में उन सभी लोगों को ब्राह्मण मान लिया जाता था , जो बौद्धिक , चिकित्सा सम्बन्धी या अन्य ऐसी ही क्रियाशीलताओं में संलग्न होते थे
यहां हर जाति के यात्री को भोजन दिया जाता है
हर छत्रम् में चार वेदों के ज्ञाता , एक शिक्षक व एक चिकित्सक रहते हैं
भारत की जीवन दृष्टि , जीवन शैली , जीवन कौशल , जीवन रचना का परिचय प्राप्त करने के लिये , भारत को ठीक से समझने के लिये , समृद्ध , सुसंस्कृत भारत को अंग्रेजों ने कैसे तोड़ा उसकी प्रक्रिया जानने के लिये , भारत कैसे गुलाम बन गया इसका विश्लेषण करने के लिये और अब उस गुलामी से मुक्ति पाने का मार्ग ढूंढने के लिये यह अध्ययन था
जितना मूल्य अध्ययन का है उससे भी कहीं अधिक मूल्य उसके उद्देश्य का है
गांधीजी उनकी दृष्टि में अवतार पुरुष हैं
इस ग्रन्थश्रेणी में प्रकाशित पुस्तकें १९७१ से २००३ तक की समयावधि में लिखी गई हैं
२४ अक्टूबर २००६ को सेवाग्राम में ही ८४ वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ
केदारनाथ के छत्रमों के बारे में यह भी व्यवस्था थी कि कुछ वर्षों तक उनके लिए प्रतिवर्ष निर्धारित धनराशि पूरी न खर्च होने के कारण जो कुछ धनराशि बच जाए , कुंभ पर्व के अवसर पर वह बची संपूर्ण धनराशि व्यय कर दी जाए और फिर नये सिरे से उनके कोष प्रारंभ किये जाएं
१८ वीं शती ई . के ब्रिटिश अभिलेखों से यह भलीभाँति अनुमान हो जाता है कि भारतीय समाज , विशेषत: यहां के ग्राम समाज कैसे चलते थे
मान्यम उस भूमि को कहते हैं , जिसका भूमि कर , विविध ग्राम संस्थाओं एवं गतिविधियों के लिए सौंपा जाता है
स्थानीय व क्षेत्रीय राज्य के स्थान पर यह कर मान्यम के प्राप्तकर्ता को दिया जाता था
इस सर्वे का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग वह है , जो १८०० ई . से पहले दक्षिणी भारत के अभिलेखों में उल्लिखित गाँवों से संबंधित है
स्पष्ट है कि उत्पादन का अंश विभिन्न कार्यों एवं विभिन्न संस्थाओं को पुरातन काल से चली आ रही प्रथाओं एवं व्यवहारों के अनुरूप ही निर्धारित किया जाता रहा है
१७७० ई . के दशक में बंगाल के एक जिले में मान्यम के दावेदारों की संख्या सत्तर हजार कही गयी है
किन्तु मोटे तौर पर जहां भी सिंचाई थी , वहां कुल कृषि-उपज का चार प्रतिशत सिंचाई-व्यवस्था के रखरखाव के लिए निर्धारित होता था
यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि १८१८ ई . के एक ब्रिटिश सर्वे के अनुसार दक्षिणी अर्काट जिले में बड़े , मझोले और छोटे मिलाकर कुल सात हजार से अधिक मंदिर थे तथा कई सौ मठम एवं छत्रम् थे
उसी अवधि में पूरे देश में ऐसे स्थानों व संस्थाओं की संख्या ३ लाख के लगभग रही होगी
कर्णम् या कनक पिल्लई वस्तुत: कोई व्यक्ति नहीं , अपितु गाँव के रजिस्ट्रार का कार्यालय होता था , जो एक ग्रामीण सचिवालय जैसा समझना चाहिए
कर्णम् के कार्य के लिए सामान्यत: कुल कृषि उपज का तीन से चार प्रतिशत अंश दिया जाता था
तलियार यानी ग्रामपुलिस ( जिसमें अनेक व्यक्ति होते रहे होंगे ) के लिए सामान्यत: ३ प्रतिशत अंश निश्चित होता था
महाराष्ट्र में ग्राम पुलिस ( रक्षक दल ) में महार लोग होते थे
सैन्य व्यवस्था का प्रमुख पालेगर कहलाता था
यदि कहीं चोरी हो जाती थी , और पुलिस या पालेगर चोरी गई संपत्ति ढूंढ निकालने में विफल रहते थे , तो उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने पद के लिए निर्धारित आय में से चोरी गई संपत्ति की क्षतिपूर्ति पीड़ित पक्ष को करें
मध्यकालीन भारत के एक इतिहासकार के अनुसार दिल्ली के शासकों के जिस एकमात्र व्यय का विवरण प्राप्त है , वह उन लोगों को मुफ्त भोजन कराने का व्यय है , जिनके लिए ऐसे भोजन की आवश्यकता पड़ती थी
पर साथ ही , अंतरग्रामीण धार्मिक , सांस्कृतिक , राजनैतिक , लेखा सम्बन्धी एवं सैन्य प्रयोजनों की व्यवस्था के लिए भी ये अंश निर्धारित थे
प्रारंभिक ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार मालाबार में १७४० ई . तक भूमि पर कर बिलकुल नहीं था
त्रावणकोर में १९ वीं शती के आरंभ में भी भूमिकर , कुल उत्पादन का ५ से १० प्रतिशत से अधिक नहीं था
जिस भूमि का राजस्व अंग्रेजों को देना पड़े , उसे त्यागकर किसान मान्यम भूमि में खेती करने लगे
जहांगीर के शासन में तो यह आमद कुल राजस्व का ५ प्रतिशत से भी अधिक नहीं होती थी
यह भी उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक रूप से चीन में भूमि कर कुल कृषि उपज का लगभग सोलहवां हिस्सा रहा बताया जाता है
भारत में मनु संहिता में अधिकतम कर , उपज का छठा अंश लिये जा सकने की व्यवस्था है , किन्तु वहां भी सामान्यत: कुल कृषि उपज का बारहवा अंश लिये जाने का ही आग्रह है
यहां यह भी स्मरणीय है कि सन् १७८० से आगे अंग्रेजों ने अनेक कारणों से मनु संहिता को विशेष महत्त्व दिया
अपनी स्थानीय सांस्कृतिक-धार्मिक संस्थाओं एवं प्रवृत्तियों , लेखा व्यवस्था , राजनैतिक , एवं सैन्य व्यवस्था या रक्षाव्यवस्था ( कानूनगो , देशमुख , पालेगर आदि ) इत्यादि का प्रबंध करने वाला गांव या क्षेत्र संभवत: शीर्षस्थ तंत्र के लिए भी लगभग ५ प्रतिशत अंश देता था
भूमि के क्रय-विक्रय की अनुमति एवं उसके प्रबंध सम्बन्धी सर्वोच्च अधिकार ग्राम समाज का ही होता था
समुदायम के सदस्यों का गांव की भूमि में विशिष्ट हिस्सा होता था
१८०५ ई . तंजावुर में मिरासदारों की कुल संख्या ६२ , ०४८ थी
यह कहना संभवत: यहां आवश्यक नहीं की संपूर्ण भारत में वास्तविक भूमि जोतने वाले के अधिकार स्थायी वंशानुगत रहते हैं
भारतीय अर्थव्यवस्था एवं उपभोग या खपत के ढांचे का एक अनुमान बेल्लारी जिले के १८०६ ई . के कुछ तथ्यों से भी होता है , जिसमें जिले भर के हर परिवार की औसत खपत का कुल आकलन है
पूरी जनसंख्या ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा तीन वर्गों में वर्गीकृत है और उसका खपत ब्यौरा है
ये तीन वर्ग हैं-पहला अधिक समृद्ध लो गों का ( कुल जनसंख्या २ , ५९ , ५६८ ) , दूसरा मध्यम साधनों वाले परिवार ( कुल जनसंख्या ३ , ७२ , ८८७ ) तथा तीसरा निम्न वर्ग ( कुल जनसंख्या २ , १८ , ६८४ ) 
घी और तेल की खपत का अनुपात तीनों वर्गो में लगभग ३:१:१ का है और दालों का ८:४:३ का
वास्तविक उच्च और निम्न लोगों के बीच अंतर की मात्रा का ज्ञान १७९९ ई . के एक विवरण से होता है
पर्याप्त छानबीन के बाद ब्रिटिश अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे की टीपू सुलतान का सबसे बड़ा अधिकारी , चित्रदुर्ग के किले का गवर्नर , टीपू के शासन में १०० रूपये प्रतिमाह पाता था
उस क्षेत्र में उन दिनों साधारण श्रमिक की मजदूरी की दर ४ रूपये प्रति माह थी
मेवाड १८१८ ई . में ब्रिटिश संरक्षण में लिया गया
१८५५ ई . में लार्ड ऐलनबरो के लार्ड केनिंग को लिखे एक पत्र में याद किया कि १५ वर्ष पहले ऐलनबरो ने स्वयं देखा था कि किस प्रकार शिमला के पहाड़ी क्षेत्र में लोगों से जबर्दस्ती सरकारी काम बेगार पर कराया गया
१८५५ ई . में लार्ड ऐलनबरो के लार्ड केनिंग को लिखे एक पत्र में याद किया कि १५ वर्ष पहले ऐलनबरो ने स्वयं देखा था कि किस प्रकार शिमला के पहाड़ी क्षेत्र में लोगों से जबर्दस्ती सरकारी काम बेगार पर कराया गया
ब्रिटिश सेना एक स्थान से दूसरे स्थान को निरंतर कूच करती रहती थी
वे उनकी आध्यात्मिक विरासत तक को समझ पाने में अक्षम रहे , उन्हें उससे भी रहित करने का प्रयास किया
आज हम अपने पूर्वजों के लोभ और धृष्टता का मूल्य चुका रहे हैं
उत्तरी , मध्य व दक्षिण अमरीका में तो यूरोप की इस विनाश लीला की शक्ति के टकराव से वहां की ९९ प्रतिशत जनसंख्या समाप्त हो गई
महात्मा गांधी ने इस संघर्ष को अधिक व्यापक अर्थ और संदर्भ फिर से देने का प्रयास किया तथा भारतीय आत्मा , मानस एवं व्यक्तित्व को फिर से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया
गांधीजी के नेतृत्व में किये गये भारतीय पुरुषार्थ से आज हम एक राजनैतिक रूप से स्वाधीन समाज हैं और आगे की संभावनाओं तथा मार्गों के बारे में सोचने का कर्तव्य और चुनौती हमारे सामने है
एक स्वाधीन समाज के रूप में हमें अब भी भविष्य की अपनी संभाव्यताओं का विचार करना होगा
सर्वप्रथम तो हमें अपनी पराजय के त्रास से अब मुक्त होना होगा
पराजय के बार बार स्मरण से मन की हीनता बढ़ती है और बुद्धि तथा चित्त स्वस्थ नहीं रहते
एक श्रेयस्कर समाजव्यवस्था कैसे क्रमश: छिन्नभिन्न होती गई और अभी तक सम्हल नहीं पा रही है , इस पर विवेकपूर्ण चिंतन एवं विमर्श तो हमारे लिए आवश्यक है
उस प्रतिरोध की शक्ति क्या थी , और कमियां क्या रहीं , इस पर पर्याप्त विचार आवश्यक है
तब भी अपने संपूर्ण भारतीय समाज को आक्रमण की चुनौती के विरुद्ध संगठित कर पाने में हम विफल रहे
यह सही है कि भारतीय समाज अपने राज्यकर्तावर्ग को सदा ही अपने नियंत्रण में और मर्यादा में रखता रहा है
अत: राज्यकर्तावर्ग को अपने स्थान पर , अपनी मर्यादा में ही प्रतिष्ठा देने का भारतीय समाज अभ्यस्त रहा है
किन्तु दूसरी ओर , सैन्य-आक्रमण की स्थिति में , प्रतिकार का सीधा भार जिस सेना पर आ पडता है , उस सैन्यशक्ति के बारे में शायद भारतीय समाज एक विशेष काल-खंड में पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाया
भारतीय मनीषा में अपनी विश्वदृष्टि के कारण स्वयं को ही परिष्कृत-सुसंस्कृत बनाये रखने की साधना करते रहने का स्वधर्मभाव प्रबल रहा
संभवत: इसी कारण हम देखते हैं कि चाहे विजयनगर राज्य हो , या मराठा राज्य , या राजस्थान के राज्य , किसी ने भी इस्लाम के अनुयायियों के आक्रमण के निहितार्थों पर विस्तार और गहराई से समीक्षा की हो , विश्लेषण किया हो , उसके संदर्भ में दीर्घकालीन नीति निश्चित की हो , ऐसा नहीं लगता
जहांगीर ने तो पुर्तागालियों के विरुद्ध अंग्रेजों की मदद भी स्वीकार की और विजयनगर के राजाओं और मराठों ने यूरोपीयों से तरह-तरह की सैनिक सहायता अपने लडाई-झगडों के समय प्राप्त की , यह तो हम सब जानते हैं
जहांगीर ने तो पुर्तागालियों के विरुद्ध अंग्रेजों की मदद भी स्वीकार की और विजयनगर के राजाओं और मराठों ने यूरोपीयों से तरह-तरह की सैनिक सहायता अपने लडाई-झगडों के समय प्राप्त की , यह तो हम सब जानते हैं
यह नहीं की हमारे समाज को धर्म और स्वधर्म का बोध नहीं था , या कि अपने पुन: उत्कर्ष , आत्मगौरव और सफलता की इच्छा नहीं थी
यह नहीं की हमारे समाज को धर्म और स्वधर्म का बोध नहीं था , या कि अपने पुन: उत्कर्ष , आत्मगौरव और सफलता की इच्छा नहीं थी
अंग्रेजी आक्रमण के बाद भारतीय अभिजनों के एक बडे वर्ग में अपने समाज से और अधिक विलगाव आता गया तथा आक्रामकों के प्रति और अधिक दास्यभाव आता गया
पराजय की दशा में हर समाज में तरह-तरह से बिखराव आता है , टूटन आती है , विकृतियां आती हैं
विगत का शोक और हीनता का भाव समाज को स्वस्थ होने देने के मार्ग में बडी बाधा है
स्वयं ब्रिटेन इतिहास में ग्यारहवीं शताब्दी तक बार बार पराजित हुआ
रूस भी बार बार पराजित होता रहा
चीन पर भी मध्य एशिया के विविध समुदायों के आक्रमण हुए और सन् १८०० ई . के बाद तो यूरोप ने चीन को घेर ही लिया और सौ - सवा सौ वर्ष तक अपने आधिपत्य में रखा
ऐसा कहा जाता है कि ५० वर्षों के भीतर जापान में पांच लाख लोगों को ईसाई बना डाला गया
इस योजना का नाम था 'कोग्यों आइकेन'
'क्रियासिद्धि सत्त्व से होती है , उपकरण से नहीं' - जैसी अनेक सूक्तियां प्रसिद्ध हैं
भारत में गांधीजी ने जब समाज का पुनस्संगठन शुरू किया , तब भी यही प्रक्रिया अपनायी
विवेकानन्द जैसी प्रतिभा इनसे भिन्न थी
पूजापाठ करने व शास्त्र वगैरह पढने-पढाने वाले समुदाय से ही अधिक परिचय रहा
फलत: प्रगाढ देशप्रेम एवं संस्कृतिप्रेम होने पर भी वे यूरोपीय मनीषा और भारतीय मनीषा के आधारभूत अन्तरों को पहचान नहीं पाए
किन्तु वे एक परिश्रमी और कुशल संगठक थे
संयम और तप से सम्पन्न इनके जीवन ने अनगिनत लोगों के संस्कृतिप्रेम एवं आत्मगौरव के भाव को प्रेरणा दी
बसवेश्वर , कबीर , रविदास , दादू , मीरा , तुलसी , सूर , नामदेव , तुकाराम , ज्ञानदेव जैसे सन्तो-सिद्धों ने भारतीय समाज को पुनस्संगठित करने के अनेक उपाय किये
उत्तरी भारत के अभिजन विदेशी आक्रामकों के प्रति दास्यभाव में अधिक बँध गये दिखते हैं
अंग्रेजों के अधिक सम्पर्क से इन्हें लगा कि हम भी भारत में इनकी जगह ले सकते हैं
जीवन का , सभ्यता और समाज- व्यवस्था का वही 'मॉडल' इन्हें सार्वभौम लगता था
शायद काठियावाड रियासत के परिवेश के कारण और साथ ही किसानों के संस्कार , बुद्धि , आदर्शों , आकांक्षाओं से परिचय के कारण वे ऐसा कर पाए , या अन्य कई कारण रहे होंगे
गांधीजी के पहले कुछेक सौ वर्षों से भारत में मानो क्षेत्र या अंश विशेष के ही प्रतिनिधि नेता उभरते रहे
यूरोपीय सभ्यता और भारतीय सभ्यता के आधार , लक्ष्यों , कार्यपद्धति के अन्तर को समझकर उसे व्यापक बोध का आधार बनाने का प्रयास गांधीजी ने किया
प्रत्येक समाज में स्मृतिरक्षा या स्मृतिप्रवाह की परम्परा भिन्न भिन्न होती है
मनुष्य मात्र में कतिपय मूलभूत प्रेरणाएं होती हैं
इस स्तर पर सार्वभौमिकता या 'युनिवर्सेलिटी' आधारभूत तथ्य है
उन्हें मात्र भिन्न-भिन्न देश-काल के प्रति एक ही सार्वभौम और एकरूप मानवीय चेतना की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं या 'रेस्पांसेज' मानना जीव की शक्तियों की अवहेलना करना है
विश्व में विविध सभ्यताएं हैं और ये आपस में एक दूसरे को ऊंचा-नीचा , श्रेष्ठ-निष्कूट देखती हैं या समान स्वतंत्र अभिव्यक्तियों के रूप में देखती हैं या कि सागरीय वृत्तों की तरह देखती हैं-आदि भेद भी सम्बन्धित सभ्यता की ही विशेषता होती है
यहां यह स्मरण स्वाभाविक है कि हजारों साल से दुनिया में विविध मानव जातियां , विविध सभ्यताएं सक्रिय हैं
अनेक सभ्यताएं तो इस यूरोपीय प्रभाव से नष्ट हो गई हैं
ऐसा नहीं है कि भारत में सम्पन्नों ने विपन्नों के प्रति मात्र करुणा ही की
अपनी अनुचित और अधर्ममय अभिव्यक्तियों को धर्मानुकूल बताने की प्रवृत्तियां भारत में भी मिलेंगी
थोडे से लोग , मुख्यत: एक व्यक्ति , चिन्तक , उद्धारक , पैगम्बर या मसीहा और उसके अंगरूप सच्चे सेवक , उन्हें मिलाकर बनी संस्था या निकाय , ये ही सत्य और संस्कृति के वाहक होते हैं
विश्व का समस्त जैव द्रव्य ( बायोमास ) अपने नियंत्रण में रखने का दायित्व यूरोपीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी का है
विश्व के समस्त विचार अपने व्यवस्था क्रम के अन्तर्गत रखने का दायित्व यूरोपीय दर्शन और मानविकी विद्याओं का है
अवेहलना और टकराहट की यह स्थिति दूर करनी होगी
भारतीय समाज आज दो भागों में विभक्त है , यह यथार्थ स्थिति है
'मासिज' ( masses ) का रूपान्तरण होना है
हमारे अधिकांश आधुनिक शिक्षाविद , अकादमीशियन , आधुनिक विद्वान , लेखक , आदि इस पश्चिमीकृत हिस्से का विद्या अंग है
आधुनिक राज्य तंत्र के दो-ढ़ाई लाख व्यक्ति पश्चिमीकृत वर्ग की प्रशासनिक शाखा है , जिन्हें यूरोप की भाषा में भारत का 'आफिसर क्लास' कहा जा सकता है
सन् १८५० ई . तक भारत की व्यवस्थाएं , तंत्र व संस्थाएं उजड़ ही गयी थीं
जिसका परिणाम यह भी होने लगा कि खेती की पैदावार घटने लगी , लोगों की खपत की शक्ति नहीं के बराबर रह गयी और हर जगह भुखमरी , दारिद्म व कंगाली दिखने लगी , जिससे लोगों में ब्रिटिश राज्य के प्रति अरुचि और क्रोध बढ़ता ही गया
ऐसी ही स्थिति में अंग्रेजी राज्य ने भारत में यूरोपीय तरीकों के माध्यम से यातायात , उद्योग व खेती में भी नयी व्यवस्थाएं व तंत्र खडे करने के प्रयास प्रारम्भ किये
लन्दन युनिवर्सिटी का 'मॉडल' तो ५०-६० वर्ष बाद बदल दिया गया
पिछले चालीस बरसों में भारत में वनों और जल का अकाल बढ़ता जा रहा है
पौष्टिक विटामिन इत्यादि के हिसाब से तो शायद ८०-९० प्रतिशत लोगों का दैनिक भोजन पोषण की किसी भी तरह की तराजू पर नहीं बैठता , इस तराजू पर भी नहीं कि शरीर स्वयं ही किसी भी तरह के भोजन को यानी केवल कार्बोहाईड्रेट वाले भोजन को आवश्यकता के अनुसार प्रोटीन इत्यादि में बदल लेता है
अगर यह 'थियोरी' और खोज ठीक होती तो कोई आवश्यकता नहीं थी की भारत का सब दूध , फल , सब्जी , भारत के गांवों और दूसरे पैदावार वाले स्थलों से खिंचकर भारत के महानगरों व दूसरे बडे नगरों में इकट्ठी हो जाती , जैसा की पिछले २०-३० वर्षों में बडी व्यापकता से होता जा रहा है
देसी आम का स्थान कलमी आम ने लिया है , अमरुद का स्थान सेब ने
यह कहने में शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आधा प्रतिशत भारतीय परिवारों ने आज के तर्क में बँधकर एक राक्षसी रूप धारण कर लिया और ९९ . ५ प्रतिशत भारतीय जनता मानो इस राक्षसी वृत्ति का आहार ही रह गयी है
तब ऐसा तो शायद अवश्य हो सकता है कि भारत के इस 'फायर वॉकिंग' का सार्वभौमीकरण हो जाये और वह विश्व के औलम्पिक्स का एक बड़ा खेल बन जाये
कला , संगीत , नृत्य इत्यादि से वंचित होने से पहले ये ९९ . ५ प्रतिशत परिवार अपनी खुली शरीर चिकित्सा , शिक्षा-दीक्षा , जल प्रबन्ध , ग्राम और नगर नियोजन और रूपाकृति-रचना से अधिकांशत: वंचित हो ही चुके थे
इस पश्चिम के दिये हुए लक्ष्यों के अनुकरण में हमने भारत की सब तरह की स्वदेशी व्यवस्थाओं और प्रतिभाओं को या तो बेकार बना दिया या उन्हें समेटकर संग्रहालयों व अभिलेखागारों में रख दिया या उन्हें भारत के आधा प्रतिशत लोगों के सुपुर्द कर दिया
अपनी बात को साबित करने के लिये जहां तहां से विदेशियों के ( किन्हीं खोज निकाले गये अथवा प्रसिद्ध प्राचीन भारतीयों के भी ) बयान जोड़ दिये जाते हैं , कि भारत में तो हमेशा दु:ख ही दु:ख रहा है
हम सब जानते हैं कि और तो और कार्ल मार्क्स ने भी भारतीय जीवन व सभ्यता को गयी-बीती दिखलाने की दृष्टि से इसी तरह की बातें लिखीं
लोग सब कठिनाइयों और रुकावटों के रहते हुए भी कुछ इधर उधर की यात्रा करते ही हैं , मंदिरो के छोटे-मोटे उत्सव मनाते ही हैं , जहां-तहां , जब-तब यह सुनकर कि कहीं कोई देवी या सन्त प्रकट हुए हैं , उस तरफ भागते ही हैं , कहीं-कहीं समय पर नंगे होकर उत्सवों में आनन्दोल्लासमग्न नृत्य करते ही हैं
प्लेटो , यूरोपीय ईसाईयत , पश्चिमी रैशनलिज्म , मार्क्सीय समीक्षात्मक विश्लेषण पद्धति सबके बोझ से हम लदे हैं
नैतिक सत्ता या किसी तरह की अध्यात्मशक्ति तो हमारे पास है नहीं
परिणाम यह है कि भारत दो भागों में बँट गया है
एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का , जो भारत के तंत्र और साधनस्रोतों को नियंत्रित करते हैं और दूसरा है उन ९९ . ५ प्रतिशत का ( इनमें से १५-२० प्रतिशत शायद आधे फीसदी के सहायक व नौकर माने जा सकते हैं , और सुरक्षा व अधिकाधिक आमदनी का लोभ इन्हें काफी समय तक बाकी ८०-८५ प्रतिशत से अलग रख सकता है ) , जो केवल अपने सीमित व अवशिष्ट बल पर जी रहे हैं और जिनका किसी भी तरह का बौद्धिक व सामाजिक सम्पर्क भारत के शासक वर्ग व 'आफिसर क्लास' से नहीं है
अगर आज संसार में और देशों के सम्पर्क में रहने की बात नहीं होती , तो हमारी यह दुविधा कुछ आसानी से हल हो सकती थी
बाहर का इतना घनिष्ट सम्बन्ध और आना जाना नहीं होता , तो हमारे समाज के इन दोनों भागों का एक दूसरे से आदान- प्रदान , क्रिया-प्रतिक्रिया आवश्यक हो जाती
परन्तु इस संसार की 'थियेरीज' , अवधारणाओं और संरक्षण से तो हम निकल ही सकते हैं
इसी सदी में महात्मा गांधी ने स्वतन्त्रता संग्राम के समय हमारे में से अधिकांश को इन 'थियेरीज' अवधारणाओं और संरक्षण से निकाल लिया था
पिछले चालीस वर्षों में भारत में इतने सब विरोधाभासों के बाबजूद , इतना तो हुआ ही है कि हजारों भारतीय युवक-युवतियों ने न केवल अपने बृहद समाज के जुडने व एकरूप होने के प्रयत्न किये हैं , किन्तु पश्चिमी सभ्यता के उपकरणों को भी काफी हद तक समझ लिया है
 ) पश्चिमीकृत ढंग से भारत के महानगरों व इनसे मिलते जुलते ५०-१०० क्षेत्रों में बनायी जा सकती है
लेकिन जहां जहां बृहद् समाज को पश्चिमीकृत ज्ञान व संसाधनों की आवश्यकता होगी ( जैसे कि ऊर्जा के क्षेत्र में इंधन गैस और प्रकाश विश्लेषण के द्वारा बनी बिजली की ) वहां पश्चिमीकृत क्षेत्रों का यह कर्तव्य होगा कि इस तरह के आत्मसातीकरण में बृहद् समाज के कहने पर उसका हाथ बटाएँ
इस तरह के बँटवारे में यह आवश्यक है कि आज तक पिछले ४० वर्षों में भारत में सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर जो नयी योजनाएं , कलकारखाने , सिंचाई व बिजली बनाने के कार्यक्रम , यातायात इन्तजाम , मकान बनाने के रूपाकार आदि के तरीके चले हैं , उनकी पूरी तरह से समीक्षा हो
लेकिन जब तक ऐसी समीक्षा पूरी नहीं हो जाय , तब तक लगभग सभी क्षेत्रों में नये काम उठाना या पुरानों को बढ़ाना बन्द किया जाय
यह भी मान लिया जाय कि भारत की जल व्यवस्था , वन व्यवस्था , कृषि और पशुपालन , कपडे , शक्कर और भवननिर्माण सामग्री से सम्बन्धित कार्य बृहद् समाज की जिम्मेदारी रहेगी और पश्चिमीकृत क्षेत्रों को इन बातों में अपनी आवश्यकताओं व प्राथमिकताओं को बृहद् समाज की इस जिम्मेदारी के अन्तर्गत ही रखना होगा
लेकिन भारत में दो सौ वर्ष के विनाश और उपेक्षा के कारण बहुत से क्षेत्रों में बड़े बड़े प्रश्न खड़े हो गये हैं
भारत को न केवल अपनी जल , वन , कृषि , लघु उद्योग की व्यवस्था का पुनरुद्धार करना है , न केवल नदियों की गहराई बढानी और उनका प्रदूषण घटाना है , किन्तु भारत के विद्या व सांस्कृतिक केन्द्रों की पुर्नस्थापना करनी है
इसमें सबसे पहला काम , जो एक दो वर्ष के अन्दर ही देश भर में स्थापित किया जा सकता है वह है 'पड़ोसी स्कूलों' की स्थापना
अर्थशास्त्र सदा से राजनीति शास्त्र की एक अधीनस्थ विद्या है
राजनीति संस्कृति का अंग है , संस्कृति की सेवा के लिए है
इस प्रकार अर्थशास्त्र का स्थान संस्कृति में बहुत बाद में है
प्राकृतिक साधन-स्रोत , उनके उपयोग और व्यवहार का कौशल तथा मानवीय बुद्धि के अन्य कौशल , हुनर और परिश्रम ही मूलभूत पूँजी हैं
कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र को प्रमुखता दी क्योंकि कार्ल मार्क्स में बहुत गहरा और प्रबल यूरोपीय तथा ईसाई संस्कार , संवेग और बोध था
समस्त देश को अर्थशास्त्र से नियन्त्रित रखना चाहता है इसमें वह दास्य - भाव से भरी बुद्धि ही प्रमुख कारण है
भारत को अब अपनी पुनर्योजना सांस्कृतिक राजनीति को आगे रखकर करनी होगी
इस पुनर्योजना में अर्थशास्त्र नियामक सिद्धान्त कदापि नहीं हो सकता
अपनी सभ्यता से कटे हुए और यूरोपीय सभ्यता के मर्म से अनजान तथा उसके प्रति दास्यभाव से भरे हुए भारतीय शासकवर्ग को ही अर्थशास्त्र प्रमुख दिखता है
यूरोपीय शासक वर्ग तो हमें अपनी सभ्यता का मानवीय संसाधन मानकर हमारे लिए अर्थशास्त्र को प्रमुख मानता रहा है
आज मौसम आदि की जानकारी के लिए आसमान में जाने , बादलों का सूक्ष्म एवं अत्यंत महंगे उपकरणों से निरीक्षण आदि करने का विस्तृत तंत्र है , जिसमें राष्ट्रैय धन का बडा व्यय होता है
स्मरणीय है कि प्राय: सभी धर्मग्रन्थों में कुलाचार और लोकाचार के बारे में अन्तिम निर्णय की अधिकारी घर की जानकार स्त्रियां ही मानी गई हैं
किसानों और ग्वालों , चरवाहों आदि को गाय-बैल , भैंस-बकरी , ऊँट , भेड , घोडे , आदि से सम्बन्धित विस्तृत ज्ञान है
अब इन विद्याओं की पिछले १०-१२ वर्षों से कुछ चर्चा होने लगी है
इनके लिए बृहत् भारतीय समाज को पर्याप्त साधनस्रोत सुलभ रहने देना चाहिए
हमारी अध्यात्म ( परा ) विद्या के ग्रंथों तथा धर्मग्रंथों का भी गहराई से व्यापक अध्ययन आवश्यक है
इस विषय में किसी एक या कुछ प्राचीन विद्वानों के मत ही 'अन्तिम वचन' नहीं हैं
स्पष्ट है , यह राजनीति किसी एक केन्द्रीय 'कैडर' या समूह के द्वारा हो पाना असम्भव है और ऐसा प्रयास अपने ही राजनैतिक आदर्शों के विरुद्ध भी होगा
दल तथा अन्य संस्थाएं इस समाज के एक सामान्य अंग के रूप में हो ही सकते हैं
संस्थाओं के रूप तो बदलते ही रहते हैं और फिर अनन्तरूपता तो हमारी जीवनदृष्टि का मान्य तत्त्व है
परम्परागत मान्यताओं के स्वरूप के सम्बन्ध में भ्रान्तियां बढ़ी हैं तथा समझ गलत हुई है
पुरुष नये संस्कारों , नयी संस्कृति के प्रभाव में आते गये
स्त्रियाँ परंपरागत संस्कारों को जीवित रखे रहीं
सर्वाधिक चिन्ता की बात यह है कि घरों में भी नरनारी के मध्य बौद्धिक-वैचारिक- भावात्मक संवाद समाप्त हो चला है
समाज के बिखराव के दौर में गलतफहमियाँ बढी और भ्रान्तियां फैलीं
अंग्रेजी राज के समय में ही फैला है
अब तो पढेलिखे वर्ग में एक नयी प्रवृत्ति उभरी है
इससे अधिक राक्षसी काम कुछ भी नहीं हो सकता
विदेशी विद्वानों की व्याख्याएं ही हमारे शिक्षातंत्र में आप्तवचन मानी जाती हैं जिससे जाति तथा अन्य समुदायों के प्रति बोध विकृत हुआ है
जातियां समाज की स्वाभाविक इकाई रही हैं और यदि अब उस इकाई का स्वरूप भिन्न होता है तो उसका विचारविमर्श और निर्णय सामाजिक बुद्धि , सामाजिक विमर्श एवं सामाजिक संवाद से ही हो सकता है
बृहद् समाज से वह बहुत मितव्ययिता की अपेक्षा करता है
भारतीय दृष्टि के अनुरूप हर क्षेत्र में संयुक्त संघ का , समुच्चय का , सबके प्रतिनिधित्व का ढांचा ही उभरेगा
प्रमाद एवं अविवेक की विदाई देनी होगी
स्वदेशी की पुर्नप्रतिष्ठा के द्वारा भारत वर्ष फिर से सबल-सशक्त तेजस्वी राष्ट्र बन कर समकालीन विश्व में स्वधर्म को निभाये यह देश के अधिकांश लोगों की है , ऐसा मैं मानता हूँ
स्वदेशी अत्यन्त प्राचीन अवधारणा है
स्वदेशी की पुर्नप्रतिष्ठा के द्वारा भारत वर्ष फिर से सबल-सशक्त तेजस्वी राष्ट्र बन कर समकालीन विश्व में स्वधर्म को निभाये यह देश के अधिकांश लोगों की है , ऐसा मैं मानता हूँ
क्योंकि , जैसी कि महात्मा गांधी ने १४ फरवरी १९१६ को मद्रास में ईसाई मिशनरियों के एक सम्मेलन में दिए गए अपने भाषण में स्वदेशी की परिभाषा की थी ''स्वदेशी वह भावना है , जिससे कि हम आसपास के परिवेश से ही अपनी अधिकतम आवश्यकतायें पूरी करते हैं और उनसे ही अधिकाधिक व्यवहार सम्बन्ध रखते हैं तथा स्वयं को उनका सहज अभिन्न अंग समझते हैं , न कि दूरस्थ लोगों और वस्तुओं से स्वयं को जोडने लगते हैं
लगभग तीस पैंतीस बरस तक स्वदेशी भारतीयों का मन्त्र बना रहा और स्वदेशी , स्वराज तथा स्वधर्म की प्रतिष्ठा भारत के राष्ट्रीय जीवन का लक्ष्य - सा दिखने लगा
महात्मा गांधी द्वारा की गई स्वदेशी की इस परिभाषा को शायद आज और अधिक स्पष्ट करना पडे या शायद उसे कुछ परिवर्तित या परिमार्जित और परिष्कृत करना पडे
समकालीन विश्व सन्दर्भों को जानते तथा स्मरण रखते हुए उसकी सम्भावनायें देखनी समझनी तथा जाँचनी परखनी होंगी और उन शक्तियों को भी पहचानना होगा जो कि स्वदेशी और भारतीयता की पुनर्प्रतिष्ठा कर सकेंगी या उसका माध्यम और वाहन बनेंगी
ऐसा कहा जाता है कि यूरोप ने छपाई की कला और प्रयोग विधि , नाविकों का कम्पास और उसकी प्रयोगविधि , बारुद बनाने का शास्त्र और विधि तथा कागज बनाने की विधि १३ वीं , १४ वीं शताब्दी में चीन से सीखी
इसी तरह चेचक का टीका ब्रिटेन में पहली बार १७२० में तुर्की से सीख कर लाया गया
इसी तरह चेचक का टीका ब्रिटेन में पहली बार १७२० में तुर्की से सीख कर लाया गया
जापान ने २० वीं शती ई . के आरम्भ में पश्चिमी व्यवस्थाओं , तकनीकों और उत्पादनों का अपने ढंग से गहराई से निरीक्षण किया
ऐसा कहा जाता है कि १९१० के लगभग जापान ने अमेरिका से बीस रेलवे इंजन खरीदे
अत: एक बार हम यदि किसी तकनीक को , जो हमें अपने अनुकूल लगती है , आत्मसात कर लेते हैं और उसे अपने अनुकूल ढाल लेते हैं तो फिर कोई भी बाहरी तकनीक शायद स्वदेशी - सी ही बन जाती है
परन्तु हमारी समकालीन प्रवृत्तियाँ तो स्वदेशी और भारतीयता की दिशा से विपरीत दिशा में ही चलती दिख रही हैं
लेकिन भारत के ५ लाख से भी अधिक गांवों , कस्बों और जिला केन्द्रों के बाजारों में तो सामान्य देसी वस्तुएँ भी दुर्लभ ही हो चली हैं
भारतीय सामग्री से बनीं , भारतीय शिल्पियों द्वारा , भारतीय शिल्प परम्परा और भारतीय रूपाकृतियों में बनी वस्तुएँ तो हमें प्राय: अपने बाजारों में नहीं दिखतीं
आटे की हाथ चक्की , तेल पिराई की घानी , गन्ना पिराई की हाथ वाली मशीनें , मिट्टी के घडे और पत्तल-दोने आदि तो अब हमारे सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा की चीजें नहीं रहे और उनका धीरे धीरे लोप ही हो चला है
हमारे भोजन की सामग्री भी आज अधिकतर तो गैर भारतीय विज्ञान , प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रक्रिया के द्वारा ही तैयार की जाती है
यहाँ तक कि छाछ तक खातेपीते घरों में भी दुर्लभ हो चली है
यह विचार भी अपेक्षित है कि क्या स्वदेशी में यह ह्रास अथवा स्वदेशी की यह उपेक्षा अंग्रेजी काल से शुरू हुई या पहले से ? 
उनमें शिक्षा के बारे में चार मुख्य श्रेणियाँ हैं - १ ) कुल निरक्षर , २ ) कुल साक्षर , ३ ) देसी भाषा में साक्षर और ४ ) अंग्रेजी में साक्षर
जनगणना के ये आँकडे दिखाते हैं कि तब भारत के बहुत से नगरों व क्षेत्रों में देसी भाषाओं में साक्षरता का जो प्रतिशत है , वह अंग्रेजी में साक्षरता के प्रतिशत से केवल चार गुना है
प्रत्येक भाषा एक विशद अर्थपरम्परा , दर्शनपरम्परा और विचार परम्परा की अभिव्यक्ति होती है
हमारी जो आत्मछवि है , वह भी यूरोपीय 'इंडोलॉजी' के विद्वानों द्वारा गढी गई छवि है , जो उन्होंने अपने ही प्रयोजन से रची थी
निजी जीवन में और अपनों के प्रति व्यवहार में हमारे साधारण जन की स्वदेशी भावना झलकती है
भारतीयता हमारे निजी जीवन व्यवहार और हमारी धार्मिक व्यवस्थाओं में अभी भी , चाहे कुछ प्राणहीन रूप में ही सही , जीवित है
व्रतउपवास आदि में क्या खाएँ क्या न खाएँ , पूजाअर्चना में किन वस्तुओं का , किस तरह के पेड़ोंपत्तियों और फूलों का प्रयोग करें , किनका न करें , विवाह आदि में कैसी व्यवस्था तथा व्यवहार करें , इन सबका विचार करते समय हमारे जो संस्कार उभर आते हैं और व्यवहार में व्यक्त होते हैं , वे हमारे भीतर भारतीयता के संस्कारों की गहराई के सूचक हैं
भोजन , वस्त्र , औषधि आदि में ऐसे भारतीय संस्कार अभी पचास वर्ष पूर्व तक व्यापक और प्रबल दिखते थे
भारतीयता के तथा भारत से जुड़े क्षेत्रों के मुख्य लक्षण समान हैं
नदी , पर्वत , सागर , वृक्षवनस्पति सभी समग्र सत्ता के महत्त्वपूर्ण अंग हैं
इसके साथ ही हमारे यहाँ जीवन को केवल मनुष्य में या कि कुछ प्राणियों में ही सीमित कर के नहीं देखा गया
दूसरों के अपने संस्कृतिरूपों को समाप्त करना तो चाक्रवर्त्य में भी निहित नहीं है
हमारी जीवन दृष्टि और हमारी सामाजिक सांस्कृतिक राजनैतिक संस्थायें , सभी का मुख्य आधार परस्परता , स्वभाव में प्रतिष्ठित स्वधर्म , स्वाधीनता तथा अभय रहा है
वनों पर वन के जानवरों , घूमन्तू जातियों तथा वनवासियों का अधिकार भारत में परम्परा से मान्य रहा है
हमारे सामाजिक संगठन में यह व्यवस्था रही कि एक कुल- समूह या जाति समूह के एक ही तरह के प्राकृतिक साधन स्रोतों से विशेष सम्बन्ध रहे
हर गांव के पास अपना सार्वजनिक चारागाह और अपना सामुदायिक वनक्षेत्र या वृक्षक्षेत्र होता था
राजधर्म लोकधर्म का एक अंग है
चराचर जीवों और जीवन से आत्मीयता के ये संस्कार अभी भी व्यवहार में प्रकट होते हैं
इस भारतीयता में मनुष्य कोई सृष्टि का केन्द्र नहीं है , सहज अंश है
समस्त जीवनरूप पूज्य हैं , पवित्र हैं और जीवन रूपों की विविधता सहज है , रक्षणीय है तथा सम्मान योग्य है
और मनुष्य सम्पूर्ण प्रकृति का तथा समस्त जीवों का स्वामी और नियन्त्रक है तथा वह नियन्त्रक बने , यही वहाँ स्वाभाविक माना गया है
यूरोपीय सम्पर्क जब विश्व के भिन्न-भिन्न देशों से बढ़ा और जब वह धीरे धीरे स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानने लगा , तब से ही आधुनिक पश्चिमी मनुष्य ने मानव जाति की धारणा रची है
इस धारणा को मान लेने के बाद यही स्वाभाविक है कि भिन्न भिन्न कसौटियों के आधार पर मानवजाति की विविध श्रेणियाँ बनाई जायें और इस श्रेणीक्रम में जो लोग ऊँचे सोपान पर हैं , उन्हें शेष सबके जीवन को नियन्त्रित करने का स्वाभाविक अधिकार मान्य किया जाये
हमारा पुलिसबल भी समाज को भयभीत रखकर ही व्यवस्था की रक्षा कर पाना सम्भव समझने लगा है
राज्यसंस्था की दंडशक्ति का लक्ष्य केवल दुष्टता को त्रास देना होता है जिससे समाज में स्वधर्मपालन के लिए अभय और आत्मीयता का परिवेश सुदृढ़ बने
समाज में भय का संचार करने वाला या उसमें फूट और भेदभाव बढ़ाने वाला राज्य तो हमारे यहाँ कुराज ही कहा गया है
इसलिए भारतीय राज्य के सेवकों तथा सेवा के इच्छुक प्रतिस्पर्धियों को भी राज्य और समाज के रिश्तों में परस्पर भय , अलगाव , अविश्वास तथा विरोध भाव को बढ़ावा देना त्यागना चाहिए
भारत की प्राचीनता और विविधता भारत के लिये एक बड़ा वरदान ही रही
भारतीय साहित्य मात्रा में तो विराट है ही , इसकी रचना की कालावधि भी सुदीर्घ है
भारत की सनातनता एक तरह से भारतीय प्रवाह में रही , उसके ग्रन्थों व स्थिरता में नहीं
यह चित्रण जो अंग्रेजों द्वारा किया गया , इससे १८६०-१८७० के बाद भारत में एक बड़ी टूटन हुई
शायद अभी तक हमें यह सूझा भी नहीं है कि इस तरह का सन्दर्भ खोजना और बिखरे टुकड़ों को इससे जोड़ना भी हमारा काम है
हमें जीवित रहना है तो इन सब को हटाकर कहीं जलाना व दफनाना ही पड़ेगा
अंग्रेजों ने भारत के बौद्धिक वर्ग का राजनैतिक इस्तेमाल किया
लेकिन स्वदेशी और भारतीयता को प्रतिष्ठित करने में महात्मा गांधी कहां मात खा गए ? उनसे चूक कहां हुई ? इसके बारे में मुझे लगता है कि १८ वीं शती के उत्तरार्ध में देश के अंग्रेजीदां पांच फीसदी लोगों ने जो राजनीति शुरू की , उसके केन्द्र में सत्ता में भागीदारी की मांग तो थी ही , साथ ही अंग्रेज और अंग्रेजियत को अपने से बड़ा माना गया था
इसी के साथ स्वदेशी की कड़ी भी शक्तिहीन हो गई
गांधी सेवा संघ बनाया गया
गांधी आर पार लड़ाई की चुनौती दे डालते हैं
पर दूसरे ? दो टूक शब्दों में कहूं तो नेहरू और उनके लोगों ने पिछले ५० साल में गांधी के साथ चौतरफा बदला लिया है
१८७० आते-आते यह अंग्रेजीदाँ वर्ग इस बात के लिए अकुलाने लगा कि जब हम अंग्रेजों की तरह रहना जानते हैं , उन्हीं की तरह अंग्रेजी बोल लेते हैं , राजनीति और दर्शन वगैरह पर भी बात कर लेते हैं , तो फिर वे हमें थोड़ा बराबरी का दर्जा क्यों नहीं देते ? रिचर्ड टेंपुल १८८०-८२ में कहता है कि इन लोगों को कानून वगैरह पढ़ा देने से ऐसा हुआ है
भारतीय तासीर का अंग्रेजी शासन और अंग्रेजियत के खिलाफ मौलिक विरोध के रूप में १८७० के आसपास उत्तर प्रदेश और बिहार में गोहत्या के खिलाफ जबरदस्त जन आंदोलन उठ खड़ा हुआ
इसे मोड़ कर नष्ट करने और अंग्रेजीदाँ वर्ग में उठी बराबरी की मांग को संतोष देने के लिए ही कांग्रेस का जन्म हुआ
मुसलमानों को अंग्रेजों की तरह जिला-जिला पहुँच कर प्रशासन की सीढ़ी बनाना नहीं आता था
हिन्दुस्तान कोई मुसलमानों के हाथ से अंग्रेजों के हाथ में नहीं गया
शोध साबित करते हैं कि उन बुरे दिनों में भी हिन्दुस्तानी मजदूर की मजदूरी इंग्लैंड में दी जा रही मजदूरी से ज्यादा थी
बंगाल पर पूरे कब्जे के बाद १७६५ में सवाल उठा कि किसानों से मालगुजारी क्या ली जाए ? ये किसान तब छठा-आठवां हिस्सा ही देते थे
वहां सवाल-जवाब में सलाहकार खिलजी को बता रहे हैं कि गैरमुसलमान से राजा उत्पादन का ५० फीसदी हिस्सा भी कर में ले ले तो गलत नहीं है
१७८०-८५ में बनारस में एक ब्राह्मण पर हत्या का इलज़ाम लगा
वे भारतीय धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ हैं न ! वे वह सब जानते हैं जो इस देश के धर्मशास्त्र नहीं जानते ! तो वे बताते हैं कि नहीं , इनके यहां तो ऐसे मामले में तप्त लोहे से दागे जाने का रिवाज है
दक्षिण भारत में तो गांव के झगड़े तय करने का काम पेरियार का ही था
गांव की सुरक्षा का जिम्मा महारों का था
मैंने जाँचा कि दक्षिण में १८ वीं सदी में कुल शिक्षितों में ८० फीसदी गैरब्राह्मण हैं
क्या राजनीति और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरियों के अलावा भी गांधी किसी ऐसे कारण से मजबूर थे कि स्वदेशी वृक्ष के लिए कोई ऐसा थाला नहीं बन सका , जिसे नेहरू जैसे लोग मिटा न पाते , और वृक्ष पनपता-बढ़ता चला जाता ? जिसे उनके बाद सर्वोदयी , गांधीवादी , समतावादी , समाजवादी , मानवतावादी , राष्ट्रवादी आदि आदि सब मिलकर संभाल लेते , और आज भारत की एक नई तसवीर बनी होती ? गांधी की गांव की कल्पना उधार की है और किताबी है
१८७१ में वे लन्दन की एक गोष्ठी में जाते हैं तो हिन्दुस्तान के लिए नमक के महत्त्व का मुद्दा उठाते हैं
लिहाजा स्वदेशी की जो अवधारणा या कार्यरेखा बनती है , ढेर सारी चीजों को बटोर कर अंग्रेजों के सामने , तो वह एक बड़ी ताकतवर चीज के रूप में रख दी जाती है , उसका एक ढाँचा भी खड़ा कर दिया जाता है , पर मामला ऊपर ही ऊपर है , जड़ें नदारद हैं
विनोबा ने समुदाय की , ग्रामदान की बात की
१९०५ की स्वदेशी की बंगाल वाली विचारधारा सतह पर ही थी
स्वदेशी क्या हो , इसे तय करने के लिए राज्य और समाज कैसे व्यवस्थित हो , इस सवाल पर जाना होगा
१९११ की जनगणना में पंजाब में १७०० खानों में जाट बंटे हैं
ये कुल इकठ्ठा होते हैं तो कुछ संघीय-सा संयोजक ढांचा बनता है
इस ढांचे में फैसलों की प्रक्रिया कई स्तरों में रही होगी
पर पंजाब वगैरह में तो १८५०-६० तक चर्खा खूब चलता ही था
१९५०-६० में जापान इस रास्ते चला तो ५-१० साल बड़ी खलबली रही
पर हम लोगों ने अपने लोगों को रद्दी मान लिया है , उसकी वजह से यह मानसिकता होगी , इसका भरोसा नहीं होता
स्विच अपने हाथ में होगा तो उधार का भी स्वदेशीकरण हो जाएगा
गांधीजी खुद स्वदेशी का एक कच्चा सा मॉडल बना पाये थे
इतना ही नहीं , आजादी की लड़ाई में उमड़े जनसमुदाय को भी यह कह दिया गया कि जाइए , आपका काम पूरा हुआ
जब तक हम इस खोए हुए आत्मविश्वास को फिर से वापस नहीं लाते तब तक न देश स्वदेशी चल सकता है और न विदेशी
अंग्रेजों ने राज्य मुसलमानों से नहीं छीना
राज उन्होंने इन हिन्दू राजे-रजवाड़ों से ही छीना
अंग्रेजों ने राज्य मुसलमानों से नहीं छीना
१७८४ में मनुस्मृति का पहली बार अंग्रेजी अनुवाद हुआ
तो १०० साल से जब हमारी मानसिकता लोगों को गुलाम बनाने वाली हो गई और उसमें मनुस्मृति भिड़ा दी गई तो कारीगर गायब क्यों नहीं होंगे ? स्वदेशी मॉडल तो तभी बन सकता है जब आर्थिक और सामाजिक बराबरी बने
स्वदेशी और पश्चिम की पूरी अवधारणा को समझने के लिए १८ वीं सदी के अंग्रेजी समाज को समझना जरूरी है ! पश्चिम का विकास का मॉडल केन्द्रीकृत रहा है
पर मानसिकता के साथ जीवनपद्धति तो अपने आप उतरने लगती है
पर आज भी पश्चिमीकरण को मानने वालों की संख्या हमारे समाज में दो फीसदी से ज्यादा नहीं है
हमारे यहां विदेश रिटर्न होना भी उपलब्धि माना जाता है न इसलिए ! गांधीवादी आश्रमों में भी विदेश आते जाते हिन्दुस्तानी को सफल हिन्दुस्तानी कहा जाता है न ! बीच में १९५४ में यह होने लगा था कि विनोबा के बारे में पश्चिम क्या सोचता है ? इस विसंगति पर पूछने पर अन्दरखाने बताया जाता था कि पश्चिम में आदर मिल जाता है तो यहां दिल्ली में भी सुनवाई होने लगती है
हमारे यहां विदेश रिटर्न होना भी उपलब्धि माना जाता है न इसलिए ! गांधीवादी आश्रमों में भी विदेश आते जाते हिन्दुस्तानी को सफल हिन्दुस्तानी कहा जाता है न ! बीच में १९५४ में यह होने लगा था कि विनोबा के बारे में पश्चिम क्या सोचता है ? इस विसंगति पर पूछने पर अन्दरखाने बताया जाता था कि पश्चिम में आदर मिल जाता है तो यहां दिल्ली में भी सुनवाई होने लगती है
आजकल तो भाजपा वालों के भी भाषण विदेशियों के दो दर्जन उदाहरणों के बगैर पूरे नहीं होते
कांग्रेस ने ही नहीं , समाजवादियों , भाजपा आदि सबने वही मॉडल लिया
देहातों तक में आज ९० फीसदी माल हिन्दुस्तानी नहीं रहा है
लड़ाई के दौरान कांग्रेस का ढाँचा ब्रिटिश साम्राज्य के ढांचे पर बना
जो गांधी खादी को आन्दोलन का प्रतीक बनाते हैं , वे ही १९४४ में खादी के सम्मेलन में कहते हैं कि मैं तो कृषि को प्रतीक चाहता था पर दिक्कत देखते हुए खादी को प्रतीक बनाया
फिर १९४७ में वे कांग्रेस को खत्म करने की बात करते हैं
वे तो इस बात की चर्चा में लगे हैं कि आने वाले भारत को किस तरह का बनाया जाना चाहिए
फिर लोगों के सुझाव पर हरिजन शब्द लाते हैं
नेपाल के राजा ने कुछ जमीन मन्दिर के नाम की थी
स्थायी सेना तो यूरोप में भी १७०० के आसपास ही खड़ी होती है
१८९१ की जनगणना में अंग्रेज बड़े पैमाने पर जातिगत वर्गीकरण करते हैं
जाटों में ११ , ००० जातियों की और राजपूतों में ८५०० की
अब ये पंजाब के कारीगर जो छोटी मशीनें जोड़ लेते हैं , वे सिखाने पर हवाई जहाज भी जोड़ सकते हैं
मॉडल पर जनमत संग्रह हो जाना चाहिए
अगर ज्यादातर लोगों को लगता है कि प्लास्टिक युग में ही जाने में भलाई है , पिछले पर लौटने में फजीहत है , बाहरी ताकतें पिछले पर साबूत नहीं लौटने देंगी तो दूसरों को समाज को इस दिशा में जाने में रोड़ा नहीं बनना चाहिए
आज कांशीराम और मायावती गांधीजी के खिलाफ बोलते हैं , फिर उनके विरोध में हम लोग बोलने लगते हैं
तिरूपति में हाल ही में सम्पन्न भारतीय विज्ञान काँग्रेस में अनेक विशिष्ट वैज्ञानिकों ने भारत सरकार के , प्रौद्योगिकी नीति सम्बन्धी ताजे वक्तव्य पर बहुत बेचैनी प्रदर्शित की
उनमें से एक के अनुसार ‘हमारे यहाँ पुराने विज्ञान की ही पढ़ाई की जाती है ( स्नातक उपाधिधारियों के लिये ) , कई मामलों में ४० बरस पुराने प्रयोग ही पढ़ाये जाते रहते हैं
‘एक अन्य वैज्ञानिक के अनुसार 'आधिकारिक पदों पर बैठे ज्यादातर लोगों का किसी भी ताजे शोध के प्रति रवैया यह होता है कि क्या और कहीं ऐसा हुआ है ? ’ नई सूझों , नये विचारों को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता
पारम्परिक तकनीकी और स्थानीय मेधा की अवहेलना से अपने लोगों का आत्मविश्वास घटा है और स्थानीय प्रौद्योगिकी द्वारा बुनियादी स्तर पर समस्याओं के समाधान की क्षमता पर भी असर पड़ा है ( देखें ‘हिन्दू' , मद्रास १० जनवरी , १९८३ ) इसी अवधि में अन्यत्र सम्पन्न एक सभा में एक विशिष्ट और राजनैतिक तथा प्रशासनिक सत्ता के बहुत करीब रहे व्यक्ति ने यह अभिमत व्यक्त किया कि मौजूदा न्यायिक पद्धति 'नागरिकों के हित संरक्षण की दृष्टि से बहुत संवेदनाहीन , बेहद धीमी , और बेहद खर्चीली है
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में तथा विश्व मामलों की हमारी सरकारी समझ में प्रगति के भी लाभ गिनाये जाते हैं
इसी सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में नवम्बर १९४८ में इस प्रश्न पर गरम झड़प हो गई थी कि संविधान में भारतीय गाँवों का स्थान क्या हो ? संविधान का मसविदा वकीलों की एक समिति ने तैयार किया था
इसी सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में नवम्बर १९४८ में इस प्रश्न पर गरम झड़प हो गई थी कि संविधान में भारतीय गाँवों का स्थान क्या हो ? संविधान का मसविदा वकीलों की एक समिति ने तैयार किया था
नियोजित विकास की उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए या विक्षोभ की पद्धति को समझने के लिए भी , शायद यह जरूरी है कि भारत के हाल के अतीत में कुछ झांका जाय
सन् १९२९ तक भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की घोषित प्रेरणा थी , तत्कालीन ब्रिटिश राजनैतिक पद्धति के अन्तर्गत ही किसी तरह की समानता की उपलब्धि
किन्तु दिसम्बर १९२९ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश राज्य से पूर्ण स्वतन्त्रता की उपलब्धि का लक्ष्य निश्चित किया और महात्मा गांधी द्वारा तैयार स्वातन्त्र्य प्रतिज्ञा में कहा गया , ‘हमारा विश्वास है कि हर एक समाज की तरह , भारतीय जन का भी यह अहस्तान्तरकरणीय अधिकार है कि वह स्वाधीन रहे और अपने परिश्रम के फल का आनन्द ले तथा जीवन की जरूरतों से इस प्रकार युक्त रहें कि उनके पास विकास के सम्पूर्ण अवसर हों
हमारा यह भी विश्वास है कि यदि कोई सरकार लोगों को इन अधिकारों से वंचित करती है और उनका उत्पीड़न करती है , तो लोगों को यह अधिकार भी है कि वे उस सरकार को बदल दें या समाप्त कर दें
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक , राजनैतिक , सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया है और पूर्ण स्वराज पाने पर ही भारतीय जन विकास के पूर्ण अवसर पायेंगे , यह मुद्दा एक हद तक उस भारतीय संविधान द्वारा भी पुनः पुष्ट किया गया जो कि भारत ने जनवरी १९५० से अपने पर लागू किया
स्वाधीनता : विचारों , अभिव्यक्ति , विश्वास , आस्था और उपासना की
विशेषकर यह कि सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक न्याय वाली सामाजिक व्यवस्था की प्राप्ति और सुरक्षा के जरिए लोगों के कल्याण के प्रोत्साहन हेतु राज्य प्रयासरत रहे एवं राष्ट्रीय जीवन की समस्त संस्थाओं को इससे अवगत कराये तथा अन्य के साथ ही , इन बातों की प्राप्ति की दिशा में अपनी नीतियां निर्देशित करें ( अ ) कि समस्त नागरिक नरनारियों को समान रूप से आजीविका का उचित जरिया पाने का अधिकार हो
 ( ग ) कि आर्थिक व्यवस्था इस तरह से क्रियाशील हो कि उसके फल स्वरूप सर्वसाधारण के लिए हानिकारक रूप में धन और उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण न होने पाये
यद्यपि १९३० की स्वाधीनता की प्रतिज्ञा की शब्दावली का किसी सीमा तक संविधान में समावेश किया गया और वह भारत के नियोजित विकास का निर्देशक विचार ( सिद्धांत ) बनी , तथापि ऐसा प्रतीत होता है , और पिछले तीन दशकों की प्रवृत्तियों तथा घटनाओं से पुष्ट भी होता है कि व्यवहार में उसे अधिक गम्भीरता से नहीं लिया गया , विशेषकर उनमें से ज्यादातर लोगों के द्वारा , जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व के पदों पर अथवा स्वाधीनता पाने पर दिल्ली में बनी सरकार के प्रमुख पदों पर थे
जरूर वे यह भी सोचते थे कि अपने जोखिम भरे नजरिये के सिलसिले में वे ‘जनता के विशाल समूह को विश्वास में लें और उन्होंने देखा कि ‘जनता के विशाल समूह में यह उत्तेजना भरनी होगी कि वे राष्ट्र को गतिशील रखने के विराट उद्यम के सहभागी हैं , सरकार में और उद्योग में साझीदार हैं
कई समूहों ने , विशेषकर समाजवादियों ने , छोटी मशीनों की बात भी कही ( शायद भारत के लिये उपयुक्त प्रौद्योगिकी के सन्दर्भ में , जो कि स्वदेशी उपकरण , माल तथा साधनों से विकसित हो सके ) तथा 'चौखम्भा राज्य’ आदि शब्दावलियों के सहारे देश के लिये अधिक उपयुक्त राजनैतिक ढांचे की बात कही और दीर्घकालिक सामाजिक एवं रचनात्मक सेवाकार्य के लिये विशाल भूमिसेना की बात की
सम्पूर्ण गांव की ग्राम सभा , ग्रामसमुदाय तथा लोकशक्ति के विचार के आधार पर भारतीय राजनैतिक स्वरूप ( पोलिटी ) को पुष्ट करने वाला सर्वोदय आन्दोलन भी उभरा
पश्चिम ने अपने बारे में बहु प्रचारित किया कि यूरोपीय मनुष्य का इतिहास और उसकी प्रेरणायें तथा सैद्धांतिक निरूपण सार्वभौम हैं
फलतः हम यह मानने लगे कि पश्चिम ने अपने १००० वर्षों के इतिहास में जो कुछ किया है उसे अपने यहाँ दुहारने में हम भी समर्थ हैं
ईसवी सन १८०० के आसपास , जब भारतीय समाज के बड़े हिस्से को यूरोपीय राजनैतिक शक्ति ने छिन्नभिन्न कर दमित कर रखा था , उस समय भी भारत के अधिकांश हिस्सों में लोगों के बीच अधिक समानता थी , और यहाँ के साधारण श्रमिक ब्रिटेन के जनसाधारण से अधिक मेहनताना पाते थे
थॉमस मुनरो के अनुसार बेलारी जिले में उच्च , मध्यम और निम्न वर्गों में प्रतिव्यक्ति उपभोग-ढांचा १७:९:७ के अनुपात में था
इसके साथ ही , घर पर बड़ी संख्या में शेष बच्चे पढ़ रहे थे ( मद्रास शहर में की गई एक गणना के अनुसार शालाओं में जाने वाले बच्चों की संख्या की गई एक गणना के अनुसार शालाओं में जाने वाले बच्चों की संख्या से चार गुने बच्चे घरों में पढ़ रहे थे ) 
तमिलभाषी क्षेत्र में पाठशालाओं में ( यहां सर्वत्र आशय देशी पाठशालाओं से है , अंग्रेजी व्यवस्था द्वारा संचालित स्कूल तब नहीं थे ) पढ़ रहे कुल बच्चों में शूद्र जाति के और तथाकथित अन्त्यज जातियों के बच्चों की संख्या ६० से ८० प्रतिशत थी
साथ ही , औद्योगिक उत्पादन और कृषि दोनों में गुणात्मक वृद्धि भी हुई है
अधिक सुरूचिपूर्ण और अधिक व्यवस्थित जीवन का सृजन करने के स्थान पर इस प्रक्रिया ने वस्तुतः साधारण जीवन को अधिक अस्थिर , अधिक असुरक्षित और निश्चय ही ज्यादा बदसूरत बना डाला है
यह कहना शायद गलत न होगा कि हमारे कस्बों , शहरों और महानगरों में भी कुछ सौ वर्ग मीलों में फैले केन्द्रीय क्षेत्रों और सिविल लाइनों के अतिरिक्त , शेष क्षेत्र का विगत तीन दशाब्दियों में हर दृष्टि से हास ही हुआ है और इन स्थानों में से अधिकांश तेजी से एक विशाल 'स्लम’ की दिशा की ओर बढ़ रहे हैं
इसके विपरीत भारत के गाँव जो यदाकदा कुलीन वर्ग की गहरी दिलचस्पी के केन्द्र बनते रहते हैं , अत्यधिक दरिद्रीकरण और बुनियादी जन सुविधाओं के अभाव के बावजूद व्यवस्था और निवास की योग्यता में तुलनात्मक दृष्टि से अभी भी बहुत बेहतर हैं
हमारे निजी निवास , छात्रावास , होटल आदि में पश्चिमी ढंग के शौचालयों का निर्माण जारी है , जबकि कोई बिरला भारतीय ही इनका उपयोग करने में सुविधा का अनुभव करता होगा
आराम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है , तब भी यदि इस मामले में तनिक भी विचार से काम लिया जाता , तो अकेला यह तथ्य ही इन शौचालयों की स्थापना को रोक देने को पर्याप्त होता है कि इस यूरोपीय ढंग के शौचालयों में बहुत अधिक पानी ‘फ्लश' के लिये जरूरी होता है और पानी मोटे तौर पर हिन्दुस्तान में एक दुर्लभ वस्तु ही है
इसका परिणाम यद्यपि बिल्कुल निराशाजनक नहीं रहा है , तथापि ऐसा भी नहीं है कि हम दावा कर सकें कि हम एक पश्चिम जैसा समाज बनाने जा रहे हैं
यह तो हो सकता है कि लगभग पाँच-पचास लाख भारतीय घरों में आज टेलीविजन सेट हों , रेफ्रीजरेटर हों , गैस वा बिजली के चूल्हे हों , शायद दस लाख कारें हों तथा ऐसा ही कुछ और हो , लेकिन इन्हीं ( सत्तावर्गीय ) स्रोतों के अनुसार भारतीय जनता का आधा हिस्सा ‘गरीबी रेखा के नीचे रहता है और ‘गरीबी रेखा से ऊपर वाले लोगों का अधिकांश हिस्सा घंटों तक परिवहन , दूध , चीनी , मिट्टी के तेल , खाद्य पदार्थ आदि के लिए लाईन लगाने में खर्च करने को विवश है
पर दुर्भाग्यवश उनके उत्तराधिकारियों ने , विशेषकर जो स्वाधीन भारत के प्रबन्धक बने , उन्होंने ब्रिटिश राज्य के समय का व्यवहार का ढांचा अपना लिया
इसमें ‘स्वराज' शीर्षक से अपने लेख में गांधीजी ने स्वराज लोकतंत्र की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था , यह एक सामुद्रिक वृत्त होगा , जिसका केन्द्र होगा व्यक्ति , जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा , गांव ग्रामसमुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा , यही क्रम चलता रहेगा और सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा , जो अपने मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे , सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे , जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं
इसमें ‘स्वराज' शीर्षक से अपने लेख में गांधीजी ने स्वराज लोकतंत्र की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था , यह एक सामुद्रिक वृत्त होगा , जिसका केन्द्र होगा व्यक्ति , जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा , गांव ग्रामसमुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा , यही क्रम चलता रहेगा और सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा , जो अपने मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे , सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे , जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं
 ( सभ्यता सम्बन्धी उनका यह विश्लेषण सर्वप्रथम १९०९ में 'हिन्द स्वराज' में सामने आया
ऐसी परिस्थितियों में , भारतीय राजनैतिक व्यवस्था को तथा जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय विचारशील भारतीयों को उन भागों तथा साधनों को खोजना होगा , जिनमें राष्ट्र की एकता सुरक्षित रहने के साथ साथ देशजन को स्वतन्त्रता , अवसर और आनुपातिक राष्ट्रीय साधनस्रोत उपलब्ध हो सकें जिसमें विविध स्तरों पर लोग जीवन की अधिक आवश्यक और बुनियादी समस्याओं पर विचार करना तथा उनका समाधान करना प्रारम्भ कर सकें
अब हमारे पास भारतीय मामलों के प्रबन्ध का पैंतीस वर्षों ( अब ५० वर्षों ) का अनुभव है , और साथ ही अन्तरराष्ट्रीय जगत का अधिक यथार्थपरक परिचय है और शायद , औद्योगिक क्रान्ति की उपलब्धियों की चकाचौंध से भी हम कुछ मुक्त हुए हैं , यह तथ्य अवश्य नये मार्गों तथा साधनों के सृजन को अधिक व्यावहारिक बना देता है
अब हमारे पास भारतीय मामलों के प्रबन्ध का पैंतीस वर्षों ( अब ५० वर्षों ) का अनुभव है , और साथ ही अन्तरराष्ट्रीय जगत का अधिक यथार्थपरक परिचय है और शायद , औद्योगिक क्रान्ति की उपलब्धियों की चकाचौंध से भी हम कुछ मुक्त हुए हैं , यह तथ्य अवश्य नये मार्गों तथा साधनों के सृजन को अधिक व्यावहारिक बना देता है
भारतीय योजनानिर्माताओं तथा उनके स्वामियों और प्रेरकों की बहुत गम्भीर गलती यह रही है कि उन्होंने देवताओं की तरह व्यवहार करने का प्रयास किया ( या आधुनिक बिम्बविधान से बात करें तो कहना होगा कि उन्होंने उस महान श्वेत मनुष्य की तरह व्यवहार करने की कोशिश की , जो संसार के जंगली लोगों के लिए दिव्य उपहारों का बोझ लेकर आया बताया जाता है
शायद यह समय है जबकि हम वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही सामान्य बुद्धि का प्रयोग करें और आज की कठोर वास्तविकता से एक एक कदम आगे बढ़े
शायद यह समय है जबकि हम वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही सामान्य बुद्धि का प्रयोग करें और आज की कठोर वास्तविकता से एक एक कदम आगे बढ़े
हमारे देश में या तीसरी दुनिया के दूसरे देशों में परिवार , शिक्षा और समाज की जो अवधारणा आज प्रचलित है उनकी नींव ग्रेट ब्रिटेन या अमेरिका में १९ वीं सदी के दौरान पड़ी थी
पुराने यूनानी दिनों से लगा कर १९ वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप में परिवार और शिक्षा का सम्बन्ध राजनैतिक सत्ता या सम्पत्ति हासिल करने से जुड़ा रहा है
लेकिन पुराने स्पार्टा में , जहां नब्बे प्रतिशत आबादी दास या अजनबी लोगों की थी और जिन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं थे या १९ वीं शताब्दी के ब्रिटेन में , जहां सिर्फ एक प्रतिशत लोग जेंटलमैन समझे जाते थे , परिस्थितियां बहुत अलग नहीं थीं
लेकिन पुराने स्पार्टा में , जहां नब्बे प्रतिशत आबादी दास या अजनबी लोगों की थी और जिन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं थे या १९ वीं शताब्दी के ब्रिटेन में , जहां सिर्फ एक प्रतिशत लोग जेंटलमैन समझे जाते थे , परिस्थितियां बहुत अलग नहीं थीं
अठारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण के दौरान जो बहसें चलीं और उनमें से जो सिद्धांत निकले उन्होंने इस सम्भावना की तरफ इशारा करना शुरू किया कि परिवार और शिक्षा रूपी इन दोनों विशेषाधिकार को पश्चिमी यूरोप के सभी या अधिकांश लोगों तक फैलाया जा सकता है
क्रान्ति के डर ने उन्हें ईसाई व दूसरी नैतिक मान्यताओं को आम लोगों तक फैलाने के लिए प्रेरित किया
इसी भय से उन्हें परिवार की अवधारणा को आम लोगों में फैलाने की जरूरत महसूस हुई ताकि वैधानिक रूप से स्थापित हुई सत्ता की अधीनता मानने की आदत लोगों में डाली जा सके
पुनर्जागरण काल के तर्कवाद ने इस धारणा को भी पैदा किया कि अगर उचित संस्थाएं खड़ी कर दी जाएं और उचित माहौल बना दिए जाए तो सभी लोग सम्पत्तिवान और ताकतवर हो सकते हैं
दूसरी तरफ लोगों को समुदायों की जैविक इकाइयों से तोड़ कर अकेला कर दिया गया
१९ वीं शताब्दी तक भौतिक जीवन में स्वतंत्रता का उपभोग मुट्ठी भर लोगों तक ही सीमित था
१९ वीं शताब्दी तक भौतिक जीवन में स्वतंत्रता का उपभोग मुट्ठी भर लोगों तक ही सीमित था
फिर भी जो लोग बहुत दुस्साहसी , उद्यमी या हताश होते थे , ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न निकले पर बहुसंख्यक आबादी के ऐसे लोग भी अपने देश के भीतर या दूरदराज इलाकों में राजनैतिक सत्ता या सम्पत्ति हासिल करने में सफल हो जाते थे
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उपभोग का दायरा बढ़ जाने के कारण और विज्ञान व प्रौद्योगिकी की विशाल उपलब्धियों के कारण १९ वीं शताब्दी में जो आदर्शवादी ढांचे बनाए गए थे उनसे भी मुक्ति पाने में मदद मिली है
उनका आधार तो सम्पत्ति और सत्ता ही रहा था
इसलिए परिवार की आदर्शीकृत अवधारणा तो टूटनी ही थी
आज के पश्चिम में परिवार कुछ कुछ सराय जैसा दिखाई देता है जिसमें रहने वाले लोगों में कुलीय भावना जैसी कोई चीज नहीं होती
दास प्रथा , सामंतवाद या सर्वहारा जैसी परिस्थितियों के कारण पश्चिमी समाज में पारिवारिक सम्बन्धों के पनप सकने लायक माहौल ही नहीं रहा
आज हम यूरोप में जिस परिवार के टूटने की इतनी बात करते हैं वह केवल परिवार की एक १९ वीं सदी वाली आदर्शीकृत अवधारणा का टूटना ही है
पश्चिमी यूरोप या अमेरिका में सत्ता और सम्पत्ति के केन्द्रीकरण व व्यक्तिगत स्वतंत्रता सम्बन्धी विचारों ने इस बात की तो कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी कि वहां समाज जैसी कोई चीज़ उभर सके
इसके अलावा सत्ता और सम्पत्ति के केन्द्रीकरण व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार के बावजूद पश्चिमी यूरोप में समाज की मान्यता पूरी तरह नहीं मर पाई
काफी पुराने समय से भारत के लोग अपने आपको गांव , कस्बे या तीर्थों को केन्द्र बनाकर अथवा जाति या उद्योग-धंधों को केन्द्र बना कर संगठित करते रहे हैं
उदाहरण के लिए हर व्यक्ति स्थानीय इकाई का भी सदस्य होता था , जाति का भी और शिल्प या उद्योग व्यापार सम्बन्धी श्रेणी का भी
भारत के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सभ्यता के नाते तो वह बहुत पुराने जमाने से ही इकाई माना जाता रहा है लेकिन उसकी बुनियादी राजनैतिक इकाइयां तो किसी छोटे इलाके में ही सीमित होती थीं
यहां चक्रवर्ती राजा की अवधारणा भी रही है
लेकिन ऐसे मामलों में भी उनकी शक्ति मुख्यत: प्रशासनिक ही थी
शासन के विधिनियमों की व्याख्या तो धर्म द्वारा स्थानीय रीतिरिवाजों द्वारा पहले से ही हुई रहती थी
इस व्याख्या को समय समय पर जातियों या औद्योगिक श्रेणियों द्वारा सामूहिक विचार-विमर्श के जरिए बदला या सुधारा जाता रहता था
हमारे यहां विवाह को शायद ही कभी व्यक्तिगत घटना माना जाता हो , वह तो एक सामाजिक घटना है
इन सामाजिक सम्बन्धों और विवाह सम्बन्धों के कारण शिक्षा या दूसरे सभी सामाजिक कार्य समाज की ज़रूरतों और समुदायों के अपने काम धंधे की ज़रूरतों से निर्धारित होते रहे हैं
शिक्षा के बारे में दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह विभिन्न शिल्पों के विशेषज्ञ माने गए लोगों द्वारा दी जाती थी
शास्त्री या अधिक विशेषता वाली शिक्षा तो विद्यालयों और विद्यापीठों में ही दी जाती थी और वे आज के स्कूलों और कॉलेजों या उच्च शिक्षा संस्थानों जैसे ही थे
इस विश्लेषण और बहस के जो भी नतीजे निकले , लेकिन हमें अपने भविष्य के बारे में फैसले लेने से पहले यह गारंटी जरूर कर लेनी चाहिए कि दोनों सभ्यताओं की बुनियादी अवधारणाओं के बारे में कोई घालमेल और गलतफहमी न रहे
मुस्लिम शासकों का शासन करने का ढंग और मुहावरा भी भारतेतर विचारों में ढला था
इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य उन लोगों के पक्ष में इतिहास का चक्र मोडना था जो पश्चिमी विचारों के ढांचे में ढल चुके थे , और उन लोगों को किनारे करना था जो देसी तौर तरीकों की वकालत करते रहते थे
बेंटिक इस समाचार से सन्तुष्ट हुआ था कि निरर्थक कामों में खर्च किया जाने वाला पैसा बहुत बड़ी हद तक घटा दिया गया है
१९४६ से १९४९ के बीच स्वतंत्र भारत का संविधान जिस तरह तैयार किया जा रहा था उससे भी इन परिस्थितियों को समझा जा सकता है
स्वतंत्र भारत के जन प्रतिनिधि इस संविधान पर विचार करने के लिये संविधान सभा के रूप में बैठे जरूर पर करीब करीब हर मामले में उन्हें अंगूठा लगाने की ही भूमिका निभानी पडी
लेकिन जहां तक भारतीय पद्धतियों के अनुरूप ढालने की बात है , कुछ नहीं किया गया
देश के अपने आदर्शों , मर्यादाओं , विज्ञान और तकनीक पर चर्चा रही
वर्ष के अन्त में देश की अपनी कला से सम्बन्धित उत्सव हुए , और इनमें न केवल भारत के कोने कोने के गान , नृत्य , कथायें सामने आईं अपितु निकटवर्ती बौद्ध देशों के विद्वानों और कलाकारों ने भी भाग लिया
जो साहस , आत्मविश्वास , देश को बनाने का उत्साह , सन् १९४७ से पहले आया था , उस पर पिछले पचास बरस ने बहुत हद तक पानी फेर दिया
लेकिन १९४५ के बाद तो पश्चिमी प्रभाव में आए लोग फिर से आगे आए और १९४७ में उन्होंने ही देश को चलाने की बागडोर संभाली
कुछ थोड़े ही मनुष्य मनुष्य माने जा सकते हैं , बाकी तो पशु व शेष प्रकृति के समान हैं
ऐसी स्थिति में से हम निकलना चाहते हों तो हमें अपने देश की परम्पराओं , मान्यताओं , विद्याओं और भारतीय स्वभाव के आधार पर नया भारत बनाना शुरू करना चाहिए
अंग्रेजों से मिले तंत्र व व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ने का हमें शीघ्र ही निश्चय कर लेना चाहिए , और ऐसी योजना बनानी चाहिए कि अधिक से अधिक २०-२५ बरस में हम अपने पाँवों पर खड़े हो जाएँ , हमारी अपनी व्यवस्थाएँ पूरी तरह स्थापित हो जाए और अंग्रेजों के दिए तंत्र व्यवस्था को हम ताक पर रखें , पुराने लेखागारों में कभी अध्ययन के लिए रख दें
अंग्रेजों से मिले तंत्र व व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ने का हमें शीघ्र ही निश्चय कर लेना चाहिए , और ऐसी योजना बनानी चाहिए कि अधिक से अधिक २०-२५ बरस में हम अपने पाँवों पर खड़े हो जाएँ , हमारी अपनी व्यवस्थाएँ पूरी तरह स्थापित हो जाए और अंग्रेजों के दिए तंत्र व्यवस्था को हम ताक पर रखें , पुराने लेखागारों में कभी अध्ययन के लिए रख दें
हमें ऐसा मान लेना चाहिए कि पिछले २००-२५० बरस हमारे लिए विपत्ति के ही रहे हैं और उनमें जो कुछ हुआ उससे भारत वर्ष में रहने वालों का विनाश ही हुआ
आज सबसे पहले तो हमें अपनी कृषि , वनव्यवस्था व पशुपालन पर ध्यान देना होगा
ये ही हमारे समाज के मुख्य भौतिक आधार हैं
पश्चिम से आए हुए तरीकों को छोड़कर , हमें अपने तरीकों , बीजों , फसलों , सिंचाई व्यवस्थाओं पर आना होगा और जो आवश्यक बदलाव उनमें करने हों वे भी करने होंगे
यह भी अत्यन्त आवश्यक है कि भारतवर्ष जल्दी से जल्दी विदेशों से अनाज , तेल और खानेपीने के दूसरे सामान लेना बन्द कर दे
पिछले १०-१२ बरसों के अध्ययन ने यह बतलाया है कि १७५० के करीब भारतवर्ष और चीन के क्षेत्र में कुल विश्व का ७३ प्रतिशत औद्योगिक उत्पादन होता था
हमारे बच्चों का पालन और शिक्षा पिछले १५०-२०० वर्षो में बुरी तरह से बिगड़ी है
वैसे यूरोप और अमरीका से हम मित्रता रखते हुए भी , उनसे आवश्यक दूरी रख सके तो वह हमारे लिए ही नहीं सभी के लिए शुभ रहेगा
यह आवश्यक है कि हम अपने करीब के देशों से - विशेषत: चीन , कोरिया , जापान , थाईलेण्ड , कंबोडिया , इंडोनेशिया , वियतनाम , श्रीलंका , नेपाल , म्यांमार ( बर्मा ) , बांग्लादेश , पाकिस्तान , अफगानिस्तान , ईरान से करीबी सम्बन्ध दोबारा कायम करें
लेकिन इन देशों के सोच व स्वभाव हमारे देश के सोच व स्वभाव से बहुत मिलता जुलता है
यह काम शीघ्र ही विद्याकेन्द्रों के द्वारा पी . एच . डी . , व इसी तरह के अध्ययन कार्यक्रम में होने चाहिए
हमें अंग्रेजों ने और अंग्रेजी शिक्षा ने जो जो सिखा दिया था , उसे ही हम अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगे थे
अपने इतिहास के प्रति ग्लानि तथा हीनता का भाव शिक्षित भारतीयों में गहराई तक घर कर गया था
यह भी था कि गांधीजी ने 'हिन्द स्वराज' में पूर्व और पश्चिम की दो भिन्न भिन्न सभ्यताओं की बात उठाई और यहां के जनमानस में पहले से ही बैठी अपनी सभ्यता की विशेषताएं दिखाई
उसका भी कुछ प्रभाव हमारे ऊपर था , लेकिन आधुनिक शिक्षित वर्ग में ज्यादातर तो हवा एक ही थी कि पश्चिम बहुत आगे बढ गया है , हमें भी उसी रास्ते पर तेजी से आगे बढना है
विश्व के बारे में हमारी जो धारणा थी , उसमें पश्चिम की शक्ति और सफलताएं ही प्रमुख थीं , उसकी विकृतियां , ऐतिहासिक क्रूरताएं , बर्बरताएं हमारे ध्यान में नहीं थीं
भिन्न भिन्न स्मृतियों में भी अलग अलग व्यवस्थाएं है , इसका कारण भी यही समय का अन्तर है
जैसे १८५० के यूरोप में जो विज्ञान व तकनीकी विकसित थी वह चीन में २००० वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुकी थी
लेकिन चीन ने बारुद बनाने की विधियों से उत्सवों आदि में काम आने वाली आतिशबाजियां व पटाखे बनाए , जबकि यूरोप ने अब से पांच छ: सौ वर्ष पहले वही विधि जानकर युद्ध और हिंसा के लिए हथियार बनाये
लेकिन चीन ने बारुद बनाने की विधियों से उत्सवों आदि में काम आने वाली आतिशबाजियां व पटाखे बनाए , जबकि यूरोप ने अब से पांच छ: सौ वर्ष पहले वही विधि जानकर युद्ध और हिंसा के लिए हथियार बनाये
भारत में भी इस्पात तथा लोहे के निर्माण की अपनी विकसित विधि थी
हमने मान लिया था कि पश्चिमी चिन्तन ही सारे संसार को जीत लेगा , इसलिए जल्दी जल्दी उसी राह पर हम बढ़ चले
खेती या पुराने हुनर , शिल्प , कलाकौशल , उद्योग आदि के बारे में तो घर की स्त्रियां भी उतना ही जानती थीं , जितना पुरुष; बल्कि प्राय: स्त्रियां कुछ अधिक ही जानती थीं
जब इतने वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में एक व्यक्ति अंग्रेजी को प्रभुत्व की , प्रतिष्ठा की भाषा मान रहा था , तो स्पष्ट है कि भेद तो बढ रहा था
मैकाले के सामने कुछ अंग्रेज अफसरों ने यह तर्क रखा था कि यहां बंगाल में तो एक लाख देशी स्कूल पहले से हैं , उन्हें हम दस दस रूपया भी प्रति वर्ष दें तो उनका काम चलता रहेगा
उस पर मैकाले ने कहा कि नहीं , उन्हें कुछ भी देने का कोई औचित्य नहीं है , वह तो व्यर्थ होगा
अभी कुछ दिन पहले प्रख्यात दार्शनिक विद्वान दयाकृष्ण यहां दिल्ली में बतला रहे थे कि १८५० के करीब से , जब अंग्रेजों ने भारत में विश्वविद्यालय स्थापित करने शुरू किये , हमारा आत्मचित्र और आत्मस्मृति बिगड़नी शुरू हुई
शायद प्लेटो का भी यही विचार रहा हो , पूंजीवाद और मार्क्सवाद का तो है ही कि लोग कुछ नहीं है , वे तो हमारे द्वारा सुधारे जाएंगे , पीटे ढाले जाएंगे , फिर जिधर हम चाहेंगे , उधर वे चलते चले जाएंगे , हम बढते चले जाएंगे
शायद प्लेटो का भी यही विचार रहा हो , पूंजीवाद और मार्क्सवाद का तो है ही कि लोग कुछ नहीं है , वे तो हमारे द्वारा सुधारे जाएंगे , पीटे ढाले जाएंगे , फिर जिधर हम चाहेंगे , उधर वे चलते चले जाएंगे , हम बढते चले जाएंगे
भारत में , जहां लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूर्ण होना तो कुछ कठिन नहीं था , हमसे वह भी नहीं हो पा रहा है
उसमें समाज का मन , बुद्धि , पुरुषार्थ , प्राणशक्ति खिलकर नहीं लगी
५० वर्षों में हमने बहुत नया कबाड़ इकट्ठा कर लिया
छांटने का विवेक खोकर , हम बस संग्रह करते गये
हमारे बारे में जो जो सिखाया पढ़ाया गया है , उसके बारे में सन्देह करना भी सीखें , सबको निर्देश मानकर स्वीकार न करते चलें , यह बहुत जरूरी है
संयुक्त राज्य अमेरिका में रेड इंडियनों ( वहाँ के मूल निवासियों ) की गणना पुरानी जनगणनाओं में कभी की ही नहीं जाती थी , क्योंकि यूरोप से आए लोग रेड इंडियनों को मनुष्य नहीं मानते थे
'जात' शब्द प्रयोग कुलविशेष में जन्मे व्यक्तियों के अर्थ में ही किया जाता रहा है
संसार में सभी समाज और सभ्यताएं एक दूसरे से सीखते रहते हैं , पर वे सीखी हुई विद्या , जानकारी और हुनर को अपना बना लेते हैं
इस सुझाव में गांधीजी की शर्त थी कि ये दोनों योजनाएं विदेशों से किसी तरह से धन व साधन नहीं लेंगी और जो भी धन व साधन जरुरी होंगे , वे भारत के अन्दर से ही लिए जाएंगे
यूरोप का स्वचालन ( आटोमेशन ) का विचार तो २३०० वर्ष पहले अरस्तू ने भी उठाया
४०-५० वर्ष पहले हमारे मित्र रामस्वरूप ने अपनी पुस्तक "कम्युनिज्म एंड द पीजैण्ट्री' में आधुनिक उत्पादन ( मॉडर्न प्रोडक्शन ) के विषय में कुछ प्रश्न उठाये थे
आज की स्थिति में यह विचारणीय एवं आवश्यक लगता है कि भारत में बृहत् समाज को समुचित साधन व स्वतंत्रता मिले , जिससे बृहत् समाज की इकाइयां अपनी मान्यताओं , व्यवस्था की अपनी प्रणालियों और अपने तकनीकी ज्ञान के आधार पर चल सकें
भारत में कृषि व उद्योग या ऐसे अन्य क्षेत्रों में ८० प्रतिशत उत्पादन तो आज भी परम्परागत भारतीय प्रतिभा के लोग ही करते हैं
पर यह बंटवारा हमें सामाजिक विनाश की ओर ही ले जाता है
यह सही है कि पश्चिम को इसका अभ्यास रहा है कि ९० क्या , ९९ प्रतिशत तक की आबादी को एक प्रतिशत प्रभुवर्ग दासत्व में बांधकर रखे और उनसे मशीन जैसा बनाकर काम ले
अभी की तरह ८५-९० प्रतिशत साधनों का उपयोग केवल उन्हें हि तो नहीं करने दिया जा सकता
दूसरी और , ८०-८५ प्रतिशत लोगों को अपने साधनस्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग करने दिया जाए
दूसरी और , ८०-८५ प्रतिशत लोगों को अपने साधनस्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग करने दिया जाए
आत्माभिव्यक्ति के स्वतंत्र अवसर मिले , तो वे आवश्यकतानुसार बाह्य ज्ञान को आत्मसात् भी करते रहेंगे
सन् १७५० से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही , अंग्रेजों ने यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था
दूसरा , और इससे भी अधिक महत्त्व का काम था भारत के खुशहाल खेतिहरों व कारीगरों को अलग अलग तरीकों से अपने अधीन करना और यहां की खेती की उपज के आधे से अधिक भाग कर ( टैक्स ) के रूप में बंदूक व तलवार के जोर पर वसूल करना
अंग्रेजी व्यवस्था ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को खतम कर दिया और उसकी जगह नई केन्द्रीकृत व्यवस्था लागू की
इसके साथसाथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी व्यवस्था ने तिगुना चौगुना बढ़ा दिया और सन् १७९० के आसपास जमीन की मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी , जिन्हें जमींदार कहा गया
वैसे इंग्लैंड में ७०० वर्षो से जमींदार होते रहे थे , लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल का ५०-८० प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे , सरकार को कुल फसल का लगभग १० प्रतिशत देते थे
भारतीय व्यवस्था में लगान , जिसकी दर वैसे भी काफी कम थी , अनाज के रूप में ही लिया जाता था
अंग्रेजी व्यवस्था के आने से गरीबी में भारी बढ़ोत्तरी हुई और उसकी फसल के दाम गिर गये
यह सिलसिला अगले ४०-५० वर्ष तक चलता रहा और इस दौरान भारत की जनता की एक बड़ी संख्या भुखमरी , अकाल इत्यादि से सन १९०० और उसके बाद तक मरती रही
कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार , 'कुल दुनिया कि लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर ( सन् १७९३ से सन् १९०० तक ) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल दस वर्ष में ( सन् १८९१ से सन् १९०१ तक ) भूख , अकाल के मारे एक करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये' ( हिन्दी ग्रंथमाला , मई , १९०८ पृष्ठ ९ और 'भारत भारती' , संवत् १९६९ , पृष्ठ ८७ ) 
इससे पहले , सन् १८७० के आसपास भारतेन्दु हरिश्रंद्र ने कहा था कि अंग्रेजों ने भारतवासियों से सब कुछ ले लिया , लेकिन उन्हें भीख मांगना अवश्य सिखा दिया है
महात्मा गांधी जनवरी १९१५ में भारत लौटे थे
कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार , 'कुल दुनिया कि लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर ( सन् १७९३ से सन् १९०० तक ) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल दस वर्ष में ( सन् १८९१ से सन् १९०१ तक ) भूख , अकाल के मारे एक करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये' ( हिन्दी ग्रंथमाला , मई , १९०८ पृष्ठ ९ और 'भारत भारती' , संवत् १९६९ , पृष्ठ ८७ ) 
इस तरह के शोषण और अत्याचार के कारण भारतीयों में अंग्रेजो से लड़ने की शक्ति नहीं रह गयी
वैसे तो भारत के लोग कभी भी खूंखार व लड़ाकू नहीं रहे , न ही उन्हें न्यायालयों में जाने का चाव ही था
अंग्रेजी राज्य ने उनके खेतों को छीनकर उद्योगों व घरों को उजाड़ कर , उन्हें न्यायालयों की शरण लेने के लिए एक तरह से बाध्य किया
भय और उसके साथ साथ गरीबी और मुफलिसी का राज्य छा गया
फिर भी अंग्रेज कुछ भयभीत ही रहे , विशेषकर भारतीय सैनिकों से
साधारणत: तो अंग्रेज यही मानते थे कि भारतीय सैनिक , जिनकी संख्या सन् १८२०-३० में दो तीन लाख रही होगी उनके प्रति वफादार हैं
इसी बीच सन् १८२९-३० के बर्षो में यह भी तय किया गया कि अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीय लोगों को भारत में जहाँ तहाँ , विशेषत: पर्वतों पर , ठंडी जगहों पर बसाया जाये
सन् १८५७-५८ की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद , जिसमें अन्तत: भारतीय हार ही गये , उनके सैकडों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर , अलग अलग तरीकों से , मार दिया गया
सन् १८५७-५८ की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद , जिसमें अन्तत: भारतीय हार ही गये , उनके सैकडों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर , अलग अलग तरीकों से , मार दिया गया
सन् १९४६ से सन् १९४९ तक जो संवैधानिक सभा हमारे यहां बैठी , और जिसमें संविधान के बारे में काफी सोच विचार और बातचीत हुई , उसमें भी इस तरह के प्रश्न उठे होंगे
हम लोग इस पर सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेगें तो , दस बीस वर्ष में भारत में , अंग्रेजों के बनाये तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं
वैसे तो भारत पिछले २०-३० वर्षो से विश्वशक्तियों के बढ़ते दबाव में है
और कुछ महीनों से खादी ग्रामोद्योग आयोग इसमें लगा है कि हम खादी से अमरीकी जीन्स कपड़ा डैनिम और उससे जीन्स बनवायें और उन्हें विदेशों में भेजें
जैसे दो हजार बरस से यूरोप , व उसके बाद अरब लोग मुख्यत: अंतरराष्ट्रीय व्यापार व लूटमार पर जीवन चलाते थे
यह ऊपर जो कहा गया है वह अधिकांशत: तो हमारे २००-२५० बरस की दासता का परिणाम है , और पिछले ५० बरस में हमारे ऊपर जो बाहर का बढ़ता दबाव है उससे इसका भारतव्यापी विस्तार हुआ है
अंग्रेजों ने ३००-४०० बरस पहले क्रोमवेल के मध्य सत्रहवीं शती के समय से अपने यहां दो दलों को लेकर राज्यव्यवस्था बनानी शुरू की
जैसे कि १८ वीं शती के अन्त में ब्रिटिश लेबर पार्टी बनी तो पुरानों में से एक दल क्षीण पड जाता है जैसे कि विग व लिबरल क्षीण हुए
हमारा 'स्टील फ्रेम' कहा जाने वाला अंग्रेजों का दिया तंत्र व ढांचा भी अब शक्तिहीन ही है , उसके बस का अब लोगों को बराबर भयभीत कर लेना नहीं है जो कि ब्रिटिश समय में उसका मुख्य काम था , लेकिन लोगों के रास्तें में बाधायें कायम करना तो अभी तक जारी है ही
जिससे भारत के १० से १५ प्रतिशत लोग तो सरकारी व्यवस्था के खंभे बन गये हैं , और बाकी ८५ से ९० प्रतिशत निरुत्साहित , कंगाल और साधनहीन
इस तरह के टूटने की एक भयंकर शुरूआत दिल्ली के सांसदों और विधानसभा के सदस्यों को लेकर ही शुरू हुई
वैसे तो आज का सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , सांस्कृतिक ढांचा इन २००-१५० वर्षों में , या और पहले से ही , जर्जर होता गया है , लेकिन पिछले ८-१० बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है
क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर ही भारत को संभाल सकेंगे , सुव्यवस्थित रख सकेंगे , समृद्धि दे सकेंगे और विश्व के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे
भारतीय केन्द्र व्यवस्था से यह कभी होने वाला नहीं है , यह तो एक प्रवंचना है
क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर ही भारत को संभाल सकेंगे , सुव्यवस्थित रख सकेंगे , समृद्धि दे सकेंगे और विश्व के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे
श्री धर्मपालजी का जन्म सन् १९२२ में उत्तर प्रदेश के मुझफ्फरनगर में हुआ था
१९३० में ८ वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार गांधीजी को देखा
१९४० में , १८ वर्ष की आयु में उन्होंने खादी पहनना शुरू किया
१९४२ में 'भारत छोडो' आन्दोलन में भाग लिया
१९४९ में उनका विवाह अंग्रेज युवति फिलिस से हुआ
धर्मपालजी एवं फिलिस के एक पुत्र एवं दो पुत्रियां हैं
१८ वीं एवं १९ वीं शताब्दी के भारत के विषय में अनुसन्धान कर के लेख लिखे , भाषण किये , पुस्तकें लिखीं
लगभग सन् १८०० तक विज्ञान और तंत्रज्ञान के बहुत से क्षेत्रों में यूरोप के कतिपय प्रदेश पीछे रहने के कारण ब्रिटिश विद्वानों में इस समझ का अभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है
समुचित समझ के अभाव के दो उदाहरण प्रस्तुत हैं - शीतला प्रतिरोधक टीकाकरण तथा वपित्र के उपयोग से सम्बन्धित हैं
यूरोप में वपित्र का सर्वप्रथम उपयोग केरिन्थिया ( ऑस्ट्रिया ) के जोसेफ लोकाटेली नामक व्यक्ति ने १६६२ में किया था ऐसा कहा जाता है
इंग्लैंड में उसका पहली बार उपयोग सन् १७३० में हुआ , परंतु व्यापक मात्रा में उसका उपयोग करने में संभव है और ५० वर्ष लग गये थे
इस ग्रंथ के अध्याय १२ एवं १३ के लेखकों के अनुसार भारत में अनादिकाल से वपित्र प्रयुक्त होता रहा था
इस ग्रंथ के अध्याय १२ एवं १३ के लेखकों के अनुसार भारत में अनादिकाल से वपित्र प्रयुक्त होता रहा था
इस काल ( लगभग १७२०-१८२० ) के यूरोपीय आलेखों में , यूरोप से बाहर के विश्व के विविध क्षेत्रों के विज्ञान तथा तंत्रज्ञान एवं समाज , संस्थाओं , रीति-रिवाज और कानूनों के द्वारा निरूपित विवरण प्राप्त होते हैं
जातिगत यूरोपीय पूर्वाग्रह ( सुशिक्षित और विद्वान वर्ग में भी वे कम न थे ) का प्रसार , भारतीय खगोलविद्या और बनारस की वेधशाला के विवरण में नाटकीय ढंग से प्रत्यक्ष होता है
एडिनबर्ग युनिवर्सिटी के गणित के प्राध्यापाक और लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रो . ज्होन प्लेफेर द्वारा यूरोप में एकत्रित की गई भारतीय खगोलविद्या विषयक सामग्री की अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ( पृ-४८-९३ ) समीक्षा में भी वह दिखाई देती है
एडिनबर्ग युनिवर्सिटी के गणित के प्राध्यापाक और लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रो . ज्होन प्लेफेर द्वारा यूरोप में एकत्रित की गई भारतीय खगोलविद्या विषयक सामग्री की अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ( पृ-४८-९३ ) समीक्षा में भी वह दिखाई देती है
एडिनबर्ग युनिवर्सिटी के गणित के प्राध्यापाक और लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रो . ज्होन प्लेफेर द्वारा यूरोप में एकत्रित की गई भारतीय खगोलविद्या विषयक सामग्री की अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ( पृ-४८-९३ ) समीक्षा में भी वह दिखाई देती है
केवल प्राचीनता निश्चित करने की बात भी अल्पजीवी बनकर रह गई
'एडिनबर्ग रिव्यू' जैसी सामयिक पत्रिका द्वारा अभी तक भारत से संबंधित विषयों का ऊपरी तौर पर बचाव करते हुए भी , सन् १८१४ तक , भारतीय खगोलविद्या की प्राचीनता का मुद्दा भी अन्तत: यूरोप ने नकार दिया था
प्लेफेर के अनुसार १८वीं शताब्दी के भारतीय खोगलशास्त्री को 'उनके नियमों के मूलभूत सिद्धान्तों विषयक नहीं के बराबर ज्ञान था तथा उनमें अधिक जानने की उत्कण्ठा भी नहीं थी
' तब भी भारतीय खगोलवेत्ताओं के साथ आदानप्रदान तथा उनके द्वारा प्राप्त जानकारी और आधार सामग्री के द्वारा ही यूरोप को भारतीय खगोलशास्त्र का ज्ञान प्राप्त हुआ था
इस प्रकार एम . ली . जेन्टले ने सन् १७६९ के आसपास भारत की मुलाकात के अवसर पर जानकारी प्राप्त की
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार , 'हिन्दुस्तान में उनके निवास के दौरान उनके खगोल विषय के ज्ञान के कारण , सामान्य रूप से अन्य यूरोपीयों की तुलना में , ब्राह्मण उनके परिचय में अधिक आये
फलत: गणना करने की पद्धतियों की पर्याप्त समझ प्राप्त करने का उन्हें अवसर मिला था
यह भी संभव है कि भारत में सन् १७५० के आसपास विभिन्न विज्ञान और तंत्रज्ञान का पतन शुरू हो गया था और संभव है अनेक शताब्दियों से उसका प्रारंभ हो गया था
अठारहवीं शताब्दी के मध्यभाग के विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा उससे पूर्व के विज्ञान और तंत्रज्ञान के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन भी आवश्यक है
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यूरोपीय मानस में अवस्थित धारणाओं के दूसरे भी कतिपय परिणाम हैं
दूसरे विवरण के दो प्रमुख मुद्दों में से एक के विषय में ऊपरी तौर पर ऐसा प्रस्थापित करने का प्रयास किया गया है कि बंगाल के कमान्डर इन चीफ द्वारा सन् १७७७ में प्रकाशित एक लेख में बताये अनुसार इस वेधशाला का निर्माण १६ वीं शताब्दी में नहीं परंतु मात्र ५०-६० वर्ष पहले ही हुआ है
 ) इस मेजिस्ट्रेट ने यह प्रतिपादित किया है कि , यह 'भवन साधु-संतों और यात्रियों के विश्रामस्थान के रूप में राजा मानसिंह ने निर्माण करवाया था; परंतु 'वेधशाला राजा जयसिंह ने बनाई थी
यह कार्य दो वर्ष में पूर्ण हुआ था तथा राजा ( जयसिंह ) की संवत् १८०० ( सन् १७४३ ) में मृत्यु हो गई थी
कारण कि वे मानते हैं कि आवश्यक ज्ञान को प्रोत्साहित करने की अपेक्षा उसमें स्व-प्रतिष्ठा का दिखावा अधिक था
मराठों की राजधानी पूना के ब्रिटिश रेसीडेन्ट के सहायक विलियम हन्टर ने सन् १७९८ में 'आंभीर अथवा जयनगर' के राजा जयसिंह के 'खगोलशास्त्रीय उपक्रमों से संबंधित विवरण' नामक लेख में पुन: एक बार वेधशाला विषयक उल्लेख किया है
मराठों की राजधानी पूना के ब्रिटिश रेसीडेन्ट के सहायक विलियम हन्टर ने सन् १७९८ में 'आंभीर अथवा जयनगर' के राजा जयसिंह के 'खगोलशास्त्रीय उपक्रमों से संबंधित विवरण' नामक लेख में पुन: एक बार वेधशाला विषयक उल्लेख किया है
' कथित 'झीज मोहम्मदशाही'१२ का अवतरण उद्धृत कर , १८ वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुए राजा जयसिंह ने इस वेधशाला का निर्माण किया था , इस विषय में दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करने का प्रयास इस लेख में किया गया है
' कथित 'झीज मोहम्मदशाही'१२ का अवतरण उद्धृत कर , १८ वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुए राजा जयसिंह ने इस वेधशाला का निर्माण किया था , इस विषय में दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करने का प्रयास इस लेख में किया गया है
इस पुस्तक का प्रथम प्रकाशन आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑव् इन्डिया द्वारा किया गया था
उसमें कहा गया था कि 'मन मंदिर' अर्थात् वाराणसी की वेधशाला का प्रवर्तमान भवन 'सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में बनाया गया था
' ऐसी शेष सभी तिथियों को १५ अस्वीकार करते हुए यह लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि 'विलियम्स के अनुसार , वाराणसी वेधशाला के सन् १७३७ के समय को स्वीकार किया जा सकता है , १६ क्योंकि तथ्यगत सभी मुद्दों के संदर्भ में वह विश्वसनीय है
प्रो . प्लेफेर यों भी लिखते हैं कि इन कोष्ठकों के लिए भूमिति और अंकगणित का उत्तम ज्ञान तथा त्रिमिति समकक्ष कलन गणित भी सुलभ रही होगी यह इससे सिद्ध होता है
कर्नल टी . टी . पीयर्स द्वारा लंदन की रॉयल सोसायटी को भेजा हुआ और अभी तक उनके अभिलेखागार में सुरक्षित अध्ययन आलेख ( अध्याय-४ ) 'गुरु' के चार उपग्रह और 'शनि' के सात उपग्रह विषयक भारतीयों के ज्ञान के साथ सम्बन्धित है
बृहस्पति की आकृति के आसपास नृत्य कर रहीं चार कन्याओं का ब्राह्मण द्वारा कर्नल पीयर्स को सुनाया गया प्रसंग अवकाशी पदार्थो से संबद्ध अरब एवं हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान विषयक एक सुदृढ़ तर्क है
नृत्य कर रहीं चार कन्याएँ स्पष्टत: गुरु के चार उपग्रहों का प्रतिनिधित्व करती हैं
शनि की आकृति सात हाथोंवाली बताई गई है , वह भी आनंददायक और जिज्ञासा जागृत करनेवाली बात है
हर्षल ने २८ अगस्त , १७८९ को छठे उपग्रह की खोज की
चालीस फुट फोकल लेन्थ युक्त विशाल दूरबीन बनाया , उससे पूर्व हर्षल भी सातवें उपग्रह-आकृति का सातवाँ हाथ अवश्य प्रतीक होगा - को नहीं खोज पाया था
शनि के सभी उपग्रह बहुत छोटे हैं और शनि ग्रह भी पृथ्वी से बहुत दूर है , जिससे निरीक्षण हेतु उच्च क्षमता की दूरबीन आवश्यक है
परंतु ये संस्मरण समग्रतया इस संदर्भ में हमें अत्यंत रुचिप्रद लगते हैं और हमारी कल्पना में अंकित चित्र के अनुसार कर्नल पीयर्स का अध्ययन आलेख हर्षल की दृष्टि में अवश्य आया होगा और संभव है , उसी ने इस महापुरुष को अथक और अद्भुत परिश्रम करने हेतु धुन लगाई होगी
रुबेन बरो का अप्रकाशित अध्ययन लेख अध्याय-३ उसकी नई नियुक्ति के स्थान कोलकता में उपस्थित होने के लिये आने के तुरंत बाद ब्रिटिश गर्वनर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स को भेजा गया था
यह लेख एकदम आधी-अधूरी अटकलों से भरा हुआ है और एक प्रकार से देखें तो यूरोप के अठाहरवीं शताब्दी के जनजागरण युगीन बौद्धिक परंपराओं के अनुरूप है
बरो ने अपने निबंध 'हिन्दुओं को द्विपदी प्रमेय - Binomial Theorem - का ज्ञान होने का प्रमाण' और उसके बाद एच . टी . कॉलब्रुक ( Colebrooke ) का 'हिन्दू बीजगणित' विषयक ( उसके द्वारा किये गये ब्रह्मगुप्त और भास्कर के बीजगणित , अंकगणित एवं मापन के पद्धति अनुवाद की प्रस्तावना के रूप में ) विस्तृत लेख भी इसी अटकलबाजी का अनुसरण है
बरो के प्रदान विषयक और विशेषकर हिन्दू बीजगणित की ओर यूरोप का ध्यान आकर्षित करते हुए एनासायक्लोपीडिया ब्रिटानिका ( छठा संस्करण ) में 'बीजगणित' के सम्बन्ध में लिखा है , 'हमें लगता है कि इस जिज्ञासा प्रेरक विषय की कुछ प्राचीनतम टिप्पणियाँ यूरोप तक पहुंचाने के लिए मिस्टर रूबेन बरो के हम आभारी हैं
"द्विपदी प्रमेय विषयक लेख ( अध्याय ५ ) कोलकता में सन् १७९० में प्रकाशित हुआ था
तब तक , और उसके बाद २० वीं शताब्दी के एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका जैसे ब्रिटिश संदर्भ ग्रंथ में , इस प्रमेय को खोजने का श्रेय न्यूटन को दिया गया था
"ल्यूकास डी . बर्गो ने सन् १४७० के आसपास सहगुणकों द्वारा घनमूल प्राप्त किया . . . दूसरे किसी भी घात से स्वतंत्र रूप से द्विपद की किसी घात की राशि के सहगुणकों को प्राप्त करने का नियम सर्वप्रथम ब्रिग्ज ने सिखाया
"ल्यूकास डी . बर्गो ने सन् १४७० के आसपास सहगुणकों द्वारा घनमूल प्राप्त किया . . . दूसरे किसी भी घात से स्वतंत्र रूप से द्विपद की किसी घात की राशि के सहगुणकों को प्राप्त करने का नियम सर्वप्रथम ब्रिग्ज ने सिखाया
तब डॉ . वॉलिस जैसे प्रभूत वाचन करनेवाले अध्ययनशील व्यक्ति इससे अनजान हों और इस खोज के साथ न्यूटन का नाम जोड़ दें यह आश्चर्यजनक लगता है
एच . टी . कॉलब्रुक का 'हिन्दू बीजगणित' विषयक विस्तृत लेख आर . बरो , एफ विलफोर्ड , एस . डेविस , एडवर्ड स्ट्रेची , ज्हॉन टेलर आदि पुरोगामियों की खोजबीन और उनके अपने गहन ज्ञान का परिपाक है
भारत के वैद्यकीय क्षेत्र के व्यक्तियों ( १८ वीं शताब्दी के अंतभाग में उन्हें चाहे किसी भी नाम से पहचाना जाता हो तब भी ) द्वारा भारत के भिन्न भिन्न भागों में शल्य चिकित्सा की पद्धतियों का काफी बड़ी मात्रा में उपयोग किया जाता था
आँख की नेत्रमणि का धुंधलापन कम करने की ( मोतीयाबिंद की ) शस्त्रक्रिया वे बहुत सफलता से कर लेते हैं और वर्तमान यूरोप में जो पद्धति प्रवर्तमान है उसी प्रकार , मणि में ठीक उसी जगह में छेद करने का काम वे अनादि काल से करते आये हैं
आँख की नेत्रमणि का धुंधलापन कम करने की ( मोतीयाबिंद की ) शस्त्रक्रिया वे बहुत सफलता से कर लेते हैं और वर्तमान यूरोप में जो पद्धति प्रवर्तमान है उसी प्रकार , मणि में ठीक उसी जगह में छेद करने का काम वे अनादि काल से करते आये हैं
सुप्रीन्टेन्डन्ट के अनुसार भारतीय लोगों में दो सौ व्यक्तियों में मृत्यु दर एक थी
टीकाकरण विभाग के सुप्रीन्टेन्डन्ट जनरल के अनुसार लोगों के एक हिस्से का 'गरीबी के कारण' अथवा सैद्धान्तिक दृष्टि से' ( १८०० के आसपास ) टीकाकरण नहीं किया जा रहा था |३२ ऐसा लगता है कि "सैद्धान्तिक दृष्टि से' टीकाकरण न करनेवाले कोलकता के यूरोपीय थे
टीकाकरण विभाग के सुप्रीन्टेन्डन्ट जनरल के अनुसार लोगों के एक हिस्से का 'गरीबी के कारण' अथवा सैद्धान्तिक दृष्टि से' ( १८०० के आसपास ) टीकाकरण नहीं किया जा रहा था |३२ ऐसा लगता है कि "सैद्धान्तिक दृष्टि से' टीकाकरण न करनेवाले कोलकता के यूरोपीय थे
३३ दूसरी ओर , 'गरीबी के कारण' टीकाकरण न करनेवाला वर्ग भारतीय प्रजा का था
अन्य विशेष प्रकार के वर्ग ( शिक्षक , डॉक्टर , धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय विभाग , ग्रामीण कार्यालयों आदि सहित ) की तरह टीका देनेवालों का निर्वाह भी लोगों से होनेवाली आय से होता होने की संभावना है
इसलिए अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक जिन क्षेत्रों में यह प्रक्रिया प्रचलित थी वहाँ स्पर्शजन्य छूत से मुक्त पद्धति सन् १८०० तक कोलकता के यूरोपीयों को अधिक हानिकारक लगने लगी
हिचकिचाहट की यह स्थिति शायद शोध की अपर्याप्त व्यवस्था अथवा उदासीनता के कारण थी अथवा तो उत्तर पश्चिमी प्रांत के कार्यकारी सुप्रीन्टेन्डन्ट ऑव वैक्सीनेशन के संकेत के अनुसार १८७० में , प्रजा की टीका लगवाने के प्रति हिचकिचाहट के कारण थी
इस अधिकारी के अनुसार नमीयुक्त जलवायु में किये जानेवाले टीकाकरण की अपेक्षा स्थानीय पद्धति में 'प्रतिकार शक्ति अधिक' थी
३४ कारण चाहे जो भी हो परंतु , ऐसा लगता है कि सन् १८७० तक तो स्थानीय टीकाकरण पद्धति जारी थी और वाराणसी क्षेत्र में तो उसकी मात्रा ३६% जितनी उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैले शीतला के अनियंत्रित प्रकोप का मूल , एक तो राज्य की पिछड़ी स्थिति थी तो दूसरी ओर सार्वत्रिक टीकाकरण हेतु आवश्यक व्यवस्था करने में उदासीनता थी तथा इसके साथ ही समग्र सहायता वापस ली जाने के कारण गुपचुप और चोरी छीपे टीका देने को विवश बनाकर स्थानीय टीकाकरण पद्धति के अस्तित्व को बनाये रखना अत्यंत कठिन बना दिया गया था , इससे स्पष्ट सिद्ध होता है
होलवेल के विवरण से उठनेवाला दूसरा महत्त्वपूर्ण मुद्दा है , १८ वीं शताब्दी के मध्यभाग में टीका लगानेवाले भारतीयों की जीवाणुओं द्वारा लगनेवाली छूत से संबंधित मान्यता
उनके मतानुसार , 'अति सूक्ष्म' , पानी में न घुलनेवाले नत्रल द्रव्य , चरबी और तैली पदार्थों के साथ सख्त और अधिक मात्रा में चिपक जानेवाले जीवाणुओं की हवा में जितनी मात्रा होगी उतनी ही मात्रा में शीतला का रोग अधिक या कम मात्रा में संक्रामक तथा मंद या तेज होता है
' ( हवा में तैरनेवाले और खुली आँखों से नहीं दिखनेवाले ये 'अति सूक्ष्म जीवाणु' सभी संक्रामक रौग फैलाने के कारण हैं , विशेषकर 'शीतला का' , और वे ( जीवाणु ) श्वासोच्छवास की क्रिया के माध्यम से हरेक प्राणी के शरीर में स्वयं या संबंधित प्राणी को हानि पहुँचाये बिना बार बार आवागमन करते रहते है' परंतु 'भोजन के साथ लिये जानेवाले जीवाणुओं के लिए ऐसा नहीं है
' ( हवा में तैरनेवाले और खुली आँखों से नहीं दिखनेवाले ये 'अति सूक्ष्म जीवाणु' सभी संक्रामक रौग फैलाने के कारण हैं , विशेषकर 'शीतला का' , और वे ( जीवाणु ) श्वासोच्छवास की क्रिया के माध्यम से हरेक प्राणी के शरीर में स्वयं या संबंधित प्राणी को हानि पहुँचाये बिना बार बार आवागमन करते रहते है' परंतु 'भोजन के साथ लिये जानेवाले जीवाणुओं के लिए ऐसा नहीं है
क्योंकि , वे रक्त में जाते हैं जहाँ कुछ समय में उनकी उपस्थिति व्याधिकारक लाल सूजन पैदा करती है और वे चमड़ी पर फुन्सियों के रूप में उभर आते हैं
'ऐसा एलेकजान्डर वॉकर का निरीक्षण ३७ था ( अध्याय १२ ) , '१८ वीं शताब्दी के भारत में कृत्रिम सिंचाई का अभाव' बतानेवाली वर्तमान पाठ्यपुस्तकों के विवरण के साथ इसका नाट्यात्मक विरोधाभास दिखाई देता है
 ) ( चीन , मिश्र , यूरोप विभिन्न देश आदि ) की अन्य देश के साथ तुलना तो इस विषय के विवरणयुक्त और तुलनात्मक अध्ययन से ही हो सकती है
संभव है कि देश के बहुत बड़े हिस्से में यह अभाव अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्पन्न हुआ जो राजकीय नीति का परिणाम हो
मद्रास ( चैन्नई ) में चूने से कोयले की बनावट ( अध्याय ९ ) बहुत ही जिज्ञासा प्रेरक है , जबकि कागज निर्माण की प्रक्रिया ( अध्याय ११ ) संभव है वर्तमान हाथ से बननेवाले कागज की निर्माण प्रक्रिया से बहुत भिन्न नहीं है
अध्याय १० में दी गई बर्फ बनाने की पद्धति अति मुग्ध करनेवाली है
' परंतु १७९० के दशक में ब्रिटेन में अत्यन्त वैज्ञानिक और टेकनिकल दृष्टि से जिज्ञासा पैदा करनेवाला पदार्थ तो ब्रिटिश रोयल सोसायटी के अध्यक्ष सर जे . बैंक्स को डॉ . स्कोट द्वारा भेजा गया 'वूटझ' फौलाद का नमूना था
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ब्रिटेन अपनी आवश्यकता की अपेक्षा बहुत कम फौलाद बना पाया था
अधिकतर स्वीडन , रूस आदि देशों से आयात करता था
फौलाद के उत्पादन में ब्रिटेन के पीछे रहने का कारण कदाचित उसके कच्चे लोहे की तथा ईंधन की अथवा उसमें प्रयुक्त कोयले की गुणवत्ता हलकी थी
'एक बंद पात्र में कार्बन के संयोग से पिघलाया जाए तो लोहे को फौलाद में परिवर्तित किया जा सकता है , ' यह खोज , अभी होनी थी
सन् १८२५ तक ब्रिटिश उत्पादक ने 'बंद पात्र में , बहुत ऊँचे तापमान में , कार्बुरेटेड हाइड्रोजन गैस की प्रक्रिया द्वारा , लोहे को फौलाद में परिवर्तित करने की' पेटन्ट ली थी
इस प्रकार परिवर्तन की प्रक्रिया कुछ ही घण्टों में पूरी हो जाती थी , जबकि पुरानी पद्धति में १४ से २० दिन लग जाते थे
'४७ इण्डियन आयर्न एन्ड स्टील कंपनी के स्थापक और बाद में शेफील्ड में फौलाद बनाने और उसके विकास के कार्य में सघन रूप से जुड़े जे . एन . हीथ के अनुसार ऐसा लगता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की उपर्युक्त दोनों खोजें भारतीय प्रक्रिया में जुड़ी हुई थीं
'४७ इण्डियन आयर्न एन्ड स्टील कंपनी के स्थापक और बाद में शेफील्ड में फौलाद बनाने और उसके विकास के कार्य में सघन रूप से जुड़े जे . एन . हीथ के अनुसार ऐसा लगता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की उपर्युक्त दोनों खोजें भारतीय प्रक्रिया में जुड़ी हुई थीं
आगे वे लिखते हैं , 'भारत के मूल निवासी ढाई घण्टे में ही , केवल गरमी देकर ढला हुआ फौलाद बना लेते हैं , इस तथ्य को अन्य किसी प्रकार से नहीं समझाया जा सकता है
जिसमें धातु पिघलाई जाती है , उन पात्रों में जब धातु रखी जाती है तब पदार्थों को सफेद बना देनेवाले तापमान पर होती हैं , परंतु भारतीय पद्धति में एकदम ठंडे पात्र भट्ठी में रखे जाते हैं
' वे अधिक व्यावहारिक तथ्यों की ओर आगे बढ़े |
अधिकांश १७९० के दशक जितने पुराने हैं , परंतु अधिकतर विवरण १८२० से १८८५ के दौरान लिखे गये हैं
भारत के लोहे और फौलाद के उत्पादन विषयक अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी बहुत स्पष्ट विवरणों के साथ लगता है कि सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध जितना पुराना विवरण है
पन्द्रहवें अध्याय के विवरण के अनुसार जबलपुर जिले के अगेरिया आदि स्थानों में १४० सेर कोयला , ७० सेर अशुद्ध लोहा बनाने में प्रयुक्त होता था
अठारहवीं शताब्दी में भारत के अलग अलग भागों में ऐसी कितनी भट्ठियाँ कार्यरत रही होंगी उसका अनुमान लगाना कठिन है
अतएव अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में समग्र भारत में कार्यरत भट्ठियों की संख्या १० , ००० के आसपास होने की संभावना है
सन् १८०० से , भारत को ब्रिटिश उत्पादकों के केवल ग्राहक के रूप में देखा जाने लगा
तब भी , भारत में निवास करनेवाले कुछ ब्रिटिशरों ने , भारत में लोहे और फौलाद का विपुल मात्रा में उत्पादन करने की कल्पना अवश्य की थी
उदाहरणार्थ-बंगाल में इस प्रकार के कारखाने का प्रारंभ करने हेतु एक प्रार्थना पत्र के उत्तर में लंदन के सत्ताधिकारियों ने १८१४ में कहा था , 'ऐसे कारखाने प्रारंभ करने के लिए छोटा या बड़ा प्रोत्साहन देने की नीति के विषय में हमारे मन में बहुत बड़ी शंकाएँ होने से हमारा निर्देश है कि अधिक कोई खर्च न किया जाए
शीतला प्रतिरोधक टीका प्राचीन भारत में दिया जाता था , वह भी प्रसिद्ध है
'५९ मद्रास के आसिस्टन्ट सर्वेयर जनरल के लेखों के द्वारा सेलम में लोहे और फौलाद के उत्पादन के विषय में कुछ जानकारी मिलती है
समय के विषय में अनिर्णित होते हुए भी रानाडे को स्वयं को इंग्लैण्ड और अन्य देशो में 'वूटझ' ( एक प्रकार का फौलाद ) की निकास के विषय में पर्याप्त जानकारी है
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में विकसित हुई तिरस्कार और उदासीनता के मूल का उत्तम उदाहरण एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के आठवें संस्करण ( सन् १८५० ) के 'बीजगणित' विषयक लेख में देखा जा सकता है
इस विज्ञान के प्राचीन अध्यापकों की कृतियों पर टीकाएँ लिखी गईं , कुशल और अध्ययनपूर्ण स्पष्टीकरण दिये गये , परंतु अन्य नई पद्धतियों अथवा नये सिद्धान्तों का निरूपण नहीं हो पाया
भारत में सब कुछ अलंध्य अर्थात् मर्यादाओं से जकड़ा हुआ लगता है , और सत्य तथा क्षतियाँ भी स्थायी बने रहे , इसका ध्यान रखा गया है
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका द्वारा , १८५० के दशक में , इस उद्धरण का चयन तत्कालीन भावनाओं के अनुरूप था , परंतु अविश्वास प्रगट करनेवाला यह अवतरण , एडिनबरो रिव्यू ( १८५७ ) के चौबीसवें पृष्ठ के हस्ताक्षर रहित जिस लेख से लिया गया है , उसमें और भी बहुत सी बातें कही गई हैं
इस सत्य को मानकर चलें तो भी उनकी ज्ञानशाखा का पतन अति शीघ्रता से हुआ होगा , क्यों कि वर्तमान समय में मात्र दो दशक पूर्व भारत में पर्याप्त आभा के साथ विज्ञान प्रकाशवान था यह स्पष्ट है'
इसीलिए उन्होंने आगे बीजगणित में भी 'पृथक्करण' का अभाव होने के कारण दु:ख व्यक्त करते हुए लिखा है कि ब्रह्मगुप्त ने अनिर्णायक कूटप्रश्नों का दिया हुआ हल 'एकदम' सामान्य लगता है
'एक अत्यंत कठिन कूटप्रश्न का १२०० से अधिक वर्ष पूर्व एक भारतीय बीजगणितकार द्वारा दिया गया हल , यूरोप जिनके लिए गर्व कर सकता है ऐसे १८वीं शताब्दी के अंत के नैसर्गिक लाक्षणिकताओं और शोधवृत्ति रखनेवाले दो अति विख्यात गणितशास्त्रियों के साथ स्पर्धा कर सकता है
'ब्रह्मगुप्त का यह शोध योगानुयोग हो सकता है ऐसे तर्क का खण्डन करते हुए लिखा है , 'गहन खोजबीन के कतिपय क्षेत्रों में योगानुयोग और आकस्मिकता का काफी प्रभाव होता है , जहाँ एकदम निम्नकक्षा की योग्यता और समझ रखनेवाला व्यक्ति भी महान शोध कदाचित कर सकता है , परंतु हम जिस विषय का विचार कर रहे हैं , वह इस स्तर का नहीं है
केवल मैकाले ने ही अतिशय नाटकीयता और घमण्डपूर्वक इस प्रकार के संदेह और तिरस्कार व्यक्त किये हैं , परंतु २ , फरवरी , १८३५ की उसकी कार्यवाही की टिप्पणी में मैकाले द्वारा किये गये कथन के साथ तत्कालीन ब्रिटिश गर्वनर जनरल बेन्टीक ( 'इस लिखित कार्यवाही में व्यक्त की गई भावनाओं के साथ मैं पूर्णरूप से सहमत हूँ
आगे लिखता है , 'मुझे लगता है कि पूर्व के लेखक साहित्य के जिस क्षेत्र में सर्वोच्च हैं , वह क्षेत्र काव्य का है
' भारतीय अध्ययनशीलता को समर्थन या सहकार देने में स्वयं को जोड़ने का अस्वीकार करते हुए मैकाले आलंकारिक भाषा में लिखता है , 'दूसरी ओर यदि सरकार की मान्यता वर्तमान पद्धति को ही ज्यों का त्यों रखने की है तो मेरी प्रार्थना है कि मुझे समिति के अध्यक्ष पद से निवृत्त होने की अनुमति दें
आलोचना , अवलोकन , धमकियाँ और चिल्लाहट जैसे ऊपरि वर्णित उदाहरणों से भारत विषयक लेख और उपदेश भरे पड़े हैं और मैकाले तथा ( भारत में कम प्रसिद्ध ) उसके पूर्व आदर्श विलियम विल्बरफोर्स और जेम्स मिल द्वारा सूचित शिक्षा पद्धति आज भी उसी दशा में पूर्ववत् चल रही है
समाज के प्रति एवं विज्ञान , तंत्रज्ञान , राज्यशास्त्र आदि विषय में १७ वीं , १८ वीं , १९ वीं शताब्दी के यूरोप का दृष्टिकोण , तत्कालीन अयूरोपीय समाजों के इस विषय के दृष्टिकोण से एकदम उल्टा और परस्पर विरोधी था
इसी प्रकार से अयूरोपीय विश्व में विज्ञान और तंत्रज्ञान की खोज एवं उसका विकास भी यूरोप की तुलना में भिन्न था | साथ ही भारत जैसे देश में उसका ढाँचा उसके विकेन्द्रीकरण की ओर अधिक झुकाव रखनेवाली राजनीति के साथ सुसंगत था और उनके औजार तथा कार्य के स्थलों को अनावश्यक ढंग से प्रचण्ड और भव्य बनाने का प्रयास नहीं किया जाता था
अठारहवीं शताब्दी के भारत की प्रक्रियाएँ और औजार अनघड़ नहीं अपितु सिद्धान्त को विपुल मात्रा में व्यावहारिक बनाकर तथा सौन्दर्य की उच्च कक्षा की मनोभूमिका के आधार पर विकसित किये गये होगें ऐसा लगता है
अपने समय में ही सम्पत्ति की इस भूख ने संघर्ष , लूट आदि में वृद्धि की और वॉल्टर को इस आलोचना करने हेतु प्रेरित किया , 'भारतीय , तार्तार और हमारे जैसे लोगों से अपरिचित रहे होते तो वे दुनिया के सबसे सुखी लोग होते
पहला बिन्दु १७५०-१९०० के दौरान भारत का अर्थतंत्र छिन्न भिन्न होने से सम्बन्धित है
कृषि एवं अन्य उत्पादनों के साथ जुड़ी हुई प्रजा के शोषण के प्रकार और तीव्रता अथवा निकास किये गये धन तथा संपत्ति का क्या हुआ ( सरकारी भूमि कर के रूप में कुल कृषि उत्पादन के ५०% की अनिवार्य वसूली इसका उत्तम उदाहरण है ) जैसे प्रश्न के विषय में हम चर्चा और तर्क कर सकते हैं
परन्तु ब्रिटिशरों द्वारा बनाई गई भूराजस्व पद्धति में अलग अलग प्रकार से कर अंकन दुगुना तिगुना करके , उसका अधिकांश भाग केन्द्रीय प्रबंधन तंत्र के अलावा राजधानियों ( केन्द्र और प्रान्तों के ) तथा उससे बडे नगरों की ओर खींचा जाने लगा था और समग्र प्रजा को उसके कुप्रभाव में धकेल दिया गया था
इस योजनाबद्ध उपेक्षा और तिरस्कार ने अर्थतंत्र के पतन को त्वरित कर दिया और वित्त पद्धति के बदलाव को बल प्रदान किया
उनके अवशेष अभी अस्तित्व में हैं और उपयोग में भी है; परंतु अति उपेक्षा और दारिद्र्य ने उन्हें घेर लिया है
उदाहरणार्थ कांगड़ा और जूनागढ़ ( हिमाचल प्रदेश ) जिलों में स्वदेशी प्लास्टिक सर्जरी का अभी अभी तक प्रचलन था
६५ मानव समाजों के उदय और अवपात के विषय में ( या जिन विभिन्न स्थितियों से वे गुजरते होंगे उनके विषय में ) अनेक प्रकार की तात्विक अवधारणायें होती हैं
ह्रास की संकल्पना ( सामान्यत: जो भारत को लागू की जाती है ) उनमें एक है
भारतीय समाज रचना के उदय और अवपात को ह्रास का अथवा अन्य यूरोपीय सिद्धान्त लागू होने की वास्तविक प्रासंगिकता चाहे जो हो , परंतु ऐसा लगता है कि अठारहवीं शताब्दी से पूर्व भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संभवत: पर्याप्त मात्रा में संतुलन प्राप्त कर चुकी थी
भारतीय सभ्यता , सामाजिक मूल्य और प्रवृत्ति तथा सामाजिक नीति नियमों के ( और परिणामजन्य राजकीय ढाँचे और संस्थाओं के ) संदर्भ में भारत की विज्ञान और प्रौद्योगिकियाँ दुर्बल अवस्था में होने के स्थान पर यथार्थ में भारतीय समाज को अपेक्षित कार्यवाही कर रही थीं
भारत में यूरोपीय सत्ता का प्रारंभ होते ही यह पुनरुत्थान निरुत्साह और अकल्पनीय अव्यवस्था में परिवर्तित हो गया
यूरोप ने अरबों आदि से विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्राप्त की तथा अरबों एवं अन्यों ने भारत से प्राप्त की
यूरोप ने अरबों आदि से विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्राप्त की तथा अरबों एवं अन्यों ने भारत से प्राप्त की
आज अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की यूरोपीय क्रियान्विति की असरों से मुक्त हो रहे अन्य अनेक देशों की तरह ही , भारत की समस्या भी नवीनीकरण तथा सर्जनात्मकता सिद्ध करने की और उसी दिशा में आगे बढ़ने की है
ऐसी नवीनीकरण और सर्जनात्मकता व्यापक स्वदेशी आधार लेने पर ही संभव हो सकती है
स्वदेशी आधार निश्चित करने ( और तदनुरूप ढाँचागत मूलभूत परिवर्तन कर उसके साथ जोड़ने ) का काम अभी भारत जैसे देशों में करना शेष है
' ऐसा माने ( Maine , भारत के गवर्नर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सदस्य ) द्वारा १९ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रचलित किया गया सूत्र वृद्धिंगत होती गई यूरोपकेन्द्री विचारणा की बौद्धिक और विद्वत्तापूर्ण अभिव्यक्ति मात्र है
टीका १७८९ में बनाया था
हीने के अनुसार स्टोटार्ड एक विख्यात 'औजार बनानेवाला' था और जिसे स्टोडार्टने १७९४-९५ में वुट्झ पर प्रयोग करने में मदद की थी और पियर्स के अनुसार स्टोडार्ट एक 'कुशल कलाकार' था
५२ . एम . जी . रानाडे : 'एसेज ऑन इन्डियन इकोनोमिक्स' , तृतीय संस्करण , १९१६ ५३ . अध्याय १५ , पृ . २३४ ५४ . राष्ट्रीय अभिलेखागार ( NAI ) होम मिसेलेनियस रेकर्ड्झ , खण्ड ४३७ , रिपोर्ट ऑफ द मिनरोलोजिकल सर्वे ऑफ द हिमालय माउन्टेन , १८२६ , पृ . ६२७ ५५ . ब्रिटिश रॉयल सोसायटी भी ऐसे रुख से अछूती न रह सकी
 ( फिलोसोफिकल ट्रान्जेक्शन , खण्ड ८५ , पृ . ३२२ ) इस ग्रंथ में अध्याय १७ , पृ . २७८ ५६ . आई . ओ . आर . : पब्लिक डीस्पेच टु बेंगाल , २९ जुलाई १८१४ , अनुच्छेद ९ ५७ . फ्राकोइस बाल्टझार सोल्विन्स : लेस हिन्दोस-चार भाग , १८०२-१२ ५८ . फिलोसोफिकल ट्रान्जेक्शन : खण्ड २८ , फादर पेपिन कृत 'बेंगाल' ( Bangales ) से १८ दिसम्बर १७०९ , पृ . २२६ ५९ . कुर्त पोलाक ( Kurt Pollak ) , 'दी हीलर्स : द डॉक्टर्स दैन एन्ड नाऊ' , अंग्रेजी संस्करण , १९६८ , पृ . ३७-३८ ६० . मजूमदार और अन्य : एन एडवान्स्ड हिस्टी ऑव इन्डिया , पृ . ५६१ ६१ . एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका , ८ वां संस्करण , बीजगणित पर लेख
१ . वाराणसी की हिन्दू वेधशाला पूर्व भारत में बनारस अर्थात् ब्राह्मणों की नगरी , हिन्दुस्तान के मूल धर्मगुरुओं की विद्याभूमि है
मैंने जैसे सुना है ( और बाद में प्रमाणित हुआ है ) ये ब्राह्मण भविष्य में होनेवाले सूर्य और चन्द्र ग्रहणों की जानकारी रखते थे
हमने इस भवन में प्रवेश किया और सीढियाँ चढ़कर गंगा के किनारे पड़नेवाली एक विशाल छत पर पहुँचे , वहाँ मैंने संतोष और आश्चर्य के साथे देखे विशाल यंत्र ! ये सभी यंत्र पत्थर से निर्मित थे और बहुत अच्छे ढंग से आरक्षित थे
आकृति १ में 'क' द्वारा निर्देशित यंत्र में दो विराट चतुर्थ वृत्तांश हैं , जिनकी त्रिज्या नौ फुट दो इंच के आसपास है , उसके ठीक समकोण पर पच्चीस अंश के उत्सेधवाला दर्शक काँटा है - इस प्रकार एक ओर झुकाववाला , टेढ़ा निर्माण करना और फिर सैकड़ों वर्ष तक टिका रहनेवाला निर्माण करना सचमुच स्थपति की निपुणता को सिद्ध करता है
इतनी अद्भुत रूप से अचूक है , इस यंत्र की कार्यपद्धति ! और जब इस रचना की तुलना हिन्दुस्तान के आज के कारीगरों की कृतियों के साथ की जाती है तब वह अत्यधिक अद्भुत और अद्वितीय लगती है ! निसंदेह , ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्व में विज्ञान के साथ साथ कलाओं का भी इतना ही ह्रास हुआ होगा
लेफटेन्ट कर्नल आर्किबाल्ड कैम्पबेल जो तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के मुख्य इंजीनियर थे उन्होंने इस यंत्र का यथार्थ दर्शन करानेवाला चित्र किसी एक निश्चित निरीक्षण बिन्दु से बनाया था , परन्तु अत्यन्त दु:ख की बात है कि वे कुछेक विराट चतुर्थ वृत्तांशों - जिसकी त्रिज्या बीस फुट थी - को अपने चित्र में नहीं ले पाये क्यों कि ये वृत्तांश उन्होंने निरीक्षण बिन्दु चयन किया था उसी की ओर थे
पीतल की एक खूँटी वृत्तांश के केन्द्र के आगे जड़ दी गई है
यह घड़ी , जिसे छाया यंत्र कहा जा सकता है , दर्शक की परछाईं वृत्तांश पर जहाँ पड़ती है , उसके आधार पर सौर समय बतलाने का कार्य करती है
इस वृत्ताकार पत्थर के केन्द्र में से वर्तुल के समतल में लम्ब के रूप में लोहे की छड़ लगाई गई है
इस वृत्त को मध्य में समक्षितिज दिशा में ३६० भागों में विभाजित किया गया है
परन्तु केन्द्रस्थ वर्तुल में अधिक छोटे प्रतिविभाग नहीं हैं
आकृति 'घ' में प्रदर्शित यंत्र में दो समकेन्द्री वृत्ताकार दीवारें हैं , जिनमें से बाहर की दीवार ४० फुट व्यास की और आठ फुट ऊँचाई की , और अंदर की लगभग आधी अर्थात् चार फुट ऊँची है
प्राचीन ब्राह्मणों के खगोलशास्त्रीय ज्ञान विषयक कतिपय शंकाएँ उठाई जा रही हैं कि यह ज्ञान सचमुच उनका अपना था या ईरान के लोगों ने जब हिन्दुस्तान पर आधिपत्य स्थापित किया तब उनके द्वारा ब्राह्मणों तक पहुँचा है ? मेरी धारणा है कि ये सभी शंकाएँ निराधार होने से ठहर नहीं पाती हैं , क्यों कि वर्तमान में ब्राह्मण जिन भविष्यवाणियों को करते हैं वे उन्हें उनके पूर्वजों के पास से प्राप्त ज्ञान और उन पूर्वजों के द्वारा लिखे विधानों के आधार पर करते हैं
प्राचीन ब्राह्मणों के खगोलशास्त्रीय ज्ञान विषयक कतिपय शंकाएँ उठाई जा रही हैं कि यह ज्ञान सचमुच उनका अपना था या ईरान के लोगों ने जब हिन्दुस्तान पर आधिपत्य स्थापित किया तब उनके द्वारा ब्राह्मणों तक पहुँचा है ? मेरी धारणा है कि ये सभी शंकाएँ निराधार होने से ठहर नहीं पाती हैं , क्यों कि वर्तमान में ब्राह्मण जिन भविष्यवाणियों को करते हैं वे उन्हें उनके पूर्वजों के पास से प्राप्त ज्ञान और उन पूर्वजों के द्वारा लिखे विधानों के आधार पर करते हैं
रोयल सोसायटी के सदस्य श्रीयुत् ज्होन कॉल , ने राज खगोलशास्त्री को लिखे एक पत्र में कोरोमांडल किनारे की धर्मशालाओं में दीवारों और छतों पर देखे राशियों के चित्रों का उल्लेख किया है
यहाँ जिज्ञासा का विषय जयसिंह के पुत्र मानसिंह द्वारा २०० वर्ष पहले निर्मित की गई वेधशाला है
वेधशाला में दो वृत्ताकार सूर्य घड़ियाँ हैं , जिनमें बड़ी घड़ी वास्तव में विलक्षण है; उसके पत्थर की चाप की त्रिज्या ९ फुट ८ इंच तथा दर्शक की मोटाई ५ फुट ९ इंच है
वेधशाला में दो वृत्ताकार सूर्य घड़ियाँ हैं , जिनमें बड़ी घड़ी वास्तव में विलक्षण है; उसके पत्थर की चाप की त्रिज्या ९ फुट ८ इंच तथा दर्शक की मोटाई ५ फुट ९ इंच है
१ . प्राचीनकाल की धुंधली और अस्पष्ट दंतकथाओं से खगोलशास्त्र का जब से उदय हुआ तब से पृथ्वी पर उसकी प्रगति ने पीछे मुड़कर नहीं देखा
खगोल के इस ज्ञान ने समय बीतने पर अरबों के साथ स्पेन में भी प्रवेश किया
३ . खगोलशास्त्र के सर्वप्रथम परिचय के लिए हम श्रीयुत ला' लूबरे के आभारी हैं
क्योंकि भारतीय खगोलशास्त्र के पास महान समस्याओं के समाधान हेतु पर्याप्त गहराई और सूक्ष्मता है ही
वास्तविकता यह है कि 'भारतीय खगोलशास्त्र'" पुस्तक के अध्ययन से उसके कर्ता की शक्ति और विद्वत्ता पर संपूर्ण आदर उत्पन्न होते हुए भी , कुछ ऐसी वैज्ञानिक अश्रद्धा के साथ मैंने अध्ययन करना आरम्भ किया क्यों कि विज्ञान में जो कुछ नया और असामान्य है उसकी गिनती और तर्क के निकष पर पूर्ण सावधानी और सतर्कता से परीक्षा होनी चाहिए ऐसा मुझे लगता है
ये लेख तीन विभिन्न बिन्दुओं की ओर इंगित करते हैं; प्रथम तो , भारतीय खगोलशास्त्र विषयक हम अभी तक जो कुछ भी जानते हैं , विशेषकर आगे उल्लेख किये कोष्ठकों के चार भागों से जो जानकारी मिलती है , उसका संक्षिप्त वृत्त देना; दूसरा इन कोष्ठकों के आधार पर प्राप्त मुख्य तर्क , विशेषकर उनकी प्राचीनता के संदर्भ में प्रस्तुत करना और तीसरा , जिन भौमितिक कौशल्यों के द्वारा इस संपूर्ण खगोलशास्त्रीय प्रणाली की रचना हुई है , उसका आसादन करना , अनुमान लगाना
ये लेख तीन विभिन्न बिन्दुओं की ओर इंगित करते हैं; प्रथम तो , भारतीय खगोलशास्त्र विषयक हम अभी तक जो कुछ भी जानते हैं , विशेषकर आगे उल्लेख किये कोष्ठकों के चार भागों से जो जानकारी मिलती है , उसका संक्षिप्त वृत्त देना; दूसरा इन कोष्ठकों के आधार पर प्राप्त मुख्य तर्क , विशेषकर उनकी प्राचीनता के संदर्भ में प्रस्तुत करना और तीसरा , जिन भौमितिक कौशल्यों के द्वारा इस संपूर्ण खगोलशास्त्रीय प्रणाली की रचना हुई है , उसका आसादन करना , अनुमान लगाना
वह न तो कोई सिद्धान्त देता है और न खगोलीय घटनाओं का कोई वर्णन करता है
इस प्रकार , यह खगोलशास्त्र हमारे समक्ष तीन मुख्य बातें प्रस्तुत करता है : १ . सूर्य और चन्द्र के स्थान निर्धारित करने के कोष्ठक और नियम; २ . ग्रहों के स्थान निर्धारित करने के कोष्ठक और नियम; ३ . ग्रहण का स्पर्श , मोक्ष तथा पूर्ण स्थिति निश्चित करने का नियम
६ . अन्य खगोलशास्त्रियों की तरह ब्राह्मणों ने भी सूर्य , चन्द्र तथा ग्रहों के आकाशीय भ्रमण मार्ग के आकाश के अन्य भाग से अलग स्थान दिया है
यह भाग , जिसे हम राशिचक्र५ कहते हैं , उसे ब्राह्मणों ने सत्ताईस समान भागों में बाँटा है
फिर , समय का सप्ताह में विभाजन करने का श्रेय भी चन्द्र कलाओं को ही जाता है; जो प्रथा लगभग समग्र जगत में७ व्याप्त है
सप्ताह के सात वारों को भी ब्राह्मणों ने हमारी तरह ही सात ग्रहों के नाम दिये हैं
परंतु श्रीयुत् जेन्टिल द्वारा दिये उनके नाम और आकार८ अलग ही हैं
उनमें से अधिकतर तारों के समूह से बने हैं
इसके साथ साथ , क्रांतिवृत्त को भी तीस अंश की बारह राशियों में विभाजित किया गया है
८ . जिस गति के कारण स्थिर जैसे तारे पूर्व दिशा की तरफ खिसकने लगते हैं और वसंत संपात से उनका अंतर लगातार बढ़ता रहता है , उस गति की भी ब्राह्मणों को जानकारी थी; और उनके सभी कोष्ठकों में भी उन्होंने इस गति का समावेश किया है
समय के सूक्ष्म विभाजन में , भी भारतीयों का गणित साठ भाग के अनुसार ही चलता है: वे प्रत्येक दिन को ६० घण्टों १२ में , प्रत्येक घण्टे को ६० मिनिट में और उसी प्रकार१४ प्रत्येक स्तर पर क्रमश: ६० भाग करते जाते हैं
दिये गये निश्चित समय में , किसी भी आकाशीय ज्योति का स्थान निश्चित करने के लिए तीन वस्तुएँ आवश्यक हैं; प्रथम , भूतकाल की किसी 'निश्चित क्षण में' अवलोकन द्वारा निश्चित किया गया ज्योति का स्थान
जब यह संस्कार किसी ग्रह की कक्षीय उत्केन्द्रता के कारण पैदा होता है तब उसे 'मंद फल' भी कहते हैं
वास्तव में यह भी दर्ज करना चाहिये कि सारे कोष्ठकों में खगोलीय वर्ष सूर्य के इस प्रचलनशील राशिचक्र में प्रवेश के साथ शुरू होता है , और वर्षारम्भ ऋतुओं की सापेक्षता में आगे ही जाता है , और २४ , ००० वर्षों में एक चक्र पूरा होता है
१७ उस पर से ऋतु वर्ष१८ प्राप्त करने के लिए हमें २१ मिनिट ५५ सेकन्ड घटाने पड़ते हैं , जो सूर्य को ५४'' चलने में लगनेवाला समय है
जिस बिन्दु से सूर्य की गति सबसे कम है , उस बिन्दु को सूर्य का भूम्युच्य बिन्दु कहते हैं क्योंकि उस बिन्दु से पृथ्वी से उसका अंतर सबसे कम है
भूम्युच्य बिन्दु राशिचक्र के आरंभ बिंदु से ८०° आगे है और स्थिर तारों की पश्चात् भू पर अपना स्थान बनाये रखता है अथवा यों कहें कि , उसके जितनी ही गति से चलता है , ऐसी धारणा है
२१ यह धारणा पर्याप्त रूप से निश्चित न होने पर भी टोलेमी की अवधारणा कि भूम्युच्य बिन्दु संपूर्णत: स्थिर है - सत्य से अधिक समीप है क्योंकि आधुनिक मूल्य के अनुसार सूर्य का भूम्युच्य बिन्दु वार्षिक १०'' की गति से खिसक रहा है
१२ . इन कोष्ठकों पर से चन्द्र की गति प्राप्त करने के लिए १९ वर्ष की अवधि में चन्द्र द्वारा किये गये २३५ चक्रों पर से कुछ बीच में जोड़कर गणना की जाती है
जिसके लिए एथेन्स के खगोलवेत्ता मेटन को बहुत सम्मान प्राप्त हुआ है और हमारे आधुनिक कैलेन्डर२३ में भी जो महत्त्वपूर्ण है , वह 'मेटन चक्र' के रूप में पहचाने जानेवाले चक्र की विश्वसनीय जानकारी श्याम के खगोलशास्त्रियों को थी यह एक अत्यंत जिज्ञासाप्रेरक मुद्दा है
जिसके लिए एथेन्स के खगोलवेत्ता मेटन को बहुत सम्मान प्राप्त हुआ है और हमारे आधुनिक कैलेन्डर२३ में भी जो महत्त्वपूर्ण है , वह 'मेटन चक्र' के रूप में पहचाने जानेवाले चक्र की विश्वसनीय जानकारी श्याम के खगोलशास्त्रियों को थी यह एक अत्यंत जिज्ञासाप्रेरक मुद्दा है
दूसरी अवधारणा यह है कि निर्देशक्षण से सन् ६३८ के २१ मार्च के ६२१ दिन बाद शुरू हुआ और ३२३२ २४ दिन में उसका ( चन्द्र का ) एक संपूर्ण भ्रमण पूर्ण होता है
अब , युति और प्रतियुति के समय , चन्द्र की असमताओं में से महत्वपूर्ण दो - मंदफल और चन्द्रक्षोभ भूम्युच्य बिन्दु से अंतर पर आधारित है और इसीलिए दोनों एक जैसे दिखते हैं
क्योंकि भूम्युच्य बिन्दु से कोणीय अंतर की जगह घटती जाती है
श्रीयुत् कोसिनी लिखते हैं कि श्यामी कोष्ठकों के रूप में पहचाने जानवाले ये कोष्ठक वास्तव में श्याम के याम्योत्तरवृत्त के लिए नहीं हैं क्योंकि नियम सूर्य के लिए ३' और चन्द्र के लिए ४०' घटाने के लिए कहते हैं
ये सब मिलकर पन्द्रह कोष्ठक हैं , जिसमें सूर्य और चन्द्र की औसत गति के अलावा सूर्य चन्द्र के मंदफल संस्कार तथा प्रत्येक ग्रह के लिए दो प्रकार के संस्कार जैसे कि प्रत्यक्ष और वास्तविक असमता आदि का समावेश होता है
१६ . कोष्ठकों का दूसरा एक समूह , जिन्हें भारत से फादर पेटोल ने श्रीयुत द' लेईस्ली को भेजा था वह भी उस कृष्णापुरम् वाले कोष्ठक प्राप्त हुए तभी प्राप्त हुआ था
इससे , श्रीयुत् बईली ऐसा अनुमान करते हैं कि ये कोष्ठक नरसापुर के हैं
३० इन कोष्ठकों में निहित सिद्धान्त और उदाहरण भले ही उनके साथ सीधा कोई सम्बन्ध न रखते हों , परंतु सूर्य और चन्द्र के ग्रहणों की गणना में इनका उपयोग निश्चित है
उनकी पद्धति के अनुसार सौर वर्ष को बारह असमान महीनों में बाँटा जाता है
इस प्रकार 'अन्य' अर्थात् जून महीने में सूर्य जब तीसरी राशि में होता है तब उसकी गति सबसे कम होती है और महीना ३१ दिन ३६ घण्टे ३६ मिनिट ३३ का होता है
इस प्रकार 'अन्य' अर्थात् जून महीने में सूर्य जब तीसरी राशि में होता है तब उसकी गति सबसे कम होती है और महीना ३१ दिन ३६ घण्टे ३६ मिनिट ३३ का होता है
जबिक मार्गग्य अर्थात् दिसम्बर में सूर्य की गति सर्वाधिक वेगमय होने से वह महीना केवल २९ दिन २० घण्टे ५३ मिनिट का होता है
३६ उसके बाद दिनों को महीनों में परिवर्तित करनेवाले कोष्ठक की सहायता से वे इन दिनों को खगोलीय महीने में तथा दिन आदि में परिवर्तित करते हैं , जो राशि-अंश-कला-विकला में सूर्य के भोग के सममूल्य होते हैं
इस प्रकार , सूर्य भोग अर्थात् क्रांतिवृत्त पर सूर्य का स्थान प्राप्त होता है
१९ . लगभग इसी प्रकार से किन्तु कुछ कृत्रिम और अधिक युक्तिपूर्ण नियमों की सहायता से त्रिवेलोर के ब्राह्मण चन्द्र के स्थान की भी गणना करते हैं
२२ . ब्राह्मणों ने अपने प्रचलनशील राशिचक्र को अपने ग्रंथकाल के समय से वसंतसंपात से ५४° आगे रखा है
अब श्रीयुत् जेन्टिल अपने साथ भारतीय राशिचक्र का एक आलेखन लाये हैं; जिसकी सहायता से उसमें अवस्थित तारों के स्थान अच्छी तरह से निश्चित हो सकते हैं
४१ विशेष में , लगता है कि रोहिणी अर्थात् वृषभ राशि के प्रथम तारे को चौथे नक्षत्र के अंतिम अंश में रखा गया है
श्रीयुत् बेइली त्रिवेलूर के कोष्ठकों की तुलना कृष्णापुरम् के कोष्ठकों के साथ करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इन दोनों में से प्रथम ( त्रिवेलूर ) का ग्रंथकाल १७ और १८ ४४ फरवरी के बीच की मध्यरात्रि , वर्ष ३१०२ ईसा पूर्व है
श्रीयुत् बेइली भी यह मानना उचित समझते हैं कि वह सूर्य का मध्यम स्थान नहीं था , जिसकी खगोलीय कोष्ठक में आवश्यकता होती है , परंतु सही स्थान था , जो मध्यम सूर्य से उस समय के सूर्य का मंदफल संस्कार के जितना अलग पड़ता है
२४ . कलियुग के प्रारंभ के काल में ( अर्थात् ईसा पूर्व ३१०२ के फरवरी महीने की १७ वीं और १८ वीं तारीख के बीच की मध्यरात्रि को ) चन्द्र का मध्यम स्थान , मेयर के कोष्ठकों के अनुसार - जिसका आधार इस मान्यता पर है कि चन्द्र की गति का दर इस शताब्दी के प्रारंभ में जितना था उतना ही हमेशा रहता है - गिनने पर वह १० राशि - ०-५१'-१६'' मिलता है
४७ परंतु उसी खगोलशास्त्री के मतानुसार चन्द्र धीमा परंतु निरन्तर प्रवेग युक्त रहता है , जिससे उसकी कोणीय गति प्रत्येक युग में पहले के युग से ७९'' अधिक होती है
चन्द्र के उपरोक्त भोग में सुधार को जोड़ने पर कलियुग के प्रारंभ के चन्द्र का सही मध्यम स्थान मिलता है , जो १० राशि -६°-३७' जितना है
इस प्रकार आधुनिक और प्राचीन गणनाओं के बीच की समयावधि एक अंश का दो तृतीयांश से भी कम है और वह भी इतने दूर के समय की गणना के लिए ! फिर , चन्द्र के प्रवेग की गणना का तो भारतीय गणना में कोई स्थान नहीं है
२५ . इस निष्कर्ष को ठोस रूप देने हेतु श्रीयुत् बेइली इन सभी कोष्ठकों का उपयोग कर के कलियुग के प्रारंभ के समय के चन्द्र के स्थान को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं , जिन कोष्ठकों तक भारतीय खगोलविद् पहुँचे होने की संभावना है
वे प्रारंभ करते हैं टोलेमी के कोष्ठकों से और यदि उनकी मदद से हम नेबुचेदनेजर के युग से उल्टा चलकर कलियुग के प्रारंभ तक पहुँचे , भारतीय और मिस्रीय वर्षों की तुलनात्मक लंबाइयों को गणना में लें और साथ ही त्रिवेलूर और एलेकझान्ड्रिया के याम्योत्तरों के बीच के अंतर को भी ध्यान में लें तो सूर्य भोग हमें १००-२१'-१५'' जितना अधिक और चन्द्र भोग ११०-५२'-७'' जितना अधिक मिलेगा
इससे यह सिद्ध हो जाता है कि भारतीय खगोलशास्त्र टोलेमी से उद्भूत नहीं हुआ है
उलूघ बेग के कोष्ठक मिस्र के खगोलशास्त्री से भी अधिक सूक्ष्म और सटीक हैं
निस्सन्देह कलियुग के प्रारंभ के ग्रंथकाल के लिए उसके मध्यम सूर्य का अंतर १९-३०° और मध्यम चन्द्र का अंतर ६° है; जो अंतर पहले से बहुत कम होते हुए भी इतना अवश्य बता देता है कि भारतीय कोष्ठक तार्तारों के उधार नहीं लिये हैं
जो मानबिन्दु भारतीय खगोलशास्त्र को अन्य से अलग करते हैं उनके विषय में उन्हें कुछ भी ध्यान में नहीं था
निस्सन्देह कलियुग के प्रारंभ के ग्रंथकाल के लिए उसके मध्यम सूर्य का अंतर १९-३०° और मध्यम चन्द्र का अंतर ६° है; जो अंतर पहले से बहुत कम होते हुए भी इतना अवश्य बता देता है कि भारतीय कोष्ठक तार्तारों के उधार नहीं लिये हैं
इसके अनुसार चन्द्र का स्थान गिनने के नियम में मान लेते हैं कि कलियुग के प्रारंभ के ग्रंथकाल से ४३८३ वर्ष और ९५ दिन में चन्द्र की गति चलनशील राशिचक्र में ७-२°-०'-७'' अथवा वसंतसंपात से ९-७°-४५'-१'' है
अब , उसी समय के अंतर्गत मेयर के कोष्ठक से गणना की गई चन्द्र की मध्यम गति उपरोक्त से २०-४२'-०४'' अधिक है , ५३ जो चन्द्र की प्रवेगी गति के सिद्धान्त के साथ सुसंगत लगने पर भी , स्वीकार करना पडता है कि मेयर ने निश्चित किये प्रवेग से वह काफी दूर है
२७ . अब , विशेष बात यह है कि यदि हम मेयर के सिद्धान्तों के आधार पर कलियुग के प्रारंभ से ४३८३ वर्ष और ९४ दिन में चन्द्र की कोणीय गति की गणना करें तो वह कम ही होनी चाहिए
यदि उसका वेग इस शताब्दी में है उसके अनुसार एक सा और समान रहा होता तो , हमें यह गति मिलेगी ५°-४३'-७'' जो ऊपर की गणना की तुलना में केवल १'-७'' जितनी ही कम है और वह भी चार हजार वर्ष से अधिक समय के लिए
तब भी , चुस्त गाणितिक तर्क के आधार पर ऐसा अनुमान कर सकते हैं कि उन कोष्ठकों का आधार रूप अवलोकन खिव्रस्तीयुग के प्रारंभ के २००० वर्ष से अधिक पुरातन नहीं है
सचमुच , उनके लिखे अनुसार , चन्द्र के प्रवेग के आधार पर दिया गया , प्रत्येक तर्क अधिक ध्यान देने योग्य और अधिक निर्णयात्मक सिद्ध हुआ है , क्योंकि वह प्रवेग कहीं पुरातन अवलोकनों का आधुनिक अवलोकनों के साथ मेल बिठाने के लिए किया गया अनुभवजन्य सुधार नहीं है और ना ही ऐसा कोई तथ्य कि जो केवल 'इधर के अवरोध' ( या गुरुत्वाकर्षण के लिए आवश्यक समय ) जैसे पूर्वथारणात्मक कारणों के लिए उत्तरदायी होते हैं
यह एक ऐसी घटना है , जो श्रीयुत् द' लाप्ला ने गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक सिद्धान्त के आधार पर खोज निकाली है और वह आवश्यक रूप से श्रीयुत् द'ला ग्रान्ज ने खोजी पृथ्वी की कक्षा के उत्केन्द्र से जुडी है; जिससे चन्द्र का प्रवेग दूसरे ढंग से ग्रहों के असर के कारण उद्भूत होता है; जो ऊपर कथित उत्केन्द्रता को एक के बाद एक बढाकर , घटाकर चन्द्र पर अलग अलग मात्रा में ऐसा असर पैदा करते हैं , जिससे सूर्य का जो असर चन्द्र की पृथ्वी का चक्कर लगाती हुई गति को प्रभावित करता है , उसमें परिवर्तन होता है
यह एक ऐसी घटना है , जो श्रीयुत् द' लाप्ला ने गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक सिद्धान्त के आधार पर खोज निकाली है और वह आवश्यक रूप से श्रीयुत् द'ला ग्रान्ज ने खोजी पृथ्वी की कक्षा के उत्केन्द्र से जुडी है; जिससे चन्द्र का प्रवेग दूसरे ढंग से ग्रहों के असर के कारण उद्भूत होता है; जो ऊपर कथित उत्केन्द्रता को एक के बाद एक बढाकर , घटाकर चन्द्र पर अलग अलग मात्रा में ऐसा असर पैदा करते हैं , जिससे सूर्य का जो असर चन्द्र की पृथ्वी का चक्कर लगाती हुई गति को प्रभावित करता है , उसमें परिवर्तन होता है
इससे वह एक आवर्ती असमता है जिसके द्वारा चन्द्र की गति युगान्तरों में , जितनी धीमी होगी , उतनी बढ़ेगी
इससे वह एक आवर्ती असमता है जिसके द्वारा चन्द्र की गति युगान्तरों में , जितनी धीमी होगी , उतनी बढ़ेगी
इस असमता को गिनने का सूत्र ला' प्लास ने दिया है , जो सैद्धान्तिक रूप से साररूप से प्राप्त आसादन मात्र होने पर मेयर ने प्रयोग के रूप में दिये सूत्र की अपेक्षा अधिक निश्चित है और यदि वे मेयर के सूत्र के स्थान पर उपयोग में लाया जाए तो वह कुछ अलग परिणाम देगा
५७ सूत्र के आधार पर गणना करने पर ४३८३ वर्ष ९५ दिन की अवधि में यह प्रवेग मेयर की तुलना से १७' ३९'' जितना बड़ा हो जाता है और परिणामस्वरूप कृष्णापुरम् सारिणी की अपेक्षा १६'- ३३ जितना अधिक है
ये अवलोकन जब भारत में लिये जाते थे तब संपूर्ण यूरोप जंगली और उज्जड़ अवस्था में था और गुरुत्वाकर्षण की सूक्ष्मातिसूक्ष्म असरों की खोज लगभग पाँच हजार वर्षों के बाद यूरोप में हुई और वे दोनों अनुसंधान एक दूसरे का समर्थन करते हैं यही विज्ञान की प्रगति और भाग्य परिवर्तन का अद्भुत उदाहरण है , जिसे मानव इतिहास ने प्रस्तुत किया है
ये अवलोकन जब भारत में लिये जाते थे तब संपूर्ण यूरोप जंगली और उज्जड़ अवस्था में था और गुरुत्वाकर्षण की सूक्ष्मातिसूक्ष्म असरों की खोज लगभग पाँच हजार वर्षों के बाद यूरोप में हुई और वे दोनों अनुसंधान एक दूसरे का समर्थन करते हैं यही विज्ञान की प्रगति और भाग्य परिवर्तन का अद्भुत उदाहरण है , जिसे मानव इतिहास ने प्रस्तुत किया है
परंतु ईसा पूर्व ५५०० वर्ष पहले वह अभी से केवल २९ सेकन्ड लंबा था; जबकि श्रीयुत बेइली की धारणा के परिणाम स्वरूप प्राप्त उत्तर २ मिनिट ५० सेकन्ड था
३४ . क्रांतिवृत्त की तिर्यकता एक ऐसा दूसरा मुद्दा है , जिस के विषय में भारतीय और यूरोपीय खगोलशास्त्र के बीच संमति नहीं है
ब्राह्मणों ने क्रांतिवृत्त की तिर्यकता २४° निर्धारित की है
अब ला ग्रान्ज का तिर्यकता का विचलन सूत्र६६ जो इस संस्कार को २२'-३२'' मूल्य देता है , सन् १७०० में तिर्यकता में जोड़ने पर २३°-२८' - ४१'' मिलता है
दूसरी असमता का संबंध ग्रह के केन्द्र के साथ है अथवा तो कहें कि ग्रह की कक्षा की उत्केन्द्रता के कारण उद्भव होता है
बुध के विषय में , आश्चर्य नहीं है कि प्रारंभ के सभी खगोलशास्त्रीयों को गलत दिशा में मार्गदर्शन दिया गया
इसीसे सूर्योच्च बिन्दु से ९०° का अंतर महत्तम होता है
ऐसा करने का ( कठिन रीति अपनाने का ) कारण स्वाभाविक रूप से सीधी सरल पद्धति में गलती होने की आशंका है
यहाँ मंदफल संस्कार ग्रह का मध्यम स्थान शुद्ध करने के लिए नहीं , परंतु सूर्य का मध्यम स्थान शुद्ध करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है , जिसे फिर 'शीघ्र' संस्कार लागू किया जाता है जिसमें ग्रह का स्थानांतर समाविष्ट है
यह सूर्योच्च बिन्दु , ग्रंथकाल के क्षण १४९१ ईसवी में , क्रांतिवृत्त के ५ राशि - २१°- ४०'-२०'' बिन्दु पर स्थित था
अब यही वस्तु श्रीयुत् द' ला' लान्डे के कोष्ठकों के आधार पर गणना करने पर ३ राशि- १६९°-४८'-५८'' अर्थात् ब्राह्मणों की गणना में १०° जितनी गलती हो रही है ऐसा लगता है
अंतर केवल इतना है कि वे जिस युग का अनुकरण करते हैं , उनके बीच में पाँच हजार वर्षों का अंतर है
यह संस्कार अभी , श्रीयुत् लान्डे के कोष्ठकों के अनुसार ६°-२३'-१९'' है और उससे उपरोक्त ला ग्रान्ज सूत्रों के द्वारा गणना करने पर श्रीयुत् बेईली के अनुसार ३१०२ वर्ष ईसा पूर्व के ग्रंथकाल समय पर यह संस्कार ७°-४१'-२२' ७७ होना चाहिए
परंतु यह दर्ज करना जिज्ञासाप्रेरक है कि गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त में नया शोध होने के साथ ही इस प्रकार के नये योगानुयोग ज्ञात हुए हैं और दो महान भूमितिशास्त्रियों ने , 'संक्षोभक बलों का सिद्धान्त' अन्वेषित किया है
ला' प्लास कहते हैं , 'अब मैंने अपने सिद्धान्तों द्वारा प्रतिपादित किया है कि ईसा से ३१०२ वर्ष पूर्व के भारतीय ग्रंथकाल के क्षण से शनि की दृष्ट वार्षिक गति १२°- १३'-१४'' है , जो भारतीय कोष्ठकों के अनुसार १२°-१३'-१३'' है
४३ . इस प्रकार , हमने कुल नौ खगोलशास्त्रीय तत्त्वों का परीक्षण किया
फिर , इस से यह भी सिद्ध होता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त भी ईसा से तीन हजार वर्ष पहले उनके पास था
ऐसा कदाचित् ही माना जा सकता है कि इस संभवितता ने ही भारतीय खगोलशास्त्र की गलतियों को इतना विलक्षण सौभाग्य दिया जिससे अवलोकनकार अपने समय की आकाशी पिंडों की स्थिति तो खोज नहीं पाये परंतु अपने जन्म से कुछेक हजार वर्ष पूर्व की स्थिति का वर्णन करने में सफल हुए
४४ . इन कोष्ठकों की मौलिकता प्रस्थापित करनेवाला तर्क जब तक उनकी रचना में प्रयुक्त भौमितिक सिद्धान्तों का विचार नहीं करते हैं , तब तक अधूरा है क्यों कि यह असंभव नहीं है कि इन कोष्ठकों को इन ( भौमितिक ) सिद्धान्तों के साथ जोडकर और सर्वसामान्य प्रमेयों के साथ एकीकृत कर के देखने पर उनका ग्रीक खगोलशास्त्र के साथ संबंध दिखाई देगा , जो विभिन्न लोगों के पृथक अध्ययन में न भी दिखाई दे
४५ . जिन नियमों के द्वारा सूर्य और चन्द्र के स्थान से ग्रहण की घटना निश्चित की जाती है उन नियमों का भूमिति के साथ सबसे निकट संबंध है
श्रीयुत् जेन्टिल ने , त्रिवेलोर के ब्राह्मणों में प्रचलित ग्रहणों विषयक नियमों का पूर्ण वृत्तांत स्मरणिका में दिया ही है
४६ . स्पष्ट है कि इस नियम में यह धारणा समाविष्ट है कि जब सूर्य की क्रांति दी गई हो तब दिनमान में वृद्धि सूचित करनेवाली होगी और स्थान के अक्षांश की स्पर्श ज्या का गुणोत्तर प्रत्येक स्थान पर अचल रहता है
४६ . स्पष्ट है कि इस नियम में यह धारणा समाविष्ट है कि जब सूर्य की क्रांति दी गई हो तब दिनमान में वृद्धि सूचित करनेवाली होगी और स्थान के अक्षांश की स्पर्श ज्या का गुणोत्तर प्रत्येक स्थान पर अचल रहता है
परंतु विषुववृत्त से अधिक दूर जाने पर वह ऐसी गलती तक ले जा सकता है , जिससे अवलोकन भी गलत हो जाए
प्रारंभ के भूमितिशास्त्रियों को , सहज रूप से सर्वाधिक भय अपने निदर्शनों में आनेवाली चौकसी की कमी का था; क्योंकि वे जिससे जुड़ जाते थे उन गलतियों और अनिश्चितताओं की सीमाएँ उन्हें नहीं दिखायी देती थीं
४७ . इस प्रकार , किसी भी स्थान पर दिनमान का विचलन अथवा जिसे हम चरान्तर८९ कहते हैं , उसे प्राप्त करने के बाद ब्राह्मण उसका उपयोग अन्य हेतु के लिए करते हैं
इस प्रकार की गणना गोलीय त्रिकोणमिति अथवा उसके समान किसी पद्धति के बिना संभव नहीं होती है
४८ . ग्रहण-गणना के दूसरे भाग में भूमिति के एक बहुत ही प्रसिद्ध सिद्धान्त का सीधा ही उपयोग किया गया है
हमें यह जानना चाहिए कि यह प्रमेय भारत में अन्वेषित हुआ होगा , जहाँ से उस तत्त्वज्ञानी ने शायद कुछ ठोस और कुछ काल्पनिक अनुमान प्राप्त किये होंगे और उनके द्वारा अपने शिष्यों का प्रशिक्षण और मनोरंजन करने का आनंद प्राप्त किया होगा
४९ . हमने देखा है कि हम इस गणना में सूर्य और चन्द्र के अर्धव्यास का उपयोग करते हैं
सूर्य के दृश्य व्यास के लिए वे उसकी दैनिक गति का ४/९ भाग लेते हैं , जब कि चन्द्र के लिए १/२५ भाग लेते हैं
सूर्य के दृश्य व्यास के लिए वे उसकी दैनिक गति का ४/९ भाग लेते हैं , जब कि चन्द्र के लिए १/२५ भाग लेते हैं
साथ ही पृथ्वी की छाया का छेद , यदि सूर्य का दृश्य व्यास दिया गया है तो , चन्द्र का दृश्य व्यास जितना बढ़ता है उतना ही बढ़ता जाता है अथवा चन्द्र का पृथ्वी से अंतर घटने पर वह बढ़ता है और निरूपित नियम को यथार्थ सिद्ध करने वाला गुणोत्तर बनाये रखता है
इस अनुमानित देशांतर के लंबन९४ के द्वारा अक्षांश से लंबन प्राप्त करते हुए हमें समरूप त्रिकोणों का सिद्धान्त देखने को मिलता है
५१ . इस प्रकार ब्राह्मण जिन परिणामों को प्राप्त करते हैं , उनमें अत्यंत सूक्ष्मता होती है
धारणा यह है कि ग्रहण के मध्य में सूर्य जिस बिन्दु पर है , उसकी दोनों ओर गोलक का छोटा हिस्सा , उस बिन्दु पर स्पर्श के समतल के साथ सुसंगत है , ऐसा कहा जा सकता है
५२ . जब से सूर्य और चन्द्र की क्रांति में असमताएँ देखने में आई हैं , तब से उनके लिए नियम निश्चित करना , उनका माप खोजना और उनकी कक्षाओं के विभिन्न बिन्दुओं से उनका मूल्य कितना होता है , यह खोजना एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन गया है
इस उद्देश्य के लिए सूर्य और चन्द्र के केन्द्रों में संस्कार के कोष्ठकों यानी कि 'छाया'और ग्रहों के मंदफल संस्कार कोष्ठकों का हमें अध्ययन करना पड़ेगा
पहले के संदर्भ में श्याम के कोष्ठकों का श्रीयुत् कोसिनी का निरीक्षण है कि यह संस्कार भृम्युच्च बिन्दु से मध्यम अंतर के साइन ( ज्या ) के गुणोत्तर का अनुसरण करता है
इस विचलन का महत्तम मूल्य ३०° से ऊपर है; परंतु वहाँ भी वह १ मिनिट से कम ही है
उन्होंने इस प्रकार की गणना की है , परंतु केवल अनुमानित कोष्ठक की जाँच करने से ध्यान में आयेगा कि उसमें एक छोटा परंतु नियमित विचलन तो है ही
कोष्ठक में दिये गये और नियम के अनुसार गणना किये गये अंतर पूर्ण रूप से नियमित हैं , जो ३०° के बिन्दु से दोनों ओर घटते जाते हैं और चरण के अंत और प्रारंभ में शून्य हो जाते हैं
उदाहरण के लिये कोसिनी के नियम के आधार से गिने गये मूल्यों और कोष्ठकों में मूल्यों के बीच के अंतर सूर्य के मंदफल संस्कार का मूल्य चन्द्र के मंदफल संस्कार के दुगुने से भी अधिक होने पर ऐसा होता है
इतना ही नहीं , ये अवलोकन सूर्य और चन्द्र के संस्कारों पर भी चरितार्थ हैं
उसके बाद उसी कोष्ठक से मंदफल खोजने के लिए उपकरण के रूप में उसका ( शुद्ध किये गये मध्यम मध्यकेन्द्र का ) उपयोग होता है
क्यों कि मध्यम मध्यकेन्द्र में उसके लिए निश्चित किया गया संस्कार कोष्ठक में देखकर उसका आधा संस्कार जोड़ने से या घटाने से यह मध्यकेन्द्र ठीक सूक्ष्मता के साथ उत्केन्द्रक कोणिकांतर में रूपान्तरित हो जाता है
५५ . सूर्य और चन्द्र के संस्कारों के लिए बनाई गई सारिणियों और उनके लिए प्रयुक्त नियमों के बीच भी संपूर्ण सुसंगति नहीं है , क्योंकि इन दोनों में जिसे हम उत्केन्द्रक कोणिकांतर के रूप में मानते हैं , उसी को मध्यम मध्यकेन्द्र माना जाता है
अत: उस संस्कार का साधन उत्केन्द्रक कोणिकांतर हो या मध्यम मंदकेन्द्र , उससे कुछ विशेष अंतर नहीं पड़ता है
५५ . सूर्य और चन्द्र के संस्कारों के लिए बनाई गई सारिणियों और उनके लिए प्रयुक्त नियमों के बीच भी संपूर्ण सुसंगति नहीं है , क्योंकि इन दोनों में जिसे हम उत्केन्द्रक कोणिकांतर के रूप में मानते हैं , उसी को मध्यम मध्यकेन्द्र माना जाता है
५६ . इस प्रकार , जो पूर्वधारणा भारतीय खगोलशास्त्र की नींव के रूप में थी , उससे उत्स्कूर्त कुछ निष्कर्षों में एक निष्कर्ष यह है कि ब्राह्मणों के खगोलशास्त्र और टोलेमी की प्रणाली के बीच बहुत सी समानताएँ हैं
टोलेमी की प्रणाली में इसी तथ्य को पाँच ग्रहों को लागू किया गया था जिसे ब्राह्मणों ने व्यापक रूप में प्रस्थापित किया था , जैसे कि ग्रहों की कक्षाएँ वृत्ताकार हैं , पृथ्वी उस कक्षा के अंदर है परंतु केन्द्र से कुछ दूर है और प्रत्येक ग्रह अपनी कक्षा में नियमित रेखीय वेग से नहीं चलता है , परंतु यह रेखीय वेग नियमित लगता है , यदि उनका निरीक्षण इस बिन्दु से किया जाए , जो कि कक्षा के केन्द्र से इतना ही दूर है , जितना वह केन्द्र पृथ्वी से दूर है
अब , इस योगानुयोग के संदर्भ में निर्णय करना कठिन है , क्योंकि एक ओर इस संयोग को आकस्मिक नहीं माना जा सकता और दूसरी ओर यह सन्देहास्पद है कि यह साम्य इस विषय की प्रकृति के कारण है या फिर भारत और ग्रीस के खगोलशास्त्रियों के बीच किसी अज्ञात आदान प्रदान के कारण है
५७ . इस तर्क में तथ्य है इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है , तथापि इस मुद्दे की ओर ध्यान देना चाहिए कि यह तीसरी अवधारणा का उद्भव ग्रीकों के विषय में पूर्ण रूप से ऊपरि वर्णित योगानुयोग पर आधारित नहीं है
यद्यपि , हम उन्हें उनके अपने कार्यो में व्याख्यायित किये गये किसी तर्क के स्वरूप में नहीं लेते परंतु उनके द्वारा निर्मित प्रभाव का मूल्यांकन इस बात से कर सकते हैं कि युगों के बाद केप्लर की प्रणाली के साथ उनके प्रतिस्पर्धियों की चुनौती - जिसे केप्लर जैसे महान व्यक्ति ने आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया लगता है - का पुनरावर्तन करते रहे , उसके मूल भी इस वृत्ताकार कक्षा की अवधारणा में निहित हैं
यह आदानप्रदान या संदेश व्यवहार के भारत से ग्रीस की ओर जाने की संभावना अधिक है , उससे उल्टे की नहीं
इस अंतिम अभिप्राय के पक्ष में एक और बात भी सोची जा सकती है कि ग्रहों की कक्षाओं को दोहरी उत्केन्द्रता के साथ जोड़ने की आवश्यकता है ऐसा टोलेमी ने कहीं भी नहीं कहा है और इस सन्देह के लिए अवकाश रहने दिया है कि तर्क की अपेक्षा आधिकारिक सत्ता उसकी प्रणाली को अधिक प्रभावित करती है
५८ . ग्रहों के कोष्ठकों में हमने एक अन्य संस्कार 'शीघ्रम' को देखा है , जो पृथ्वी की कक्षा के लंबन को सन्तुष्ट करता है
यह लंबन है ग्रह के सूर्यकेन्द्री और पृथ्वीकेन्द्री यामों के बीच का अंतर
कक्षाएँ वृत्ताकार मानी गयी हैं , परंतु असमताएँ पृथ्वी की गति से उत्पन्न मानी जाती हैं
कक्षाएँ वृत्ताकार मानी गयी हैं , परंतु असमताएँ पृथ्वी की गति से उत्पन्न मानी जाती हैं
५९ . आगे की गणनाओं में बहुत से गौण कोष्ठकों की भी आवश्यकता निर्माण होगी; परंतु भारत में उसकी कोई टोह नहीं मिलती है
'आइने अकबरी' के एक परिच्छेद में दर्ज किया गया है कि हिन्दू वृत्त के व्यास और परिघ के गुणोत्तर १२५०:३९२७ होना मानते हैं
१०२ आगे लेखक आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि इतने अत्यंत साधारण लोगों में भी वह सत्य प्राप्त होता है जिसके लिए कदाचित् सबसे अधिक शिक्षित और विद्यासम्पन्न राष्ट्र भी असफल प्रयास करते हैं
समग्र प्रक्रिया में उस वक्र के विशेष गुणधर्मो की जानकारी के साथ दशांश स्थान के बाद के दस स्थानों तक नौ वर्गमूल लेने का अंकगणितीय सामर्थ्य आवश्यक होता है
मेटियस और वियेटा ये दो ही वृत्त के क्षेत्रफल की निश्चितता के विषय में आर्किमिडिज से आगे गये
त्रिवेलूर की सारिणियों में दिये गये मूल स्थानों और उसी ग्रंथकाल के लिए द' ला केइली और मेयर के कोष्ठकों के आधार पर गणना किये गये स्थानों के बीच की पूर्ण एकरूपता से उपर्युक्त निष्कर्ष निष्पन्न हुए हैं
द्वितीय : अभी ब्राह्मणों का खगोलशास्त्र अत्यंत प्राचीन होने पर भी उसमें बहुत से ऐसे कोष्ठक और नियम हैं , जिनकी रचना परवर्ती काल में हुई होगी
परन्तु वे उसी प्रकार के हैं जैसे प्राचीन ग्रंथकाल के मध्यम गति के कृष्णापुरम्१०३ कोष्ठकों का उपयोग करके बनाये गये हों , जिनमें एकाद सामान्य गणना के अतिरिक्त कोई विशेष युक्ति या कौशल की आवश्यकता न हो
वास्तव में , इस शास्त्र में होनेवाली भविष्य की खोज केवल खगोलशास्त्रियों या गणितज्ञों को ही नहीं परंतु ऐसे हर व्यक्ति को पर्याप्त आनन्द प्रदान करेगी जो मानव मात्र की प्रगति से हर्ष का अनुभव करता है अथवा तो पृथ्वी के प्राचीन निवासियों के विषय में जानने के लिये उत्सुक है
तृतीय : जिन चार खगोल प्रणालियों के कोष्ठकों का हमने परीक्षण किया उसका आधार स्पष्टत: एक ही है
ज्ञान की यह प्रणाली लोगों की नैसर्गिक मनोवृत्ति के साथ इतनी एकाकार हो गई है और उनके अंदर इतनी गहरे तक प्रसारित हो गई है तथा इतनी वैविध्यपूर्ण हो गई है कि उसे उस देश की प्राचीन धरोहर के रूप में प्रस्तुत होने का अधिकार है
चतुर्थ : इन कोष्ठकों की रचना में भूमिति , अंकगणित और सैद्धान्तिक खगोलशास्त्र का प्रचण्ड ज्ञान दृष्टिगत होता है
इस प्रकार भारतीय राशिचक्र की गति न ताराओं जितनी है और न सूर्य के भूम्युच्च बिन्दु के गति जितनी
३ ३ . भारतीय घण्टे , मिनिट , अर्थात् घटी , पल ३४ . वही ३५ . Med . Acad . Scien . ११ पृ . १८७ Asc . Ind पृ . ७६ ३६ . भारतीय कालगणना को यहाँ यूरोपीय कालगणना में रूपांतरित किया गया है
यह अंतर २०° , ५२' है , जो मात्र भौगोलिक क्षति के कारण होगा , उससे अधिक नहीं है
वे मूल स्थान के अक्षांश के साथ सुसंगत नहीं हैं , परंतु उससे पर्याप्त ऊँचे अक्षांश के लिए हैं , जो उनके दिन की लंबाई ढूँढने के नियम से पता चलता है
कभी उसे श्रीलंका का द्विभाजन करनेवाला बताते हैं तो कभी श्रीलंका के पश्चिम तट को स्पर्श करनेवाला , तो कभी अंतिम छोर पर पश्चिम कन्याकुमारी से लंका , जो उसका एक बिन्दु है , उसे फादर ह्यू केम्प श्रीलंका समझते हैं
जबकि श्रीयुत् बेइली मानते हैं कि वह लंका नामक सरोवर है , जो वोग्रा का मूल है
परंतु आईने अकबरी में दिये एक हिन्दु नक्शे पर से लंका एक टापू के रूप में है , जो ब्राह्मणों के मूलभूत याम्योत्तर ( जो लगभग कन्याकुमारी से गुजरती है ) और विषववृत्त के छेद पर विद्यमान है
ऐसा होने पर भी , उनके नियमों में जिस भाषा का प्रयोग हुआ है , उसमें हमें किंवदन्तिरूप और अज्ञानयुक्त युग के चिह्न दृष्टिगत होते हैं जिससे यूरोप का खगोलशास्त्री भी पूर्णत: मुक्त नहीं है
यहाँ भी चन्द्र का आरोहपात 'राक्षस' के रूप में पहचाना जाता है
जैसे कि 'अयनांश' अर्थात् सूर्य के भोग में संपातों के चलने के लिए की गयी कमी
यह शब्द दो शब्दों से बना है: 'अयन' अर्थात् मार्ग और 'अंश' अर्थात् भाग
मानो कि मंदफल संस्कार × है और यह उत्केन्द्र कोण का अंतर है e यह कक्षा की उत्केन्द्रता अथवा महत्तम संस्कार की स्पर्शज्या है; तो फिर ∴ x= 2e sin Ø + 2e3 sin3Ø/3+2e5 sin 5 Ø/5+ . . . . ९९ . गणना की यह पद्धति सत्य से इतनी अधिक निकट है कि मंगल की कक्षा में भी , उसकी कोणीय गति निरन्तर है ऐसी दृढ़ धारणा पर मध्यम मंदकेन्द्र से मंदफल , ऊपर बताये अनुसार , केन्द्र से दूर के एक बिन्दु के आगे गिना जाए तो वह इस नियम से बनाये भारतीय कोष्ठकों से क्वचित ही एकाध कला जितना अलग पड़ता है
ऐसा पता चला कि इससे उन्होंने इन दोनों असमताओं को एक ही बिन्दु पर लाने की कल्पना की; अर्थात् ऐसा बिन्दु जो सूर्य और पृथ्वी के ठीक मध्य में अर्थात् दोनों समान अंतर में हो
मंदफल संस्कार का साधन खोजने के लिए आधा 'शीघ्रम' संस्कार और आधा मंद' संस्कार उपयोग करने की पद्धति पर से श्रीयुत् बेइली अपना निष्कर्ष देते हैं
खाल्डिया और ग्रीस के खगोलशास्त्र के कतिपय भाग - जिन्हें संभवत: भारत से आयात किया माना जा सकता है - की बात में मुदे 'Astronomic lardianne' के दसवें प्रकरण का संदर्भ लेना ही पडे़गा , जहाँ इस विषय को अत्यंत विद्वत्तापूर्ण और सयुक्तिक ढंग से रखा गया है
अबुल फरायस कहते हैं कि बेबिलोन के सातवें खलीफा अल मैनन ( लगभग सन् ८१३ में ) के शासन में हबाश नाम के खगोलशास्त्री ने कोष्ठकों के तीन समूह तैयार किये
खाल्डिया और ग्रीस के खगोलशास्त्र के कतिपय भाग - जिन्हें संभवत: भारत से आयात किया माना जा सकता है - की बात में मुदे 'Astronomic lardianne' के दसवें प्रकरण का संदर्भ लेना ही पडे़गा , जहाँ इस विषय को अत्यंत विद्वत्तापूर्ण और सयुक्तिक ढंग से रखा गया है
३ . बनारस की वेधशाला से सम्बद्ध संकेत प्राचीन स्मारकों के निरीक्षण का कला एवं इतिहास से वैसा ही सम्बन्ध है , जैसा कि प्रयोगों का प्राकृतिक तत्त्वज्ञान से
इसी प्रकार प्राचीन स्मारकों के निरीक्षण के बिना तत्सम्बन्धी कोई भी अनुमान अस्पष्ट और अनिर्णित रहता है
लन्दन और पेरिस की रोयल सोसायटी की स्थापना के प्राथमिक उद्देश्य थे - भिन्न भिन्न देशों के विद्वानों के साथ संवाद स्थापित करना , कलाक्षेत्र की कठिनाइयाँ दूर करना , उनकी सामूहिक शक्ति का संगठन और ज्ञान की सीमाओं का विस्तार करना
इस सिद्धांत की सत्यता का प्रमाण जिन्हें मिला था , ऐसे यूरोपीय पुरातत्त्वविद अति परिश्रम कर पदक एकत्रित करने तथा ग्रीक , रोमन , पामीरियन और इजिप्शियन प्राचीन संस्कृति की जानकारी एकत्रित करने लग गये थे
उन्होंने प्रश्नावलियाँ तैयार कीं; निरीक्षण के नये नये विषय ढूंढे
वे उन खोज रहित क्षेत्रों के ज्ञान के खजानों को अपना बना लेने हेतु इतने अधिक उत्सुक दिखाई दे रहे थे कि वे बहुत सी आशा अपेक्षाएँ रख बैठे थे | सचमुच तो अयोग्य साधनों का उपयोग करने के कारण वे इन प्रयासों में असफल हुए थे
परन्तु ये प्रयास करनेवालों के परिश्रम और बुद्धिमत्ता के कारण हमेशा स्मरण में रखे जाएँगे
ऐसा प्रतीत होता है कि उसका निर्माण केवल स्मारक के रूप में हुआ है और तब भी यह एकमात्र और शंकास्पद अवलोकन से तत्त्ववेत्ता ऐसे निर्णय पर किस प्रकार पहुँचे कि पृथ्वी ने अपना अक्ष बदला नहीं है ? यह भी काफी समय तक निश्चित नहीं हुआ था कि इस खोज का कोई प्रायोगिक मार्ग भी था या नहीं , परन्तु सौभाग्य से खगोलशास्त्र के लिए बनारस में एक विशाल वृत्तांश विद्यमान है जो उसके स्थापनाकाल से ही , वेधशाला निर्माण हुई तब से ही याम्योत्तर समतल में स्थापित किया गया है
सर्वविदित है कि संपातों का भ्रमण ( अयनगति ) और पृथ्वी की गति का धूनन ( कंपन ) ढूँढ़ने की समस्या कुछ प्रसिद्ध गणितज्ञों ने अपने हाथ में ली है तथापि वे इस विषय में एक मत नहीं हैं
जैसे कि न्यूटन , सिम्पसन , वाम्सले और सिल्वेइन बेइली की धारणा है कि सूर्य एवं चन्द्र की गुरुत्वाकर्षी असरों के कारण विषुववृत्त अपने स्थान पर नहीं है; फलत: वह पुराने अक्ष के आसपास की नई स्थिति में प्रदक्षिणा करती है
हम जानते हैं कि पृथ्वी के विषुववृत्त का ५/६ भाग पानी से घिरा हुआ है और उस पर कहीं भी समुद्र छिछला भी नहीं है
केवल माडागास्कर से लेकर सुमात्रा तक के थोडे से भाग में कहीं कहीं छिछला समुद्र है
यह भी संभव है कि क्रांतिवृत्त की तिर्यकता से सम्बद्ध कुछ जानकारी भी बनारस की वेधशाला से प्राप्त होगी क्यों कि प्राचीन अवलोकन संतोषजनक ढंग से कभी कभी सूचित करनेवाले होते हुए भी , इनमें से कुछ अवलोकन सुसंगत नहीं हैं और खगोलशास्त्रियों के साथ इस वार्षिक कमी के १/४ भाग जितना मात्रा भेद भी है
इसी प्रकार मुझे बताता गया कि यंत्रों ( साधनों ) पर माप हेतु विभाग बनाये गये हैं , परन्तु उन पर माप अंकित नहीं है
यदि उन पर उपविभाग और अंक होते तो उनके द्वारा हमें प्राचीन अक्षरों या अंक विषयक जानकारी प्राप्त होती
इसी प्रकार कुछ निश्चित अवलोकन और सुनिश्चित तथ्यों की सहायता से बहुत सारे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं
हमें इस पर ध्यान देना चाहिए कि ज्ञान प्रयोगों की संख्या के अनुपात में नहीं , परन्तु उसकी अपेक्षा बहुत बडे अनुपात में बढ़ता है और एक अकेला अवलोकन कदाचित नगण्य अथवा निरर्थक लगने पर भी अन्य अवलोकनों के साथ मिलकर बहुत बड़ा असर पैदा कर सकता है
इसी तर्क के आधार पर बनारस की वेधशाला में केवल खगोलीय दृष्टिकोण से लिये गये अवलोकन व्यापार , इतिहास , कालगणना तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में उपयोगी हो सकते हैं
अत: हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सभी विज्ञान भारत में उदित हुए , इसी भूमि पर उच्च कक्षा तक विकसित होने के बाद अन्य देशों तक पहुँचे
जो विद्यार्थी भारत में विज्ञान के अध्ययनार्थ आये , उनके निजी शक्ति एवं झुकाव के अन्तर के कारण से यह अन्य देशों में पहुंचना कम अधिक मात्रा में प्रभावित हुआ होगा
हमें ज्ञात है कि वह अध्ययनार्थ भारत आये थे , परन्तु हमेशा शिष्य की क्षमता ही उसका प्रावीण्य निश्चित करती है
इसका कारण था 'उसमें पूर्वज्ञान का अभाव' था
ऐसी स्थिति में फादर गोबिल दो मापों के बीच का गुणोत्तर मापने में सफल हुए हैं
इससे हमें इतना लाभ अवश्य होगा कि ये लोग किस प्रकार के कोणीय मापों को प्रयुक्त करते थे और उनमें उपविभागों का विभाजन किस प्रकार किया गया था
न्यूटन की कालगणना इस मान्यता पर आधारित है कि शिरोन का गोलक प्रमुख रूप से आकाशदर्शन के अध्ययनकर्ताओं हेतु बनाया गया था
प्रस्तुत अवधारणा को अतिशय विरोध का सामना करना पड़ा था क्यों कि इसे सभी मानते हैं कि हिन्दुओं की भी ऐसी ही नक्षत्र आकृतियाँ हैं और क्रम भी यही है
क्योंकि असत्य अवधारणा पर आधारित गुणक अवलोकन लेना व्यर्थ है और यह भी जानते हैं कि बेबिलोन के खगोलशास्त्रियों के पास महान सिकन्दर के समय तक अनुमानत: दो हजार वर्षों के अवलोकन थे
इसी प्रकार टोलेमी का सूर्य मंडल प्राचीन पायथागोरियन प्रणाली की अपेक्षा अति प्राचीन माना जाता है और उसके बाद ग्रीकों एवं रोमनों का अज्ञान तो कितने ही प्राचीन स्मारकों में उनके द्वारा किये गये हास्यास्पद स्पष्टीकरणों से स्पष्ट हो जाता है
इस स्पष्टीकरण से ज्ञात होता है कि पर्शिया में बैल को चन्द्र का प्रतीक बताया गया है
यहूदी अमावस्या के दिन बछड़े की पूजा करते , नक्षत्रों की रानी के लिए 'केक' बनाते और तुरही बजाते थे
सामान्य रूप से ऐसी जानकारी प्राप्त हुई है कि ब्राह्मण उनकी ग्रहण गणना हमारी तरह खगोलीय कोष्ठकों द्वारा न कर , नियमों की सहायता से करते हैं
वर्तमान आधुनिक ब्राह्मण जिस पद्धति को अपनाते हैं उसे अथवा तो पालन करते हैं उस पद्धति के अवलोकनों पर कोई प्रभाव पड़नेवाला नहीं है , क्यों कि अवलोकन किसी सम्प्रदाय या पंथ के नहीं होते हैं , तथ्यगत होते हैं; वेधशाला चाहे टोलेमी पद्धति की हो या कोपरनिकन पद्धति की , यदि वह संख्या बहुत बड़ी हो और बहुत सावधानीपूर्वक तैयार की गई हो तो वह आधुनिक खगोलशास्त्र की अति महत्त्वपूर्ण सेवा मानी जाएगी; भले ही पृथ्वी को स्थिर माना जा रहा हो या गतिशील
वर्तमान आधुनिक ब्राह्मण जिस पद्धति को अपनाते हैं उसे अथवा तो पालन करते हैं उस पद्धति के अवलोकनों पर कोई प्रभाव पड़नेवाला नहीं है , क्यों कि अवलोकन किसी सम्प्रदाय या पंथ के नहीं होते हैं , तथ्यगत होते हैं; वेधशाला चाहे टोलेमी पद्धति की हो या कोपरनिकन पद्धति की , यदि वह संख्या बहुत बड़ी हो और बहुत सावधानीपूर्वक तैयार की गई हो तो वह आधुनिक खगोलशास्त्र की अति महत्त्वपूर्ण सेवा मानी जाएगी; भले ही पृथ्वी को स्थिर माना जा रहा हो या गतिशील
मेरा यह भी मानना है कि प्रथम भारतीय व्यवस्थापक सभा की अभिलाषा जेस्युइटों के आधुनिक समाज जैसी ही थी
और राजाओं की सभा में जेस्युइटों की तरह भटकते थे , जो ज्ञानविज्ञान की जानकारी का अन्य अधिक महत्त्व की बातों ( राजकाज ) में उपयोग करने का प्रयास करते थे . . . आदि . . . इस अभिप्राय हेतु कारण इतिहास से ढूँढकर यहाँ क्रमबद्ध करना काफी लम्बा हो जाएगा
परन्तु हम जानते हैं कि किसी निश्चित अक्षांश के लिए बनाई गई सौरघड़ी अन्य अक्षांश हेतु भी उपादेय होती है , यदि उसका ठीक प्रकार से अध्ययन कर उचित ढंग से व्यवस्थित कर रखा जाय
वे ढाली गई और नक्काशी युक्त मूर्तियां बनाते थे , उपवनों में वृक्ष की छाया में पूजा करते थे और अपनी संतानों को , वर्तमान के ब्राह्मणों एवं साधुओं की तरह आग पर से चलाते थे
बाइबल में दिये गये एहाज और अन्य इजरायली राजाओं के मूर्तिपूजा के वृतान्त से ज्ञात होता है कि संभवत: जेन्टू उपासना पद्धति भारत से लेकर पश्चिम भूमध्य समुद्र तक व्याप्त थी और यहूदी उसे द्रुतगति से अपना रहे थे
भारत विषयक हमारा ज्ञान इतना सीमित है कि यह अनुमान करना भी असंभव है कि साहित्य में ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठता कैसे बनाये रखी थी
यों कहा जाता है कि जगत जिसे 'टोलेमी प्रणाली' के रूप में जानता है उसे हिन्दुओं के एक विजेता विक्रमजीत ने पूर्व में प्रचलित किया था और उस परम्परा में विश्व की सभी सही प्रणालियाँ विस्तृत हो गई थीं
यह वही किस्सा है जो यूरोप में कैथोलिक क्षेत्रों में घटित हुआ है; क्यों कि पोप की आज्ञा के अनुसार कोपरनिकस की प्रणाली का स्वीकार नास्तिकता है और उसका सार्वजनिक रूप से प्रचार करना अधोगति की परिसीमा है
यह वही किस्सा है जो यूरोप में कैथोलिक क्षेत्रों में घटित हुआ है; क्यों कि पोप की आज्ञा के अनुसार कोपरनिकस की प्रणाली का स्वीकार नास्तिकता है और उसका सार्वजनिक रूप से प्रचार करना अधोगति की परिसीमा है
हम जानते हैं कि अरब गणितशास्त्री मुख्यत: ग्रीकों के गणित का उपयोग करते थे
हम जानते हैं कि अरब गणितशास्त्री मुख्यत: ग्रीकों के गणित का उपयोग करते थे
नष्ट भ्रष्ट किये गये अरबों के गणित ग्रन्थों में से किसी को भी लें तो हमें ग्रीकों के ही सिद्धान्त देखने को मिलेंगे; फलत: उसके मूल स्रोत की खोज करना आर्किमीडीज , युक्लिड , डायोफेन्टस , एपोलोनियस आदि के अद्भुत आविष्कार की खोज करना है , ऐसे आविष्कार जो बहुत पहले खो चुके हैं और जिन्हें खोने पर यूरोप के गणितज्ञों को पछतावा था
यदि ऐसा मान लिया जाय कि वह वेधशाला ( संभाव्यता के प्रत्येक नियम के विरुद्ध ) केवल प्रदर्शन हेतु निर्मित की गई थी अथवा उसके निर्माण में महत्त्वपूर्ण कुछ नहीं है; अथवा किसी प्रकार के अवलोकन नहीं लिखे गये थे अथवा उसके स्वरूप , स्थिति या साधनों की रचना से भी उसकी किसी प्रकार की उपयोगिता नहीं दिखाई देती है - तब भी , इस विषय का परिश्रम व्यर्थ नहीं होगा; क्यों कि इससे भारत के भूगोल , खगोल , जलवायु आदि से सम्बन्धित असंख्य अवलोकन प्राप्त हो सकते हैं
भारत के सर्वेक्षण कुछ क्षतिग्रस्त हैं और इसका मुख्य कारण यह है कि भारत के किसी भी स्थान के - पोंडिचेरी को छोड़कर - रेखांश योग्य ढंग से निश्चित नहीं किये गये हैं
और वास्तव में अधिकतर ब्रिटिश नकशे अक्षांश - रेखांश को निश्चित किये बिना केवल पर्वतों की आदर्श शृंखला और काल्पनिक जंगलों को भर कर दंभी सर्वेक्षकों के द्वारा खंडश: बनाये गये थे और ऐसे ही लोगों के द्वारा एकत्रित किये गये थे
इससे भिन्न भिन्न सर्वेक्षणों को उचित ढंग से साथ में रखने में भी सहायता मिलेगी और बनारस तथा अन्य ऐसे स्थानों के रेखांश भी उससे प्राप्त हो सकेंगे
चुम्बकीय सुई ( दिशादर्शक यंत्र ) के विचलन के गहन अवलोकन लेने का अवसर केवल सर्वेक्षण में सुधार करने हेतु ही नहीं तो चुम्बकत्व का सिद्धांत ढूँढ़ने में भी उपयोगी रहेगा
फिर अन्य कोई पुरातन अवलोकन ढूँढ़ने हों तब भी उसका उपयोग हो सकता है , भारत और इंग्लैण्ड की जलवायु भिन्न होने से , समानता के स्थान पर तर्क का आधार लिया जा सकेगा; विशेषकर फर्क के लिये जब बहुत से कारण हों और उनमें से बहुत कम निश्चित हो पा रहे हों तब
यदि अवलोकनकार को उपयुक्त यंत्र उपलब्ध करवाया जाए तो चन्द्र का क्षैतिज लंबन खोजना भी सही रहेगा , जिस प्रकार सर्वप्रथम डिगस ने सूचित किया था और मेक्सलीन ने सेन्ट हेलेना में उसकी क्रियान्विति की थी
इस पद्धति का पूर्व अंश मापन पद्धति की तुलना में अधिक लाभ है , क्योंकि यह पद्धति पर्वतों के अनिश्चित आकर्षण से प्रभावित होनेवाली नहीं है
इतना ही नहीं , मौसम विज्ञान ( Meterology ) , वायुदबाव शास्त्र , खगोलशास्त्र , विद्युतशास्त्र आदि अनेक विज्ञानों से सम्बद्ध अवलोकन बनारस की यात्रा से संभव हो सकते हैं , यद्यपि इस प्रकार के विशिष्ट मुद्दों की सूची अनंत है
यदि खगोल के किसी मर्मज्ञ को कंपनी द्वारा अपने तथा अधीनस्थ क्षेत्र के प्रमुख नगरों एवं स्थलों के अक्षांश - रेखांश मापन हेतु कुछ अच्छे साधनों के साथ भेजा जाता है तो वह व्यक्ति केवल निर्धारित क्षेत्र का सही सर्वेक्षण तथा देश की वर्तमान और पुरातन स्थिति से सम्बद्ध जानकारी ही नहीं प्राप्त करेगा अपितु सार्वजनिक रूप से मापन किया जा सकनेवाला खगोलीय तथा भौतिक अवलोकनों का भंडार एकत्रित करने का अवसर प्राप्त करेगा
मूल पुस्तक का नाम है - 'सृष्टि के आश्चर्य' ( द वन्डर्स ऑफ द क्रिएशन - The Wonders of the creation . ) वस्तुत: यह पुस्तक एक प्रकार से प्रचलित प्राकृतिक इतिहास विषयक है जिसे संपादक ने विज्ञान से सम्बद्ध पुस्तकों तथा अरबों के यात्रा वर्णनों एवं अनुभवों के आधार पर लिखा है
मूल पुस्तक का नाम है - 'सृष्टि के आश्चर्य' ( द वन्डर्स ऑफ द क्रिएशन - The Wonders of the creation . ) वस्तुत: यह पुस्तक एक प्रकार से प्रचलित प्राकृतिक इतिहास विषयक है जिसे संपादक ने विज्ञान से सम्बद्ध पुस्तकों तथा अरबों के यात्रा वर्णनों एवं अनुभवों के आधार पर लिखा है
इस क्षेत्र के विद्वानों को पूछने पर जानकारी प्राप्त हुई कि मंगल का व्यक्तित्व एक योद्धा जैसा है और गुरु की आकृति एक बैठे हुए वृद्ध व्यक्ति की है , जिसके आसपास चार कन्याएँ नृत्य कर रही हैं
पुस्तक का प्रारम्भ आकाशीय पदार्थ एवं ख-गोलकीय आश्चर्यों के निरूपण से होता है
मंगल और बृहस्पति को छोड शेष सभी ग्रहों के लिये अंक दिये गये हैं
यह पुस्तक हिजरी सन् की पाँचवीं अथवा छट्ठी शताब्दी में लिखी गई है
इस पुस्तक का अनुवाद मैं लब्धप्रतिष्ठ सोसाईटी के समक्ष रखना चाहता था , परंतु आकृतियाँ चित्रित करने की कठिनाई ने मेरी योजना की क्रियान्विति को बाधित किया
सचमुच तो मैंने इस पुस्तक की प्रतिलिपि केवल शनि की आकृतियों के लिये ही की थी
अभी तक यूरोपीयों के द्वारा केवल पाँच उपग्रह देखे गये थे , परंतु इसमें तो शनि छ: उपग्रहों से युक्त चित्रित किया गया है
सातवें हाथ में मुकुट है , जो चार भागों में विभाजित है
मेरी धारणा है कि ये चार समकेन्द्री वलय हैं
यदि छठे उपग्रह का आविष्कार हो जाए तो भी उसका सशक्त तर्क विरोधी अभिप्राय के समर्थन में होगा
अतएव इतना ही कहूँगा कि अल्हाजन ने रंग विषयक ( प्रकाश के परावर्तन के सम्बन्ध में ) लिखा है और बहिर्गोल दर्पण के द्वारा प्राप्त होनेवाले प्रतिबिम्बों की समस्या आज भी अल्हाजन के नाम से जानी जाती है
यहाँ मुझे निर्दिष्ट करना चाहिए कि अल्हाजन ने रंगों एवं परावर्तन प्रक्रिया के सम्बन्ध में लिखा है , यदि उसने दृगकांच और त्रिपार्श्वकांच द्वारा होनेवाले वक्रीभवन के सम्बन्ध में नहीं लिखा , जिसमें दर्पण प्रयुक्त होते हैं ऐसे किसी भी उपयोग के सम्बन्ध में नहीं लिखा तो इतने मात्र से प्रमाणित नहीं होता कि तब दूरदर्शक यंत्र नहीं थे
कारीगर उनका उपयोग जान सकते हैं , जानकार होने पर भी वे लिखेंगे नहीं , क्यों कि सम्प्रति व्यवसाय केवल कार्य और अभ्यास से ही सीखे जा सकते हैं
यदि यह पुस्तक यूरोप में दूरदर्शक प्रयोग में आने से पूर्व लिखी गई थी - और यह भी निश्चित है कि यहाँ दूरदर्शक एक सामान्य उपयोग की वस्तु मानी जाती थी जबकि उसका हमें विचार तक नहीं आया था
यद्यपि वे डोलोन्ड द्वारा निर्मित दूरदर्शक जैसा वर्णन नहीं करते हैं; तथापि वह दूरदर्शक ही था
बंदूक में प्रयुक्त होनेवाले विस्फोटक , अतीत की तुलना में नया आविष्कार माना जाएगा , परंतु ग्रे के बंदूकशास्त्र ( गनेरी ) पुस्तक में उल्लेख है कि वह सिकंदर के समय में भी बंदूकों में प्रयुक्त होता था
एक तो शनि के छठे उपग्रह का अनुसंधान किया जा सकता है , जिसका अस्तित्व पूर्णत: काल्पनिक नहीं माना जा सकता
यदि यह पुस्तक यूरोप में दूरदर्शक प्रयोग में आने से पूर्व लिखी गई थी - और यह भी निश्चित है कि यहाँ दूरदर्शक एक सामान्य उपयोग की वस्तु मानी जाती थी जबकि उसका हमें विचार तक नहीं आया था
यद्यपि वे डोलोन्ड द्वारा निर्मित दूरदर्शक जैसा वर्णन नहीं करते हैं; तथापि वह दूरदर्शक ही था
बंदूक में प्रयुक्त होनेवाले विस्फोटक , अतीत की तुलना में नया आविष्कार माना जाएगा , परंतु ग्रे के बंदूकशास्त्र ( गनेरी ) पुस्तक में उल्लेख है कि वह सिकंदर के समय में भी बंदूकों में प्रयुक्त होता था
एक तो शनि के छठे उपग्रह का अनुसंधान किया जा सकता है , जिसका अस्तित्व पूर्णत: काल्पनिक नहीं माना जा सकता
कुछ की पंखे जैसे आकार की होती है , कुछ की चक्राकार और तेज मंडलाकार होती है , तो कुछ की गति होती ही नहीं है
फिर , कुछ की गति वक्र होती है , तो कुछ मार्गी ( सीधा ) होते हैं तो कुछ अंतरिक्ष के आरपार चले जाते हैं
परिणामस्वरूप कहा जाता है कि विषुववृत्त अभी पृथ्वी के जिस भाग में है उसकी तुलना में भूतकाल में अधिक उत्तर की ओर अवस्थित होगा
बुखारा के नीचे के रेतीले मैदान भी तब 'मोझीझ के स्वर्ग' की तलहटी के एक भाग थे
स्वर्ग की चार पवित्र नदियाँ भारत , चीन , साइबेरिया , तथा कास्पियन सागर की ओर बहती थीं
ब्राह्मणों का यह मानचित्र संस्कृत भाषा में है और उसके साथ बौद्ध तत्वज्ञान पर आधारित भूगोल से सम्बन्धित एक ग्रन्थ भी है
सूर्य और अग्नि की पूजा , यज्ञ में मनुष्य और पशुओं के बलिदान आदि एक काल में सार्वत्रिक थे
पोपवाद और देवतावाद के विभिन्न सिद्धान्त 'ब्रह्मा' और 'बुद्ध' के साथ पर्याप्त साम्य रखते हैं और जिस प्रकार टोलेमी की खगोल प्रणाली के लेखक ब्राह्मण थे , ठीक उसी प्रकार प्रतीत होता है कि कोपर्निकस की प्रणाली एवं आकर्षण सिद्धांत का शोध करनेवाले बौद्ध थे
पोपवाद और देवतावाद के विभिन्न सिद्धान्त 'ब्रह्मा' और 'बुद्ध' के साथ पर्याप्त साम्य रखते हैं और जिस प्रकार टोलेमी की खगोल प्रणाली के लेखक ब्राह्मण थे , ठीक उसी प्रकार प्रतीत होता है कि कोपर्निकस की प्रणाली एवं आकर्षण सिद्धांत का शोध करनेवाले बौद्ध थे
जब छ: वर्ष पूर्व एक पंडित की सहायता से मैंने 'बीजगणित' के कुछ अंश का अनुवाद किया , तब मेरी धारणा है कि मेरे सिवाय किसी यूरोपीय को कल्पना भी नहीं हुई होगी कि हिन्दुओं के पास बीजगणित का ज्ञान भी था
श्री जेन्टिल के ग्रंथ के पृष्ठ २५३ तथा २५४ पर दिये हुए कोष्ठकों के पाँचवें और छठे स्तंभ इस कोष्ठक को सुंदर ढंग से स्पष्ट करते हैं , परंतु 'भोग' अर्थात् चरान्तर के प्रथम अंतरों को दुगुना गिनें
यहाँ अंतरों को लेने के पीछे प्राथमिक कारण यह दिखाई दे रहा है कि त्रिज्याएँ चाप के निकटस्थ मूल्य को देती हैं और अंतरों को जोड़कर चाप का भी निकटस्थ मूल्य प्राप्त किया जा सकता है
अब प्रथम स्तंभ के मूल्य प्रथम , द्वितीय और तृतीय राशि के लिए चरान्तर का दुगुना है , जिससे उसका आधा करने से यह चरान्तर घटी में प्राप्त होगा
परंतु श्री विट्शेल , जिन्होंने ब्रिग्ज का उल्लेख कुछ वर्ष पूर्व ही , विकलन पद्धति के शोध करनेवाले के रूप में किया था , कहते हैं कि उन्हें द्विपदी प्रमेय के चिह्न बहुत पुराने लेखकों के लेखों में भी प्राप्त हुए हैं
परंतु श्री विट्शेल , जिन्होंने ब्रिग्ज का उल्लेख कुछ वर्ष पूर्व ही , विकलन पद्धति के शोध करनेवाले के रूप में किया था , कहते हैं कि उन्हें द्विपदी प्रमेय के चिह्न बहुत पुराने लेखकों के लेखों में भी प्राप्त हुए हैं
'प्रथम अंक ८ को उसके नीचे लिखी संख्या १ द्वारा भागाकार करें
अर्थात् एक साथ ३ दरवाजे खुलवाने की संख्या ५६ का द्वारा गुणाकार कर उसके नीचे का अंक ४ द्वारा भागाकार करने पर ७० आएगा
ध्रुवों को परिवर्तित करने के संदर्भ में कदाचित लिखने योग्य एक अवलोकन है; जिसे छोटे चट्टानीय झींगे कहते हैं जो सामान्यत: पानी के सर्वोच्च स्तर के लगभग एक फुट तक की ऊँचाई में मर जाते हैं
ध्रुवों को परिवर्तित करने के संदर्भ में कदाचित लिखने योग्य एक अवलोकन है; जिसे छोटे चट्टानीय झींगे कहते हैं जो सामान्यत: पानी के सर्वोच्च स्तर के लगभग एक फुट तक की ऊँचाई में मर जाते हैं
अब , संभवत: प्रकृतिविद इस सीप के आकार के आधार पर उसकी आयु कह पाएँगे और यदि ऐसा संभव हो पाएगा तो इस क्षेत्र में समुद्र स्तर में होनेवाले उतार चढ़ाव का अनुमान अच्छे ढंग से किया जा सकेगा
सीपों की संख्या में समुद्र सतह से ऊँचाई के अनुपात में उनमें वृद्धि होती जाती थी , परंतु यह वृद्धि इतनी अधिक नहीं थी , जो हमें यह मानने के लिए प्रेरित करे कि चट्टान बहुत वर्षो से समुद्र के बाहर रही होगी
प्रथम तो उत्सुकतापूर्वक जिज्ञासु ज्ञान के स्रोत विषयक सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता ही है और उसकी प्रगति का पुनरावलोकन ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया को अपने सूचनों के द्वारा प्रोत्साहित करता है
गणितशास्त्र के इतिहास में बहुत समय से एक प्रश्न पूछा जाता रहा है कि बीजगणितीय पृथक्करण की खोज का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए
प्रथम तो उत्सुकतापूर्वक जिज्ञासु ज्ञान के स्रोत विषयक सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता ही है और उसकी प्रगति का पुनरावलोकन ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया को अपने सूचनों के द्वारा प्रोत्साहित करता है
हम इस विषय में तो नि:शंक ही हैं कि यह ज्ञान हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अरबों से प्राप्त हुआ है , परंतु अरबों ने स्वयं बीजगणित की खोज का दावा नहीं किया है
उनके इतिहास की संक्षिप्त अवधि में जब सांस्कृतिक सफलता का समय था तब उन्होंने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति की थी
इतना ही नहीं , परंतु गणित के दो भाग-एक सरल और दूसरा गूढ़-अर्थात् अंकगणित और बीजगणित की आधारभूत गिनती और पृथक्करण की पद्धतियों की खोज एवं विकास का श्रेय प्राप्त करने का दावा , निस्संदेह जहाँ तक प्राचीन खोजबीन का संबंध है वहाँ तक तथा अमुक निश्चित विषयगत बिन्दुओं के लिए आधुनिक खोजबीन के संदर्भ में औचित्य का भी सही ढंग से परीक्षण हो पाएगा
पृथक्करण कला की प्रवर्तमान प्रगत स्थिति में यह आशा बिलकुल भी नहीं है कि बीजगणित , अंकगणित और मापन संबंधी प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के प्रस्तुत संस्करण इस कला में कुछ रिक्त अन्य संदर्भ में नया प्रकाश डाल पावें
उन्होंने अपना महान ग्रंथ 'सिद्धांत-शिरोमणि' शक संवत् १०७२ में पूर्ण किया ऐसी सूचना उन्होंने ग्रंथ के एक परिच्छेद में ही दी है
इस ग्रंथ का काल शक संवत् ११०५ है , अर्थात् सिद्धांत ग्रंथ के ३३ वर्ष बाद प्रयोग ग्रंथ आता है
इस प्रकार 'लीलावती' और 'बीजगणित' जिसके दो भाग हैं ऐसे ग्रंथ 'सिद्धांतशिरोमणी' की रचना का समय अत्यंत सावधानीपूर्वक , संतोषजनक ढंग से ख्रिस्ती कालगणनानुसार बारहवीं शताब्दी का मध्यभाग अर्थात् सन् ११५० है
टीकाग्रंथों तथा मूलग्रंथों की तुलना और मिलान करने पर ज्ञात होता है कि सरल प्रवाहपूर्ण लेखन-जैसा कि उनकी प्रतिलिपियों में है - युक्त भास्कराचार्य की कृतियाँ ढाई से तीन शताब्दी पूर्व हिन्दू और मुसलमान दोनों के पास थी
भास्कराचार्य का इन उदाहरणों के साथ पद्यात्मक लेखन , बीच बीच में आनेवाली विवरणात्मक टिप्पणियों को कम करने पर भी , अभी तक प्रचलित टीका के ग्रंथकाल तक , जरा भी परिवर्तित नहीं हुआ है
परिणामों के कारणरूप पूर्व कथित चिह्नों का समर्थन किया और ग्रंथ तथा भाष्य दोनों का परिचय क्रमश: ब्रह्मगुप्त के ग्रंथ और पृथूदक स्वामी के भाष्य के रूप में प्रस्थापित किया
भास्कर के सर्वाधिक तेजस्वी ने आर्यभट्ट के एक परिच्छेद को उद्धृत किया है
भास्कर के एक दूसरे टीकाकार आर्यभट्ट को पूर्व के विद्वानों में मूर्धन्य मानते हैं और उस समय विचाराधीन पुस्तक की टीका में द्विघात समीकरण को हल करने हेतु पूर्ण वर्ग की पद्धति को आर्यभट्ट के द्वारा 'मध्यम हरण' नाम दिया जाने का उल्लेख किया गया है
यह प्राचीन खगोलशास्त्री और बीजगणितज्ञ वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त से पूर्व हो चुके थे और ब्रह्मगुप्त ने भी यदाकदा उनका संदर्भ दिया है
सूर्य सिद्धांत और शिरोमणी के टीकाकार आर्यभट्ट को खगोलशास्त्र के अन्तर्ज्ञानरहित और मानवीय लेखकों में प्रथम मानते हैं; उन्होंने पराशर से ही ग्रहों की मध्यम गतियों के आँकडे ग्रहण किये और फिर प्रणाली में आवश्यक सुधार किये थे
सूर्य सिद्धांत और शिरोमणी के टीकाकार आर्यभट्ट को खगोलशास्त्र के अन्तर्ज्ञानरहित और मानवीय लेखकों में प्रथम मानते हैं; उन्होंने पराशर से ही ग्रहों की मध्यम गतियों के आँकडे ग्रहण किये और फिर प्रणाली में आवश्यक सुधार किये थे
खलीफा अब्बासादी के शासनकाल में अरब खगोलशास्त्रियों को भारतीय खगोलशास्त्र विषयक जो जानकारी मिली उसके अनुसार , वे जानते थे कि उन दिनों हिन्दुओं में तीन अलग-अलग खगोल प्रणालियाँ प्रचलित थीं और उनमें से एक के साथ आर्यभट्ट का नाम सहज परिवर्तित रूप में भी , सर्वथा अपरिचित नहीं था
दूसरी दो प्रणालियों में से प्रथम तो ब्रह्मगुप्त की 'सिद्धान्त' है , जिससे अरब सुपरिचित थे और जिससे उन्होंने 'सिन्धहिन्द' लिखी और दूसरी थी 'अर्क' अर्थात् सूर्य जिसे वे 'आर्कन्ड' लिखते हैं , जो आज भी लौकिक हिन्दी में प्रयुक्त होता है
खलीफा अब्बासादी के शासनकाल में अरब खगोलशास्त्रियों को भारतीय खगोलशास्त्र विषयक जो जानकारी मिली उसके अनुसार , वे जानते थे कि उन दिनों हिन्दुओं में तीन अलग-अलग खगोल प्रणालियाँ प्रचलित थीं और उनमें से एक के साथ आर्यभट्ट का नाम सहज परिवर्तित रूप में भी , सर्वथा अपरिचित नहीं था
खगोलशास्त्र में आर्यभट्ट का प्रावीण्य था , बीजगणित में उन्होंने जो भी लिखा है इस तथ्य का स्वीकार करते हुए अनेक लेखकों ने , उनका स्वतंत्र खगोल प्रणाली के स्थापक के रूप में उल्लेख किया है
खगोलशास्त्र में आर्यभट्ट का प्रावीण्य था , बीजगणित में उन्होंने जो भी लिखा है इस तथ्य का स्वीकार करते हुए अनेक लेखकों ने , उनका स्वतंत्र खगोल प्रणाली के स्थापक के रूप में उल्लेख किया है
कुछेक ने प्राचीन और मौलिक आधारभूत सामग्री उद्धृत करने की आवश्यकता पडने पर बीजगणितज्ञों में मूर्धन्य के रूप में उनको माना है - इन सभी तथ्यों पर मनन करते हुए , उन्हें छोड़कर पृथ्करण की कला के महान शोधकर्ता के रूप में तथा उसे आज की स्थिति तक पहुँचानेवाले व्यक्ति के रूप में किसी अन्य गणितशास्त्री की खोज करने की आवश्यकता नहीं है
यों , तो हिन्दुओं में आर्यभट्ट ही ऐसे प्रथम सुविख्यात शास्त्रज्ञ हुए हैं , जिन्होंने 'बीजगणित' विषयक कुछ लिखा है और भले ही वे कदाचित शोधकर्ता न हों , तो भी खोजी व्यक्तित्व के रूप में उन्होंने इस पृथक्करण शास्त्र को जिस कक्षा तक पहुंचाया है , उसे देखते हुए उनके जीवन एवं के समय का पता लगाना या बाद में ब्रह्मगुप्त ( या जिसका समय ठीक रूप से निश्चित हो चुका है ) और आर्यभट्ट के बीच कितना समय बीत गया , उसे निश्चित करने हेतु किसी सीधे प्रमाण के अभाव में किसी भी अनुसरणीय मार्ग की छानबीन करना , एक विशेष अर्थ में रुचिप्रद बना रहेगा
इससे , निष्कर्ष यह निकलता है कि अबुल फरीज के प्रमाण के आधार पर , आर्यभट्ट ग्रीक बीजगणितज्ञ डायोफेन्टस जितने ही प्राचीन होने चाहिए , जो सम्राट जुलियन के समय में अर्थात् सन् ३६० में हुए थे
क्यों कि आर्यभट्ट के पास अधिक अज्ञातों के समीकरणों को हल करने का कौशल था
इतना ही नहीं , प्रथम कक्षा के अनिश्चयात्मक प्रश्नों के हल हेतु सामान्य पद्धति आर्यभट्ट ने विकसित की थी जब कि ग्रीक गणितज्ञ के विषय में ऐसी जानकारी प्राप्त नहीं होती है तथापि डायोफेन्टस में निश्चित समाधानों के विषय में अत्यन्त व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और युक्तिप्राचुर्य दिखाई देता है और दोनों के बीच में कतिपय समानताएँ दृष्टिगोचर होती हैं
वे ऋण संख्याओं को बिन्दु द्वारा पृथक करते हैं
 ( बीजगणित प्रकरण-६ , विभाग-१५३-१५६ के प्रारंभ का विवरण ) 'वर्ग' और 'घन' के प्रथमाक्षर अपनी-अपनी घात दर्शाते हैं और जब साथ आते हैं तब इन दोनों में से बड़ा घात दर्शाता है
संयुक्त राशि के पदों को उसके घातांक के घटते क्रम में दर्शाया जाता है और अचल संख्या अनिवार्य रूप से सबसे अंत में आएगी
फिर अरब बीजगणितज्ञ तो संकेतों से बहुत दूर हैं वरन् यों कहें कि वे सर्वथा संकेत रहित हैं
Tavgioni Tozzetti के मतानुसार पीजा के Leonardo Bonacci नामक आरबों के सर्वप्रथम विद्वान ने वर्णमाला के छोटे अक्षर मूल्य दर्शाने हेतु प्रयुक्त किये
'शाइ' अर्थात् वस्तु
अरबों ने अज्ञात संख्या के वर्ग हेतु 'माल' शब्द प्रस्तुत किया , जिसका अर्थ होता है 'सम्पत्ति'
'अचल सम्पत्ति ( Estate ) अथवा सम्पत्ति ( Property ) का स्वीकार'- इस अर्थ में लियोनार्डो ने 'सेन्स' शब्द प्रयुक्त किया है
वे अधिक बड़ी घात दर्शाने हेतु 'माल' और 'चब' का साथ में उपयोग करते थे तथा डायोफेन्टस की तरह घातांको का जोड करते थे , हिन्दुओं की तरह गुणाकार नहीं करते थे
धनात्मक राशि दर्शाने हेतु आरबों ने 'जैप' अर्थात् अधिक अथवा 'विशेष' शब्द का प्रयोग किया है
इसीलिए पृथक्करण कला की इस शाखा को अरबों ने नाम दिया है - 'तारीक अल जब्रवा अल मुकाबला' अर्थात् पुन: स्थापना एवं तुलना की पद्धति' तथा इसी कारण से अरबों के द्वारा दिया गया संपूर्ण शीर्षक है 'फिरिश्त खराजूल मझहूलत बा तारिक अलजब्र वा अल मुकाबला' जिसका लेटिन में शुद्ध भाषातंर पीजा के लियोनार्डो ने किया 'द सोल्यूशन क्वारन्दम क्वायेश्वानम सेकन्डम मोडम एलजिब्राये एट एल मुकाबलाये'५° जिसके आधार पर वर्तमान नाम 'एलजिब्रा' प्रचलित हुआ
हिन्दू बीजगणित में समीकरण की दोनों ओर के सभी पद धनात्मक ही हों यह आवश्यक नहीं है
हिन्दुओं द्वारा पृथक्करणशास्त्र में की गई प्रगति का विचार करें तो वह स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होगा कि वे करणमूल के अंकगणित का ज्ञान रखते थे
उन्हें इसकी जानकारी थी कि किसी भी सान्त संख्या को शून्य द्वारा विभाजित करने पर भागफल अनन्त प्राप्त होता है
इतना ही नहीं , उन्होंने प्रथम कक्षा की अनिश्चयात्मक समस्याओं को हल करने हेतु सामान्य पद्धति की भी आजमाईश की थी
वे दूसरी कक्षा की समस्या हेतु प्राप्त किये गये एक अस्थायी हल के आधार पर असंख्य हल प्राप्त करने की पद्धति को पा चुके थे , जो ऐसे प्रश्नों के सामान्य हल प्राप्त करने की पद्धति के बहुत निकट थे
उन्होंने ( हिन्दुओं के ) बीजगणित का उपयोग केवल खगोल और भूमिति में हीं नहीं किया वरन् उससे उल्टा बीजगणित के नियमों का निदर्शन करने हेतु भी भूमिति का उपयोग किया
इसी से बीजगणित के सर्वप्रथम ( ब्रह्मगुप्त के ) ग्रंथ में भी अपेक्षाकृत अधिक उदाहरण खगोलिक हैं और यहीं अनिश्चयात्मक प्रश्नों का हल वास्तविक एवं व्यावहारिक बन जाता है
उनमें से अधिकतर भौमितिक हैं , एक ही खगोलिक है और शेष संख्यात्मक ( सांख्यिक ) हैं , इनमें से बहुत से प्रश्न अनिर्णायक प्रकार के हैं और उनमें से भी अमुक , भले ही मात्रा में अधिक नहीं है तो भी पद्धति के समान नहीं हैं और डायोफेन्टाईन प्रकार की कितनी ही समस्याओं को भास्कराचार्य ने अपने बीजगणित ग्रंथ के बदले अंकगणित ग्रंथ में दिया है
इस संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन में आगे बढते हैं तो डायोफेन्टस कृत्रिम द्विघात समीकरण स्पष्टत: पृथक्करण करवाने की गति से सुपरिचित था; परंतु उसके व्यवस्थापन से कम परिचित रहा होगा , ऐसा प्रतीत होता है
समीकरण तैयार करने की उनकी प्राथमिक सूचनाएँ संक्षिप्त और निर्धारित विषयानुसार हैं
उसके संकेत , पूर्व निरीक्षणानुसार अत्यंत अल्प और असुविधापूर्ण हैं
डायोफेन्टस की अपनी प्रस्तावना में वर्णित तेरह पुस्तकों में से छ: अथवा अधिक से अधिक सात पुस्तकें हमारे समक्ष आई हैं
३ . प्रथम और द्वितीय कक्षा के अनिश्चयात्मक प्रश्नों के हल में सामान्य पद्धति की खोज करने में वे बहुत आगे बढ़ गये
इस प्रकार हिन्दुओं के नियम में समान संकेत प्रयुक्त करने पर इच्छित वर्गमूल प्राप्त हो जाता है , परंतु न तो ब्रोन्कर अथवा न तो वॉलिस-जिन्होंने स्वंय भी इस प्रकार की पद्धति प्रदान की है - अथवा न फर्मेट स्वयं जिन्होंने यह प्रश्न उठाया था और न तो फ्रेनिकल , इस विषय एवं उसके सार्वत्रिक उपयोग का महत्त्व समझ पाये
ला ग्रान्ज को भी इस अनिश्चयात्मक पृथक्करण की शाखा की विशेष प्रणाली का यश प्राप्त होता है , परंतु वे भी सन् १७६७^९२ तक और उनके दूसरी कक्षा के समीकरणों का संपूर्ण समाधान तो सन् १७६९^९३ से पूर्व नहीं दे पाये
ऐसा भी पाखण्ड होता रहा है कि इस पृथक्करण की कला के स्रोत ग्रीक भूमितिशास्त्रियों के लेखों में ढूँढने चाहिए
इतना ही नहीं , पथ्यूस की कृतियों में पृथक्करण विषयक छानबीन और बीजगणित जैसी ही प्रकृति युक्त पद्धति अथवा उसका कुछ प्रभाव आर्किमिडिझ और ऐपोलोनियस में दृष्टिगत होता है
विशेषकर आर्किमिडिज तथा अन्य भी कुछ ग्रीक लेखकों के लेखों में संकेतित होते हैं , परंतु ये बीजगणितीय कलनशास्त्र से बहुत ही भिन्न हैं
 ( दोनों के बीच की ) समानता केवल व्यस्त प्राप्त करने की पद्धति तक ही सीमित है; जिसे हिन्दू तथा अरब दोनों अपने बीजगणित से पूर्णत: भिन्न मानते हैं और जिसे हिन्दू अंकगणित के साथ अथवा मापकरण के साथ जोड़ते हैं
इतना ही नहीं , पथ्यूस की कृतियों में पृथक्करण विषयक छानबीन और बीजगणित जैसी ही प्रकृति युक्त पद्धति अथवा उसका कुछ प्रभाव आर्किमिडिझ और ऐपोलोनियस में दृष्टिगत होता है
' इनमें से एक भी व्याख्या डायोफेन्टस और अन्य किसी भी ग्रीक लेखक के लेखों में प्राप्त नहीं हो सकती
वे धनात्मक और ऋणात्मक मूल्यों के क्रमबद्ध सोपानों को बहुत ही अचूक ढंग से प्रस्तुत करते हैं
वे समीकरण बनाते हुए ऋणात्मक पदों के स्थानों को अदला- बदली करते हुए तथा अंतिम समीकरण जिसमें दोनों ओर एक-एक , एक ज्ञात दूसरा अज्ञात , प्राप्त करना सिखाते हैं
डायोफेन्टस जैसे सुप्रसिद्ध गणितशास्त्री के नामोल्लेख की भूमिका तथा लेखों की समालोचना हिपोशिया द्वारा लगभग पाँचवी शताब्दी के प्रारंभ में की गई है , उस समालोचना और आर्मोनियन ईसाई के अरबी इतिहास के आधार पर उन्हें जूलियन के समकालीन माना जा सकता है और इसलिए वे ईसा की चौथी शताब्दी के मध्य में हुए थे ऐसा माना जाएगा
अरबों के पास भी बीजगणित का ज्ञान था , जो सादे और संयुक्त ( अर्थात् द्विघात ) समीकरणों के हल की स्थिति तक विकसित था
बीजगणितीय पृथक्करण के ग्रंथ उस काल में अरबी भाषा में लिखे जाते थे
ऐसे दो विशिष्ट गणितशास्त्री अब्बसौदि अलमुम और खारिजमी थे
उनमें भी खारिजमी को आरब गणित का प्रथम परिचय करानेवाले के रूप में पहचानते हैं
हिन्दुओं के पास बीजगणित का ज्ञान पाँचवीं शताब्दी से , कदाचित उससे भी पहले से था और उसका विकास प्रथम और द्वितीय कक्षा के निश्चयात्मक और अनिश्चयात्मक दोनों प्रकार के प्रश्नों के सामान्य हल तक तथा परिणामस्वरूप जिसमें दूसरा पद नहीं है ऐसे चतुर्घात समीकरणों के और अत्यंत सीमित तथा सरल स्थिति में त्रिघात समीकरणों के हल तक हो चुका था
हिन्दुओं के पास बीजगणित का ज्ञान पाँचवीं शताब्दी से , कदाचित उससे भी पहले से था और उसका विकास प्रथम और द्वितीय कक्षा के निश्चयात्मक और अनिश्चयात्मक दोनों प्रकार के प्रश्नों के सामान्य हल तक तथा परिणामस्वरूप जिसमें दूसरा पद नहीं है ऐसे चतुर्घात समीकरणों के और अत्यंत सीमित तथा सरल स्थिति में त्रिघात समीकरणों के हल तक हो चुका था
यद्यपि अरब भारतीय तथा ग्रीक-दोनों में से किसी को भी बीजगणित के अन्वेषक मानने को सम्मत नहीं हैं
अरब ग्रीक खगोलशास्त्रियों या अंकगणित के लेखों से परिचित होने से पहले ही भारतीय खगोलशास्त्र तथा अंकगणित से परिचित हो चुके थे और डायोफेन्टस के लेखों के अनुवाद या भावानुवाद से तो वे शताब्दी से भी अधिक अथवा लगभग दो शताब्दी बाद परिचित हुए
परंतु बीजगणित विषयक सर्वप्रथम हिन्दू लेखक का समय भी डायोफेन्टस के समय से बहुत दूर के भूतकाल का तो क्या , परंतु डायोफेन्टस के समय का होने की भी संभावना नहीं है तथा प्राथमिकता का तर्क , कम से कम छानबीन की इस स्थिति में , ग्रीक शोध के पक्ष में है
हिन्दुओं को सभी अंकगणितीय संकेतों का लाभ मिल चुका था , जबकि ग्रीकों को अटपटे संकेत बाधारूप बनते थे
परंतु बीजगणित विषयक सर्वप्रथम हिन्दू लेखक का समय भी डायोफेन्टस के समय से बहुत दूर के भूतकाल का तो क्या , परंतु डायोफेन्टस के समय का होने की भी संभावना नहीं है तथा प्राथमिकता का तर्क , कम से कम छानबीन की इस स्थिति में , ग्रीक शोध के पक्ष में है
उनकी दोनों दिनदर्शकाएँ , धार्मिक एवं सामाजिक , सूर्य-चन्द्र की गति से नियंत्रित हैं और इन दोनों ज्योतियों की गति का उन्होंने सावधानीपूर्वक अध्ययन किया है और इतनी अधिक सफलतापूर्वक किया है कि चन्द्र का ( सूर्य के उपलक्ष्य में ) भ्रमण , जिसके साथ उन्हें विशेष सिद्धांतगत संबंध है , जितना ग्रीक प्राप्त कर पाते थे उससे भी बहुत अधिक शुद्ध है
जो स्पष्टत: चन्द्र की दैनिक गति से परलिक्षित हो रहा है
धार्मिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार के पंचांगों में साठ वर्ष के प्रतिष्ठित समय अवधि के रूप में उसका उल्लेख किया जाता है
ताराओं के मानव जीवन पर होनेवाले प्रभाव के विषय में प्राचीनकाल से ही वे श्रद्धा रखते हैं और यह सब उनकी पूजा पद्धति के कारण सहज भी था; क्यों कि पूजा पद्धति में ही सूर्य को दिव्य अस्तित्व तथा ग्रहों को देवों के रूप में स्थान दिया गया है
ताराओं के मानव जीवन पर होनेवाले प्रभाव के विषय में प्राचीनकाल से ही वे श्रद्धा रखते हैं और यह सब उनकी पूजा पद्धति के कारण सहज भी था; क्यों कि पूजा पद्धति में ही सूर्य को दिव्य अस्तित्व तथा ग्रहों को देवों के रूप में स्थान दिया गया है
यद्यपि उनके पास उनका अपना कहा जा सकनेवाला भविष्यकथन शास्त्र तो ईसा से शताब्दी पूर्व , सीधे पराशर एवं गर्ग के समय से ही है
तथापि ऐसा मानने के लिए पर्याप्त अवकाश रहता ही है कि इस विषय में उन्होंने संपर्क के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त किया है - ग्रीकों अथवा खाल्डियनों से
इन लक्षणों के अनुसार राशिचक्र को बारह भागों में विभाजित करने की , उन्हें ग्रीकों के समान चित्रों के द्वारा पहचानने की और अर्थ की दृष्टि से भी ग्रीकों के समान लगनेवाले नाम देने की घटना के साथ जोड़ने पर तथा टोलेमी की अथवा तो यो कहें कि हिप्पार्कस की खगोल प्रणाली की भारतीय खगोल प्रणाली के साथ तुलना करने पर , उनके बीच एकरूपता नहीं परंतु साम्य है
सुई चुभोकर किए गए ये छेद काले पड़ने लगते हैं तथा सूख जाते हैं और अन्य नई फुँसियाँ नहीं निकलती हैं
वे मरीज के शरीर पर ठंडे पानी की भीगी हुई कपड़े की पट्टियाँ रखकर उसके शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने का प्रयास करते हैं
मैं उनकी इस शल्यक्रिया की कार्यवाही की सफलता या इस रोग के उपचार की उनकी इस पद्धति के बारे में कुछ भी नहीं कह सकता लेकिन मैंने इससे एक बात स्वयं अच्छी तरह जान ली है कि यह बीमारी अप्रैल एवं मई में अपना प्रकोप फैलाती है
चिकित्सक महाविद्यालय के एक बुद्धिमान एवं प्रज्न विशेषज्ञ ने हाल ही में टिप्पणी की है कि चिकित्साशास्त्र कई बार संयोगों पर निर्भर होता है तथा इसके कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण सुधार अनभिज्ञता एवं अशुद्ध प्रयोग के परिणाम स्वरूप हुए हैं; यह स्थिति चेचक के टीकाकरण की प्रथा में विशेष रूप में देखी जा सकती हैं
बंगाल प्रदेश में इस व्याधि की सामान्य स्थिति ( जहां के लिए ये पर्यवेक्षण सीमित हैं ) ऐसी थी कि पाँच या छह वर्ष तक इस की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया
प्रत्येक सातवें वर्ष , ( शायद ही कोई अपवाद हो ) मार्च से जून तक इसका प्रकोप होता था
इस बीमारी के इस आवधिक प्रकोपों ( जिनमें से चार आवधिक प्रकोपों का मैं प्रत्यक्ष साक्षी हूँ ) के वैश्विक स्तर पर अत्यधिक संघातिक संगामी प्रभाव हुआ जिसकी चपेट से कुछ स्थानीय तथा यूरोपीय बच भी गए लेकिन जो इस बीमारी की चपेट में आ गए , वे सामान्य रूप से इस बीमारी की चपेट में आने के पहले , दूसरे या तीसरे दिन काल के ग्रास बन गए
सेंट हेलेना द्वीप इस संबंध में एक मात्र उदाहरण देने योग्य द्वीप है जहाँ का कोई भी पुरुष या महिला नहीं है जो प्राकृतिक रूप से इस बीमारी ( जब बंगाल का अधिवासी हो ) की चपेट में आया हो या उसे जीवन से हाथ धोना पड़ा हो
वर्षों तक इस द्वीप पर रहने तथा परिपक्वता की स्थिति तक पहुंचने तक यहाँ के लोग द्वीप से बाहर क्वचित् ही जाते हैं; यहाँ के लोग बचपन से ही रतालू खाते हैं जिसकी प्रकृति दूषित गुण वाली होती है जिसके सेवन से भयंकर दस्त लग जाते हैं तथा कभी-कभी सूजा हुआ दुर्गधयुक्त गला हो जाता है
वर्षों तक इस द्वीप पर रहने तथा परिपक्वता की स्थिति तक पहुंचने तक यहाँ के लोग द्वीप से बाहर क्वचित् ही जाते हैं; यहाँ के लोग बचपन से ही रतालू खाते हैं जिसकी प्रकृति दूषित गुण वाली होती है जिसके सेवन से भयंकर दस्त लग जाते हैं तथा कभी-कभी सूजा हुआ दुर्गधयुक्त गला हो जाता है
वर्षों तक इस द्वीप पर रहने तथा परिपक्वता की स्थिति तक पहुंचने तक यहाँ के लोग द्वीप से बाहर क्वचित् ही जाते हैं; यहाँ के लोग बचपन से ही रतालू खाते हैं जिसकी प्रकृति दूषित गुण वाली होती है जिसके सेवन से भयंकर दस्त लग जाते हैं तथा कभी-कभी सूजा हुआ दुर्गधयुक्त गला हो जाता है
इससे रक्त प्रदाहक बीमारी से प्रतिरोध करने की शरीर को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण आदत पड़ जाती है; तथापि इस तरह की बीमारी इन लोगों के लिए ( प्राय: सड़न की अत्यधिक मात्रा होने पर ) घातक सिद्ध होती है; तथा उस मौसम में भी यह खतरा बना रहता है जब यह बीमारी भयावह नहीं होती तथा दूसरों के लिए अनुकूल होती है
उस समय इस बिमारी का किसी न किसी रूप में अस्तित्व रहा होगा क्योंकि इन धर्मग्रंथों में शीतला माता की पूजा का उल्लेख है जिसे आम लोग 'गूती का तगूरा' कहते हैं
उस समय इस बिमारी का किसी न किसी रूप में अस्तित्व रहा होगा क्योंकि इन धर्मग्रंथों में शीतला माता की पूजा का उल्लेख है जिसे आम लोग 'गूती का तगूरा' कहते हैं
खसरा के लिए भी यह अराध्य देवी हैं
बंगाल में वर्ष को प्रमुखत: चार-चार महीनों की तीन ऋतुओं में विभाजित किया जाता है; जून के मध्य से अक्टूबर के मध्य तक वर्षाऋतु होती है , अक्टूबर के मध्य से फरवरी के मध्य तक शीत ऋतु होती है जिसमें कभी भी तापमान शून्य तक नहीं पहुंचता; इन चार महिनों में दुनिया में बंगाल से अधिक सुहावना एवं आह्वादक मौसम कहीं नहीं होता लेकिन यूरोपीय लोगों में इन महीनों में यहाँ रहने की स्वतंत्रता इसलिए छिन जाती है क्योंकि इन्हीं महीनों में इस बीमारी के बीजों का वपन हो जाता है जो कि वर्ष के आगामी महीनों में फूलते-फलते हैं तथा चेचक का रूप ले लेते हैं
स्नायु संबंधी सड़न से बुखार आता है ( कभी-कभी यह घातक स्थिति तक पहुँचता है ) तथा खतरनाक मौसम का संकेत देता है
इस तरह के बुखार से स्थानीय लोग सामान्यत: स्वास्थ्यलाभ कर लेते हैं लेकिन यूरोपीय प्राय: नहीं कर पाते
चाहे वे टीका लें या न लें लेकिन पथ्यापथ्य के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं
यह तैयारी उन्हें एक महीने तक मछली , दूध और घी के परित्याग के साथ करनी होती है; मछली का निषेध स्थानीय , पुर्तगालियों तथा मुसलमानों में होता है जो साम्राज्य के प्रत्येक प्रदेश में रहते हैं
उसके पास जो चिंदी होती है उसमें गत वर्ष के चेचक के सत्व पहले से मिले होते हैं
वे ताजा सत्व से कभी भी टीकाकारण नहीं करते तथा प्राकृतिक रूप से फैली इस बीमारी के सत्व का भी वे इस हेतु उपयोग नहीं करते तथापि विशिष्ट एवं मध्यम मार्ग अपनाए जाते हैं
कभी कभी वह एक दिन में आठ से दस घरों में टीकाकरण कार्य पूर्ण कर लेता है
जब ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती है तथा मरीज के शरीर के किसी भी भाग पर एक भी पुन: नहीं निकलती तो मान लिया जाता है कि मरीज को भविष्य में फिर कभी चेचक की बीमारी नहीं लगेगी क्योंकि उसे फुंसियाँ सामान्य रूप में उठी थीं
जब टीकाकरण के उपचार हेतु बताये गये परहेज का पूरी तरह से पालन किया जाता है तो इसके जादुई प्रभाव के बारे में सुनने में आता है कि दस लाख में एक ही संक्रमण का शिकार होता है , या केवल वही इसका शिकार होता है जो परहेज नहीं करता
यदि दूध की बात की जाए तो यह समस्त स्थानीय भोजन का आधार है ( चावल के पश्चात ) 
अत: ऐसे मौसम में जब चेचक होने का खतरा होता है तथा अतिप्राकृत संधान में प्रदाहकता बढती है तब ऐसे रोगी के लिए दूध अनुचित आहार है
भारत में अधिवासी हमारी यूरोपीय महिलाओं ने उनके यहाँ कार्यरत स्थानीय नौकरानियों के अनुभव से यह सब सीख लिया है तथा उनसे प्रभावित होकर ऋतुस्त्राव की अवधि में वे चाय में बिल्कुल दूध नहीं डालती
तीसरी वस्तु घी के संबंध में है
उनका मानना है कि ऐसे समय में रोगी को समस्त वसायुक्त एवं तैलीय चीजों के सेवन की मनाही की जाती है
मध्यवर्ती ( या दूसरा ) कारक घटक जो कि प्रथम को उत्तेजित करता है तथा उसे खमीरीकरण की स्थिति में पहुँचाता है
घर्षण से लघु रक्त संचार नलिकाओं में रक्त के परिभ्रमण में गति आती है तथा फाहा में मिश्रित सत्व को गंगाजल की कुछ बूँदे डालकर इसलिए घोल दिया जाता है कि वह आसानी से रक्त से संपर्कित हो जाए
पूर्व की इस प्रथा का अगला बिंदू टीकाकरण की इस पद्धति में चेचक के मरीज को सुबह शाम ठंडे पानी से सिर से पैर तक पानी डालकर स्नान कराना हमारी इस चर्चा में समाहित है तथा ठंडे पानी से स्नान करने की यह क्रिया बुखार आने तक चालू रखने का प्रावधान है
ठंडे पानी से स्नान कराने की इस पद्धति का उपयोग पूर्व के वैद्यों तथा समस्त यूरोपीय चिकित्सकों द्वारा अपनाया गया है तथा इस पद्धति का निरन्तर उपयोग करके अनुभव के आधार पर पाया है कि यह पद्धति अन्य किसी पद्धति की अपेक्षा अधिक प्रभावी पद्धति है | जहां मरीज के बचने की कोई भी आशा नहीं होती उन सभी मामलों में भी इसकी उपयोगिता अवश्यंभावी है
इस पूर्व की पद्धति का इस आलेख का अगला एवं अंतिम बिंदु उपरि उल्लिखित फुसिंयो को फोड़कर उनमें से मवाद को निकालने पर विचार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं तार्किक है; फिर भी स्थिति के संबंध में पश्चिम में लम्बे समय तक कुछ भी विचार नहीं किया गया जिस पर आश्चर्य होता है और यदि मुझे ठीक तरह से स्मरण है तो चेचक विषय पर लिखने वाला एक मात्र लेखक है ल्विटियस हैजिस ने डॉकटर टिसॉट से पूर्व इस संबंध में कुछ संकेत अवश्य दिए
इसमें उसे उसके एक प्रबुद्ध एवं सुरुचिसम्पन्न टीकाकार एवं अनुवादक डॉकटर किर्कपैट्रिक ( पृ २२६ एवं २२७ ) का सहयोग प्राप्त हुआ मुझे उम्मीद है कि डॉकटर टिसॉट की प्रत्याशा के विपरीत था कि आम धारणा की बजाय विशिष्ट रूप से इसकी सफलता भी अप्रितम रूप में होनी चाहिए तभी इसे लोगों की आम स्वीकृति प्राप्त होगी
कई मलिन प्रकार की बीमारियों में पूर्वी चिकित्सकों की फुंसियो को फोड़कर मवाद निकालकर उपचार करने की पद्धति बहुत ही सराहनीय है क्योंकि इससे मरीज के शरीर के विषाणु मवाद के रूप में बाहर निकल आते हैं
कई मलिन प्रकार की बीमारियों में पूर्वी चिकित्सकों की फुंसियो को फोड़कर मवाद निकालकर उपचार करने की पद्धति बहुत ही सराहनीय है क्योंकि इससे मरीज के शरीर के विषाणु मवाद के रूप में बाहर निकल आते हैं
फिर भी , अत्यंत नाजुक मामलों में वे अपनी परिचारिकाओं या मरीज के ऊपर आश्रित न रहकर फुंसियो को फोड़कर उनमें से मवाद निकालने का कार्य अपने सधे हुए हाथों से करते हैं
दूसरी बार बुखार आने पर या कुछ हद तक कम होने पर तथा हर प्रकार की ऐसी स्थिति में वे अपने इस उपचार को जारी रखते हैं तथा कई मामलों में सकारात्मक परिणाम न मिलने पर भी , जिन में से कुछ मामलों में मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ तथा मेरे उपचारात्मक अनुभव के दौरान ऐसे मामले आए , तथा फुंसियो के संसक्त होने पर भी उनकी वे सफलतापूर्वक शल्यक्रिया कर देते है
इस बीमारी में शरीर के अंदर के विकारकारक विषाणु त्वचा पर फुंसियो के माध्यम से मवाद के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं तथा शरीर के अंदर से शरीर के बैरियों का समग्र निष्कासन होना भी स्वास्थ्य के लिए लाभकर होता है क्योंकि यदि उन्हें शरीर से बाहर न निकाला जाए तो ये शरीर के किसी अन्य तंत्र में जाकर गड़बड़ी पैदा करके संकटपूर्ण स्थिति का निर्माण कर देते हैं
इस बीमारी में शरीर के अंदर के विकारकारक विषाणु त्वचा पर फुंसियो के माध्यम से मवाद के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं तथा शरीर के अंदर से शरीर के बैरियों का समग्र निष्कासन होना भी स्वास्थ्य के लिए लाभकर होता है क्योंकि यदि उन्हें शरीर से बाहर न निकाला जाए तो ये शरीर के किसी अन्य तंत्र में जाकर गड़बड़ी पैदा करके संकटपूर्ण स्थिति का निर्माण कर देते हैं
प्रथम फुंसियो के निकलने में ये समग्रत: शरीर से बाहर नहीं निकलते तथा इनकी शरीर में उपस्थिति होने के कारण दूसरी बार रोगी को बुखार आता है तथा घातक स्थिति बनी रहती है
९ . पूर्वी भारत में मद्रास में उत्कृष्ट गारा बनाने की पद्धति गड्ढे से उकेरी ताजा मिट्टी के पूरे भरे हुए पंद्रह बुशेल लें
इसमें ऐंठन भरकर उँगली जितना मोटा बनाएँ ( इंग्लैंड में इस सन के स्थान पर बैल के बालों का उपयोग किया जाता है ) 
इस प्रकार से गारा बनाने के बाद उसमें से थोडा अलग निकाल लें , आधा बुशेल लें , आधे बुशेल में पाँच या छह अंडों की सफेदी तथा चार औंस घी ( या सामान्य नमक रहित मक्खन ) एवं एक पिंट ( एक रतल ) मट्ठा लें तथा इन सभी को अच्छी तरह से घोल लें और इसमें से थोड़ा सा भाग गारे में मिलाएँ और जब तक घी , अंडों की सफेदी तथा छाछ को अच्छी तरह से गारा सोंख न ले तब तक प्रतीक्षा करें
तदुपरांत सादा ताजे पानी से उसे गीला करें तथा मिलाएँ और जमीन पर खुरपी से बिछाएँ इसे किसी पत्थर के बेलन से पत्थर पर उसी तरह से दबाएँ जिस तरह से इंग्लेंड में चॉकलेट बनाई जाती है
ध्यान रखें कि जब आपका पलस्तर के लिए प्रथम लेपन लगाया जाए तो इसे सख्त करनी से या चिकनी ईंट से अच्छी तरह से दबाकर लगाएँ
और बढ़िया चिनम तैयार करने के लिये जो बाहरी हिस्सों पर पलस्तर करने के काम आती है उसमें छाछ मिलाते हैं जिसे यहाँ तोपरे कहा जाता है
और बढ़िया चिनम तैयार करने के लिये जो बाहरी हिस्सों पर पलस्तर करने के काम आती है उसमें छाछ मिलाते हैं जिसे यहाँ तोपरे कहा जाता है
मुसब्बर के स्थान पर तारपीन या जंगली आलूचा के पेड़ की शाखाएँ या छाल भी इसमें उपयोग की जा सकती हैं
हरड के स्थान पर आलूचा का कुछ रस तथा गुड़ के स्थान पर सस्ती चीनी या सीरा का उपयोग किया जा सकता है तथा होना भी चाहिए
हरड के स्थान पर आलूचा का कुछ रस तथा गुड़ के स्थान पर सस्ती चीनी या सीरा का उपयोग किया जा सकता है तथा होना भी चाहिए
ध्यान दें : चीन में तथा अन्य कुछ भागों में भी वे गारे में पशुओं का रक्त भी मिलाते हैं लेकिन उपरि उल्लिखित वस्तुओं के उपयोग से उत्कृष्ट गारा ( मॉर्टर ) तैयार हो जाता है जो खूब टिकाऊ एवं उपयोगी होता है तथा रक्त मिलाने से बने गहरे रंग का भी नहीं होता है
मैं ने इस तराशीयुक्त मॉर्टर कार्य से तैयार किया हुआ एक कक्ष देखा है जो वेन्सकॉट कार्य से भी अधिक चिकना एवं सुन्दर है
मैं आपके समक्ष पूर्व भारत के इलाहाबाद , मूतगिल तथा कोलकता में इसे तैयार करने की प्रक्रिया प्रस्तुत करना चाहता हूँ जो उत्तरी अक्षांश पर २५ १/२° और २३ १/२° के बीच स्थित हैं
मैं आपके समक्ष पूर्व भारत के इलाहाबाद , मूतगिल तथा कोलकता में इसे तैयार करने की प्रक्रिया प्रस्तुत करना चाहता हूँ जो उत्तरी अक्षांश पर २५ १/२° और २३ १/२° के बीच स्थित हैं
इन स्थानों पर बर्फ बनाने की प्रक्रिया में सामान्य रूप से सुबह-सुबह ( विशेष रूप से कुछ विशिष्ट प्रकार के मौसम के सिवाय जिसे मैं विशिष्ट रूप से बाद में निरूपित करूंगा ) सूर्योदय से पूर्व प्राय: बर्फ एकत्रित की जा सकती है और यह कार्य वर्ष में करीब तीन महीने दिसंबर से फरवरी तक किया जा सकता है
इन स्थानों पर बर्फ बनाने की प्रक्रिया में सामान्य रूप से सुबह-सुबह ( विशेष रूप से कुछ विशिष्ट प्रकार के मौसम के सिवाय जिसे मैं विशिष्ट रूप से बाद में निरूपित करूंगा ) सूर्योदय से पूर्व प्राय: बर्फ एकत्रित की जा सकती है और यह कार्य वर्ष में करीब तीन महीने दिसंबर से फरवरी तक किया जा सकता है
एक बड़े खुले मैदान में तीन या चार बड़े गड्ढे खोदे जाते जिनमें से प्रत्येक करीब ३० फीट चौरस तथा दो फीट गहरा होता था
इस गादी पर एक दूसरे से सटे हुए मिट्टी के छोटे-छोटे कड़ाह पानी भरकर बर्फ जमने के लिए रखे जाते
यहाँ यह दर्ज करना आवश्यक है कि बर्फ की मात्रा भौतिक रूप से मौसम पर निर्भर करती है
क्योंकि मैंने प्राय: कहा है कि मानव शरीर को महसूस होने वाली कड़ाके की सर्दी की रात में मुश्किल से ही बर्फ जमती है जबकि रात अत्यंत शांत एवं निरभ्र होती है तथा अपेक्षाकृत कुछ गरमी भी होती है तब कड़ाह का पानी जम जाता है
क्योंकि मैंने प्राय: कहा है कि मानव शरीर को महसूस होने वाली कड़ाके की सर्दी की रात में मुश्किल से ही बर्फ जमती है जबकि रात अत्यंत शांत एवं निरभ्र होती है तथा अपेक्षाकृत कुछ गरमी भी होती है तब कड़ाह का पानी जम जाता है
बर्फ तैयार करने की इस प्रक्रिया का भौतिक कारण यह बताया जा सकता है कि थर्मामीटर मौसम की गरमी को कुछ भी क्यों न बताए , कुछ भागों में जहाँ ठंड के मौसम में दिसंबर , जनवरी एवं फरवरी के महीनों में कडाके की सर्दी भले ही शून्य तापमान पर क्यों न पहुँच जाए , गड्ढो में रखे बर्तन में रंध्रयुक्त मिट्टी के बर्तनों में रखा पानी इस स्थिति में जमीन की गरमी के होने के बावजूद भी जम जाएगा तथा प्रात: काल के पश्चात् गर्मी पड़ने के समय तक जमा रहेगा
मौसम का संभवत: पानी के जमने में किसी हद तक योगदान उस समय हो सकता है जब उसे जमीन की गर्मी से दूरी पर रखा जाए
मैंने पहले भी स्वयं पर्यवेक्षण किया है कि गड्ढो में इस विधि से रखे पात्रों में बर्फ उन रातों में अधिक रूप में जमी जब मौसम स्वच्छ तथा निरभ्र रहा था तथा आधी रात के पश्चात् ओस पड़ी थी
गन्नों या भारतीय मक्का के डंठलों की मुलायम गादी कडाहों के नीचे ठंडी हवा के लिए रास्ता देती है जो कि बर्तन के बाह्य भाग से छिद्रों के माध्यम से गर्मी की आनुपातिक मात्रा बाष्पीकृत रूप में निकल जाती है
पात्र संरंध्र होने से उसमें अंदर ठंडी हवा जाने का अवकाश रहता है तथा उनकी स्थिति मैदानी भागों में जमीन के अंदर कुछ फुट होने से उनमें बाहर की हवा नहीं जा पाती अत: जमे हुए खंडो को वियोजित नहीं कर पाती
इस जमी हुई बर्फ की बड़ी मात्रा एक जगह एकत्रित करके तथा उसे समुचित रूप से विधिवत संरक्षित रखकर भीषण गर्मी में अन्य द्रवों के प्रशीतन के लिए उपयुक्त पद्धति से उपयोग किया जाता है
बर्फ के इन खंडों पर थर्मामीटर रखने पर थर्मामीटर हिमांक से दो या तीन अंश नीचे गिरा तापमान दर्शाता है
११ . सन के उपयोग एवं भारत के कागज का निर्माण मेरा मानना है कि 'सन' नामक उपयोगी पौधा समग्र हिंदुस्तान में उगाया जाता है
इसके बीज वर्षा की शुरुआत होने से पूर्व जुलाई माह में बो दिए जाते हैं
इस पर अक्टूबर में फूल आते हैं तथा दिसंबर में इसे काट लिया जाता है
इसकी छाल से सभी प्रकार की रस्सियाँ , टाट , जालेदार टाट , आदि बनाएँ जाते हैं
कपडा , रस्सी और कागज बनाने की सामग्री अभी बहुत कम है इसलिये भारत में पश्चिम भाग में अवस्थित ब्रिटिश बस्तियों में इसकी खेती करना लाभदायी रहेगा
अन्य देशों में भी जहां सन और वरसन नहीं होता वहां इसे उगाया जा सकता है
यहाँ रस्सी निर्माण के लिये से अन्य वनस्पतियों के रेशों का उपयोग भी किया जाता है जिनमें से एक गुड़हल प्रजाति की है जिसका विवरण मैंने एक अन्य आलेख में दिया है
एक दिन में वह २५० शीटें तैयार कर लेता है
बढ़िया कागज की दोबारा पालिश की जाती है
१२ . भारतीय कृषि मलबार की कृषि- सामान्यत: हिंदुओ द्वारा की जानेवाली कृषि को यूरोपीय लोगों द्वारा दोषपूर्ण बताया गया है- उनका यह दृष्टिकोण कितना औचित्यपूर्ण है ? उनके हल एवं कृषि के औजार कैसे हैं- वे कृषि के सिद्धांतों को भली भाँति समझते हैं लेकिन पूँजी की कमी तथा यहाँ के लोगों का कंगाल होना इसमें मुख्य बाधा है- लोगों के इस संबंध में विविध मत हैं- उनका फालवाला हल सिचाई एवं प्रतिरोपण गुजरात और दक्षिण की कृषि पर भी चर्चा मालबार कृषि व्यवसाय- धान की फसल तथा विभिन्न लोगों की स्थिति- बडे कृषि जोत , जमीदार , किसान , गुलाम , तथा कृषि श्रमिक , मिट्टी
कृषि फसल उगाने की कला है
इस कला में सभी प्रकार के वृक्ष , पौधे , फल , एवं अनाज उगाना समाहित है
बहुलतापूर्वक उपज पैदा करने की यह सर्वाधिक त्वरित पद्धति है
इस प्रणाली में पर्याप्त संख्या एवं मात्रा में औजारों , उपस्करों , पशुओं एवं श्रम का उपयोग होता है
इस संबंध में यह भी स्वीकार करना होगा कि जमीन पर कृषि करने की कला मानवश्रम का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है
१२ . भारतीय कृषि मलबार की कृषि- सामान्यत: हिंदुओ द्वारा की जानेवाली कृषि को यूरोपीय लोगों द्वारा दोषपूर्ण बताया गया है- उनका यह दृष्टिकोण कितना औचित्यपूर्ण है ? उनके हल एवं कृषि के औजार कैसे हैं- वे कृषि के सिद्धांतों को भली भाँति समझते हैं लेकिन पूँजी की कमी तथा यहाँ के लोगों का कंगाल होना इसमें मुख्य बाधा है- लोगों के इस संबंध में विविध मत हैं- उनका फालवाला हल सिचाई एवं प्रतिरोपण गुजरात और दक्षिण की कृषि पर भी चर्चा मालबार कृषि व्यवसाय- धान की फसल तथा विभिन्न लोगों की स्थिति- बडे कृषि जोत , जमीदार , किसान , गुलाम , तथा कृषि श्रमिक , मिट्टी
मलबार का कृषि व्यवसाय उनके अपने इतिहास से अधिक प्राचीन है
दोनों लोगों के बीच प्रथाओं में कृषक के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्राप्त है
कृषिभूमि पट्टे पर देकर भू प्रबंध की व्यवस्था की जाती है
वे हिंदुओं द्वारा प्रयुक्त कृषि यंत्रो को भद्दा , घिसापिटा एवं परंपरागत कहकर उनकी भत्सर्ना करते हैं
उनकी यह भत्सर्ना भारत के सभी भागों की कृषि पर लागू नहीं होती क्योंकि वहाँ विभिन्न रूपों एवं प्रकारों के कृषि यंत्र उपयोग में लाए जाते हैं
गुजरात में यह यंत्र अत्यंत हल्का एवं सुथरा होता है
खेत का कूँड़ एक रेखा की तरह सीधा होता है
ये बहुत सुगम होते हैं , जमीन एवं कृषक के अनुकूल होते हैं
समग्र भारत में इन यंत्रो का ढाँचा अत्यंत सामान्य होता है जहां भूमि हल्की , पथ्थर रहित और पानी के कारण नरम होती है वहां कृषक की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है
समग्र भारत में इन यंत्रो का ढाँचा अत्यंत सामान्य होता है जहां भूमि हल्की , पथ्थर रहित और पानी के कारण नरम होती है वहां कृषक की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है
सुहावने एवं सामान्य मौसम में बीज को पाला या ठंडी से बचाना आवश्यक नहीं होता है
यह एक प्रबल साक्ष्य है कि भारतीय हल इस उद्देश्य के सर्वथा अनुकूल है क्योंकि इसकी फाल ऐसी होती है कि बीज सही जगह पडकर , उगकर खूब अच्छी प्रचुर फसल पैदा करते हैं
वह अपनी पद्धति को इसलिए नहीं छोड़ता क्योंकि उसके लिए यह पद्धति आसान एवं उपयोगी है , लेकिन उसे आप यह बताइए कि इस विधि के अपनाने से उसका ही फायदा होगा तो वह उस पद्धति को सीखकर अपना भी लेगा
दुनिया के सभी लोगों में व्यक्ति अपनी परंपरागत आदतों एवं प्राचीन रीतिरिवाजों को अपनाता चला आ रहा है
कुछ सक्रिय एवं उद्यमी तथा पूर्वाग्रह रहित मराठा कृषकों को इस में लगाया गया , उनके लिए एक गाँव बनाया गया तथा उन्हें बीज एवं मवेशी उपलब्ध कराए गए
उन्होंने आपत्ति प्रकट की कि हल बहुत भारी था; इससे श्रमिक एवं बैल व्यर्थ ही अधिक थक जाते थे; अत: इससे कार्य कम ही हो पाता था और यह इस उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं था; हमारा अपना हल इससे बढ़िया एवं उपयोगी था अत: हमें उसीका उपयोग करना चाहिए
उन्होंने आपत्ति प्रकट की कि हल बहुत भारी था; इससे श्रमिक एवं बैल व्यर्थ ही अधिक थक जाते थे; अत: इससे कार्य कम ही हो पाता था और यह इस उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं था; हमारा अपना हल इससे बढ़िया एवं उपयोगी था अत: हमें उसीका उपयोग करना चाहिए
उन्होंने आपत्ति प्रकट की कि हल बहुत भारी था; इससे श्रमिक एवं बैल व्यर्थ ही अधिक थक जाते थे; अत: इससे कार्य कम ही हो पाता था और यह इस उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं था; हमारा अपना हल इससे बढ़िया एवं उपयोगी था अत: हमें उसीका उपयोग करना चाहिए
क्या उन्हें इस नई पद्धति को अपनाने से कम श्रम एवं कम खर्च में अधिक उपज प्राप्त होगी ? तथा क्या हमने अपने सभी साधनों और कौशलों का उपयोग करके इस पद्धति से कृषि करना सिखाया है ? हमें इस तथ्य पर भी बहुत अच्छी तरह से विचार करना है कि भारत की महत्त्वपूर्ण फसल धान है और उसके लिये हमारी यूरोपीय पद्धति कितनी अनुकूल है क्योंकि धान की कृषि करने का यूरोपीयों को कोई अनुभव नहीं रहा है
औजार की आकृति एवं शक्ति जमीन एवं मौसम के अनुकूल होनी ही चाहिए
४ लेकिन भारतीय कृषक को अंग्रेज किसानों की मशीनों के बारे में तथा खर्चीली पद्धति के बारे में जानकारी देने के साथ ही उन्हें कार्य करने हेतु स्वतंत्र बनाना होगा तथा धन भी उपलब्ध कराना होगा
भोजन के लिए पशुओं के पालन की बात उसके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि मुट्ठीभर यूरोपीय लोग जहां निवास करते हैं वहीं पर थोडी सी मात्रा में इसकी खपत होगी
भारत में विविध प्रजातियों के पौष्टिक कंदमूल , फल , आदि पैदा होते हैं
यहाँ केला एक ऐसा फल है जो कि आहार में अत्यंत पौष्टिक होता है
भारत के कई भागों में आलू पैदा किया जाता है
यदि हम उसे कुछ फल और सब्जियां देना चाहें तो हमें सर्वप्रथम इस बात में सुनिश्चित होना पडेगा कि उन्हें उसका स्वाद अच्छा लगेगा या नहीं
हिंदुओं ने एक बड़े लम्बे अरसे से कृषि में एक बड़ा ही सुंदर एवं उपयोगी आविष्कार किया हुआ है
और यह है वपित्र अर्थात् फालयुक्त हल
तथापि , मैंने इसे मलबार में कभी नहीं देखा क्योंकि धान की खेती में उसकी आवश्यकता नहीं होती
धान के पौधों के रोपण से ही अधिक लाभ प्राप्त होता है
वे कृषिकर्म में विभिन्न प्रकार के हलों का उपयोग करते हैं जिनमें बुवाई वाले हल और सामान्य हल दोनों हैं , जिनका उपयोग वे बीज एवं जमीन के अनुसार करते हैं
कृषिकार्य के उद्देश्यों के अनुरूप वे विभिन्न औजारों का उपयोग करते हैं जो हमारे आधुनिक सुधारों की वजह से इंग्लेंड में भी प्रयुक्त होने लगे हैं
खेत में ढेले तोडने के लिए मुँगरी का उपयोग भी वे करते हैं; साथ ही , छटाई करने के लिए वे फावडे-कुदाली , दांती , खुरपी आदि का उपयोग भी करते हैं
इन कृषि औजारों का कई बार मात्र इसलिए विरोध किया जाता है कि ये साधारण , फूहड , एवं अशोधित होते हैं
साधारण होना निश्चित रूप से कोई दोष नहीं होता; हमारे अपने कई जिलों में हल अधिक जटिल एवं पेचीदा होता है
उन्हें प्रभाव और दिखावे को परखने की समझ होती है जो उन्हें अच्छे कृषक सिद्ध करती है
हिंदुस्तान के कृषकों के कुछ कृषि औजारों को अपूर्ण सिद्ध करने की बात की जा सकती है लेकिन यथार्थ यह है कि अपनी कला में वे पूर्णता प्राप्त हैं
अत: खेत की जमीन को हवा , ओस एवं वर्षा के लिए आवश्यक रूप से खुला रखा जाता है
भारत के कई भागों में एक ही खेत में विभिन्न प्रकार की कई प्रजातियों के बीज बोने की प्रथा प्रचलित है
गुजरात में छोटा गुवार नामक पौधे को गन्ने की फसल के साथ लगाया जाता है
ज्वार और बाजरे को भी साथ साथ बोया जाता है , अनाज के लिये नहीं अपितु चारे के लिये
घास संग्रह करने की उनकी ये गाँज या बुझियाँ दीर्घायात आकार की हमारी ही तरह की होती हैं लेकिन प्राय: ये हमारी इंग्लैण्ड की गाँज या बुझियों की तुलना में अधिक विस्तृत परिमाप की होती हैं
भारत के जिन भागों में घास पैदा नहीं होती तथा मेरा मानना है कि इन हिस्सों की जलवायु घास उगने के अनुकूल नहीं होती; वहां जडें खिलाई जाती हैं जो हमारे यहाँ की फियोरिन मशीन या गडासे काटे हुए ज्वार के साथ खिलाया जाता है जो कि पशुओं के लिए बहुत पौष्टिक होती है
गुजरात में संपत्ति की सुरक्षा को कभी नजरंदाज नहीं किया जाता था
वे वहाँ के स्थानीय देशी लोगों को निम्नतम , घृणित एवं ऐबपूर्ण बताते हैं
कर्नल विल्क्स ने मैसूर के कृषिकर्म का जो सुस्पष्ट , साफ सुथरा , समुचित एवं व्यापक विचक्षण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है , मेरा अनुभव भी वैसा ही है
अमेरिका में कुँआरी अथवा नई भूमि में बिना खाद डाले भी वर्ष प्रतिवर्ष लगातार फसलें पैदा की जाती हैं
ब्रिटेन में वहां के आसपास के कस्बों के आसपास के इलाकों में भूमि की उर्वरता कम हुए बिना प्राय: नियमित आवर्तन नहीं किया जाता है
वेस्टइंडीज में तो गन्ने के सिवाय कोई भी फसल पैदा ही नहीं होती
इन दृष्टांतों से सिद्ध होता है कि एक ही प्रजाति के बीजों को एक ही खेत में बार बार बोने से बचना अच्छे कृषिकर्म के लिए लगभग नियम है; बिना किसी विपरीत परिणाम के विशिष्ट परिस्थिति की पूर्णरूप से अनदेखी भी की जा सकती है
धान की फसल में अन्य किसी भी फसल की तुलना में कम श्रम लगता है
पशुओं के खाने से बची प्रभूत घास को जलाना भारतीय कृषि का एक भाग ही लगता है , भले ही वह सार्वत्रिक नहीं है और विशेष स्थिति में ही किया जाता है
इसी तरह से इसी उद्देश्य के लिए भेड के अवशिष्ट से उत्कृष्ट खाद बनाने के लिए झाड-झंखाड को जलाकर उसकी राख मिलाकर उपयोग किया जाता है
इस तरह उपलों का भोजन पकाने के लिए उपयोग करने के लिए भारत के किसानों की आलोचना की जाती है लेकिन यथार्थ स्थिति समझने के लिए कुछ हद तक इस आलोचना से पूर्व कि वस्तुस्थिति को समझना आवश्यक है
मैं ने भारत के बुवाई से कृषिकर्म का पहले ही उल्लेख किया है; यह कृषि पद्धति , अत्यंत उपयोगी एवं उत्तम है
भारतीय किसान विषम स्थितियों में रहते हुए श्रमसाध्य ढंग से निरंतर फसल पैदा करके अपने उत्पादन को बढाने के प्रयास करता है
कई बार आवर्तन पद्धति का फसल उगाने में उपयोग किया जाता है लेकिन जहां कछारी भूमि होती है वहाँ आवर्तक फसल उगाना अनावश्यक होता है
स्थानीय विशिष्टताओं , स्थानीय दवाबों एवं साधनों की कमी के कारण कई बार किसान कई लाभों से वंचित रह जाता है
ऐसे प्रयोजन एवं कार्य को सम्पन्न करने के लिए बरसों का समय चाहिए , अत्यंत धैर्य के साथ विषय ज्ञान भी चाहिये तथा मौसम की विशिष्टताओं को समझने के लिए युक्तियुक्त निर्णायक बुद्धि भी चाहिये
भारत वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में , ब्रिटिश सरकार के उत्कृष्ट राष्ट्र का सर्वोत्तम हिस्सा है; अत: हमारा अत्यावश्यक दायित्व है कि हम इसकी वर्तमान दशा को सुधारने हेतु हर संभव भरसक उपाय करें तथा इसे इस विषम स्थिति से बचाएँ
जब वे गलत पद्धतियों का उपयोग करते हैं तो वे यह सब कुछ इसलिए नहीं करते कि वे कृषि कला के वास्तविक सिद्धांतों को नहीं जानते या उनके बारे में अनभिज्ञ हैं; अपितु इस सबके पीछे उनकी गरीबी एवं दमनकारक तत्त्व हैं
गुजरात में - तथा वास्तव में दक्षिण में भी लेकिन विशेष रूप से गुजरात में - संभवत: उसी तरह का सावधानी पूर्वक एवं दक्षतापूर्वक कृषि कर्म का अध्ययन इंग्लैंड की तरह ही किया जाता है
यथार्थ स्थिति यह होती है कि किसी भी देश की जलवायु पर वहाँ के कृषि कर्म की पद्धति तथा प्रथा निर्भर करती है
यह भी सही है कि गुजरात में अधिकांश जमीन अत्यंत उत्पादनक्षम है तथा यहाँ की भूमि को परत भूमि के रूप में खाली रहने देने की अपेक्षा वर्ष प्रति वर्ष नियमित रूप से क्रमश: अच्छी फसलें पैदा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है
उत्तरी भारत से यहां की कृषि में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ हैं
भारत के विभिन्न भागों में कृषि में भिन्नता है जिसका कारण ऋतु , हवामान और भूमि की भिन्नता है
फार्मों का आकार एक जोत से लेकर बीस जोत का होता है
चिरमिर लोग मुख्य रूप से श्रमिक के रूप में काम करते हैं लेकिन और श्रमिक भी होते हैं
भूमि को सामान्यत: अच्छी तरह से बाड़ लगाकर उपविभाजित किया गया है | लम्बे , सँकरे तथा सुंदर दिखनेवाले आकर्षक रूप में विभाजित किए गए खेत वास्तव में प्राकृतिक विभाजन जैसे लगते हैं
भूमि को सामान्यत: अच्छी तरह से बाड़ लगाकर उपविभाजित किया गया है | लम्बे , सँकरे तथा सुंदर दिखनेवाले आकर्षक रूप में विभाजित किए गए खेत वास्तव में प्राकृतिक विभाजन जैसे लगते हैं
इन्हें सिंचाई की सुविधा के उद्देश्य से विभाजित किया गया है
धान के खेत में पानी का स्तर विशिष्ट स्थिति पर निर्भर करता है
तत्पश्चात् यह गीली मिट्टी और पानी से मिश्रित होकर कीचड जैसा बन जाता है
पानी से भरे होने से सर्वप्रथम खरपतवार झाड-झंखाड तथा घास सड जाती है और धान के पौधों के लिए उर्वरक खाद के रूप में परिवर्तित हो जाती है
वनस्पति के सर्वाधिक आवश्यक कारक तत्त्व के रूप में पानी ही तो है
रोपे जानेवाले धान के बीज को हमेशा नहीं तो कई बार तो २० से ३० घंटे तक पानी में आधा डुबाया हुआ रखा जाता है
धान के बीज को मूल जगह बोकर उन्हें पहले उगाया जाता है
रोपने कि क्रिया हाथों से की जाती है
इन्हें पूनम या मोदन कहा जाता है
दक्षिणी भाग कई बार एक वर्ष में या कभी कभी १४ महीनों में तीन फसलें पैदा करने के योग्य है
२१ एक प्रकार का चावल यहाँ दूसरे स्थानों की अपेक्षा जल्दी पकता है
दक्षिणी भाग कई बार एक वर्ष में या कभी कभी १४ महीनों में तीन फसलें पैदा करने के योग्य है
उत्पादन में बहुत अधिक बढोतरी में यहाँ की गर्म जलवायु का व्यापक रूप से हिस्सा होता है
मलबार में धान की फसल वर्ष की सभी ऋतुओं में देखी जा सकती है
इस प्रांत की झलक सुंदर , मोहक एवं वैविध्यपूर्ण है
मलबार के लोग दो तरह के हलों का उपयोग करते हैं
दूसरे की अपेक्षा पहला भारी होता है
लेकिन दोनों ही हलों की एक समान संरचना होती है
यहाँ खेती करने में बहुत कम अड़चनें हैं | यूरोप में कोई भी किसान एक ही सिद्धांत का पालन करेगा
विभिन्न प्रकार के पशुओं को हल में एक साथ जोतने को मलबार में नीचा नहीं माना जाता
हिंदू कृषकों के हलों की तरह ग्रीकों एवं मिस्रवासियों के हलों में फाल नहीं होती
एशिया के लोगों की तरह ही प्राचीन काल के लोगों ने जुताई में केवल बैलों का उपयोग किया
मक्के की फसल की कटाई हँसिया से की जाती है
भारत में जमीन की उर्वरता पानी की उपलब्धता , आवधिक रूप में नियमित वर्षा तथा जमीन की फलदायकता पर निर्भर होती है
मलबार में जमीन को तीन किस्मों की फसल पैदा करने के लिए उपयुक्त पाया गया है
प्रथम किस्म को पशीमा कूर कहा जाता है
यह किस्म उर्वरता एवं उपजाऊपन की दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट कोटि की होती है जो बहुत अधिक समृद्ध मिट्टी से संरचित होती है
'कूर' का अर्थ है 'तुलना में'
दूसरे प्रकार की भूमि को 'राशि पशीमा कूर' कहा जाता है
समान या मध्यम किस्म की जमीन को यह नाम दिया जाता है
अत: यह 'राशि' गुणसूचक विशेषण है जो कि मिट्टी और बालू के मिश्रण के लिए उपयोग होता है जो पहली किस्म की मिट्टी के साथ संयोजित रूप में रहता है
तीसरे प्रकार की जमीन को 'राशि कूर' कहा जाता है
'राशि कूर' शब्दावली 'रहितता' के अर्थ की बोधक होती है
उर्वरता की प्रामाणिकता दूसरी में होती है , इसमें मिट्टी जैसे फूल जाती है तथा उस गड्ढे में भरने पर आनुपातिक रूप में बढ जाती है
यह देखा गया है कि यद्यपि हिंदू मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन करते हैं वे उद्यान विज्ञान से अत्यंत कम जुडे हुए होते हैं तथा उद्यान भी कम ही लगाते हैं
एक छोटा सा स्थान ही उनकी आवश्यकतानुरूप समस्त आवश्यक पौधों को उगाने के लिए पर्याप्त होता है
मिर्ची या लालमिर्च , उद्यान भाजी , ककडी एवं कद्दू , कुछ पुष्प आदि उनके छोटे से बगीचों में मुख्य पौधे होते हैं
मलबार की जमीन कछारी भूमि है
पूर्णिमा तथा शुक्लपक्ष में वर्षा तथा ओस अधिक प्रचुर मात्रा में पड़ती है अत: यहाँ के किसान इस ऋतु में अपने अधिकांश कृषि कार्यो में व्यस्त रहते हैं
ऋतु की संभाव्यता के लिए ज्योतिषी को पूछा जाता है | ज्योतिषी मौसम की परिगणना करते हैं
'प्राकृतिक इतिहास' में बेकन कहते हैं कि यदि चंद्रकला में वृद्धि के साथ बोया या काटा जाए तो बीज , बाल , नाखून , झाडियाँ , तथा जड़ी-बूटियाँ बहुत जल्दी बढती हैं
ग्रामीण समाज की एक खास विशिष्टता उनका पृथक वास है
जब उनके पास अपने पशुवृंद को चारा खिलाने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता है तो वे पास वाले की सहमति से अपने चारागाह को बढा लेते हैं
मेजर जनरल सर अलेकजैंडर वॉकर , सन् १८२० सन्दर्भ १ . गोग्युट , खंड-१ , पू . ८५ २ . एडिनबर्ग रिव्यू , सं . ६७ पृ . २०१ ३ . उस तरह की बेगार सभी निरंकुश सरकारों में सेवा के रूप में बरकरार रही
यदि जमीन विशेष रूप से अधिक सख्त हो तो वे चार बार और कई बार तो पाँच बार भी भरते हैं
इसी ऋतु में उन्होंने देखा कि घोड़ों को चारे के रूप में गाजर खिलाई जा रही थी अत: उन्होंने अश्वारोही सेना में गाजर की आपूर्ति के साथ साथ रज्जका की भी आपूर्ति की
यदि इसमें नियमित रूप से पानी दिया जाए तथा इसकी समय समय पर निराई भी कर दी जाए तो प्रत्येक २०- २५ दिन के अंतराल पर इससे नियमित रूप से रजका की कटाई पशुओं को हरा चारा खिलाने के लिए की जा सकती है तथा बडी ही जोरदार फसल प्राप्त होती है
कोंकण क्षेत्र में किसान खेत में पत्ते , झाड़-झंखाड़ एवं सूखी घास आदि को भी जला डालते हैं
बंगाल में जमीन की असाधारण अनुर्वरता हिंदू कृषकों के लिए संभवत: अनुकूल नहीं है
पोलेंड के उच्चभागों में भूमि की प्राकृतिक उर्वरता से गेहूँ की लहलहाती हुई खूब अच्छी फसल पैदा होती है
२० . मलबार के फार्मों के संबंध में कुछ विलक्षण एवं रोचक स्थितियों वाले विवरण के लिए डॉ . बछानन को देखिए
वह एक बहादुर सिपाही था
अपने देश के लोगों की चारित्रिक विशेषताओं के अनुरूप ही बलदेवसिंह अपने प्रांत की स्थानीय विशेषताओं की बातें मुझे कहता रहता था
मैं ने कुछ पुस्तकों में पढ़ा है कि पेटेंट किया गया बुवाई का हल त्रुटिपूर्ण है क्योंकि इससे बुवाई के समय बीज जमीन की मिट्टी में समान रूप से नहीं गिरता है
इसके लगभग अठारह इंच के लम्बाई की तथा दस इंच चौडाई के अलग अलग टुकडों की संरचना होती है जिसके ऊपरी सिरे पर एक इंच चौडे छेद का एक पोला बाँस लगाया जाता है जो लगभग तीन फीट लम्बा होता है
इसमें दाना डालने का कार्य महिला द्वारा किया जाता है जो कि हल की बायीं तरफ चलती है
वह अपने दाएँ हाथ को कभी भी कप से बाहर निकालकर बीज नहीं निकालती क्योंकि हल तो चल रहा होता है और अगर वह सीधे हाथ को बीज की थैली में डालकर बीज निकालेगी तो इस बीच हल आगे बढ जाएगा और उतना स्थान बीज से खाली रह जाएगा तथा बीज गिरेगा ही नहीं
उन्होंने बुवाई की कृषि को बार बार करने के दौरान यह अनुभव किया कि बुवाई का यह हल बीज को मिट्टी के अंदर इतने असमान रूप में डालता है कि बीज एक तरफ हो जाता है
इन में एक सीध में छिद्र किए हुए होते हैं जिनमें से होकर जमीन में मिट्टी के अंदर बीज हाथ से गिराया जाता है
उसने मुझे यह भी बताया है कि इसमें कुछ त्रुटियाँ भी हैं क्योंकि जब बुवाई के काम में बच्चों की सहायता ली जाती है तथा ठंडी के मौसम में जब गेहूँ के दाने अपने हाथों से इसके माध्यम से बोए जाते हैं तब वे इनके प्रत्येक छेद से गिराते हैं तो अत्यंत फुर्ती के कारण अधिक दाने गिरा देते हैं
मुझे इस संबंध में एक अन्य जानकारी भी अपेक्षित है कि क्या इंग्लैंड में लोग बोए गए अनाज के उगने के पश्चचात् खरपतवार एवं झाड झंखाड को समूल नष्ट करने के लिए इस प्रकार के किसी औजार का उपयोग करते हैं
यह औजार तीन छोटी छोटी ममूटियों को हल के पैने भाग के साथ समान दूरी पर लगा कर बनाया जाता है
मैंने जो तीन कृषि औजार भेजे हैं उन्हें देखकर आप अच्छी तरह समझ सकेंगे कि पश्चिम में जिस तरह की बुवाई पद्धति का आज भी उपयोग किया जा रहा है वह इस पद्धति की तुलना में संभवत: अनावश्यक ही है
मैंने जो तीन कृषि औजार भेजे हैं उन्हें देखकर आप अच्छी तरह समझ सकेंगे कि पश्चिम में जिस तरह की बुवाई पद्धति का आज भी उपयोग किया जा रहा है वह इस पद्धति की तुलना में संभवत: अनावश्यक ही है
 ( तीन हलों का सेट लंदन में कृषि बार्ड को विधिवत प्राप्त हुआ तथा इन तीनो हलों के रेखाचित्र ( उपयुक्त विवरण के साथ ) 'कृषि बोर्ड के पत्राचार" ( १७९७ ) के प्रथम खंड में प्रकाशित हुए
कमजोर बैल धान के खेत में हल नहीं खींच सकते हैं क्योंकि हल को सीधे चलाए जाने की आवश्यकता होती है
इस जिले में चने को छोडकर बाकी सभी फसलों को पैदा करने के लिए बुवाई कृषि कर्म का ही उपयोग किया जाता है
यह कपास बौनी किस्म का होता है | इसे बुवाई के हल के माध्यम से बोया जाता है
मैं ने एक खेत में एक अन्य प्रकार की जुताई देखी थी जिसमें करीब तीस इंच दूरी पर जोता गया था
गाँव की दक्षिण दिशा में रहने वाले निवासियों को अत्यंत आनंदानुभूति होती है
इसके समीप ही लोहे के अयस्क की खदानें है
लोहे की खदानें गाँव की उत्तरी दिशा में एक मील दूरी पर तथा पहाडी से आधामील दूरी पर स्थित हैं जहाँ से वे कच्चा लोहा टोकरियों में भरकर गाँव के समीपवर्ती भाग में स्थित भट्टियों में लाते हैं
कच्चा लोहखनिज जमीन के प्रथम स्तर के नीचे ( जो कि पूर्वोल्लिखित विवरण के अनुसार कंकड एवं बालू से निर्मित होती है ) परत के रूप में होता हैं
खदानों के बाहरी दिखावे के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता लेकिन कुछ दूरी से देखने पर वे एक लोमडी की माँद जैसी दिखती हैं
अकाल से पहले कुल मिलाकर ४० भट्टियां थीं जो अब घटकर केवल १० रह गई हैं
अकाल से पहले कुल मिलाकर ४० भट्टियां थीं जो अब घटकर केवल १० रह गई हैं
भट्ठी में पुन: ये चीजें डालने के सम्बन्धमें , विशेष रूप से कोयला डालने के सम्बन्ध में वे लक्षमपुरम् के लोगों से अधिक समझदारी से व्यवहार करते हैं
समीपवर्ती पहाडियों से प्रचुर मात्रा में कोयला हेतु लकङी प्राप्त की जा सकती है
भट्ठी को चलाने के लिए इस समय नौ लोगों की आवश्यकता होती है जो मुख्य रूप से आदि कार्यों को करते हैं लेकिन इस पुरानी पद्धति तथा उपस्करों में थोडा सुधार भी आग और पानी या दोनों के माध्यम से बड्डी आसानी से किया जा सकता है जिससे नियोजित करनवाले लोगों की संख्या आसानी से कम की जा सकती है
डॉ . हैन ने इसका विवरण देते हुए लिखा है कि उन्हें अजनबियों के लिए बोझा ढोना पडता था ( उदाहरणार्थ : ब्रिटिश सेना तथा ब्रिटिश असैनिक अधिकारियों के लिए ) तथा वे एक गाँव से दूसरे गाँव तक ऐसे समय में बोझा ढोने के लिए जाया करते थे
ये खदानें जबलपुर , बडागाँव , पन्ना , कटोला , तथा सागर जिलों में हैं
प्रथम चार का लौह अयस्क अभ्रकयुक्त होता है जो कम जंग लगा होने पर पारदर्शक लोहे जैसा दिखता है
प्रथम चार का लौह अयस्क अभ्रकयुक्त होता है जो कम जंग लगा होने पर पारदर्शक लोहे जैसा दिखता है
यह अत्यंत आसानी से पिघलता है
यह पहलेवाले लोह अयस्क की अपेक्षा जल्दी पिघलता है तथा प्रत्यक्ष प्रयोग में १८५ सेर लोह अयस्क को १६५ सेर कोयले द्वारा प्रज्वलित किए जाने पर दस से भी कम घंटों में ७७ सेर अपरिष्कृत लोहा प्राप्त होता है जो कि लगभग ४२ प्रतिशत होता है
यह पहलेवाले लोह अयस्क की अपेक्षा जल्दी पिघलता है तथा प्रत्यक्ष प्रयोग में १८५ सेर लोह अयस्क को १६५ सेर कोयले द्वारा प्रज्वलित किए जाने पर दस से भी कम घंटों में ७७ सेर अपरिष्कृत लोहा प्राप्त होता है जो कि लगभग ४२ प्रतिशत होता है
नर्मदा नदी के दक्षिणी किनारे पर डांगराय में अभ्रकयुक्त लोह अयस्क स्फटिक वालुकाश्म से अंतरस्तरित मोटी परत के रूप में रहता है
चट्टान को तोड़कर इसे निकाला जाता है लेकिन इसका लोह अयस्क अच्छी किस्म का नहीं होता
इसका अभ्रकी प्रकार इतना अधिक उपचायक होता है कि यह लगभग भुरभुरा होता है
यह हमेश सतह के नजदीक पाई जाती हैं तथा मगैला को छोड़ शेष सभी से उत्कृष्ट कोटि का पिटवाँ लोहा प्राप्त होता है
बडागाँव , लमतेरा , एवं इमलिया की लोह खदानें बडागाँव , लमतेरा , एवं इमलिया की खदानें बेल्हारी परगना के घाटी की उत्तरी दिशा में स्थित हैं तथा उल्लेखनीय बात यह है कि इस पर्वत श्रेणी के पास लोह अयस्क अलग प्रकार का होता है
यह सतह के पास लोहमय बालुई मिट्टी के रूप में होता है तथा किसी भी चट्टान से असंबद्ध होता हालाँकि सद्योलग्न स्तर वालुकाश्म का होता है
इन में से पहली दो खदानों में लोह अयस्क दानेदार , लगभग मटर के आकार का गोलाकार मृत्तिकामय ( सं . २० ) होता है जो कि लोहमय मिट्टी द्वारा ठोस पदार्थ में जुडा हुआ होता है; दूसरे प्रकार का लोह अयस्क टुकडों के आकार एवं चपटे रूप में पहले प्रकार के लोहअयस्क जैसा ही होता है ( सं . २१ ) लेकिन कुछ कम सख्त होता है तथा इसके पिंडों को अधिक आसानी से अलग किया जा सकता है
यह बडागाँव के लोह अयस्क से बेहतर सिद्ध होता है क्योंकि उस में शायद सीमेंट में निहित दूषित तत्त्व इसे अत्यंत भंगुर बना देते हैं
इनका लोह अयस्क सामान्य मृण्मय किस्म का ( सं . २२ ) होता है जो पतले से स्तर में मटियाले हेमेटाइट या लाल गेस एवं पीली मिट्टी के बीच में होता है जिसके नीचे मटियाला हेमेटाइट तथा ऊपर पीली मिट्टी होती है
सिमेरिया गाँव में एक अन्य हलकी किस्म का और भंगुर लोहा होता है जिसे गलाने पर बेहतर किस्म की धातु प्राप्त होती है
कटोला जिले की लोह खदानें पन्ना जिले में हीरे की खदाने हैं तथा जिस क्षेत्र में ये पाई जाती हैं उस क्षेत्र के समीप कटोला की लोह खदानें हैं
इनके बीच में केन नदी सीमा रेखा की भाँति बहती हैं
इनके बीच में केन नदी सीमा रेखा की भाँति बहती हैं
कटोला की लोह अयस्क खदानें केन और देसान नदियों के बीच कई पहाडियों में फैली हुई हैं
इन में से प्रथम एवं द्वितीय ( सं . २४ ) का लोह अयस्क आगे वर्णित देयरा खान के लोह अयस्क जैसा है तथा तीसरी खदान ( सं . २५ ) का लोह अयस्क विभिन्न आकारों के पानी में घिसे पथ्थरों जैसा है जो कि लोहमय बालुई मिट्टी में दबा हुआ है
ये खदानें विंध्याचल पहाडियों की तलहटी के समीपवर्ती भागों में स्थित हैं
ये लोह बटियाँ जमीन की ऊपरी सतह से करीब पंद्रह फीट नीचे पाई जाती हैं तथा खंडों एवं बालुकश्म के टुकडों के साथ मिश्रित हैं
यह जमीन की सतह के अत्यंत पास ही लोहमय बालुई या बजरीली मिट्टी में एक पहली परत के रूप में होता है
इसके समीपवर्ती भाग में कोयले का स्लेटी पत्थर निकलता है
पश्चिम दिशा में और आगे बढ़ने पर बजना नगर के पास छापर पहाडियाँ हैं जिनमें प्रचुर मात्रा में लोह अयस्क है
उसकी तलहटी हरित प्रस्तरों के उभारों से छाई हुई हैं और वह अस्तव्यस्त फैली हुई है
इसके आसपास की पहाडियां बडी भू-हलचल के कारण मूल पर्वत से अलग हो गई लगती हैं
वहाँ भोजपुर गाँव के पास लोह-प्रस्तर से कुछ गोल बटियाँनुमा लोहमय मिट्टी निकाली जाती है लेकिन मोतेही से निकाले जानेवाले लोह अयस्क के समान होने के कारण इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता
इस जिले की अंतिम खदानें सेरवा , हीरापुरा , तिघोरा एवं मंदेवरा की हैं जिनमें से सेरवा की छोटी सी खदान गाँव के पास ही है
इसी तरह की अगली खदाने हैं जिनका लोह अयस्क ( सं . -३६ ) इसी प्रकार का है लेकिन हीरापुर की खदान का लोह अयस्क अत्यंत उत्कृष्ट कोटि का है
यह खदान अच्छी सड्क के पास होने के कारण इसका कच्चा माल प्राय: अन्य स्थान पर परिशुद्ध करने के लिए ले जाया जाता है
पश्चिम में इससे और आगे भी देसान एवं जमनी नदियों के बीच में वेलदाना , सराय , धौरी सागर तथा अन्य स्थानों में अन्य खदानें भी हैं
उल्लेखनीय बात यह है कि लोह अयस्क पहाडियों की शृंखला के अंदर हैं
इसकी तलहटी सिनाइटिक ग्रेनाइट से निर्मित है तथा उसका ऊपरी भाग वालुकाश्म से निर्मित है
इसकी तलहटी सिनाइटिक ग्रेनाइट से निर्मित है तथा उसका ऊपरी भाग वालुकाश्म से निर्मित है
तेंडुकैरा गाँव से वे डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर हैं
ये स्तरित स्फटिक चट्टान से निर्मित पहाडियों की निम्न शृंखला के समीप हैं जिसमें स्पष्ट रूप से फैल्सपर होता है
इसका सामान्य गुण तथा दिखावट अपारदर्शी एवं मृण्मय होती है लेकिन इसमें धातुमय चमक होती है तथा यह सतत विकीर्णित होता है
इसका अत्यंत सामान्य रूप अनियत संकेंद्रित पटलिका होती है जो विभिन्न रंगों सामान्यत: पीले या पीत भूरे रंग - से रंजित होती है
इसका निर्माण आगे बताया गया है; लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि इससे अत्यंत उत्कृष्ट पिटवाँ लोहा पैदा होता है जो सभी प्रकार से उपयोग में आता है
यह अपने संकेंद्रित स्तरित रंग से अलग होता है; इसका सिरा पीला होता है
काला ( सं . ५ ) अर्थात् काला लोह अयस्क सघन , मटमैला , भूरा ऑक्साइड होता है
इससे अच्छी स्टील बनती है
काठकोयला भारत में सर्वत्र काठकोयले का उपयोग लोहे को पिघलाने के लिए किया जाता है क्योंकि यहाँ के स्थानीय लोगों को कोयले के बारे में ज्ञान नहीं है और न उनके विद्यमान शोधक कारखानों में इसका उपयोग किया जा सकता है क्योंकि इससे बहुत अधिक कार्बनीकृत धातु को गलाना पूर्णत: अनुपयुक्त होता है
काठकोयला भारत में सर्वत्र काठकोयले का उपयोग लोहे को पिघलाने के लिए किया जाता है क्योंकि यहाँ के स्थानीय लोगों को कोयले के बारे में ज्ञान नहीं है और न उनके विद्यमान शोधक कारखानों में इसका उपयोग किया जा सकता है क्योंकि इससे बहुत अधिक कार्बनीकृत धातु को गलाना पूर्णत: अनुपयुक्त होता है
वे लोहे को पिघलाने के लिए विभिन्न प्रकार की लकडियों की गुणवत्ता एवं प्रभाव से भली भाँति परिचित होते हैं तथा उसका ही उपयोग करते हैं जो उनके अनुभव की कसौटी पर सर्वाधिक खरा उतरता है
इनको नापने की इकाई मध्यमा ऊंगली की चौडाई होती है
भट्ठी की ज्यामितीय संरचना भट्ठी कि ज्यामितिय रूपरेखा बनाने के लिए ( आरेख-१ आकृति १ एवं २ ) ए बी रेखा अनिश्चित होती है
आगे 'एफ' से 'जी' तक फिर छह भाग निर्मित होते हैं जहां भट्ठी को रीचार्ज करने का बिन्दु मिलता है
आगे का कार्य अत्यधिक कुशल कलाकार द्वारा किया जाता है जो आंतरिक भाग की संरचना को बनाता है और इस पर मिट्टी का पलस्तर करता है
जब इस तरह भट्ठी निर्मित हो जाती है तो इसे सूखने दिया जाता है और इसी बीच अन्य उपांगों की रचना की जाती है जिन्हें भारतीय गुदैरा , पचर , गरेडी एवं अकैरा कहते हैं ( इनके अंग्रेजी भाषा में समतुल्य शब्द नहीं हैं ) विशेष रूप से अकैरा अत्यंत असाधारण उपकरण होता है ( आरेख-१ आकृति-४ एवं-५ एवं आरेख-२ आकृति-१+ ) 
छोटे होने से लोह अयस्क की अशुद्धि बडी मात्रा में रह जाएगी
बडे होने से लोहा अधिक गल जाएगा
यह भी उल्लेखनीय है कि इन परिमाणों का उत्पाद भट्ठी के लिए घनाकार भाग के बीसवें भाग के बराबर रहना चाहिये
धोंकनी ये धोंकनियाँ भी अकैरा की तरह विशिष्ट संरचना युक्त हैं
इन्हें हाथ से संचालित किया जाता है
इन्हें बकरी की एक खाल से बनाया जाता है जो चौडाई में सात भाग तथा लम्बाई में ८ भाग होता है
केवल इतना ही समझ में आता है कि इसे बनाने की कला तेंदूकैरा में एक बार विस्मृत हो गई जिसे लोहा पिघलानेवाले लोगों ने कटोला में पुन: प्राप्त कर लिया
केवल इतना ही समझ में आता है कि इसे बनाने की कला तेंदूकैरा में एक बार विस्मृत हो गई जिसे लोहा पिघलानेवाले लोगों ने कटोला में पुन: प्राप्त कर लिया
धोंकनी के नोजल की संरचना इसकी आकृति ज्यामितीय रूप में बनाने के लिए एक ए बी रेखा समान तीन भाग की खींचे ( आरेख-II , आकृति - २ ) , इसे चार भागों में विभक्त करें , उसका प्रत्येक भाग इसकी प्रत्येक रेखा को छुए तथा दो मध्य में हों
इस से यह प्रदर्शित होता है कि भट्ठी निर्माण का आयोजन अत्यंत कुशलतापूर्वक तथा बुद्धिमानीपूर्वक किया गया है
और उसके ज्यामितीय अनुपात सामान्य माप से सही रूप में बनाए रखे गये हैं
जब तक हाथ एवं उँगलियाँ नापने में कुशल हैं कार्य कौशल में अभिवृद्धि होती रहेगी
शोधक शाला ( रिफाइनरी ) शोधक शाला ऊपर से देखने में अत्यंत अनगढ दिखती है लेकिन भट्ठी के समान ही ये भी एकदम नवीन हैं
एक पिघलानेवाली भट्ठी में दो शोधकशालाओं की जरूरत होती है
इसे बनाने के लिए २० अंकों के छोटे क्युबिट का उपयोग होता है
चिमनी का परिमाप भौतिक रूप में एक हाथ चौडा , एक हाथ गहरा तथा छह हाथ लम्बा होता है
अण्डाकार भाग पर बैठ कर प्रचालक इस उपस्कर से अपना काम करता है
शोधकशाला की भट्ठी एक ऐसा भाग है जिसके निर्माण के लिए कौशल की आवश्यकता होती है
यह कार्य सामान्य रूप से प्रचालक स्वयं करता है
समानांतर केंद्र इस भट्ठी का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है तथा इसके तुरंत बाद धोंकनी की हवा के झोंके के कोण को समुचित रूप से समायोजित करने का भाग है
हवा के झोंके के संबंध में यह पूर्ण रूप से आवश्यक है कि यह आंतरिक परिधि के सामने के कोने पर लगभग १२ डिग्री के कोण पर निर्देशित हो या आकृति - १ , बी में सी बिंदु के रूप में हो
स्थानीय कारीगरों के पास ऐसे कोइ औजार नहीं हैं जिनकी सहायता से वे इसे यथातथ सही रूप में माप सकें लेकिन भट्ठी का उपयोग करने पर तुरंत उन्हें इस बात का पता चल जाता है कि आखिर इसमें त्रुटि कहाँ है
धोंकनियों से भट्ठी में प्रगलन क्रिया तीव्र की जाती है लेकिन लकडी के नोझल की बजाय वे लम्बी लोहे की ट्यूबों से आरेख ५ , आकृति - ५ के अनुरूप बनाकर रखते हैं
इससे धोंकनी से धोंकी गई हवा २४ डिग्री पर ही लकड़ी के नोझल की तरह ही धोंकी जाती है
प्रगलन भट्ठी आरेख - ७ आकृति १ एवं २ में लघुवृत्ताकार प्रगलन भट्ठी का आगे का एवं पीछे का भाग प्रदर्शित किया गया है
इस शोधकशाला का और अधिक व्यापक रूप में उपयोग भारी काम करने के लिए भी किया जाता है
प्रगलन एवं शोधन करने की विधि इस उत्पादन की प्रक्रिया में भारतीय प्रगलनकर्ता केवल कोयले का ही उपयोग करते हैं
लोह अयस्क को छोटे छोटे अखरोट के आकार के टुकडों में तोड़ लिया जाता है लेकिन इसे न तो धोया जाता है , न इसे सेंका जाता हैं क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि इसमें बडी मात्रा में सल्फर होती है और इस विधि का उपयोग करने से वह नष्ट हो जायेगा
अत: वे भट्ठी की चिमनी को काठकोयले से भरते हैं
धोंकनियों को तीन लोग चलाते हैं
भट्ठी के अंदर जानेवाली हवानली में बंधे एक लोहे के एक टुकडे के आकार से पता चलता है कि अभी अंदर कितना अकैरा शेष है
लोह अयस्क का विषम मिश्रण ही पिघलकर अवस्कर के रूप में निकल जाता है
इससे मुक्त हुआ लोहा भट्ठी की नली में अत्यधिक गुरुत्व के कारण गिर जाता है तथा वहाँ पदार्थ के रूप में जम जाता है
इस क्रिया में उपयोग किया जाने वाला काठकोयला टीक , मौवा या बाँस जैसी सख्त लकङी से बना हुआ होता है , यह इस निर्माण का एक अभिन्न अंग होता है जिस के लिए भारतीय लोह निर्माता बडी ही चतुराई से काम लेते हैं क्योंकि पहले तो वे कच्चे पदार्थ को अच्छी तरह से अकार्बनीकृत होने के लिए समय नहीं देते तथा उसके पश्चात इसके कोनों को कुरेदने की अत्यंत जोखिमभरी प्रथा उनमें प्रचलित है
उत्पादन तेंदूकैरा का लोह अयस्क उत्पादन ३६ से ४० प्रतिशत तक है लेकिन यह समग्र रूप में ३६ प्रतिशत की बजाय ४० प्रतिशत के लगभग है
काठकोयला के संबंध में इतना कहना उचित होगा कि इसका उपयोग गुणवत्ता के अनुसार तथा भट्ठी की कार्यक्षमता के अनुसार किया जाता है
अत: कुल उत्पादन इस प्रकार हुआ : लोह अयस्क से ३८ प्रतिशत उत्पादन मिला , कच्ची धातु ६३ प्रतिशत मिली तथा पिटवाँ लोह का ५६ प्रतिशत उत्पादन हुआ जो कि सिल्ली के रूप में पुल बनाने के लिए उपयोग हेतु उपयुक्त था
लोहे की गुणवत्ता लोहा निकाल कर सागर की खान के कैप्टन प्रेसग्रेव को भेजा जाता था
 ( प्रेसग्रेव यहाँ का एक अधिकारी है जो लोहे की गुणवत्ता के विषय में निर्णय देने में अत्यंत सक्षम है ) वह उसकी गुणवत्ता का अध्ययन करके लोहे को सलाखों में ढाल कर लोहे के पुल बनाने हेतु उपयोग में लेता था क्यों कि वह उस समय इसी क्षेत्र में कार्यरत था
दूसरे विवरण में कथन की उन तीन संख्याओं को समाहित किया गया हैं जिससे अत्यंत अच्छी लोह सलाखें निर्मित होती हैं लेकिन गढाई करने तथा इसे उपयोग करने पर यह थोडा सा सख्त होता है जो संभवत: कार्बन के अंश की उपस्थिति के कारण होता है
यह उल्लेख करना भी आवश्यक हें कि उपरि उल्लिखित लोह सलाख सामान्य लोह सलाख नहीं होती अपितु यह उच्च कोटि की पिटवाँ गढी हुई लोह सलाखें होती हैं जिन का उपयोग झूलापुल के निर्माण में किया जाता है , इनकी कठोरता अंतिम तीन संख्याओं के अनुरूप होती है , जिससे सिद्ध होता है कि इसमें कार्बन की थोडी सी मात्रा विद्यमान होती है
मेरी चार भट्टियों में कच्चे लोह अयस्क के प्रगलन की मात्रा ३० अप्रैल से ६ जून तक ३५४१/२ मन थी तथा इसकी लागत ३०४ नागपुर या २६० कलकता सिक्का रूपए थी
अगेरिया लोहे के एक टुकडे को विभक्त करने पर इसके टूटे हुए एक छोटे भाग का हल्का नीला खुरदरा रंग दिखा तथा शेष भाग चाँदी के रंग का श्वेत दिखाई दिया जिससे इसकी उत्कृष्ट कोटि का पता चलता है
तदुपरांत इसे तपाया गया तथा इसमें छेद किया गया जिस के आधार पर पता चला कि यह अत्यंत अच्छी किस्म का लोहा है
3 . नोट : इस उपकरण के संबंध में मिट्टी की प्रकृति - गुडेरा मिट्टी की फन्नी होती है जिसका उपयोग भट्ठी में अकैरा की अनुलम्ब स्थिति को समायोजित करने के लिए किया जाता है
पाचड मिट्टी की आयताकार प्लेट होती है जिसका उपयोग सुराख को ढकने हेतु अकैरा को रखने के लिए किया जाता है तथा इसे समायोजित किया जाता है
नोट : उर्ध्वाकार कोण १२ डिग्री कोण में फन्नी - है कि कोण कम डिग्री का बने
९ . सामान्य अंग्रेजी लोह सलाख से ऐसी अत्यंत उच्च कोटि का पिटवाँ लोहा ७०% के लगभग निकलता है
१० . नोट : प्रगलन की प्रक्रिया करने से पूर्व लोह अयस्क को सेकने के कुछ लाभ भी होते हैं जिन के लिए खर्च तो आता ही है तथा इसकी समग्र सफलताओं के कारणों को मैं निम्मानुसार स्पष्ट कर सकता हूँ : यूरोप में भट्टियों , जहाँ तक मैं जानता हूं , सामान्यत: अभिलम्ब होती हैं तथा इन में लोह अयस्क अभिलम्ब रूप में अंदर गिरता है
परिणामत: उनकी नीचे गिरने की क्रिया अत्यंत तीव्र एवं त्वरित रूप में होती है लेकिन भारत में भट्टियां तिर्यकाकार होती हैं तथा इनमें कच्चा लोह अयस्क एवं ईंधन अत्यंत धीरे धीरे गिरता है अत: अत्यंत तापबिंदु पर पहुँचने से पूर्व सल्फर एवं अन्य वाक्यशील अवयवों के क्षय होने में काफी समय लगता है
यही कारण है कि इन भट्टियों की चिमनियों पर सदैव सल्फर का आवरण चढाया जाता है जिससे यह भी पता चलता हैं कि भारतीय शोधनशाला की अपेक्षा दोनों संक्रियाओं के प्रभाव के तहत अधिक कार्बन प्राप्त होता है तथा इस कार्बन को खत्म किया जाता है और परिणामत: इससे केप्टन प्रेसग्रेव द्वारा पर्यवेक्षित अंतिम तीन अंकों की कठोरता होती है
अकेले मद्रास को ही प्रति वर्ष १००० टन लोहा भेजा जाता है
अंग्रेजी पद्धति से लोहे का उत्पादन इंग्लैंड में अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ है; अत: भारत में भी इसी प्रक्रिया के अनुरूप वैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है
"विभिन्न प्रक्रियाओं की सम्पूर्ण जानकारी होने की गर्वोक्ति करने से पूर्व हमें लोहे के व्यापार के संबंध में निश्चित रूप से काफी कुछ सीखना होगा
' ( उत्पादन के शब्दकोश में ) डा . करे इसी विषय में कहते हैं कि 'दार्शनिक तो उपयोगी कलाओं के अध्ययन के प्रति उदासीन रहते हैं और प्रयोगशाला तथा सिद्धान्तों की गौण बातों में अधिक उलझे रहते हैं
' ( उत्पादन के शब्दकोश में ) डा . करे इसी विषय में कहते हैं कि 'दार्शनिक तो उपयोगी कलाओं के अध्ययन के प्रति उदासीन रहते हैं और प्रयोगशाला तथा सिद्धान्तों की गौण बातों में अधिक उलझे रहते हैं
इस विषय के ज्ञान की यह स्थिति होने के कारण भारत के उत्पादन की सादी , सस्ती और दीर्घ परम्परा के परिणाम स्वरूप प्रस्थापित पद्धति में निहित सिद्धांतों का सावधानी पूर्वक परीक्षण करके उत्पादन की पद्धति में सुधार और बदल किया जा सकता है और वह अधिक लाभकारी हो सकता है
अंग्रेजी उत्पादन की श्रमसाध्य पद्धतियों की अपेक्षा इससे अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं क्योंकि अंग्रेजी पद्धति के लिए अधिक पूंजी , कीमती भवन तथा उपयुक्त व्यापार की आवश्यकता होती है
५ . इंग्लैंड में कच्चे लोह अयस्क को शुद्ध करने के लिए प्रगलन हेतु खदानों से कोयला प्राप्त कर के इसका ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है
भट्टियों में हवा का दबाव करीब तीन पौंड घन इंच होता है तथा हवा का परिमाण सामान्यत: ४ , ००० घनफीट प्रतिमिनट के आसपास होता है
भट्टियों में हवा का दबाव करीब तीन पौंड घन इंच होता है तथा हवा का परिमाण सामान्यत: ४ , ००० घनफीट प्रतिमिनट के आसपास होता है
एक जोड़ी भट्ठी के निर्माण पर १८०० स्टर्लिंग से अधिक की लागत आती है
६ . ढले हुए लोहे को सलाखों में परिवर्तित करने के लिए इंग्लैण्ड में सामान्यत: 'परिशोधन' नामक प्रथम प्रक्रिया की जाती है जिसमें लगभग एक टन लोहे को समतल खुली भट्टियों में करीब तीन फीट चौरस रूप में भरकर उसे दो या दो से अधिक घंटे तक गर्म करने की सघन क्रिया की जाती है जिसके कारण इस में काफी गैस उड जाती है
इस प्रक्रिया में धातु भी वजन में बारह से सत्रह प्रतिशत घट जाती है
७ . परिशोधित ढलवाँ लोहा अब उत्कृष्ट धातु बन गया होता है | तत्पश्चात् उसे परावर्तन भट्ठी में डाला जाता है जिसे 'पलटनी भट्ठी' कहा जाता है , जिसमें कोयले की बहुत अधिक प्रदाहक ज्वाला भभकती है जिसके माध्यम से यह धातु पहले तो आंशिक रूप से पिघलती है तथा उसके पश्चात् अपरिष्कृत पाउडर के रूप में गिरती है
परिणाम में भी भिन्नता दिखाई देती है; इस पद्धति से प्रति दिन पांच सौ किलो ढलवां लोहा बनाने से लेकर कभी कभी पांच टन तक ढलवाँ लोहा तैयार किया जाता है
इस क्रिया में प्रत्येक टन ढलवाँ लोहा तैयार करने के लिए लगभग सवा दो से साढे तीन टन काठकोयले का उपयोग किया जाता था
अत: एक टन ढलवाँ लोहा तैयार करने के लिए चार से पाँच गुनी मात्रा में कोयला खर्च होता है
इस गड्डे को काठ कोयले से भर दिया जाता है जिसमें कच्चा लोह अयस्क थोडी सी मात्रा में भर दिया जाता है
१३ . भारत के देशी लोगों द्वारा लोहे के प्रगलन की पद्धति हिमालय से केप कोमोरिन ( कन्याकुमारी ) तक समान ढंग से अपनाई जाती है
कच्चा लोह अयस्क मुख्यत: या तो नालों में प्राप्त सामान्य चुम्बकीय लोह वालुकारम या लोहमय ग्रेनाइट से पृथक किया गया कुटा हुआ चुम्बकीय लोह अयस्क होता है लेकिन मैंने गूमसूर के लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला परावर्तक लोह अयस्क भी देखा है
१४ . देशी भट्टियों मे उपयोग की जाने वाली सामग्री भारत की सामान्यत: लाल रंग की कुम्हारी मिट्टी होती है , जिस का यदि सावधानी पूर्वक चयन नहीं किया जाए तो परावर्तक नहीं होती है
१४ . देशी भट्टियों मे उपयोग की जाने वाली सामग्री भारत की सामान्यत: लाल रंग की कुम्हारी मिट्टी होती है , जिस का यदि सावधानी पूर्वक चयन नहीं किया जाए तो परावर्तक नहीं होती है
१६ . धोंका नली चौदह इंच लम्बी तथा लगभग चार इंच मोटी मिट्टी से निर्मित बेलनाकार होती है जिसमें एक इंच व्यास का एक छेद किया जाता है
१७ . धोंकनियाँ बकरी की खालों से बनाई जाती हैं
भट्ठी को उसकी गर्दन तक लगभग २६ पौंड कोयले से भर दिया जाता है
लगभग ढाई घंटे में तीव्र गर्मी ज्वाला बन कर शांत हो जाती है तब धोंकनी को हटा दिया जाता है
भट्ठी के दरवाजे तोडकर खोल दिये जाते हैं और शेष लोहे को पिंड के रूप में वहाँ से निकाल लिया जाता है
१९ . देशी भट्टियों में लगभग ग्यारह के पिंड बनते हैं जो कभी कभी दो आना के हिसाब से बिकते हैं
१९ . देशी भट्टियों में लगभग ग्यारह के पिंड बनते हैं जो कभी कभी दो आना के हिसाब से बिकते हैं
उत्कृष्ट पिण्ड का परीक्षण करने पर मैंने पाया कि उसमें लगभग छह पौंड लोहा था ( सामान्यत: उनमें तीन पौंड से अधिक लोहा होता नहीं है ) 
उत्कृष्ट पिण्ड का परीक्षण करने पर मैंने पाया कि उसमें लगभग छह पौंड लोहा था ( सामान्यत: उनमें तीन पौंड से अधिक लोहा होता नहीं है ) 
अत: ये भट्टियां सस्ती एवं सुविधाजनक तो होती ही हैं , साथ ही जहाँ कोयला प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है , वहाँ इन के माध्यम से लोहे को प्रगलित करने का काम आसानी से किया जा सकता है
२० . यद्यपि भारत में लोहे का सकल उत्पादन यथेष्ट मात्रा में होता है; फिर भी , दक्षिण भारत में जमीन पर परिवहन की कठिनाई के कारण यूरोपीय पूंजीपति द्वारा यहाँ उद्योग स्थापित करना कठिन है
यहां एक मात्र सुधार यही हो सकता है और स्थानीय लोगों को मनाया जा सकता है कि भट्ठी का आकार बढाया जाए और धोंकनी अधिक शक्तिशाली बनाई जाए जिससे इंधन की बचत हो सके और उत्पादन बढाया जा सके
२१ . देशी पद्धति से निर्मित लोहे की गुणवत्ता के संबंध में हमें विभिन्न लेखकों से अत्यंत विरोधाभासी टिप्पणियाँ प्राप्त हुई हैं
२२ . यदि निकृष्ट किस्म के अंग्रेजी लोहे की ठण्डी सलाख को मोड़ने के प्रयास किए जाएँ तो वह मुड़ेगा नहीं परन्तु टूट जाएगा और उसके टूटे हुए छोर पर अनियमित कोण पर चमकीली सपाट जगहों पर कुछ छोटे छोटे कण नजर आएँगे जिन्हें लेंस से देखने पर निस्क या 'ग्रेफाइट' के सितारे जैसे दिखाई देंगे
लेखकों का मानना है कि विशुद्ध लोहा या तो तन्तु जैसा होता है नहीं तो पत्थर जैसा
कोयले का उपयोग कर के बनाया गया अंग्रेजी लोहा हथौड़े के घाव नहीं झेल सकता है
जिससे घोडे़ की नाल बनाई जा सके वह लोहा अच्छी गुणवत्ता वाला माना जाता है
जब इसे बँटी हुई रस्सी के लच्छे की तरह मोड़ा जाता है तो जब तक कुछ बल्लियां बाहर नहीं निकल आतीं तब तक इसके किसी भी भाग पर कोई टूटन नहीं होती है
जैसा कि मैं प्रदर्शित कर चुका हूँ देशी भारतीय लोहे में स्टील होती है
इस तरह से परीक्षण किया गया लोहा चार भिन्न प्रकारों के उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है
यह लकड़ी की धुरियों , पहियों आदि के निर्माण के लिए उपयोगी होता है जहा संसक्ति एवं शक्ति दोनों की अवश्यकता होती है
इसमें संसक्ति या लसलसापन नहीं होता
अत: लुहारी कार्य करने के दौरान हथौडे़ की चोट इसकी लोह सलाख के कोने पर मारने पर यह बहुत जल्दी चटक जाता है लेकिन यह लोहा सामान्य किस्म का लोहा नहीं होता
आपकी इच्छानुसार मैंने इस देश के लोगों द्वारा कपास की सफाई करने की प्रवर्तमान पद्धतियों की जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किए
ऊपरी तौर पर देखने में आया है कि वे जब इस पदार्थ के घोल तथा फिटकरी के घोल में कपडे़ को डुबोते हैं तथा उसी समय वे इस कपडे़ को वनस्पति रंग में डुबोते है तब बड़ा ही चटक रंग चढ़ता है
कुछ समय बाद मैं आपको इस देश में चूना बनाने की पद्धति के बारे में जानकारी दूँगा जिसे यहां के लोग चूनम् कहते हैं तथा इसका उपयोग भवनों , छतों , कुल्या बनाने , पानी के नीचे सतह के निर्माण करने में तथा जहाजों की नीचे की तली बनाने में उपयोग करते हैं
कुछ समय बाद मैं आपको इस देश में चूना बनाने की पद्धति के बारे में जानकारी दूँगा जिसे यहां के लोग चूनम् कहते हैं तथा इसका उपयोग भवनों , छतों , कुल्या बनाने , पानी के नीचे सतह के निर्माण करने में तथा जहाजों की नीचे की तली बनाने में उपयोग करते हैं
ऐसी जगहों पर यह ताँबे की टक्कर का होता है
यह विशेष रूप से बडे पत्थरों को आपस में अच्छी तरह से जोड देता है जो कि दीवाल जैसा दिखता है
इसका एक मुख्य तत्त्व अपरिष्कृत चीनी का एक प्रकार होता है जो कि श्री बर्गमन के प्रयोग में अपरिष्कृत पृथक सैकरीन एसिड सदृश दिखाई देता है
मुम्बई , जनवरी १९ , १७९२ यूरोप से आगत अंतिम जहाज एसैक्स द्वारा मुझे आपका १७ मार्च , १७९१ का पत्र प्राप्त हुआ
भारत की कलाएँ अत्यधिक जिज्ञासा पैदा करनेवाली हैं
मुझे उम्मीद है कि एस्सैक्स यहां से करीब छह सप्ताह बाद जाएगा तब तक मैं इस विषय को आरंभ कर दूँगा तथा आपको अवगत करा दूँगा
चौथे , उनकी साबुन , बारूद , नील , स्याही , सिंदूर , तूतिया , लोहा और ताँबा , फिटकरी आदि बनाने की पद्धति
मैं ने हाल ही में पाया कि यहाँ के लोग चीजों को प्रचुर मात्रा में और अत्यंत कम कीमतों पर बनाते हैं
यह मुझे अत्यंत कीमती लवण लगता है
इसकी कीमत यहाँ एक टन की २ . १० या ३ पौंड से अधिक नहीं होगी
यह संकोचक पदार्थ एक वृक्ष से प्राप्त होता है जो इस द्वीप में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है
कुछ रंगों को और अधिक चटखदार बनाने में इसकी गजब की भूमिका होती है जो वृक्ष के व्रण से बने रंगों में बिल्कुल भी नहीं होती क्योंकि मैं ने इस देश के रंगाई कार्य में इसका उपयोग होते हुए देखा है
सल्फ्यूरीय अम्ललौह युक्त ड्रपा से अत्यंत उत्कृष्ट कोटि की स्याही बनती है जो अन्य किसी भी प्रकार की स्याही से उच्च कोटि की होती है
मैं एक बक्से में स्टील का नमूना भेज रहा हूँ जिसे वुट्ज कहा जाता है तथा जिसे भारतीय मूल्यवान मानते हैं
मैं एक बक्से में स्टील का नमूना भेज रहा हूँ जिसे वुट्ज कहा जाता है तथा जिसे भारतीय मूल्यवान मानते हैं
यह देखने में अन्य किसी भी चीज से कडा दिखता है
मुम्बई , जनवरी १९ , १७९६ मैं ने आपको कैप्टन विलेट के माध्यम से दो बक्से कुछ दिन पूर्व भेजे थे जिनमें से एक में भगवान गणेश की मूर्ति थी तथा दूसरे में मैंने १८३ रतल वूट्ज तथा पीतल की नौ अन्य हिंदू देवीदेवताओं की मूर्तियाँ भेजी थीं
मुम्बई , जनवरी १९ , १७९६ मैं ने आपको कैप्टन विलेट के माध्यम से दो बक्से कुछ दिन पूर्व भेजे थे जिनमें से एक में भगवान गणेश की मूर्ति थी तथा दूसरे में मैंने १८३ रतल वूट्ज तथा पीतल की नौ अन्य हिंदू देवीदेवताओं की मूर्तियाँ भेजी थीं
इनमें से एक हंड्रेड वेईट ( ११२ रतल ) वूट्ज आप परीक्षण के लिए अपने पास रख सकते हैं तथा शेष सामग्री डॉ . जॉन्सन को दे दें
आपको इसमें कुछ बीज भी मिलेंगे जो अत्यंत पौष्टिक और स्वादिष्ट सब्जियों के हैं
मैं आपको आलेख भी भेज रहा हूँ जिसे मेरे मित्र मेजर वाकर ने तैयार किया है जो अब इस सूबे के आयुक्त हैं
उदाहरण के लिए मैं ने उनके द्वारा बनाई गई एक जोडी पिस्तौल देखी है जो कि देखने में सुंदरता की दृष्टि से किसी से भी किसी भी तरह से निकृष्ट नहीं है , और लंदन में निर्मित पिस्तौलों से सभी दृष्टि से संभवत: बेहतर ही हैं
मेरी जानकारी में , ताँबा भारत में निर्मित नहीं होता
इस देश में नशे के लिए गांजे के किए जाने वाले उपयोग से आप अनभिज्ञ नहीं होंगे
मुझे प्राय: यह अत्यंत असाधारण लगता है कि यह अद्वितीय वनस्पति उत्पाद यूरोप में सामान्य उपयोग में नहीं लाई जाती है क्योंकि कई अवसरों पर आपके पास इनका कोई विकल्प नहीं होता है
गर्म होने पर यह द्रव रूप में हो जाती है तथा ठंडी होने पर जमकर यह कठोर हो जाती है मैं आपको डामर के दो नमूने भेज रहा हूँ
परिशिष्ट १ स्रोत अध्याय १ . 'बनारस में ब्राह्मण वेधशाला' सर रॉबर्ट बार्कर द्वारा लिखित है जो फिलोसोफीकल ट्रांजेक्शन इन रॉयल सोसायटी लंदन ( खंड-६७ , वर्ष १९६७ पृ . ५९८-६०७ ) में 'बनारस में ब्राह्मणों की वेधशाला विषयक' शीर्षक से छपा था
अध्याय ४ . कर्नल टी . डी . पीयर्स द्वारा लिखित 'ऑन द सिक्स्थ सेटेलाइट ऑफ सेटर्न' लंदन की रॉयल सोसायटी के संग्रहालय में ए . पी . ५/२२ उपलब्ध है
यह एक पत्र के रूप में है जो कर्नल टी . डी . पीयर्स ने इस सोसायटी के सचिव के नाम लिखा था
अध्याय ६ . एच . टी . कोलब्रुक द्वारा लिखित 'हिंदु बीजगणित' उनके १८१७ के लघुशोघ प्रबंध 'ब्रह्मगुप्त एवं भास्कर के संस्कृत ग्रंथों से अंकगणित एवं क्षेत्रमिति के साथ बीजगणित' नाम से पहली बार प्रकाशित हुआ
अध्याय ८ . 'ईस्ट इंडीज में चेचक की टीकाकरण पद्धति का लेखाजोखा' जे . जेड . हॉलवेल , एफ . आर . एस . द्वारा इसी शीर्षक से १७६७ में प्रकाशित किया गया
उसमें इसका शीर्षक था , 'हिंदुस्तान की संस्कृति में सन या सन के पौधे की उपयोगिता: हिंदुस्तान के कागज के निर्माण की पद्धति के संबंध में लेखाजोखा'
अध्याय १२ . कर्नल अलैक्जेंडर वॉकर द्वारा लिखित 'भारतीय कृषि' मलबार एवं गुजरात की कृषि पर वर्ष १८२ में किये गये बृहद् और व्यापक कार्य से लिया गया है जो स्कॉटलेंड के राष्ट्रीय पुस्तकालय में 'वॉकर एवं बाऊलेंड दस्तावेजों" १८४ ए . ३ ( पृ . ५७७-६५४ ) के रूप में है
' अध्याय १६ . मद्रास के सहायक महासर्वेक्षक कैप्टन जे . कैम्पबेल द्वारा लिखित 'दक्षिण भारत में लोह सलाख का निर्माण' १८४२ के आसपास लिखा गया था
' अध्याय १६ . मद्रास के सहायक महासर्वेक्षक कैप्टन जे . कैम्पबेल द्वारा लिखित 'दक्षिण भारत में लोह सलाख का निर्माण' १८४२ के आसपास लिखा गया था
परिशिष्ट २ लेखकों का परिचय सर रॉबर्ट बार्कर ( मृत्यु १७८९ ) कुछ समय के लिए बंगाल के सेना प्रमुख रहे
लेकिन मार्च १७८१ में सरकार के साथ उनके सामंजस्यपूर्ण वोट के कारण उन्हें बैरोनेत्सी ( सामंत ) की उपाधि से विभूषित किया गया
कई पदों पर रहने के उपरांत वे सन् १७७० में ग्रीनविच में तत्कालीन रॉयल खगोलशास्त्री मस्केलिन के सहायक नियुक्त किए गए
जॉन ज्ञेफेनिया हॉलवैल ( १७११-१७९८ ) बंगाल के राज्यपाल थे
उनका जन्म १७ सितम्बर १७११ को डबलिन में हुआ
सन् १७३६ से आगे उन्होंने कोलकता में चिकित्सा व्यवसाय आरंभ किया
जॉन ज्ञेफेनिया हॉलवैल ( १७११-१७९८ ) बंगाल के राज्यपाल थे
उनका जन्म १७ सितम्बर १७११ को डबलिन में हुआ
पीयर्स का निधन गंगा के तट पर १५ जून १७८९ में हुआ
जॉन प्लेफेयर ( १७४८-१८१९ ) गणितशास्त्री एवं भू वैज्ञानिक थे
उनका जन्म १० मार्च १७४८ को डण्डी ( स्कॉटलेंड ) के पास हुआ था
तत्पश्चात् उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया
१७८५ में वे एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में गणित के संयुक्त प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए तथा सन् १८०५ में उसी विश्वविद्यालय में प्राकृतिक दर्शन के प्रोफेसर के पद के लिए गणित के पद से मुक्त हुए
सन् १८०७ में वे रॉयल सोसाइटी के फैलो के रूप में नियुक्त हुए
ईस्ट इंडिया कंपनी की चिकित्सा सेना में वे आए तथा उन्होंने मुख्य रूप से मुम्बई प्रेसीडेन्सी में सेवा की
तीस वर्ष भारत में रहकर वे इंग्लैंड चले गए तथा बाद में उन्होंने चिकित्सा का व्यवसाय आरंभ किया | सन् १८१५ में उन्हें लंदन में चिकित्सकों के महाविद्यालय के लाइसेंसिएट के रूप में प्रवेश मिला था
इसी वर्ष उन्होंने चिकित्सा में नाइट्रोमुरैटिक एसिड के उपयोग पर मैडिको चिरुगीकल सोसाइटी के लिए 'ट्रांजेक्शन' विषयक रोचक शोधपत्र लिखकर अपना योगदान दिया
अलैक्जेंडर वॉकर ( १७६४-१८३१ ) ब्रिगेडियर जनरल थे
१७८० में वे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में कैडेट के रूप में नियुक्त हुए
जून १८०२ में वॉकर को बडौदा के राजनीतिक रेजीडेंट के रूप में नियुक्त किया गया
लेखक परिचय श्री धर्मपालजी का जन्म सन् १९२२ में उत्तर प्रदेश के मुझफ्फरनगर में हुआ था
१९३० में ८ वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार गांधीजी को देखा
१९४२ में 'भारत छोडो' आन्दोलन में भाग लिया
१९४९ में वे इंग्लैण्ड , इझरायल और अन्य देशों की यात्रा पर गये
१९५० में वे भारत वापस आये
१९६४-६५ में श्री धर्मपालजी आल इण्डिया पंचायत परिषद के शोध विभाग के निदेशक रहे
१९९३ से जीवन के अन्त तक सेवाग्राम , वर्धा में रहे
१९८६ में उनका स्वर्गवास हुआ
पुत्र डेविड लन्दन में व्यवसायी है , पुत्री रोझविता लन्दन में अध्यापक है और दूसरी पुत्री गीता धर्मपाल हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय , जर्मनी में इतिहास विषय की अध्यापक है
पुत्र डेविड लन्दन में व्यवसायी है , पुत्री रोझविता लन्दन में अध्यापक है और दूसरी पुत्री गीता धर्मपाल हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय , जर्मनी में इतिहास विषय की अध्यापक है
श्री जयप्रकाश नारायण , श्री राम मनोहर लोहिया , श्री कमलादेवी चट्टोपाध्याय , श्री मीराबहन उनके मित्र एवं मार्गदर्शक हैं
गांधीजी उनकी दृष्टि में अवतार पुरुष हैं
१ . विषय प्रवेश परम्परागत रूप से भारतीयों का राजसत्ता अथवा सरकार के प्रति सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप से कैसा भाव होता है ? कुछ अपवादों को छोड़कर भारत के लोग विनम्र , ढीले और सरल होते हैं
१ . विषय प्रवेश परम्परागत रूप से भारतीयों का राजसत्ता अथवा सरकार के प्रति सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप से कैसा भाव होता है ? कुछ अपवादों को छोड़कर भारत के लोग विनम्र , ढीले और सरल होते हैं
एक तो अनेक शस्त्रों की सहायता से और दूसरा नि:शस्त्र
इस दूसरे प्रकार के विरोध का मूल २०वीं शताब्दी में दिखाई देता है और उसका श्रेय महात्मा गांधी को प्राप्त है
इस दूसरे प्रकार के विरोध का मूल २०वीं शताब्दी में दिखाई देता है और उसका श्रेय महात्मा गांधी को प्राप्त है
विद्वानों के एक समूह के अनुसार , गांधीजी को इन हथियारों की प्रेरणा थोरो , टोलस्टोय , रस्किन से मिली
महात्मा गांधी के सविनय कानूनभंग के यूरोपीय अथवा अमेरिकी उद्भव के संबंध में अनेक निवेदन हुए हैं
एक विद्वान के मतानुसार , सरकार की अन्यायपूर्ण सत्ता के विरुद्ध प्रतिकार के कर्तव्य का स्वनिवेदन थोरो के निबन्ध 'रेजिस्टेन्स टु सिविल गवर्नमेन्ट' : Resistence to Civil Government में मिलता है
यह निबंध भारत की सविनय कानूनभंग की क्रांति का आधार बना था
एक अन्य लेखक के मतानुसार गांधीजी थोरो , विलियम लॉयड गेरिसन और टॉलस्टॉय से प्राप्त हुए पाठ को क्रियान्वित करने के लिए सीली के साथ सहमत हुए थे
उसमें अनेकों विद्वान गांधीजी की प्रेरणा को प्रह्लाद अथवा अन्य प्राचीन महानुभावों के उदाहरणों में देखते हैं
धरना , हडताल और देशत्याग ( तमाम सम्पत्ति के साथ जमीन छोड़ देना ) की भारतीय परंपरा का ध्यान रखते हुए दिवाकर इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उनकी मुख्य चिन्ता समुदाय अथवा समूह की नहीं , अपितु व्यक्तियों की और सांसारिक जीवन की थी
और दिवाकर बताते हैं कि भारत के इतिहास में आधुनिक हडताल जैसी दीर्घ समय तक चलनेवाली हडताल का कोई उदाहरण नहीं है
महात्मा गांधी के राजकीय दर्शन के एक विश्लेषक के मतानुसर , असहयोगपूर्ण प्रतिकार की गांधीजी की पद्धति मानवीय स्वतंत्रता पर आक्रमण के प्रतिकार के लिए हुई सामूहिक क्रांति के इतिहास में नई थी
उनके सामाजिक जीवन में यह व्यावहारिक दर्शन था
इस प्रस्तावना के लेखक लिखते हैं : 'सविनय कानूनभंग संबंधी थोरो का निबंध असिंहक आंदोलन के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है
६० वर्ष बाद , महात्मा गांधी के लिये सविनय कानूनभंग राजकीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक क्रांति का एक साधन बन गया था
' काका कालेलकर और आर . पेयने आदि अन्य लेखक भले ही गांधीजी के असहयोग तथा सविनय कानूनभंग के शस्त्रों का भारत की प्राचीनता के साथ कुछ संबंध होना मानते हों , किन्तु कालेलकर को लगता है कि यह महात्मा गांधी का विश्व समुदाय को दिया गया अद्वितीय प्रदान था
यद्यपि कालेलकर को लगता है कि गांधीजी के वतन सौराष्ट्र में त्रागा , धरना और बहारवटिया आदि बातें अमल में थीं और सम्भवत: उनका प्रभाव गांधीजी पर रहा हो
अधिकांश मानते हैं कि , राजा का अर्थ होता है , जो खुश रखता है वह
महाभारत का एक श्लोक जो अनेक बार उद्धृत किया जाता है , स्पष्ट कहता है , 'लोगों को एकत्रित होकर ऐसे क्रूर राजा को मार देना चाहिए जो अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता
प्राचीन समय में अथवा तुर्क या मुगलकाल में राजाप्रजा का जो भी संबंध रहा हो , जेम्स मिल के मतानुसार , सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा अठाहवीं शताब्दी में , भारत में राजा को उसकी प्रजा भययुक्त आदर देती थी
" और गांधीजी भी मानते थे कि , अपने नियम खराब हों या अच्छे उनका पालन करना ही चाहिए , ऐसी एक नई विचारधारा थी
लोग नापसंद कानून नहीं मानते थे
किन्तु असहयोग और सविनय कानूनभंग भारत की ऐतिहासिक परम्परा होने के कारण से ही उनके नेतृत्व में अधिकांशत: उसका व्यापक प्रयोग किया जा सका
ऐसा लगता है कि भारत के परंपरागत इतिहासकारों की अपेक्षा अधिक महात्मा गांधी तथा मिल को भारत में प्रवर्तमान राजा प्रजा के बीच के संबंध की सही जानकारी थी
भारत के इतिहास में बहुत पीछे गए बिना अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी से संबंधित भारत और ब्रिटन के सूत्रों एवं सामग्री की सुव्यवस्थित खोज से महात्मा गाँधी और मिल के मंतव्य की सच्चाई के पर्याप्त प्रमाण मिल सकते हैं
उससे ये भी संकेत मिलते हैं कि सरकार के दमनकारी और अत्याचारी कदम के सामने भारतीयों द्वारा उपयोग में ली जाने वाली सविनय कानूनभंग और असहयोग की पद्धतियाँ प्रमुख थीं
सनदी अन्वेषण से भी सविनय कानूनभंग तथा असहयोग के अनेकों उदाहरण मुखर रूप से बाहर आते हैं
उदा: नवम्बर १८८० के ब्रिटिश गर्वनर और कौन्सिल मद्रास ( अब चेन्नई ) के बीच हुई कार्यवाही में ब्रिटिश शासकों के तानाशाही कदम के विरुद्ध मद्रास पटनम शहर में क्रांतिकारियों ने जो प्रतिकार किया उसको इस प्रकार लिखा गया है : 'शहर में जनता की एक जाति ने अनेक पत्र लिखे , फिर चित्रकार एवं अन्य सेन्ट टॉमस के पास एकत्रित हुए
उदा: नवम्बर १८८० के ब्रिटिश गर्वनर और कौन्सिल मद्रास ( अब चेन्नई ) के बीच हुई कार्यवाही में ब्रिटिश शासकों के तानाशाही कदम के विरुद्ध मद्रास पटनम शहर में क्रांतिकारियों ने जो प्रतिकार किया उसको इस प्रकार लिखा गया है : 'शहर में जनता की एक जाति ने अनेक पत्र लिखे , फिर चित्रकार एवं अन्य सेन्ट टॉमस के पास एकत्रित हुए
उदा: नवम्बर १८८० के ब्रिटिश गर्वनर और कौन्सिल मद्रास ( अब चेन्नई ) के बीच हुई कार्यवाही में ब्रिटिश शासकों के तानाशाही कदम के विरुद्ध मद्रास पटनम शहर में क्रांतिकारियों ने जो प्रतिकार किया उसको इस प्रकार लिखा गया है : 'शहर में जनता की एक जाति ने अनेक पत्र लिखे , फिर चित्रकार एवं अन्य सेन्ट टॉमस के पास एकत्रित हुए
ब्रिटिशरों ने काले पुर्तगालियों ( ब्लैक पोर्ट्जगीझ - block Portugues ) के अधिकदल की भर्ती की और कम विरोधी और अधिक विरोधी समूहों को एक दूसरे के सामने कर दिया
उसके बहुत समय बाद १८३०-३१ में कनारा ( कर्नाटक ) में एक आंदोलन की घटना हुई
उन्होंने कहा कि उन्हें उस के बारे में कोई शिकायत नहीं है , उन्हें सरकार से शिकायत है कि उनपर कार्य , स्टेम्प नियंत्रण , नमक और तम्बाकू का एकाधिकार लगाया गया है उसे वापस लेना चाहिए
वस्तुत: जिस घटना को लेकर लोग हिंसा पर उतर आते थे , वह लगभग सरकार के आंतक का प्रतिकार था
 ? ( किस अवसर पर लोगों ने आतंक की प्रतिक्रिया हिंसक बनकर दी यह स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है
भारतीय शासकों के स्थान पर ब्रिटिश शासन करने लगे ( फिर वह कानून के अनुसार हो अथवा पर्दे के पीछे ) तभी से मूल्यों की ऐसी समानता नष्ट हो गई
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के ब्रिटीश शासकों की नैतिक अथवा मानसिक दुनिया शासितों की दुनिया से सर्वथा विपरीत थी
ब्रिटिश शासन स्थापित होने तक प्रवर्तित 'दमन के विरुद्ध विद्रोह' को जेम्स मिल 'सामान्य चलन' कहता है वह क्रमश: 'सत्ता के समक्ष बिनाशर्त शरणागति' में परिवर्तित होता गया
ब्रिटिश शासन स्थापित होने तक प्रवर्तित 'दमन के विरुद्ध विद्रोह' को जेम्स मिल 'सामान्य चलन' कहता है वह क्रमश: 'सत्ता के समक्ष बिनाशर्त शरणागति' में परिवर्तित होता गया
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में गोपालकृष्ण गोखले के अनुसार 'ऐसा लगता था कि लोग केवल आज्ञा पालन करने के लिए ही जीते थे'
प्रचलित अभिप्राय से विरुद्ध १७८४ के बाद ( यदि उससे पूर्व नहीं है तो ) इस्ट इन्डिया कम्पनी ने भारत संबंधी इंग्लेन्ड में होने वाले निर्णयो में शायद ही कोई बडी भूमिका निभाई थी
बहुत से किस्सों में , भारत के लिए १७८४ के बाद से अति महत्त्वपूर्ण विस्तृत सूचनाओं का प्रथम मसौदा तैयार करने की जवाबदारी बोर्ड ऑव कमिश्नर्स की हो गई
बहुत से किस्सों में , भारत के लिए १७८४ के बाद से अति महत्त्वपूर्ण विस्तृत सूचनाओं का प्रथम मसौदा तैयार करने की जवाबदारी बोर्ड ऑव कमिश्नर्स की हो गई
यह बोर्ड ब्रिटिश संसद में कानून पारित कर बनाया गया था
यह बोर्ड १८५८ तक सावधानी से जवाबदारी निभाता रहा
बंगाल राज्य में ब्रिटिश प्रशासन तंत्र का सर्वोच्च प्रमुख गवर्नर जनरल इन काउन्सिल था जो सरकार के अनेक विभागों की सहायता से काम करता था
१७५० में उसकी रचना भारत के लिए बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स की सूचना के आधार पर की गई थी
रहस्य , राजकीय , सेना , लोक , कर और न्यायिक विभाग ये सभी प्रमुख विभाग थे , जिनका संचालन फोर्ट विलियम ( अर्थात् कोलकता ) से होता था
 ( प्रमुख के रूप में काम करनेवाले कमान्डर इन चीफ गवर्नर जनरल की अनुपस्थिति में ) गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की बैठक सप्ताह में एक निश्चित दिन किसी निश्चित विभाग की कार्यवाही के लिए होती थी और बेठक में उपस्थित उन विभागों के सचिव के द्वारा संबंधित संस्था को बैठक में लिए गए निर्णयों तथा आदेशों की जानकारी दी जाती थी
 ( प्रमुख के रूप में काम करनेवाले कमान्डर इन चीफ गवर्नर जनरल की अनुपस्थिति में ) गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की बैठक सप्ताह में एक निश्चित दिन किसी निश्चित विभाग की कार्यवाही के लिए होती थी और बेठक में उपस्थित उन विभागों के सचिव के द्वारा संबंधित संस्था को बैठक में लिए गए निर्णयों तथा आदेशों की जानकारी दी जाती थी
सामान्य रूप से इन सभी संस्थाओं का प्रमुख काउन्सिल का एक सदस्य रहता था जो सरकार की अनेक व्यापक गतिविधियों का निदेशन और निरीक्षण करता था
जब कि पुलिस निरीक्षण ( सुपरिन्टेन्डन्ट्स ऑफ पुलिस ) तथा कानून और व्यवस्था के निश्चित कार्य जिला न्यायाधीश के रूप में पहचाने जाने वाले एक अलग अधिकारी के पास थे
 ) उस समय ( बंगाल , बिहार , बनारस आदि में ) जिला समाहर्ता का कार्य मुख्य रूप से राजस्व लगाने और वसूलने से संबंधित ही था
सामान्य रूप से , समाहर्ता को बोर्ड ऑव् रेवेन्यू सूचना देता था तथा पत्र व्यवहार करता था
दूसरी और , न्यायाधीश को गर्वनर जनरल इन कॉउन्सिल के न्यायिक विभाग द्वारा सूचना तथा पत्र प्राप्त होते थे
दूसरी और , न्यायाधीश को गर्वनर जनरल इन कॉउन्सिल के न्यायिक विभाग द्वारा सूचना तथा पत्र प्राप्त होते थे
बनारस और संभवत: अन्य जिलों में दो अन्य स्वतंत्र और उच्च सत्ताएँ थीं
बनारस और संभवत: अन्य जिलों में दो अन्य स्वतंत्र और उच्च सत्ताएँ थीं
समाविष्ट किए गए सभी अभिलेख गांधीजी के पहले के असहयोग तथा नागरिक अवज्ञा के आंदोलन के श्रेष्ठ उदाहरण हैं
इस विनियम के अनुसार निवास के सभी मकानों ( मुक्तिप्राप्त श्रेणी के अतिरिक्त ) पर वार्षिक किराये के ५ प्रतिशत तथा सभी दूकानों पर वार्षिक किराये का १० प्रतिशत कर लेने की व्यवस्था थी
मकान किन सामग्रियों के बने हैं इसके साथ कर का कोई लेना देना नहीं था
जिन मकानों अथवा दूकानों को करमुक्ति दी गई थी उनमें सेना के जवानों के मकान , बंगले तथा अन्य इमारतें तथा धार्मिक निवासों तथा खाली मकानों अथवा दूकानों का समावेश होता था
कर प्रति माह एकत्रित किया जाता था
फिर भी , यदि कुछ रकम बाकी रह जाए तो उस बाकी रकम को मालिक के स्थायी ( अचल ) सम्पति तथा चीजें बेचकर वसूला जाए
योगानुयोग उस समय समाहर्ताओं को मिलनेवाला ऐसा कमिशन असाधारण नहीं माना जाता था
इस कर से कुल अनुमानित आय एक पूरे वर्ष में रु . ३ लाख थी
उस समय लादे गए विभिन्न नए अथवा अधिक कर से प्राप्त होने वाली कुल अपेक्षित आय में यह कर १० प्रतिशत हो ऐसी ही अपेक्षा थी
१८१०-११ की बंगाल राज्य की कुल कर आय ( रु . १० . ६८ करोड ) के अनुपात में - जिसका अधिकांश हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र से प्राप्त होता था - मकान कर की राशि नगण्य थी
किन्तु उस समय लादे गए अन्य करों के अनुपात में - जिसका अधिकांश भार नगरीय क्षेत्र पर पडनेवाला था - यह कर व्यापक विरोध का मुद्दा बन गया
गाँव खाली कर जाने जैसे अंतिम कदम सूचित करते हैं कि शासकों और प्रजा के बीच अंतर बढ़ता गया था और शासक कमजोर पड़ते गए थे
नगारिक अवज्ञा के आधुनिक आंदोलन में हुई हिंसा तथा उसके विरुद्ध काम लेने वाली सत्ता द्वारा हुई प्रतिहिंसा गहन जाँच की अपेक्षा करती है
उस पर टिप्पणी करते हुए माइकल वाल्झर मानते हैं कि 'अमेरिका में भी ऐसा ही होता है'
बनारस की घटनाएं विरोध बनारस से शुरू हुआ
परम्परागत संस्थाए तथा कार्यवाही वहाँ सबसे अधिक विद्यमान थी
इसलिए , इस प्रकार का कर समग्र समाज के अधिकारों पर आक्रमण के समान है , जो न्याय के मूलभूत सिद्धान्तों के विरुद्ध है
२ . साथ ही , यह भी स्पष्ट हो गया कि मकान कर पुलिस के लिए खर्च पूरा करने के लिए ही लगाया गया है
४ . बनारस में लगभग ५० , ००० मकान होगें , जिनमें से १/३ जितने तो हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक स्थल हैं
परिणामस्वरूप जो मकान के किराए पर जी रहे हैं , उनके लिए तो बहुत भारी मुसीबत खड़ी होती है
उस पर स्टेम्प ड्यूटी , कोर्ट फीस , वाहन-व्यवहार और नगर-उपकर दोनों को असर हुआ है
उस पर यह नया कर तो , घाव पर नमक छिड़कने के समान है
उसके साथ आपका उस ओर भी ध्यान खींचना जरूरी है कि उस प्रकार के सतत बढ़ते बोझ के कारण पिछले १० वर्ष में चीज वस्तुओं का भाव १६ गुना बढ़ गया है
कर लागू करने में सर्वप्रथम बनारस के ही सत्ताधीश थे
इसका कारण यह था कि उनके पास प्रशासनिक तथा सैन्य सहारा भी पर्याप्त मात्रा में था और उस दृष्टि से वे बहुत अधिक सुव्यवस्थित और सबल थे
दिनांक २६ नवम्बर को तो बनारस के समाहर्ता ने , बनारस के न्यायाधीश को मकान कर वसूल करने के लिए उनके निश्चय तथा उस हेतु प्रारम्भ किए गए अंकन के बारे में जानकारी भी दे दी और साथ ही उन्होंने प्रार्थना की कि उस कर के संबंध में सूचना देनेवाली नकलों को अलग अलग थानों में लगा दिया जाए
दिनांक २६ नवम्बर को तो बनारस के समाहर्ता ने , बनारस के न्यायाधीश को मकान कर वसूल करने के लिए उनके निश्चय तथा उस हेतु प्रारम्भ किए गए अंकन के बारे में जानकारी भी दे दी और साथ ही उन्होंने प्रार्थना की कि उस कर के संबंध में सूचना देनेवाली नकलों को अलग अलग थानों में लगा दिया जाए
समाहर्ता के उस पत्र का दिनांक ११ दिसम्बर को ही न्यायाधीश ने उत्तर भिजवा दिया था और सूचित किया था कि उस प्रकार की सूचनाएँ दी जा चुकी हैं
फिर भी उन्होंने क्लेक्टर को यह भी आश्वासन दिया था कि जिस किसी मकानमालिक के द्वारा आपके अधिकारियों को नियमानुसार कर्तव्यपालन में कोई अवरोध उपस्थित किया जाएगा तो ऐसी सूचना आपसे प्राप्त होते ही मैं पुलिसदल के अधिकारियों को आदेश का अमल कराने में सहायक बनने के लिए निश्चित सूचना तत्काल ही दे दूँगा
इस प्रकार अंकन प्रारम्भ हो गया , किन्तु उसका उतना ही विरोध भी होता रहा
अत: कार्यवाहक न्यायाधीश ने दिनांक २५ दिसम्बर को कोलकता में सरकार को सूचित किया कि : 'मुझे सरकार के माननीय गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को जानकारी देनी है कि विनियम १५ , १८१० अनुसार कर लागू करने की व्यवस्था के प्रति नगर के सभी लोगों में अत्यधिक उत्तेजना और विरोध फैलने से स्थिति गंभीर बनी है
इस प्रकार इस विनियम के प्रति एक व्यापक विरोध और तिरस्कार दिखाई दे रहा है और यदि किसी भी व्यक्ति की ओर से इस साजिश से वापस लौटने का तनिक भी संकेत होने पर उसकी सार्वजनिक निन्दा और तिरस्कार किया जाता है , यही नहीं , तो उसे उसकी जाति से निष्कासित कर देने तक की स्थिति उत्पन्न हुई है
' अधिकारियों के ऐसे अनेकों प्रयासों के बावजूद षडयंत्र कायम था
कोर्ट ऑव अपील और कोर्ट ऑव सर्किट के न्यायाधीश का बनारस के राजा और स्थानीय समाज के अग्रणियों पर अच्छा प्रभुत्व था
सरकार का आदेश नहीं आता तब तक लोगों ने नगर छोड़ कर किसी एक स्थान पर इकठ्ठा होकर वहीं बने रहने का निर्णय कर लिया है , मेरे या स्थानीय अधिकारियों की ओर से दिए जानेवाले किसी भी आश्वासन का जरा भी असर नहीं दिखता है
' दिनांक ४ जनवरी तक परिस्थिति शांत होती गई और कार्यवाहक न्यायाधीश अपने द्वारा उठाए गये कदमों से जैसे कि , लोहारों को वापस बुलाने के लिये जमीदारों पर डाले गये दबाव और अन्य 'अग्रगण्य नागरिकों की ओर से मदद' से खुश था
फिर भी , उसे लगता था कि , "परन्तु सानुकूल लगनेवाली इस स्थिति पर अधिक विश्वास रखना उचित नहीं है , क्योंकि धार्मिक नेता और अन्य गणमान्य लोग अभी भी अपने इरादे में अविचल लगते हैं
ये लोग जनमानस को भ्रमित कर , समझाकर उकसा रहे हैं
प्रत्येक जाति के अग्रणी को उनके समूह से कोई भी इस संगठन से पीछे हटता दिखाई देने पर उसे जाति से निष्कासित करने के लिये बाध्य किया जाता है
उन्होंने प्रान्त के हर गांव में धर्मपत्री पहुँचाने के लिए खास दूतों की नियुक्ति की , और प्रत्येक परिवार से एकएक व्यक्ति को बनारस भेजने का सन्देश दिया
धार्मिक नेता धर्मभीरु लोगों पर के अपने प्रभाव से उन्हें एकजुट रखने का प्रयास करते थे
सरकार का मानना था कि कर हटाने के लिए होनेवाले दंगे और आंदोलन के सामने घुटने टेकना सामान्य नीति के सिद्धान्त की दृष्टि से बहुत ही बेतुका माना जाएगा
इसलिए कार्यवाहक न्यायाधीश द्वारा उठाए गए कदम को उचित मानते हुए सरकार द्वारा पत्र में और भी स्पष्टता की गई कि , 'यद्यपि इस प्रसिद्धि के साथ लोगों को यह भी बता देना चाहिए कि सरकार के निर्णय अथवा आदेशों का अब इसके बाद कोई भी विरोध करेगा तो गंभीर खतरा या आपत्ति को निमंत्रण देगा
सरकार के इस कदम के समाचार सेना के अधिकारियों के साथ मंत्रणा करने के बाद और उचित व्यवस्था करने के उपरान्त लोगों को पहुँचाए जाएँ
स्थिति की गंभीरता विषयक २ जनवरी का रिपोर्ट प्राप्त होने पर सरकार ने ७ जनवरी को सैन्यबल का किस प्रकार उपयोग किया जाए इस संबंध में सूचनाएँ भेजीं
इसके साथ सरकार के घोषणापत्र में बताया गया था कि न्यायाधीश और समाहर्ता को कर्तव्यपालन में सहायता करने के लिए सेना के ऑफिसर कमान्डिंग को आदेश दे दिया गया है
जनवरी ७ , इस घोषणापत्र के प्रसिद्ध करने की तारीख , से जनवरी ११ के बीच ( इंग्लैण्ड के निदेशक सत्ताधीशों को १२ जनवरी १८११ को लिखे गये राजस्व पत्र के अनुसार ) गंभीरता से विचारणा करने पर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को लगता था कि इस कर में कुछ सुधार करने की आवश्यकता है
जो सुधार उस कर के अमल से , जिन पर इस कर का सर्वाधिक असर पड़ सकता है ऐसे लोगों की स्थिति का विचार कर इस सुधार के संबंध में सोचा गया है
बनारस की जनता द्वारा प्रस्तुत किए गए आवेदन को सरकार के दिनांक ५ जनवरी के आदेश द्वारा सर्वथा अस्वीकृत कर दिया गया है , यह समाचार बनारस की जनता को दिनांक १३ जनवरी को प्राप्त हुआ
फिर भी ऐसे लोगों को सरकार का सदाशय क्या है यह भी समझाने की संभावना भी नहीं है
उन्हें तो , सबसे अधिक चिन्ता , अधिक दलों के आने की थी 'जिससे वे सरकार के आदेशों का अमल कर सकें'
उसने आगे कहा , 'मेरा दृढ़ मत है कि राज्यसत्ता की अवमानना करने की यही स्थिति यदि बनी रहती है तो प्रजा को देश की सरकार के प्रति जो आदर की भावना होनी चाहिये वह दिनप्रतिदिन कम होती जाएगी
 ) ' इसी पत्र में उन्होंने और भी स्पष्ट किया कि: सरकार के विनियम १५ , १८१० को चालू रखने के प्रस्ताव की जानकारी होते ही अत्यन्त आपत्तिजनक और उत्तेजनापूर्ण पर्चे मुहल्लों में वितरित होने लगे
मैंने ऐसे पर्चे प्राप्त करके देने वाले लोगों को ५०० रुपये का इनाम घोषित किया है
इस प्रकार सत्ताधीशों के द्वारा किए गए अमाप प्रयासों के कारण जनता की एकता और विश्वास क्रमश: टूटते गए
जो यह भी नहीं कर सकते उन्हें अपनी शक्ति के अनुरूप इस अभियान के लिए योगदान देने के लिए बताया गया है जिससे जो ( कोलकता ) जाना चाहते हैं उनके खर्च में सहायता हो
इस आवेदन की शैली और मायना अवमाननायुक्त है
यद्यपि जनता झुक अवश्य गई थी , फिर भी परिस्थिति सामान्य से कहीं भिन्न थी
कार्यवाहक न्यायाधीश की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए , सरकार दिनांक ८ फरवरी को , जनता द्वारा स्वीकार की गई ताबेदारी को अत्यन्त संतोषपूर्वक स्वीकार करती है और न्यायाधीश की कार्यवाही का समर्थन करती है
फिर भी सामान्य माफी विषयक न्यायाधीश के सुझाव को अस्वीकार्य करते हुए सरकार ने बताया था कि , "राजद्रोही और अन्यायपूर्ण आचरण करनेवाले बनारस के लोगों को आम माफी देना मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को उचित नहीं लगता है
उल्टे उनका तो मत ऐसा है कि इस प्रकार का आचरण भविष्य में फिर से न हो इसलिये इन अपराधियों को ऐसा उदाहरण रूप दण्ड देना चाहिये कि और कोई इस प्रकार का आचरण करने का साहस न करे
पहले के सुधार के साथ यह आदेश , एक सप्ताह बाद , दिनांक २३ फरवरी को न्यायाधीश ने बनारस के राजा और अग्रगण्य निवासियों को भेज दिया था
प्रारंभ में मैने मेरे अधिकारियों को सभी मालिक तथा किराएदारों , जिनके मकान का निर्धारण हो चुका है , उसकी विस्तृत जानकारी लाने के लिए कहा
इसके लिए एक नोट भेजा जिसमें प्रत्येक मकान के किराए की दर और निश्चित की गई कर की राशि की जानकारी का पत्रक तैयार करने के लिए कहा
इस प्रकार , सहयोग न देने की मनोवृत्ति ( जनता की ) तो फरवरी के प्रारम्भ में ही स्पष्ट हो गई थी
निवासियों का अंतिम आवेदन सरकार को भेजते हुए न्यायाधीश ने बताया , 'मुझे लगता है कि वे लोग जिस मुद्दे और उसके लिए उठाए गए कदम के संबंध में आपत्ति कर रहे हैं वह सरकार के व्यवहार के बारे में है , कर निर्धारण या उसकी वसूली से संबंधित नहीं है
बनारस के समाहर्ता ने , दिनांक २ जनवरी के पत्र में बताया था कि अन्य शहरों के निवासी भी बनारस की घटनाओं को देख रहे थे
पटना के न्यायाधीश ने भी दिनांक २ जनवरी को नगर के नागरिकों द्वारा प्रस्तुत किये गये कर के विरुद्ध के आवेदनों को सरकार के प्रति भेज दिया था
सरकार ने दिनांक ८ जनवरी को ( न्यायाधीश को ) लिखित उत्तर दिया कि ये आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए हैं
पटना के न्यायाधीश ने भी दिनांक २ जनवरी को नगर के नागरिकों द्वारा प्रस्तुत किये गये कर के विरुद्ध के आवेदनों को सरकार के प्रति भेज दिया था
' ऐसा मंतव्य रखने के बावजूद सरकार ने इस प्रकार के निर्देश दिये , 'फिर भी वास्तव में ऐसी आत्यंतिक स्थिति का निर्माण होता है ( अथवा सेना को बुलाना पड़ता है ) तो आवश्यकतानुसार दीनापुर से सैन्य सहायता प्राप्त करें , ताकि स्थानीय अधिकारियों को विनियम के अनुसार अपनी कार्यवाही निभाने में सहायता प्राप्त हो
' शहर छोड़ देने की उनकी मनोवृत्ति प्रबल बनती दिखी इसलिये उसने लिखा , 'इस आवेदन की भाषा आपत्तिजनक लगने पर भी उन्हें आपके पास पहुँचाना मैं मेरा कर्तव्य समझता हूं' और 'इसके बदले में , जो महाजन अपने मकान छोड़कर खेतो में रहने चले गए हैं , उन्होंने निवास स्थानों में वापस लौटने का वचन दिया है'
अपने रिपोर्ट के समापन में न्यायाधीश ने बताया कि , 'उस मकान कर से उत्पन्न असंतोष के संबंध में , मुझे कहना ही पडे़गा कि यह बहुत गहरा और बहुत ही व्यापक है
' यद्यपि , वास्तव में तो , मुर्शिदाबाद के न्यायाधीश को डर था ऐसा कोई दंगा भड़का नहीं था , परन्तु भागलपुर की घटनाओं के दौरान भी देखा गया था उस प्रकार ७ महीने बाद भी कर वसूल नहीं किया जा सका था
भागलपुर की घटनाएँ भागलपुर में तो इस कर के विरुद्ध असाधारण विरोध हुआ था
कल सरकारी अधिकारी कुछ प्रगति नहीं कर सके और उसी शाम मैं जब मेरे केरेज में निकला तब कुछ हज़ार लोग रास्ते के दोनों ओर खडे़ दिखाई दिए , यद्यपि ये लोक किसी भी प्रकार के उत्पात अथवा ऊधम नहीं मचाते थे , किन्तु अपनी परिस्थिति का वर्णन कर जोर शोर से कर भरने के संबंध में अपनी असमर्थता दर्शा रहे थे
इससे कुछ समय के लिए कर वसूली स्थगित करने के लिए समाहर्ता को सूचना देना उन्हें अधिक उचित लगा
समाहर्ता को न्यायाधीश की यह सूचना अपने कार्य में हस्तक्षेप के समान लगी और ऐसा लगा कि कुछ गैरकानूनी तत्त्वों के एकत्रित होने से ही , वे सत्ता के मूल में प्रहार करने के लिए तैयार हुए हैं
सरकार को उसकी रैयत पर सत्ता जमानी ही चाहिए , इसलिए उन्होंने सरकार का मार्गदर्शन भी मांगा
इसलिए उन्होंने न्यायाधीश को आदेश दिया कि उन्हें दिए गए आदेश तत्काल निरस्त करें और वह भी पूर्णत: सार्वजनिक रूप में बताएँ
मुझे मुंह और सिर पर घाव लगे हैं और यदि मैं मि . ग्लास के मकान में भाग नहीं गया होता तो मुझे बचाने वाला कोई भी नहीं था
तो भी कथित तथ्य की साहजिक अस्पष्टता कोलकता स्थित सरकार को स्वीकार्य नहीं थी
उन्होंने तो , कर वसूली के समय उनके ऊपर हुए हमले के संबंध में समाहर्ता ने जो जानकारी दी थी उसे ही सही मान लिया और दिनांक ११ अक्टूबर को उन्हें पहले भेजे गए आदेश को अपनाते हुए एक विस्तृत प्रस्ताव बना लिया , और न्यायाधीश को निलम्बित कर दिया क्योंकि सरकार को लगा कि यदि न्यायाधीश ने मकान कर वसूलने में व्यस्त समाहर्ता को पर्याप्त सहायता भेजी होती और आम शांति बनी रहे इस हेतु से सावधानीपूर्वक कदम पहले से ही उठाये गये होते तो , भागलपुर के स्थानीय निवासियों ने समाहर्ता के प्रति ऐसा अपमानजनक और आक्रामक कृत्य , जो उन्होंने अपने पत्र में बताया था , किया ही न होता , इतना ही नहीं , तो सरकार ने दिनांक २९ अक्टूबर , १८११ को इंग्लैन्ड को लिख भेजा कि न्यायाधीश के पद को संभालने के लिए वहां से , एक अधिक समर्थ और कार्यप्रवण व्यक्ति को भेज दें , साथ ही ऐसी भी इच्छा व्यक्त की कि 'वह व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो कर वसूली के लिए कृतनिश्चयी हो'
अंतत: सरकार ने उस समय , भागलपुर में कर वसूल करने में समाहर्ता और उनके अधिकारियों को सहायता करने के लिए तथा पुलिस को भी सहायता करने के लिए , अतिरिक्त सेना की पलटन भेजना उचित माना
सरकार का यह प्रस्ताव सार्थक नहीं हुआ , क्योंकि भागलपुर में इस आदेश को पहुंचने से पूर्व वहाँ शांति स्थापित हो गई थी
समाहर्ता सरकार की सत्ता को प्रभावी रूप में स्थापित करने के लिए अथक परिश्रम की आवश्यकता है ऐसा मानते थे जब कि न्यायाधीश , जो वास्तव में पुलिस और सेना के कार्य के लिए उत्तरदायी थे वे शांतिमय और अपेक्षाकृत कम उग्र मार्ग पसंद करते थे
भागलपुर की जनता की दिनांक २२ को हुई सभा के विषय में न्यायाधीश ने दिनांक २४ को रिपोर्ट भेजा , 'यद्यपि इतने से काम न चलने से मैं हिल हाउस पहुंचा और शाहजंगी पर एकत्रित लोगों को बिखेरने के लिए अधिक ट्रूप भेजा
तब बताया गया कि वे वहाँ पर किसी अन्त्येष्टि के लिए एकत्रित हुए थे
उन्हें गोली चलने का कोई डर नहीं था
इसलिए उन्होंने न्यायाधीश को सलाह दी कि जब वे लोग आपको आवेदन देने आएँ तो आवश्यक पूरा सैन्य दल उस समय वहाँ उपस्थित ही रखें , अथवा इन लोगों को वहाँ आने ही न दें
इसके साथ ही उन्होंने आसपास के जिलों के न्यायाधीशों को लिखा कि 'उनके जिलों से भागलपुर की ओर आनेवाले १० से अधिक लोगों के समूह को रोकें और सन्देहास्पद लगनेवाले स्थानीय लोगों के प्रत्येक संदेश व्यवहार को भी रोककर वापस भेजें'
इस शांति स्थापना के तत्काल बाद ही कुछ गलतफहमी फैलने लगी थी
सरकार को भी लगा कि यूरोपीयों से इस प्रकार का कर वसूलना उचित नहीं है इसलिए सरकार ने जिले में रहनेवाले यूरोपीयों से कर वसूल न करने की बात कही
जनवरी १८१२ में जानकारी दी गई कि भागलपुर में निवास करनेवाले यूरोपीयों ने यह कर भरने से इन्कार किया था
यह निरस्त करने वाला विनियम दिनांक ८ मई , १८१२ को विनियम ७ , १८१२ के रूप में पारित किया गया था
जिन वस्तुओं से स्थायी और अधिक कर मिल सकता है ऐसी वस्तुओं पर कर लगाने का एक विस्तृत ढांचा बना सकते हैं
इस परिच्छेद में और भी बताया गया था , 'परन्तु यदि बदल नहीं किए जाते तो यह कर स्थानीय प्रजा में अत्यन्त विपरीत भाव और पूर्वाग्रह निर्माण कर देता
परन्तु असन्तोष और घृणा इस कर के लागू होने से बहुत वर्षों पूर्व से उभर रही थी
बनारस , भागलपुर , मुर्शिदाबाद आदि स्थानों का जनसमाज सरकार के करतूतों के प्रति आशंकित होने लगा था
मुर्शिदाबाद के लोगों को यह एक 'नया अत्याचार' लगा था
२ . लोग हजारों की संख्या में 'धरना' के लिये निरन्तर इकट्ठे होते थे
 ( एक अनुमान से तो कई दिनों तक यह संख्या २ , ०० , ००० थी ) 'उन्होंने घोषित किया था कि जब तक कर वापस नहीं लिया जाएगा , वे हटेंगे नहीं
' ३ . विभिन्न कारीगरों और दस्तकारों ने अपने अपने व्यावसायिक संगठनों का संकलन कर प्रतिरोध की योजना बनाई थी
७ . 'बनारस के सम्मेलन में शामिल होने के लिये परिवार से कम से कम एक व्यक्ति ने आना चाहिये ऐसी धर्मपत्री का प्रदेश के सभी गांवों में वितरण करने के लिये दूत भेजे गये थे
' ८ . 'आन्दोलन जारी रखने के लिये और जिनका निर्वाह दैनन्दिन रोजगारी पर चलता था उनके परिवारों की सहायता के लिये हर जाति के हर व्यक्ति ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान दिया था
' ९ . लोगों की एकमति बनाये रखने के लिये संतों ने भी अपने प्रभाव का उपयोग किया था
१० . समूह इतना सर्वसमावेशी था कि उससे अलग होने की इच्छा करनेवाले को अपमान और डांटडपट होने से पुलिस भी बचा नहीं सकती थी
न्यायाधीश के मतानुसार ये फलक 'अत्यन्त आक्षेपार्ह और भड़काऊ' थे
इस पद्धति से विरोध करना इस बात का संकेत था कि उनमें और राज्य की सत्ता में कोई दुश्मनी नहीं थी
 , शासक और शासित के सम्बन्धों की जिस संकल्पना को लेकर वे जी रहे हैं , और आज भी उनके मानस में अवस्थित है वह तो दोनों के बीच में निरन्तर आदान-प्रदान की थी
बहुत विलम्ब से भारत के लोगों को समझ में आया की विरोध की इस पारंपरकि पद्धति का अवलम्बन करना व्यर्थ है क्योंकि जिन के प्रति यह विरोध किया जा रहा है वे सर्वथा भिन्न और अपरिचित मूल्यों के लोग हैं और भारत के लोगों और इन में कोई समानता नहीं है
पटना , सरन , मुर्शिदाबाद ( भले ही कम तीव्र ) और भागलपुर की घटनाओं और बनारस की घटनाओं में पूर्ण समानता है
जिस प्रकार लोगों ने अपने आप को संगठित किया , जिन उपायों का उन्होंने अवलम्बन किया , अपनी एकता बनाये रखने के लिये जो योजना बनाई और जिस आधारभूत तर्क से आन्दोलन का जन्म हुआ - वह सब दोनों समय में एक ही था
महात्मा गांधी ने जब विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों को उठाया तब उनके असहयोग और नागरिक अवज्ञा का व्यापक प्रसार और आत्यन्तिक सफलता का एक कारण तो यह हो सकता है कि बीसवीं शताब्दी के अंग्रेज शासक अपेक्षाकृत सहृदय और विचारशील हुए थे
स्वयं गांधीजी के व्यक्तित्व का प्रभाव भी एक कारण हो सकता है जिससे प्रेरित होकर अनेक अंग्रेज अधिकारी सोचने लगे थे और निजी वार्तालापों में बोलने लगे थे कि उनके शासन ने भारत को कितना नुकसान पहुंचाया था
परन्तु निस्सन्देह रूप से एक बात तो प्रस्थापित होती ही है कि अन्याय के विरुद्ध असहयोग और नागरिक अवज्ञा का अवलम्बन करना भारत की परम्परा में है
प्रजा और सरकार के आपसी सम्बन्धों के क्षेत्र में तो इसकी निर्णायक भूमिका है और आज भी भारतीय राजनीतितन्त्र निर्विघ्न और निर्बाध चलने के लिये तथा उसके स्वास्थ्य के लिये इन दोनों तत्त्वों की विधायक अनिवार्यता है
अभिलेखों में स्पष्ट दिखता है कि १८१०-११ में सत्ताधीश बार बार कह रहे हैं कि लोगों ने 'जन अधिकारियों के प्रति बिना शर्त अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिये' , 'सरकार ने लोगों की मांग या आपत्ति के प्रभाव में आकर झुकना नहीं चाहिये' , सरकार को यदि झुकना ही पड़ता है तो वह 'सरकार की सत्ताशीलता के साथ अत्यन्त स्पष्ट रूप से समझौता किये बिना' होना चाहिये
वह लिखता है , 'मेरा दृढ़ मत है कि राज्यसत्ता की अवमानना करने की यही स्थिति यदि बनी रहती है तो प्रजा की देश की सरकार के प्रति जो आदर की भावना होनी चाहिये वह दिनप्रतिदिन कम होती जाएगी
दूसरा , महात्मा गांधी के प्रयासों के बावजूद भारत के सर्वजनसमाज में साहस और विश्वास समान रूप से परिलक्षित नहीं होता है
अथवा कदाचित बनारस के लोगों की तरह एक बार दबा दिये जाने के बाद प्रज्वलित ज्योति पुन: शान्त हो जाती है उसी तरह 'उदास शान्ति' में डूब जाते हैं क्यों कि उन्हें लगता है कि भले ही वे 'प्रतिरोध नहीं कर सके तो भी वे सम्मत नहीं होंगे
कुछ का मत है कि सर्वस्वीकृत प्रतिमानों के सन्दर्भ में ही इनका अवलम्बन मान्य करना चाहिये
इसका अत्यधिक उग्र और बहुचर्चित विरोध श्री आर . पी . परांजपे ने दिसम्बर २६ , १९२४ के लखनऊ के इण्डियन नेशनल लिबरल फैडरेशन के अध्यक्षीय भाषण में किया
इसका अत्यधिक उग्र और बहुचर्चित विरोध श्री आर . पी . परांजपे ने दिसम्बर २६ , १९२४ के लखनऊ के इण्डियन नेशनल लिबरल फैडरेशन के अध्यक्षीय भाषण में किया
श्री परांजपे ने कहा , 'अर्धशिक्षित लोगों के मानस में राष्ट्रभक्ति के श्रेष्ठ प्रकार के रूप में जिस नागरिक अवज्ञा की संकल्पना प्रस्थापित की जा रही है वह वर्तमान अन्तिमवादी प्रचार का अत्यन्त उत्पाती स्वरूप है
यह स्मरण में रखना आवश्यक है कि 'महात्माओं' , 'मौलवियों' और 'देशबन्धुओं' की कल्पनाएँ साकार हो जाने के बाद भी जनमानस में कानून और व्यवस्था के प्रति अनादर का भाव बना ही रहेगा
परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया और महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रवाद के एक मात्र प्रतीक बन गये , इस प्रकार के विरोधों की मुखरता कम होती गई
कुछ व्यक्तियों के कुछ विशेष रूप में होनेवाली इन तत्त्वों की अभिव्यक्ति के लिये असहमति होने पर भी १९३० के मध्य से असहयोग और नागरिक अवज्ञा अन्याय का प्रतिकार करने की भारतीय पद्धति के रूप में प्रस्थापित हो गये
सत्याग्रह को नकारने का अर्थ होगा दीर्घकाल तक आपखुदी की अप्रतिरोधात्मक अधीनता
के . सन्तानम् के अनुसार कुछ खास अपवादात्मक किस्सों को छोड़ 'लोकतान्त्रिक सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह न्यायोचित नहीं है
' परन्तु सन्तानम् जैसे लोगों को भी अपने मूलभूत अधिकारों की रक्षा हेतु विशिष्ट परिस्थिति में व्यक्तियों द्वारा सत्याग्रह का अवलम्बन करने की आवश्यकता महसूस होती है
अभी अभी मार्च १९६७ में ही उन्होंने कहा , 'लोकतन्त्र में भी सत्याग्रह और असहयोग को विधिसम्मत शस्त्र माना जाना चाहिये बशर्ते उनका प्रयोग शेष सारे उपाय नाकाम हो जाने के बाद अन्तिम आलम्बन के रूप में हो
' इस प्रकार , १९२० के दशक से वर्तमान विरोध तत्त्वत: भिन्न स्वरूप का है
एक ओर अधिकार के पदों पर और जिम्मेदारी निभानेवाले लोग असहयोग और नागरिक अवज्ञा को बहुत पसंद नहीं करते हैं तो दूसरी ओर भारत में इसे व्यापक मान्यता प्राप्त होने लगी है
श्री के . सन्तानम् का विचार है कि 'लोकतांत्रिक शासकों को समझना चाहिये कि सही रूप में सत्याग्रह सही रूप के लोकतन्त्र के लिये पूरक है
अपने अवलोकनों का निहितार्थ क्या हो सकता है इसकी पूर्ण जानकारी के बिना ही यू . एन . ढेबर और के . सन्तानम् ने केन्द्रवर्ती मुद्दे की ओर संकेत किया है
श्री ढेबर के अनुसार , ' ( लोकतन्त्र के सन्दर्भ में ) राज्य या संविधान के मूल को नष्ट करनेवाले कानून अथवा गतिविधि स्थायी होने लगती हैं तभी सत्याग्रह का प्रश्न खड़ा होता है' सन्तानम् के अनुसार लोगों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा हेतु सत्याग्रह त्वरित उपलब्ध शस्त्र है
ब्रिटिश इस प्रकार के विरोध की ओर ध्यान नहीं देते थे इसका मुख्य कारण यह है कि लगभग यहां से जाने तक भी अपने भारत के शासन की वैधता के बारे में उनका मानस निश्चित नहीं था
दूसरी ओर भारत के कुछ हिस्सों में शासितों ने भले ही ब्रिटिशों के शासन को स्वीकार किया हो तो भी स्वयं ब्रिटिशों को शासन करने का अपना न्यायिक अधिकार है ऐसा नहीं लगता था
पूरे के पूरे ब्रिटिश शासनकाल में यह अवैधता की भावना प्रवर्तमान रही
रोबर्ट क्लाईव के अनुसार भारत में ब्रिटिश शासन का मूल सिद्धान्त ' हमारा स्वामित्व और हमारा प्रभाव हमने प्राप्त किया हुआ है अत: उसे बल प्रयोग के द्वारा बनाए रखना चाहिये , देश के राजाओं को भय दिखाकर वश में रखना चाहिये
वे अपना जीवनयापन करने के लिये हमारी चाकरी कर रहे हैं
' मेटकाफ ने आगे लिखा , 'हमारे लिये सब से बड़ा भय रूसी आक्रमण का नहीं है
भारत के लोगों के मन से हमारी अजेयता का भाव शिथिल होने का भय सब से बड़ा है
कुछ मास पूर्व मैटकाफ ने परामर्श दिया था , 'भारतीय जनसमाज का प्रभावशील तबका समान हित और समान भावनाओं के साथ हमारी सरकार में नहीं जुड़ता तब तक भारत में हम जड़ें नहीं जमा सकते , परिणामत: हमारा शासन अत्यन्त असुरक्षित ही रहेगा ऐसा मेरा निश्चित मत है' और उसने 'हमारे देशवासियों को भारत में स्थिरतापूर्वक स्थापित करने में सहूलियत हो इस हेतु से योजनाबद्ध पद्धति से' जो भी हो सकता है वह सब करने का आग्रह किया था
स्थिति का इस प्रकार का आकलन भारत में अवस्थित सभी अंग्रेज समान रूप से करते थे इसलिये वह सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन में परिलक्षित होता था
स्थिति का इस प्रकार का आकलन भारत में अवस्थित सभी अंग्रेज समान रूप से करते थे इसलिये वह सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन में परिलक्षित होता था
राज्य का ढांचा गलत नहीं हो सकता ( इसी प्रकार सत्ता और प्रभाव के अन्य केन्द्र भी ) यह सिद्धान्त ब्रिटिशों द्वारा प्रस्थापित किया गया और ब्रिटिश सत्ता के जाने के बाद भारत में आज भी उसी प्रकार से प्रस्थापित है
शासक और शासित में जितना अधिक सुसंवाद होता है उतनी ही इनके प्रयोग की आवश्यकता कम होती है
इस बात का भी स्वीकार करना चाहिये कि अन्य अनेक उपायों के समान , असहयोग और नागरिक अवज्ञा सब कुछ सुलझा नहीं सकते
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी का कालखण्ड ही उसका उदाहरण है जहां शासक और शासितों के मूल्य समान नहीं थे
केवल महात्मा गांधी की प्रतिभा , अप्रतिहत साहस और अतुलनीय संगठनात्मक कुशलता का ही जादू था कि मूलत: आन्तरिक परिस्थितियों में प्रयोग करने के लिये बने साधनों का प्रयोग उन्होंने विदेशी सत्ता से सामने भी किया
संदर्भ १ . पश्चिम बंगाल राज्य के अधिकृत अभिलेख : बंगाल ज्यूडिशियल क्रिमिनल प्रोसीडिंग्ज फरवरी ८ , १८११ , ओरिजिनल कन्सल्टेशन्स नं . ६ २ . जे . मिल और एच . एच . विल्सन , हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश उन्डिया - ग्रंथ ७ , पृष्ठ ८६७ उसका अर्थ ऐसा तो नहीं ही हो सकता है कि असहकार और सविनय कानूनभंग की जो घटनाएँ १८१०-११ में घटी थीं और जिन्हें हम सत्याग्रह कहते हैं , उन दोनों के बीच कोई अंतर ही नहीं था
१४ . भारत का संविधान अनुच्छेद ८२ विनोबा भावे जैसे जिम्मेदार और कानून के शासन का सम्मान करने वाले व्यक्तियों के मतानुसार भी जिस स्थिति में कानून द्वारा किसी कार्य को उचित ठहराया गया हो अथवा जनसामान्य का अभिप्राय भी उस और हो , परन्तु उसका अमल न होता हो , तब सत्याग्रह का आश्रय लेना उचित कहा जा सकता है
 ( 'सत्याग्रह विचार' पृष्ठ ६५ ) अभी तो , देश में निहित व्यापक भुखमरी और असुरक्षा से अधिक कोई दूसरी स्थिति विवादास्पद ही नहीं है
उसे दूर करने के लिए कानून की सम्मति और तरफदारी तो गणतंत्र के संविधान में ही दी गई है
१८५७ में ४५ , १०८ जितने यूरोपीय सैनिक थे
३ . घटनाओं का अधिकृत वृत्तांत क . बनारस की घटनाएं १ . क . १ बनारस के समाहर्ता का कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र २६-११-१८१० डबल्यू , डबल्यू , बर्ड एस्क . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस महोदय , विनियम १५ , १८१० के तहत बनारस के मकानों और दूकानों पर कर लागू किया गया है उसकी वसूली के लिये आपके सहयोग की अपेक्षा है , जिससे इस कर के विषय में यथासंभव अधिक मात्रा में प्रचार किया जा सके
उस हेतु से मेरा प्रस्ताव है कि और एक या दो सम्माननीय व्यक्तियों को प्रतिनियुक्त किया जाए जो प्रत्येक मोहल्ले के घरों और दूकानों का अंकन करें और ऐसी व्यवस्थित जानकारी एकत्रित करें जिसमें प्रत्येक के किराए की दरों की जानकारी शामिल की जा चुकी हो
मकानमालिक और उसमें रहनेवालों को प्रवर्तमान विनियम लागू करने के संबंध में जरूरी नोटिस पहुँचाने के बाद दिए जाने वाले और वसूल किए गए किराए के बारे में सही जानकारी प्राप्त की जा सकेगी
यदि कोई मकानमालिक की ओर से कोई अवरोध या बाधा उत्पन्न करने की कोई घटना घटेगी तो मैं स्वयं मेरे अधिकारियों के साथ जुड जाउँगा , जिससे मेरी पूर्व सम्मति के बिना वे कोई कदम न उठा लें
सूचित विनियम की धारा ४ जो इस कर के लिए रची गई है और विनियम १० , १८१० के द्वारा इसकी सीमा का निर्धारण हुआ है उस सन्दर्भ में आपसे टाउन ड्यूटी के समाहर्ता द्वारा किये गये सीमांकन से भी मुझे अवगत किया जाए जो अंतिम विनियम की धारा ७ के अनुसार सम्बन्धित सभी को मान्य है
सूचित विनियम की धारा ४ जो इस कर के लिए रची गई है और विनियम १० , १८१० के द्वारा इसकी सीमा का निर्धारण हुआ है उस सन्दर्भ में आपसे टाउन ड्यूटी के समाहर्ता द्वारा किये गये सीमांकन से भी मुझे अवगत किया जाए जो अंतिम विनियम की धारा ७ के अनुसार सम्बन्धित सभी को मान्य है
१ क . २ बनारस के समाहर्ता का कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र ६-१२-१८१० डब्लयू . डबल्यू , बर्ड एस्क . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस महोदय , गत दिनांक २६ के मेरे पत्र के संदर्भ में आपको सूचित कर रहा हूं कि मकानों को क्रमांक देने का काम शुरू कर दिया गया है
 ( यह काम केवल संख्या गिनने के लिए शुरू किया गया है , क्रमांक उस मकान पर लगाना उचित नहीं माना है , क्योंकि ऐसा करने से शायद मकानमालिकों को आपत्तिजनक लगेगा ) बनारस नगर में यह काम श्रीमान मुहम्मद तकी खान नामक एक स्थानिक सज्जन को सौंपा गया है जो कुशल और गणमान्य व्यक्ति है , और विश्वास है कि वह यह काम पूर्ण ईमानदारी पूर्वक तथा सरकार तथा स्थानिक निवासियों को ध्यान में रखकर कर सकेगा
 ( यह काम केवल संख्या गिनने के लिए शुरू किया गया है , क्रमांक उस मकान पर लगाना उचित नहीं माना है , क्योंकि ऐसा करने से शायद मकानमालिकों को आपत्तिजनक लगेगा ) बनारस नगर में यह काम श्रीमान मुहम्मद तकी खान नामक एक स्थानिक सज्जन को सौंपा गया है जो कुशल और गणमान्य व्यक्ति है , और विश्वास है कि वह यह काम पूर्ण ईमानदारी पूर्वक तथा सरकार तथा स्थानिक निवासियों को ध्यान में रखकर कर सकेगा
१ . क . ३ कार्यवाहक न्यायाधीश का बनारस के समाहर्ता को पत्र ११-१२-१८१० डब्लयू . ओ . सेलमन एस्क . समाहर्ता , बनारस महोदय मुझे आपका गत दिनांक २६ तथा अभी दि . ६ के पत्र मिले हैं , जिसकी रसीद सादर भेज रहा हूं
२ . विनियम १५ , १८१० की प्रति नगर के सभी थानों में भेज दी है और थानेदारों को आदेश भी है कि जो कोई भी इस प्रति को पढने समझने के लिए मांगे उसे दें
१ . क . ४ कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस का सरकार को पत्र २५-१२-१८१० जी . डोड्स्वेल एस्क . सरकार के सचिव न्याय विभाग , फोर्ट विलियम महोदय , मुझे सरकार के माननीय गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को जानकारी देनी है कि विनियम १५ , १८१० के अनुसार कर लागू करने की व्यवस्था के प्रति नगर के सभी लोगों में अत्यधिक उत्तेजना और विरोध फैलने से स्थिति गंभीर बनी है
२ . स्थानीय निवासियों ने मुझे सामूहिक रूप से आवेदन दिए हैं
३ . ये सभी आवेदन बनारस को उपर्युक्त विनियम द्वारा लागू किए गए मकानकर से माफी देने के संबंध में दिए गए हैं
उसमें आवेदकों ने कर सह पाने की अपनी असमर्थता का उल्लेख किया है
नगर में अनेक फाटकों पर स्थानिक पहरेदार का निभाव उस वोर्ड के स्थानिक निवासियों द्वारा ही होता है
लगभग १० , २४१ मकानों का अंकन हुआ है
लगभग १० , २४१ मकानों का अंकन हुआ है
प्रवर्तमान अशांति को स्वीकार कर के मैंने उनके मन में अपेक्षा निर्माण की है जो निराशा में परिवर्तित हो कर करनिर्धारण से जो कठिनाई निर्माण हुई है उसे और बढा देगी
१ . क . ५ . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस का सरकार को पत्र २८-१२-१८१० महोदय , दिनांक २५ को मैंने आपको बनारस के निवासियों द्वारा छिडे संघर्ष और सभी निवासियों में उठे आक्रोश की स्थिति के संबंध में सूचना देते हुए पत्र लिखा था जिसमें उसे शांत करने के लिए मैंने जो उपाय सोचे थे उस का भी उल्लेख किया था
२ . गत दिनांक २५ की शाम उपद्रवी लोगों की भीड नगर के विभिन्न स्थानों और सिकरोल के बीच एकत्रित हो गई थी और उन्होंने उपद्रव शुरू किया था
३ . परन्तु दोपहर के बाद संघर्ष की स्थिति फिर से निर्माण हुई
बनारस नगर के लगभग सभी वर्ग के कारीगर लोग अर्थात् लोहार , मिस्त्री , दर्जी , नाई , जुलाहे , कहार आदि एकमत होकर उस संघर्ष में साथ थे और यह संघर्ष ऐसा जोर पकडङता गया कि दिनांक २६ को तो अन्तिम संस्कार करनेवाले लोगों ने भी अपना काम बन्द करने के कारण कई शव बिना दाह संस्कार किए गंगा में बहाए जा चुके थे
बनारस नगर के लगभग सभी वर्ग के कारीगर लोग अर्थात् लोहार , मिस्त्री , दर्जी , नाई , जुलाहे , कहार आदि एकमत होकर उस संघर्ष में साथ थे और यह संघर्ष ऐसा जोर पकडङता गया कि दिनांक २६ को तो अन्तिम संस्कार करनेवाले लोगों ने भी अपना काम बन्द करने के कारण कई शव बिना दाह संस्कार किए गंगा में बहाए जा चुके थे
बनारस नगर के लगभग सभी वर्ग के कारीगर लोग अर्थात् लोहार , मिस्त्री , दर्जी , नाई , जुलाहे , कहार आदि एकमत होकर उस संघर्ष में साथ थे और यह संघर्ष ऐसा जोर पकडङता गया कि दिनांक २६ को तो अन्तिम संस्कार करनेवाले लोगों ने भी अपना काम बन्द करने के कारण कई शव बिना दाह संस्कार किए गंगा में बहाए जा चुके थे
७ . जिले के समाहर्ता अभी अनुपस्थित होने से मुझे ऐसा लगा है कि मैं उन्हें जल्दी से वापस लौटने का परामर्श दूं , क्योंकि यहाँ के स्थानीय कर निर्धारकों को इस संवेदनशील स्थिति में उनके विवेक के आधार पर मुक्त नहीं छोड देना चाहिए
२ . परन्तु मेरे सभी प्रयास विफल रहे हैं
सभी वर्ग के लोग अपने धंधे बंद करके बैठ गए हैं
उससे गरीब प्रजा बहुत दुखी हो गई है
इस प्रकार इस विनियम के प्रति एक व्यापक विरोध और तिरस्कार दिखाई दे रहा है और यदि किसी भी व्यक्ति की ओर से इस साजिश से वापस लौटने का तनिक भी संकेत होने पर उसकी सार्वजनिक निन्दा और तिरस्कार किया जाता है , यही नहीं , तो उसे उसकी जाति से निष्कासित कर देने तक की स्थिति उत्पन्न हुई है
मैंने उनका विरोध शान्त करने के लिए अत्यन्त सुलहकारी व्यवहार करने का प्रयास किया है
मैंने बनारस के राजा को , अग्रणी व्यापारियों को और यहाँ के गणमान्य निवासियों को पत्र लिखकर व्यक्तिगत रूपसे प्रार्थना की है कि वे अपने पद का उपयोग कर लोगों को शांत होकर बिखर जाने के लिए समझाएँ
मैंने अब निर्णय किया और मैंने स्वयं मेजर जनरल मेक्डोनाल्ड से मिलकर लोगों की मानसिकता के बारे में विस्तारपूर्वक समझाया और किसी भी प्रकार की आपातकालीन स्थिति निर्माण होते ही तैयार रहने के लिए सूचित किया
हमने नामदार की रेजिमेन्ट को भेजने का निर्णय किया और मैं आशा करता हूं कि इसे सरकार की मान्यता प्राप्त होगी
१ . क . ६ ( क ) मेजर जनरल मेक्डोनाल्ड का बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र ३१-१२-१८१० महोदय , आज सुबह अपने बीच हुई बातचीत में आपने बनारस नगर के निवासियों में जो रोष व्याप्त है उसकी सूचना दी तथा अपना अभिप्राय भी बताया कि लोगों का रोष और अधिक भडक सकता है और संभवत: हिंसा पर उतर आ सकता है
१ . क . ६ ( क ) मेजर जनरल मेक्डोनाल्ड का बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र ३१-१२-१८१० महोदय , आज सुबह अपने बीच हुई बातचीत में आपने बनारस नगर के निवासियों में जो रोष व्याप्त है उसकी सूचना दी तथा अपना अभिप्राय भी बताया कि लोगों का रोष और अधिक भडक सकता है और संभवत: हिंसा पर उतर आ सकता है
इससे प्रजा की कठिनाई बढ़ गई है
५ . जिन लोगो का यहाँ के लोगों पर प्रभाव है ऐसे अग्रणियों का सहयोग भी मुझे नहीं मिल रहा है क्यों कि उनकी ऐसी इच्छा नहीं है
मुझे जैसी खबर मिली कि आसपास के परगनों से लुहार एकत्रित हो रहे हैं , तत्काल ही मैंने जमीनदारों को , उनके ही उपर आपत्ति आनेवाली है यह समझकर अपने अधिकार का उस उत्पात के विरुद्ध उपयोग करने के लिये बताया
३ . सरकार की ओर से कुछ आदेश आने की अपेक्षा से एकत्रित हुए लोगों में अब थोडी निराशा फैलने लगी है और वे दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं
मेरा मानना है कि अब तक इन लोगों को नगर के कुछ प्रमुख लोगों का समर्थन था जो उन लोगों को ईंधन और अनाज किराना ( घर गृहस्थी का सामान ) प्रदान करते रहे , किन्तु उन लोगों का स्रोत भी खाली होने का आभास होते ही नुकसान के प्रति चिन्तित होने लगे हैं और इस प्रकार के व्यवहार से उनके परिवारों को कितना नुकसान होगा यह उनकी समझ में आने लगा है
४ . परन्तु सानुकूल लगनेवाली इस स्थिति पर अधिक विश्वास रखना उचित नहीं है , क्योंकि धार्मिक नेता और अन्य गणमान्य लोग अभी भी अपने इरादे में अविचल लगते हैं
४ . परन्तु सानुकूल लगनेवाली इस स्थिति पर अधिक विश्वास रखना उचित नहीं है , क्योंकि धार्मिक नेता और अन्य गणमान्य लोग अभी भी अपने इरादे में अविचल लगते हैं
२ . वांछित परिणाम प्राप्त होने की स्थिति अब निर्माण हुई है उसे समझाने के लिए इस मास के प्रारम्भ से जो संकटपूर्ण स्थिति निर्माण हुई थी उसका अधिक सूक्ष्मतापूर्वक वर्णन करूंगा , जो अभी तक मैंने नहीं किया है
नगर के सभी प्रकार के लोग अपने अपने वर्गो में नगर के किसी स्थान पर इकट्ठे हो गए थे , अपने अपने वर्गो में विभाजित हो गए थे , उद्देश्य सिद्ध नहीं होने तक वहां से न हटने की सौगंध उन्होंने खाई थी और दिनप्रतिदिन उनकी संख्या बढ रही थी और संकल्प दृढ होता जा रहा था
जो लोग अनिच्छुक थे उन लोगों को गृहत्याग करने के लिये बाध्य किया जाता था और जो लोग उस संघर्ष में जुडने में ढीलापन दिखाते थे उन को दण्डित किया जाता था
इस प्रकार पूरा संगठन व्यापक बन रहा था
६ . इधर मल्लाहों के उस संघर्ष में जुडते ही नदी पार करने में दोनों ओर के लोगों को भारी कठिनाई का सामना करना पडता था
जल व्यवहार लगभग ठप्प हो गया था
७ . इन दण्डों से तथा घर से दूर रहने से , चीजवस्तुओं के अभाव से लोग थकने लगे और उन्हें अपने प्रयासों की निरर्थकता समझ में आने लगी और संख्या कम होने लगी
न्यायाधीश के बुलाने पर जिले के अन्दरूनी किसी स्थान से मैं कल सायंकाल वापस आया
मुझे बताया गया कि लगभग २० , ००० से भी अधिक लोग धरने पर बैठ गए हैं
उनकी संख्या दिनप्रतिदिन बढ रही है , क्योंकि प्रत्येक समुदाय के अग्रणियों ने अपने बंधुओं को इसके लिए एकत्रित और एक होने के लिए कहा था
उसमें कोई एक पक्ष अथवा वर्ग अधिक उत्साही अथवा अधिक दृढ था तो वे लोहार ही थे
क्योंकि ( उन्हें पक्का विश्वास है ) ऐसे शांत अनाक्रामक दुश्मनों के विरुद्ध घातक शस्त्रों का उपयोग नहीं होगा
लोग कहते हैं कि वे सरकार के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन किसी भी प्रकार से झुकने का उनका मानस नहीं है
एक हथियार के बल पर प्रतिरोध और दूसरा देश छोड देना
देश छोड़ने की बार बार धमकी तो वे दे रहे हैं फिर भी मुझे नहीं लगता है कि वैसा होगा
साथ ही व्यवसाय और कारीगरी के पूर्ण रूप से रुक जाने से , और पूरे देश में उस बंदी का प्रसार होने से आज तक जिनका इस प्रश्न के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसे जमीनधारकों में भी हलचल पैदा हो जाएगी
दु:ख की बात तो यह है कि अश्वसेना सुलभ नहीं थी जो बिना किसी भी प्रकार के कल्लेआम के भीड को बिखेर सके अथवा जहां भीड इकट्ठी हो उसे खदेड सके क्यों कि उनका कोई सरदार या नेता नजर नहीं आता था जिसे बुलाकर व्यक्तिगत रूप से पटाया जा सके
मुझे कुछ विश्वसनीय अधिकार सूत्रों से पता चला है कि पटना के निवासियों ने बनारस के निवासियों को लिख भेजा है कि से उन्हें बहुत मार्गदर्शन मिलेगा
बनारस एक नींव का पत्थर बनेगा जिस पर दूसरे नगर खडे होंगे
२ . गर्वनर जनरल उन काउन्सिल को विनियम १५ , १८१० के तहत नगरों के मकान पर लागू किए गए कर हटाने के लिए कोई उचित कारण नहीं लगता है
उसके साथ काउन्सिलीय महोदय को ऐसा लगता है कि ऐसे दंगे और भीड़ के सामने कर का बली देना उचित कदम नहीं होगा क्योंकि उसे हटाने की कोई सामान्य नीति नहीं बनी है
मान्यवर चाहते हैं कि आप दृढता और धैर्यपूर्वक अब तक जैसे करते रहे हैं वैसे ही करते रहें और समाहर्ता को यह विनियम लागू करने के लिए अपना इस तरह का समर्थन चालू रखें
४ . आवेदकों ने अपने विरोध में बताया है कि उन लोगों को चौकीदारों और फाटकबंदी के सुधार कार्य के खर्च के लिए धन तो देना ही पडता है जो अन्य नगरो में निवासियों को नहीं देना पड़ता
सरकार को लगता है कि विनियम १५ , १८१० के तहत लगाया गया मकान कर कुछ लोगों के लिए भारी पडेगा
इसलिए सरकार का आशय है कि उन्हें पूर्व के कर से मुक्ति देकर , फाटकबंदी कर सरकार के अन्य स्रोत से चुकाया जाए
साथ ही यह भी बताया जाए कि ( सरकार ) अपने विवेक से उचित लाभ या माफी देने के लिए अपने अधिकारों का उपयोग करेगी , परन्तु गवर्नर जनरल उन काउन्सिल गैरकानूनी जमावों के दबाव अथवा उनके आवेदनों अथवा दंगों अथवा शोर मचानेवाली सभाओं या कार्यक्रमों के सामने झुकनेवाली नहीं है
साथ ही यह भी बताया जाए कि ( सरकार ) अपने विवेक से उचित लाभ या माफी देने के लिए अपने अधिकारों का उपयोग करेगी , परन्तु गवर्नर जनरल उन काउन्सिल गैरकानूनी जमावों के दबाव अथवा उनके आवेदनों अथवा दंगों अथवा शोर मचानेवाली सभाओं या कार्यक्रमों के सामने झुकनेवाली नहीं है
५ . आप बनारस के राजा अथवा अन्य अग्रणियों के वर्चस्व एवं प्रभाव का अपने तरीके से अवश्य उपयोग कर सकतें है और लोग जिसमें प्रवृत्त हैं ऐसे दंगे फसाद अथवा राजद्रोह की घटना रोकने या दबा देने के लिए उनकी सहायता ले सकते हैं
उस पत्र में आपको सरकार की उस भावना का भी उल्लेख मिलेगा जिसमें सरकार अनुचित आवेदन देकर उसके निर्णय में अवरोध उत्पन्न करनेवाली भीड ( आवश्यकतानुसार बल प्रयोग द्वारा भी ) तितर बितर करना बिल्कुल उचित समझती है और जरूरत पड़ने पर उसके ( भीड के ) नेताओं को बन्दी बना कर उस अपराध के लिए मुकद्दमा चला सकती है
३ . सरकार के आदेशों एवं विनियमों का पालन करवाने के लिये और स्थानीय अधिकारियों की प्रतिष्ठा सुरक्षित करने के लिये अत्यन्त अनिच्छा से गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को देश के सैन्य बल का प्रयोग करने की विवशता निर्माण हुई है
अत: नामदार गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की सलाह है कि आप तथा समाहर्ता ने मिलकर लोगों को समझाकर या धमकाकर वर्तमान राजद्रोह की गतिविधियों से परावृत्त करने के लिये जो भी सम्भव है वह सब कुछ करना चाहिए और जब तक प्रत्यक्ष हिंसा का आचरण नहीं होता और सेना अथवा नागरिक अधिकारियों पर हमला नहीं होता तब तक सेना ने शस्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहिये
साथ ही आज वहाँ के विभिन्न सरकारी अधिकारियों को भी सरकार के इस प्रस्ताव की जानकारी देना जरूरी है कि मकान कर की व्यवस्था लागू करने का निर्णय हो चुका है
घोषणा की अंग्रेजी , पर्शियन और हिन्दुस्तानी भाषा में नकल भेजने की भी मुझे सूचना मिली है
अब घोषणा प्रकाशित करने तक में जनरल मैकडोनाल्ड ने सैन्यबल कितने समय अथवा अवधि तक रखना उस बात का निर्णय आप अपने विवेक से करेंगें
गवर्नर जनरल इन काउन्सिल के ध्यान में आया है कि बनारस नगर के कुछ लोग इकट्ठे मिलकर भीड जैसे उपद्रव मचाकर उस विनियम का गैरकानूनी रीति से विरोध कर रहे हैं
इसके साथ ही उस प्रांत के ट्रप कमान्डर को भी जरूरी आदेश अलग से दिया गया है कि वे न्यायाधीश तथा समाहर्ता को उनका कर्तव्य निभाने के लिये आवश्यक सहायता करें , खासकर उन्हें उपद्रव करनेवाली अथवा दंगा करनेवाली गैरकानूनी सभाओं को बिखेरने , सभा में भाग लेनेवाले अथवा ऐसे समूहों को मददकर्ता लोगों को गिरफ्तार कर न्यायाधीश के समक्ष खडा करें , और इस प्रकार उन्हें पर्याप्त सहायता करें
२ . आपके पत्र के चौथे अनुच्छेद में आपने बताया है कि 'परन्तु सानुकूल लगनेवाली वर्तमान स्थिति पर अधिक विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि लोगों के धार्मिक नेता अभी भी उनके इरादे में अविचल लग रहे हैं
३ . विनियम १५ , १८१० अनुच्छेद १ के खण्ड ६ में घोषित किया गया है कि सभी धार्मिक भवनों को उस मकान कर से मुक्त रखा गया है
४ . गवर्नर इन काउन्सिल को प्रवर्तमान स्थिति में श्रीमान बाबू शिवनारायण सिंह की प्रशंसनीय सेवा से अत्यधिक प्रसन्नता और संतोष हुआ है
आप उन्हें अवश्य बताएँ कि गवर्नर जनरल ने शिवनारायणसिंह को खिलावत देने का निश्चय किया है , जो कि उन्होंने बाजार में आपूर्ति चालू रखने में और सार्वजनिक शांति की स्थिति बनाए रखने में जो प्रशंसनीय योगदान दिया है उसके पुरस्कार के स्वरूप सरकार की ओर से दिया जाएगा
आप उन्हें अवश्य बताएँ कि गवर्नर जनरल ने शिवनारायणसिंह को खिलावत देने का निश्चय किया है , जो कि उन्होंने बाजार में आपूर्ति चालू रखने में और सार्वजनिक शांति की स्थिति बनाए रखने में जो प्रशंसनीय योगदान दिया है उसके पुरस्कार के स्वरूप सरकार की ओर से दिया जाएगा
उसके लिए स्थानीय अधिकारियों के साथ कोई ढीलापन न हो और लोगों की भावना और स्वमान को ठेस न पहुँचे यह भी देखें , क्योंकि इस समय सरकार के लिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है
२ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल अभी तुरंत तो किराये की वार्षिक उपज निश्चित करने के मत के नहीं हैं , इसलिए उपर्युक्त मकानों को करमुक्ति देने की निश्चित पद्धति भी निर्धारित नहीं हो सकती है
परन्तु मान्यवर यह अवश्य चाहते हैं कि यदि लोग उनके राजद्रोह अथवा अपराधी कृत्यों को स्थानीय अधिकारियों के समक्ष कबूल करने अथवा मान लेने के लिए राजी होते हैं तो उचित करमुक्ति दे दें
३ . उसके साथ आपको यह पत्र समाहर्ता को भी पहुंचाने की सलाह है , जिससे उन्हें निर्धारण के कामकाज के लिए जरुरी मार्गदर्शन मिलेगा
१ . क . १५ . बनारस के समाहर्ता को सरकार का पत्र ७-१-१८११ महोदय , मुझे माननीय गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की ओर से गत दिनांक २ का आपका पत्र मिलने की सूचना देने को कहा गया है और विनियम १५ , १८१० की व्यवस्था लागू करने के संबंध में बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश को आदेश भेजा जा चुका है
कार्यवाहक न्यायाधीश ने इच्छा व्यक्त की है कि सरकार की ओर से जो कुछ अनुदेश हैं वे आपको भेज दिये जाए
आपका आज्ञाकारी जी . डोडस्वेल काउन्सिल कक्ष सरकार के सचिव जनवरी ७ , १८११ राजस्व विभाग १ . क . १६ . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस का सरकार को पत्र १८-१-१८११ महोदय , सरकार के विचारार्थ इसके साथ जरूरी दस्तावेज शीघ्र भेज रहा हूँ
प्रत्यक्ष रूप से ही एक समूह में प्रेसिडेन्सी तक आवेदन पहुँचाने हेतु वे एकत्रित हो गए थे
इस स्थिति में मुझे सरकार का प्रचारपत्र मिला , तब मुझे लगा कि उससे लोगों को गलत तरीके अपनाने से परावृत्त किया जा सकेगा
दूसरी ओर मेजर जनरल मेक्डोनाल्ड मुझे आवश्यकतानुसार समर्थन देने की स्थिति में नहीं हैं ऐसा सोचते थे
४ . मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड की धारणा थी कि लखनऊ से कोई सहायता आ जाएगी परन्तु मुझे जानकारी थी कि छह अथवा आठ दिन में यह संभव नहीं था
आपसे भेंट करने हेतु मैं कल सुबह ८ . ०० बजे श्री ब्रूक के निवासस्थान पर उपस्थित रहूंगा
जनमानस का वर्तमान मिजाज कैसा है; सरकार के निर्णय की घोषणा होने पर भीड क्या करेगी; हमें उसका प्रतिरोध करना चाहिये या भीड को बिखेरना चाहिये और सरकार को पुन: निवेदन करना चाहिये; फाटकबंदी निरस्त होने की जानकारी मिलने पर आपके अभिप्राय में स्थिति कैसी बनेगी; हो सकता है कि फाटकबन्दी निरस्त होने से नगर और उपनगर के अलग पडने की स्थिति न रहने से लोग बिखर कर अपने अपने घर चले जाएँ; या ऐसा न भी हो; घोषणा से पूर्व इसकी जानकारी देना उचित है या नहीं; जो जमाव के छुपे सूत्रधार हैं उनके नाम , वर्णन और अन्य जानकारी चाहिये; क्या उनमें गोसाई भी हैं; हैं तो किस सम्प्रदाय के; क्या राजपूत होंगे; वे अगर होंगे तो गोसाइयों के साथ मिल जाएँगे; इस भीड में मराठे भी होंगे; मुसलमानों की तरह ये भी लडाकू होते हैं और जल्दी हथियार उठा लेते हैं क्या; हो सकता है वे महाराजा अमृतसिंहजी के कहने से निफ्क्रिय रहें; सरकार के आदेश के अनुपालन के विषय में बनारस के राजा का रूख कैसा रहेगा; इस विषय में आपकी क्या राय है
नगरीय और ग्रामीण लोग एकमत और एकजूट हैं
कार्यवाहक न्यायाधीश का मत था कि इन लोगों की विरोध प्रदर्शन के लिए कोई हिंसक गतिविधि अपनाने की पूर्वयोजना नहीं है , परन्तु संभवत: वे सरकार को दमन या हिंसा के लिए उत्तेजित करने का इरादा रखते हैं ताकि सरकार पर अत्याचार करने का आरोप कोलकता उच्च न्यायालय के समक्ष किया जा सके
१ . क . १६ ( ख ) मि . ब्रुक्स के निवासस्थान पर दिनांक १३ जनवरी , १८११ को श्री बर्ड , कार्यवाहक न्यायाधीश बनारस तथा मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड , नगर के कमान्डिग अधिकारी के बीच हुए विचार विमर्श का सारांश जनमानस का सरकार के प्रति मिजाज विधायक नहीं लग रहा है
परन्तु बनारस के राजा से सहायता की अपेक्षा नहीं की जा सकती
मेजर जनरल मि . बर्ड को बताते हैं कि उनके पास अभी स्वयंसेवकों की चार कंपनी सहित , ५०० से अधिक बंदूकधारी नहीं हैं
मेजर जनरल जो कहते हैं उसके विपरीत ही श्री बर्ड बताते हैं
उसका अर्थ यह भी निकलता है कि लोग राजीखुशी से सरकार के प्रस्थापित आदेश को सिर माथे चढा रहे हैं
मि . बर्ड के मतानुसार तो ये लोग वापस लौट कर , कलकत्ता जाने के लिए एकत्रित हो रहे हैं
डब्लयू , ब्रुक जे . डी . एरस्किन डब्लयू . ओ . सेलमन हस्ताक्षर करने के बाद मेजर जनरल ने बताया कि फिर भी श्री बर्ड ऐसा सोचते हैं कि मेजर जनरल के पास जो कुछ बल है वह जब जरूरत हो तब बुलाना है , तो श्री बर्ड ऐसा करें और मेजर जनरल को बुला लें
१ . क . १७ बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र २०-१-१८११ महोदय , मैंने विगत दिनों में एक्सप्रेस पत्र भेजा , उसके बाद नगर की स्थिति में शायद ही कोई अन्तर आया है
२ . सरकार के विनियम १५ , १८१० को चालू रखने के प्रस्ताव की जानकारी होते ही अत्यन्त आपत्तिजनक और उत्तेजनापूर्ण पर्चे मुहल्लों में वितरित होने लगे
मैंने ऐसे पर्चे प्राप्त कर देने वाले लोगों को ५०० रूपये का इनाम घोषित किया है
प्रतिदिन लोगों को बिखेरना और अपने राजद्रोही और अन्यायपूर्ण व्यवहार को छोडने के लिये विवश करना ही महत्त्वपूर्ण कर्तव्य बनता जा रहा है
जनसामान्य सरकार के आदेश का प्रतिरोध करने के लिए निश्चयपूर्वक इकट्ठा हुआ और अपनी मांग का स्वीकार करवाने पर तुली भीड की गति से आंदोलित हो रहा था
५ . ऐसी हताशा की स्थिति से उन लोगों में काफी उलझन निर्माण हुई और अंतमें वे अधिकारियों को दूसरा आवेदन देने के लिए नए सिरे से तैयार हुए
 ( आवेदन का अनुवाद संलग्न कर रहा हूँ ) उन्हें आशा थी कि न्यायालय के हस्तक्षेप से उनके पक्ष में कोई हल निकलेगा
६ . इस आवेदन को स्पष्ट रूप से अस्वीकृत कर दिए जाने से उनकी कठिनाई बढ़ गई
कुछ समझदार और विचारशील लोगों ने अपना समर्थन वापस ले लिया
लोगों को लगने लगा कि अब वे ऐसी मुश्किल में फंसे हैं कि उससे सम्मान पूर्वक उबरना मुश्किल होगा
अंतमें लोग उलझन और अनिश्चय से ग्रस्त होकर मानने लगे कि इनकी पूरी कार्यवाही को जाननेवाली सरकार से उनके उद्देश्य की पूर्ति होना तो दूर , उन्हें भयंकर दण्ड मिलेगा
उन्होंने मुझे २३ तारीख को कहलवाया कि यदि मैं स्वयं उन्हें समझाऊँ तो वे सब कुछ छोड कर बिखर जाने की इच्छा रखते हैं
परन्तु सरकारी अधिकारियों के साथ उनका पूर्व में जो अवांछित व्यवहार रहा था उसे देखते हुए मुझे उनसे मिलना उचित नहीं लगा और मैंने उनका प्रस्ताव मान्य नहीं किया
उसके स्थान पर सैयद अकबर अली खान ने एक योजना प्रस्तुत की जिसकी सफलता निश्चित लगती थी
बनारस के राजा अपने गांव के निवास से नगर में वापस लौटे और वे लोगों को उनके कर्तव्य के प्रति जागरूक बनने के लिये प्रेरित करने में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुए
लोगों को समझाया गया कि राजा माफी प्राप्त करने में मध्यस्थता करेंगे , और स्वयं राजा बाबू शिवनारायण सिंह को मिले खिताब से जोश में आ गए थे और मानते थे कि इस अवसर पर उन्होंने अदा की हुई भूमिका से भारी बहुमान और सरकार का विश्वास जीतने का अवसर मिला है
ऐसी विकट परिस्थिति में भी माफी की बात प्रजा वात्सल्य का उदाहरण बनेगी
१३ . मेरा कर्तव्य समझकर मान्यवर को , सैयद अकबर अली खान और मौलवी अब्दुल कादिर खान को उनकी समर्थक भूमिका के लिए उचित सम्मान देने का सुझाव दे रहा हूँ
साथ ही यह आवेदन ऐसे लोगों ने प्रस्तुत किये हैं जो ( देशके ) विनियम के विरोध में दृढतापूर्वक संघ की रचना कर एकत्रित हुए हैं जो कि अत्यन्त आपत्तिजनक है
७ . राजद्रोही और अन्यायपूर्ण आचरण करनेवाले बनारस के लोगों को आम माफी देना मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को उचित नहीं लगता है
१० . बनारस में अभी जो स्थिति उत्पन्न हुई उसका सामना करने के लिए आपको जो कुछ दायित्व दिये गए , उनको आपने जिस दृढता और समझदारी पूर्वक निभाया है उसके लिए मान्यवर काउन्सिल संतोष के साथ प्रशंसा व्यक्त करते हैं
ऐसा करने से शायद असंतोष , रोष और अंतत: उत्तेजना का वातावरण उत्पन्न होगा
उन्हें निर्णय की जानकारी भी हो चुकी है , फिर भी इस समय आवेदन को वापस कर देना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं माना जाएगा
सामान्य भावना तो कर के विरुद्ध की ही लगती है और लगभग सभी निवासी ऐसे किसी कर के सामने झुकने को तैयार नहीं लगते हैं
साथ ही मान्यवर काउन्सिल को आपके द्वारा बताई गई स्थिति के संबंध में कोई ऐसा कारण नहीं दिखता है जिसकी वजह से इस समय कर में सुधार संबंधी कोई बातचीत रोक देनी चाहिये
४ . जब लोग खुले आम कानूनभंग कर राजद्रोह का आचरण करते थे तब ही पूर्वोक्त नोटिस रोके रखने के कदम से मुझे लोगों को समझाने का अवसर मिला , जिसका विरोध भी कम हुआ और सभीने अपने हित में मुझे सुना , लेकिन यह प्रस्ताव धार्मिक नेताओं और निम्नवर्गीय लोगों के लिये लाभकारी था , और यह प्रस्ताव ऐसे समय पर आया जब लोग सरकार से इस कर को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए आवेदन दे रहे थे
तब तक गवर्नर जनरल इन काउन्सिल की इच्छा है कि विनियम की इस व्यवस्था से बडी संख्या में लोगों को मुक्ति का लाभ मिलता है इसकी ओर ध्यान दिया जाए और इस से पूर्व की धाराओं का उचित रूप से पालन कराया जाए
इस संबंध में समाहर्ता के साथ मिलकर रिपोर्ट तैयार किया जाए जिसमें सरकार के वर्तमान आदेश के अनुरूप करमुक्ति के पात्र धार्मिक भवनों की जानकारी का समावेश किया गया हो
दूसरा सरकार का यह इरादा नहीं है कि निचले स्तर के लोगों को आवास कर के लिए निशाना बनाया जाए क्यों कि उनकी आय कर चुकाने के लिये पर्याप्त नहीं होती
दूसरा सरकार का यह इरादा नहीं है कि निचले स्तर के लोगों को आवास कर के लिए निशाना बनाया जाए क्यों कि उनकी आय कर चुकाने के लिये पर्याप्त नहीं होती
बाद में सरकार के पास ऐसा प्रस्ताव आया कि फाटकबंदी से सम्बन्धित खर्च सार्वजनिक फंड से चुकाने के स्थान पर , मकान के किराए के निर्धारण में मकानमालिक , मकानधारक को किराया निर्धारण के समय जो बाद मिलता है और वे मोहल्ले कर के माध्यम से अपने हिस्से में आने वाली रकम चुकाते रहे हैं , उस मकान को कर मुक्ति दी जाए
इस संबंध में इस के पूर्व में आवेदनों आए हुए मानने या कोई आपत्ति उपस्थित की गई हो तो उसकी रिपोर्ट भेजने के लिये , बोर्ड ऑफ कमिश्नर समाहर्ता को बताएगा
इसके बाद दिनांक १६ फरवरी के सरकार के आदेश जिसमें फाटकबंदी के बारे में तथा धार्मिक नेताओं अथवा ( भवनों के ) तथा अकिंचन गरीब लोगों को कर से मुक्ति देने की व्यवस्था के आदेश थे उसे बोर्ड ऑफ कमिश्नर को भेज दिया है और उससे संबंधित सारी व्यवस्था बोर्ड की सूचना के अनुरूप समाहर्ता करेंगे
१ . क . २३ . पूर्व कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र २३-२-१८११ जी . डोड्स्वेल एस्क सरकार के सचिव , न्यायतंत्र विभाग फोर्ट विलियम महोदय , गत दिनांक १६ का सरकार का आदेश देखकर मैं बहुत व्यथित हुआ कि मान्यवर काउन्सिल ने मेरे द्वारा वर्णित परिस्थिति के संदर्भ में कोई वास्तविक कदम की ओर ध्यान नहीं दिया और प्रवर्तमान परिस्थिति में , कर में किए जाने वाले सुधारों को घोषित नहीं करने के मेरे निर्णय को मान्य नहीं रखा
इस संबंध में इस प्रकार का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का इच्छुक हूं - ३ . गत दिनांक ७ को मेरे द्वारा प्रेषित पत्र का उद्देश्य केवल इतना ही था कि लोगों को कर में किए गए सुधारों की जानकारी तब तक न दी जाए जब तक सरकार की ओर से उनके आवेदन का उत्तर नहीं आता
३ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल ने , मिस्टर बर्ड ने शुभाशयपूर्वक आवास कर के सुधारों की सूचना देना स्थगित रखने के लिए जो कदम सूचित किया था , उसके प्रति पूर्ण संतोष व्यक्त किया है
साथ ही एक घोषणा करवाई कि यदि किसी व्यक्ति को किराए की दर अथवा उसमें दर्शाए गए कर के संबंध में कोई विरोध है तो उसकी जानकारी दी जाए
बंगाली में लिखे आवेदन पर जीनगंज और उसके आसपास के लोगों ने हस्ताक्षर किये हैं
१ . घ . १ ( अ ) मुर्शिदाबाद शहर के निवासियों का आवेदन २९-२-१८११ ( सारांश ) ईश्वर की कृपा से एक अंग्रेज सज्जन जानता है कि दुनिया के किसी भी राजा ने अपनी प्रजा पर अत्याचार किया नहीं है
एक तो सतत महामारी के कारण शहर के लोग मर रहे हैं और संभवत: आधे लोग ही बचें हैं
आपका आज्ञाकारी रेवन्यू बोर्ड जी . डोड्स्वेल ९ अक्टूबर १८११ सी . बुलर १ . च . २ . सर हेमिल्टन , समाहर्ता , भागलपुर का रिचार्ड रॉक , एस्क , प्रेसिडेन्ट और मेम्बर ऑव् बोर्ड ऑव रेवन्यू , फोर्ट विलियम को पत्र २-१०-१८११ श्रीमान् आपके सेक्रेटरी के दिनांक १४ अगस्त के पत्र में निहित आदेश का पत्र मुझे गत दिनांक १८ को मिला , जिसके अनुरूप मैंने एक अधिसूचना ( नकल साथ है ) प्रकाशित कर , सबको बता दिया है कि मकान कर की वसूली का कार्य बहुत ही जल्दी अर्थात् कि बंगाली वर्ष के पहले ही दिन से शुरू किया जानेवाला है
विनियम १५ , १८१० के अनुरूप निर्धारण किया है और बोर्ड के दिनांक १४ अगस्त के आदेश के अनुसार कर वसूलना शुरू भी कर दिया है
मेरे मतानुसार तो लगता है कि बाकीदारों पर जप्ती लाने के लिए इससे अधिक अच्छा अवसर नहीं हो सकता , क्यों कि लोग भी बहुत कम हो गए थे और अधिकारियों के समर्थन में प्रभावक प्रयास हुआ होता तो भीड़ द्वारा हो हल्ला या मारकाट होने की संभावना नहीं के बराबर थी
३ . न्यायाधीश को घर में अनेक हथियार मिले , जिसके आधार पर सरकार को उसे जब्त करने के लिए कहा जा सकता है
फिर उन्हें बार बार चेतावनी दिये जाने पर कि अधिक समय इकठ्ठा रहेंगे तो गोली चलाई जाएगी , वे बिखर गए
मैंने कोतवाल तथा अन्य पुलिस के लोगों को , लोग भीड़ न करें , इस हेतु तैनात किया
 ( संलग्न पत्र में इसका उलेख है ) ट्रूपों को नगर में थोड़ी थोड़ी दूर पर तैनात किया
जब भीड़ के अग्रणी चले गए , तब शेष महिलाओं और बालकों में सैन्य के गुस्से का डर नहीं दिखाई देता था
१ . च . १३ . समाहर्ता , भागलपुर का सरकार को पत्र २५-१०-१८११ जी . डोड्स्वेल सरकार के सचिव फोर्ट विलियम महोदय , मुझे इस बात का संतोष है कि कर वसूली बिना किसी भी विरोध या आक्षेप के की गई
आगे आदेश यह भी है कि मि . शेक्सपियर पूर्व में अधिसूचित विनियमों को ध्यान में रखते हुए उनके पालन में सर्तक रहेंगे , क्योंकि उसमें हुई असावधानी के परिणामस्वरूप ही तो उन्हें अभी डेप्यूटेशन पर आने का अवसर मिला है
इस विषय में अर्थात् समाहर्ता द्वारा निर्धारित किया गया कर जो बोर्ड ऑफ रेवन्यू ने भी मान्य रखा है उसे लागू करने में वांछित भूमिका निभानी है
यह भी आदेश है कि उनके विभाग की ओर से कमान्डर इन चीफ़ को भेजी जाने वाली कार्यवाही की सूचना के बारे में , हिज़ एक्सेलेन्सी की इच्छा है कि उन्हें बताया जाए कि भागलपुरमें , उपलब्ध हिलरेन्जर ट्रुपों के अतिरिक लश्करी दलों की आवश्यकता रहेगी या नहीं
३ . ऊपरि वर्णित स्थिति में यह जरूरी लगता है कि मि . यूविंग , मि . सेनफर्ड से कार्यभार सम्हाल लें और अन्य आदेश आने तक न्यायाधीश के रूप में पदभार वहन करें
क्योंकि रिपोर्ट में भागलपुर के निवासियों की ओर से , मकान कर चुकाने के संबंध में विरोध के कारण उनके स्वयं को तथा सरकार के अधिकारियों को खतरा होने की आशंका व्यक्त की गई थी
समाहर्ता पर जब हमला हुआ तब उनके साथ कोई पुलिस अधिकारी या कर्मचारी का नहीं होना तो कोतवाल की लापरवाही और जानबूझ कर किए गए दुर्व्यवहार का उदाहरण है
भागलपुर आपका आज्ञाकारी रात्रि साढे आठ जे . सेनफर्ड ३१ अक्टूबर १८११ न्यायाधीश १ . च . १८ . न्यायाधीश , भागलपुर का सरकार को पत्र ५-११-१८११ ( सारांश ) मेरे बचाव में मुझे अब अत्यन्त जरूरी लगता है कि मेरी समझ से अब समाहर्ता के प्रति किसी भी प्रकार की नर्मी बरतना निरर्थक है
जिसने मेरे प्रति और खास कर सरकार को भेजे रिपोर्ट में अत्यन्त घटिया अभिप्राय दर्शाया है
इसमें मुझे भी बताया गया है कि हमला उनके कर वसूली के कारण नहीं हुआ है
अत: समाहर्ता का यह बयान सच लगता है
वह समग्र रूप से अनहोनी घटना के समान था
मेरा तो यह भी अभिप्राय है कि उसे एक भीड़ का कृत्य नहीं माना जा सकता अपितु कुछ निम्न जाति के लोगों का नशे की हालत में किया गया कृत्य था
मेरा तो यह भी अभिप्राय है कि उसे एक भीड़ का कृत्य नहीं माना जा सकता अपितु कुछ निम्न जाति के लोगों का नशे की हालत में किया गया कृत्य था
आपका आज्ञाकारी यूविंग , कार्यकारी न्यायाधीश १ . च . २० ( ए ) जे यूविंग का न्यायाधीश भागलपुर को पत्र २२-१०-१८११ जे . सेनफर्ड एस्क न्यायाधीश , भागलपुर महोदय , फज़ल अली की जिस स्थिति में गिरफ्तारी की गई थी , उसे मैं आपको लिखित बताना जरूरी समझता हूँ
कल शाम मैं जब मि . क्रे क्राफ्ट के साथ मेरी बग्गी में जा रहा था तब मैंने हिल हाउस के नीचे कई हजार लोगों को सादे वेश में भीड़ में इकट्ठा होते देखा
बग्गी की शाफ्ट पर चढ गया और फिर बग्गी के पायदान को खींच कर उठते हुए गिर पड़ा
साईस ने मेरे कहने से उसे पकड़ लिया
मि . क्रे क्राफ्ट बाहर कूद पडे और उस मनुष्य का हाथ पीछे बांध दिया
यह गलत और आपत्तिजनक है
इस प्रकार की जांच करना उनके पद के कार्य क्षेत्र से बाहर का कार्य माना जाएगा
भीड , कर का विरोध करने के लिए एकत्रित हुई थी , जो कुछ दिनों से वसूल किया जा रहा था
अर्थात् २१ अक्टूबर से पूर्व ही कुछ स्थानों पर शराब , मिठाई , पंडे , पुरोहितों , पुजारी और इधर- उधर ईंटों का ढेर दिख रहा था
४ . मेरा निवेदन है कि न्यायाधीश को बुलाकर पूछा जाए के लोग भीड न करें , इस हेतु रोकथाम के उपाय के रूप में उन्होंने क्या कदम उठाया था ? हमले के पहले चार पांच दिन में लोगों की भीड को बिखेरने के लिए उन्होंने क्या किया था ? उसके बाद १९ अक्टूबर के पत्र के संदर्भ में उन्होंने क्या आदेश दिए जिससे मुझे मेरा कर्तव्य पूरा करने में मदद मिले ? ५ . अब जब मैं अभी भागलपुर में उपस्थित नहीं रह सकता हूं और मेरी अनुपस्थिति में सर्किट न्यायाधीश जांच के लिए जा रहे हैं तब मेरी आपसे प्रार्थना है कि यदि उन्हें इस मामले में कोई सूचना जरूरी है तो वे मेजर फ्रेन्कलीन या लिटल ज्हॉन से सम्पर्क करें
६ . पिछले दंगों की अत्यन्त ही सूक्ष्म जांच हो यह मैं उत्सुकता पूर्वक चाहता रहा हूं और मैं अभी भी आशा करता हूँ कि ऐसा होगा ही
परन्तु यह समझना चाहिये कि पुलिस अधिकारी अथवा सेना के सिपाही भी अन्य लोगों के समान ही मकानकर के भोग बने हुए होते हैं
६ . गत २१ अक्टूबर की शाम को सर फ्रैडरिक हैमिल्टन के साथ भीड़ ने निश्चित ही कठोर व्यवहार किया होगा
४ . नीति से पलायन की पद्धति २ . १ . जी . डॉड्स्वेल , पूर्व सीनि . मेम्बर बोर्ड ऑफ रेवन्यूका सरकार के मुख्य सचिव एन . बी . एड्मॉन्स्टोन को पत्र ( सारांश ) १८-१०-१८१९ ११ . मकान कर निश्चित करने के कार्य में अच्छी प्रगति हुई है , इससे लगता है कि बंगाल , बिहार और उड़ीसा में अल्प समय में ही कार्य पूरा हो सकेगा
१४ . फिर भी कर से होनेवाली आय अभी भी अगर सरकार का उद्देश्य है , तो विनियम १ , १८११ की धारा १२ से लोगों के अनेक वर्गों को जो परवाना दिया जाता है उसके लिए कर लगाया जा सकता है ऐसा मेरा सुझाव है
२ . ३ फरुखाबाद के बोर्ड ऑफ कमिश्नर को मुख्य सचिव का पत्र २२-१०-१८११ बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स सज्जनों , अति आदरणीय वाइस प्रेसिडन्ट इन काउन्सिल ने विनियम १५ , १८१० के तहत लगाए गए मकान कर के विषय में उसे शीघ्र निरस्त करने के लिए स्वीकृति दी है
इससे बोर्ड ऑफ रेवन्यू को निर्देश है कि कर निर्धारण की प्रक्रिया जहाँ पूरी नहीं हुई है वहां उसे स्थगित कर दें और कर वसूली का काम जहां चालू हो गया है वहीं रोक दें , परन्तु जहाँ कर लागू होने के प्रति स्पष्ट विरोध या अशान्ति हुई है वहां आदेश मिलने तक की अवधि के लिए चालू रखें
कोई विरोध नहीं दिखाई देता है तो कर आंशिक अथवा पूरा वसूल करना चालू रखें
जब कि दूसरी ओर समाहर्ता के प्रचार पत्र के अनुसार कर वसूली स्थगित करने के बाद पुन: चालू करना लोगों के मन में सार्वजनिक रूप से अस्थिरता की छाप छोड़ेगा
६ . इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए मान्यवर लोर्डशीप इन काउन्सिल ने , भागलपुर जिले में कर वसूली स्थगित करने के स्थान पर चालू रखना उचित माना है जो दिनांक २२ अक्टूबर के आदेश से उल्टा होगा
७ . उपर्युक्त परिस्थिति से पता चलता है कि भागलपुर के समाहर्ता ने सरकार के कर समाप्त करने के इरादे की लोगों को जानकारी दे दी है , किन्तु यदि उपर्युक्त सूचना भागलपुर को भी हो सके इस प्रकार से तैयार की जाती तो भी काउन्सिल को लगता है कि समाहर्ता को कर स्थगित करनेवाली जानकारी प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं थी
८ . इससे स्पष्ट है कि समाहर्ता ने निर्धारण या वसूली का कार्य स्थिति देखकर रोक दिया है और सरकार का आशय सार्वजनिक विज्ञप्ति अथवा अधिसूचना के बिना ही स्पष्ट हुआ है
८ . इससे स्पष्ट है कि समाहर्ता ने निर्धारण या वसूली का कार्य स्थिति देखकर रोक दिया है और सरकार का आशय सार्वजनिक विज्ञप्ति अथवा अधिसूचना के बिना ही स्पष्ट हुआ है
८ . इससे स्पष्ट है कि समाहर्ता ने निर्धारण या वसूली का कार्य स्थिति देखकर रोक दिया है और सरकार का आशय सार्वजनिक विज्ञप्ति अथवा अधिसूचना के बिना ही स्पष्ट हुआ है
जब हिज़ मेजेस्टी के यूरोपीय प्रजाजनों को सभी बातों में कोर्ट और विनियम के प्रति जिम्मेवार माना जाता है अथवा जिस राजा ने संसद में मान्यता दे कर जवाबदेही निश्चित की है तब तो उन्हें हिन्दुस्तान के प्रजाजन मानकर उल्टा व्यवहार केसे हो सकता है
इस विषय में उनका अभिप्राय है कि यूरोपीय प्रजा को इस कर वसूली में जब्ती का शिकार नहीं बनाया जा सकता
४० . अत्यन्त चिन्ता के साथ आप मान्यवर को विदित हो कि विनियम की इस व्यवस्था को लागू करने के लिए राजस्व अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदम अत्यन्त असंतोष और प्रतिकार उत्पन्न करने वाले सिद्ध हुए हैं और बनारस के स्थानिक अधिकारियों के प्रति रोष और प्रतिकार की भावना भडक उठी है
इन पत्रों को ज्यूडिशियल विभाग में दर्ज किया गया है
४१ . इस विषय में स्थानिक अधिकारी के साथ किए गए पत्राचार की नकल अलग से भेजी जा रही है
मुझे सरकार की ओर से कोई आदेश नहीं आता तब तक समाहर्ता को निर्धारण कार्य रोक देने के लिए समझा रहे हैं
अत: यह अनिवार्य लगता था कि लोगों की भीड को बिखेरने के लिए शीघ्र ही कदम उठाए जाएँ और यथा संभव धैर्य और समझदारी से काम लिया जाए और अनिवार्य होने पर ही देश के सैन्य बल की मदद लें
४३ . विनियम के बारे में ( कार्यवाहक न्यायाधीश को हमारे गत दिनांक ५ के आदेश में दर्शाए अनुसार ) प्रमुख शहरों अथवा नगरों में , विनियम १५ , १८१० अनुसार लागू किया गया मकान कर वापस लेने के लिए कोई उचित कारण हमें नहीं लगा
इसके अतिरिक्ति धार्मिक भवन ही नहीं अपितु धार्मिक कार्यों - पूजा पाठ - करानेवाले पुरोहित और धार्मिक अग्रणी अथवा सूत्रधार माने जाने वाले लोग जिस मकान में रहते हों उन सभी को कर से मुक्ति दें , और साथ ही बहुत ही गरीब लोगों को भी छूट का लाभ दें
क्योंकि लोगों में नागरिक , घरेलू तथा धार्मिक बातें एक दूसरे से इतनी जुडी हुई होती हैं कि वे स्थापित पद्धति में किसी भी बदल या सुधार के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होते हैं
किन्तु मकान कर मेरे मत से किसी प्रकार का रोष अथवा असंतोष करनेवाला नहीं लगता
ब्राह्मण , फकीर और अन्य लोग , जनता को उत्तेजित करने में लग गए हैं
लोग स्थानीय अधिकारियों को तिरस्कृत कर रहे हैं
६४ . विरोध और उपद्रव का संकेत तो तभी मिल गया था जब समाहर्ता ने उसकी ड्यूटी के लिए भेजे अधिकारियों का लोगों के द्वारा विरोध हुआ
वास्तव में निर्धारण के अनुसार कर की कुल राशि केवल ३ , ०० , ००० रु . के लगभग होने जा रही है
३ . ४ . बंगाल से प्राप्त राजस्व विभाग का पत्र ३०-१०-१८१२ ( सारांश ) १११ . कोलकता शहर के उपनगरों में मकान कर वसूली और उसके वितरण के मुद्दे पर बोर्ड ऑफ रेवन्यू को रिपोर्ट और उससे संबंधित कार्यवाही का विवरण हमारे पत्र के अनुच्छेद १०१ , १०२ में वर्णित है
३ . ४ . बंगाल से प्राप्त राजस्व विभाग का पत्र ३०-१०-१८१२ ( सारांश ) १११ . कोलकता शहर के उपनगरों में मकान कर वसूली और उसके वितरण के मुद्दे पर बोर्ड ऑफ रेवन्यू को रिपोर्ट और उससे संबंधित कार्यवाही का विवरण हमारे पत्र के अनुच्छेद १०१ , १०२ में वर्णित है
३ . ५ . बंगाल से प्राप्त रेवन्यू विभाग का गोपनीय पत्र १६-९-१८१२ फोर्ट विलियम , बंगाल से हमारे गवर्नर जनरल इन काउन्सिल १ . ६ अक्टूबर , १८१० को पारित प्रस्ताव के अनुसरण में बंगाल , बिहार , उडीसा और बनारस प्रांतो में वसूल किए गए मकान कर और इस विषय पर ११ फरवरी तक के आपके समग्र पत्राचार पर विचार किया गया
इसमें मकानों पर कर का प्रस्ताव सरकार के ध्यान पर लाया गया होगा
४ . कर लागू करने से बहुत ही रोषपूर्ण संघर्ष और उपद्रव निर्माण हो गया है
न्यायाधीश ने लोगों का रोष शांत करने और सरकार के आदेश आने तक अपने घर तथा धंधे पर वापस लौट जाने के लिए समझाने का प्रयास किया था
उसमें क्या था इसकी हमें जानकारी नहीं है , परन्तु कमिश्नर के उस समय के कर्मचारी के पत्र से जाना जा सकता है कि कोलकता निवासी कमिश्नर के घर पर एकत्रित हुए थे
उनमें से कुछ लोगों को बुलाकर पूछने पर उन्होंने बताया था कि वे किसी भी प्रकार का कर भरने के लिए राजी नहीं थे
पहला यह कि कोलकता का कर सरकार की राजस्व आय के लिए नहीं अपितु म्युनिसिपालिटी के लिए ही लिया जाता है , जिसमें मई में कुछ वृद्धि मुहल्लों और उपनगरों की साफ सफाई आदि के लिए निर्धारित की जानेवाली है
दूसरा यह कि कोलकता ब्रिटिश हुकूमत और नियमों के अनुसार प्रशासन के अन्तर्गत है
१० . मुतरफा या व्यावसायिक परवाना जो कि एक समय में सरकार की महत्त्वपूर्ण आमदनी थी वह उस समय के लोर्ड कॉर्न वालिस के समय में समाप्त किया गया था
१० . मुतरफा या व्यावसायिक परवाना जो कि एक समय में सरकार की महत्त्वपूर्ण आमदनी थी वह उस समय के लोर्ड कॉर्न वालिस के समय में समाप्त किया गया था
हम मानते हैं कि वह मकानकर था ही नहीं क्योंकि उस कर को खाना शुमारी ( मकान-क्रमांकन ) कर कहा जाता था
आपने लिखा है कि नए कर लगाने से पूर्व चारों ओर से विचार कर लेना चाहिए क्योंकि लोगों की सामाजिक और पारिवारिक रीतिनीति धार्मिक रीतिनीति से जुडी हुई होती है अत: किसी भी प्रकार के बदल या सुधार के प्रति वे अत्यन्त संवेदनशील होते हैं , और आपने ठीक ही कहा है कि किसी भी प्रशासन ने नये कर लगाने से पूर्व लोगों के स्वभाव और मिजाज को अच्छी तरह से जानना चाहिए
१२ . दक्षिण और कर्णाटक ( प्रांतों ) में इस प्रकार के कर हैं ही लेकिन आपने प्रस्तावित किया है उसके साथ उनका साम्य होते हुए भी अन्तर भी बहुत है
हमारी धारणा है कि कर का प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाली कमिटी ऑव् फाईनेन्स या फिर बोर्ड ऑव रेवन्यू जो आपके मार्गदर्शन में आवश्यक विनियम बनाती है , उन्होंने हमारा पत्र पढा होगा ऐसा लगता नहीं है
१७ . बनारस के हमारे निम्नलिखित कर्मचारियों की अत्यन्त न्यायपूर्ण , सावधान एवं सतर्क एवं सुदृढ कार्यप्रणाली संतोष प्रदान करनेवाली रही थी
१९ . हम इस अवसर पर आपको एक खास सिफारीश के साथ यहाँ के लोगों के पूर्वाग्रह और विचारों के प्रति उचित ध्यान देने के लिए बता रहे हैं और साथ साथ लोर्ड कॉर्न वालिस ने उनके दिनांक ११ जून १७८० के बोर्ड ऑव रेवन्यू को लिखे पत्र में स्पष्ट बताया है , उस सिद्धान्त पर दृढतापूर्वक लगे रहने का अनुरोध भी करते हैं , जिसमें कहा गया है , 'समय समय पर जरूरी आंतरिक कर लगाना और वसूलना प्राचीनकाल से चली आ रही और सर्वस्वीकृत प्रणाली है अर्थात् सरकार का वह अधिकार है
बंगाल में राजस्व की अधिकांश आय जमीन से आती है और यह स्थिर आय होने के कारण अन्य किसी भी प्रकार के व्यय का सामना करने के लिए आवश्यक हो तो भी उसमें वृद्धि न करें
जमीन और जमीन से सम्बन्धित सम्पत्ति के मालिकों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था पूरी करना इतना लाभदायी है कि सेना की व्यवस्था करने के बाद बची हुई राशि स्थानीय दल निर्माण करने की जैसे मदों में और हिज मेजेस्टी की कुछ अतिरिक्त रेजिमेन्ट निर्माण करने के लिए सेना के लिए निर्धारित अधिकांश राशि खर्च हो जाती हैं
और बंगाल और बिहार जैसे प्रान्तों में दीर्घ काल से शान्ति और उन्नति का वातावरण स्थापित हुआ है और दंगे आदि पर होने वाले व्यय का बोझ नहीं रहने से अब हम स्थानीय प्रजा के सहयोग की मांग कर सकेंगे
प्रान्तों में व्यक्ति के द्वारा कोरे कागज का उपयोग किए जाने के स्थान पर स्टैम्प युक्त कागज का उपयोग करता है तो उसकी अधिकृतता बढ जाती है
३ . ५ . १ . बोर्ड का कोर्ट को पत्र इन्डिया ओफिस व्हाईट होल १५ जून १८१२ ( सारांश ) मुझे कमिश्नर फॉर अफेर्स ऑव इन्डिया का निर्देश है कि बंगाल सीक्रेट रेवन्यू ड्राफ्ट २१८ सुधार और बदल के साथ वापस भेज दूँ
पैरा १८ को छोड देने का बोर्ड का कारण यह है कि ( उसमें ) बंगाल सरकार को पूछा गया है कि ड्यूटी पूरी या फिर आंशिक रूप से पुन: शुरु की गई है या नहीं , क्या यह वही ड्यूटी है जो उससे पूर्व जमीन के विवाद के निपटारे के रूप में वापस ली गई थी
बंगाल प्रेसिडेन्सी के अधीन प्रशासन को चलाने में बहुत व्यय होता है जिसके लिए कोर्ट ऑव डायरेक्टर को अनुच्छेद तैयार करना था , वह सेयर ड्यूटी के कारण से छूट गया था
जिन वस्तुओं से स्थायी और अधिक कर मिल सकता है ऐसी वस्तुओं पर कर लगाने का एक विस्तृत ढांचा बना सकते हैं
यह काम सरकार की सत्ता के साथ बिना समझौता किए करना चाहिए
६ . मकान कर , अन्य कर के समान ही एक कर है , अधिक कुछ नहीं
हाँ , नया कर लागू होने पर कुछ हलचल होती ही है , किन्तु लोगों का अंसतोष किस रूप में प्रकट होगा उसकी पूर्वधारणा अथवा पूर्वानुमान करना संभव नहीं होता है
हाँ , नया कर लागू होने पर कुछ हलचल होती ही है , किन्तु लोगों का अंसतोष किस रूप में प्रकट होगा उसकी पूर्वधारणा अथवा पूर्वानुमान करना संभव नहीं होता है
यह भी कहा जा सकता है कि विविध उपायों के दौरान अनुभव से समझ में आया कि उसके पीछे यह मनोभाव था कि लोगों की अपनी सम्पत्ति सार्वजनिक ( राज्यकी ) सम्पति में बदल रही है
उनकी शिक्षा डी . ए . वी . कालेज , लाहौर में हुई
१९३० में ८ वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार गांधीजी को देखा
१९४० में , १८ वर्ष की आयु में उन्होंने खादी पहनना शुरू किया
जाकर वे वहाँ के सामुदायिक ग्राम के प्रयोग को जानना समझना चाहते थे
१९६४-६५ में श्री धर्मपालजी आल इण्डिया पंचायत परिषद के शोध विभाग के निदेशक रहे
१९८२ से १९८७ सेवाग्राम ( वर्धा , महाराष्ट्र ) में रहे
१९४९ में उनका विवाह अंग्रेज युवति फिलिस से हुआ
१९८६ में उनका स्वर्गवास हुआ
उनकी स्मृति में वाराणसी में मानव सेवा केन्द्र के तत्वावधान में बालिकाओं के समग्र विकास का केन्द्र चल रहा है
धर्मपालजी एवं फिलिस के एक पुत्र एवं दो पुत्रियां हैं
१८ वीं एवं १९ वीं शताब्दी के भारत के विषय में अनुसन्धान कर के लेख लिखे , भाषण किये , पुस्तकें लिखीं
उनका यह अध्ययन , चिन्तन , अनुसन्धान विश्वविद्यालय से उपाधि प्राप्त करने के लिये या विद्वता के लिये प्रतिष्ठा , पद या धन प्राप्त करने के लिये नहीं था
भारत की जीवन दृष्टि , जीवन शैली , जीवन कौशल , जीवन रचना का परिचय प्राप्त करने के लिये , भारत को ठीक से समझने के लिये , समृद्ध , सुसंस्कृत भारत को अंग्रेजों ने कैसे तोडा उसकी प्रक्रिया जानने के लिये , भारत कैसे गुलाम बन गया इसका विश्लेषण करने के लिये और अब उस गुलामी से मुक्ति पाने का मार्ग ढूंढने के लिये यह अध्ययन था
श्री जयप्रकाश नारायण , श्री राम मनोहर लोहिया , श्री कमलादेवी चट्टोपाध्याय , श्री मीराबहन उनके मित्र एवं मार्गदर्शक हैं
मूल पुस्तकें अंग्रेजी में हैं
२४ अक्टूबर २००६ को सेवाग्राम में ही ८४ वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ
शिक्षा के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में अधिकांश लिखाई प्राचीन समय की या दसवीं और बारहवीं शताब्दी की शिक्षा पद्धति को केन्द्र में रखकर होती थी , जबकि कुछ लेखन कार्य अंग्रेज शासन काल में और तत्पश्चात् के समय की शिक्षा पद्धति के संदर्भ में संपन्न हुआ है
इसी प्रकार तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विद्याधामों के बारे में भी अनेक विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ उपलब्ध हैं
सन् १९३९ में प्रकाशित पंडित सुखलालजी द्वारा लिखित बृहद ग्रन्थ व्यापक क्षेत्र को अपने में समाविष्ट करता है , फिर भी विषयवस्तु की दृष्टि से उस पुस्तक का महत्त्व कम ही माना गया है
 ( १ ) सन् १८३५ और १८३८ में बंगाल और बिहार के कुछ जिलों में प्रचलित भारतीय शिक्षा पद्धति के बारें में अंग्रेज अधिकारी और पूर्व पादरी विलियम एडम द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के बहु चर्चित विवरण | ( २ ) सन् १८२०-३० के वर्षों में मुंबई प्रांत में भारतीय शिक्षा पद्धति के बारे में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के प्रकाशित विवरण | ( ३ ) चेन्नई प्रान्त में भारतीय शिक्षा पद्धति के बारे में वर्ष १८२२-२५ में किए गए सर्वेक्षण के प्रकाशित विवरण ॥* ( ४ ) जी . डबल्यू . लिटनर द्वारा इसी विषय , भारतीय शिक्षा पद्धति के बारे में पंजाब प्रांत में सम्पन्न सर्वेक्षण का विवरण इन स्रोतों में लिटनर का विवरण सरकारी अभिलेखीय प्रमाण और उसने स्वयं पंजाब में किए हुए सर्वेक्षण पर आधारित है
' गाँधीजी का यह कथन एडम , लिटनर आदि ने दिये हुए निष्कर्ष तथा वर्षों तक भारतीयों के मानस में अवस्थित संवेदनाओं का प्रतिबिंब था , फिर भी गाँधीजी के इस कथन को सर फिलिप हार्टोग नामक अंग्रेज ने वैयक्तिक रूप से तथा अंग्रेज सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर चुनौती दी
इससे गांधीजी की ओर से हार्टोग को प्रमाण पहुँचाए गए थे , किन्तु उससे उसका समाधान नहीं हुआ और चार वर्ष बाद गांधीजी के कथनों को गलत सिद्ध करने के एक मात्र आशय से लंदन विश्वविद्यालय के 'इन्स्टिट्यूट ऑफ एज्युकेशन' ( Institute of Education ) में एक व्याख्यान श्रेणी में तीन व्याख्यान दिए
इससे गांधीजी की ओर से हार्टोग को प्रमाण पहुँचाए गए थे , किन्तु उससे उसका समाधान नहीं हुआ और चार वर्ष बाद गांधीजी के कथनों को गलत सिद्ध करने के एक मात्र आशय से लंदन विश्वविद्यालय के 'इन्स्टिट्यूट ऑफ एज्युकेशन' ( Institute of Education ) में एक व्याख्यान श्रेणी में तीन व्याख्यान दिए
' गाँधीजी का यह कथन एडम , लिटनर आदि ने दिये हुए निष्कर्ष तथा वर्षों तक भारतीयों के मानस में अवस्थित संवेदनाओं का प्रतिबिंब था , फिर भी गाँधीजी के इस कथन को सर फिलिप हार्टोग नामक अंग्रेज ने वैयक्तिक रूप से तथा अंग्रेज सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर चुनौती दी
इसी लेखक के पूर्व प्रकाशित साइंस एण्ड टैक्नोलोजी इन द एटीन्थ सेन्युरी 'Indian Science and Technology in the Eighteeth century ) और 'सिविल डिसओबेडिअन्स इन इण्डियन ट्रेडिशन' ( Civil Disobedience in Indian Tradition ) इन दोनों पुस्तकों की तरह यह पुस्तक भी भारत के एक विशेष आयाम को प्रकट करती है
मुझे वर्ष १९७२-७३ के लए 'ए . एन . सिन्हा इन्स्टिट्यूट ऑफ सोश्यल स्टडीज' ( A . N . Sinha Institute of Social Studiesत ) पटना की सीनियर फेलोशिप प्राप्त हुई , उसके लिए मैं संस्था का आभारी हूँ
१२वीं शताब्दी तक तो वह व्यवस्था अत्यंत प्रभावी रही थी , परंतु एडम के विवरण से ज्ञात होता है कि १९वीं शताब्दी के चौथे दशक से यह सक्षम , प्रभावी शिक्षा व्यवस्था का ह्रास होने लगा था
१९ फरवरी , १९८१ धर्मपाल आश्रम प्रतिष्ठान सेवाग्राम 'भारत में अंग्रेजी राज' , सन् १९२३ में यह पुस्तक पहली बार हिन्दी में प्रकाशित हुई तब उस पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी थी
यह पुस्तक अनेक स्वातंत्र्य सेनानी , वरिष्ठ राजनीतिज्ञ , शिक्षा शास्त्री आदि के लिए प्रेरणास्रोत बन गई थी
रमणीय वृक्ष प्रस्तावना भारतीय इतिहास से संबंधित विगत कुछेक दशकों का ज्ञान अधिकांशत: विदेशी लेखकों के द्वारा लिखे गए लेख एवं पुस्तकों के माध्यम से हमें प्राप्त होता रहा है
सदियों से जो भी विदेशी यात्री भारतभ्रमण के लिए आते थे , उनका भारत के साथ कोई सीधा संबंध तो था नहीं , साथ ही वे पूर्ण रूप से भिन्न समाज संरचना तथा जलवायु से आये थे
सन् १७०० के पहले से ही अंग्रेज तो भारत के वैधानिक शासक बन बैठे थे
साथ ही ऑक्सफर्ड , केम्बिज तथा एडिनबर्ग जैसे प्रख्यात विश्वविद्यालयों का प्रारंभ भी १३वीं - १४वीं शताब्दी में ही हो गया था
" जहाँ शिक्षा नि:शुल्क नहीं थी वहाँ निर्धन विद्यार्थियों को इस विद्याधाम में शिक्षा का लाभ प्राप्त हो सके इस हेतु उनके लिए नि:शुल्क शिक्षा , भोजन तथा निवास की विशेष व्यवस्था की जाती थी
व्यक्तिगत तौर पर बाइबल पढने का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोग , तथा जमीनदारों के लिए ही मान्य था , जबकि कारीगर वर्ग , नौकरीपेशा लोग कामसीखिये तथा छोटे किसान या उनसे निम्नवर्ग के लोग आदि को बाइबल के पठन से पूर्णत: वंचित कर दिया गया था जिससे 'धर्मशास्त्रों के स्वच्छंद उपयोग से निर्माण होनेवाली अव्यवस्थाओं को कम किया जा सके , '* ऐसे प्रावधानों के कारण 'कृषक मज्रदूर की संतान के लिए किसानी मजदूरी करना , कारीगर के संतानों के लिए उनके परंपरागत व्यवसाय को अपनाना तथा उच्च कुल में जन्म लेनेवालों को राज्यवस्था का अध्ययन करके शासन करना ही स्थितिप्राप्त था
व्यक्तिगत तौर पर बाइबल पढने का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोग , तथा जमीनदारों के लिए ही मान्य था , जबकि कारीगर वर्ग , नौकरीपेशा लोग कामसीखिये तथा छोटे किसान या उनसे निम्नवर्ग के लोग आदि को बाइबल के पठन से पूर्णत: वंचित कर दिया गया था जिससे 'धर्मशास्त्रों के स्वच्छंद उपयोग से निर्माण होनेवाली अव्यवस्थाओं को कम किया जा सके , '* ऐसे प्रावधानों के कारण 'कृषक मज्रदूर की संतान के लिए किसानी मजदूरी करना , कारीगर के संतानों के लिए उनके परंपरागत व्यवसाय को अपनाना तथा उच्च कुल में जन्म लेनेवालों को राज्यवस्था का अध्ययन करके शासन करना ही स्थितिप्राप्त था
इस प्रकार के विद्यालय शुरू करने का आशय श्रमिक वर्ग के लोग शिक्षा के माध्यम से धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने की तैयारी करें और विशेष रूप से वेल्स में ये निर्धन लोग रविवार की प्रार्थना में बाइबल का पठन कर सकें' , यह था
" विद्यालय में शिक्षा की अवधि के विषय में डोब्ज लिखते हैं कि , विद्यालय में उपस्थिति विषयक अनियमितता के कारण सन् १८३५ में साधारण रूप में जो शिक्षा एक वर्ष में दी जाती थी , वह सन् १८५१ आते आते बढकर दो वर्ष में दी जाने लगी
१८वीं शताब्दी में सार्वजनिक विद्यालयों की स्थिति बिगड गई थी
सन् १८५१ के बाद गणित को शिक्षा में एक नियमित विषय का स्थान प्राप्त हुआ
तथापि तक्षशिला या नालंदा विद्यापीठों का या बाद में १८वीं शताब्दीमें नवद्वीप" का जो महत्त्वपूर्ण स्थान भारत में था लगभग वही स्थान इंग्लैण्ड में ऑक्सफर्ड , कैम्ब्रिज और एडिनबर्ग विश्वविद्यालयों का था और सन् १७७३ के बाद इंग्लैण्ड से जो भी व्यक्ति प्रवासी , अध्येता या न्यायाधीश के रूप में भारत में आए , उनमें से अधिकांशत: इन तीन में से किसी एक विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहे हुए थे
१९वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ऑक्सफर्ड में नौ महाविद्यालय तथा पाँच बड़े छात्रालय ( Halls ) थे
यहाँ धर्मशास्त्र तथा प्रशिष्ट साहित्य मुख्य विषय के तौर पर पढाए जाते थे
इन पादरियों को भारत के विज्ञान , सामाजिक व्यवस्था , तत्त्वज्ञान और धर्मशास्त्रों में विशेष जिज्ञासा थी
और कई विद्वानों का राजनीति , इतिहास और अर्थव्यवस्था जैसे विषयों के प्रति लगाव था
यही नहीं , तो यूरोप के उच्च श्रेणी के लोगों को इन विषयों में लगाव होने से , ये वर्णन यूरोप की अनेक भाषाओं में भी प्रकाशित हुए थे
१८वीं शताब्दी के मध्यसे लेकर , भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य प्रदेशों के बारे में लिखित सामग्री भरपूर होने के कारण यूरोप में भारत को जानने की काफ़ी जिज्ञासा जगी और चर्चाएँ होने लगीं
उसमें भी भारत की राजनीति , तत्त्वचिंतन , विज्ञान और विशेष कर खगोलविज्ञान जैसे विषयों में यूरोप के वॉल्टेर , एब रेनाल , जीन बेईली जैसे अनेक विद्वानों ने गहरी रुचि ली थी
स्वाभाविक रूप में ही इंग्लैण्ड के जिज्ञासुओं को भी इस वैद्यकीय क्षेत्र में जिज्ञासा बढ़ती ही गई
इन जिज्ञासुओं में से अधिकांश एडिनबर्ग युनिवर्सिटी के साथ जुड़े हुए थे , और उनमें भी एडम विलियम रोबर्टसन , उज्हॉन प्लेफेंअर और ए . मेकनोशी आदि मुख्य थे
ने उसे भारत की राज्य व्यवस्था की सारी जानकारी इकट्ठी करने को कहा तथा इसके लिए कोई एक नगर या जिला पसंद करके , उसकी जनसंख्या , उसकी विविध जातियाँ , वर्ग , उनके व्यवसाय , लोगों की जीवनशैली , वे आपस में किस प्रकार जुडे हुए हैं , श्रमिकों द्वारा सरकार और साहूकार किस प्रकार धन-संचय करते हैं , वह सब ब्यौरा इकट्ठा करने के लिए कहा था
वह लिखता है , 'हिन्दुओं की प्राचीन परंपराएँ , इतिहास , साहित्य , बोधकथाएँ आदि समस्त प्राचीन विश्व के इतिहास को उद्घाटित कर सकता है
सन् १७७० के बाद , अंग्रेजों के अधीन भारत के प्रदेशों में भारत के ज्ञान भण्डार , शास्त्र तथा विद्याधामों का एकदूसरे से भिन्न तीन कारणों से अध्ययन हो रहा था
इसलिए ये विद्वान , जो भी ग्रन्थ प्राप्त थे तथा जो ग्रन्थ वाराणसी जैसे विद्याधामों से प्राप्त हो सकते थे उन सभी ग्रन्थों को लिखित रूप में सुरक्षित रखने के पक्ष में थे
यह प्रयोग था लोगों को ईसाई मत के झण्डे के नीचे लाने का
इस हेतु यहाँ के लोगों की भाषा में ईसाई विचारधारा को प्रस्तुत करना आवश्यक था
विलियम विल्बरफोर्स ने लिखा था , 'ईसाई मत के पूर्ण प्रसार के लिए प्रादेशिक भाषाओं में पवित्र धर्मग्रन्थों का वितरण होना सार्थक सिद्ध होगा
'२५ इन्हीं कारणों से अंग्रेजों ने भारत में संस्कृत और पर्शियन महाविद्यालयों की स्थापना की
किसी भी विषय पर नई नीति के निर्धारण से पूर्व , उसके बारे में प्रवर्तमान स्थिति को ठीक प्रकार से समझ लेना आवश्यक होता है
जैसे कि चेन्नाई प्रांत में 'भारत में देशीय शिक्षा' Indigenous Education Survey ) विषयक सर्वेक्षण द्वारा संकलित की गई जानकारी मूल स्वरूप में आज भी उपलब्ध है
ये सर्वेक्षण अधिकतर सन् १८२० से १८४० की भारत की शिक्षा की स्थिति के बारे में पर्याप्त जानकारी देते हैं
उसका कारण यह है कि भारत की परंपरागत शिक्षा पद्धति पाठशालाओं में , गुरुकुलों में , तथा मदरसों में प्रचलित थी
'शिक्षा' एक ऐसी संकल्पना थी जिसमें स्वाभाविक रूप में ही प्रज्ञा , शील , समाधि जैसी संकल्पनाओं का समावेश होता था
परन्तु परंपरागत शिक्षा संस्थाओं में हुई कमी को चिंता का विषय कहा जाना चाहिए
उसने अपने प्रथम विवरण में लिखा है कि सन् १८३०-४० के वर्षों में बंगाल और बिहार के गाँवों में १ , ०० , ००० के लगभग पाठशालाएँ थीं
उसने बताया कि , 'यहां प्रत्येक गाँव में एक पाठशाला थी'२९ इसी प्रकार मुंबई प्रेसीडेन्सी के जी . एल . प्रेन्टरगास्ट नामक वरिष्ठ अधिकारी ने लिखा है कि 'गाँव बडा हो या छोटा , यहाँ शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा जहाँ कम से कम एक पाठशाला न हो
किन्तु जो लोग भारत की शासन व्यवस्था के साथ जुडे हुए थे तथा जो भारत की निश्चित विचारधारा के प्रति समर्पित थे उन सभी लोगों ने इन निरीक्षणों को गलत ही बताया
साथ ही , १८वीं शताब्दी के अंत और १९वीं शताब्दी के शुरूआत के वर्षों में कई अंग्रेजों ने भारत तथा इंग्लैण्ड की शिक्षा , उद्योग , हस्तकला , कृषि जैसे विषयों की तुलना की , तब उनके मानस में यह परिलक्षित हुआ कि , भारत के कृषि मज्रदूर को इंग्लैण्ड के कृषि मजदूर की अपेक्षा अधिक वेतन प्राप्त होता था
तो भी भारत में शिक्षा का प्रसार , शिक्षा पद्धति , पाठ्यक्रम आदि की गुणवत्ता और व्यापकता इंग्लैण्ड की अपेक्षा अच्छी थी
विकटतम परिस्थितियों में भी , पाठशालाओं में छात्रों की उपस्थिति का अनुपात इंग्लैण्ड की अपेक्षा भारत में ऊँचा था
साथ ही भारत की पाठशालाओं में वातावरण भी इंग्लैण्ड की पाठशालाओं की अपेक्षा विशेष प्रसन्न और नैसर्गिक था साथ ही , भारत के शिक्षक इंग्लैण्ड के शिक्षकों की अपेक्षा विशेष आत्मीयता और निष्ठा से काम करते थे
वह बात थी बालिका शिक्षा की
अंतिम मुद्दा है यह है कि बड़े पैमाने पर व्याप्त शिक्षा व्यवस्था का एक कारण था उसकी अर्थव्यवस्था
भारतमें अंग्रेजों के शासन के पूर्व अत्यंत कठिन समय में भी राज्य की आय का बडा हिस्सा लोककल्याण के कार्यों के लिए खर्च किया जाता था
छात्रों की संख्या नीचे बताए गए पाँच वर्गों में बतानी थी - ( १ ) ब्राह्मण ( २ ) वैश्य ( ३ ) शूद्र ( ४ ) अन्य जातियाँ ( ५ ) मुस्लिम
यहाँ १ से ४ श्रेणी के छात्रों की कुल संख्या में श्रेणी ५ के छात्रों की संख्या जोडकर हिन्दू और मुस्लिम मिलकर छात्रों की संख्या का योग प्राप्त किया जाता था
दूसरा , कनारा जिले के समाहर्ता ने इस सर्वेक्षण के प्रत्युत्तरमें जिले के विद्यालयों , महाविद्यालयों की संख्या या उसमें पढनेवाले छात्रों की संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी , क्योंकि उसे लगा कि यहाँ सब निजी तौर पर शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं
उसने यह भी बताया कि 'इस जिले में एक भी महाविद्यालय नहीं है' , क्योंकि उसका मानना था कि कनारा जिले में सार्वजनिक शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी , वहाँ केवल वृद्धों द्वारा कभी कभी बच्चों को एक स्थान पर इकट्ठा करके शिक्षा दी जाती थी
इसी प्रकार बेल्लारी , कडप्पा , गुंटूर और राजमहेन्द्री जिलों के समाहर्ताओं ने विस्तृत विवरण से युक्त जानकारी भेजी है
जबकि तिन्नेवेल्ली , विशाखापट्टनम और तंजावुर जिलों के समाहर्ताओं ने केवल आकड़े भेजकर अपना कर्तव्य निभाया है
इसी परिप्रेक्ष्य में राजमहेन्द्री जिले के समाहर्ता का काम बहुत ही व्यवस्थित है
विद्यालय , महाविद्यालय तथा छात्रों की संख्या सारिणी १ में प्रत्येक जिले में स्थित विद्यालय तथा महाविद्यालयों की संख्या व उनमें अध्ययन कर रहे छात्रों की संख्या दी गई है
यह जानकारी संबंधित जिलों के समाहर्ताओं के द्वारा भेजी गई थी जिनमें गंजाम और विशाखापट्टनम् के समाहर्ताओं ने कहा कि उनके द्वारा भेजी गई जानकारी अपूर्ण थी
यह जानकारी संबंधित जिलों के समाहर्ताओं के द्वारा भेजी गई थी जिनमें गंजाम और विशाखापट्टनम् के समाहर्ताओं ने कहा कि उनके द्वारा भेजी गई जानकारी अपूर्ण थी
इन सभी जानकारियों की चेन्नई प्रान्त की सरकारने १० मार्च , १८२६ को समीक्षा शुरू की थी , इस परिप्रेक्ष्य में चेन्नई के तत्कालीन गवर्नर सर टोमस मनरो लिखता है कि , समूचे प्रदेश में बालिकाओं की संख्या अत्यंत कम थी
छात्रों का ज्ञाति आधारित विभाजन कन्या और कुमार , ऐसे सभी छात्रों का जातिगत विभाजन अत्यंत रोचक है तथा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है
साथ ही उडिया , मलयालम , तेलुगु , कन्नड और तमिल इन पांचों भाषाकीय क्षेत्रों का वर्गीकरण प्राप्त होने से उसकी उपयुक्तता और महत्त्व बढ़ जाता है ( देखिए सारिणी २ ) 
लोगों में एक ऐसी मान्यता व्यापक रूप में है कि प्राचीनकाल हो या अंग्रेजों का शासन , भारत में शिक्षा तो केवल उच्च या मध्यम वर्ग के लोगों के लिए ही सीमित रही थी; किन्तु यहाँ प्रस्तुत जानकारी से ज्ञात होता है कि यह मान्यता सर्वथा गलत और भ्रामक सिद्ध होती है
लोगों में एक ऐसी मान्यता व्यापक रूप में है कि प्राचीनकाल हो या अंग्रेजों का शासन , भारत में शिक्षा तो केवल उच्च या मध्यम वर्ग के लोगों के लिए ही सीमित रही थी; किन्तु यहाँ प्रस्तुत जानकारी से ज्ञात होता है कि यह मान्यता सर्वथा गलत और भ्रामक सिद्ध होती है
वह भी चेन्नई जैसे प्रांत में जहाँ कुल जनसंख्या के ९५ प्रतिशत लोग द्विज वर्ण के थे
सारिणी ३ से स्पष्ट होता है कि मलबार जिले में द्विज छात्रों की संख्या कुल संख्या के २० प्रतिशत से भी कम थी , किन्तु यह जिला मुसलमानों के आधिक्य का होने से मुस्लिम छात्रों का अनुपात २७ प्रतिशत जितना ऊँचा था , जबकि शूद्र और अन्य जाति के छात्रों का अनुपात ५४ प्रतिशत जितना था
कन्नड भाषी बेल्लारी जिले में ब्राह्मण और वैश्य छात्रों का कुल प्रतिशत ३५ जितना था , जबकि यहाँ शूद्र और अन्य ज्ञातियों का अनुपात ६३ प्रतिशत था
तथापि तेलुगुभाषी जिलों में छात्रों का अनुपात कडप्पा जिले में २४ प्रतिशत से लेकर विशाखापट्टनम् में ५६ प्रतिशत के बीच था
इस प्रकार पूर्व दर्शाई गई सारिणीयों के आधार पर जान सकते हैं कि समूचे चेन्नई प्रान्त में केवल १० पाठशालाओं में ही अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी और १० में से ७ तो केवल उत्तर आर्कोट जिले में ही थीं
इस प्रकार पूर्व दर्शाई गई सारिणीयों के आधार पर जान सकते हैं कि समूचे चेन्नई प्रान्त में केवल १० पाठशालाओं में ही अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी और १० में से ७ तो केवल उत्तर आर्कोट जिले में ही थीं
नेल्लोर , उत्तर आर्कोट और मछलीपट्टनम में क्रमश: ५० , ४० और १९ पारसी विद्यालय थे , उत्तर आर्कोट में १ और कोइम्बटूर की पाँच पाठ शालाओं में ग्रंथम् की शिक्षा दी जाती थी तथा हिन्दवी ( हिन्दुस्तानी ) की भी शिक्षा दी जाती थी
नेल्लोर , उत्तर आर्कोट और मछलीपट्टनम में क्रमश: ५० , ४० और १९ पारसी विद्यालय थे , उत्तर आर्कोट में १ और कोइम्बटूर की पाँच पाठ शालाओं में ग्रंथम् की शिक्षा दी जाती थी तथा हिन्दवी ( हिन्दुस्तानी ) की भी शिक्षा दी जाती थी
इस प्रकार समाहर्ताओं ने विद्यालयों में शिक्षा का स्तर अथवा गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं दिया है
यह भी दिखाई देता है कि पाठ शालाओं में शिक्षा का कार्य दीर्घकाल तक चलता था
साधारणत: सभी स्थानों पर प्रात: ६ बजे शिक्षा का कार्य शुरू होता था और सूर्यास्त तक और तत्पश्चात् चलता था
इन पाठशालाओं की कार्यपद्धति , शिक्षा पद्धति और वहाँ पढाये जानेवाले विषयों के बारे में सुंदर वर्णन पावलीनो द बार्थोलोम्यु और एलेकझान्डर वॉकर ने अपनी पुस्तकों में दिया है
उच्च शिक्षा की संस्थाएँ कुछ समाहर्ताओं ने अपने जिलों में उच्च शिक्षा की एक भी संस्था नहीं है ऐसा बताया है
राजामुन्दरी जिले में सर्वाधिक अर्थात् २७९ महाविद्यालय थे जिनमें १४५४ छात्र अध्ययन करते थे
सारिणी ६ से यह प्रत्यक्ष होता है कि उच्च शिक्षा की संस्थाओं में अधिकांशत: ब्राह्मण छात्र ही थे
चेन्नाई का समाहर्ता लिखता है , 'ज्योतिष और खगोलशास्त्र जैसे विषय निर्धन ब्राह्मणों की संतानों को सिखाए जाते थे
अत: ब्राह्मणों के बेटों को अक्षरज्ञान प्राप्त करने के बाद वेद और शास्त्रों के अध्ययन हेतु उच्च शिक्षा की संख्याओं में भेजा जाता था
अत: ब्राह्मणों के बेटों को अक्षरज्ञान प्राप्त करने के बाद वेद और शास्त्रों के अध्ययन हेतु उच्च शिक्षा की संख्याओं में भेजा जाता था
ऐसे ब्राह्मणों का जीवननिर्वाह उनके पूर्वजों को जमीनदारों ने दान में दी उपजाऊ जमीन से होनेवाली आय से होता है
उच्च शिक्षा में अध्ययन हेतु उपयोग में लाई जानेवाली पुस्तकें उच्च शिक्षा की संस्थाओं में सामान्य रूप से वेद , शास्त्र , पुराण , गणित , ज्योतिष , महाकाव्य जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी
वैसे तो प्रत्येक जिले में निजी तौर पर शिक्षा प्राप्त करने की परंपरा प्रचलित थी ही
किन्तु मलबार जिले में तो वहाँ के विशेष सामाजिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण यह प्रथा बड़े पैमाने पर व्याप्त थी
मलबार जिले में १९४ छात्र आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का अध्ययन करते थे
सर्वेक्षण में जिलों से अधूरी जानकारी मिलने से निजी तौर पर विभिन्न विषयों की शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों की पूरी संख्या प्राप्त करना कठिन था
संस्थामें रहकर अध्ययन करनेवाले छात्रों की संख्या एवं घर पर रहकर अध्ययन करनेवाले छात्रों की संख्या के सम्बन्ध में चेन्नई जिले ने भेजी हुई जानकारी भी विशेष रूप से रोचक लगती है
यहां पर पाठशाला में रहकर अध्ययन करनेवाले छात्रों की अपेक्षा , घर पर अध्ययन करनेवाले छात्रों की संख्या ४ . ७३ प्रतिशत अधिक थी
किन्तु यूरोप के अधिकांश देशों की अपेक्षा भारत में प्रवर्तमान शिक्षा का स्तर ऊँचा है
मलबार और विशाखापट्टनम् जिले का जयपुर प्रदेश , इन दो क्षेत्रों को छोड़कर कहीं भी पाठशालाओं में ब्राह्मण , वैश्य और क्षत्रिय जाति की कन्याएँ नहीं जाती थीं; मछलीपट्टम् , मदुरा , तिनेवेली और कोईम्बतूर के समाहर्ताओं के अनुसार उनमें अधिकांश नर्तिकाएँ थीं अथवा मंदिरों में नृत्य करनेवाली देवदासी थीं
मलबार और विशाखापट्टनम् जिले का जयपुर प्रदेश , इन दो क्षेत्रों को छोड़कर कहीं भी पाठशालाओं में ब्राह्मण , वैश्य और क्षत्रिय जाति की कन्याएँ नहीं जाती थीं; मछलीपट्टम् , मदुरा , तिनेवेली और कोईम्बतूर के समाहर्ताओं के अनुसार उनमें अधिकांश नर्तिकाएँ थीं अथवा मंदिरों में नृत्य करनेवाली देवदासी थीं
" सारिणी ८ से पता चलता है कि विशाखापट्टनम् के जयपुर प्रदेश में कुमार छात्रों की अपेक्षा सर्वाधिक छात्राओं की संख्या २९ . ७ प्रतिशत थी
उनमें भी ब्राह्मण कुमारों की तुलना में ब्राह्मण कन्याओं का अनुपात ३७ प्रतिशत था
चेन्नई प्रान्त में किए गए इन शैक्षणिक सर्वेक्षणों का इंग्लैण्ड की सरकार ने स्वागत किया
दिनांक १६ अप्रैल १८२८ के दिन इंग्लैण्ड से चेन्नई प्रान्त को लिखे गए एक पत्र में बताया गया कि 'यहाँ भेजी गई जानकारी ज्यादातर अधूरी है और जो भी जानकारी यहाँ मिली है उससे यह प्रतीत होता है कि वहाँ भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धति से किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है
उसने एक ऐसा अभिमत व्यक्त किया था कि सन् १८३० के बाद के वर्षो में बिहार और बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में १ लाख जितनी शालाएँ अभी भी किसी न किसी स्वरूप में अस्तित्व में थीं
कुछ वर्षों के बाद मिशनरी कार्य त्यागकर उन्होंने पत्रकारिता का व्यवसाय अपनाया
सामाजिक स्थिति के बारे में वैविध्यपूर्ण उपयोगी जानकारी एडम के विस्तृत विवरण से एक बात सिद्ध होती है कि ऐसी विस्तृत और वैविध्यपूर्ण जानकारी से युक्त विवरण तैयार करने में एडम ने अच्छा खासा परिश्रम किया था
इससे बंगाल और बिहार में एक लाख पाठशालाएँ थीं ऐसे उसके निरीक्षण को अलग ही रखकर देखें तो भी उसने इन सर्वेक्षणों के द्वारा तत्कालीन सामाजिक और शैक्षणिक परिस्थिति के बारे में जो वैविध्यपूर्ण जानकारी प्रकाशित की है वह सचमुच महत्त्वपूर्ण है
प्रवर्तमान परिस्थिति में इस प्रान्त में १ , ५० , ७४८ गांव हैं अत: कम से कम लगभग एक लाख गाँवों में विद्यालय थे
वह और भी कहता है , 'प्राथमिक शाला की पढ़ाई आम तौर से गाँव के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर में या उसके घर के आसपास किसी स्थान पर की जाती थी
एडम का द्वितीय विवरण एडम के दूसरे विवरण में राजाशाही जिले के नेतोर क्षेत्र में उसने जो सर्वेक्षण किया उसी की जानकारी प्रस्तुत की है
जबकि १५८८ परिवारों के बच्चे घर पर रह कर ही शिक्षा ग्रहण करते थे
एडम प्रत्येक गाँव की भेंट करना चाहता था , किन्तु उसके ध्यान में आया कि 'गाँव में कोई अंग्रेज आ रहा है' ऐसी बात सुनते ही आतंक छा जाता था इस भय , या आतंक को दूर करना आसान नहीं था
भाषा आधारित विभाजन जिन पांच जिलों में सर्वेक्षण किया गया था उससे यह ज्ञात होता है कि शैक्षणिक संस्थाओं की कुल संख्या २ , ५६६ थी जिसका भाषा आधारित विभाजन इस प्रकार है- बंगाली १०९८ , हिन्दी ३७५ , संस्कृत ३५३ , फारसी ६९४ , अरबी ३१ , अंग्रेजी ८ , कन्या ६ और शिशु १
 ( २ ) द्वितीय : ढाई से चार वर्ष : इस अवधि में छात्र को ताड़पत्र पर अक्षरज्ञान दिया जाता था
साथ ही उन्हें हिसाब , पत्र लेखन , आवेदन लेखन आदि की शिक्षा भी दी जाती थी
लेखा विषय का अध्ययन एडम ने अपने सर्वेक्षण में पाठशालाओं में अध्ययन के लिए प्रयुक्त पुस्तकों की सूची दी है
उसकी जिलाश: सूची में बहुत ही अंतर होने पर भी समानता यह है कि इन सभी पाठशालाओं में 'देशी लेखा' विषय की शिक्षा दी जाती थी
हालांकि एक भी मिशनरी पाठशाला में इस विषय की शिक्षा नहीं दी जाती थी
शिक्षा की समयावधि सामान्य रूप से ७ से १५ वर्ष की रहती थी
पर्शियन और एरेबिक शिक्षा संस्थाएँ पर्शियन की शिक्षा देनेवाली संस्थाओं को एडम उच्च शिक्षा की संस्था न मानकर पर्शियन को पाठशाला के केवल एक विषय के तौर पर ही स्वीकार करता है
६ १७५ छात्र अरबी भाषा का अध्ययन करते थे जो अधिकतर मुस्लिम थे
लिटनर अपने सर्वेक्षण में लिखते हैं , 'जब पंजाब अंग्रेजों के आधिपत्य में आया तब वहाँ की विभिन्न स्तर की पाठशालाओं में ३ , ३० , ००० जितने छात्र थे
' उसमें और भी कहा गया है कि , '३५ या ४० वर्ष पूर्व अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों की संख्या में छात्र साहित्य , न्यायशास्त्र , तर्कशास्त्र , तत्त्वचिंतन और आयुर्वेद का उच्च स्तर का अध्ययन करते थे
' उसमें और भी कहा गया है कि , '३५ या ४० वर्ष पूर्व अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों की संख्या में छात्र साहित्य , न्यायशास्त्र , तर्कशास्त्र , तत्त्वचिंतन और आयुर्वेद का उच्च स्तर का अध्ययन करते थे
वैसे तो संगीत तथा नृत्यकला का भी विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता
किन्तु भारत की परंपरागत हुनर कला या तंत्रविद्या का कहीं पर भी उल्लेख न होने का मुख्य कारण यह था कि जिन लोगों ने भारत की परंपरागत शिक्षापद्धति पर लिखा है चाहे वे कोई प्रवासी हों या सरकारी अधिकारी या मिशनरी या कोई विद्वान - उन में किसी को भी भारत की परंपरागत तंत्रविद्या या हुनर कला में विशेष रुचि नहीं थी
तात्पर्य यह है कि कोई निश्चित जाति के अनेक लोग किसी एक निश्चित कारीगरी या तंत्रविद्या का ज्ञान रखते थे
एक यथार्थ यह है कि भारत में अंग्रेजों का शासन स्थापित होने के कुछ ही दशकों में भारत की परंपरागत बुनियादी शिक्षा पद्धति की भारी उपेक्षा होने लगी थी
अंग्रेजों का भारत में शासन स्थापित होने से पूर्व , भारत का सामाजिक जीवन तथा भारत के निर्यात आदि के यूरोपीयों ने किए वर्णनों के द्वारा भी यही सिद्ध होता है कि भारत उस समय अत्यंत समृद्ध और जीवित राष्ट्र था
एक विनाश का और दूसरा पुन:निर्माण का
एशिया की प्राचीनतम समाजव्यवस्था को नष्ट करके इंग्लैण्ड को एशिया में पाश्चात्यीकरण की बुनियाद डालनी है
'*॰ इस प्रकार इंग्लैण्ड के द्वारा योजनाबद्ध विनाश का शिकार केवल भारत ही नहीं , बल्कि विश्व के और देश भी बने हैं
इस प्रकार उन्हें पता चल गया कि अंग्रेजों ने उनकी सामाजिक , आर्थिक व्यवस्था को आमूल नष्ट कर दिया है
दु:खदायक तो यह था कि मार्क्सवाद , समाजवाद या पूंजीवाद के पश्चिमी विचारों से प्रभावित भारतीयों के विचार अपने ही देश के विषय में द्वेषपूर्ण विचार करने वाले विलियम बिल्बरफोर्स , जेम्स मिल या मार्क्स के विचारों से मिलते थे
भारत की इस प्रकार की सामाजिक , आर्थिक स्थिति के बीच सन् १९३१ में अंग्रेज सरकार द्वारा आयोजित गोल मेज परिषद में भाग लेने के लिए महात्मा गांधी लंदन गए थे
लोर्ड लोधिअन की अध्यक्षता में , दिनांक २० अक्तूबर , १९३१ के दिन उस सभा में इंग्लैण्ड के अनेक प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे १२ वहाँ गांधीजी द्वारा दिए प्रवचन से इंग्लैण्ड में काफी हलचल मच गई थी
सरकारी व्यय के बारे में बताया कि , 'यहाँ प्रधानमंत्री को सामान्य नागरिक की अपेक्षा ५० गुना अधिक वेतन मिलता है , जबकि वाइसरॉय को ५०० गुना राशि वेतन में दी जाती है
शिक्षा के बारे में चर्चा करते हुए गांधीजी ने दो बातों पर सबका ध्यान आकर्षित किया ( १ ) भारत में आज ५० या १०० वर्ष पूर्व जो थी उससे अधिक निरक्षरता दिखाई देती है और ( २ ) अंग्रेज अधिकारी शिक्षा और संबंधित विषयों पर ध्यान देने के बजाय शिक्षा पद्धति को नष्ट भ्रष्ट कर रहे हैं , उन्होंने भारत की शिक्षा परंपरा के प्राण ले लिए हैं
गांधीजी की इस चुनौती को अंग्रेज सर फिलिप हार्टोग ने स्वीकार कर लिया
यह हार्टोग 'द स्कूल ऑफ ओरिएन्टल स्टडीज , लंदन' ( The School of Oriental Studies , London ) का एक संस्थापक था
ये लेख थे ( १ ) 'द डिक्लाइन ऑफ मास एजुकेशन इन इन्डिया' ( The Decline of Mass Education in India ) और ( २ ) 'हाउ इण्डियन एज्यूकेशन वॉज क्रश्ड इन द पंजाब' ( How Indian Education was Crushed in the Punjab ) | ये दोनों लेख ज्यादातर एडम के रिपोर्ट्स , जी . डबल्यू लीटनर की प्रकाशित पुस्तक और पंजाब सरकार द्वारा प्रकाशित किये गये अधिकृत साहित्य पर ही आधारित थे
तथापि फिलिप हार्टोग को गांधीजी के दिए स्रोत अपूर्ण ही लगे और उन्होंने गांधीजी को उनका कथन वापस लेने का आग्रह किया
उन्हें यरवडा जेल में रखा गया
जेल से ही दिनांक १५-२-१९३२ को हार्टोग को पत्र लिखकर गांधीजी ने बताया कि वर्तमान परिस्थिति में वे , उन्हें चाहिए वैसे प्रमाण भेज नहीं सकते हैं इसलिए यह कार्य उन्होंने प्रा . के . टी . शाह को सौंपा है'
' यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि हार्टोग को प्रा . के . टी . शाह का विस्तृत विवरणयुक्त पत्र निरर्थक ही लगा
व्यक्ति तथा उसकी मानसिकताओं की तुलना करना ठीक नहीं है , तथापि यहाँ एक बात तो स्पष्ट दिखाई देती है कि विन्सेन्ट स्मिथ लिखित 'अकबर , द ग्रेट मोगल' ( Akbar , the Great Mogal ) नामक पुस्तक पढ़ने के बाद डबल्यू , एच . मार्लेन्ड को जिस प्रकार के मनोभाव जागे , उस प्रकार के मनोभाव सर फिलिप हार्टोग को प्रा . के . टी . शाह का पत्र पढ़कर जागे होने चाहिए
स्मिथ ने अपनी एक पुस्तक में टिप्पणी की है कि , 'आज के खेतिहर मजदूरों की अपेक्षा अकबर और जहांगीर के समय में भूमिहीन खेतिहर मजदूर ज्यादा सुखी थे
मनरो के आंकड़ों का इन्कार करते हुए हार्टोग बताते हैं कि ''शिक्षा में केम्पबेल के समान रूचि तथा सतर्कता नहीं रखनेवाले समाहर्ताओं के द्वारा प्राप्त जानकारियों के आधार पर मनरो के द्वारा छात्रों की संख्या बढ़ाकर दर्शाई होने की संभावना है
उस पत्रक में एक टिप्पणी जोड़कर वह कहता है कि , इंग्लैण्ड में शिक्षा के लिए सर्वप्रथम संसद ने सन् १८३३ में ३० , ००० पाउन्ड का हिस्सा अलग रखा था
हार्टोग ज्ञानी और अनुभवी था , फिर भी उसके द्वारा की गई स्पष्टताओं में कल्पनाशक्ति की कमी तथा इतिहास को समझने की असमर्थता दिखाई देती है क्योंकि वह सन् १९३९ से पूर्व के इंग्लैण्ड में प्रचलित बातों को ही जड़ता से पकडे़ रहता है
कारण कुछ भी हो , किन्तु १८वीं शताब्दी के अन्त और १९वीं शताब्दी के आरंभ में भारत में अस्तित्व रखनेवाली ऊँची साक्षरता दर और शैक्षणिक सुविधाओं की जो बात गांधीजी तथा अन्य लोगों ने की थी उसको स्वीकार करने के लिए हार्टोग तैयार नहीं था
' हार्टोग के व्याख्यान से संबंधित पुस्तक पर तो भारत में अनेक लेख भी लिखे गए
अक्तूबर १९३१ में लंडन स्थित चेथम हाउस में गांधीजी ने जो प्रवचन दिया था उसका रहस्य फिलिप हार्टोग समझा ही नहीं था
इससे शिक्षा की दुर्गति हुई उसके २०-३० वर्ष पूर्व स्वाभाविक रूप में ही इससे बड़ी संख्या में छात्र विद्यालयों में अध्ययन करते हों ऐसा मानने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है , क्योंकि ऐसा भी निर्देश कहीं प्राप्त नहीं होता है कि यह आंकड़ा वर्ष १८२२-२५ के छात्रों की संख्या से कम था
सन् १८०३ के बाद से ही इंग्लैण्ड में शालाओं में जानेवाले छात्रों की संख्या बढ़ने लगी थी
५० वर्षों में इंग्लैण्ड में छात्रों की संख्या २९ गुना बढ़ी थी
किन्तु संख्यात्मक वृद्धि के साथ साथ इंग्लैण्ड की शिक्षा व्यवस्था में कोई गुणात्मक विकास नहीं हुआ था
गांधीजी ने इस समूचे घटनाक्रम का ऐतिहासिक , सामाजिक और मानवीय परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन किया था
वर्ष १८७५ में शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या बढ़ी और उसी के साथ जनसंख्या भी बढ़कर ३ , ५६ , ४१ , ८२८ हुई और कुमार तथा कन्या छात्रों की संख्या बढकर क्रमश: ६ , ८१ , १७४ और १ , १० , ४६० की हुई थी
कुमार छात्रों की संख्या बढ़कर ३४ . ४ प्रतिशत हुई , जो टोमस मनरो के सन् १८२६ के सर्वेक्षण में ३३ . ३ प्रतिशत कुछ समीप है
वैसे सभी सत्ताधीशों की तरह अंग्रेजों ने भी अपनी उपलब्धि की प्रशंसा करने में कमी नहीं रखी थी
उन्होंने १९वीं शताब्दी के अंत में शिक्षा में हुई संख्यात्मक वृद्धि को बढ़ा-चढ़ाकर प्रसिद्धि दी
अत: इन आंकड़ों के बारे में स्वाभाविक रूप से सन्देह निर्माण हो सकता है , किन्तु वर्ष १८२२-'२५ के आंकड़ों के लिए सन्देह इसलिए नहीं होता क्योंकि तब इन आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने के लिए अंग्रेजों के पास कोई भी तात्विक कारण नहीं था
१९वीं शताब्दी के अंत में अगर इधर उधर कोई संस्था बच भी गई थी तो उसे भी अंग्रेज परंपरा की शिक्षा रीति ने भस्म कर दिया था
इतना ही नहीं भारत को एक सनातनी , असंस्कारी , जंगली , संकुचित , रूढ़ियों को माननेवाले लोगों का देश बताया जाता है तथा अज्ञान , गरीबी व अत्याचार अनादिकाल से इस देश के भाग्य में लिखा हुआ है , ऐसा ठोंक-ठोंककर बताने के लिए विदेशियों के उद्धरण प्रस्तुत करने में हमेशा तत्पर ऐसा एक बड़ा वर्ग आज भी भारत में है
इतना ही नहीं भारत को एक सनातनी , असंस्कारी , जंगली , संकुचित , रूढ़ियों को माननेवाले लोगों का देश बताया जाता है तथा अज्ञान , गरीबी व अत्याचार अनादिकाल से इस देश के भाग्य में लिखा हुआ है , ऐसा ठोंक-ठोंककर बताने के लिए विदेशियों के उद्धरण प्रस्तुत करने में हमेशा तत्पर ऐसा एक बड़ा वर्ग आज भी भारत में है
१८वीं और १९वीं शताब्दी में भारत में आए हुए अंग्रेज अधिकारी और प्रवासी तथा अन्य यूरोपीयों के लेखों के आधार पर ही चार्ल्स मेटकाफ और हेनरी मोइनी ने भारत को 'प्रजातांत्रिक' गाँवों का देश' कहा था
हालांकि भारत का इतिहास यही कहता है कि भारतीय समाज और राजतंत्र चाहे एक राष्ट्र के तौर पर सदा संगठित और एकसूत्र में गुंफित रहते थे , यह समाज या शासनतंत्र किसी एक केन्द्रीय व्यवस्था से कभी भी जुडे़ हुए नहीं थे
इसके अभिलेखीय प्रमाण अंग्रेज सरकार की टिप्पणियों से भी मिलते हैं
इस प्रकार सरकार के साथ समाज भी शिक्षा के क्षेत्र में आवश्यक योगदान देता रहता था
'चाकरन' श्रेणी से प्रशासन और अर्थव्यवस्था या लेखा विभाग के कर्मचारियों का वेतन दिया जाता था
जबकि 'बाजी' श्रेणी से धार्मिक और सेवा से संबंधित क्रियाकलापों के साथ जुड़े हुए लोगों को सहायता की जाती थी
बंगाल , बिहार में श्रेणी से आर्थिक सहायता प्राप्त करनेवाले व्यक्ति और संस्थाओं की कुल संख्या ३० , ००० से ३६ , ००० जितनी ऊँची थी
सन् १७५० से १८०० के मध्य राजकीय , सामाजिक अनवस्था के वर्षों के बाद चेन्नाई प्रांत में अंग्रेजों का पूर्ण शासन स्थापित हुआ
सन् १८०१ में बेल्लारी और कन्नड़ जिलों की लगभग ३५ प्रतिशत कृषि की जमीन किसी भी प्रकार के राजस्व से मुक्त थी , किन्तु टोमस मनरो ने ऐसी 'राजस्व मुक्त' जमीन की मात्रा येनकेन प्रकारेण केवल ५ प्रतिशत कर दी
सन् १८०५ से १९२० के वर्षों में चेन्नई प्रांत के विभिन्न जिलों से प्राप्त टिप्पणियों के आधार पर समाज के व्यक्तियों तथा संस्थाओं को दी जानेवाली सहायता के बारे में बहुत जानकारी प्राप्त होती है
स्टार पेगोडा वह मुद्रा थी जिसका मूल्य ३ . ५० रु . होता था
अंग्रेज सरकार से प्राप्त जानकारी से ज्ञात होता है कि चेन्नई प्रांत की तरह अन्य सभी प्रांतों में भी विभिन्न प्रकार से दी जानेवाली सहायताओं की मात्रा लगभग समान ही रहती थी
इससे यह कहा जा सकता है कि , अंग्रेज सरकार की राजस्व आय का लगभग ३३ प्रतिशत हिस्सा इस प्रकार के सामाजिक , सांस्कृतिक उत्कर्ष के कार्य में खर्च होता था
टीपू सुलतान के समय में भी मलबार में भू राजस्व दर अत्यंत कम था
सन् १७५७-'५८ के बाद बंगाल और बिहार में ऐसी सहायता देना बंद कर दिया गया था और सन् १८०० तक 'चाकरन' और 'बाजी' श्रेणियों से दी जानेवाली सहायता बंद कर दी गई थी
भारत की बुनियादी , परंपरागत शिक्षा पद्धति के बारे में बेल्लारी जिले के समाहर्ता का विवरण प्रचुर जानकारियों से समृद्ध और प्रसिद्ध है
वे बताते हैं कि 'शिक्षा पद्धति के क्षय के बारे में तो देश में शनै: शनै: सर्वत्र फैलती जानेवाली गरीबी ही जिम्मेदार है
बेल्लारी के समाहर्ता कैम्पबेल एक समझदार और अनुभवी अधिकारी थे
समाहर्ता बनने से पूर्व उन्होंने बोर्ड ऑफ रेवन्यू के सचिव के तौर पर काम किया था
' मनरो कितने भी सक्षम क्यों न हों वे एक अंग्रेज गवर्नर थे और यह कहने की स्थिति में नहीं थे कि जबसे अंग्रेजों ने सारी राजस्व आय की व्यवस्था केन्द्रस्थ की तब से यहाँ की शिक्षा पद्धति के पतन का प्रारंभ हुआ था
दिनांक २५-६-१८५३ को न्यूयोर्क के दैनिक 'डेइली ट्रिब्यून' में मार्क्स भारत को 'ईसाई मत की स्थापना के पूर्व से ही सदा के लिए दरिद्र और कंजूस देश' बताता है , भारतीय समाज जीवन को सर्वथा निष्प्राण , गौरवहीन और गतिहीन बताता है
इस पुस्तक में मिल ने लिखा है , 'काम करने में गंभीरता की कमी , असत्य , छलकपट , औरों की संवेदनाओं की उपेक्षा , भ्रष्टाचार आदि हिन्दूओं और मुस्लिमों के सामान्य लक्षण हैं
वे कायर , संवेदनाहीन , आत्मवंचना में डूबे हुए , हमेशा औरों की आलोचना करनेवाले तथा जुगुप्सा की सीमा तक गंदे होते हैं
' सामंतशाही समय के यूरोप के लोगों के साथ भारत के लोगों की तुलना करके मिल लिखता है , 'यूरोप के लोगों में अनेक कमियाँ और दोष रहते हुए भी दर्शनशास्त्र , न्यायपद्धति और शासन व्यवस्था के क्षेत्रों में वे भारतीयों से तो कहीं आगे थे
यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में युद्ध कौशल में भी हिन्दू निम्न कक्षा के थे
इससे भी आगे अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति को 'खराब' और उसके अंत की ओर गतिमान पद्धति बताया था
जबकि गांधीजी ने इस शिक्षा पद्धति को मूल से उखाड़ दिये गये वृक्ष के समान बताया था
' अंग्रेजों के आत्यंतिक लोभ के कारण भारतीय समाज , धर्म और संस्कृति जिन आधारों पर टिके थे , वे मूल स्रोत ही अदृश्य होने लगे थे
बेल्लारी के समाहर्ता ए . डी . केम्पबेल के उपर्युक्त अति प्रसिद्ध पत्र का आधार लेकर अंग्रेजों ने ऐसा रौब जताने का प्रयत्न किया था कि भारत में अक्षरज्ञान केवल व्यावसायिक व्यवहार चलाने के लिए' ही दिया जाता है
उसने कहा , 'भारत का समस्त ज्ञान और विद्वत्ता यूरोप के किसी अच्छे पुस्तकालय के एक टाँडे में ही समाया है
' मेकोले को भारत का समस्त ज्ञान , साहित्य , धर्म , सभ्यता , विद्वत्ता आदि सर्वथा निकम्मे लगते थे
विल्बर फोर्स , मेकोले और मार्कस की तरह मिल को भी भारत के शिष्टाचार , रीतिरिवाज तथा सभ्यता अत्यंत जंगली लगती थी , और ऐसे भारत को सुधार कर उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के मार्ग उसने बताए थे
शिक्षा पद्धति का मखौल करने से , शिक्षा के सभी स्रोत बंद कर देने से ही उनका इच्छित कार्य सिद्ध हो जाता था
आनेवाले दिनों में अंग्रेज भारत में क्या करना चाहते थे , उसके संकेत हमें लंदन से चेन्नई सरकार को लिखे गए एक पत्र से प्राप्त होते हैं
चेन्नई प्रांत में भारतीय शिक्षापद्धति पर हुए सर्वेक्षणों की सभी जानकारी लंदन भेजी गई उससे पूर्व यह पत्र लिखा गया है
इस पत्र में सर्वेक्षण का स्वागत किया गया था तथा इन सर्वेक्षणों के द्वारा शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अंग्रेजों द्वारा हड़प लिया जाएगा ऐसा भय लोगों में न फैलने पाए उसकी सतर्कता बरतने की सूचना समाहर्ताओं को दी गई थी उसका इस पत्र में समर्थन किया गया था
साथ ही उसका क्रियान्वयन इस शिक्षापद्धति का लगातार मजाक उड़ा कर , आलोचना करके और सर्वथा उपेक्षा करके किया जा रहा था
परिणामस्वरूप , भारत की मूल परंपरागत शिक्षा पद्धति मृत:प्राय बनती गई और आखिर नष्ट हो गई
इस प्रकार भारतीय शिक्षा पद्धति का जड़ समेत नाश होने के लिए अंग्रजों के कृत्य जिम्मेदार हैं
सर्वप्रथम तो भारत में साक्षरता के विषय में ऐसी तबाही मच गई कि समग्र विश्वभर में प्रचारित प्रसारित किए गए साक्षरता के अनेक प्रयासों के बावजूद भारत में साक्षरता क्षेत्र में आज सफलता नहीं मिल पाई है
दूसरा , उससे भारत में शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त सामाजिक संतुलन का भी अंत हो गया है
उस शिक्षा पद्धति का अंत होने से आज जो अनुसूचित जाति के लोग कहे जाते हैं , उनकी सामाजिक स्थिति बहुत ही गिर गई है
३७ . देखिए अध्याय ४ और ५ के अतिरिक्त लंदन से बंगाल सरकार को ३ जून , १८१४ के दिन लिखे गए पत्र में बताया गया है कि , 'भारत में चिरकाल से पारंपरिक रूप से चली आ रही शिक्षापरंपरा , जो हमारे देश में चेन्नई से पूर्व पादरी डॉ . बेल के द्वारा लाई गई थी , की यहाँ सर्वत्र प्रशंसा हो रही है
व्यवसायों में जाति के परिप्रेक्ष्य में कुछ जानकारी १७ सितम्बर १८२१ तथा ९ मार्च १८३७ के चेन्नई बोर्ड ऑव् रेवन्यू प्रोसीडिंग्स से भी मिल जाती है
४५ . गूंटुर का समाहर्ता भी डबल्यू एडम जैसा ही अभिमत रखता है
५० . अनेक प्रमाणों से यह ज्ञात होता है कि इंग्लैण्ड के लोग इस बात का स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थे कि शिक्षा प्राप्त करनेवाले छात्रों की संख्या इंग्लैण्ड की अपेक्षा भारत में अधिक थी
किन्तु हिन्दू-मुस्लिम छात्रों का तथा कुमार और कन्या छात्रों का विभाजन सन् १८३२ में हाऊस ऑफ कोमन्स पेपर्स में प्रकाशित हुआ था
टोमस मनरो ने हाऊस ऑफ कोमन्स के समक्ष इन प्रमाणों के साथ बताया था कि 'अगर सांस्कृतिक आधार पर इंग्लैण्ड और भारत के बीच आदान-प्रदान किया जाए तो इंग्लैण्ड के हिस्से में आयात करना ही होगा
एडम ने लिखा है , 'जब बालक चार वर्ष , चार मास और चार दिन का होता है तब उसे शाला में प्रवेश दिया जाता है' , पू . १४९ ) ५७ . इस सर्वेक्षण का शीर्षक था 'हिस्ट्री ऑफ इन्डिजीनस एज्यूकेशन इन दी पंजाब सिन्स एनक्सेशन एण्ड इन १८८२ . " ( प्रथम प्रकाशन १८८३ , पुनर्मुद्रण , १९७३ , पटियाला ) | ५८ . सर्वत्र शासन करने का स्वयं को दैवी अधिकार प्राप्त हुआ है , ऐसा अंग्रेज पहले से ही मानते आए हैं
एडम ने लिखा है , 'जब बालक चार वर्ष , चार मास और चार दिन का होता है तब उसे शाला में प्रवेश दिया जाता है' , पू . १४९ ) ५७ . इस सर्वेक्षण का शीर्षक था 'हिस्ट्री ऑफ इन्डिजीनस एज्यूकेशन इन दी पंजाब सिन्स एनक्सेशन एण्ड इन १८८२ . " ( प्रथम प्रकाशन १८८३ , पुनर्मुद्रण , १९७३ , पटियाला ) | ५८ . सर्वत्र शासन करने का स्वयं को दैवी अधिकार प्राप्त हुआ है , ऐसा अंग्रेज पहले से ही मानते आए हैं
'ए ब्रीफ डिस्क्रिप्शन ऑव न्यूयोर्क , फोर्मरली कॉल्ड न्यू नेदरलेन्ड्ज्स ( १६७० ) नामक पुस्तक में डेनियल ने लिखा है , 'अंग्रेज निवासी के तौर पर सबसे पहली बार जब इस क्षेत्र में आए तब से ही भगवान ने मानो उन्हें शासन करने का अधिकार दे दिया लगता था
उसे भारतीय कला वैभव तो अपरिचित विषय ही लगता है
इस प्रकार शिक्षक भी 'सार्वजनिक सेवक' की श्रेणी में आ जाते हैं
३ . सर टोमस मनरो मद्रास प्रेसीडेन्सी की शिक्षा व्यवस्था विषयक १८२२-२६ १ . १ . भारत के लोगों के अज्ञान तथा उनमें ज्ञान प्रसार के साधनों के बारे में इंग्लैंड में , अथवा इस देश में बहुत कुछ लिखा गया है
समग्र देश में शिक्षा की वास्तविकता जानने के लिए कोई अभिलेख नहीं है
स्त्रियों की सादगी के लिए इसे अयोग्य माना गया है , और सार्वजनिक नर्तिकाओं के लिए ही वह ठीक माना गया है; किन्तु राजबंदा व हिन्दुओं की कई और जातियां जिनमें इस प्रकार का पूर्वाग्रह नहीं है , उनकी स्त्रियों को पढ़ाया जाता है
स्त्रियों की सादगी के लिए इसे अयोग्य माना गया है , और सार्वजनिक नर्तिकाओं के लिए ही वह ठीक माना गया है; किन्तु राजबंदा व हिन्दुओं की कई और जातियां जिनमें इस प्रकार का पूर्वाग्रह नहीं है , उनकी स्त्रियों को पढ़ाया जाता है
प्रति , सज्जनों तथा राजस्व विभाग के बोर्ड के अध्यक्ष तथा सदस्य , मुझे बताया गया है कि माननीय गवर्नर इन काउन्सिल इस बात को अत्यंत महत्त्वपूर्ण और रोचक मानते हैं कि सारे देश से शिक्षा की स्थिति के बारे में उपलब्ध सभी निश्चित स्वरूप की जानकारी प्राप्त की जाए
जिन शालाओं में लिखाई पढ़ाई सिखाई जाती है वैसी शालाओं की संख्या , उनमें अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या , उनकी जाति , शाला में छात्रों की अध्ययन अवधि , उन से लिया जानेवाला मासिक या वार्षिक शुल्क तथा इनमें कोई शाला अगर लोगों के दान से चलती है तो उस दान के प्रकार और राशि आदि की जानकारी समाहर्ताओं को बताएँ
धर्मशास्त्र , कानून , खगोलशास्त्र आदि विषयों की शिक्षा देनेवाले कोलेज या संस्थाएँ हों तो वे भी जानकारी दें
पूर्व की सरकारों से किसी भी प्रकार की सहायता कभी ली गई हो , वैसी एक भी शाला यहाँ नहीं है
३ . गाँवों में या शहरों में उच्च वर्ग के ब्राह्मण बच्चों की शिक्षा गाँव के मुखिया के मकान में होती है
वह शिक्षक का चयन करता है , जिसे प्रति छात्र कुछ राशि दी जाती है
इस प्रकार गाँव के मौलवी मुसलमान बच्चों को पढ़ाते हैं
छात्रों को वाचन , लेखन तथा गणित का अध्ययन करवाया जाता है
लोगों का समूह कृषि कार्य करता है
यह प्रदेश जंगल तथा घाटियों में फैला और छिटपुट छोटे घरों से बना है
लोग मुख्य रूप से कोंकणी हैं
इतने विस्तीर्ण जिले में एक ही सरकारी नौकर पर्शियन लिख सकता है
विद्यालयों में पढ़ना , लिखना और गिनना , इस के अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण कुछ नहीं सिखाया जाता
४ . शिक्षक को हर छात्र से प्रतिमास पांच आने मिलते हैं
२ . वर्तमान में प्रचलित शिक्षा-प्रथा की प्राप्त जानकारी अत्यंत सीमित है
४१ शिक्षकों के बीच इनका बँटवारा करने से प्रत्येक को औसतन वर्ष में ५७ रूपए , ५ आना और ५ पाई मिलते हैं , जो बहुत ही कम और अपूर्ण है
३ . बच्चों के शालाप्रवेश की कम से कम आयु ५ वर्ष है
धर्मशास्त्र , कानून आदि पढ़नेवाले छात्र १५ वर्ष की आयु में अध्ययन आरंभ करते हैं और इन विषयों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए कोई व्यवसाय शुरू करने तक अलग-अलग कॉलेजों में अध्ययन चालू रखते हैं
शुल्क की राशि का आधार छात्र की स्थिति पर निर्भर करता है
मैं सोच रहा था कि अगर गरीब लोग शाला में अपने बच्चे भेजने लगें तो शालाओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है या नहीं
२ . सारिणी से ज्ञात होगा कि लगभग ८ , ०० , ००० की जनसंख्या में केवल ८४४ शालाएँ हैं और उनमें १३ , ७२१ छात्र पढ़ते हैं
तंजावुर , नागपट्टम् जे . कोटन २८ जून १८२३ प्रधान समाहर्ता विशेष : छात्र सामान्य रूप से पांच वर्ष विद्यालय में रहते हैं | औसत से मासिक ४ डी फेनम का शुल्क उनसे लिया जाता है | निःशुल्क चलनेवाले विद्यालयों में से १९ मिशन से संलग्न हैं , २१ विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन राजा देते हैं , १ विद्यालय के शिक्षकों का वेतन त्रिवलूर धर्मस्थान देता है , तीन विद्यालयों के शिक्षक बिना वेतन लिए पढ़ाते हैं| व्यक्तिगत रूप से सरकारी अनुदान प्राप्त विद्यालय एक भी नहीं है | केवल मिशन से सहायता प्राप्त होती है | उसके अतिरिक्त एक गांव का सर्वसामान्य होता है जिसका मूल्य १ , १०० रुपये अनुमानित है |
तंजावुर , नागपट्टम् जे . कोटन २८ जून १८२३ प्रधान समाहर्ता विशेष : छात्र सामान्य रूप से पांच वर्ष विद्यालय में रहते हैं | औसत से मासिक ४ डी फेनम का शुल्क उनसे लिया जाता है | निःशुल्क चलनेवाले विद्यालयों में से १९ मिशन से संलग्न हैं , २१ विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन राजा देते हैं , १ विद्यालय के शिक्षकों का वेतन त्रिवलूर धर्मस्थान देता है , तीन विद्यालयों के शिक्षक बिना वेतन लिए पढ़ाते हैं| व्यक्तिगत रूप से सरकारी अनुदान प्राप्त विद्यालय एक भी नहीं है | केवल मिशन से सहायता प्राप्त होती है | उसके अतिरिक्त एक गांव का सर्वसामान्य होता है जिसका मूल्य १ , १०० रुपये अनुमानित है |
उनकी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप वे शाला में रहते हैं
५ . सातगुड तेहसील की फारसी शाला प्रति छात्र १/४ रुपये के 'याम्य' अनुदान से चलती है
वहाँ लगभग ८ विद्यार्थी फारसी भाषा का अध्ययन करते हैं
कुछ संपन्न लोग और स्वेच्छा से अपना समय देनेवाले विद्वान ऐसी संस्थाएँ चलाते हैं
२ . कोई व्यवस्थित कॉलेज यहाँ नहीं है , किन्तु उच्च शिक्षा के केन्द्र हैं और वहां छात्र पढ़ते भी हैं
२ . कोई व्यवस्थित कॉलेज यहाँ नहीं है , किन्तु उच्च शिक्षा के केन्द्र हैं और वहां छात्र पढ़ते भी हैं
२ . इन शालाओं में प्रत्येक में एक शिक्षक है तथा मलबारी तथा स्थानीय भाषाओं में लिखना पढना सिखाया जाता है
सुबह ६ बजे से लेकर १० और दोपहर १२ से २ तथा अपराह्न ३ से ८ के दौरान छात्र शाला में आते हैं
नेल्लोर के समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति २३-६-१८२३ ( टी . एन . एस . ए : बी . आर . पी . : खण्ड ९५२ का . ३०-६-१८२३ , पू . ५१८८-९१ , क्र . २६ ) १ . आपके गत २५ जुलाई के पत्र का उत्तर मैंने पहले ही दिया होता
प्रत्येक छात्र दो आने से लेकर ४ रुपए तक प्रति मास अपने शिक्षक को देता है
छात्र की शिक्षा का खर्च प्रति मास निवास और साधन सामग्री का एक रुपया और अंग्रेजी भाषा पढ़नी है तो उसके दो रुपए होता है
६ . पाँच वर्ष की आयु में छात्र शाला में प्रवेश पाता है
ऊपर निर्देशित शुल्क के अतिरिक्त विद्यार्थी हर पन्द्रह दिन में एक बार एक सेर चावल देता है
शाला के प्रथम प्रवेश के समय भी शिक्षक को उपहार दिया जाता है
किन्तु जमीनदारी तेहसीलों में शालाओं के बारे में आपने माँगी जानकारी संचित करने में अनिवारणीय रुकावटें आने से वैसा नहीं हो पाया
अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उत्सुक कुछ लोग , पढ़ेलिखे लोगों को अपने घर बच्चों को पढ़ाने हेतु निमंत्रित करते हैं
अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उत्सुक कुछ लोग , पढ़ेलिखे लोगों को अपने घर बच्चों को पढ़ाने हेतु निमंत्रित करते हैं
यह सब उन्हें रेत पर उंगलियों से लिखना होता है
साथ ही पत्रव्यवहार , गणितशास्त्र , लेखा आदि की शिक्षा छात्र की रुचि के अनुरूप दी जाती है
५ . वेदपाठी ब्राह्मण छात्रों को इसमें कौशल प्राप्त करने पर वैदिक और शास्त्रोक्त महाविद्यालय में प्रवेश दिया जाता है
७ . इस देश के अधिकांश नगर और गाँवो में ब्राह्मण , उनके छात्रों को वेद और शास्त्र , महाविद्यालयों में या अन्य स्थानों पर या अपने घरो में सिखाते हैं
७ . इस देश के अधिकांश नगर और गाँवो में ब्राह्मण , उनके छात्रों को वेद और शास्त्र , महाविद्यालयों में या अन्य स्थानों पर या अपने घरो में सिखाते हैं
इसमें ३३ छात्रों को अध्ययन करवाया जाता था
१० . भोजन और वेश के साथ हिन्दू छात्रों को लगभग मासिक ६ आने का पारिश्रमिक कागज , स्लेट और पुस्तकों आदि के लिए शाला के शिक्षकों को देना होता है
छात्र का निर्वाह और पुस्तकों का वार्षिक खर्च लगभग साठ रुपए होता है
मुस्लिम छात्रों की संख्या २३६ है
२ . सामान्यत: ७ से १५ वर्ष की आयु के छात्र शाला में पढते हैं
पढाई का खर्च वार्षिक औसतन ७ पेगोडा होता है
३ . और कहीं नहीं , किन्तु केवल जयलूर तेहसील में ७ शालाएँ ऐसी हैं जिन्हें किसी देशी सरकार ने शिक्षकों के निर्वाह हेतु ४४ से ४७ कणी जमीन दी है
जिले में कुल ५३३ शालाएँ हैं , जिनमें ६ , ६४१ छात्र अध्ययन करते हैं
बेल्लारी के समाहर्ता बोर्ड ऑव् रेवन्यू के प्रति , १७-८-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९५८ का . २५-८-१८२३ , पृ . ७१६७-८५ , क्रमांक : ३२-३३ ) १ . आपके पत्र दिनांक २५-७-१८२२ और १९-६-१८२२ के आदेश के अनुरूप संलग्न पत्रक , जो वस्तुत: अधिकारियों की आवश्यक जानकारी भेजने में देर हो जाने से , आपको पहुँचाने में भी देर हो गई है
बेल्लारी के समाहर्ता बोर्ड ऑव् रेवन्यू के प्रति , १७-८-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९५८ का . २५-८-१८२३ , पृ . ७१६७-८५ , क्रमांक : ३२-३३ ) १ . आपके पत्र दिनांक २५-७-१८२२ और १९-६-१८२२ के आदेश के अनुरूप संलग्न पत्रक , जो वस्तुत: अधिकारियों की आवश्यक जानकारी भेजने में देर हो जाने से , आपको पहुँचाने में भी देर हो गई है
३ . हिन्दू छात्रों की संख्या ६ , ३९८ तथा मुस्लिम छात्रों की संख्या केवल २४३ है
लगभग २३ शिक्षा संस्थाएँ ऐसी हैं जहाँ केवल ब्राह्मण ही अध्ययन करते हैं
उन्हें धर्मशास्त्र , खगोलशास्त्र , तर्कशास्त्र , न्यायशास्त्र जैसे हिन्दू शास्त्रों की शिक्षा संस्कृत भाषा में दी जाती है
उन्हें धर्मशास्त्र , खगोलशास्त्र , तर्कशास्त्र , न्यायशास्त्र जैसे हिन्दू शास्त्रों की शिक्षा संस्कृत भाषा में दी जाती है
६ . हिन्दू बच्चों की शिक्षा पाँच वर्ष की आयु में शुरू होती है
बालक जब पाँच वर्ष का होता है , तब उसे जिस शाला में प्रवेश प्राप्त करना है वहाँ के शिक्षक और अन्य छात्रों को उस बालक के मातापिता अपने घर निमंत्रित करते हैं
सभी बच्चे गणेशजी की प्रतिमा के चारों और बैठते हैं
अध्ययन शुरू करने वाले बच्चे को गणेशजी के सम्मुख बिठाया जाता है
भगवान को नैवेद्य अर्पण किया जाता है
७ . कई मातापिता आर्थिक स्थितिवश या अन्य कारणों से अपने बच्चों को केवल पाँच वर्ष पढ़ाकर शाला से उठा लेते हैं , किन्तु जिनके मातापिता अपनी संतान के मानसिक विकास और संस्कार का ध्यान रखते हैं , वे १४ से १५ वर्ष तक विद्याभ्यास करते हैं
शाला में पहली बार प्रवेश करनेवाले छात्र की हथेली पर विद्यादेवी सरस्वती का नाम लिखा जाता है जो कि सम्मानदर्शक होता है
शाला में पहली बार प्रवेश करनेवाले छात्र की हथेली पर विद्यादेवी सरस्वती का नाम लिखा जाता है जो कि सम्मानदर्शक होता है
निम्न श्रेणी के छात्र कक्षा के वरिष्ठ छात्र के अधीन रहते हैं , जबकि ऊपर की कक्षा के छात्रों को स्वयं शिक्षक पढाते हैं
निम्न श्रेणी के छात्र कक्षा के वरिष्ठ छात्र के अधीन रहते हैं , जबकि ऊपर की कक्षा के छात्रों को स्वयं शिक्षक पढाते हैं
लिखने के लिये जो पेन्सिल प्रयुक्त होती है उसे 'बुट्टापा' कहा जाता है
जोड , बाकी , गुणा आदि सरल हिसाब सिखाया जाता है | बाद में और अधिक परिश्रम करके भी उसे अपूर्णांक संख्या का हिसाब सिखाया जाता है
छात्रों को वजन , धारिता और कद के नाप , पहाडा , अंकगणित के नियम आदि दिन में दो बार मोनिटर के द्वारा दोहराये जाते हैं
ये तीन पुस्तकें हैं रामायण , महाभारत और भागवत
१३ . मनोरंजक कहानियों के लिए पंचतंत्र , वैतालपंचविंशति , पंकिल सुयुक्ताहह्लर आदि पुस्तकें भी पढ़ाई जाती हैं
इनमें निघंटु , अमर , शब्दामृत , शब्दमुनिदर्पण , व्याकरण , आंध्रदीपिका , आंध्रनामसंग्रह आदि पुस्तकों का समावेश होता है
१४ . तेलुगु और कन्नड भाषी सभी शालाओं में पढाए जानेवाली सभी पुस्तकें पद्य में होती हैं
कई शिक्षक उन्हें उचित दक्षिणा नहीं मिलती तब तक एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी का आगे का अध्ययन नहीं करवाते हैं
यहाँ शिक्षा के आरंभ में छात्र शिक्षक को २५ पैसे दक्षिणा देता है
किन्तु जब छात्र पद्य में लिखी पुस्तकों की चर्चा करने लगता है , संस्कृत पद्यों के अर्थ करने लगता है तथा इन सब पुस्तकों की बात उसकी देशी भाषा में सोदाहरण करने की योग्यता प्राप्त करता है तब शिक्षक छात्र के मातापिता से बड़ी दक्षिणा की अपेक्षा करता है
भारत में बने सूती कपडे के स्थान पर हमारे यूरोप में बने सूती कपडे के भारत में प्रवेश से भारत के कारीगरों की आमदनी के साधन हाल के वर्षों में कम होते जा रहे हैं
हमारे देश से बड़ी सेना इस देश की सीमा पर तैनात किए जाने से इस देश में खाद्यान्न के संतुलन में काफी उलटा असर पड़ा है
१९ . सरकार इस बात की भी उपेक्षा नहीं कर सकती कि इस जिले की दस लाख जितनी जनसंख्या में आज केवल ७ , ००० जितने छात्र ही शालाओं में अध्ययन कर रहे हैं
इस देश में उच्च शिक्षा तो संस्कृत में ही दी जाती है
१९ . सरकार इस बात की भी उपेक्षा नहीं कर सकती कि इस जिले की दस लाख जितनी जनसंख्या में आज केवल ७ , ००० जितने छात्र ही शालाओं में अध्ययन कर रहे हैं
१९ . सरकार इस बात की भी उपेक्षा नहीं कर सकती कि इस जिले की दस लाख जितनी जनसंख्या में आज केवल ७ , ००० जितने छात्र ही शालाओं में अध्ययन कर रहे हैं
२२ . इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि यहाँ पहले हिन्दू शासक धन स्वरूप में तथा भूमि के रूप में बड़े पैमाने पर दान देकर शिक्षा की सहायता करते थे
२४ . मुझे अच्छी तरह से स्मरण है कि पूर्व के समय में कॉलेज बोर्ड की सिफारिश के आधार पर सरकार ने यहाँ के निवासियों की शिक्षा का स्तर सुधारने के हेतु प्रयोगधर्मी शालाएँ शुरू करने के लिए कडप्पा के समाहर्ता की नियुक्ति की थी , किन्तु उस उत्साही और समर्थ सरकारी अधिकारी का स्वर्गवास होने से वह योजना ही बंद कर दी गई थी
साथ ही , यहाँ की देशी शालाओं के शिक्षकों को तेलुगु और कन्नड भाषा का व्याकरण सिखाएगा
उनका न्यूनतम वेतन रु . ७/- रखा जाए
इन १७ शिक्षकों को सर्वप्रथम तो वह मुख्य शास्त्री व्याकरणादि की शिक्षा देंगे
२९ . संभव हो तो इन शिक्षकों की मुख्य शास्त्री के द्वारा वर्ष में एक बार परीक्षा लेकर उनमें अग्रिम स्थान प्राप्तकर्ता को पुरस्कृत करना चाहिए
राजमहेन्द्री के समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति १९-९-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९६३ , का . २-१०-१८२३ , पू . ५२०-२५ क्रमांक २९-३० ) १ . उपसचिव के दिनांक २५ जुलाई १८२२ पत्र में मांगी गई जानकारी के संदर्भ में पत्र के साथ निश्चित पत्रक में इस कचहरी के अधिकार क्षेत्र में स्थित देशी विद्यालय और छात्रों की संख्या की जानकारी सविनय भेजता हूँ
राजमुन्द्री के जिलों के १ , २०० गाँव और ७ , ३८ , ३०८ की जनसंख्या में केवल २०७ गाँवों में लेखन पठन की शिक्षा , २९१ शालाओं में २ , ६५८ हिन्दू और मुसलमान छात्रों को दी जाती है
राजमुन्द्री के जिलों के १ , २०० गाँव और ७ , ३८ , ३०८ की जनसंख्या में केवल २०७ गाँवों में लेखन पठन की शिक्षा , २९१ शालाओं में २ , ६५८ हिन्दू और मुसलमान छात्रों को दी जाती है
राजमहेन्द्री के समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति १९-९-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९६३ , का . २-१०-१८२३ , पू . ५२०-२५ क्रमांक २९-३० ) १ . उपसचिव के दिनांक २५ जुलाई १८२२ पत्र में मांगी गई जानकारी के संदर्भ में पत्र के साथ निश्चित पत्रक में इस कचहरी के अधिकार क्षेत्र में स्थित देशी विद्यालय और छात्रों की संख्या की जानकारी सविनय भेजता हूँ
शाला में प्रवेश के लिए बच्चे की ५ वर्ष , ५ महीना और ५ दिनकी आयु शुभ मानी गई है
मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी शाला को सार्वजनिक सहायता नहीं मिलती
४ . महाविद्यालयों की संख्या , बल्कि धार्मिक , कानूनी , खगोलशास्त्र के निरीक्षकों की संख्या केवल २७९ और छात्रोंकी संख्या १ , ४५४ है
मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी शाला को सार्वजनिक सहायता नहीं मिलती
छात्रों को केवल कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है , जो उनके प्रासंगिक धार्मिक कार्य करवाने तक ही सीमित है
वह तैरोयन: निशरीनद हुब्बी , कुटनाड तेहसील स्थित तेरुनाव्य क्षेत्रम् के दक्षिण में था
राजा ने इस कॉलेज के निर्माण के लिए पूर्ण खर्च की जिम्मेदारी ली थी
साथ ही उन्होंने उस कॉलेज के लिए एक भाण्डारगृह निर्माण करने का आदेश दिया था , जिसकी सुरक्षा के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति भी उन्होंने की थी
प्रधान समाहर्ता की कचहरी जे . बॉन कालिकट , ५ अगस्त १८२३ प्रधान समाहर्ता राजा झामोरिन की ओर से भेजे गए निवेदन का अनुवाद ( ब ) आरंभ में मलबार के ब्राह्मणों को धर्म विषयक शिक्षा उनके घर के निकट रहनेवाले उस समय के शिक्षकों के द्वारा 'क्षेत्रम्' में दी जाती थी , तथापि ऐसा लगता था कि इस प्रकार की शिक्षा विशेष लाभकर्ता नहीं होगी , उसमें छात्रों की संख्या और भी कम होगी
मलबार के प्रधान समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति , ५-८-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड : ९५७ , का . १४-८-१८२३ , पू . ६९४९-५५ क्रमांक : ५२-५३ ) ( अ ) १ . इस जिले में अवस्थित शालाओं और कॉलेजों की संख्या भेजने की अनुमति चाहता हूँ
साथ ही , इस कॉलेज के आचार्यों के लिए धान के खेत का एक हिस्सा अलग रखा गया था
धर्मशास्त्र , न्याय सिखानेवाले शिक्षक कुछ भी राशि प्राप्त नहीं करते
इन कॉलेजों में ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन १०० से १२० छात्र आते थे
किन्तु सन् ९४९ में विदेशियों ने आक्रमण किया और कई मंदिर तथा निवासस्थानों का नाश किया था
किन्तु सन् ९४९ में विदेशियों ने आक्रमण किया और कई मंदिर तथा निवासस्थानों का नाश किया था
धीरे धीरे 'वेदम्' का ज्ञान और शिक्षा मलबार क्षेत्र से नष्ट हो गए
धर्म के ज्ञान से विमुख रहना ब्राह्मणों के लिए महापातक सा माना जाता था
यहाँ ९६६ के वर्ष तक तो विद्यादान अनवरत चल रहा था
उसकी सहाय हेतु भूमि भी अलग रखी गई थी , जहाँ कई ब्राह्मण शास्त्रों का अध्ययन करते थे
उनके निपुण होने पर , जब वे कॉलेज छोड कर जाते थे तब कालिकट के तल्लेल क्षेत्रम् में प्रत्येक को वार्षिक १०१ फेनम पर नियुक्त किया जाता था
उनके निपुण होने पर , जब वे कॉलेज छोड कर जाते थे तब कालिकट के तल्लेल क्षेत्रम् में प्रत्येक को वार्षिक १०१ फेनम पर नियुक्त किया जाता था
सेलम के समाहर्ता बोर्ड ऑफ रेवन्यू के प्रति ८-७-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९५४ का . १४-७-१८२३ , पृ . ५ , ९०८-१० , सं . ५० १ . दि . २५ जुलाई १८२२ को आपके बोर्ड के द्वारा मुझे बताया गया था उस के तहत मैं संलग्न पत्रक सादर भेज रहा हूँ
३ . विद्यार्थी उनके मित्रों की सहायता और उनकी शिक्षा के प्रति रुचि के अनुरूप तीन से पाँच वर्ष शाला में बिताते हैं
३ . विद्यार्थी उनके मित्रों की सहायता और उनकी शिक्षा के प्रति रुचि के अनुरूप तीन से पाँच वर्ष शाला में बिताते हैं
केवल मुस्लिम शाला के पास उसके वार्षिक खर्च के लिए वार्षिक २० रु . जितनी आमदनी करनेवाली जमीन है
इस शाला के एक पुराने शिक्षक 'थोमिआह' की उपाधि से विभूषित थे , जिन्हें समाहर्ता द्वारा वार्षिक रु . ५६ के हिसाब से प्रति मास वेतन दिया जाता था
३ . छात्रों के लिए शुल्क मुख्यत: उनके पिता या शाला में भर्ती करने के लिए आनेवाले की स्थिति के अनुरूप प्रति छात्र मासिक २ आने से २ रुपए होता है
४ . लगता है कि जिले में जनता द्वारा अनुदान प्राप्त शालाएँ नहीं है या धर्म , कानून , खगोल आदि विषय पढाने का कोई कॉलेज भी नहीं है
४ . लगता है कि जिले में जनता द्वारा अनुदान प्राप्त शालाएँ नहीं है या धर्म , कानून , खगोल आदि विषय पढाने का कोई कॉलेज भी नहीं है
जो ब्राह्मण यह सिखाते हैं उनका निर्वाह सामान्यत: मान्यम् भूमि द्वारा किया जाता है
४ . लगता है कि जिले में जनता द्वारा अनुदान प्राप्त शालाएँ नहीं है या धर्म , कानून , खगोल आदि विषय पढाने का कोई कॉलेज भी नहीं है
इन में छात्रों की संख्या ९३९ के लगभग है
जिन छात्रों के परिवार इस प्रकार की सहयोग राशि देने में असमर्थ हैं , वहाँ वे जिन गाँवों में अध्ययन करते हैं उन गाँवों के घरों से अपनी दैनन्दिन आवश्यकता की चीजें प्राप्त कर लेते हैं और वे भी सहर्ष उनकी आवश्यकताएँ पूरी कर देते हैं
५ . जिन्हें यहाँ अध्ययन करवाया जाता है उन्हें धर्म या दर्शनशास्त्र में गहरा अध्ययन करना है तो वे बनारस , नवद्वीप जैसे स्थानों पर जाते हैं
२ . इस जिले में सरकार या सत्ताधीशों के द्वारा अनुदान प्राप्त करनेवाली कोई शाला या कॉलेज नहीं है
किन्तु छात्र अपने शिक्षक को प्रतिमास ४ आना या १ रुपया शुल्क देते हैं
२ . इस जिले में सरकार या सत्ताधीशों के द्वारा अनुदान प्राप्त करनेवाली कोई शाला या कॉलेज नहीं है
सेक्रेटरी टु गवर्नमेन्ट , बोर्ड ऑफ रेवन्यू के प्रति २७-१-१८२५ ( टीएनएसए : बीआरपी , खण्ड १०१० का . २७-१-१८२५ नं . ७-८ , पृ . ६७४-५ ) १ . समग्र देश में शिक्षा की स्थिति जानने के लिए सरकार उत्सुक है
२ . इस जिले में सरकार द्वारा अनुदान में दी गई जमीन या किसी भी प्रकार की आर्थिक सहाय के सहयोग से चलनेवाली एक भी शाला या कॉलेज नहीं है और इस प्रकार की किसी भी संस्था का अस्तित्व मेरी जानकारी में नहीं है
३ . हर प्रकार की शिक्षा निजी शिक्षकों के द्वारा अथवा तो गुरुओं के निवास पर रहनेवाले छात्रों को , उन गुरुओं द्वारा अथवा तो शालाओं में दी जाती है
पढ़ने लिखने के साथ , अंकगणित सीखने के बाद प्रत्येक का उस औसत में खर्च बढ़ता जाता है
४ . कडप्पा में अनेक शालाएँ स्वैच्छिक अनुदानों के द्वारा निभाई जाती हैं
५ . ब्राह्मणों में , बच्चा जब ५-६ वर्ष का होता है तभी से उसकी पढ़ाई शुरू हो जाती है और शूद्रों में ६ से ८ वर्ष के बाद शुरू होती है
विद्यार्थी लिखने पढने में , अंकगणित में कुशल बन जाते हैं तब उनका अध्ययन पूरा हुआ मान लिया जाता है
विद्यार्थी लिखने पढने में , अंकगणित में कुशल बन जाते हैं तब उनका अध्ययन पूरा हुआ मान लिया जाता है
फिर , वह उस प्राप्त ज्ञान को अपने पिता की दुकान में बैठकर और भी पक्का करता है
६ . इस जिले में लगभग सभी गाँवों में इनामी जमीन अलग से अंकित की गई है
परंतु मुझे यह भी कहना चाहिए कि कई स्थानों पर ब्राह्मणों के द्वारा विद्या आदर के साथ प्राप्त की जाती है और गरीब लोग भी इसी प्रकार पढाई पूरी करते हैं
१० से १६ वर्ष की आयु तक अगर विद्या प्राप्त करने के लिए ब्राह्मण के पास आवश्यक साधन न हों तो वह अपना निवासस्थान त्याग देता है
८ . बोर्ड स्वाभाविक रूप में प्रश्न करता है कि बच्चों को अपने गाँव में ही अध्ययन करने के लिए आवश्यक साधन क्यों नहीं है ? वह १० से १०० मील चलकर यात्रा करके जहाँ वे अपरिचित हैं वहाँ कैसे टिक सकते होंगे ? और वर्षों तक वापस न लौटने के इरादे से वहाँ कैसे रह सकते होंगे
४ . देखने से ज्ञात होता है कि देश में अवस्थित शालाएँ अधिकांश लोगों के द्वारा दी गई धनराशि के आधार पर चलती हैं
अलग अलग जिलों में विद्वानों को दिये जानेवाले वेतन में अंतर देखा गया है और वह छात्रों के मातापिता की स्थिति के अनुरूप सामान्यत: मासिक १ आने से चार रुपए है
राजमुंद्री में विज्ञान के लगभग ६९ शिक्षकों के पास दान में प्राप्त जमीन है और इससे पहले जमीनदारों ने दिए धन से १३ को भत्ते मिलते थे
उत्तर आर्कोट के २८ कॉलेज पूर्व की सरकार ने मंजूर किए मान्यम् और माराहों के सहयोग से चलते हैं
६ फारसी शालाएँ सार्वजनिक खर्च से चलती हैं जिनका खर्च रु . १ , ८६१ जितना आता है
सेलम में इनकी जमीन से प्रतिवर्ष लगभग रु . १ , १०९ आय होती है , जिसका उपयोग धर्मशास्त्र आदि के २० शिक्षकों को सहायता करने में होता है
एक मुसलमान शाला को प्रति वर्ष र . २० की आय होनेवाली जमीन शाला के लिए मंजूर की गई है
तंजावुर में ४४ शालाओं और ७१ कॉलेजों को राजा का दान मिलता है
त्रिचिनापल्ली जिले में ७ शालाओं को झामोरिन राजा ने दान में दी हुई ४६ कणी जितनी आय है
यह अभिमत भी व्यक्त किया था कि अभी जिलेमें जो ब्राह्मण उनके मूल याम्य और श्रोत्रियो में खोजे जा सकते हैं
८ . अभी लिखे गए श्री कैम्पबेल के निर्देश के बारे में ऐसा तय करने का बोर्ड सोच रहा है कि इस समय उनको बताई योजना और इसके बारे में सामान्य विचार या शिक्षासुधार के बाद में बहस अनावश्यक है क्योंकि फिलहाल तो सरकार की यह इच्छा है कि शिक्षा की वास्तविक स्थिति कैसी है , उसी की जानकारी प्राप्त करें , जिससे कौन-सी क्षति दूर करने के लिए क्या किया जाए वह ज्ञात हो सके
जनगणना के हिसाब के लगभग साडे बारह करोड से अधिक जनसंख्या में केवल १ , ८८ , ००० लोग ही शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं , जो लगभग १३°/ , प्रतिशत है , जो अत्यंत असंतोषजनक है
११ . श्री हेरिसन के अवलोकन के बावजूद बोर्डने यह आवश्यक माना है कि अभी के प्रधान समाहर्ता को बुलाकर शालाओं के बारे में अभिमत मंगवाया जाए , जो सरकार द्वारा भेजे गए नमूने के अनुरूप तैयार किया गया हो , और प्राप्त होते ही उसे माननीय गवर्नर इन काउन्सिल को प्रस्तुत किया जाए
शास्त्रों आदि का ज्ञान विशेषकर ब्राह्मणों को ही निजी तौर पर दिया जाता है
गंजाम राज्य की ओर से स्थायी आय प्राप्त कोई शालाएँ या महाशालाएँ इस जिले में नहीं हैं
राजमहेन्द्री इसे जिले में कुछ शालाएँ प्रजा द्वारा प्राप्त स्थायी आय से चलती हैं
प्रत्येक छात्र की ओर से एक रुपए से लेकर दो आने तक प्रत्येक महीने हर शिक्षक को प्राप्त होते हैं
छात्र को पाँच वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश दिया जाता है और तब से लेकर ५ से ७ वर्ष तक उसका अध्ययन चलता है
शास्त्रों के ( अलग अलग विषयों को ) पढानेवाले शिक्षक और उपाध्यायों की संख्या २७९ है
इनमें लगभग ६९ शिक्षकों को जमीन के स्वरूप में सहायता या पारिश्रमिक मिलता है और १३ व्यक्तियों को पूर्व के जमनदारों की ओर से पैसे के रूप में वेतन दिया जाता है
इनमें लगभग ६९ शिक्षकों को जमीन के स्वरूप में सहायता या पारिश्रमिक मिलता है और १३ व्यक्तियों को पूर्व के जमनदारों की ओर से पैसे के रूप में वेतन दिया जाता है
गंजाम राज्य की ओर से स्थायी आय प्राप्त कोई शालाएँ या महाशालाएँ इस जिले में नहीं हैं
जिला समाहर्ता मानते हैं कि महीने में दो रुपए प्रत्येक शिक्षक को मिले इतना वेतन होना चाहिए
मछलीपट्टम शिक्षा के आदर्श के लिए नियमित स्थायी आयवाली एक भी संस्था इस जिले में नहीं है
धर्मार्थ शाला में नेल्लोर के एक जमीनदार की ओर से प्रतिमास प्रत्येक शिक्षक को वेतन के तौर पर तीन पेगोडा सहायता के तौर पर मिलता है
छात्र को सामान्य तौर पर पाँच वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश दिया जाता है और १२ से १६ वर्ष तक वह वहाँ अध्ययन करता है
इनमें अधिकांश छात्र अध्ययन पूर्ण करने पर सार्वजनिक संस्था में या निजी व्यवसाय में जुड जाते हैं
केवल वेदाभ्यास करनेवाले ब्राह्मण छात्रों को शाला से महाशालाओं में धर्मशास्त्र और अन्य विद्याशाखाओं के अध्ययन हेतु ले जाते हैं
प्रत्येक छात्र कागज्ञ और अन्य छिटपुट सामग्री के लिए औसतन चार आने और शिक्षक के मासिक वेतन के तौर पर चार आने से दो रुपए तक देता है
महाशालाओं में अलग अलग विषय ब्राह्मणों द्वारा छात्रों को नि:शुल्क सिखाये जाते हैं
प्रत्येक छात्र साधन सामग्री , पुस्तक आदि के लिए वार्षिक औसतन साठ रुपए महाशालाओं को देता है
प्रदेश के अधिकांश ब्राह्मणों द्वारा वेद का अध्ययन घरेलू तौर पर करवाया जाता है
बिना किसी भी प्रकार के वेतन के विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा निजी तौर पर शास्त्र सिखाए जाते हैं
गुंटुर समाज की सहायता से चलनेवाली एक भी शाला इस जिले में नहीं है | विभिन्न शास्त्र पढानेवाला एक भी कॉलेज नहीं है
बच्चों को पांच वर्ष की आयु में वहाँ प्रवेश करवाया जाता है और अधिकांश ५ वर्ष तक शाला में उनकी पढाई होती है
इनमें १५ ब्राह्मण , और ११ मुसलमानों को कर्णाटक राज्य द्वारा वेदाभ्यास और अरबी तथा फारसी सिखाने के लिए पैसे और जमीन के रूप में अनुदान मिलता है
प्रति छात्र शिक्षक को मासिक दो आने से लेकर चार रुपए तक की राशि मिलती है
गुंटुर समाज की सहायता से चलनेवाली एक भी शाला इस जिले में नहीं है | विभिन्न शास्त्र पढानेवाला एक भी कॉलेज नहीं है
बेल्लारी इस जिले में राज्य की ओर से प्राप्त सहायता द्वारा एक भी शाला नहीं चलती है
बेल्लारी इस जिले में राज्य की ओर से प्राप्त सहायता द्वारा एक भी शाला नहीं चलती है
नियमित रूप में एक भी कॉलेज नहीं चलता है , किन्तु लगभग २३ उदाहरण ऐसे है जहां ब्राह्मणों द्वारा कई विद्याशाखाओं की शिक्षा दी जाती है
बच्चे पाँच वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश लेते हैं
धनिक माता पिता के बच्चे १४ या १५ वर्ष की आयु तक अध्ययन पूरा करते हैं ऐसा भी दिखाई देता है
जब बालक प्राथमिक वर्णमाला और अंकज्ञान प्राप्त करता है तब चार आना और जब बालक कागज पर लिखता पढता है तथा गणित जैसे विषय का पठन शुरू करता है तब आधा रुपया मासिक शुल्क दिया जाता है
जब बालक प्राथमिक वर्णमाला और अंकज्ञान प्राप्त करता है तब चार आना और जब बालक कागज पर लिखता पढता है तथा गणित जैसे विषय का पठन शुरू करता है तब आधा रुपया मासिक शुल्क दिया जाता है
बेल्लारी इस जिले में राज्य की ओर से प्राप्त सहायता द्वारा एक भी शाला नहीं चलती है
गरीबी के कारण पैसे न दे पानेवाले छात्र उच्च शिक्षा से वंचित ही रह जाते हैं
कडप्पा इस जिले में दान में मिली जमीन या राज्य सरकार की ओर से प्राप्त अनुदान के आधार पर चलनेवाली शिक्षा की एक भी संस्था नहीं है
शुल्क देने के अनुपात में छात्र जैसे जैसे उपर की कक्षा में आगे बढता जाता है , वैसे वैसे वृद्धि होती जाती है
ब्राह्मण जातिमें बालक को ५ से ६ वर्ष की आयु में शाला में भेजा जाता है | शूद्र जाति में ६ से ८ वर्ष की आयु में शाला में भेजा जाता है
इन बच्चों को दो वर्ष से कम समय में लिखाई-पढाई और आवश्यक गणित का ज्ञान प्राप्त कर लेना रहता है
कडप्पा की धर्मार्थ शालाएँ ही इस जिले की प्रमुख शालाएँ हैं
कडप्पा इस जिले में दान में मिली जमीन या राज्य सरकार की ओर से प्राप्त अनुदान के आधार पर चलनेवाली शिक्षा की एक भी संस्था नहीं है
उत्तर आर्कोट जिले में स्थित ६९ कॉलेजो की संख्या टिप्पणी क्रमांक २ जिले के प्रधान समाहर्ता की ओर से प्रस्तुत की गयी है , उनमें ४३ में धर्मशास्त्र , २४ में कानून आदि और २ में खगोलशास्त्र पढ़ाया जाता है
उत्तर आर्कोट जिले में स्थित ६९ कॉलेजो की संख्या टिप्पणी क्रमांक २ जिले के प्रधान समाहर्ता की ओर से प्रस्तुत की गयी है , उनमें ४३ में धर्मशास्त्र , २४ में कानून आदि और २ में खगोलशास्त्र पढ़ाया जाता है
कॉलेजों में ८ से १२ वर्ष की अवधि रहती है
केवल तीन हिन्दू शालाओं में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है
गाँव का शिक्षक ३ रुपए से लेकर १२ रुपए तक मासिक वेतन प्राप्त करते हैं
हिन्दू शालाओं में छात्र ५ से ६ वर्ष तक अध्ययन करते हैं
गाँव का शिक्षक ३ रुपए से लेकर १२ रुपए तक मासिक वेतन प्राप्त करते हैं
उसकी बस्ती लगभग ३ लाख है
एक फेनम से लेकर १ पेगोडा तक का मासिक शुल्क छात्र देते हैं
केवल एक ही मुस्लिम शाला के पास थोडी जमीन है , जिसकी वार्षिक आय से २० प्रतिशत जितना आधार मिल जाता है
इस शाला के पूर्व के एक गुरु के पास छोटी जमीन जागीरदारी थी उससे ५६ रुपए वार्षिक आय होती थी , किन्तु उस गुरु की मृत्यु के बाद उसकी आजीवन जागीरदारी का अंत हो गया
इस शाला के पूर्व के एक गुरु के पास छोटी जमीन जागीरदारी थी उससे ५६ रुपए वार्षिक आय होती थी , किन्तु उस गुरु की मृत्यु के बाद उसकी आजीवन जागीरदारी का अंत हो गया
शाला में ३ से ५ वर्ष तक की शिक्षा दी जाती है | हिन्दु शालाओं में प्रत्येक छात्र से वार्षिक शुल्क ३ रुपये से कम नहीं लिया जाता , जब कि मुस्लिम शालाओं में १५ से २० रुपए तक का वार्षिक व्यवहार रहता है
एक फेनम से लेकर १ पेगोडा तक का मासिक शुल्क छात्र देते हैं
लगभग १९ मिशनरी शालाओं में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है
२१ शालाओं में गुरुजनों को राजाओं की ओर से वेतन प्राप्त होता है और एक शाला के शिक्षकों का निर्वाह खर्च त्रिवेल्लोर पेगाडा धर्म संस्थान के द्वारा किया जाता है
छात्रों को लगभग पाँच वर्ष तक शाला में अध्ययन करना होता है
इनमें ७१ शालाओं का निर्वाह तंजावुर के राजा और राजा के १६ गाँवों की ओर से होता है
इनमें ७१ शालाओं का निर्वाह तंजावुर के राजा और राजा के १६ गाँवों की ओर से होता है
इनमें ७१ शालाओं का निर्वाह तंजावुर के राजा और राजा के १६ गाँवों की ओर से होता है
इनमें ७१ शालाओं का निर्वाह तंजावुर के राजा और राजा के १६ गाँवों की ओर से होता है
त्रिचिनापल्ली इस जिले में एक भी शाला या कॉलेज नहीं है जिसके लिए लोगों से निधि इकट्ठी की जाती हो
त्रिचिनापल्ली इस जिले में एक भी शाला या कॉलेज नहीं है जिसके लिए लोगों से निधि इकट्ठी की जाती हो
सामान्य रूप से ७ से १५ वर्ष तक छात्र शाला में अध्ययन करता है
शिक्षा का वार्षिक खर्च औसतन ७ पेगोडा होता है
त्रिचिनापल्ली इस जिले में एक भी शाला या कॉलेज नहीं है जिसके लिए लोगों से निधि इकट्ठी की जाती हो
मदुरा लगता है कि इस जिले में शाला के निर्वाह हेतु कोई भी जमीन दान में प्राप्त नहीं हुई है | शिक्षकों के वेतन हेतु अति गरीब छात्र से १/२ फेनम तक का और अधिक सुखी छात्रों से मासिक २ से ४ फेनम शुल्क लिया जाता है
छात्र को सामान्यत: ५ वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश करवाया जाता है , और १२ से १५ वर्ष की आयु पर वे शाला छोड देते हैं
छात्र को सामान्यत: ५ वर्ष की आयु में शाला में प्रवेश करवाया जाता है , और १२ से १५ वर्ष की आयु पर वे शाला छोड देते हैं
त्रिचिनापल्ली इस जिले में एक भी शाला या कॉलेज नहीं है जिसके लिए लोगों से निधि इकट्ठी की जाती हो
कोइम्बतूर इस जिले में सभी शालाएँ लागों के सहयोग से चलती हैं
शिक्षक अपने स्थायी वेतन के अतिरिक्त त्यौहारों पर बच्चों के पालकों से भेंट आदि प्राप्त करते हैं
यहाँ कॉलेजों में यथावसर जाकर अलग अलग शास्त्रों का गहरा अध्ययन नौकरी मिलने तक करते हैं
मलबार मलबार में केवल एक ही कॉलेज है
शाला के शिक्षकों को प्रति मास १/४ रुपए से ४ रुपए तक का शुल्क उनके नियमित वेतन के अतिरिक्त स्वतंत्र रूप से प्रति छात्र मिलता है
अभी कॉलेज है वह झामोरिन के राजा ने स्थापित की थी और अभी २ , ००० रु . की वार्षिक राशि छात्रों के और २०० रु . राशि शिक्षक के निर्वाह के लिए झामोरिन के राजा की ओर से दी जाती है
अभी कॉलेज है वह झामोरिन के राजा ने स्थापित की थी और अभी २ , ००० रु . की वार्षिक राशि छात्रों के और २०० रु . राशि शिक्षक के निर्वाह के लिए झामोरिन के राजा की ओर से दी जाती है
श्रीरंगपट्टम् कहा जाता है कि श्रीरंगपट्टम् द्वीप स्थित कॉलेज और शालाओं के निर्वाह के लिए पूर्व की राज्य सरकारों की ओर से या व्यक्तियों की ओर से जमीन बाँटी गई थी
ऐसी टिप्पणी का अंशमात्र भी रेकर्ड पर दिखाई नहीं देता | शाला के शिक्षकों का निर्वाह उनके छात्रों द्वारा होता है
हर छात्र के लिए औसतन मासिक शुल्क ५ आने है
इस आय से शिक्षकों को वार्षिक ५७ रुपए जितनी राशि मिलती है
हर छात्र के लिए औसतन मासिक शुल्क ५ आने है
कहा जाता है कि १३ वर्ष की आयु तक शिक्षा के भिन्न भिन्न विषयों में आवश्यक ज्ञान छात्र प्राप्त कर लेते हैं
ऐसी टिप्पणी का अंशमात्र भी रेकर्ड पर दिखाई नहीं देता | शाला के शिक्षकों का निर्वाह उनके छात्रों द्वारा होता है
सर टॉमस मनरो की टिप्पणी मार्च १० , १८२६ ( फोर्ट सेंट ज्योर्ज , राजस्व विभाग ) १ . २ जुलाई १८२२ के दिन सरकार के राजस्व विभाग के सदस्यों को सूचित किया गया कि प्रांतों में शिक्षा की स्थिति तथा शालाओं की संख्या की जानकारी प्राप्त करें
इससे उनके गत वर्ष के २१ फरवरी के पत्र द्वारा कई समाहर्ताओं से प्राप्त जानकारी के अनुरूप बोर्ड ने विवरण दिया
२ . रेवन्यू बोर्ड ने लिखा है कि १२ करोड , ५० लाख की जनसंख्या में केवल १ , ८८ , ००० व्यक्तियों ने अर्थात् प्रति ६७ व्यक्तियों में केवल एक व्यक्ति ने शिक्षा प्राप्त की है
बडी संख्या की शालाओं में शिक्षा की गिरावट दिखाई दी है क्योंकि सक्षम शिक्षकों की कमी के कारण शालाओं में संख्या भी कम रहने लगी थी
प्रत्येक छात्र का मासिक शुल्क चार , छ: या आठ आने है
ऐसा भी कह सकते हैं कि शिक्षकों के साधारण अज्ञान के कारण अधिकांश शिक्षक बडी संख्या में छात्रों को शाला में आकर्षित नहीं कर सकते हैं परंतु शिक्षा की कमजोरी का प्रथम कारण है शिक्षा की मांग की कमी , प्रोत्साहन का अभाव और लोगों की गरीबी
ऐसा भी कह सकते हैं कि शिक्षकों के साधारण अज्ञान के कारण अधिकांश शिक्षक बडी संख्या में छात्रों को शाला में आकर्षित नहीं कर सकते हैं परंतु शिक्षा की कमजोरी का प्रथम कारण है शिक्षा की मांग की कमी , प्रोत्साहन का अभाव और लोगों की गरीबी
ऐसा भी कह सकते हैं कि शिक्षकों के साधारण अज्ञान के कारण अधिकांश शिक्षक बडी संख्या में छात्रों को शाला में आकर्षित नहीं कर सकते हैं परंतु शिक्षा की कमजोरी का प्रथम कारण है शिक्षा की मांग की कमी , प्रोत्साहन का अभाव और लोगों की गरीबी
अत: शिक्षकों को अच्छा वेतन राज्य सरकार से मिलना ही चाहिए
मैं दूसरी यह बात भी सूचित करता हूँ कि राज्य को समाह्ता के अधीन क्षेत्रों में दो मुख्य सरकारी शालाएँ शुरू करनी चाहिए
६ . हमारे विशेष समाहर्ता के अधिकार में २० जितने प्रदेश हैं , जहाँ तहसीलदारी का परिवर्तन हो सकता है
किन्तु अभी प्रत्येक समाहर्ता विभाग में १५ जितनी तेहसीलों की औसतन गिनती की गई है
इस प्रकार , सब मिलाकर ३०० तेहसीलें होती हैं
इस प्रकार सूचित योजना के अनुरूप समाहर्ता के अधिकार के अंतर्गत राज्य की ४० शालाएँ और ३०० तेहसील शालाएँ निर्मित होंगी
समाहर्ता के अधिकार में राज्य की शालाओं में शिक्षक का वेतन १५ रुपए और तहसील कक्षा की शालाओं में ९ रुपए प्रत्येक शिक्षक को मिलेंगे
७ . शालाओं का कुल खर्च निम्नानुसार रहेगा रू . * चेन्नाई स्कूल-बुक सोसायटी का मासिक खर्च ७०० . ०० * समाहर्ता के अधिकार की शालाएँ , मुसलमान शाला संख्या २० के १५ रु . के हिसाब से ३०० . ०० * समाहर्ता अधिकार की हिन्दू शालाएँ शाला संख्या २० के १५ रु . के हिसाब से ३०० . ०० * तेहसीलदारी की ३०० शालाएँ , ९ रु . के हिसाब से २७०० . ०० इस प्रकार प्रत्येक महीने का कुल खर्च ४ , ००० और वार्षिक कुल खर्च होता है - ४८ , ००० . ०० यह खर्च तो अलग अलग समय में होगा क्योंकि आवश्यक संख्या के प्रशिक्षित शिक्षक मिलेंगे वैसे वैसे खर्च की राशि बढती जाऐगी
उसका कार्यक्षेत्र ( १ ) सार्जवनिक शाला निर्माण करना और उसकी देखभाल करना ( २ ) उसके लिए आवश्यक स्थल तय करना ( ३ ) उसमें उपयोग में लिए जानेवाले प्रकाशन तय करना ( ४ ) गाँवों के लोगों को किस प्रकार अच्छी शिक्षा दी जा सके वह देखना और महत्त्वपूर्ण विषयों पर इन सब जांचों के परिणामों की जानकारी राज्य सरकार को देना होगा
शिक्षा से पैसा और पद प्राप्ति , ज्ञान प्राप्ति और लोगों की स्थिति में सुधार होता है
अगर हम लोगों को शिक्षा देने का संकल्प करें और हमारे ढांचों को यथावत रखें और यदि हम तेहसीलदारी तक शालाएँ सीमित न रखते हुए छोटे प्रदेशों में उनकी संख्या बढा देंगे तो मुझे विश्वास है कि हम इस पुरुषार्थ में सफल रहेंगे
४ . फ्रा पाओलीनो द बार्टोलोमियो भारत में बच्चों की शिक्षा के विषय में सभी ग्रीक इतिहासकार भारत के लोगों को अन्य देशों के लोगों की अपेक्षा बडे कद के और मजबूत गठन के बताते हैं
उनका नवजात बालक उपेक्षित की तरह भूमि पर पड़ा रहता है
बच्चे को यूरोप की तरह सुरक्षित नहीं रखा जाता है
ठंडे पानी से बार बार स्नान , नारियल के तेल से और इन्जिया नामक पौधे के रस से बार बार मर्दन , ग्रीस के 'जुवेनिलिया' जैसा व्यायाम आदि शक्ति और स्फूर्ति बढाते हैं
भारत के लडकों के लिए शिक्षा यूरोप के समान नहीं है
लेखन सिखानेवाले शिक्षक को अगीअन या 'एलुतासीन' कहा जाता है , जो छात्रों के सम्मुख अपनी बैठक लेते हैं
इन छोटे छात्रों ने लिखने की कुछ तैयारी की होती है तब शिक्षक अपने आसन मृगचर्म , व्याघ्रचर्म पर पालथी लगाकर बैठते हैं या नारियेल के पत्तों से बनी चटाई पर बैठते हैं , या कभी जंगली अनानस के छिलकों से बनी चटाई जिसे 'कझडा' कहते हैं , उस पर बैठते हैं
जीसस क्राइस्ट के जन्म से २०० वर्ष पूर्व लेखन की यह पद्धति शुरू की गई थी , ऐसा मेगेस्थनिज के प्रमाणों से पता चलता है
उनके विद्यार्थी उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हैं , अपना दाहिना हाथ मुँह पर रखते हैं तथा शब्द भी बोलने का साहस नहीं करते , पर जब गुरु बोलने की अनुमति देते हैं तभी बोलते हैं
जो बोलते रहते हैं , अनुशासन का पालन नहीं करते , उन्हें शाला से बिदा कर दिया जाता है क्योंकि ऐसे विद्यार्थी अपनी वाणी पर संयम न रख सकने के कारण तत्त्वज्ञान के अध्ययन के लिए योग्य नहीं माने जाते
जब गुरु या शिक्षक शाला में प्रवेश करते हैं तब विद्यार्थी उन्हे अत्यंत विनय और सम्मान से मिलते हैं
जो नियम अत्यंत सावधानी से गठित किए गए होते हैं उसका उल्लंघन बिलकुल नहीं किया जाता
उसमें देव से संबंधित सब शास्त्र , अलग अलग विषयों के शास्त्र , रंग , ध्वनि , पृथ्वी , सागर , नदियाँ , मनुष्य , प्राणी , सब कलाएँ तथा भारत के व्यवसायों के विषयों का समावेश होता है
संस्कृत काव्यरचना के लिए और उसे प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करनेवाले छात्रों को परिचित ऐसे शब्दों में गुरुजन छोटे वाक्यों में पंक्ति रचना सिखाते हैं
इस प्रकार खेल खेल में ही बालकों के कोमल मस्तिष्क में भाषा सिखाते सिखाते योग्य वाक्य रचना कैसे हो उसका ज्ञान तथा भविष्य में उनका चरित्र गठन हो उसके लिए मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है
सभी भारतीय उसका पूजन नहीं करते हैं , किन्तु जो लोग उसकी पूजा करते हैं वे शैव कहलाते हैं
ऑफ करगेरी , जो केलिप्सो नौका युद्ध सेना के अध्यक्ष हैं वे कहते हैं जिनको धर्म की शक्ति और धार्मिक मान्यता का असर क्या है वह जानना है उन्हें अवश्य भारत जाना चाहिए
भारत के इन ग्रामजनों को देवों को भजने के लिए सर्वाधिक बडा प्रेरक बल है शिक्षा
शल्य चिकित्सा , शरीर विज्ञान और भूगोल जैसे विषयों को इसमें स्थान नहीं दिया गया है
भारत के लोग मानते हैं कि उनका देश विश्व में सर्वाधिक सुंदर और सुखी देश है
उनकी समुद्र यात्रा केवल उनकी नदियों तक ही सीमित है
साधारणत: प्रदेश की जमीन पर रहनेवाले भारतीयों को समुद्रयात्रा में बडी अरुचि है
युद्ध में तोपों का उपयोग नहीं होता है
खडे रहकर जाल फेंकने की विद्या ( हस्तिलुथिडम ) , ( गेंद ) खेलने की कला , ( कुन्दर ) ( पंडाकाली ) , शतरंज , ( क्युडरंगम् ) , टेनिस , ( कोलाडी ) तर्कशास्त्र ( तर्कसंग्रह : ज्योतिष , कानून और स्वाध्याय तथा मौन
गुरुजन के प्रति विशेष सम्मान का व्यवहार होता है
वर्ष में दो बार प्रत्येक शिक्षक को रेशमी कपड़ा दिया जाता है , जिसका उपयोग वे वस्त्रों के लिए करते हैं
बारह वर्ष की आयु की सभी शूद्र जातिकी , नायर जातिकी कन्याओं को घर पर ही रहना होता है
जब कभी उन्हें बाहर जाना है तो अपनी माँ या चाची , मौसी के साथ वे जाती हैं
नौ साल की आयु में लडकों को बडे समारोहपूर्वक उनके बाप-दादे के व्यवसाय में दीक्षा दी जाती है
वहाँ कोई भी पुरुष नहीं जा सकता
वहाँ कोई भी पुरुष नहीं जा सकता
दूसरी ओर वैश्य अपने लडकों को कृषि विषयक ज्ञान देते हैं तथा क्षत्रियों को राज्यप्रशासन और सेना प्रशिक्षण के लिए शस्त्रविद्या का अध्ययन करना होता है; शूद्रों को यंत्रविद्या , मछली पकडने का कार्य , बागवानी तथा बनियों के बच्चों को व्यवसाय का ज्ञान करवाया जाता है
दूसरी ओर वैश्य अपने लडकों को कृषि विषयक ज्ञान देते हैं तथा क्षत्रियों को राज्यप्रशासन और सेना प्रशिक्षण के लिए शस्त्रविद्या का अध्ययन करना होता है; शूद्रों को यंत्रविद्या , मछली पकडने का कार्य , बागवानी तथा बनियों के बच्चों को व्यवसाय का ज्ञान करवाया जाता है
महान सिकंदर के समय में भारतीयों ने यंत्र कला में इतनी कुशलता प्राप्त की थी कि उसका सेनानायक नीअरकस यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया था कि 'भारतीयों ने ग्रीक सैनिकों के आक्रमण को रोकने के लिए अद्भुत कुशलता से सामना किया था , एक बार मुझे ऐसी ही स्थिति का अनुभव हुआ था'
कुछ दिन के बाद ठीक वैसा ही दूसरा लैम्प बनाकर वह कारीगर मुझे दे गया और मैं दोनों लैम्प में असली लैम्प कौन सा है यह पहचान नहीं पाया
दूसरी और उनका इतिहास अभी की कई यूरोपीय भाषाओं जैसे ग्रीक या रोम की भाषा के साथ बहुत ही जुडा हुआ है
जो प्राचीन पुरातन भाषा है और जो अब बोली नहीं जाती उस संस्कृत भाषा में उसकी बुनियाद है
जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मनुष्यों को जब अत्यधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता है तब विद्या और शास्त्रों की सहज वृद्धि होती है ऐसा मानना चाहिए
भारत के मध्य भाग में बसनेवाले लोगों की तुलना में मलबार की शिक्षा अत्यंत सीमित रही है , किन्तु इसके साथ ही अक्षरज्ञान के मामले में वे लापरवाह नहीं रहे है
ब्राह्मण तो सामान्यत: शाला के शिक्षक होते ही हैं तथापि कोई भी प्रतिष्ठित जाति का व्यक्ति शिक्षा का व्यवसाय कर सकता है
अत्यंत सरल पद्धति से , भय और धमकियों से रहित तथा बिना मार पीट ही बच्चों को शिक्षा दी जाती है
क्योंकि इस पद्धति से हम समाज के निम्नस्तर तक शिक्षा का प्रसार बिना खर्च के और दोषरहित पद्धति से कर सकते हैं
प्रत्येक छात्र एक दूसरे को सहायता करनेवाला छात्र है , जहाँ बालू पर छोटी सी लकड़ी या ऊँगली से अक्षर लेखन होता है
प्रत्येक छात्र एक दूसरे को सहायता करनेवाला छात्र है , जहाँ बालू पर छोटी सी लकड़ी या ऊँगली से अक्षर लेखन होता है
वे शिक्षक से एक ही पाठ की शिक्षा ले रहे थे
अब उसे ग्रहण करने के लिए , पूर्व के पाठों की तरह उनका पुनरावर्तन कर रहे थे , जिससे वे भूल न जाएँ
लगभग २०० वर्ष पूर्व पिटर डेलावेले ने मलबार की शिक्षा पद्धति का एक विवरण प्रकाशित किया है
उनमें एक बच्चा लयबद्ध गा रहा था
जैसे कि 'एक एक एक . . . . . और जब वह इस प्रकार बोले जा रहा था तब वह 'एक' लिख भी रहा था और यह लिखाई किसी कागज-पेन से नहीं किन्तु जमीन पर बालू पर ऊँगली से हो रही थी
तत्पश्चात् जब पूरी जमीन अंकों से भर जाती थी तो वे अपने हाथ से उसे मिटा देते थे और आवश्यक लगने पर इसी के लिए रखी ढेर सी बालू में से थोडी सी लेकर उसे छिटककर पुन: लिखते थे | इस प्रकार पाठक्रम पूरा होने तक वे इसी प्रकार से लिखते , पढ़ते व आगे बढ़ते थे
मैंने उनसे प्रश्न किया कि वे अगर कुछ भूल जाएँ तो उसे सुधारेगा कौन या कौन स्मरण करवायेगा
तब उनका उत्तर था कि हम चारों या जितने भी हैं , सभी तो भूल जाएँगे नहीं
मिशनरी अब प्रामाणिकता से स्वीकार करते हैं कि इन शालाओं में जिस पद्धति के द्वारा शिक्षा दी जा रही है वह पद्धति वे भारत से ले गए हैं
हिन्दुओं की अपेक्षा और कोई भी लोग शिक्षा के महत्त्व को सही रूप में नहीं समझ सकता है
हिन्दुओं की अपेक्षा और कोई भी लोग शिक्षा के महत्त्व को सही रूप में नहीं समझ सकता है
इस पुस्तक को लकड़ी की दो पट्टियों के बीच में सुरक्षित रखा जाता है
कई बार आवरण चढाकर , वॉर्निशयुक्त बनाकर उसे सुंदर रूप दिया जाता है
इन लकड़ी की पट्टियों को 'स्टेव' कहा जाता है
अभी अगर धनराशि दी जाए तो भारत में शालाओं की संख्या में वृद्धि करने में और कोई कठिनाई दिखाई नहीं देती | शिक्षकों के लिए मिशनरियों से भेंट करने के लिये लोग उत्सुक और उतावले हो रहे हैं
यहां बच्चों को पारंपरिक रूप में कोई ज्ञान नहीं है , वे केवल बुद्धि से सीखते हैं
सन् १४४२ में अब्दुल रज्जाक ने उसके सफर के दौरान यह पद्धति बिशनगढ में देखी थी
मलबार में लंबे समय से संस्कृत भाषा का स्थानीय भाषा में अनुवाद किया गया है तथा वहाँ की स्थानीय लिपि में लिखने का कार्य चल रहा है
जमीनदार , जिनका बस्ती में सम्मान का स्थान माना गया है और अंचल की सत्ता तथा संपत्ति जिनके हाथ में है , उन्होंने शिक्षा , जिज्ञासा और स्वातंत्र्य के उत्साह को विशेष प्रभावित किया है
वे नक्काशी प्रकार से लिखाई करना ज्यादा पसंद करते हैं
पुरातन समय के स्टाइल्स के समान पैने नुकीले लोहे के साधन का वे कलम के स्थान पर प्रयोग करते हैं
इस प्रकार का साहित्य किसी विशेष संप्रदाय या वर्ग के लिए नहीं है
ये पत्ते जल्दी से सड्ते नहीं हैं और जीव जंतुओं का मुकाबला भी कर सकते हैं
और कागज की अपेक्षा काफी लंबे समय तक उसे सुरक्षित रखा जा सकता है
भिन्न नाप के कागजों की तरह भिन्न भिन्न आकार और गुणवाले पत्तों ( भोजपत्र ) का लोग उत्पादन करते हैं
ये पत्ते , उत्तर लिखने , पुस्तकें बनाने , या पत्र लिखने के काम मे आते हैं
पुस्तकें लकडी की दो पतली तख्तियों में बाँध कर रखी होती हैं और इन को मनपसंद रंगों से रंगा जाता है या वार्निश की जाती है
परंतु त्रावणकोर में अभी भी पुस्तकों का पूरा भंडार सुरक्षित है , जिसमें मलबार साहित्य का बडा हिस्सा प्राप्य है
इनमें से ३०-४० पुस्तकों का मलबारी भाषा में अनुवाद किया गया है
संस्कृत के कुछ शब्दों को अनुवाद में भी यथावत रखा गया है
टिप्पणी में मलबार के कार्यों का उल्लेख किया गया है जो पुस्तक सूची में क्रमांक १८१ पर दर्शाया गया है
मलबारी कवि रचित ९०० लघु कविताओं - जो प्रत्येक आठ कडी की होती है - वे ९०० अष्टक भारत में उपलब्ध हैं
मलबारी कवि रचित ९०० लघु कविताओं - जो प्रत्येक आठ कडी की होती है - वे ९०० अष्टक भारत में उपलब्ध हैं
मलबार में बहुत से नाटक होते हैं तथा मलबारी लोग नाटक देखने के बड़े शौकीन हैं
" इस मंडप में हजारों दर्शक बैठ सकते हैं
राजकुमारी के विवाह के समय स्त्री पुरुष एक साथ बैठकर नाटक देखते थे
नाटक के पात्रों में देवी देवता , राजा , वीरपुरुष और उनके सेवक थे
मैं मानता हूँ कि दो पत्नियों की अपेक्षा एक पत्नी होना अच्छा है - यह दिखाना इस नाटक का उद्देश्य था
इस से अनुमान किया जा सकता है कि केवल बंगाल और बिहार में ऐसे १ लाख विद्यालय हैं और यदि दोनों प्रान्तों की संयुक्त जनसंख्या ४ करोड़ है तो प्रति ४०० व्यक्ति एक विद्यालय होगा
इस से अनुमान किया जा सकता है कि केवल बंगाल और बिहार में ऐसे १ लाख विद्यालय हैं और यदि दोनों प्रान्तों की संयुक्त जनसंख्या ४ करोड़ है तो प्रति ४०० व्यक्ति एक विद्यालय होगा
इस से अनुमान किया जा सकता है कि केवल बंगाल और बिहार में ऐसे १ लाख विद्यालय हैं और यदि दोनों प्रान्तों की संयुक्त जनसंख्या ४ करोड़ है तो प्रति ४०० व्यक्ति एक विद्यालय होगा
इस प्रकार सारे प्रशिया में १९ , २३ , २०० बालक शिक्षा से लाभान्वित होने योग्य हैं
यह अनुपात इस देश में चुस्ती से लागु नहीं होता क्योंकि यहाँ शाला जाने की आयु ५-६ वर्ष है और विद्यालय छोडने की आयु १४ के स्थान पर १०- १२ वर्ष की है
शिक्षक अपनी आजीविका के लिये छात्रों पर निर्भर होते हैं
वर्तमान परिस्थिति में विद्यालय शिक्षा हेतु कोई महत्त्वपूर्ण साधन बनने की सम्भावना नहीं है
सभी बच्चों को प्रादेशिक भाषामें शिक्षा दी जाती है
शिक्षक को अधिक वेतन मिल सके इस हेतुसे अधिक संख्या में धनी परिवार के बालकों को प्रवेश देने की स्वतन्त्रता शिक्षक को होती है
यह अभ्यास आठ-दस दिन चलता है
उसके बाद उन्हें ताडपत्र पर लिखना सिखाया जाता है जिसके लिये वे कलम ऊंगलियों से नहीं अपितु मुट्ठी से पकङते हैं
उसके बाद उन्हें ताडपत्र पर लिखना सिखाया जाता है जिसके लिये वे कलम ऊंगलियों से नहीं अपितु मुट्ठी से पकङते हैं
इस प्रकार कलम से उन्हें ताडपत्र पर संयुक्ताक्षर , शब्दांश , शब्द , अंक ( पहाड ) , द्रव्य , वजन और दूरी के नाप , विशेष व्यक्तियों के नाप व स्थान लिखना सिखाया जाता है
इस दौरान उन्हें जोडबाकी , गुणा , भाग , जमीन के सरल नाप , व्यवसाय तथा खेती से सम्बन्धित हिसाबकिताब और पत्र लेखन सिखाया जाता है
ग्रामीण क्षेत्रों में गणित के नियम कृषि से सम्बन्धित विषयों में और नगरीय क्षेत्रों में व्यवसाय से सम्बन्धित हिसाब किताब में उपयोगी होते हैं
केवल वेतन के लिये वे बेगार करते हैं
शिक्षक भी अपने चरित्र से , उपदेश या डांटडपट के द्वारा अपने छात्रों के चरित्रनिर्माण हेतु कोई नैतिक प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते
नातोर में विद्यालयों की संख्या १० है जिनमें १६७ छात्र अध्ययन करते हैं
नातोर में विद्यालयों की संख्या १० है जिनमें १६७ छात्र अध्ययन करते हैं
ये छात्र १० वर्ष की आयु में विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और १० से १६ वर्ष की आयु में विद्यालय छोडते हैं
शिक्षक युवा और प्रौढ वय के होते हैं
बालकों की सूक्ष्म संदवेनाओं का नियमन करना , उनकी इच्छाओं और भावनाओं को नियंत्रित करना या इस प्रकार का मार्गदर्शन देना-ऐसा कोई विचार उनके मनमें नहीं आता
शिक्षा में सामान्य तौर पर चार स्तर दिखाई देते हैं
उदाहरणार्थ , जमीन , ताडपत्र , केले के पत्ते और कागज
यह आमदनी शिक्षक के निभाव के लिये पर्याप्त नहीं होती इससे वह अन्य बालकों को भी साथ में ले लेता है जिनमें से एक एक आना , दूसरा तीन आने और अन्य पाँच प्रत्येक चार चार आने मासिक देते हैं
मेरी बात का तात्पर्य यह है कि उनकी योग्यता के अनुसार या जिले में प्राप्त पारिश्रमिक की तुलना में वह कम नहीं है परंतु पूर्ण योग्यता वाले समर्थ व्यक्ति के वेतन की तुलना में वह कम है
वे भोजन के लिये प्रतिदिन एक घर से दूसरे घर जाते हैं , यह उनके विनम्र चरित्र और भावना का परिचायक है ( इसी से उनका सरल स्वभाव और सेवाभावना जानी जा सकती है ) 
ये कार्य हैं पटवारी , अमीन , सुमारनीस और खमार-नवीस जो देशी राजाओं के द्वारा नियुक्त होते हैं
पटवारी घर घर जाकर जमींदारों का लगान वसूल करता है और उसे प्रति माह ढाई या तीन रूपये वेतन मिलता है
पटवारी घर घर जाकर जमींदारों का लगान वसूल करता है और उसे प्रति माह ढाई या तीन रूपये वेतन मिलता है
अमीन ग्रामवासियों और जमींदारों के झगडे निपटाना , जमीन का नाप करना आदि कार्य करता है और उसे तीन से चार रूपये मासिक वेतन मिलता है
सुमारनवीस पटवारियों द्वारा जमा कराई रकम का हिसाब रखता है और प्रतिमास पांच रूपये वेतन पाता है
विद्यालयों के लिये भवन नहीं बनाये गये हैं तथा विद्यालय के स्वामित्व के भवन नहीं हैं
कुछ छात्रों को चंडीमंडप में पढाया जाता है
यह स्थान मंदिर जैसा होता है और गाँव के प्रमुख परिवारों की मालिकी का होता है
यह स्थान मंदिर जैसा होता है और गाँव के प्रमुख परिवारों की मालिकी का होता है
'बैठक' ( चौपाल ) एक झोंपडीनुमा खुली जगह होती है जहाँ मनोरंजन या गाँव के सामान्य हित की चर्चा हेतु सभाएँ होती हैं
विद्यालयों के लिये भवन नहीं बनाये गये हैं तथा विद्यालय के स्वामित्व के भवन नहीं हैं
क्रमांक ४ के गाँव में 'अ' विद्यालय वर्षा के सिवाय खुले मैदान में लगता है
वर्षाऋतु में जिन बालकों के माँ बाप व्यय कर सकते हैं वे उनके लिये घास या पत्तियों का मंडप बना देते हैं , जो चारों और खुला होता है और मुश्किल से एक ही व्यक्ति को वर्षा से बचा पाता है
कोलकता बुक सोसायटी से प्राप्त पुस्तकें जब मैंने उनके समक्ष रखीं , तो उन्हें ज्ञान के साधन के तौर पर नहीं वरन् कौतूहल से देखा गया
शिक्षक जो कुछ मौखिक पढाता लिखाता है छात्र उतना ही सीखते हैं
हाल ही में किसी ग्रामवासी संपादक ने इस कमी को दूर करने हेतु एक आवृत्ति का संपादन करने का विचार किया है
पहला स्तर शायद ही दस दिन का होता है जिसमें छोटे बालकों से उँगली या बाँस की कलम से जमीन पर लिखवाया जाता है
पहला स्तर शायद ही दस दिन का होता है जिसमें छोटे बालकों से उँगली या बाँस की कलम से जमीन पर लिखवाया जाता है
बालक की क्षमता के अनुसार दूसरा स्तर ढाई से चार वर्ष का होता है और वे ताडपत्र पर लिखने में समर्थ हों , इस प्रकार समय तय किया जाता है
बार बार पुनरावर्तन , कौडियों की मदद से सौ तक गिनती , पहाडा , जमीन नापने की तालिका ( कोष्टक ) , वजन नापने की तालिका ( शेर कोष्टक ) जिससे सूखा माल सामान तौला जा सकता है आदि कंठस्थ कराया जाता है
तीसरे स्तर की शिक्षा दो तीन वर्ष की होती है
कृषि विषयक गणना में जमा उधार , दैनिक , मासिक या वार्षिक वेतन की गणना , जमीन का क्षेत्रफल नापने की कथा-बीघा सारिणी , उसकी चौबंदी का नाप , उसकी लंबाई चौडाई का नाप , उसकी पैदावार तथा लगान आदि की गणना सिखाई जाती है
शिक्षा का चौथा स्तर दो वर्ष का होता है
इसमें आर्थिक पत्रव्यवहार , आवेदनपत्र , लेखन , अनुदान की जानकारी और गणना , भाडा चिट्ठी ( रसीद ) , प्राप्त धन की रसीद , हूंडी आदि का समावेश होता है
ऐसा लगता है कि ग्रामीण शिक्षा प्रणाली मात्र कान पर आधारित है और दृश्य ( आंख ) की उसमें उपेक्षा की जाती है; यह गलतफहमी के कारण है
लेखन में तो दृश्येन्द्रिय के बिना ज्ञान सम्भव ही नहीं है
अज्ञान की अपेक्षा गरीबी के कारण शिक्षा की इस प्रथा और कम खर्चीली व्यवस्था का स्वीकार किया गया है
मैं यह कहने में असमर्थ हूँ कि स्कॉटलैण्ड की ग्राम शालाओं में दी जानेवाली शिक्षा विद्यार्थी के दैनंदिन व्यवहार के लिए अधिक उपयोगी है
फारसी प्राथमिक शालायें नातोर में चार फारसी शालायें हैं
उनमें साढे चार वर्ष से तेरह वर्ष तक की आयु के बालकों को प्रवेश दिया जाता है और वे बारह से सत्रह वर्ष की आयु तक शिक्षा प्राप्त करते हैं
इस प्रकार इन शालाओं में चार से आठ वर्ष तक का पाठ्यक्रम है
बंगाली शालाओं के शिक्षकों की अपेक्षा यहाँ के शिक्षकों का स्तर ऊँचा है फिर भी अपेक्षित स्तर की गुणवत्ता नहीं है
नैतिक दृष्टि से बंगाली शिक्षकों का सुन्दर प्रभाव बालकों के चरित्र और स्वभाव पर पडता है
उन्हें आवश्यकता के अनुसार मासिक वेतन मिलता है
यह वेतन डेढ रूपये से चार रूपये तक का होता है
इन शालाओं के आश्रयदाताओं का मुख्य हेतु उनके बालकों को शिक्षा दिलाना होता है
दो विद्यालयों के अपने मकान हैं जो परोपकारी आश्रयदाताओं ने बनवाये हैं और उनकी सहायता भी करते रहते हैं
फारसी शालायें छपी हुईं पुस्तकों से अपरिचित हैं , परंतु हस्तलिखित साहित्य का निरंतर उपयोग होता है
अक्षरों का ज्ञान , उनकी शब्द रचना , शुद्ध के लिये कौन सा अक्षर या शब्द किस अवयव की मदद से बोला जाता है यह जानना आवश्यक होता है
उनके हाथ में दूसरी पुस्तक सादी का 'पढनामा' दी जाती है
उसके बाद ही बालक को स्वर और व्यंजन संधि तथा स्वर व्यंजन के संयुक्त शब्द सिखाये जाते हैं जिससे वह शब्द रचना कर सके
विवाह से संबंधित सादी की एक पुस्तक 'गुलिस्तान' भी पढाई जाती है जिसमें विवाह जीवन की रीतिनीति सिखाई जाती है
विद्यार्थी को फारसी हिसाब , फारसी नाम और बाद में हिन्दी नाम लिखना सिखाया जाता है
इस लेखन में , हिब्रू इतिहास के प्रसिद्ध प्रसंगों से जुडी , जोसेफ और जुलेखांकी काव्य पंक्तियाँ , लैला मजनू की प्रेमकथा , सिकंदरनामा से महान सिकंदर के पराक्रमों की कथायें आदि का समावेश होता है
दूसरे विभाग में मूलाक्षरों का नाम दर्शने वाले अक्षरों का इस गणन हेतु उपयोग किया जाता है
बालवय के बाद फारसी शालाओं में जब यह लगता है कि अब अधिक भार पूर्वक शिक्षा दी जा सकती है , तब शिक्षा का समय प्रात: ६ बजे से रात के ९ बजे तक बढा दिया जाता है
अन्य जिलों में जहाँ संपन्न और प्रभावी मुसलमान परिवार रहते हैं वहाँ शिक्षक को मियाँ या आखुन कहा जाता हैं
व्यक्तिगत शिक्षक भी होते हैं जिन्हें 'सेन्सर मोइम' या 'अतालिक' कहा जाता है जो घरेलू बडे नौकर के समान होते हैं
भले ही पुस्तक हस्तलिखित हो परंतु उसके उपयोग के कारण वह काफी प्रगत है
इस उपयोगिता के कारण बालकों का मन नियमित रचनाओं के लिये तैयार हो जाता है और शुद्ध तथा प्रांजल भाषा और उससे विचार , बुद्धि और आस्वादन को प्रोत्साहन उसके प्रतिफल हैं
परंतु जहां तक मेरा निरीक्षण है , सभी पुस्तकें , जो काम में ली जा रही हैं , केवल भाषा शिक्षण के लिये ही हैं , अर्थात् ध्वनि का ज्ञान , वाक्यरचना हेतु शब्दों या कहानी की जानकारी देने तक सीमित हैं
लोगों के दो समुदाय हैं , एक पढा-लिखा मुस्लिम समुदाय है और दूसरा हिन्दू समुदाय है
अरबी प्राथमिक शालायें अरबी शालाओं में धार्मिक या औपचारिक वाचन कुरान के कुछ भागों से किया जाता है
ये छात्र ७ से १४ वर्ष के आयु समूह में पढना सीखते हैं और ८ से १८ वर्ष की आयु में विद्यालय छोड देते हैं
शाला में १ वर्ष से ५ वर्ष तक वे रहते हैं
निम्नतम प्रशिक्षण युक्त शिक्षक उपलब्ध हैं जिन्हें शिक्षा का कार्य दिया जाता है
मात्र कुछ आकार , नाम , शब्द , ध्वनि , कुछ अक्षर और अक्षर मिलाकर लिखे शब्द वे जानते हैं और सिखाते हैं , और जितना वे पढाते हैं उतना ही लिखा हुआ समझ सकते हैं
शिक्षक अलाझ ( कठमुल्ले ) हैं जो काफी निम्न स्तर के मुसलमान धर्मगुरु हैं , जो अपना जीवन निर्वाह अपने ही वर्ग के गरीब , अज्ञानी और अंधविश्वासी लोगों के आधार पर करते हैं
इसके लिये उन्हें दोनों पक्षों से १ आना से ८ आना तक मिलता है
मृत्यु समय की क्रिया , जिसमें मृतक के लिये प्रार्थना की जाती है , १ दिन से ४० दिन तक चलती है
इसके लिये वे जानवरों का झटका ( काटना ) करते हैं और पवित्र आयतें बोलते हैं , जिनके बिना मुसलमान यह माँस नहीं खा सकते
एक उदाहरण में तो शिक्षक को शाला के आश्रयदाता से निश्चित वेतन , कुछ छात्रों से शुल्क और जीवनावश्यक वस्तुयें कुल मिलाकर साडे चार रूपये जितनी मासिक आय होती है
इसके लिये वे कोई वेतन या पारिश्रमिक नहीं लेते
तीन उदाहरणों में शिक्षकों को सलामी के रूप में वेतन मिलता है जो पांच या छह रूपये की भेंट होती है
शिक्षक अलाझ ( कठमुल्ले ) हैं जो काफी निम्न स्तर के मुसलमान धर्मगुरु हैं , जो अपना जीवन निर्वाह अपने ही वर्ग के गरीब , अज्ञानी और अंधविश्वासी लोगों के आधार पर करते हैं
डॉ . बुशनन को दिनाजपुर जिले में १६ विद्यालय मिले , जबकि पडोस के पूर्णिया जिले में लगभग ११९ जितनी ऐसी संस्थायें हैं
नदिया में उन्होंने ३१ हिन्दू शालाएँ बताई हैं
जिनमें ७४७ छात्र अध्ययनरत थे
कुछ में ३ से ५ और कुछ में ९ से ११ कमरे होते हैं
वाचनकक्ष का भी इन्हीं में समावेश हो जाता है
ये कच्चे मकान ज्यादातर शिक्षकों के ही बनाए हुए होते हैं
विद्यालय का मकान बनाने और विद्यार्थियों के भोजन के लिये शिक्षक दान एकत्र करते हैं
कुछ मामलों में जमीन के लिये किराया दिया जाता है
समान्यत: जमीन या मकान भेट में मिले हुए होते हैं
यदि शिक्षक को बच्चे एकत्रित करने में कठिनाई होती है , तो वह अपने संबंधियों के बालकों को एकत्र कर शाला प्रारंभ करता है और उन्हें शिक्षा देकर एवं सामाजिक वादविवादों के समय अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर नाम कमाता है
उसके बाद के तीन घंटे नहाने-धोने , भोजन करने और विश्राम के लिये होते हैं
विशेष तौर पर तर्कशास्त्र के छात्र देर रात २-३ बजे तक अध्ययन करते रहते हैं
बंगाल में तीन प्रकार के महाविद्यालय हैं
पहले में व्याकरण , सामान्य साहित्य , आलंकारिक भाषा , महान पौराणिक काव्य और विधिशास्त्र की शिक्षा दी जाती है
दूसरों में मुख्य तौर पर कायदे-कानून और पौराणिक कविताओं की शिक्षा दी जाती है
तीसरे प्रकार के विद्यालयों में तर्कशास्त्र की मुख्य विषय के रूप में शिक्षा दी जाती है
परंतु यह शिक्षा भाषण के स्वरूप में नहीं होती
महाविद्यालय के प्रथम वर्ष में उस कॉलेज ( महाविद्यालय ) में प्रयुक्त व्याकरण के पाठों का पुनरावर्तन होता है और जब वे विद्यार्थियों को कंठस्थ हो जाते हैं तब शिक्षक उन्हें समझाता है
व्याकरण का अध्ययन , दो , तीन या छ वर्ष तक चलता है और जहाँ पाणिनि का व्याकरण भी पढाया जाता है वहाँ यह समय दस वर्ष से कम नहीं होता
प्रत्येक वर्ग के विद्यार्थी एक या अधिक पुस्तक लेकर शिक्षक के समक्ष बैठते हैं और सबसे तेजस्वी विद्यार्थी उसे ऊँची आवाज में पढता है तथा शिक्षक जब जब उसका अर्थ पूछता है तब तब वह उत्तर देता रहता है
जिनके विवरण जिस से पूर्वोक्त अधिकांश जानकारी प्राप्त हुई है , से ऐसा अंदाज लगता है कि १ लाख ब्राह्मणों में से १ हजार ब्राह्मण संस्कृत व्याकरण सीखते हैं इनमें से ४००-५०० लोग काव्य रचना के अमुक अंश पढ सकते हैं और ५० अलंकार शास्त्र के कुछ अंश पढते हैं
जिनके विवरण जिस से पूर्वोक्त अधिकांश जानकारी प्राप्त हुई है , से ऐसा अंदाज लगता है कि १ लाख ब्राह्मणों में से १ हजार ब्राह्मण संस्कृत व्याकरण सीखते हैं इनमें से ४००-५०० लोग काव्य रचना के अमुक अंश पढ सकते हैं और ५० अलंकार शास्त्र के कुछ अंश पढते हैं
इन हजार छात्रों में से ४०० स्मृति ( विधिशास्त्र ) पढते हैं , परंतु तंत्रशास्त्र का अध्ययन १० से अधिक छात्र नहीं करते
३०० छात्रों ने न्यायशास्त्र का अध्ययन किया है किन्तु पांच या छह लोगों ने मीमांसा , सांख्य , वेदांत , पतंजलि , वैशेषिक या वेदों का अध्ययन किया होता है
इन में से दस जितने ब्राह्मण खगोलशास्त्र का अध्ययन करते हैं तथा अन्य दस से कुछ अधिक इसका अधूरा ज्ञान रखते हैं
जब कोई छात्र तर्कशास्त्र या विधिशास्त्र का अध्ययन प्रारंभ करता है तब शिक्षक की अनुमति से उस छात्र के सहपाठी उसका मानद नाम ( पद ) से अभिनंदन करते हैं
प्रदेश के कुछ भागों में यह पदवीदान पंडितों की उपस्थिति में होता है तथा कुछ अन्य स्थानों पर राजा या जमीनदार की उपस्थिति में किया जाता है
ये राजा या जमींदार शिक्षा को प्रोत्साहन देने को उत्सुक रहते हैं और छात्र को सम्मानित करने के लिए उसे कीमती वस्त्र देते हैं और तिलक करते हैं
इन लोगोंने खूब श्रम करके अक्षर लेखन का व्यवसाय अपनी आजीविका के लिये विकसित किया है और शिक्षा का व्यवसाय अपनाया है
यह व्यवसाय आजीविका का साधन मात्र नहीं है परंतु अपने जातिबंधुओं के लिये नैतिक और धार्मिक रूप से लाभप्रद , प्रशंसनीय और उत्पादक है
इन लोगोंने खूब श्रम करके अक्षर लेखन का व्यवसाय अपनी आजीविका के लिये विकसित किया है और शिक्षा का व्यवसाय अपनाया है
यह व्यवसाय आजीविका का साधन मात्र नहीं है परंतु अपने जातिबंधुओं के लिये नैतिक और धार्मिक रूप से लाभप्रद , प्रशंसनीय और उत्पादक है
छात्रों की संख्या शायद ही छह से अधिक होती है
पहली स्थिति में जहाँ मुसलमान विद्यार्थी शिक्षक के ही घर में रहते हैं , उन्हें संदेशवहन , बजार से खरीदी , और घर का काम करना होता है
एक के पास से वे अक्षरज्ञान और फारसी भाषा के कुछ अंश , दूसरे से 'पढनामा' , तीसरे से गुलिस्तां सीखतें हैं
फारसी भाषा में दक्षता प्राप्त करने का हेतु छात्र को आजीविका रूप कोई कार्य प्राप होना होता है परंतु कुछ मामलों में अरबी भाषा का भी अध्ययन किया जाता है , जिसमें व्याकरण , साहित्य , धर्मशास्त्र और कानून की शिक्षा दी जाती है
कोलकता और चौबीस परगना की हिन्दू संस्थाओं की निश्चित संख्या प्राप्त नहीं हुई है
महाविद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों की संख्या १७३ दर्शाई गई है , जिनमें कम से कम तीन और ज्यादा से ज्यादा पंद्रह छात्र एक शिक्षक के पास पढते थे
ये सभी संस्थाएँ संपन्न हिन्दुओं के स्वैच्छिक सहयोग और धर्मार्थ प्राप्त जमीन की पैदावार से चलाई जाती थीं
हेमिल्टन के कथनानुसार सन् १८०१ में २४ परगना की सीमा में और मेरे अनुसार कोलकता शहर से बाहर १९० विद्यार्थी समूह थे
श्री वोर्ड बताते हैं कि जयनगर और मुजलीपुर में ऐसी १७-१८ शालायें थीं और आंदुली में १०-१२ शालायें थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में एकमात्र मदरसा था जिसमें मुस्लिम कानून की शिक्षा दी जाती थी परंतु वह कहाँ था इसका उल्लेख हेमिल्टन ने नहीं किया है
मौलवी अपने घर पर ही कुछ छात्रों को रखकर उन्हें फारसी और अरबी पढ़ाते हैं
फारसी और अरबी पढनेवाले ये छात्र प्रभावशाली परिवारों के हैं और धर्मार्थ तौर पर पढ़ रहे हैं अत: वे व्यय और दुराचार से अनभिज्ञ रहते हैं
यहाँ हिन्दू विद्यालय न होना आश्चर्यजनक लगता है
इस जिले में रहनेवाले और इन विद्यालयों की शिक्षा से परिचित विद्वान लोग इस प्रदेश के निवासी होने से इंकार करते हैं
कोई भी विष्न या बाधा उत्पन्न न करनेवाले निवृत्त हिन्दू विद्वान जब यह कहते हैं कि यूरोप के लोग हिन्दू भाषा और साहित्य की अपेक्षा मुसलमानों पर ज्यादा ध्यान देते हैं तो ऐसी गलत बयानी को साधारण रूप से नहीं लिया जाना चाहिए
जगन्नाथपुरी के मुख्य मार्ग पर धार्मिक मठों की भरमार है , दक्षिण का प्रदेश साधु-साध्वियों के निवास के तौर पर जाना जाता है , जहाँ हिन्दुओं को विविध शाखाओं की शिक्षा दी जाती है
जगन्नाथपुरी के मुख्य मार्ग पर धार्मिक मठों की भरमार है , दक्षिण का प्रदेश साधु-साध्वियों के निवास के तौर पर जाना जाता है , जहाँ हिन्दुओं को विविध शाखाओं की शिक्षा दी जाती है
हुगली इस जिले में हिन्दू शिक्षा संस्थाओं की संख्या ध्यानाकर्षक है
त्रिवेणी नामक शहर में ७-८ शालायें हैं जिनमें से एक में बंगाल के सबसे अधिक वृद्ध एवं विद्वान व्यक्ति , जगन्नाथ तारक पढाते थे
त्रिवेणी नामक शहर में ७-८ शालायें हैं जिनमें से एक में बंगाल के सबसे अधिक वृद्ध एवं विद्वान व्यक्ति , जगन्नाथ तारक पढाते थे
उनकी मृत्यु १०९ वर्ष की आयु में हुई
उन्होंने वेदांत , सांख्य , पतंजलि , न्याय , स्मृति , तंत्र , काव्य , पुराण और अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया था
क्षेत्रों की संख्या , प्राप्त आमंत्रणों की संख्या , हिन्दू परिवारों में धार्मिक अवसरों पर प्राप्त उपहार शिक्षक की प्रतिष्ठा का आधार माना जाता है
समर्थ विद्यार्थी विद्यालय के समय के बाद अपने घर रहते हैं और यदि शिक्षक विद्यार्थी का खर्च वहन नहीं कर सकता है तब ऐसे गरीब छात्रों के लिए गाँव के सुखी व्यक्ति दान देते रहते थे
समर्थ विद्यार्थी विद्यालय के समय के बाद अपने घर रहते हैं और यदि शिक्षक विद्यार्थी का खर्च वहन नहीं कर सकता है तब ऐसे गरीब छात्रों के लिए गाँव के सुखी व्यक्ति दान देते रहते थे
पहले तीन चार वर्ष तक संस्कृत व्याकरण का अध्ययन और बाद के छह से आठ वर्ष तक कानून या तर्कशास्त्र का अध्ययन किया जाता है
इसे जिले में मुस्लिम विद्यालय नगण्य हैं
सीतापुर घनी बस्तीवाला क्षेत्र है और २२ मील दूर है
सीतापुर घनी बस्तीवाला क्षेत्र है और २२ मील दूर है
इस विद्यालय के संस्थापक उमीशुद्दीन थे
उनकी एकनिष्ठ सेवाओं के बदले में अंग्रेज सरकार उसके लिये पाँच रूपये आठ आना निभाव खर्च देती थी
उनकी एकनिष्ठ सेवाओं के बदले में अंग्रेज सरकार उसके लिये पाँच रूपये आठ आना निभाव खर्च देती थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
हाजी मोहम्मद के दान से हुगली में चल रहे विद्यालय के अलावा एक अन्य सीतापुर के विद्यालय की जानकारी मिलती है
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में इस विद्यालय में ३० छात्रों को अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी और जनरल कमेटी के विवरण के अनुसार इसमें केवल २५ विद्यार्थी थे और उन सबको केवल फारसी सिखाई जाती थी
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
सन् १८१८ के सितम्बर में बर्दवान के जिलाधीश से रामबल्लभ भट्टाचार्य और उनकी धार्मिक संस्था एवं सभा के लिये ६० रूपये वार्षिक पैंशन के दावे की पूछताछ की गई
इस स्थिति में रेवेन्यू बोर्ड ने दावेदारों के जीवन काल तक पूरी पेन्शन चालू रखने का प्रस्ताव पारित किया तथा कहा कि निष्ठापूर्वक मूल हेतु का पालन हो इसका ध्यान रखा जाए
मार्च १८१९ में बर्दवान के जिलाधीश ने रेवेन्यू बोर्ड को आवेदन दिया था
जुलाई , १९२३ में रेवेन्यू बोर्ड ने बर्दवान के महाविद्यालय को २५४ रूपये वार्षिक अनुदान के लिये सिफारिश की और उसे लोकशिक्षा की साधारण समिति को भेज दिया
जुलाई , १९२३ में रेवेन्यू बोर्ड ने बर्दवान के महाविद्यालय को २५४ रूपये वार्षिक अनुदान के लिये सिफारिश की और उसे लोकशिक्षा की साधारण समिति को भेज दिया
इस स्थिति में रेवेन्यू बोर्ड ने दावेदारों के जीवन काल तक पूरी पेन्शन चालू रखने का प्रस्ताव पारित किया तथा कहा कि निष्ठापूर्वक मूल हेतु का पालन हो इसका ध्यान रखा जाए
जुलाई , १९२३ में रेवेन्यू बोर्ड ने बर्दवान के महाविद्यालय को २५४ रूपये वार्षिक अनुदान के लिये सिफारिश की और उसे लोकशिक्षा की साधारण समिति को भेज दिया
नदिया मुसलमानों की विजय के समय नदिया हिन्दुओं की राजधानी थी और फिलहाल वह ब्राह्मण शिक्षा का प्रमुख स्थान है
नदिया मुसलमानों की विजय के समय नदिया हिन्दुओं की राजधानी थी और फिलहाल वह ब्राह्मण शिक्षा का प्रमुख स्थान है
हेमिल्टन ने लिखा है कि शिक्षा के मामले में वहाँ निश्चित गिरावट आई होगी क्योंकि सन् १८०१ में मार्कविस ऑफ वेलेस्ली के पूछने पर वहाँ के न्यायाधीश ने बताया कि उसे एक भी हिन्दू या मुसलमान शिक्षा संस्था की जानकारी नहीं है जिसमें कानून की शिक्षा दी जाती हो
बंगाल के राजकुमारों और नदिया के राजाओं ने विद्यार्थियों के निभाव और शिक्षा के लिये कुछ शिक्षकों को जमीन दी थी
बंगाल के राजकुमारों और नदिया के राजाओं ने विद्यार्थियों के निभाव और शिक्षा के लिये कुछ शिक्षकों को जमीन दी थी
सन् १८११ में गवर्नर जनरल लोर्ड मिन्टो ने नदिया और तिरहत में हिन्दू महा विद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की और इस हेतु अलग धन राशि की व्यवस्था की
सन् १८११ में गवर्नर जनरल लोर्ड मिन्टो ने नदिया और तिरहत में हिन्दू महा विद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की और इस हेतु अलग धन राशि की व्यवस्था की
सन् १८११ में गवर्नर जनरल लोर्ड मिन्टो ने नदिया और तिरहत में हिन्दू महा विद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की और इस हेतु अलग धन राशि की व्यवस्था की
श्री वोर्ड ने सन् १८१८ में नदिया में ३१ विद्यालय बताये हैं जिनमें ७४७ विद्यार्थी थे
श्री वोर्ड ने सन् १८१८ में नदिया में ३१ विद्यालय बताये हैं जिनमें ७४७ विद्यार्थी थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
काशीनाथ तर्क चूडामणि के पास ३० छात्र थे
उभयानन्द तर्कालंकार के पास २० छात्र थे
रामशरण न्यायवागीश के पास १५ छात्र थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
रामशरण न्यायवागीश के पास १५ छात्र थे
उभयानन्द तर्कालंकार के पास २० छात्र थे
कान्त विद्यालंकार के पास ४० छात्र थे
वैधानिकशास्त्र के महाविद्यालय रामनाथ तर्कसिद्धांत के पास ४० छात्र थे
गंगाधर शिरोमणि के पास २५ छात्र थे
मोहन विद्यावाचस्पति के पास २० छात्र थे
गांगुलि तर्कालंकार के पास १० छात्र थे
गांगुलि तर्कालंकार के पास १० छात्र थे
गंगाधर शिरोमणि के पास २५ छात्र थे
गंगाधर शिरोमणि के पास २५ छात्र थे
मोहन विद्यावाचस्पति के पास २० छात्र थे
मोहन विद्यावाचस्पति के पास २० छात्र थे
जहाँ काव्य शिक्षा दी जाती थी वैसे महाविद्यालय कालीकान्त तर्कचूडामणि के पास ५० छात्र थे
सन् १८२१ में श्री विल्सन की सामान्य जनादेश समिति के सदस्य के रूप में विशेष जाँच हेतु जब नियुक्ति की गई तब नदिया जिले में शिक्षा की जो स्थिति थी उसकी कुछ जानकारी एकत्र की थी
उस समय नदिया में २५ स्थानों पर शिक्षा की व्यवस्था थी
पंडित ( शिक्षक ) यहाँ नहीं रहते थे किन्तु प्रात: जल्दी आकर सूर्यास्त तक कार्य करते थे
विद्यार्थियों की झोंपडियां बनाने या उनकी मरम्मत करने का खर्च शिक्षक उठाते थे तथा विद्यार्थियों को नि:स्वार्थ शिक्षा देते थे और उनके भोजनादि का खर्च भी वहन करते थे
कुल ५००-६०० विद्यार्थी थे जिनमें से अधिकांश बंगाली थे
विशेष तौर पर कुछ विद्यार्थी दक्षिण से , कुछ नेपाल और आसाम से और कुछ पूर्व में तिरहट तक से आये थे
पंडित ( शिक्षक ) यहाँ नहीं रहते थे किन्तु प्रात: जल्दी आकर सूर्यास्त तक कार्य करते थे
प्रमुख त्यौहारों पर विद्यार्थी भिक्षाटन को निकल पडते थे और बहुत सी आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेते थे जो उनके खाली समय में उपयोगी होती थी
नदिया में प्रमुख तौर पर न्याय व तर्कशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी
सन् १८१६ में सरकारी अधिकारियों के अनुसार विद्यालयों की संख्या ४६ और छात्र संख्या ३८० थी
सन् १८१६ में सरकारी अधिकारियों के अनुसार विद्यालयों की संख्या ४६ और छात्र संख्या ३८० थी
सन् १८२९ में २५ विद्यालय और ५००-६०० विद्यार्थी थे
नदिया में हिन्दू शास्त्रों की शिक्षा देने वाले कुछ विद्यालयों को ब्रिटिश सरकार से थोडा सा वार्षिक भत्ता मिलता था
इस तरह रामचन्द्र विद्यालंकार को सन् १८१३ में ७१ रूपये वार्षिक भत्ता मिलता था , जो उनकी बैठक व्यवस्था के क्षेत्रफल के अनुसार दिया जाता था
सन् १८१८ में बालानाथ शिरोमणि ने रामचंद्र विद्यालंकार के वारिस और गुरुकुल के उत्तराधिकारी के रूप में आवेदन किया
रेवेन्यू बोर्ड में किये गये इस दावे के संबंध में जिलाधीश महोदय को आदेश दिया गया कि बालानाथ ऐसा कोई विद्यालय चलाते हैं या नहीं इसकी जाँच की जाए
जून १८२० में सरकार ने ७१ रूपये वार्षिक पेन्शन तथा शेष राशि देने का निर्णय किया
जून १८१८ में शिवनाथ विद्यावाचस्पति की ओर से नदिया के जिलाधीश ने रेवेन्यू बोर्ड को आवेदन पत्र भेजा जिसमें ६० रूपये वार्षिक पेन्शन ( भत्ता ) देने की सिफारिश की
इस गुरुकुल की स्थापना नेतोर के राजा ने की थी
श्री राम शिरोमणि के गुरुकुल में तीन ही विद्यार्थी थे तो भी वार्षिक भत्ता तथा अन्य अतिरिक्त रकम अदा की गई
इसी प्रकार सन् १८१९ में राम जयतर्क बंका के लिये नदिया के गुरुकुल में पांच विद्यार्थियों के लिये ६२ रूपये का भत्ता मंजूर किया गया
१८२९ में सामान्य जनादेश समिति से कहा गया कि सरकार में जो याचिका दी गई है उसकी जाँच कर सरकार को विवरण दिया जाए
समिति ने एक सचिव और एक सदस्य की नियुक्ति की
विदेशी ( अन्य जिलों के ) विद्यार्थियों की संख्या १००-१५० थी और ये १५० विद्यार्थी नदिया में अपनी याचिका के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे
सामान्यत: वे उसके कर्जदार ही बने रहते थे , तथा प्रभावशाली ब्राह्मण वर्ण के कारण वह विद्यार्थियों के साथ धोखेबाजी नहीं कर पाता था
इस याचिका में कुछ विद्यार्थियों ने माँग की थी कि उन्हें जो १०० रुपये मासिक भत्ता ( छात्रवृत्ति ) मिलता था उसे पुन: प्रारंभ किया जाए
पहले शांतिपुर में शासकीय अनुदान से धर्मादा संस्था चलती है परंतु फिलहाल उसका अस्तित्व नहीं है
सन् १८२४ में नदिया के जिलाधीश के माध्यम से एक आवेदन रेवेन्यू बोर्ड को दिया गया जिसमें कालीप्रसाद तर्कसिद्धांत की गत वर्ष हुई मृत्यु के कारण उनके भाई देवीप्रसाद विद्यावाचस्पति को शांतिपुर में गुरुकुल चलाने के लिये वार्षिक १५६ रूपये ११ आने १० पाई भत्ता मंजूर करने की माँग की गई थी
मुसलमानों की अच्छी खासी आबादी होने के बावजूद उनकी कोई शिक्षा संस्था न हो यह असंभव लगता है
ढाका और जलालपुर हैमिल्टन बताता है कि जिले की कुछ शालाओं में हिन्दु धर्म के सिद्धान्त और कानून पढाये जाते थे , परंतु इससे अधिक जानकारी मेरे पास नहीं है
उस समय ऐसे कोई गुरुकुल या विद्यालय नहीं थे जिसमें हिन्दू अथवा मुस्लिम कानून की शिक्षा दी जाती हो
सरकारी अधिकारियों ने समिति को बताया कि जिले में शिक्षा के लिये किसी प्रकार का भत्ता या दानराशि दी गई हो ऐसा एक भी अभिलेख या प्रमाण नहीं है
बाकरगंज इस जिले में एक भी ग्रामशाला या महाविद्यालय नहीं है
अन्य जिलों की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के आधार पर मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि यहाँ भी शिक्षा संस्थाएँ होंगी परंतु यह बात आम जनता के ध्यान में नहीं आई होगी
सन् १८२३ में जिलाधीश ने बताया कि इस जिले में शिक्षा के लिये कोई सहायता नहीं दी गई है
बाकरगंज इस जिले में एक भी ग्रामशाला या महाविद्यालय नहीं है
सन् १८२७ में जिलाधीश महोदय को धर्मार्थ चल रही संस्थाओं की जाँच करने और उसके निष्कर्ष सरकार को बताने को कहा गया
मूलत: विद्यार्थियों की कुल संख्या १५० अनुमानित की गई थी
टिपेरा मेरे पास इस जिले की सामान्य या किसी अन्य प्रकार की किसी भी शाला की जानकारी नहीं है
सामान्य सभा के प्रश्नों के उत्तर में सरकारी प्रतिनिधियों ने बताया कि शिक्षा की सहायता के लिये या कोई सार्वजनिक कोष इस जिले में होने की जानकारी उनके पास नहीं है
मैमनसिंह हेमिल्टन बताता है कि इस जिले में नियमित रूप से मुस्लिम कानून पढानेवाली कोई शाला या गुरुकुल नहीं है किन्तु प्रत्येक परगना में हिन्दू शास्त्र पढानेवाली २-३ शालायें थीं
शिक्षा नि:शुल्क थी
शिक्षा नि:शुल्क थी
ग्राम्य शालाओं में प्राथमिक शालाओं का समावेश हो जाता है
जिले में जहाँ मुस्लिम और हिन्दू आबादी का अनुपात ५:२ का है वहाँ कोई मुस्लिम विद्यालय नहीं है यह कहना विवादास्पद लगता है
किन्तु भिन्न भिन्न स्थानों पर बालकों को निजी विद्यालयों में लिखना और पढ़ना सिखाया जाता था
मुर्शिदाबाद ऐसा कहा जाता है कि सन् १८०१ में मुस्लिम कानून की शिक्षा देनेवाली जिले में एक ही शाला थी जबकि हिन्दू शास्त्रों और रीतिरिवाजों की शिक्षा देनेवाली २० शालायें थीं
जिलाधीश ने याचिका के साथ अपनी खास टिप्पणी भी रखी जिसके अनुसार स्वर्गस्थ के पिता को यह पेंशन मिलती थी और १७९६ में तत्कालीन जिलाधीश की सिफारिश पर सरकार ने उसे मंजूर किया था
इस समय उनके पास ७ विद्यार्थी थे जिनमें से पाँच उन्हीं के पास रहते थे
दिसंबर १८१८ में मुर्शिदाबाद के जिलाधीश के माध्यम से कालिकान्त शर्मा की ओर से रेवेन्यू बोर्ड को एक याचिका दायर की गई जिसमें ५ रूपये मासिक पेन्शन चालू रखने की प्रार्थना की गई थी
जुलाई १८२२ में मुर्शिदाबाद के जिलाधीशने काशीनाथ न्यायपंचानन की ओर से एक याचिका रेवेन्यू बोर्ड को भेजी
काशीनाथ न्याय पंचानन राम किशोर शर्मा के पुत्र थे
उन्होंने राम किशोर शर्मा का स्वर्गवास हो जाने से उनको मिलनेवाली ५ रूपये मासिक पेंशन उनके नाम करने की प्रार्थना की
कोलापुर के पास व्यासपुरमें रामशरण शर्मा हिन्दू गुरुकुल चलाते थे और उसकी सहायता के लिये १७९३ में उन्हें पेंशन मिलती थी
उन्होंने राम किशोर शर्मा का स्वर्गवास हो जाने से उनको मिलनेवाली ५ रूपये मासिक पेंशन उनके नाम करने की प्रार्थना की
वीरभूम इस जिले की प्राथमिक शिक्षा के बारे में मेरे पास कोई विवरण नहीं है
सन् १८२३ में सामान्य समिति की पूछताछ पर स्थानीय अधिकारीने बताया कि इस जिले में युवकों की शिक्षा के लिये कोई निजी या सार्वजनिक गुरुकुल नहीं है
पडोस के जिले की तुलना में यह न सुना जा सकता है और न माना जा सकता है कि जहाँ ३० हिन्दू और १ मुसलमान की आबादी का औसत है वहाँ एक भी विद्यालय न हो
सन् १८२० में सर्वानंद नामक एक हिन्दू ने वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपने उत्तराधिकार का दावा किया और स्थानीय अधिकारी के माध्यम से सरकार को ५००० रूपये की सहायता भेजने की प्रार्थना की , जिससे जिले में एक ग्राम्यशाला स्थापित की जा सके
इसके साथ यह शर्त भी रखी कि शाला के मुख्यशिक्षक या उपाध्याय के रूप में सरकार उसका अधिकार स्वीकार करे
सन् १८२० में सर्वानंद नामक एक हिन्दू ने वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपने उत्तराधिकार का दावा किया और स्थानीय अधिकारी के माध्यम से सरकार को ५००० रूपये की सहायता भेजने की प्रार्थना की , जिससे जिले में एक ग्राम्यशाला स्थापित की जा सके
सन् १८२० में सर्वानंद नामक एक हिन्दू ने वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपने उत्तराधिकार का दावा किया और स्थानीय अधिकारी के माध्यम से सरकार को ५००० रूपये की सहायता भेजने की प्रार्थना की , जिससे जिले में एक ग्राम्यशाला स्थापित की जा सके
एक विशेष बात यह थी कि दो माह में ही १५ , ००० रूपये एकत्र हुए थे , परंतु यह पता नहीं चला कि ये दो माह वर्ष के वे महीने थे जब मंदिर में अधिक यात्री आते हैं या दूसरे
कार्यकारी प्रतिनिधि और जिलाधीश ने दो निवेदन दिये हैं
जिनमें भिन्न भिन्न धार्मिक उद्देश्यों के लिये दी गई जमीन का नाप , और उसकी पैदावार बताई गई है और जिन मूलभूत कार्यों के लिये जमीन दी गई थी उनमें उसका उपयोग होता है
जिलाधीश की यह धारणा रही होगी कि इस दान की रकम का उपयोग शिक्षा के लिये भी होता होगा , परंतु इसके लिये उसने कोई कारण नहीं दिया है
यह निवेदन आम जनता की जमीन के रजिस्टरों पर से तैयार किये गये थे और वे सारी बातें मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ
जिलाधीश की यह धारणा रही होगी कि इस दान की रकम का उपयोग शिक्षा के लिये भी होता होगा , परंतु इसके लिये उसने कोई कारण नहीं दिया है
जिनमें भिन्न भिन्न धार्मिक उद्देश्यों के लिये दी गई जमीन का नाप , और उसकी पैदावार बताई गई है और जिन मूलभूत कार्यों के लिये जमीन दी गई थी उनमें उसका उपयोग होता है
इस शिक्षा को भी एक प्रकार की धार्मिक दृष्टि से ही देखना चाहिए
आगमशास्त्र , खगोलशास्त्र , हस्तरेखा विज्ञान के अलावा हिन्दू धर्म के व्रत तथा कर्मकांड भी सिखाए जाते हैं और विद्यालयों में केवल आगमशास्त्र का ही ज्ञान नहीं दिया जाता
कानूनगो से प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार जिले के ९ उपविभागों में ४१ शालायें संस्कृत की शिक्षा देती हैं , जिनमें ५ से लेकर २५ तक विद्यार्थी होते हैं जिन्हें व्याकरण , सामान्य साहित्य , काव्यशास्त्र , तर्कशास्त्र , कानून , पौराणिक काव्य , खगोल तथा आगमशास्त्र की शिक्षा दी जाती है
विद्यार्थी ३५ वर्ष की आयु तक - कुछ मामलों में ४० वर्ष की आयु तक , अध्ययन जारी रखते हैं
दीनाजपुर जिले के २२ विभागों में से १५ में विद्यालय नहीं हैं और शेष ७ विभागों में केवल १६ विद्यालय हैं
दीनाजपुर जिले के २२ विभागों में से १५ में विद्यालय नहीं हैं और शेष ७ विभागों में केवल १६ विद्यालय हैं
दीनाजपुर जिले के २२ विभागों में से १५ में विद्यालय नहीं हैं और शेष ७ विभागों में केवल १६ विद्यालय हैं
अनेक शिक्षकों के पास जमीन है जिससे उनका और विद्यार्थियों का निभाव होता है और बिना किसी भेदभाव के हिन्दुओं की ओर से उन्हें उपहार मिलते हैं
धर्मार्थ सहायता , जिससे शिक्षकों को पर्याप्त मान प्रतिष्ठा मिलती है , यदि न मिले तो शिक्षा कार्य बंद हो जाता है
प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर चुकने के बाद बारह वर्ष की आयु में विद्यार्थी संस्कृत का अध्ययन प्रारंभ करते हैं
अन्य स्थानों की ही तरह बंगाल में भी पाठ्यक्रम में व्याकरण , तर्कशास्त्र , अध्यात्म और कभी कभी वेदों का तत्त्वज्ञान ( दर्शन ) , हिन्दू धर्म के वर्तमान कर्म कांड और खगोलशास्त्र , वैद्यक और जादूकला का भी समावेश होता है
परंतु इन्हें दैवी या अन्य प्रभावी साहित्य नहीं पढाया जाता है
ब्राह्मणों में अन्य हिन्दुओं की तुलना में अधिक बुद्धि सूक्ष्मता दिखाई देती है
यह एक विस्मित करनेवाली बात ही है कि जहाँ इतनी बडी मुस्लिम आबादी है वहाँ एक भी मुस्लिम शाला नहीं है
पूर्णिया डॉ . बुशनन के अनुसार इस जिले में ११९ शालायें विभिन्न स्तर पर चलती थीं
उनमें व्याकरण , तर्कशास्त्र , कानून और प्रवर्तमान कर्मकांड की शिक्षा दी जाती थी
छात्र अध्ययन में लापरवाह थे और दीर्घ अवकाशों पर चले जाते थे
किसी भी पंडित के पास आठ से अधिक छात्र नहीं थे जो प्रति शिक्षक दो से भी कम होते थे
वे पुस्तकों में से प्रार्थना पढते थे
ऐसा देखा गया कि भिन्न भिन्न विद्याओं और शास्त्रों का अध्ययन जिले के दो कोनों में ही किया गया था
कोशी के पश्चिम किनारे पर एक अन्य छोटा सा क्षेत्र है
पहले किस्से में स्थानीय शासक की देखरेख में सारा कार्य चलता है तथा आसपास के प्रदेश में प्रशासक की बहुत बडी संपत्ति होती है
इस प्रदेश के ३१ पंडित प्रमुख रूप से व्याकरण , कानून तथा पौराणिक काव्यों का अध्ययन अध्यापन करते थे
जिले के पश्चिम भाग में छोटे से स्थान पर ३३ शिक्षक हैं | यहाँ अध्यात्म और ज्योतिष पढाये जाते हैं
ग्यारह पंडित अध्यात्मशास्त्र पढाते थे
डॉ . बुशनन ने शिक्षा की विविध शाखाओं की कुछ जानकारी दी है
वे मंत्रतंत्र को नहीं मानते थे , और जडीबूटियों से दवाएँ बनाते थे
वे मंत्रतंत्र को नहीं मानते थे , और जडीबूटियों से दवाएँ बनाते थे
वे सिर्फ भिन्न भिन्न तेलों का प्रयोग करते थे
शल्य क्रियामें मात्र एक स्त्री प्रवीण थी जो पित्ताशय से पुराने ढंग से पथरी निकाल देती थी
शल्य क्रियामें मात्र एक स्त्री प्रवीण थी जो पित्ताशय से पुराने ढंग से पथरी निकाल देती थी
डॉ . बुशनन के अनुसार सारे जिले में अरबी शास्त्रों की संपूर्ण उपेक्षा की गई थी
वैद्यकीय व्यवसाय करने वालों की सबसे अधिक संख्या , १२३ नातोर में है
इस संस्था के दो वैद्यों ( शिक्षकों ) को दो संपन्न परिवारों ने अपने निजी चिकित्सक के रूप में नियुक्त किया है
हाजरानातोर क्रमांक-२६ नामक अन्य स्थान पर तीन शिक्षित हिन्दू चिकित्सक हैं
सबसे बड़े भाईने १८ वर्ष की आयु से यह व्यवसाय अपनाया है
आज वह बासठ वर्ष का है और अपना अतिरिक्त समय अपने दो भतीजों को शिक्षा देने में बिताता है
हरिदेव खलासी नामक एक तीसरे स्थान पर चार शिक्षित चिकित्सक हैं
ग्राम्य वैद्यों में स्त्री-पुरुष दोनों हैं
सामान्य चिकित्सकों के अतिरिक्त शीतला ( चेचक ) का टीका लगाने वालों का भी एक वर्ग है जो काफी सम्माननीय है
इनमें से २१ नातोर में हैं
कभी-कभी तो एक व्यक्ति एक दिनमें १००-१५० बच्चों को टीका लगा देता है
प्रति बालक टीकाकरण का शुल्क १ या दो आने मिलता है
परिचारिका का व्यवसाय करनेवाला भी एक वर्ग है
ग्राम्य चिकित्सकों की अपेक्षा एक निम्न वर्ग भी है जिसे लोग जादूगर या मदारी कहते हैं
नातोर के एक ही पुलिस थाना क्षेत्र में ऐसे ७२२ मदारी हैं
सांप लोगों के घरों में अपना आश्रयस्थान खोजते हैं और लोग सर्पदंश से बचने के लिये मदारियों की शरण में जाते हैं
जिन गाँवों में एक भी मदारी नहीं होता वहाँ लोग पास पडोस के गाँवों से बुलाकर एक दो मदारी को आवश्यक सुविधायें देकर गाँव में बसाते हैं
किन्तु ऐसा माना जाता है कि जिनका यह व्यवसाय अच्छा चलता है वह उनके श्रेष्ठ जन्मग्रहों के कारण होता है
कुछ गाँव ऐसे भी हैं जहाँ एक भी मदारी नहीं है तो कुछ गाँवों में लगभग १० मदारी हैं
परन्तु इनके मूल में नीतिभ्रष्टता और दुर्गुण हैं ऐसा कोई चिह्न दिखाई नहीं देता
आक्रमणों और युद्धों से निरंतर ग्रस्त रहने के बावजूद पंजाब ने शिक्षा की सुरक्षा ही नहीं की , उसका विकास भी किया है
इन विद्यालयों में छात्र बडी संख्या में धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने आते हैं
ऐसी दैनंदिन उपयोग की विद्या की अनेक शालायें थी जिनमें हिन्दू , मुसलमान और सिखों के बच्चे फारसी या अन्य कोई भाषा सीखते थे
प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवारों में पति पत्नी को पढ़ाता और पत्नी बच्चों को पढ़ाती थी
अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों विद्यार्थी थे , जहाँ पौर्वात्य साहित्य , कानून , तर्कशास्त्र , दर्शन , फारसी वैद्यक आदि विषय पढ़ाये जाते थे और उनका स्तर काफी ऊँचा था
अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों विद्यार्थी थे , जहाँ पौर्वात्य साहित्य , कानून , तर्कशास्त्र , दर्शन , फारसी वैद्यक आदि विषय पढ़ाये जाते थे और उनका स्तर काफी ऊँचा था
सारे वातावरण में शिक्षा के प्रति बड़ा पवित्र भाव था , चरित्र और धर्माचरण में वह उपयोगी थी
अपनी आजीविका के लिये लोग आवश्यकतानुसार पढते थे
वैश्य भी उनके पुरोहितों के आगे अत्यंत विनम्र होते क्योंकि उन्होंने ही प्राथमिक विद्यालय में उन्हें लिखना पढना सिखाया होता था
ब्रिटिश प्रशासकों ने आंकडे दिये हैं , जो दर्शाते हैं कि उन्होंने जो सर्वेक्षण किया था उसमें पुराने विद्यालय तो उपेक्षित हो गये क्यों कि उनके पास ( शासकीय ) मान्यता नहीं थी , और यूरोपीय पद्धति के विद्यालय बहुत खर्चीले थे , लोग इतना धन उसमें लगा नहीं सकते थे
' फिलिप हार्टोग का प्रश्न : गत पचास वर्षों में भारत में शिक्षा का ह्रास हुआ है इस प्रकार के अपने कथन के लिए श्री गांधी कोई प्रमाण देंगे ? श्री गांधीने उत्तर में कहा कि पंजाब प्रशासकीय अहवाल ( 2080 Administration Report ) उनका प्रमाण था
एम . के . गांधी एस्क गोलमेज परिषद सेण्ट जेम्स पेलेस एस . डबल्यू . १ प्रिय श्री गांधी , मैं समझता हूं आपने गत रात्रि में रॉयल इन्स्टीट्यूट ऑव इन्टरनेशनल अफेअर्स में कहा था कि आप ब्रिटिश अधिकारी द्वारा दिये गये प्रमाणों के आधार पर सिद्ध कर सकते हैं कि विगत पचास या सौ वर्षो में भारत में शिक्षा का ह्रास हुआ है
अब हैदराबाद में शासक मुस्लिम है और प्रजा हिन्दू है , जब कि काश्मीर में प्रजा मुस्लिम है और शासक हिन्दू है
अब हैदराबाद में शासक मुस्लिम है और प्रजा हिन्दू है , जब कि काश्मीर में प्रजा मुस्लिम है और शासक हिन्दू है
मुझे लगता है आप को ठीक जानकारी नहीं दी गई है
५ , इन्वरनेस गार्डन्स , डबल्यू , ८ २७ अक्टूबर १९३१ प्रिय श्री गांधी , आप के २३ अक्टूबर के मित्रतापूर्ण पत्र के लिए धन्यवाद
हमने हमेशा स्मरण में रखना चाहिए कि भारत में २० , ००० , ००० आदिवासी हैं और शिक्षा की दृष्टि से पिछडे इस से भी बडी संख्या में 'अस्पृश्य' हैं जिनका साक्षरता के प्रतिशत पर विपरीत प्रभाव पडता है
आप ध्यान देंगे कि ब्रिटिश इण्डिया में पुरुष साक्षरता १८८१ में ( ५० वर्ष पूर्व ) ८ प्रतिशत , १९११ में १२ प्रतिशत और १९२१ में १४ . ४ प्रतिशत थी
त्रावणकोर और कोचीन में बडी संख्या में भारतीय ईसाई हैं
मैं चाहता हूं कि आप 'मोडर्न इण्डिया ( Modern India ) ' में प्रकाशित मेरा लेख पढें
साथ ही वरिष्ठ भारतीय राजनीतिक चिन्तक स्वर्गस्थ लाला लाजपत राय का ग्रन्थ ( नेशनल एज्यूकेशन इन इण्डिया : National Education in India ) भी पढें
आपका फिलिप हार्टोग एम . के . गांधी ८८ , नाईट्सब्रिज , डबल्यू , ८८ , नाईट्सब्रिज , एस . डबल्यू १ ( डाक मुहर १४ नवम्बर १९३१ ) ( प्रति , सर फिलिप हार्टोग , लन्दन ) प्रिय मित्र , श्री गांधी को आप का २७ अक्टूबर का पत्र प्राप्त हुआ है १९२० की 'यंग इण्डिया' की प्रतियां भी अब मिली हैं जौ उनकी सूचना से मैं आपको भेज रहा हूं
कुछ लोगों को यह बात चौंकानेवाली लगेगी और कुछ लोगों को करनेवाली , परन्तु सत्य यह है कि जब से भारत ब्रिटिश आधिपत्य में गया है तब से जनसामान्य की शिक्षा की तो भारी अवनति हुई है
प्रजा के निम्न ( या सामान्य ) वर्ग के लिए ग्रामशालाएँ पूरे देशभर में व्याप्त थीं जिनमें कारीगरों , कृषकों और जमीनदारों के बच्चों को अच्छी प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी
प्रत्येक द्विज परिवार में , प्रत्येक जाति के प्रत्येक व्यवसाय में , प्रत्येक प्रतिष्ठित गांव में अपना एक पुरोहित होता था और एक ओर तो वह धार्मिक विषयों को देखता था परन्तु दूसरी ओर वह अध्यापन भी करता था
मुसलमानों की उच्च शिक्षा विद्वज्जनों के हाथ में थी
मस्जिद और दरगाहों के साथ विद्यालय जुडे हुए थे और राज्य की ओर से या निजी उदारता की ओर से भूमि या धन के रूप में उन्हें अनुदान प्राप्त होता था
मुस्लिम मदरसों के अध्ययन क्रम में व्याकरण , अलंकारशास्त्र , तर्कशास्त्र , साहित्य , विधि ( कानून ) और विज्ञान का समावेश होता था
इसीसे अनुमान किया जा सकता है कि उस समय की कुल जनसंख्या ( १ , २३ , ५० , ९४१ ) का विचार करते हुए यह कहा जा सकता है कि विद्यालय में जाने योग्य आयु के बच्चों की कुल संख्या के एक चतुर्थाश बच्चे विद्यालय में जाते थे
ब्रिटिश प्रभाव से युक्त भारत की शुद्ध देशी शिक्षा की स्थिति १८२६ में ऐसी थी जो एक शतक से भी अधिक समय तक ब्रिटिश शासन में होने के कारण से उसकी पुरानी संस्थाएँ बिखराव की स्थिति में थीं और वह नई संस्थाओं को अपना रही थीं
' सरकार माध्यमिक विद्यालयों और उच्च शिक्षा के लिये अपने संसाधन खर्च कर रही थी क्यों कि उसका विचार यह था कि उच्च वर्गों में यदि यूरोपीय शिक्षा दी जाती है तो वह सहज क्रम में नीचे के वर्गों तक पहुंचेगी
प्रजा से प्राप्त पूरी की पूरी निधि सरकार द्वारा स्थापित और संचालित विद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए खर्च की जाती थी
देशी विद्यालयों के लिए एक पैसा भी खर्च नहीं किया जाता था , इतना ही नहीं तो इन विद्यालयों के पास जो बिना किराये की भूमि थी वह भी सरकार ने वापस ले ली
सर शंकरन नायर अपने प्रखर 'असहमति का स्वर' में लिखते हैं , 'उच्च शिक्षा , और उच्च शिक्षा की ओर ले जानेवाली माध्यमिक शिक्षा केवल उच्चभ्रू वर्ग के बालकों को ही प्राप्त हो सके ऐसा करने का ही सरकार का प्रयास था . . . शिक्षा का प्रसार आम समाज में , और विशेष रूप से गरीबों में न हो इस हेतु से नियम परिपत्रित किये गये थे
क्यों कि 'वे सरकार के लिये मुसीबत खड़ी नहीं करेंगे
उच्च शिक्षा , व्यावसायिक शिक्षा , औद्योगिक शिक्षा और तन्त्रशिक्षा भारत के लोगों के लिये इसलिये दुर्लभ बनाई गई है कि इंग्लैण्ड के उद्यो और इंग्लैण्ड के अंग्रेज अधिकारियों की अनुकूलता बढे
पंजाब में महाराजा रणजितसिंह के शिक्षा को बढावा देने के विशेष प्रयासों के कारण देशी शिक्षा की स्थिति अच्छी थी
ओरिएण्टल कॉलेज और सरकारी कॉलेज , लाहौर के प्रिन्सिपाल डा . लिटनर ( कुछ समय वे शिक्षा विभाग के निदेशक भी थे ) ने पंजाब की देशी शिक्षा की स्थिति के विषय में विस्तृत सर्वेक्षण करवाया था
यहां पुरोहित एक अध्यापक भी था , कवि भी था और शिक्षा एक धार्मिक , सामाजिक एवं व्यावसायिक कर्तव्य था
'भारत के प्रत्येक गांवमें , जहां उसका अपना कुछ भी बचा था . . . वहां प्रारम्भिक शिक्षा अवश्य दी जाती थी
निष्कासितों ( जो किसी भी जाति का हिस्सा नहीं थे ) को छोड वहां एक भी बालक ऐसा नहीं था जो लिखना , पढना और गिनना न जानता हो , बल्कि गिनने में तो वे अत्यन्त माहिर थे
 ( लुडलो द्वारा लिखित 'ब्रिटिश इण्डिया' से ) डा . लिटनर का अनुमान था कि १८३४ -३५ में पंजाब में ३० हजार विद्यालय थे , और यदि एक विद्यालय में कम से कम १३ छात्र पढते थे यह माना जाए तो कुल छात्र संख्या ४ लाख जितनी होगी
डा . लिटनर लिखते हैं , 'ग्राम विद्यालयों में तीन लाख छात्र संख्या होगी , परन्तु इससे अधिक का अनुमान भी किया जा सकता है
होशियारपुर जैसे पिछड़े जिले में भी १८५२ के 'सेटलमेंट रिपोर्ट के अनुसार १९६५ पुरुषों की जनसंख्या पर एक विद्यालय था , जब कि आज ९ , ०२८ जनसंख्या पर एक सरकारी अथवा सरकारी अनुदान युक्त विद्यालय है और २ , ८१८ . ७ की जनसंख्या पर एक विद्यालय है जिस में पूरे प्रदेश के देशी विद्यालयों का भी समावेश होता है
होशियारपुर जैसे पिछड़े जिले में भी १८५२ के 'सेटलमेंट रिपोर्ट के अनुसार १९६५ पुरुषों की जनसंख्या पर एक विद्यालय था , जब कि आज ९ , ०२८ जनसंख्या पर एक सरकारी अथवा सरकारी अनुदान युक्त विद्यालय है और २ , ८१८ . ७ की जनसंख्या पर एक विद्यालय है जिस में पूरे प्रदेश के देशी विद्यालयों का भी समावेश होता है
इस वृत्तान्त पर एक दृष्टिपात करते ही समझ में आता है कि देशी शिक्षा का कितना ह्रास हुआ है और सन् १८८२ से १९१८-१९ तक कैसा ठहराव आ गया है
इन ३७ वर्षों में सरकार ने जनसमाज की शिक्षा के लिये कुछ नहीं किया है
बस , स्थानान्तरण अधिक से अधिक हुआ है
'यंग इण्डिया' में २९ डिसम्बर १९२० को प्रकाशित लेख की प्रतिलिपि पंजाब में शिक्षा का नाश कैसे हुआ १८४९-१८८६ अंग्रेजों के सीधे आधिपत्य में जानेवाला अंतिम प्रान्त था पंजाब
दो सौ वर्षो में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कन्याकुमारी से यमुना तक अपना प्रभाव ( शासन ) जमाया था , परन्तु उसके प्रशासकों ने मोगल दरबार को लांघकर उत्तर में आगे जाने का विचार वहीं किया था
औरंगझेब के वंशजों ने जब इस प्रान्त में उथलपुथल शुरू की तब उत्तर से आक्रमणकारियों ने और प्रदेश में आन्तरिक उपद्रवियों ने पूरे प्रदेश को अनवस्था और अराजक की स्थिति में डाल दिया
इस स्थिति में सिखों को अपना महत्त्व और अपना व्यक्तिगत वैशिष्टय समझ में आने लगा
उसके बाद सन् १८४९ तक सिखों ने व्यास नदी के तटों को राजकीय और सैनिकी हमलों से बचा कर रखा
अपना बेढब शासन भी उन्हें पराये सुव्यवस्थित शासन से अधिक प्रिय था क्यों कि पराये शासन में उनकी स्वतंत्रता और धर्म पर संकट आता था
ग्रामीण शिक्षा ग्रामीण प्रशासन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी
पंजाब के प्रत्येक गांव में किसी न किसी प्रकार का विद्यालय था और उसमें एक एक बालक को व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकताओं को पूर्ण करनेवाली प्रारम्भिक शिक्षा या तो नि:शुल्क या अत्यन्त अल्प मासिक शुल्क पर दी जाती थी
इन विद्यालयों के साथ साथ वहां विभिन्न प्रकार के और विभिन्न स्तर के कॉलेज भी थे जहां ज्ञान के प्राचीन आदर्श सुरक्षित रूप से जीवन्त थे
अध्यात्मविद्या , खगोलशास्त्र , गणित , व्याकरण , तत्त्वज्ञान और अन्य विज्ञानों की प्रगत शिक्षा के केन्द्र भी थे
प्रौढ आयु और बुद्धिवाले छात्रों को जहां एरेबिक और संस्कृत में शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी ऐसे महाविद्यालयों से लेकर प्राथमिक महाजनी , शराफी और लाण्डे विद्यालयों तक विविध प्रकार की , विविध स्तर की , शास्त्रीय और तान्त्रिक शिक्षा दी जाती थी
शिक्षकों को हमेशा प्रत्येक छात्र की और जीवन में वे जो व्यवसाय करनेवाले हैं उन व्यवसायों की आवश्यकताओं का ध्यान रहता था
संस्कृत के पाठ और विद्यालय पूरा होने के समय समूह में किया जानेवाला पुनरावर्तन सामूहिकता का वातावरण निर्माण करते थे , जब कि एक छात्र को व्यक्तिगत शिक्षा और वह जो पढता था उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और अपनी जिम्मेदारी पर पढने की व्यवस्था से उसे चिन्तन और स्वाध्याय की प्रेरणा मिलती थी
छात्र जब बडा होता था तब वह दर्शन पढने के लिये एक गुरु के पास जाता था तो विधि ( कानून ) पढने के लिये दूसरे
यह वैसा ही था जैसे जर्मनी में छात्र आन्तरराष्ट्रीय कानून पढ़ने के लिये हाइडलबर्ग जाता है और रोमन कानून पढ़ने के लिये बर्लिन
यह वैसा ही था जैसे जर्मनी में छात्र आन्तरराष्ट्रीय कानून पढ़ने के लिये हाइडलबर्ग जाता है और रोमन कानून पढ़ने के लिये बर्लिन
सन् १८४८ में पंजाब का शासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथ में गया
पंजाब के प्रथम प्रशासन बोर्ड ने शिक्षा की इस समृद्ध परंपरा , जो उन्हें ह्रासग्रस्त और बिखरे हुए सिख संविधान से प्राप्त हुई थी , उसे मान्यता दी
देशी शिक्षा के प्रसार और उसकी परम्परा को जीवित रखने की आवश्यकता की और ध्यान देते हुए सर ज्होन और सर हेनरी लॉरेन्सने अपनी प्रथम शिक्षा नीति का निरूपण इन शब्दों में किया - 'हम हर ग्रामसमूहमें , और सम्भव हुआ तो हर गांव में विद्यालय की स्थापना करना चाहते हैं जिससे पूरे प्रदेश में हर बच्चे को किसी न किसी रूप में प्रारम्भिक शिक्षा मिले
देशी शिक्षा के प्रसार और उसकी परम्परा को जीवित रखने की आवश्यकता की और ध्यान देते हुए सर ज्होन और सर हेनरी लॉरेन्सने अपनी प्रथम शिक्षा नीति का निरूपण इन शब्दों में किया - 'हम हर ग्रामसमूहमें , और सम्भव हुआ तो हर गांव में विद्यालय की स्थापना करना चाहते हैं जिससे पूरे प्रदेश में हर बच्चे को किसी न किसी रूप में प्रारम्भिक शिक्षा मिले
आप का प्रमुख उद्धरण डा . लिटनर का 'पंजाब में देशी शिक्षा का इतिहास है
सत्य तो यह है कि गत दस पन्द्रह वर्षों में ही पंजाब में प्राथमिक शिक्षा का विकास हुआ है
चैथम हाउस में दिये हुए वक्तव्य को वापस लेने का अभी तो मेरा कोई विचार नहीं है
१८२२-२६ में मद्रास प्रेसीडेन्सी ने सर्वेक्षण करवाया था
श्री गांधी के साथे मुलाकात , २ दिसम्बर १९३१ २० अक्टूबर १९३१ को लन्दन के चैथम हाऊस में इण्टरनेशनल अफेअर्स में श्री गांधीने कहा था कि विगत ५० से १०० वर्षों में भारत में शिक्षा की बहुत अवनति हुई है
उन्होंने मुझे कहा कि वे मानते थे कि वे पूर्ण स्वस्थ हैं परन्तु उस समय वे बोझ का अनुभव कर रहे थे
मैंने कहा कि वे इतने थके हुए थे कि चर्चा नहीं कर पायेंगे , परन्तु उन्होंने कहा कि उन्हें मुझे मिलकर खुशी हुई है
उन्होंने तत्काल स्वीकार किया कि उनके कथन की पुष्टि के लिये उनके पास कुछ नहीं था
वहां लिटनर ने लिखा था कि पंजाब मध्य प्रान्त और बंगाल से जनसंख्या के अनुपात में छात्रों की संख्या के विषय में पीछे नहीं था
होवेल ने अपनी पुस्तक "एज्युकेशन इन ब्रिटिश इण्डिया'में कहा है कि विद्यालय जाने वाले बच्चों को इतनी छोटी आयु में विद्यालय से उठा लिया जाता है कि उसके आधार पर किसी निष्कर्ष पर आना निरर्थक होगा
होवेल ने अपनी पुस्तक "एज्युकेशन इन ब्रिटिश इण्डिया'में कहा है कि विद्यालय जाने वाले बच्चों को इतनी छोटी आयु में विद्यालय से उठा लिया जाता है कि उसके आधार पर किसी निष्कर्ष पर आना निरर्थक होगा
मैंने यह भी कहा कि १९१७ से १९२७ के दशक में बंगाल में विद्यालय जानेवाले बच्चों की संख्या बढकर ३ , ०० , ००० हो गई थी ( सही अंक तो ३ , ७० , ००० है ) परन्तु कक्षा ४ में पहुंचते ३० , ००० जितनी संख्या कम हो गई थी
मैंने श्री गांधी को १८३५-३८ के विलियम एडम के 'रिपोर्ट ऑन वर्नाक्युलर एज्यूकेशन' के आंकडे भी बताये और १९२१ के जनगणना के आंकडों के साथ उनकी तुलना करके दिखाई ( खण्ड ५ , पू . ३०२ ) 
मुलाकात के अन्तिम चरण में मैंने कहा कि अब वे शान्ति चाहेंगे
वे बहुत अच्छी तरह जानते थे कि किससे परामर्श प्राप्त करना चाहिये , और उसी से परामर्श लेते भी थे
' मैंने इस राजकीय चर्चा को आगे बढ़ाना या ब्रिटिश जब भारत में आये तब राजकीय क्षेत्र में कितनी अराजकता थी उसकी ओर ध्यान आकर्षित करना उचित नहीं समझा क्योंकि मेरा मुख्य उद्देश श्री गांधी से चैथम हाऊस का अपना वक्तव्य वापस लिवाना था
हमारे वार्तालाप के दौरान श्री देसाई करके एक ऊँचे युवा उपस्थित थे परन्तु मैं उनका नाम नहीं जानता
उनसे मेरा परिचय करवाया गया परन्तु वे पूरा समय पीछे की ओर बैठी रहीं
हमारे वार्तालाप के दौरान श्री देसाई करके एक ऊँचे युवा उपस्थित थे परन्तु मैं उनका नाम नहीं जानता
ऐसा लगा कि श्री गांधी ने श्री देसाई को ब्रिटिश म्यूझीयम से कुछ जानकारी प्राप्त करने के लिये कहा था परन्तु उन्हें चाहिये थीं वे पुस्तकें प्राप्त नहीं हुई थीं और श्री गांधी के कथन के समर्थन में कुछ कहने के लिये उनके पास कुछ नहीं था
श्री देसाई मेरे साथ नीचे तक आये और ब्रिटिश म्यूझीयम की एक १८५९ की , एक १८६७-८ की और एक विल्मोट को 'द इण्डिजीनस सिस्टम ऑव एज्यूकेशन इन इण्डिया' पुस्तक की चिट बताई
मैंने कहा कि संभवत: इसलिये उन्होंने उसे नष्ट होने दिया कि वह इतनी खराब हो गई थी कि उसको बचाए रखने का कोई अर्थ नहीं था
मैंने पंजाब में अपनाई गई पद्धति का वर्णन किया और श्री गांधी ने कहा कि पंजाब में हाल ही में हुई प्रगति के विषय में उन्होंने सुना है
मैंने कहा कि मुंबई में डा . परांजपे द्वारा निर्मित पद्धति से बहुत सक्षम प्रयोग हो रहा है परन्तु उसके उनके अनुगामी ने स्थानीय संचालन के तहत स्थानांतरण कर देने के कारण वह प्रयोग विफल हो गया क्योंकि बहुत सारे जिला वॉर्ड शिक्षा में नहीं परन्तु राजनीति में रुचि रखते थे , शिक्षा के विषय में तो कुछ जानते ही नहीं थे
श्री गांधीने मुझे पूछा कि बच्चे यदि मिडल स्कूल में नहीं जाते हैं तब भी प्राथमिक शिक्षा की कोई उपयोगिता रहेगी क्या
मैंने कहा कि वह अगला चरण होगा और मैं स्थानीय मिडल स्कूल की योजना को प्रोत्साहन देना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ , केवल छात्रों के लिये ही नहीं तो इसलिये भी कि उसीसे शिक्षक भी तैयार होते हैं
मैंने अपनी कमिटि का अभिप्राय बताया कि बालिकाओं की शिक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहिये
आपने मुम्बई और बंगाल के विद्यालयों के आंकडे दिये हैं
१९१७-१९२७ के दस वर्षों में बंगाल में छात्रसंख्या बढकर ३ , ७० , ००० हुई है , परन्तु चौथी कक्षा में , जहां साक्षरता स्थिर होती है , ३० , ००० संख्या कम हो गई
१९१७-१९२७ के दस वर्षों में बंगाल में छात्रसंख्या बढकर ३ , ७० , ००० हुई है , परन्तु चौथी कक्षा में , जहां साक्षरता स्थिर होती है , ३० , ००० संख्या कम हो गई
' एडम के १८३५ में बंगाल में १ , ०० , ००० विद्यालय होने के अनुमान का उल्लेख करते हुए होवेल पू ७ पर मद्रास और बंगाल के लिये भी इसी प्रकार का अनुमान करता है और कहता है , 'यद्यपि सारे अधिकारी इस बात पर सहमत हैं कि इन विद्यालयों की अवस्थिति ही शिक्षा की चाह का संकेत है , वे इस बात पर भी एक थे कि उसमें जो पढाया जाता था वह बिलकुल बेकार था क्यों कि इन विद्यालयों में सक्षम शिक्षक नहीं थे , उनके पास पुस्तकें या अन्य सामग्री नहीं थी और बहुत छोटी आयु में बच्चे विद्यालय छोड देते थे
' एडम के १८३५ में बंगाल में १ , ०० , ००० विद्यालय होने के अनुमान का उल्लेख करते हुए होवेल पू ७ पर मद्रास और बंगाल के लिये भी इसी प्रकार का अनुमान करता है और कहता है , 'यद्यपि सारे अधिकारी इस बात पर सहमत हैं कि इन विद्यालयों की अवस्थिति ही शिक्षा की चाह का संकेत है , वे इस बात पर भी एक थे कि उसमें जो पढाया जाता था वह बिलकुल बेकार था क्यों कि इन विद्यालयों में सक्षम शिक्षक नहीं थे , उनके पास पुस्तकें या अन्य सामग्री नहीं थी और बहुत छोटी आयु में बच्चे विद्यालय छोड देते थे
' एडम के १८३५ में बंगाल में १ , ०० , ००० विद्यालय होने के अनुमान का उल्लेख करते हुए होवेल पू ७ पर मद्रास और बंगाल के लिये भी इसी प्रकार का अनुमान करता है और कहता है , 'यद्यपि सारे अधिकारी इस बात पर सहमत हैं कि इन विद्यालयों की अवस्थिति ही शिक्षा की चाह का संकेत है , वे इस बात पर भी एक थे कि उसमें जो पढाया जाता था वह बिलकुल बेकार था क्यों कि इन विद्यालयों में सक्षम शिक्षक नहीं थे , उनके पास पुस्तकें या अन्य सामग्री नहीं थी और बहुत छोटी आयु में बच्चे विद्यालय छोड देते थे
एडम साक्षरता के जो आंकडे देता है उसका विस्तृत विश्लेषण होना आवश्यक है
स्कार टॉप बोर्स हिल , ओक्सफर्ड ५ दिसम्बर १९३९ प्रिय सर फिलिप हार्टोग किस विषय पर हमारा विवाद चल रहा है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है
स्कार टॉप बोर्स हिल , ओक्सफर्ड ५ दिसम्बर १९३९ प्रिय सर फिलिप हार्टोग किस विषय पर हमारा विवाद चल रहा है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है
स्कार टॉप बोर्स हिल , ओक्सफर्ड ५ दिसम्बर १९३९ प्रिय सर फिलिप हार्टोग किस विषय पर हमारा विवाद चल रहा है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है
डेईली मेल , डेईली एक्सप्रैस और कुख्यात सण्डे पेपर ही केवल पढ़े जाते हैं
मुझे लगता है कि सबसे लोकप्रिय पत्र है 'कम्पीटीशन्स' , जो पाठकों के बहुत बड़े वर्ग को शब्दचौकोर भरना सिखाता है
मुझे लगता है कि सबसे लोकप्रिय पत्र है 'कम्पीटीशन्स' , जो पाठकों के बहुत बड़े वर्ग को शब्दचौकोर भरना सिखाता है
यदि यह सत्य नहीं है तो बंगाल के बाजारों में भयंकर चित्रोंवाले परन्तु सस्ते रामप्रसाद , चंडीदास , कृतिवास रामायण कैसे बिकते हैं ? ( दिनेश सेन के अनुसार युद्ध से पूर्व प्रति वर्ष उसकी दो लाख प्रतियां बिकती थीं | ) यही नहीं तो केवल दो विभागों में ही गाये जाने वाले भादों गीत भी बिकते हैं
शरत चैटरजी मुझे कहते थे कि १९२१ में उनके उपन्यास के बारह आनेवाले संस्करण से उन्हें बारह हजार रुपए रॉयल्टी के रूप में प्राप्त हुए थे , जिसका अर्थ है कि उसकी दो लाख प्रतियों की बिक्री हुई थी
कार्यकारी लैफ्टेनन्ट गवर्नर अत्यंत अकार्यक्षम और ढ़ीला था और शिक्षा निदेशक कुचलकर महा आलसी था
कार्यकारी लैफ्टेनन्ट गवर्नर अत्यंत अकार्यक्षम और ढ़ीला था और शिक्षा निदेशक कुचलकर महा आलसी था
हमें गांवों तक मिडल वर्नाक्यूलर विद्यालय ले जाने के लिए आग्रहपूर्वक कहा जाता था
ऑक्सफर्ड में तो पूर्व आई . सी . एस ( इण्डियन सिविल सर्विस ) की भीड हो गई है
इसलिये मैंने उनसे पूछा था कि 'गत पचास वर्षों में भारत में शिक्षा का ह्रास हुआ है ' यह जो आप कहते हैं उसके लिये कोई प्रमाण देंगे ? उन्होंने कहा , 'पंजाब एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट और 'यंग इण्डिया' में प्रकाशित लेख उनके प्रमाण हैं
मेरे आंकडों को कोई गलत सिद्ध करेगा इसका मुझे लेशमात्र भय नहीं है
मेरे आंकडों को कोई गलत सिद्ध करेगा इसका मुझे लेशमात्र भय नहीं है
अभी स्थिति यह है कि श्री गांधी उनके वक्तव्य की सत्यता सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दे सके हैं
श्री मुनशी बॉम्बे युनिवर्सिटी सेनेट के सदस्य हैं
मैंने श्री मुनशी को आपके साथ सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए कहा था
मैं आपको सत्य का खोजी मानता हूं इसलिये या तो मेरे वक्तव्य की सत्यता के प्रमाण देकर और नहीं तो मेरा वक्तव्य वापस लेकर और उसे प्रसिद्धि देकर आपको सन्तुष्ट करने के लिये उत्सुक हूं
अभी स्थिति यह है कि श्री गांधी उनके वक्तव्य की सत्यता सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दे सके हैं
मेरे पास आपका निजी पता नहीं है इसलिये यह पत्र मैं इण्डिया ऑफिस के पते पर भेज रहा हूं
महात्माजी ने 'यंग इण्डिया' के दो लेख आपको भेजे थे , परन्तु आपको वह पर्याप्त नहीं लगता है
महान अकबर के मंत्री के अथक प्रयासों से उनके शासन में भारत का जो हिस्सा था उसकी ऐसी 'सूची' बनाई गई थी जिसे 'आईने अकबरी' नाम से जाना जाता है
जिन प्रदेशों में ब्रिटिश शासन लागू हुआ उस समय प्रारम्भ में ही कुछ जांच की गईं
क्या मैं उसका सन्दर्भ दे सकता हूं ? कीर हार्डी के भारत विषयक ग्रन्थ में जिनका उल्लेख है ऐसे दो महानुभाव , मैक्समूलर और इतिहासकार लुडलो का प्रमाण के रूप में उल्लेख करना चाहूंगा
क्या मैं उसका सन्दर्भ दे सकता हूं ? कीर हार्डी के भारत विषयक ग्रन्थ में जिनका उल्लेख है ऐसे दो महानुभाव , मैक्समूलर और इतिहासकार लुडलो का प्रमाण के रूप में उल्लेख करना चाहूंगा
' ( बासु , एज्यूकेशन इन इण्डिया अण्डर द ईस्ट इण्डिया कम्पनी , पू . १८ ) सन् १८१८ में पेश्वाओं का पतन हुआ और मुम्बई ब्रिटिश आधिपत्य में गया
जिन प्रदेशों में ब्रिटिश शासन लागू हुआ उस समय प्रारम्भ में ही कुछ जांच की गईं
जिन प्रदेशों में ब्रिटिश शासन लागू हुआ उस समय प्रारम्भ में ही कुछ जांच की गईं
जिन प्रदेशों में ब्रिटिश शासन लागू हुआ उस समय प्रारम्भ में ही कुछ जांच की गईं
"विद्यार्थियों की संख्या कम से कम गणनानुसार ३ , ३० , ००० थी जो आज १ , १९० , ००० रह गई है
इन विद्यार्थियों को शाला में लिखना , पढना और गणना सिखाया जाता था
अरबी और संस्कृत महाविद्यालयों में हजारों विद्यार्थी थे , जहाँ पौर्वात्य साहित्य , कानून , तर्कशास्त्र , दर्शन , फारसी वैद्यक आदि विषय पढ़ाये जाते थे और उनका स्तर काफी ऊँचा था
वह एक ६५० फोलिओ पृष्ठों का अभिलेख है
कमिटि की रिपोर्ट के लिये इण्डियन एज्यूकेशन कमिटि के अध्यक्ष डॉ . सर विलियम हण्टर ने विशेष वृत्त तैयार किया है
परन्तु सरकारी शिक्षाविभाग ने जो आंकडा दिया है वह सही आंकडे से ८० , ००० कम है
१० मार्च १८२६ के ( कॉमन्स रिपोर्ट , १८३२ , पू . ५०६ ) वृत्त में सर टॉमस मनरो दर्ज करते हैं कि जनसंख्या का पुरुषों का ही हिस्सा और ५ से १० वर्ष की आयु के बच्चों को ही गणना में लिया जाए , तो ( कुल जनसंख्या का एक नवमांश हिस्सा ) विद्यालय में पढनेवाले बच्चों की संख्या ७ , १३ , ००० थी
मान्य विद्यालयों की वास्तविक छात्रसंख्या १ , ८४ , १७० थी जो विद्यालय जानेवाली कुल छात्रसंख्या की एक चौथाई से कुछ अधिक बैठती थी
सर टॉमस मनरो का अभिप्राय था कि सही अनुपात एक तृतीयांश होगा क्यों कि एक बहुत बडा हिस्सा घरों में निजी तौर पर शिक्षा प्राप्त करता था जिसे गिनती में समाविष्ट नहीं किया गया था
बंगाल में ( एडम का रिपोर्ट , १९३८ ) ५ से १४ वर्ष आयु के बच्चों की संख्या ८७ , ६२९ थी
१० मार्च १८२६ के ( कॉमन्स रिपोर्ट , १८३२ , पू . ५०६ ) वृत्त में सर टॉमस मनरो दर्ज करते हैं कि जनसंख्या का पुरुषों का ही हिस्सा और ५ से १० वर्ष की आयु के बच्चों को ही गणना में लिया जाए , तो ( कुल जनसंख्या का एक नवमांश हिस्सा ) विद्यालय में पढनेवाले बच्चों की संख्या ७ , १३ , ००० थी
सन् १८२६ में मुंबई प्रेसीडेन्सी में कुल जनसंख्या ४६ , ८९ , ७३५ दर्ज हुई थी
विद्यालयों की कुल छात्रसंख्या ३५ , १५३ थी
१९२१ में और १०० वर्ष पूर्व के विद्यालय जाने योग्य जनसंख्या के प्रतिशत १०० वर्ष पूर्व १९२१ मद्रास ४२ . ५ ३३ मुम्बई ४५ . १ १४ ( कुछ हिस्सों में अधिक २८ ) कोलकता ३७ . २ १६ ( '' "" ३२ ) मैंने पहले ही कहा है कि इतने समय पूर्व के आंकडे विश्वसनीय नहीं होते हैं क्योंकि ( १ ) निजी तौर पर पढनेवाले छात्रों की संख्या उपलब्ध नहीं है , ( २ ) लोगों को जो अन्यायपूर्ण लगता था ऐसा कुछ भी उद्घाटित करना उन्हें ठीक नहीं लगता था; ( ३ ) इस प्रकार की जानकारी एकत्रित करनेवाले लोग बहुत बुद्धिमान या क्षमतावान नहीं थे; ( ४ ) जनसंख्या का एक बडा हिस्सा इस गिनती से बाहर ही रखा गया था इसलिये केवल प्रतिशत कोई उपयोग के नहीं हैं
इस प्रकार की डॉ . लिटनर द्वारा प्राप्त की गई जानकारी अधिक विश्वसनीय है , और इस क्षेत्र में कार्यरत अधिकारियों की धारणा भी ऐसी ही है
उनको लिखे पत्र की प्रतिलिपि और जनवरी १४ के 'इण्टरनेशनल अफेअर्स' ( रॉयल इन्स्टीटयूट ऑव इण्टरनेशनल अफेअर्स का जर्नल ) के जनवरी के अंक में प्रकाशित मेरे लेख की प्रति भी आपको भेज रहा हूं
आप जब ये अभिलेख पढेंगे तब आपके ध्यान में आयेगा कि आप के पत्र में मैंने महात्मा गांधी को पूछे हुए प्रश्न के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं है
अभी अभी मैं जिसका अध्यक्ष था वह इण्डियन स्टेच्यूटरी कमिशन ( भारतीय विधि आयोग ) ने निर्देश दिया है कि १९१७ से १७२७ के दस वर्षों में बंगाल में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में ११ , ००० की वृद्धि हुई थी और छात्रसंख्या ३ , ७० , ००० जितनी बढी थी , जब कि चौथी कक्षा में वह ३० , ००० जितनी कम हुई थी
२० मार्च १९३९ प्रिय श्री गांधी , आपको स्मरण होगा कि सात से भी अधिक वर्ष पूर्व आप जब इंग्लैण्ड में गोल मेज परिषद के लिये आये थे तब भारत की शिक्षा की स्थिति के विषय में हमारी मैत्रीपूर्ण चर्चा हुई थी
चर्चा का कारण यह था कि आपने रोयल इन्स्टीट्यूट की सभा में कहा था कि गत ५० या १०० वर्षों में भारत में शिक्षा का ह्रास हुआ था
आपको यह भी स्मरण होगा कि दिसम्बर १९३९ में आपके नाईट्सब्रिज के निवासस्थान पर मैंने आपकी भेंट की थी
आपने मुझसे वादा किया था कि यदि आपको विश्वास हो जाएगा कि आपके कथन के लिये कोई प्रमाण नहीं है तो आप उसे सार्वजनिक रूप में वापस लेंगे
आपने बाद में यरवडा जेल से भी मुझे इस सम्बन्ध में पत्र लिखा था
महत्मा गांधी आश्रम वर्धा मध्य प्रान्त , भारत पुनश्च : मैं प्रा . के . टी . शाह को भी मेरी पुस्तक की प्रति भेजना चाहता था परन्तु मेरे पास अभी उनका वर्तमान पता नहीं है
आप देखेंगे कि पुस्तक में इन्स्टीट्यूट ऑव् एज्यूकेशन में दिये गये 'पेईन लेक्चर्स' नाम से तीन भाषण हैं
आपको स्मरण होगा कि आपके पत्र के मेरे १० मार्च १९३२ के उत्तर में मैंने लिखा था कि आपके पत्र में आपने विगत पचास वर्ष के प्रश्न को स्पर्श नहीं किया था , इसलिये मैं आपके बंगाल की शिक्षा के गत सौ वर्षों के इतिहास विषयक निष्कर्षों का स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि उसके विषय में तो बहुत कुछ कहना शेष है
मैं कुछ शिक्षाविदों के साथ पत्रव्यवहार कर रहा हूं
गोपनीय सर फिलिप हार्टोग को महात्मा गांधी के पत्र की प्रतिलिपि ( १६ अगस्त १९३९ की डाक की मुहरवाले लिफाफे में भेजी हुई; पत्र में लिखा दिनांक पढा नहीं जाता
१ . उपोद्घात योजना प्रकल्पों के सन्दर्भ में बलवन्तराय समिति के रूप में प्रसिद्ध समिति का वृत्तान्त १९५७ में प्रकट होते ही अत्यधिक उत्तेजना एवं अपेक्षाएँ उत्पन्न हुईं
उस समिति ने राज्य के ग्रामविकास कार्यक्रमों को त्रिस्तरीय अर्थात् गाँव , समुदाय विकास इकाई Community Development Block ) और जिला संवैधानिक संस्थाओ द्वारा कार्यशील बनाने की अभिलाषा की थी और इन संस्थाओं को 'पंचायत राज' नाम दिया था
उस समिति ने राज्य के ग्रामविकास कार्यक्रमों को त्रिस्तरीय अर्थात् गाँव , समुदाय विकास इकाई Community Development Block ) और जिला संवैधानिक संस्थाओ द्वारा कार्यशील बनाने की अभिलाषा की थी और इन संस्थाओं को 'पंचायत राज' नाम दिया था
इन संस्थाओं के द्वारा विकास कार्यक्रमों के संचालन का प्रारम्भ १९५९ में , राजस्थान से हुआ
'द एसोसिएशन ऑव वालन्टरी एजन्सी फॉर रूरल डेवलपमेन्ट' ( AVARD ) , दिल्ली को भी इस कार्यक्रम में गहरी रुचि थी
इस कारण प्रथम राजस्थान और बाद में आन्ध्रप्रदेश में स्थान-अध्ययन आरम्भ हुआ
इस विषय में हुई समग्र चर्चा का , १९६२ में , एवार्ड ने संकलन किया और 'भारतीय राज्य संचालन की आधारशिला पंचायत राज : संविधान सभा की कार्यवाही की गहन समीक्षा' Panchayat Raj as the Basis of Indian Polity" An exploration into the proceedings of the Constituent Assembly} के शीर्षक से उसका प्रकाशन हुआ
इस समीक्षा का सब से पहला विचार मेरे मित्र एल . सी . जैन ने प्रस्तुत किया
एवार्ड' के पूर्व के अध्ययन और 'भारतीय राज्यव्यवस्था की आधारशिला पंचायत राज' के प्रकाशन ने , १९५८ के बाद के पंचायत राज कार्यक्रमों के विषय में गहन अध्ययन करने की प्रेरणा दी
निर्णय हुआ कि अध्ययन को प्रभावी बनाने के लिए अखिल भारतीय पंचायत परिषद ( AIPP ) सर्वाधिक योग्य संस्था है
सभी परामर्शों पर विचार कर १९६३ के अन्त में निश्चित हुआ कि सर्वप्रथम मद्रास अर्थात तमिलनाडु राज्य की पंचायत पद्धति का अध्ययन किया जाए
तमिलनाडु के ग्रामविकास एवं स्थानीय संचालन ( RDLA ) विभाग द्वारा अध्ययन के इस विचार का स्वागत करते हुए सभी प्रकार से सहयोग एवं सहायता प्रदान की गई
१९६५ के उत्तरार्ध में 'मद्रास पंचायत पद्धति' ( The Madras Panchayat System ) लिपिबद्ध हुई और जनवरी १९६६ में उसका अन्तिम प्रारूप तैयार हुआ
उसके अध्याय ५ - 'समस्या [The Problem ) में निर्दिष्ट , १८वीं शती के अन्त और १९वीं शती के प्रारम्भकाल के भारत और उस समय के अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई नीति विषयक सामग्री की जाँच भी तमिलनाडु राज्य अभिलेखागार द्वारा की गई थी ! अगस्त-सितम्बर १९६५ में लेखक को लन्दन जाना पडा , उस समय इन्डिया ऑफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिश लाइब्रेरी , लन्दन में सन् १८०० के सन्दर्भ में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला
उसके अध्याय ५ - 'समस्या [The Problem ) में निर्दिष्ट , १८वीं शती के अन्त और १९वीं शती के प्रारम्भकाल के भारत और उस समय के अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई नीति विषयक सामग्री की जाँच भी तमिलनाडु राज्य अभिलेखागार द्वारा की गई थी ! अगस्त-सितम्बर १९६५ में लेखक को लन्दन जाना पडा , उस समय इन्डिया ऑफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिश लाइब्रेरी , लन्दन में सन् १८०० के सन्दर्भ में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला
बलवन्तराय महेता समिति की अभिशंसाओं के आधार पर १८५८ के पश्चात् गठित हुई पंचायत संस्थाएँ १९६५ के बाद शिथिल बनती गईं
१८वीं शती के अन्त और १९वीं शती के प्रारम्भ की पृष्ठभूमि ( अध्याय पाँच में निर्दिष्ट ) से सम्बन्धित , भारत के अधिकांश हिस्से की सामग्री ब्रिटिश दस्तावेजों में उपलब्ध है
स्वन्तत्र भारत के संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव १३ दिसम्बर १९४६ को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया था
भारत के दूसरे क्रम के पक्ष , मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार किया था
हम सरकारी तंत्र का चाहे कैसा भी गठन करें , वह किसी भी स्थिति में , हमारे लोगों की मानसिकता के साथ सुसंगत और उसे स्वीकार्य होगा
प्रस्ताव के समर्थन में अपने विचार व्यक्त करनेवाले वक्ताओं ने राजनीतिक ढाँचे का और प्रत्येक गाँव के लिए 'स्वराज' की सार्थकता का संक्षेप में वर्णन किया
प्रस्ताव के समर्थन में अपने विचार व्यक्त करनेवाले वक्ताओं ने राजनीतिक ढाँचे का और प्रत्येक गाँव के लिए 'स्वराज' की सार्थकता का संक्षेप में वर्णन किया
' शेष लोग भी ( चर्चा में ) सम्मिलित हों इसलिए कुछ समय के लिए प्रतीक्षा करने के पश्चात् ( लोग सम्मिलित नहीं हुए थे ) , लगभग एक महीने के बाद अन्ततोगत्वा २२ जनवरी १९४७ को संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव पारित किया गया
' शेष लोग भी ( चर्चा में ) सम्मिलित हों इसलिए कुछ समय के लिए प्रतीक्षा करने के पश्चात् ( लोग सम्मिलित नहीं हुए थे ) , लगभग एक महीने के बाद अन्ततोगत्वा २२ जनवरी १९४७ को संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव पारित किया गया
इसके साथ ही , संसदीय विभाग के मंत्री ने २९ अगस्त १९४७ को प्रस्ताव प्रस्तुत कर संविधानसभा के निर्णय का अनुसरण करते हुए उसके , सचिवालय में गठित , संविधान के प्रारूप का अन्वीक्षण और आवश्यक संशोधन करने के लिए एक समिति के गठन का प्रस्ताव रखा
इस प्रारूप ने कई विवाद एवं चर्चाओं को जन्म दिया
उस समय सार्वजनिक रूप में और संविधान सभा में भारी उत्तेजना और रोष उत्पन्न करनेवाला एक विषय , सम्भवत: राजनीतिक ढाँचे के स्थान के सन्दर्भ में था
अप्रैल १९४८ में ही संविधानसभा के अध्यक्ष ने यह विषय संवैधानिक परामर्शक की राय प्राप्त करने के लिए भेजा था
उसके परामर्शक श्री बी . एन . राउ की सहायता से उसने यूरोप , अमेरिका और रूस समेत विभिन्न देशों के संविधान का अध्ययन आरम्भ किया
पाण्डुलिपि के द्वितीय पठन के आरम्भ से , अन्वीक्षण समिति की ओर से वक्तव्य देते हुए नवम्बर १९४८ को श्री टी . टी . कृष्णमाचारी ने कहा था कि , 'इसके साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय जो महत्त्वपूर्ण बात थी कि - संविधान की रचना करने के लिए प्रारूप समिति ने ( 09 007168 ) आवश्यक ध्यान नहीं रखा है - इस सदन को सम्भवत: जानकारी है ही कि आपके द्वारा नियुक्त किये गए सात सदस्यों में से एक ने त्यागपत्र दिया था इसलिए उसके स्थान पर नई नियुक्ति हुई थी
इस कारण से संविधान का प्रारूप तैयार करने का बोज डॉ . आम्बेडकर के सिर पर आ गया
पाण्डुलिपि के द्वितीय पठन के आरम्भ से , अन्वीक्षण समिति की ओर से वक्तव्य देते हुए नवम्बर १९४८ को श्री टी . टी . कृष्णमाचारी ने कहा था कि , 'इसके साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय जो महत्त्वपूर्ण बात थी कि - संविधान की रचना करने के लिए प्रारूप समिति ने ( 09 007168 ) आवश्यक ध्यान नहीं रखा है - इस सदन को सम्भवत: जानकारी है ही कि आपके द्वारा नियुक्त किये गए सात सदस्यों में से एक ने त्यागपत्र दिया था इसलिए उसके स्थान पर नई नियुक्ति हुई थी
एक के बाद एक सदस्यों ने खेद , रोष एव निराशा व्यक्त की
ग्रामीण भारत ( Village India ) के विषय पर अपने आरम्भिक वक्तव्य में प्रारूप के नायक और अन्वीक्षण समिति के अध्यक्ष , डॉ . आम्बेडकर द्वारा किये गये विधान के कारण ऐसा आक्रोश विशेष रूप से व्यक्त हुआ था
कुछ सदस्यों का विचार कम-अधिक मात्रा में डॉ आम्बेडकर से मिलता था
परन्तु , संविधान सभा का समग्र रूप से अभिमत गाँवो को मान्यता प्रदान करने और भारतीय राजनीतिक ढाँचे में उन्हें स्थान देने का पक्षधर था
ये सारी बातें ध्यान देने योग्य , समझकर प्रवृत्त होने के लिए आवश्यक मानते हुए 'एवार्ड' ने कुछ अतीत में झाँकने का प्रयास किया है
केवल 'विकास' के स्थान पर 'स्वराज्य' की यही भावना , जिस पर स्वयं विकास का आधार है ऐसे , भारतीय समाज को एक और अविभाज्य बनाने का और देश को उदासीनता के गर्त से बाहर निकालते हुए लक्ष्यप्रेरित क्रियाकलाप और लोककल्याण की भावना की ओर मोडने का बृहद् कार्य करने में सहायक बनेगी
परन्तु हम व्यक्तिस्वातन्त्र्य और जनतन्त्र का समर्थन करते हैं और हमारे विभिन्न और व्यापक दर्शन सामान्य मानव अधिकारों को बाँटने के सन्दर्भ में कोई एक व्यक्ति या समुदाय अन्यों का शोषण न कर सके या उनके ऊपर आधिपत्य न जमा सके , ऐसे व्यापक रूप से जनता को राजनीतिक और आर्थिक अधिकार प्रदान करने हेतु हम किसी प्रकार से लगभग एकमत हो सकते हैं , इसे सर्वसम्मति से पारित कर सकते हैं , यह दर्शाना चाहता हूँ
लूइ फीशर के 'महात्मा गाँधी के साथ एक सप्ताह ( A week with Gandhi ) से उद्धृत शब्द हैं , 'इस समय सत्ता का केन्द्रबिंदु दिल्ली , कोलकता या मुम्बई अर्थात् बडे नगरों में है
सर्व प्रथम तो जो हमारे बीच नहीं रहे हैं और प्रस्तुत किये गए प्रस्ताव में जिन्हें राष्ट्रपिता कहकर उद्धृत किया गया है उस व्यक्ति का साक्ष्य प्रस्तुत करता हूँ
उनके शब्दों में गाँधी विचारधारा की गूंज सुनाई देती है
'जो स्थिति रूस में दिखाई देती है , उसमें राज्य समाजवाद में विलुप्त होने के स्थान पर उसमें नागरिकों को समूचे जीवन को मुट्ठी में करनेवाला अधिनायकवाद पैदा होने का भय समाया रहता है
उद्योगों का स्वामित्व और व्यवस्थापन का बँटवारा करके एवं गाँवों को ग्रामीण प्रजासत्ताक के रूप में विकसित करते हुए हम यह शिकंजा यथासम्भव अप्रभावी कर अधिनायकवाद के भय को कम कर सकते हैं
जहाँ राज्य लोगों का मालिक होता है वहाँ प्रजा की स्थिति तो सर्वशक्तिमान अधिनायक व्यक्ति या पक्ष के मन में पैदा होनेवाले तरंगी विचारों के हिलोरों पर इधर से उधर हिचकोले लेनेवाले मशीन के रोबोट सी होती है
पंडित जवाहरलाल नेहरू ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) ( चर्चा का उत्तर देते हुए ) 'हम संविधान तैयार करेंगे और मुझे विश्वास है कि हमारा संविधान अच्छा होगा , लेकिन इस सदन का कोई सदस्य क्या ऐसी भी कल्पना कर सकता है कि स्वतन्त्रता के उदय के पश्चात् स्वतन्त्र भारत किसी भी बन्धन को , इस सदन के द्वारा उनके लिए निश्चित की गई है ऐसी किसी भी बात को स्वीकार करेगा ? स्वतन्त्र भारत तो एक समर्थ राष्ट्र की चेतना का विस्फोट देखनेवाला है
मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि सदन इस बात की ओर ध्यान दे कि हम पूर्ण रूप से क्रान्तिकारी परिवर्तन के कगार पर आ खडे हैं क्योंकि किसी राष्ट्र की चेतनाशक्ति का बाँध जब टूटता है तब वह विलक्षण रूप से व्यवहार करता है , और वह ऐसा होना भी चाहिए
मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि सदन इस बात की ओर ध्यान दे कि हम पूर्ण रूप से क्रान्तिकारी परिवर्तन के कगार पर आ खडे हैं क्योंकि किसी राष्ट्र की चेतनाशक्ति का बाँध जब टूटता है तब वह विलक्षण रूप से व्यवहार करता है , और वह ऐसा होना भी चाहिए
बताया गया है कि नये संविधान की रचना पूर्णत: प्राचीन हिन्दू राज्य के उदाहरण पर आधारित होनी चाहिए
मैं निश्चयपूर्वक मानता हूँ कि ग्राम प्रजातन्त्र देश के लिए विनाशकारी है
कूपमण्डूकता , अज्ञान , संकुचित मानस और साम्प्रदायिकता को छोडकर गाँव की दूसरी पहचान क्या है ? मुझे इस बात की खुशी है कि संविधान की पाण्डुलिपि में गाँव शब्द को छोड दिया गया है और व्यक्ति को इकाई माना गया है
' श्री दामोदर स्वरूप शेठ ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) ' . . . इसके साथ साथ हमारे देश में सात लाख गाँव हैं और गाँव सब से छोटी ईकाई है
हम महात्मा गाँधी के आभारी हैं , क्योंकि उन्हीं के कारण स्वतन्त्रता की लडाई गाँवों तक पहुँची और गाँवो में उत्पन्न हुई प्रचण्ड ताकत के कारण भारत स्वतन्त्र हुआ
एक स्वतन्त्र देश का संविधान 'स्थानीय स्वराज्य' की नींव पर निर्मित होना चाहिए
भारत को प्रजासत्ताक संघराज्य अर्थात् जनतन्त्रों का संघ बनना चाहिए
केन्द्रीकरण अच्छी व्यवस्था है और समय समय पर उपयोगी भी सिद्ध होती है , परन्तु हम भूल गये हैं कि महात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में आग्रहपूर्वक कहा है कि सत्ता का अधिक केन्द्रीकरण सत्ता को स्वयं को और अधिक असहिष्णु बनाता है तथा उसे फासिस्ट विचारधारा की ओर धकेलता है
वह है यथा सम्भव सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना
उसे अपेक्षा है कि भारत कुछ नया , कुछ अनोखा करके दिखायेगा
मैं नि:संकोच कह सकता हूँ कि व्यापक मताधिकार के आधार पर , संविधान की रचना प्रक्रिया में , लाखों गाँवों का सहयोग प्राप्त किया होता तो उसका स्वरूप कुछ भिन्न होता
गरीबी हमारे देश की कैसी दुर्दशा कर रही है
लोग खाली पेट और नंगे शरीर से कितना कष्ट भोग रहे हैं
मेरे कहने का उद्देश्य केवल यह है कि यदि संविधान की रचना करने में इस देश के हजारों गांव , निर्धन लोग और मजदूरों का जरा सा भी सहभाग होता तो अभी जो बना है उससे वह ( संविधान ) बहुत ही अलग प्रकार का होता
पण्डित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) वे ( पूर्व वक्ता ) जानना चाहते हैं कि संविधान की रचना करने में देश के हजारों गाँवों एवं स्थानीय स्वराज्य का स्थान क्या है
में विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि यदि सम्पूर्ण संविधान का ध्यान से अध्ययन करने का कष्ट करेंगे तो हम समझ पाएँगे कि संविधान की रचना करते समय आप और हम महात्मा गाँधी की प्रेरक और पावन वाणी को अनसुना नहीं कर रहे हैं
में विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि यदि सम्पूर्ण संविधान का ध्यान से अध्ययन करने का कष्ट करेंगे तो हम समझ पाएँगे कि संविधान की रचना करते समय आप और हम महात्मा गाँधी की प्रेरक और पावन वाणी को अनसुना नहीं कर रहे हैं
वक्तव्य की अधिकृत प्रति नहीं होने के कारण मैं समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार का सहारा लेता हूँ - गाँवों का उन्होंने कूपमण्डूक , अज्ञान का घर , संकुचित मानसवाला और साम्प्रदायिक जैसे शब्दों से परिचय दिया है , इतना ही नहीं ग्रामसमूहों के प्रति हमारी 'दयनीय श्रद्धा' का दायित्व किसी मेटकाफ के सिर पर डाल दिया है
वक्तव्य की अधिकृत प्रति नहीं होने के कारण मैं समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार का सहारा लेता हूँ - गाँवों का उन्होंने कूपमण्डूक , अज्ञान का घर , संकुचित मानसवाला और साम्प्रदायिक जैसे शब्दों से परिचय दिया है , इतना ही नहीं ग्रामसमूहों के प्रति हमारी 'दयनीय श्रद्धा' का दायित्व किसी मेटकाफ के सिर पर डाल दिया है
वक्तव्य की अधिकृत प्रति नहीं होने के कारण मैं समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार का सहारा लेता हूँ - गाँवों का उन्होंने कूपमण्डूक , अज्ञान का घर , संकुचित मानसवाला और साम्प्रदायिक जैसे शब्दों से परिचय दिया है , इतना ही नहीं ग्रामसमूहों के प्रति हमारी 'दयनीय श्रद्धा' का दायित्व किसी मेटकाफ के सिर पर डाल दिया है
मैं स्पष्ट रूप से कहूँगा कि ऐसी स्थिति मेटकाफ के कारण नहीं अपितु अभी अभी देश को स्वतन्त्रता दिलानेवाले एक बहुत महान व्यक्ति - हमारे पथदर्शक और राष्ट्रपिता - के कारण गाँवों के प्रति प्रेम , ग्रामीण प्रजातन्त्र एवं ग्रामसमूहों के प्रति श्रद्धा प्रकट हुई है और हमने इसे हृदय से अपनाया है
वक्तव्य की अधिकृत प्रति नहीं होने के कारण मैं समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार का सहारा लेता हूँ - गाँवों का उन्होंने कूपमण्डूक , अज्ञान का घर , संकुचित मानसवाला और साम्प्रदायिक जैसे शब्दों से परिचय दिया है , इतना ही नहीं ग्रामसमूहों के प्रति हमारी 'दयनीय श्रद्धा' का दायित्व किसी मेटकाफ के सिर पर डाल दिया है
मेरी समझ में नहीं आता कि गाँव एवं ग्रामीण प्रजा के प्रति सहानुभूति , स्नेह और सद्भाव के बिना देश का पुनरुत्थान कैसे हो सकेगा ? महात्मा गाँधी ने अपने श्रेष्ठ समय में पंचायत राज्य के लिए सदा जूझते रहने का अमर मन्त्र हमें दिया
मेरे अपने प्रान्त , संयुक्त प्रान्त एवं बिहार में हमने अभी अभी 'जनपदों' की एक योजना शुरू की है
मैं नहीं जानता कि उन्होंने डॉ . जायस्वाल की पुस्तक 'इन्डियन पोलिटी' ( भारतीय राजनीतितंत्र ) पढी है या नहीं
इन पुस्तकों में हमें जानकारी मिलती है कि प्राचीन भारत में हमारा राज्यतन्त्र किस प्रकार स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर ग्रामसमूहों के आधार पर रचा गया था और उनके कारण ही कैसे हमारी संस्कृति युगों युगों से बनी हुई है
'उत्क्रान्ति की चरमसीमा पर , भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ समय में उच्चस्तरीय कार्यकुशलता से युक्त ग्राम एवं नगरों की स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं की स्थिरता और व्यवस्थित रूप से जोडनेवाली एक प्रशंसनीय राजनीतिक पद्धति के दर्शन होते हैं
लोगों के अधिकार , उनकी मुक्त गतिविधियाँ और सम्बन्धित विभाग की ( राज्य के विभाग ) अंगभूत संस्थाओं का गला घोंटे बिना या उनका अतिक्रमण किए बिना ही राज्य , अपनी प्रशासनिक , न्यायतन्त्र विषयक , आर्थिक एवं सुरक्षा से संबंधित दायित्व निभाता था
हमारा प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास भारत जैसे राष्ट्र के भविष्य के लिए उपयोगी है , ऐसे दृष्टिकोण से मैं सहमत नहीं हूँ
डॉ . आम्बेडकर ने ग्रामीण इकाइयों के विषय में कुछ उल्लेख किया
प्रशासनतन्त्र के भविष्य के आधार स्वरूप ग्राम पंचायतों के विषय में सोचना हमें सिखाया गया है
गाँधीवादी विचारधारा एवं कोंग्रेस का दृष्टिकोण यह रहा है कि भारत का भावि संविधान पिरामिड आकार का होगा और उसकी आधारशिला ग्रामपंचायतें होंगी
डॉ आम्बेडकर के मतानुसार गाँव भारत के लिए विनाशक हैं , अज्ञान का घर हैं
इस समय यदि ऐसा प्रतीत होता है तो इसका कारण हम नगरनिवासी ही हैं , जो विदेशी शासन के प्रभाव में विकसित हुए हैं
मुझे लगता है कि अब के बाद स्वतन्त्र भारत का सबसे प्रथम कार्य गाँवो को पुनर्जीवित करने का होना चाहिए
मैं स्वीकार करता हूँ कि सुदृढ केन्द्र की हमें आवश्यकता है , पर इसका अर्थ यह नहीं है कि उससे अंगोपांग शिथिल हों
मैं स्वीकार करता हूँ कि सुदृढ केन्द्र की हमें आवश्यकता है , पर इसका अर्थ यह नहीं है कि उससे अंगोपांग शिथिल हों
उन्होंने संविधान को प्रादेशिकता के ( राज्य ) आधार पर , कतिपय राजनीतिक घटकों पर आधारित , व्यक्ति को आधारभूत इकाई मानकर तैयार करने का प्रयास किया है
समग्र तन्त्र की नींव वास्तव में तो गाँव होना चाहिए
व्यक्ति समग्र संविधान की आत्मा है , परन्तु उसे कार्यान्वित करने के यन्त्र की नीव गाँव को बनाना चाहिए
व्यक्ति समग्र संविधान की आत्मा है , परन्तु उसे कार्यान्वित करने के यन्त्र की नीव गाँव को बनाना चाहिए
जहाँ तक संविधान की रचना का प्रश्न है , उसके प्रति ध्यान देते हुए , डॉ . आम्बेडकर के प्रति पूरा आदर दर्शाते हुए , मुझे कहना पड रहा है कि स्वतन्त्रता की लडाइ लडनेवालों के साथ वे अपने आपको जोड नहीं पाएँ हैं
जहाँ तक संविधान की रचना का प्रश्न है , उसके प्रति ध्यान देते हुए , डॉ . आम्बेडकर के प्रति पूरा आदर दर्शाते हुए , मुझे कहना पड रहा है कि स्वतन्त्रता की लडाइ लडनेवालों के साथ वे अपने आपको जोड नहीं पाएँ हैं
जहाँ तक संविधान की रचना का प्रश्न है , उसके प्रति ध्यान देते हुए , डॉ . आम्बेडकर के प्रति पूरा आदर दर्शाते हुए , मुझे कहना पड रहा है कि स्वतन्त्रता की लडाइ लडनेवालों के साथ वे अपने आपको जोड नहीं पाएँ हैं
ग्रामपंचायतों की रचना ऐसी होनी चाहिए जो आधुनिक हो , जिसमें शासन करने की , आर्थिक क्षमता बनाने की और विकास करने की सत्ता ग्रामजनों के पास हो
श्री के . सन्तानम ( मद्रास : सामान्य ) . . . डॉ आम्बेडकर ने ग्रामपंचायतों के विषय में अनपेक्षित प्रतिक्रिया दी और वह ( ग्रामपंचायत ) आधुनिक समय के संविधान की भावि भूमिका के लिए उचित नहीं है ऐसा बताया इसका मुझे खेद है
मैं मानता हूँ कि क्रान्तियाँ एवं परिवर्तन होते रहे हैं फिर भी उन्होंने भारतीय जीवन को पुष्ट किया था और वे ( ग्रामपंचायत ) यदि न होतीं तो भारत में अव्यवस्था फैल गई होती
मैं चाहता हूँ कि कुछ मर्यादाओं के साथ भी गाँवों को स्वायत्तता देने के लिए कोई कानूनी प्रावधान जोडा जाए
स्थानीय सत्ताधिकरण देश के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की धुरी नहीं बनती है तो संविधान विचार करने योग्य भी नहीं है
आज स्थानीय सत्ताधिकरण आश्चर्यजनक मात्रा में दयनीय स्थिति का सामना कर रहा है
केन्द्र को अमर्यादित रूप से दृढ बनाया गया है और उनकी ( प्रदेशों की ) सत्ता को छीन लिया गया है , ऐसी शिकायत करनेवाले प्रदेशों ने स्वयं ही सत्ता के मद में , स्थानीय संस्थाओं की सत्ता को हस्तगत कर लिया है और अनुचित संचालन की आड लेकर आज पचास प्रतिशत स्थानीय संस्थाओं को प्रादेशिक सरकारों ने 'सुपरसीङ' किया है
पंडित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . . नि:संदेह , कहा जा सकता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों के लिए किसी धारा का प्रावधान नहीं है
पंडित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . . नि:संदेह , कहा जा सकता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों के लिए किसी धारा का प्रावधान नहीं है
पंडित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . . नि:संदेह , कहा जा सकता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों के लिए किसी धारा का प्रावधान नहीं है
प्रा . शिब्बनलाल सक्सेना ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . डॉ . आम्बेडकर ने इससे पूर्व भारत में प्रचलित और हमारे वरिष्ठों ने संविधान की आधारशिला के रूप में कल्पित ग्रामपंचायत पद्धति की आलोचना की है
वास्तव में उन्होंने ग्रामीण जनतन्त्र को सर्वाधिक महत्त्व दिया था
डॉ आम्बेडकर ने ग्रामपंचायतों के लिए जो दृष्टिकोण प्रकट किया है इससे मैं निश्चित रूप से व्यथा का अनुभव करता हूँ
 . . . मुझे विश्वास है कि इस सदन का विशाल बहुमत ग्रामपंचायतों के विषय में इस ( डॉ आम्बेडकर के ) दृष्टिकोण के साथ सहमत नहीं है
गत वर्षों में गाँवो में कार्यरत और कोंग्रेस की ग्रामपंचायतों के द्वारा किये गये कार्यो का अनुभव रखने के कारण मैं कह सकता हूँ कि हमारे देश ने और विश्व ने जो ज्ञान और प्रकाश प्राप्त किया है उसे यदि ग्रामपंचायतों तक पहुँचाया जाए तो वे देश को एकसूत्रता में बाँधे रखने में और 'रामराज्य' के आदर्श की ओर आगे ले जाने के लिए समर्थ उपकरण बनने की क्षमता रखते हैं . . . मुझे लगता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों की स्थापना के लिए उचित प्रबन्ध होना चाहिए
गत वर्षों में गाँवो में कार्यरत और कोंग्रेस की ग्रामपंचायतों के द्वारा किये गये कार्यो का अनुभव रखने के कारण मैं कह सकता हूँ कि हमारे देश ने और विश्व ने जो ज्ञान और प्रकाश प्राप्त किया है उसे यदि ग्रामपंचायतों तक पहुँचाया जाए तो वे देश को एकसूत्रता में बाँधे रखने में और 'रामराज्य' के आदर्श की ओर आगे ले जाने के लिए समर्थ उपकरण बनने की क्षमता रखते हैं . . . मुझे लगता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों की स्थापना के लिए उचित प्रबन्ध होना चाहिए
मेरा मानना है कि उसका चुनाव व्यापक मताधिकार के आधार पर होना चाहिए और ग्रामपंचायतों को उच्च सदन के चुनाव का अधिकार देना चाहिए
मुझे विश्वास है कि उनके जैसे विचार सदन के किसी सदस्य के मन में नहीं होंगे
मुझे विश्वास है कि उनके जैसे विचार सदन के किसी सदस्य के मन में नहीं होंगे
श्री सारंगधर दास ( उडिसा : देसी रियासतें ) . . . वे गाँवों को कूपमण्डूक . . . अज्ञान का घर , संकुचित मानसवाला और साम्प्रदायिकता से युक्त मानते हैं तब . . . आश्चर्य इस बात का है कि सदन के एक आदरणीय सदस्य और राष्टरीय सरकार के मन्त्री ऐसा बोलते हैं
मुझे कहना चाहिए कि हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के पश्चात् हम गाँवों से सम्पर्क खो बैठे
महात्मा गाँधी ने ही , लगभग तीस वर्ष पूर्व हमारे बुद्धिवादियों को पुन: गाँवों मे जाने का परामर्श दिया था
गत तीस वर्षों से हम गाँवो की धूल छानते रहते हैं और गाँववालों के साथ घुलमिल जाते हैं
 . . . नगरनिवासी गाँव से , ग्रामीण जीवन से कोसों दूर हैं , अत: हम सोचते हैं कि गाँवों मे कुछ भी अच्छा नहीं है
परन्तु मैं निश्चित रूप से मानता हूँ कि कोंग्रेसजनों के मन में गाँवो का विचार मूर्धन्य है इस लिए डॉ . आम्बेडकर को इस विषय में पुनर्विचार करने और गाँवो को अपना अधिकार देने के लिए निवेदन करता हूँ , क्योंकि निकटवर्ती भविष्य में ही गाँव पूर्व में थे , उस प्रकार से आत्मनिर्भर हो जानेवाले हैं
मैं गाँव का निवासी हूँ , किसान के घर में जन्मा और पला हूँ इसलिए स्वाभाविक रूप से ही वह सभ्यता मेरे रोम रोम में उतरी है और यह मुझे प्रिय है
बेगम एजज रसूल ( संयुक्त प्रान्त : मुस्लिम ) . . . ग्राम राज्यव्यवस्था के सन्दर्भ में डॉ आम्बेडकर की बहुत आलोचनाएँ हुई है
ग्रामपंचायतें अत्यन्त निरंकुश या आपखुद हो सकती हैं
इसलिये मुझे भी लगता है कि प्रारूप समिति ने ग्राम पंचायत पद्धति के विषय में मनचाहा कानून बनाने का दायित्व प्रान्तीय विधानसभाओं पर छोडा है
 . . . ग्रामपंचायत पद्धति के लिए अत्यन्त उत्साहयुक्त समर्थकों को चेतावनी के दो शब्द कहने की अनुमति चाहता हूँ
हमारे ग्रामीण लोग जब तक शिक्षित न हों , वे राजनीतिक रूप से सतर्क न बनें और विशेषाधिकारों के प्रति भी जागरूक न हों तब तक ग्रामपंचायत पद्धति लाभ की अपेक्षा हानि अधिक पहुँचाएगी
ग्रामपंचायत पद्धति का अस्तित्व आज से नहीं सदियों से है
ग्रामपंचायत पद्धति का अस्तित्व आज से नहीं सदियों से है
यह सच है कि शोषण के कारण या अन्य कारणों से गाँव ध्वंस के कगार पर खडे हैं
संविधान की रचना करनेवालों का सब से बडा कर्तव्य गाँवों की स्थिति में सुधार हो यह देखना है
गाँव के अधिकारी , मुखिया या पटवारी की नियुक्ति वंश परम्परा के आधार पर होती रहने के कारण ऐसे लोग ही ग्राम प्रशासक बन गये हैं
उच्च स्तर पर , प्रान्तों के प्रशासन के लिए संविधान की रचना करते समय उसमें से गाँवो के पुनर्गठन के विषय की अगर अपेक्षा की जाती हो तो मेरी दृष्टि में उचित नहीं है
मुझे विश्वास है कि यह महान सदन , अपने प्रस्तुत प्रावधानों पर पुन: विचार करेगा और गाँव को या ग्राम समूह को स्वशासित संस्थाओं की कक्षा में रखने के लिए हमारे द्वारा उचित संशोधन हो , इसके प्रति जाग्रत रहेगा
एक मार्ग सत्ता के केन्द्रीकरण का और दूसरा विकेन्द्रीकरण का
परन्तु पाण्डुलिपि में कही भी जनतन्त्र की झलक नहीं दिखाई देती है और विकेन्द्रीकरण तो सर्वथा ही अदृश्य है
एक मार्ग सत्ता के केन्द्रीकरण का और दूसरा विकेन्द्रीकरण का
इसकी घोषणा साहस के साथ , स्पष्ट रूप से की जाती है , तब मैं विनम्रता के साथ अपना विरोध प्रकट करता हूँ
परन्तु मैं विनम्र व्यक्ति हूँ और मुझे किसी प्रकार का विशेष अनुभव भी नहीं है
परन्तु किसी भी रूप में , हम जो सुधार करना चाहते हैं उसके द्वारा , किसी प्रकार से ऐसे प्रबन्ध को समाविष्ट करना चाहिए जिसके अन्तर्गत हमारे राज्यप्रशासन की नींव में जनतन्त्र हो
भारत की भूमि पर जनतन्त्र केवल ऊपरी स्तर पर है , ऐसे उनके दृष्टिकोण का मैं आत्यन्तिक विरोध करता हूँ
हमारे इतिहास के सुदूर अतीत में देखने पर ध्यान में आता है कि हमारे देश की विभिन्न संस्थाओं में जनतन्त्र के सिद्धांत को स्वीकृत किया गया था . . . 
ग्रामपंचायतों की ऐसी सुदृढ आधारशिला तैयार किए बिना जनतन्त्र में लोग अपनी भूमिका निभाने की क्षमता कैसे अर्जित कर पाएँगे ? हम व्यवस्थातन्त्र का केन्द्रीकरण चाहते हैं या विकेन्द्रीकरण ? महात्मा गाँधी निरन्तर तीस वर्ष तक विकेन्द्रीकरण की बात समझाते रहे थे
हमारे आदर्श क्या हैं ? हमने निर्देशों में तथा मूलभूत अधिकारों के प्रकरण में कुछ आदर्श बताये हैं
श्री आर . अनंतशयनम आयंगर ( मद्रास : सामान्य ) . . . ठीक है कि डॉ आम्बेडकर ने संविधान के अनेक पक्षों का विश्लेषण किया है , परन्तु दुर्भाग्य से उन्होंने कुछ विषयों पर दृढता दिखाई और ग्रामस्वराज्य , ग्रामस्वायत्तता एवं जनतन्त्र के विषय पर अपना अभिप्राय प्रस्तुत किया
हमें इस ओर ध्यान करना चाहिए कि गाँव सूत्रबद्ध समाज की अपेक्षित इकाई बने
मेरा मानना है कि गाँव में भी पारिवारिक इकाई की रचना हो , यद्यपि समग्रता में भारतीयता की भावना की दृष्टि से मतदान की इकाई व्यक्ति ही रहना चाहिए
इसी पद्धति से गाँवों का पुनर्गठन होना चाहिए , इस बात को छोड देंगे तो वे किसी समान उद्देश्य से हीन केवल अवसरवादी के रूप में मिलते बिखरते रहेंगे आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थिति की दृष्टि से संगठित होने का अवसर ही प्राप्त न होता हो ऐसे लोगों का अव्यवस्थित समूह बनकर ही रह जाएँगे
हमारे नेता और प्रधानमन्त्री द्वारा परसों जो वक्तव्य दिया गया इससे मैं सहमत हूँ कि आनेवाले पाँच वर्षो के लिऐ इस संविधान को परिवर्तनशील या सीमित समयावधिवाला रखना चाहिए
उन्होंने गाँव को कूपमण्डूक मनोवृत्ति एवं साम्प्रदायिकता का घर बताया , गुलामी के कूपमण्डूक ही स्वतन्त्रता आन्दोलन के कालखण्ड में सभी प्रकार के दमन सहते रहे थे
डॉ . आम्बेडकर को ज्ञात ही नहीं है कि स्वतन्त्रता के आन्दोलन में गाँवों ने कितना बलिदान दिया है ? मेरा प्रस्ताव है कि गाँवों के लोगों को संचालन ( प्रशासन ) में अपना उचित भाग मिलना चाहिए
डॉ . आम्बेडकर को ज्ञात ही नहीं है कि स्वतन्त्रता के आन्दोलन में गाँवों ने कितना बलिदान दिया है ? मेरा प्रस्ताव है कि गाँवों के लोगों को संचालन ( प्रशासन ) में अपना उचित भाग मिलना चाहिए
मैं इतिहास के साथ राजनीतिशास्त्र का भी छात्र हूँ और में पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि , ग्रीस या विश्व के किसी देश की तुलना में भारत में जनतन्त्र का विकास बहुत पहले हुआ है
फिर भी गाँवों मे वह जनतन्त्र ग्राम प्रजासत्तात्मक या ग्रामस्वराज के रूप में कार्यरत होता दिखाई देता है
इन प्रावधानों से मैं समझ पाया हूँ कि उसकी रचना नीचे से नींव से करने के स्थान पर ऊपर से कंगूरे से की जा रही है . . . जिसके लिए हम पिछले तीस वर्षों से पसीना बहार रहे हैं और अन्तिम तीन वर्ष से जूझ रहे हैं ऐसे स्वराज्य हा सही अर्थ लोग समझते हैं
स्वराज्य या गाँववासियों के दृष्टिकोण के आधार पर नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय पक्ष पर बल दिया जा रहा है
मेरा दृढ अभिमत है कि हमारे बृहद परिवार के सदस्यों को अगर अन्न , वस्त्र एवं निवास की सुविधा प्रदान करना चाहते हैं तो ग्रामपंचायतों का अस्तित्व संविधान की रचना की नींव में होना चाहिए
हम अपने प्रदेशों को सुदृढ रखना चाहते हैं या शिथिल , हम सुदृढ केन्द्र चाहते हैं या निर्बल . . . इसके विषय में सोचना पड़ेगा
ऐसा होते हुए भी हमारे देशवासी , हमारे गाँववासी , नगरनिवासी , एवं गरीब प्रजा के लिए हम कुछ करना चाहते हैं इसकी झलक दरशनेवाली कोई बात समग्र संविधान में देखने को नहीं मिलती है
जहाँ तक उत्पादन का प्रश्न है , अधिक से अधिका मात्रा में संपत्ति का निर्माण करने के लिए गाँववासियों को महत्तम काम करने के लिए प्रेरित करनेवाला प्रावधान संविधान में नहीं है
मेरा मत ऐसा है कि संविधान में ही उसकी चुनाव पद्धति का प्रावधान किया जाए , वे बातें स्पष्ट रूप से अंकित की जाएँ
परन्तु मेरा मानना है कि मनुष्य का चरित्र उसके चेहरे से समझ में आता है , इसी प्रकार संविधान लोगों को किस दिशा में ले जाएगा इसे समझने के लिए उसे ऊपर ऊपर से देखना ही पर्याप्त है
इसलिए आशा करता हूँ कि संविधान में किए गए प्रत्येक प्रावधान की , उसकी प्रत्येक धारा की छानबीन करते समय निश्चित रूप से ऐसा प्रयास होगा कि हमने देशवासियों को जो वचन दिया है उसे पूरा करने की व्यवस्था संविधान में की जा सके
परन्तु राष्ट्र की उद्वेगपूर्ण मन:स्थिति के काल में लगभग सब कुछ ही स्थगित हो गया था , सीमित दायरे में बन्द हो गया था और राजनीतिक जीवन भी छिन्नविच्छिन्न हो गया था
जहाँ तक उत्पादन का प्रश्न है , अधिक से अधिका मात्रा में संपत्ति का निर्माण करने के लिए गाँववासियों को महत्तम काम करने के लिए प्रेरित करनेवाला प्रावधान संविधान में नहीं है
पाण्डुलिपि की अनेक वक्ताओं ने इस आधार पर अलोचना की है कि संविधान की रचना में प्राचीन भारत की व्यवस्था के किसी भी तत्त्व का समावेश नहीं किया गया है
यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि ग्रामपंचायत के विषय को लेकर बडा विवाद पैदा हुआ है
तीस वर्षों से भी अधिक समय से मैसूर सरकार ने ग्रामसमूहों को पुनरुज्जीवित करना तथा ग्रामपंचायत के कार्य को राज्य के संचालन में प्रमुख स्थान प्रदान करना शुरू किया है
दीवान से लेकर तहसीलदार तक के सभी सम्बन्धित अधिकारियों ने , अपनी समझ के अनुसार गाँवों के प्रति वैयक्तिक रूप से ध्यान दिया है
यह सच है कि कुछ गाँवों मे तीव्र मतभेद हैं
कुछ गाँव पूरी तरह उदासीन तथा कभी कभी मरणासन्न अवस्था में दीखते हैं
अर्थात ३० प्रतिशत गाँवों में कार्यकर्ता नियमित रूप से मिलते रहते हैं , पंचायत के करों का संग्रह किया गया है , गाँववासियों की स्वैच्छिक सेवाओं के द्वारा गाँव की साप्ताहिक स्वच्छता का कार्य किया है , बच्चों को टीका लगवाने की दिशा में भी उचित कदम उठाए गए हैं
व्यापक रूप से अफसरशाही की प्रशासनिक पकड नहीं है वहाँ कुछ छोटी रियासतों मे मुझे उल्लेखनीय रूप से आत्मनिर्भर ग्रामीण प्रजा के संगठित प्रयास दिखाई दिए हैं
मतपेटिका के रूप में घडे के आकार का एक पात्र नीचे छेद कर जमीन पर रखा जाता था
मतपत्र के रूप में 'कडजन' ( एक प्रकार का वृक्ष ) के पर्ण का उपयोग किया जाता था और वयस्क मताधिकार का चलन था
चुनाव सम्बन्धित गाँव तक सीमित नहीं था , अपितु समग्र भारत में ऐसी प्रक्रिया अस्तित्व में थी
ग्रामपंचायतों को देने योग्य सत्ता , उनका कार्यक्षेत्र आदि बातें प्रत्येक प्रान्त एवं राज्य में भिन्न भिन्न होंगी , इसलिए संविधान में निश्चित निर्देश देना उचित नहीं है
यहाँ प्रस्तुत किये गये संशोधन के लिए सभी प्रस्तावों का सर्वसामान्य विषय यही है कि स्वतन्त्र देश के स्थानीय स्वराज्य का समग्र ढाँचा ग्रामजीवन पर आधारित होना चाहिए , और इसे ही इस संशोधन का प्रमुख आधार बनाया गया है
सदस्य अपने वक्तव्य रख सकते हैं और अपनी बात पूरी कर लेने के पश्चात् प्रत्युत्तर देने का उनके पास अधिकार रहता ही है
किसी सिद्धान्त के उद्देश्यों के साथ सम्बन्धित न होने पर चर्चा सीमित करने के विषय में भी लोग सरकार का पक्ष जानना चाहेंगे
एक सम्माननीय सदस्य प्रो . रंगा इस समय यहाँ उपस्थित नहीं है
उन्हें चर्चा निरर्थक प्रतीत होगी तो वे उसका आग्रह नहीं करेंगे , और इसी कारण से डॉ . आम्बेडकर ने कहा कि वे संशोधन को स्वीकार करते हैं
मा . उपाध्यक्ष यदि ऐसा ही है तो मैं श्री प्रकाशम को पहले निमन्त्रित करता हूँ
श्री विश्वम्भर दयाल त्रिपाठी इस चर्चा के साथ सरकार को क्या लेना देना है ? मा . उपाध्यक्ष संविधान सभा के अध्यक्ष का दिया गया सन्दर्भ है , सरकार का नहीं
श्री टी . प्रकाशम डॉ . राजेन्द्रप्रसाद ने पंचायत राज्य को समग्र संविधान का आधार बनाने के पक्ष में मत प्रकट किया है , और कुछ दिनों से हम उस कार्य को पूरा करने के लिए प्रयासरत हैं
१० मई ( १९४८ ) को डॉ . राजेन्द्रप्रसाद ने इस सन्दर्भ में अपना अभिप्राय प्रस्तुत किया था
संविधान के परामर्शदाता श्री बी . एन . राव ने इस सन्दर्भ में सहानुभूति प्रदर्शित की , परन्तु उन्होंने ध्यान आकर्षित किया कि संविधान का आधार परिवर्तित करने के प्रयास में अधिक विलम्ब हो गया है , क्योंकि हम बहुत आगे निकल गये हैं
ग्रामीण इकाई को संविधान का वास्तविक आधार नहीं बना पाने के परिणाम स्वरूप गम्भीर स्थिति पैदा हुई
ग्रामीण इकाई को संविधान का वास्तविक आधार नहीं बना पाने के परिणाम स्वरूप गम्भीर स्थिति पैदा हुई
इस प्रस्ताव के अनुसार ऐसा मानने की आवश्यकता नहीं है कि सम्बन्धित सरकार के आग्रह से बननेवाली ग्राम प्रजासत्तात्मक रचना जंगल की लकडियाँ काटकर ईंधन के रूप में नगरों में पहुँचाने के लिए और मजदूरी की कमाई करने तक सीमित उपयोग वाली बैलगाडी की रहेगी , अपितु यह बैलगाडी का उपयोग धान एवं गाँवों के अन्य उत्पादनों का स्वयं के लिए और सामान्य जन के लाभार्थ परिवहन करने के लिए भी करेगी
इस समय कश्मीर के मोर्चे पर युद्ध कर रहे हमारे सैनिकों के लिए भी ग्राम प्रजासत्ताकत्मक रचना उपयोगी होगी
हमारे और विश्व के इतिहास से विमुख हो जाने के कारण हम इस बात को घृणा की दृष्टि से देखें यह ठीक नहीं है
मुझे कहने दीजिए कि देश में ऐसे संगठनों की रचना स्थान स्थान पर कर देंगे तो अन्न का अकाल नहीं होगा , वस्त्रों की कमी नहीं होगी और आज हमें प्रतिवर्ष रू . ११० करोड . के अन्न की जो आयात करनी पडती है , ऐसी स्थिति नहीं बनी रहेगी
उचित प्रयास के द्वारा सम्भवत: कुछ लोगों को स्वीकार्य न हो तो भी पूरी आत्मनिर्भरता के स्तर पर उनकी संरचना होगी , उनकी स्वशासित इकाइयाँ रचीं जाएँगी तो , वह मुद्रास्फीति पर भी नियन्त्रण पा सकेगी जिसे सरकार अपेक्षित मात्रा में नियन्त्रित नहीं कर सकी है
हमारे और विश्व के इतिहास से विमुख हो जाने के कारण हम इस बात को घृणा की दृष्टि से देखें यह ठीक नहीं है
हमारे और विश्व के इतिहास से विमुख हो जाने के कारण हम इस बात को घृणा की दृष्टि से देखें यह ठीक नहीं है
हमारा देश प्राचीन , अति प्राचीन देश है और उसमें गाँवों का स्थान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है
हमारा देश प्राचीन , अति प्राचीन देश है और उसमें गाँवों का स्थान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है
प्रत्येक प्राचीन देश में स्थिति ऐसी नहीं थी
एथेन्स एवं स्पार्टा की प्रजासत्तात्मक पद्धति वर्तमान इतिहास में विश्व में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है
हमारे देश में गाँवों को इतना उच्च स्थान मिला था कि हमारे अति प्राचीन ग्रन्थ , उपनिषदों की कथाओं में भी ऋषिमुनियों की कथाओं के समान ही गाँवों का वर्णन भी पाया जाता है
अति प्राचीन समय से भारत में गाँवों की जो महिमा थी उसकी जानकारी उन्हें इन पुस्तकों से प्राप्त होगी
मुस्लिम शासन के काल में भी गाँवों को अग्रिम महत्त्व दिया जाता था
उन्होंने कोंग्रेस के वार्षिक अधिवेशन भी गाँवों में आयोजित किए
यथार्थ भारत की झलक पाने के लिए उन्होंने , विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को , भारत के गाँवों में जाने का सुझाव दिया
आज भी देश की ८० प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है
आदरणीय नेता डॉ . राजेन्द्रप्रसाद एवं महात्मा गाँधी के विचारों का उल्लेख हुआ है
परन्तु हम इस बात से सुपरिचित हैं कि गाँवों का अध:पतन हो गया है , इसलिए यदि स्वराज्य जैसी कोई सुविधा उन्हें प्रदान करनी है तो , इस सार्वभौम संस्था को चाहिए कि इसे गाँवों को ही हस्तान्तरित किया जाए
कुछ दिन पूर्व संविधान के प्रारूप के सम्बन्ध में बोलते हुए मैंने सबका ध्यान आकर्षित किया था कि स्वराज्य का चयन करने के लिए ग्रामीण प्रदेशों को अवसर देनेवाला कोई प्रावधान संविधान में नहीं है
मुझे लगता है शताब्दियों से विनाश की ओर धकेल दिये गये गाँवों के पुनर्गठन की दिशा में , इस संशोधन के माध्यम से हम एक बडा कार्य कर रहे हैं
हम 'पाई' ( पुराने अर्थ चलन की सबसे छोटी इकाई ) की चिन्ता करेंगे तो 'रूपया' अपने आप पुष्ट हो जायेगा
आत्मनिर्भर शब्द का इतना ही अर्थ है कि यथासम्भव सभी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करें और अन्य वस्तुएँ पास के गाँवों से प्राप्त करें
इसलिए श्री भारती के वक्तव्य के पश्चात् समापन प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहता हूँ
इसलिए श्री भारती के वक्तव्य के पश्चात् समापन प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहता हूँ
श्री एल . कृष्णस्वामी भारती ( मद्रास : सामान्य ) माननीय उपाध्यक्षजी , यह संशोधन प्रस्तुत करने के लिए श्री सन्तानम को और उसकी स्वीकृति प्रदान करने के लिए डॉ . आम्बेडकर को धन्यवाद देता हूँ
 ( श्री सन्तानम द्वारा ) यह संशोधन तो केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता देना चाहता है , जिसका कोई अर्थ नहीं है
मार्गदर्शक सिद्धान्त के पीछे जो विचार रखा गया है वह इस बात पर बल देता है कि देश का संचालन किस प्रकार करना चाहते हैं , और इसलिए समग्र विश्व के सामने स्पष्ट कर देना चाहिए कि आर्थिक स्वातन्त्र्य एवं आर्थिक जनतन्त्र महत्त्वपूर्ण है , और इसीलिए आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण अपना महत्त्व रखता है
साथ ही मैं स्वीकार करता हूँ कि इस संशोधन से मुझे पर्याप्त संतोष नहीं है
एक आदरणीय सदस्य ने मुझसे कहा , ''हम क्या कर सकते हैं ? कुछ गाँव केवल चावल उत्पन्न करते हैं , वे स्वायत्त नहीं है
'' क्या यह बात इतनी कठिन है ? गाँधीजी आग्रहपूर्वक कहते थे कि मैं ऐसा नहीं कहता कि गाँव ऐसी सभी बातों में आत्मनिर्भर हो जाए , परन्तु कुछ सीमा तक तो स्वावलम्बी बनना चाहिए
उसमें आधारभूत विचार है , 'काम नहीं तो अन्न नहीं
' अब गाँव के निवासियों को प्रतीत होता है कि स्वराज्य है , हमारा शासन है इसलिए ( यहूदी मान्यता के अनुसार ) 'मेना' की तरह 'खादी' और 'खाद्यान्न' आकाश से टपकेगा
 ( यहूदी लोककथा के अनुसार जंगल में आकाश से खाद्यान्न मिला था , उसे 'मेना' कहा जाता है
गाँवों के लोग इस विचार को अपनायें ऐसा हम चाहते हैं तो हमें इसे लिखना चाहिए और स्वायत्तता के विषय में उन्हें समझाना चाहिए
महात्माजी ने कहा था , "ग्रामस्वराज्य के सन्दर्भ में मेरा विचार यह है कि वह एक पूर्ण प्रजासत्ताक इकाई हो , अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए पडोसियों से स्वतन्त्र हो , परन्तु जहाँ एकदूसरे का सहयोग आवश्यक है ऐसी कई बातों में गाँव परस्परावलम्बी हो
सत्याग्रह के शस्त्र द्वारा अहिंसा एवं असहयोग ग्रामसमाज के लिए नियामक शक्ति का कार्य करेगा
गाँधीजी के विचारों की सामान्य रूप से प्राप्त अनुभूति कुछ ऐसी थी; और इसलिए मेरे मतानुसार इस सर्वोच्च संस्था को चाहिए कि गाँधीजी के इस विचार एवं सिद्धान्त का स्पष्ट निरूपण करे
अगर गाँव जीवित रहता है तभी भारत भी जीवित रहेगा
मुझे अधिक कुछ जोडना नहीं है
उनका विचार था कि विकेन्द्रीकरण होना चाहिए एवं गाँव आर्थिक इकाई बनना चाहिए
शेठ गोविन्ददास ( मध्य प्रान्त एवं वराड : सामान्य ) साथ ही मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि संस्कृति एवं सभ्यता हमारे प्राचीन इतिहास की धरोहर है , जिसकी निरन्तरता एवं जीवनशक्ति हमारे समाज जीवन के प्रत्येक अंग में दिखाई देती है और हमारे वर्तमान युग में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जिसे आगे बढाना चाहते थे उसे ( संस्कृति और सभ्यता को ) हमने नकारना नहीं चाहिए
गाँवों की पूर्ण उपेक्षा कर हम नागरिक बन गये हैं और नागरिकत्व के अधिकार माँगने लगे हैं
गाँवों की पूर्ण उपेक्षा कर हम नागरिक बन गये हैं और नागरिकत्व के अधिकार माँगने लगे हैं
हमने , भारत के विकेन्द्रीकरण का और सब कुछ व्यवस्थित बनने का लक्ष्य रखा था , परन्तु इतना अधिक केन्द्रीकरण हुआ है कि एक ही केन्द्र बना रहे . . . 
संविधान के रचयिताओं ने विकेन्द्रीकरण का मार्ग नहीं अपनाया , परन्तु मुझे भारत की जनता पर विश्वास है
चाहे कैसे भी नियम बनाए जाए , हम चाहे कैसे भी अनुच्छेद ( धाराएँ ) रचें परन्तु मानवीय मानस एवं मानवीय क्षमता जीवन का अधिक महत्त्वपूर्ण कारक होता है
ये उदाहरण बताते है कि हम जिस संविधान को अपना रहे हैं , उसमें जनतत्र का वास्तविक सिद्धान्त कदाचित ही परिपूर्ण कर पाए हैं
उदाहरण के लिये विभिन्न विभाग के पारस्परिक सम्बन्ध और स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं का कार्यक्षेत्र भी मुझे सीमित प्रतीत होता है
मेरे पूर्व एक वक्ता ने यथार्थ ही बताया है की सच्चा स्थानीय स्वराज्य , सही जनतंत्र इन इकाइयों में ही निहित होना चाहिए
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
उन्हें बहुत अधिकार दिया गया है - परन्तु केन्द्र को बलवान बनाया गया है
उन्हें बहुत अधिकार दिया गया है - परन्तु केन्द्र को बलवान बनाया गया है
मुझे प्रसन्नता है कि कई प्रान्तीय सरकारों ने पंचायत कानून बनाए हैं
मुंबई सरकार ने पंचायत कानून की रचना की है , मध्य प्रदेश सरकार ने जनपद कानून बनाया है , संयुक्त प्रान्त सरकार ने गाँव पंचायत कानून और बिहार सरकार ने ग्राम पंचायत राज बनाया है
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
मुझे आशा है कि संविधान जैसा भी हो प्रान्तीय सरकार ने गाँवो को स्वायत्त बनाने के लिए प्रयास करना ही चाहिये
चुनाव परोक्ष रूप से होना चाहिए
श्री एच . वी . कामत ( मध्य प्रांत एवं वराड : सामान्य ) . . . महात्मा गाँधी की इच्छा थी कि भारत विकेन्द्रित जनतंत्र बने
 . . . राज्य के नीतिविषयक मार्गदर्शक सिद्धान्तों में ग्राम पंचायतों का प्रावधान है
डॉ . आम्बेडकर ने आरम्भ में गाँवों को अन्धश्रद्धा एवं अज्ञान के पुंज आदि कहकर तिरस्कृत किया , ऐसा होते हुए भी ग्राम पंचायतों के लिये हितकर प्रावधान हम मार्गदर्शक सिद्धान्तों में कर पाए हैं
 . . . महात्मा गाँधी और सभी धर्माचार्यो एवं ऋषिमुनियों की संकल्पना से युक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें एकमत होना चाहिए ! मैं इस लक्ष्य को 'साधुनाम् राज्यम्' या 'धरा पर का ईश्वरी राज्य' नहीं कहूँगा , मैं तो केवल पंचायत राज्य ही कहूँगा
 . . . महात्मा गाँधी और सभी धर्माचार्यो एवं ऋषिमुनियों की संकल्पना से युक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें एकमत होना चाहिए ! मैं इस लक्ष्य को 'साधुनाम् राज्यम्' या 'धरा पर का ईश्वरी राज्य' नहीं कहूँगा , मैं तो केवल पंचायत राज्य ही कहूँगा
 . . . महात्मा गाँधी और सभी धर्माचार्यो एवं ऋषिमुनियों की संकल्पना से युक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें एकमत होना चाहिए ! मैं इस लक्ष्य को 'साधुनाम् राज्यम्' या 'धरा पर का ईश्वरी राज्य' नहीं कहूँगा , मैं तो केवल पंचायत राज्य ही कहूँगा
श्री टी . प्रकाशम् ( मद्रास : सामान्य ) मेरी अपेक्षा के अनुसार यह हमारे देशवासियों के लिए अपेक्षित संविधान नहीं है
श्री टी . प्रकाशम् ( मद्रास : सामान्य ) मेरी अपेक्षा के अनुसार यह हमारे देशवासियों के लिए अपेक्षित संविधान नहीं है
महात्मा गांधी को आप मुझसे अधिक जानते हैं या देश के किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा अधिक जानते हैं और आपने ही , मान्यवर , संविधान का प्रारूप निर्माण करने की प्रक्रिया के समय , एक उत्साहपूर्ण रचनात्मक कार्यकर्ता , अधिवक्ता और सुशिक्षित व्यक्ति , जिसने कई वर्ष गाँव में व्यतीत किये हैं ऐसे व्यक्ति , ने आपको लिखे पत्र का उत्तर देने की उदारता दर्शाई थी
महात्मा गांधी को आप मुझसे अधिक जानते हैं या देश के किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा अधिक जानते हैं और आपने ही , मान्यवर , संविधान का प्रारूप निर्माण करने की प्रक्रिया के समय , एक उत्साहपूर्ण रचनात्मक कार्यकर्ता , अधिवक्ता और सुशिक्षित व्यक्ति , जिसने कई वर्ष गाँव में व्यतीत किये हैं ऐसे व्यक्ति , ने आपको लिखे पत्र का उत्तर देने की उदारता दर्शाई थी
आप उस पंचायत राज्य योजना से प्रभावित थे क्योंकि आप महात्मा गाँधी के प्रथम श्रेणी के अनुयायी हैं
इस देश के लोग जैसा चाहते थे वैसा संविधान यह नहीं है
उसे कार्यान्वित करने एवं परिपूर्ण करने का दायित्व आप , देश एवं सरकार जिसे सौंपेगी , उन सब पर रहेगा
परन्तु मेरा प्रश्न यह है कि विदेश के लोग अपने अपने सरकारी तन्त्र किस तरह से चलाते हैं इसे देखने के लिए हमारे संविधान के परामर्शदाता सर बी . एन . राउ अगर आयरलैण्ड , स्वीट्जलैण्ड या अमेरिका जा सकते हैं तो हमारे ही देश में उन्हें एकाध व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो यह कह सके कि इस देश के पास भी देने योग्य कुछ है
इस देश में भी एक राजनीतिक दर्शन था , उसे समग्र देशवासियों ने आत्मसात् किया था और इसका सुचारु उपयोग भारत का संविधान निर्माण करने के लिए हो सकता है
एक क्रान्तिकारी आन्दोलन की फलश्रुति के रूप में इस संविधान की रचना की गई है , इसलिए उसमें क्रान्तिकारी प्रजा की आशा आकांक्षाओं का प्रतिघोष गूंजना चाहिए
हमारे आन्दोलन के कालखण्ड में कुछ क्रान्तिकारी एवं आर्थिक विचारधारा हमें दी गई थी
हमारी इस यात्रा का अभी अन्त नहीं हुआ है
श्री शंकरराव देव ( मुंबई : सामान्य ) संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाले सदस्यों की नियुक्ति करते समय हम संविधान के पंडितों का ज्ञान और बहुश्रुत संवैधानिक विशेषज्ञों की सटीकता की अपेक्षा उत्सुकता से करते थे और यह बात उसमें विपुल मात्रा में है . . . परन्तु हमने बुद्धिचातुर्य से युक्त और व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञों का चयन नहीं किया , और न हीं संविधान में क्रान्ति की भावना को साकार रूप देना स्वीकार किया , क्योंकि संविधान सभा १९४६ में गठित हुई , उस के पूर्व क्रान्तिकारी संघर्ष के निकष पर संविधान के वर्तमान रचनाकारों में से कोई भी परखे नहीं गये हैं
उनका अपना प्रभाव है और इसलिए ऊपर ऊपर से देखनेवाले भी समझ सकते हैं कि वह ब्रिटन , अमेरिका या रूस के संविधान जैसा है
भारतीय प्रजा के प्रशासन के लिए तैयार किये गए इस संविधान में व्यक्ति स्वातंत्र्य का विश्वास दिलानेवाले मापदंड हैं विकास , शान्ति और भ्रातृत्व को प्रोत्साहित करनेवाले सभी सिद्धांतो को समाविष्ट किया गया है , परन्तु साथ ही यह भी स्वीकार करना पडेगा कि इस संविधान से हमारी क्रान्ति में से प्रस्फुटित होनेवाले निश्चित सिद्धांतों को कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त और प्रभावशाली यंत्रणा का प्रावधान नहीं है . . . हम कह सकते हैं कि हमने क्रान्ति की है और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अहिंसक क्रान्ति के पथ पर चलकर हम सत्ता पर आए हैं और फिर भी हमें स्वीकार करना चाहिए कि वह क्रान्ति जिन सिद्धांतों पर आधारित थी उन सिद्धांतो को हमारे राजनीतिक संगठन या भारतीय समाज में गहराई तक हमने उतारा नहीं है
श्री शंकरराव देव ( मुंबई : सामान्य ) संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाले सदस्यों की नियुक्ति करते समय हम संविधान के पंडितों का ज्ञान और बहुश्रुत संवैधानिक विशेषज्ञों की सटीकता की अपेक्षा उत्सुकता से करते थे और यह बात उसमें विपुल मात्रा में है . . . परन्तु हमने बुद्धिचातुर्य से युक्त और व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञों का चयन नहीं किया , और न हीं संविधान में क्रान्ति की भावना को साकार रूप देना स्वीकार किया , क्योंकि संविधान सभा १९४६ में गठित हुई , उस के पूर्व क्रान्तिकारी संघर्ष के निकष पर संविधान के वर्तमान रचनाकारों में से कोई भी परखे नहीं गये हैं
यह यदि गलती या क्षति है तो वह हम सबकी है , क्योंकि हमने अपने गुरु का अनुसरण ईमानदारी से नहीं किया है
राजवंश ताश के पत्तों के महल के समान टूट गये और एक के बाद एक क्रान्तियाँ आईं तब भी भारत की पंचायतों ने हमारे जनजीवन एवं सभ्यता की निरन्तरता किस प्रकार बनाए रखी यह १९३२ में हाउस ऑव कॉमन्स की सिलैक्ट कमेटी के समक्ष निवेदन प्रस्तुत करते समय सर चार्ल्स मेटकाफ ने अच्छी तरह बताया है
मुझे डर है कि अति केन्द्रीकरण से युक्त हमारे संविधान में हृदय को करने और अन्त में पक्षाघातसी स्थिति पैदा करने की सम्भावना प्रतीत होती है
सब अपेक्षा करते हैं कि महान शहीद ( गाँधीजी ) के दृढ अनुयायियों द्वारा रचित संविधान में उनकी आत्मा एवं हृदय की धङकनें सुनाई देगीं
बुद्धिमानी का तकाजा व्यावहारिक बनने के लिए कह रहा है
अत्यधिक वास्तविक विश्व में कल्पना सृष्टि में विहार करने के लिए अवसर नहीं है
यथार्थ की माँग है कि समाज के पुनर्निमाण से पूर्व उसका दृढीकरण करना चाहिए
परन्तु यथार्थ राजनीति एवं प्रशासन कला के खिलाडी ही कितनी अधिक बार स्वयं अपने जाल में फँसे हैं
हमें दृढता प्राप्त करनी चाहिए , साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज जिसका दृढीकरण कर रहे हैं वही कल भयावह बनकर कष्टदायक होगा
श्री एस . एम . घोष ( पश्चिम बंगाल : सामान्य ) पंचायतों के प्रावधान पर मैं अधिक बल देता हूँ
पंचायतों पर आधारित इस संविधान के द्वारा कार्य करेंगे तो इश्वरेच्छा हमें सफलता दिलाऐगी
श्री एस . नागप्पा ( मद्रास : सामान्य ) मैं पुन: एक बार सदन से निवेदन करता हूँ कि हम इस बात की ओर ध्यान दें - क्योंकि संविधान की रचना करनेवाले अधिकांश लोग चाहेंगे कि उसकी रचना जिस भावना के साथ हुई है उसी रूप में वह कार्यान्वित हो
ग्राम पंचायतें और कुटिर उद्योगों की स्थापना जैसे सभी कार्यक्रम दरिद्र प्रजा के लिऐ बहुत सहायक बनेंगे
श्री जसपतराय कपूर ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) . . . उग्र आलोचकों में से अन्तिम व्यक्ति उत्तरप्रदेश के शिक्षामंत्री श्री सम्पूर्णानन्द जैसे असाधारण व्यक्ति हैं
ग्राम पंचायतों की रचना करने के लिए और उन्हें कुछ मात्रा में स्वायत्तता प्राप्त हो इसके लिए महात्मा गाँधी विशेष रूप से उत्सुक थे
शासन के केन्द्रीकरण की बात करनेवाले लोगों को संविधान की धारा ४० की ठीक से जाँच कर लेनी चाहिए
श्री अलगु राय शास्त्री ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) कुछ आगे बढ़ने पर हमें प्रतीत होता है कि कथित मार्गदर्शक सिद्धांत जिसमें हमारे देश के आदर्शों को और जनता के अधिकारों को समाविष्ट किया गया है , उसकी भाषा बहुत आकर्षक , मनभावन और चमक दमकवाली है , परन्तु उसमें कहीं पर भी यह नहीं कहा गया है कि राज्य जनता को अन्न और वस्त्र देने का दायित्व पूर्ण करेगा और जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा
ये सारी बातें उसकी महान उपलब्धियाँ है , और उस विषय में हम कहेंगे कि इससे राष्ट्रपिता गाँधीजी की आत्मा प्रसन्न होगी
श्री अमीयकुमार घोष ( बिहार : सामान्य ) . . . हमने पंचायत पद्धति को राम राम कर दिया है , इतना ही नहीं परन्तु समन्वय और उत्तम प्रशासन के नाम पर राज्यों को केवल आज्ञापालक , हाँ में हाँ मिलानेवालों के स्तर पर उतार दिया है
केन्द्र के दायित्व को छोड सन् १९३५ भारतकानून ( Govt . of India Act , 1935 ) ही है
मैं तो उसे अवगुण नहीं परन्तु 'सद्गुण' के रूप में स्वीकार करने के लिए उत्सुक हूँ , क्योंकि लोगों को इस संविधान को समझने में कोई कठिनाई नहीं होनेवाली है
 . . . ऐसा कहना भी अतिशयोक्ति नहीं मानी जाएगी कि गहराई से या सीधी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है फिर भी उसमें एक ओर सरकार तथा दूसरी ओर प्रजा के बीच संघर्ष के बीज पडे हुए हैं
हमारे देश के ग्रामजीवन के विषय में उनकी मान्यता पूर्णत: गलत थी
श्री श्यामनन्दन सहाय ( बिहार : सामान्य ) . . . संविधान की रचना के सन्दर्भ में मेरा मानना है कि , हमने संविधान को ऊपर से थोप दिया है , उसका आरम्भ ग्रामजीवन से करने का हमने कतई प्रयास ही नहीं किया है
श्री श्यामनन्दन सहाय ( बिहार : सामान्य ) . . . संविधान की रचना के सन्दर्भ में मेरा मानना है कि , हमने संविधान को ऊपर से थोप दिया है , उसका आरम्भ ग्रामजीवन से करने का हमने कतई प्रयास ही नहीं किया है
दुर्भाग्य इस बात का है कि हमने सन् १९३५ के कानून का ही आधार लिया है , और इसीलिए देश की उन्नति के लिए आवश्यक आयामों का उचित विचार नहीं हुआ , उसके प्रति अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया
श्री लोकनाथ मिश्र . . . कई मित्रों को , और विशेषकर आदरणीय श्री प्रकाशम के साथ मुझे भी लगता है कि , आज भी हमारी नाडियों में जो भाव और विचार प्रवाहित है और जनता को जो पसन्द है उसी पंचायत राज्य की ठोस आधारशिला पर ढाँचा तैयार किया गया होता तभी संविधान वास्तविकता के निकट का बन पाता
यदि इस सिद्धांत को संविधान में समाविष्ट किया गया है तो मेरा प्रश्न है कि ऐसा कैसे कहा जा सकता है कि गाँधी विचारधारा की बलि चढाई गई है ? मुझे कहना है कि राष्ट्रपिता द्वारा बताए गए कार्यक्रम को आगे बढाने के लिए संविधान में अपेक्षित प्रावधान किया गया है
अल्पमत को , ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन एवं दूधारू पशु के संरक्षण का विश्वास दिया है
शासकीय कर्मचारी से प्रजा का दायित्व लेने की अपेक्षा जब तक रखी जाएगी तक तब प्रजा असावधान रहेगी और सरकार के प्रति असन्तोष जताती रहेगी
परन्तु दैनिक समाचारपत्रों के प्रति एक दृष्टिपात करने से विश्वास होगा की प्रान्तीय स्तर के नेतृत्व में भी संघर्ष है ही
 . . . निस्सन्देह , ऐसी आलोचनाएँ भी हुई हैं कि पंचायतें दायित्व नहीं निभा पाएँगी , क्योंकि हमारे ग्रामजन अज्ञानी हैं
अर्थात् नींव में पंचायत होनी चाहिए और उसकी बृहद आधारशिला पर आधारित जनतंत्र पिरामीड आकार से ऊपर उठना चाहिए
इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के आमुख में संशोधन करने की सूचना मैने दी थी , और सूचित किया था कि 'जनतन्त्र' शब्द के पश्चात् 'आत्मनिर्भरता के सिद्धांत के अनुसार गठित स्वायत्त ग्रामसमूहों के आधार पर उसे आकार देने का प्रयास किया जाए' ऐसे शब्द जोडे जाएँ . . . संशोधन का उद्देश्य यह था कि हम जनतांन्त्रिक सरकार स्थापित कर रहे हैं तब यथासम्भव मात्रा में छोटी इकाइयों को यथोचित अधिक सत्ता प्रदान करते हुए यथासंभव वास्तवलक्षी जनतन्त्र बनाएँ ताकि ऐसी लघु ईकाई बनानेवाले व्यक्तियों का यथोचित सुलभ एवं तैयार साधन प्राप्त हो सके
देश की जनसंख्या का ९० प्रतिशत हिस्सा गाँवों में रहता है
श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर ( मद्रास : सामान्य ) . . . व्यापक मताधिकार का स्वीकार करने के लिए सदन अभिनन्दन का अधिकारी है
श्री बलवन्तसिंह मेहता ( राजस्थान के संयुक्त राज्य ) . . . अन्य कुछ लोगों ने आक्षेप किया है कि हमने अपनी प्राचीन एवं ऐतिहासिक संस्थाओं के साथ एकसूत्रता नहीं बनाए रखी
ऐसा होते हुए भी हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं के कई तत्वों का समावेश किया गया है
इस सन्दर्भ में भी गाँधीजी के आदर्शों को यदि समाविष्ट किया गया होता तो वह आदर्श संविधान बन पाता , एक ऐसा संविधान जो विश्व की प्रजा एवं राष्ट्रों के लिए उदाहरण रूप और सन्देश देनेवाला होता
इस दु:खदायी स्थिति से मुक्ति पाने के लिये विश्व के सारे राष्ट्र हमारे भारत की ओर दृष्टि लगाए बैठे हैं
उसकी उपेक्षा के लिए खेद होता है , तो भी मुझे लगता है कि राष्ट्र ज्यों ज्यों आगे बढता जाता है त्यों त्यों संविधान में भी परिवर्तन आता है
हमारा प्रशासन तंत्र बहुत अधिक व्ययशील बनता जा रहा है
हमारी संवैधानिक पद्धति भी अधिक व्यवशील बनेगी क्योंकि प्रवर्तमान ढाँचा ही अत्यधिक व्ययकारी है
साथ ही संविधान के उत्साहपूर्ण प्रशंसकों के मन में भी यह सन्देह बना हुआ है कि कहीं पर कुछ अनुचित हुआ है , और जिस दिशा में गति होनी चाहिए थी उस दिशा में नहीं हुई है
संविधान में ऐसा कुछ भी स्पष्ट शब्दों में समाविष्ट नहीं किया गया है , फिर भी उन्हें ये सभी प्राप्त हो और उनकी आपत्तियाँ शीघ्रता से दूर हों इस प्रकार के संविधान को हम कार्यान्वित कर सकते है
सरदार सोचेत सिंह ( पटियाला एवं पूर्व पंजाब संघ ) . . . केवल नारों एवं निरर्थक सूत्रों की संतुष्टि के लिए अत्यधिक केन्द्रीकरण का वैभव हमें अनुकूल नहीं होगा . . . श्री टी . जे . एम विल्सन ( मद्रास : सामान्य ) देश के प्रत्यक्ष शासन में व्यक्ति की परिणामकारी साझेदारी ही जनतंत्र का सारतत्त्व है
सरकार में व्यक्ति की साझेदारी जितनी अधिक एवं प्रभावी होगी , संविधान उतना ही महान होगा , क्योंकि जनतंत्र अभी केवल एक वैचारिक धरातल पर है और मानवसमाज को अभी उसे प्राप्त करना है
 . . . कुछ सदस्यों ने ग्राम पंचायतों का उल्लेख किया
उन्होंने आक्रमण एवं जयपराजय की शताब्दियों में अपना अस्तित्व बनाए रखा था
मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि भारतीय समाज के प्रकृतिप्रदत्त एवं जन्मजात आयामों से संकेत लेकर सदन ने कुछ इस तरह की रचना करनी चाहिए थी , जो व्यक्ति को सरकार में प्रभावीरूप से साझेदार बनने के लिए सक्षम बनाए और सत्ता चोटी से नीचे की ओर नहीं अपितु मूल से चोटी की ओर जाए
कई सदस्य मानते हैं कि शक्ति केन्द्रीकरण में और सुदृढ केन्द्र में स्थित है
बापूने कहा था कि केन्द्रीकरण प्रजा की राजनीतिक एवं आर्थिक स्वाधीनता छीन लेता है
वे कहते थे कि प्रभावी जनतंत्र चोटी से नहीं अपितु मूल से ऊपर उठता है
केन्द्रीकरण वर्तमान समय का भयानक अभिशाप है
उत्पादन के केन्द्रीकरण ने पूँजीवाद को जन्म दिया और उसने समग्र विश्व में आर्थिक स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया
आज के रूस को देखने से प्रतीत होगा कि वहाँ विश्व का सब से बडा जनतन्त्र प्रस्थापित करने का दावा किया गया है फिर भी वह वास्तव में जनतन्त्र का समादर नहीं कर पाया है
सब जानते हैं कि केन्द्र के हाथ में प्रभावी सत्ता का आधार सैन्यशक्ति होता है , और सैन्य के सामर्थ्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करने का अर्थ लोगों के अधिकारों को पूर्णत: निर्मूल करने का मार्ग खुला करना ही होगा
यह जनसामान्य का संविधान है , सामान्य व्यक्ति का संविधान है ऐसा हमें कहा गया है
इसके उपरांत मुझे यह भी अनुभव होता है कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है
केवल समय की माँग को ध्यान में रखकर , उसकी माँग पूरी करने के लिए ही संविधान की रचना हुई है
मुझे दूसरा दु:ख इस बात का है कि हमने विशेष रूप से विदेशों के संविधानों से ही प्रेरणा ली है . . . हमने भारत के ऐतिहासिक सत्य एवं संस्कृति की ओर दृष्टि तक करने का कष्ट नहीं किया है
इसके उपरांत मुझे यह भी अनुभव होता है कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है
संविधान को स्वीकार करते समय हमने इतिहास जिसका साक्षी है ऐसे अपने विश्व के प्राचीनतम और इतिहास में गरिमामय स्थान पर प्रतिष्ठित महान देश ने राजनीतिक क्षेत्र में किये भव्य एवं गौरवशाली प्रयोगों के प्रति ध्यान ही नहीं दिया है
इसके उपरांत मुझे यह भी अनुभव होता है कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है
वह तो इतना ही देखना चाहेगा कि संविधान उसे पोषणयुक्त आहार , वस्त्र , स्वास्थ्य एवं समुचित शिक्षा का विश्वास दिलाता है या नहीं
मैं आपना ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ कि ग्रामीण प्रजा और सामान्य मनुष्य ऐसा कोई विश्वास संविधान में खोज नहीं पाएगा . . . मेरे सहित सभी लोग जानते हैं कि भारत गाँवों का देश है और हमारी प्रजा गाँवों मे निवास करती है
हमारी सभ्यता और संस्कृति ग्रामीण है और उसमें से कुछ बच पाया है वह गाँवों के कारण है
श्री ब्रजेश्वर प्रसाद ( बिहार : सामान्य ) * . . . विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत का सार है राज्य के प्रति पूरा अविश्वास
मैं सदन के सदस्यों से पूछता चाहता हूँ कि क्या वे इन अवधारणाओं पर आधारित राज्य की रचना करने जा रहे हैं ? महात्मा गाँधी विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे
उनके विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत के साथ 'रामराज्य' का प्रगाढ सम्बन्ध था . . . केवल अहिंसक समाज में ही सभी हिंसक तत्त्वों को दूर करने से विकेन्द्रीकरण का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा
जब तक आर्थिक असमानता है तब तक विकेन्द्रीकरण का लक्ष्य हमारी पकड में नहीं आएगा
राज्य की समाप्ति के पश्चात् ही विकेन्द्रित समाज की संरचना हो सकेगी
जब तक सेनावाद है तब तक किसी भी रूप में विकेन्द्रीकरण की सम्भावना नहीं है
अहिंसा और सत्य के महान उद्घोषक के उपदेश के पश्चात् भी हम अपने जीवन , विचार एवं राजनीति को विकेन्द्रित पद्धति में अपना प्रारूप पाने के लिए उसे आध्यात्मिक नहीं बना पाए हैं , परन्तु क्रान्ति अभी आनेवाली है और जब कभी वह आएगी तब हमें संविधान में परिवर्तन करना पडेगा
यह जनसामान्य का संविधान है - एक ऐसा संविधान जो भारत के जनसामान्य को , अपनी संकल्पना के अनुसार , देश को समृद्ध और सुखी बनाने में सक्षम ऐसे समाजवाद या अन्य किसी 'वाद' के प्रयोग करने के लिए स्वतंत्रता एवं पर्याप्त अवसर देता है
वास्तव में वह पंचायत राज्य का संविधान भी नहीं है
मार्गदर्शक सिद्धांतो के प्रावधानानुसार उचित रूप से यदि ग्रामपंचायतों का गठन होता है तो महात्मा गाँधी की इच्छा को परिपूर्ण किया जा सकता है
श्री ओ . पी . अलगेसन ( मद्रास : सामान्य ) . . . एक ऐसी आलोचना हुई है कि गाँव को राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता नहीं दी गई है
ग्रामीण इकाइयों की पद्धति की अवधारणा कुछ ऐसी थी कि ग्रामीण मतदाताओं को ग्राम पंचायतों का चुनाव करने के लिए कहा जाए , और ग्राम पंतायतों के ( निर्वाचित ) सदस्य ही विभिन्न विधायिकाओं के प्रान्तीय एवं केन्द्रीय चुनावों में भाग लें
परन्तु अब , स्वयं गाँव के मतदाता को ही , देश के सामने उपस्थित हुई समस्याओं का महत्त्व समझते हुए , अपने प्रतिनिधि को निर्वाचित करने के लिए निमंत्रित किया जाएगा
एक सुदृढ केन्द्रीय सरकार समय की माँग है
अनेक युग , और हमारा इतिहास इस बात की साक्षी देते हैं कि भारत के सामने सबसे बडी समस्या अखंडता , दृढीकरण एवं ऐक्य थी
श्री महावीर त्यागी ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) . . . परन्तु ग्रामजनों के दृष्टिकोण से देखने पर चित्र धुंधला एवं निराशाजनक है
ग्रामवासियों की समझ में आनेवाला कोई तर्क प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हूँ कि २६ जनवरी , १९५० के पश्चात् उनकी स्थिति बेहतर होगी
इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि हल चलानेवाले व्यक्ति को ही यदि संविधान बनाने को कहेंगे तभी वे उसे अपने अधिकार एवं स्वाधीनता का घोषणापत्रक मानेंगे
श्री एल . कृष्णस्वामी भारती ( मद्रास : सामान्य ) . . . यह संविधान कतिपय विशेष एवं उत्तम लक्षणों से युक्त है , परन्तु गाँधीदर्शन के आधार पर यदि इसका मूल्यांकन करना हो तो वह अत्यन्त अपूर्ण है यह मैं स्वीकार करता हूँ
मेरा स्पष्ट अभिमत है कि गाँधी विचार के नींव के और मूलभूत सिद्धांतों के प्रति उसकी दृष्टि अधूरी , संदेहयुक्त और द्विधापूर्ण है
ग्रामवासियों की समझ में आनेवाला कोई तर्क प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हूँ कि २६ जनवरी , १९५० के पश्चात् उनकी स्थिति बेहतर होगी
ग्रामवासियों की समझ में आनेवाला कोई तर्क प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हूँ कि २६ जनवरी , १९५० के पश्चात् उनकी स्थिति बेहतर होगी
उन्होंने असन्तोष व्यक्त किया है कि गाँधीजी के सिद्धांतो से संविधान में कुछ भी नहीं लिया गया है
मैं अधिकांश मित्रों के साथ सहमत नहीं हूँ - विशेषकर प्राचीन हिन्दु राज्य प्रशासन में प्रजातान्त्रिक शासनपद्धति अर्थात प्रजातन्त्र ( स्वायत्त इकाइयाँ ) के अस्तित्व के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से प्रस्तुतिकरण करनेवाले मित्रों के साथ मेरा तर्क है कि हमारे निम्न स्तरीय वर्ग , हमारे समाज की हलकी जातियाँ जिन्हें हम हरिजन कहते हैं उन्हें निरन्तर दलित एवं दबी हुई स्थिति में ही रखा , और उसके सहज परिणामस्वरूप जनतन्त्र उस समय था ही नहीं
उन्होंने असन्तोष व्यक्त किया है कि गाँधीजी के सिद्धांतो से संविधान में कुछ भी नहीं लिया गया है
८ . भारत के संविधान में पंचायतों के स्थान के विषय में संविधान परामर्शदाता की टिप्पणी मई १९४८ इस समय पंचायतों की अवधारणा को पाण्डुलिपि में सम्मिलित करने का कार्य कदाचित सरल नहीं है
मुझे लगता है कि संविधान की धारा ६९ ( ५ ) ( ए ) और १४९ ( १ ) में , संविधान सभा द्वारा किये गए निर्णय के अनुसार , केन्द्र एवं राज्यों की इकाइयों के लिए ( राज्यों के ) नीचले सदनों के प्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान है
पंचायत योजना की आवश्यकता के अनुसार परोक्ष चुनाव का प्रावधान यदि करना है तो सर्वप्रथम इन दोनों निर्णयों ( दोनों धाराओं ) को बदलना पडेगा
विश्व के सभी प्रमुख समवायतंत्र और संघ राज्यों में नीचले सदन का सीधा चुनाव होता है
अमेरिका के संयुक्त राज्यों में ऊपरी सदन अर्थात् 'सिनेट' का चुनाव पहले परोक्ष रूप से होता था , परन्तु अब ( १९३९ से ) उसका चुनाव भी सीधा होता है
इस संशोधन के अन्तर्गत केन्द्र की विधायिकाओं को धारा २९० के तहत और प्रान्त-राज्य की इकाइयों से बनी विधायिकाओं को धारा २९१ के तहत क्रमश: केन्द्र एवं इकाई विधायिकाओं का चुनाव प्रत्यक्ष या परोक्ष पद्धति से निश्चित करना होगा
संविधान की पाण्डुलिपि के अन्तर्गत , इस सन्दर्भ में धारा २९० और २९१ में पात्रता और धारा ८३ ( १ ) ( ई ) के अन्तर्गत अपात्रता निर्धारित करने का दायित्व सम्बन्धित विधानसदनों के पास रहेगा
हमारे संविधान द्वारा गाँवों से आरम्भ करते हुए ऊपर की ओर प्रान्त एवं केन्द्र तक की रचना करनी चाहिए इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में भी मैंने सोचा है
समवायी संविधान में सामान्य रूप में , परन्तु निरपवाद रूप में नहीं , केन्द्र और घटकों के साथ काम करना होता है
हमारे संविधान द्वारा गाँवों से आरम्भ करते हुए ऊपर की ओर प्रान्त एवं केन्द्र तक की रचना करनी चाहिए इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में भी मैंने सोचा है
समवायी संविधान में सामान्य रूप में , परन्तु निरपवाद रूप में नहीं , केन्द्र और घटकों के साथ काम करना होता है
समवायी संविधान में सामान्य रूप में , परन्तु निरपवाद रूप में नहीं , केन्द्र और घटकों के साथ काम करना होता है
समवायी संविधान में सामान्य रूप में , परन्तु निरपवाद रूप में नहीं , केन्द्र और घटकों के साथ काम करना होता है
जिले की कार्यकारिणी को आन्तरिक राजस्व धारा या नियम और पुलिस आदि से सम्बन्धित अधिकार हैं , जिला न्यायपालिका के लिए नागरिक न्याय कानून , फौजदारी कार्यवाही अधिनियम आदि का प्रावधान है
९ . स्वतंत्र भारत के संविधान के हेतु एवं उद्देश्यों का प्रस्ताव २२ जनवरी १९४७ को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत इसके साथ , यह संविधान सभा दृढता एवं गम्भीरतापूर्वक भारत को स्वतंत्र सार्वभौम प्रजासत्ताक घोषित करती है और उसके भावि शासन के लिए संविधान की रचना करने का भी निर्णय करती है . . . जिसके अन्तर्गत जो प्रदेश इस समय ब्रिटिश भारत के अन्तर्गत हैं , जो प्रदेश देसी रियासतों के रूप में हैं और भारत के अन्य ऐसे प्रदेश जो ब्रिटिश भारत के दायरे के बाहर हैं तथा स्वतंत्र सार्वभौम भारत में समाविष्ट होना चाहते हैं वे सब मिलकर एक संघ बनेंगे , और जिसमें उनकी प्रवर्तमान सीमाएँ या संविधान सभा इसके पश्चात् संविधान के नियमों के अनुसार तय करेगी ऐसी सीमाओं के साथ उपर्युक्त प्रदेश तथा शेष सत्ताओं समेत स्वायत्त इकाइयों का स्थान बना रहेगा और वे उसे बनाए रख सकेंगे
९ . स्वतंत्र भारत के संविधान के हेतु एवं उद्देश्यों का प्रस्ताव २२ जनवरी १९४७ को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत इसके साथ , यह संविधान सभा दृढता एवं गम्भीरतापूर्वक भारत को स्वतंत्र सार्वभौम प्रजासत्ताक घोषित करती है और उसके भावि शासन के लिए संविधान की रचना करने का भी निर्णय करती है . . . जिसके अन्तर्गत जो प्रदेश इस समय ब्रिटिश भारत के अन्तर्गत हैं , जो प्रदेश देसी रियासतों के रूप में हैं और भारत के अन्य ऐसे प्रदेश जो ब्रिटिश भारत के दायरे के बाहर हैं तथा स्वतंत्र सार्वभौम भारत में समाविष्ट होना चाहते हैं वे सब मिलकर एक संघ बनेंगे , और जिसमें उनकी प्रवर्तमान सीमाएँ या संविधान सभा इसके पश्चात् संविधान के नियमों के अनुसार तय करेगी ऐसी सीमाओं के साथ उपर्युक्त प्रदेश तथा शेष सत्ताओं समेत स्वायत्त इकाइयों का स्थान बना रहेगा और वे उसे बनाए रख सकेंगे
संघ राज्य में समाविष्ट या निर्दिष्ट ऐसी सभी सत्ताएँ और कार्य या संघ राज्य की जन्मजात या निहित या उसमें से उत्पन्न होनेवाले शासन और प्रशासन के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे; और जिसमें सार्वभौम स्वतंत्र भारत की सभी सत्ताएँ और अधिकार , उसके घटक और सरकारी विभाग प्रजा से प्राप्त होंगे; और जिसमें कानून तथा सार्वजनिक नीतिमत्ता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठ , अवसरों और कानून के समक्ष समानता; विचार अभिव्यक्ति , मान्यता , आस्था , पूजापद्धति , व्यवसाय , संगठनों की रचना करने और काम करने का स्वातंत्र्य संरक्षित एवं सुरक्षित होगा; जिसमें अल्पमतावलम्बियों , पिछडे और आदि जाति क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछडे वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त होगी; और जिसमें जनतांत्रिक एकता और अखण्डितता तथा भूमि , समुद्र और आकाश क्षेत्र के उसके अधिकारों की न्यायोचित एवं सदस्य राष्ट्रों के कानून द्वारा देखभाल की जाएगी; और यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना न्यायपूर्ण आदरयुक्त स्थान प्राप्त करेगी तथा विश्वशांति और मानवकल्याण के लिए अपना स्वैच्छिक योगदान देगी
१० . उपोद्घात "पंचायत' शब्द का भावार्थ और उसके उद्भव के सम्बन्ध में भारतीय विद्वानों के विरोधाभासी अभिमत हैं
कुछ मानते हैं कि यह शब्द ऐतिहासिक सन्दर्भ में , अपने क्षेत्र के नागरिकों की नागरिक ( ०० ) , प्रशासनिक और राजनीतिक आदि बहुविध आवश्यकताओं की ओर ध्यान देनेवाली , न्यूनाधिक रूप में स्वशासी ग्रामीण रचना का बोध कराती है
ऐसे अनेक विद्वान हैं जो अंग्रेज विद्वान मेटकाफ ( 1908 ) समेत प्रारंभिक समय के अंग्रेज जिला प्रशासकों द्वारा नाटकीय रूप से प्रयोजित ग्रामीण प्रजासत्ताक' , के समानार्थी 'पंचायत' शब्द का प्रयोग करने लगते हैं
परन्तु ब्रिटिश भारत के आरम्भिक ( १८वीं शती के उत्तरार्ध और १९वीं शती के पूर्वार्ध के ) अभिलेखों का निरीक्षण करने के पश्चात् इस विषय में ही सन्देह नहीं रहता है कि भारत के अधिकांश प्रदेशों में गाँवों का अपना ( सम्भवत: नगर आदि का भी ) एक संगठित संस्थागत ढाँचा था और उसका कार्य लोगों की नागरिक , प्रशासनिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की संस्था का था , और विभिन्न प्रकार के अपने दायित्वों को निभाने के लिए उन्हें आवश्यक अधिकार एवं संसाधन भी दिए गए थे
सन् १८५० और १८८० में , स्थानीय निधि के लिए जिला स्तर पर अपेक्षा कृत सीमित औपचारिक स्थानीय संस्थाओं के गठन के वैयक्तिक प्रयास हुए
तब लन्दन स्थित तत्कालीन भारत कार्यालय ( इण्डिया आफिस ) के प्रशासकों में कोलकाता में भारत सरकार और मद्रास प्रेसिडन्सी में स्थानीय स्तर पर कुछ स्वशासित संस्थाओं का विचार शुरू हुआ लगता है
प्रमुख तीन विषय थे : ( १ ) नई या पुरानी योजनाओं के ठीक प्रकार के क्रियान्वयन हेतु , और कुछ आवश्यक बातों के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ अधिक संसाधनों का प्रबन्ध करना , ( २ ) इस प्रकार के स्थानीय प्रशासन तंत्र की रचना करना जो पहले से ही चल रही सरकारी व्यवस्था की तुलना में स्वतंत्र हो और उसका संचालन करनेवाले व्यक्तियों को - विशेष रूपसे सम्बन्धित क्षेत्र के जिलाधीशों को - लचीली पद्धति और मुक्त रूप से आवश्यक कार्य करने के लिए अनुकूलता निर्माण करना , और ( ३ ) गाँव से लेकर जिला स्तर तक के विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों को सहभागी , या कह सकते हैं कि अपने वैयक्तिक एवं सामाजिक सुख-स्वास्थ्य के लिये क्रियाशील होने में सहायक होना
सन् १८८४ के कानून के परिणाम स्वरूप मद्रास प्रेसिडेन्सी में जिला स्तर पर , प्रत्येक जिले में तहसील स्तर पर , और ग्रामीण स्तर पर कुछ गाँवों मे त्रिस्तरीय ढाँचे की रचना हुई
भवन निर्माण एवं मार्गों की देखभाल , विद्यालय , औषधालय , औषध केन्द्र आदि की सुरक्षा जैसी गतिविधियां आरम्भ करते हुए कई क्षेत्रों में ये संस्थाएँ बलशाली बनीं
उसे अनेक प्रमाण प्राप्त हुए , उन्हें शब्दश: अंकित किये गये और ४५८११ प्रश्नोत्तरों को दस खण्डों में प्रकाशित किया गया
केवल मद्रास से सम्बन्धित प्रथम खण्ड में ही १० , ०७९ प्रश्नोत्तर हैं
सन् १९०९ से १९२० के कालखण्ड में स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं के विषय पर व्यापक रूप से चर्चाओं का क्रम जारी रहा
इस कालखण्ड विषयक शोध दर्शाता है कि पंचायत संकल्पना , इन संस्थाओं को कैसा होना चाहिये और कैसा नहीं इसका निरूपण करने वाली सामग्री १८९०-१९२० के दशक में इतनी विपुल मात्रा में प्रकाशित हुई है जितनी इसके बाद किसी के दशक में नहीं हुई , स्वतंत्रता के बाद भी नहीं
ऐसे दो विस्तृत निरूपण - एक गोपालकृष्ण गोखले द्वारा और दूसरा , सी . पी . रामास्वामी अय्यर द्वारा किया हुआ - यहाँ प्रस्तुत करने योग्य हैं : "प्रवर्तमान जिला प्रशासनिक तंत्र के तीन दूषण हैं - गोपनीयता , निरी अफसरशाही और विभागीय विलम्ब
जिले में कार्यकारी सरकारी प्रशासन का प्रमुख प्रतिनिधि जिलाधीश है , और सत्ता के दूषण तथा सत्ता के अनियंत्रित उपयोग पर रोक लगाने के लिये उसके कार्यों पर अनेक अंकुश लगाए गए हैं
जिले में कार्यकारी सरकारी प्रशासन का प्रमुख प्रतिनिधि जिलाधीश है , और सत्ता के दूषण तथा सत्ता के अनियंत्रित उपयोग पर रोक लगाने के लिये उसके कार्यों पर अनेक अंकुश लगाए गए हैं
वैसे ये अंकुश नियमानुसार हैं और उन्हें लगाने का अधिकार नियमानुसार वरिष्ठ अधिकारियों के पास ही है , और वे अपने सहायक अधिकारियों के माध्यम से ही उन्हें लगाते हैं और सत्ता का व्यापक दुरूपयोग रोकने के लिए लगाए गऐ हैं तो भी कुशल सक्षम संचालन की दृष्टि से उसका अधिक मूल्य नहीं है और इसलिए उनके ( जिलाधीशों के ) दायित्वों को निभाने में बहुत बाधाएँ उत्पन्न करते हैं
वैसे ये अंकुश नियमानुसार हैं और उन्हें लगाने का अधिकार नियमानुसार वरिष्ठ अधिकारियों के पास ही है , और वे अपने सहायक अधिकारियों के माध्यम से ही उन्हें लगाते हैं और सत्ता का व्यापक दुरूपयोग रोकने के लिए लगाए गऐ हैं तो भी कुशल सक्षम संचालन की दृष्टि से उसका अधिक मूल्य नहीं है और इसलिए उनके ( जिलाधीशों के ) दायित्वों को निभाने में बहुत बाधाएँ उत्पन्न करते हैं
मैं तो चाहता हूँ कि इस उद्देश्य के लिए प्रत्येक जिले में एक छोटी गैरसरकारी सदस्यों की समिति का गठन किया जाए , उसके दो तिहाई सदस्य जिला समिति के गैरसरकारी सदस्यों द्वारा निर्वाचित हुए हों और एक तिहाई सदस्य जिलाधीश द्वारा नियुक्त किये गये हों
'सरकार के आन्तरिक नियंत्रणों से रहित स्थानीय विषयों को निपटाने में लोगों का जब तक विश्वास नहीं किया जाएगा तब तक वे अपने दायित्व को सही ढंग से निभाना नहीं सीख पाएँगे
परन्तु , उनमें से अनेक अधिकार जिला एवं तहसील बोर्ड या उनके अध्यक्षों को सौंपे गये
'सरकार के आन्तरिक नियंत्रणों से रहित स्थानीय विषयों को निपटाने में लोगों का जब तक विश्वास नहीं किया जाएगा तब तक वे अपने दायित्व को सही ढंग से निभाना नहीं सीख पाएँगे
इसके उदाहरण के रूप में तत्कालीन समयावधि में किसी तहसील बोर्ड द्वारा हुई कुछ गलतियां दर्शाई गई थीं
इस प्रकार के तर्क के कारण ऐसी धारणा बनी कि स्थानीय संस्थाओं की गतिविधियों को कानूनी प्रावधान के द्वारा सीमित कर दिया जाए , इसके अन्तर्गत निश्चित क्षेत्रों के विषय में लोकल बोर्ड का लचीला ढाँचा तैयार किया जाए , नियंत्रण केन्द्रीय सत्ता के पास रहे जिससे ये संस्थाएँ अर्थाभाव के कारण टूट कर बिखर न जाए
नियमों के एक प्रारूप में निश्चित किया था कि 'लोकल बोर्ड एवं ग्रामविकास निधि के बजट स्थानीय सरकार की अनुमति के पश्चात् प्रभावी होंगे'
एक प्रावधान , सम्बन्धित कानून की धारा ११६ को बाधा पहुँचाता था इसलिए उसे निरस्त कर दिया गया , अन्य कुछ नियम जोडे गये
तब कहा गया था कि , 'केवल बजट के स्वीकृत हो जाने से पंचायत को उन्हें दी गई राशि खर्च करने का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता है
इन्स्पेक्टर ऑव म्युनिसिपल कौन्सिल के सामने , १९३९ में , एक गम्भीर समस्या आई
उस पत्र को यहाँ उदधृत करना उचित होगा : 'इस विषय में मेरे २०-३-१९३९ के पत्र के अन्तिम हिस्से के प्रति मैं सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ
परन्तु ऐसी घटनाएँ ध्यान में आईं कि अपनी आर्थिक स्थिति के विषय में बिना सोचे समझे और ग्रामसफाई में सुधार , पेयजल की सुविधाएँ , गाँवों की आधारभूत आवश्यकताओं के प्रति ध्यान न देकर अपने दायित्वों की अनदेखी कर गोपालन , कुटिर उद्योगों को प्रोत्साहित करना , मधुमक्खी केन्द्र , गोठ-बस्ती को बढाने के प्रावधानों के लिए ग्राम पंचायतें अत्यधिक व्यय करती हैं कानून में ऐसा प्रावधान है कि सरकार इस विषय में नियम बना सकती है , परन्तु कानून की अनुसूचि-५ के नियम १-अ ( २ ) में समाविष्ट सम्बन्धित विषयों के लिए व्यय करने से पूर्व नियम बनाने की पूर्व स्थिति नहीं है
इसके परिणाम स्वरूप दो अध्यादेश जारी किए गये
पहला अध्यादेश बैल के लिए स्थान के विषय में था
उसके तहत पंचायत को बैल न रखने के लिये और जिला बोर्ड को अपना बैल पंचायत से वापस लेने का आदेश दिया गया था
दूसरे अध्यादेश के अन्तर्गत कानून की अनुसूचि में संशोधन करते हुए कहा गया कि 'इन्स्पेक्टर ऑव म्युनिसिपल कौन्सिल एण्ड लोकल बोर्डज' या 'डिप्टी इन्स्पेक्टर आँव म्युनिसिपल कौन्सिल एण्ड लोकल बॉर्डज' की लिखित अनुमति के बिना कोई भी पंचायत मद्रास लोकल बॉर्ड एक्ट-१९२० की अनुसूचि-५ के उप-नियम ( २ ) या नियम १-ए अन्तर्गत निर्दिष्ट किसी भी बात के लिए व्यय नहीं करेगी
इस प्रकार , नियम बनाने की सत्ता के आधार पर , पंचायतों की सभी गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण हो गया
आरम्भ में ही इन संस्थाओं को तकनीकी रूप से मान्य करने का अधिकार उनके तकनीकी कर्मचारियों को दिया गया , परन्तु बाद में उन्हीं कर्मचारियों को स्थानीय समितियों की सेवाओं से निकाल दिया गया
दूसरे अध्यादेश के अन्तर्गत कानून की अनुसूचि में संशोधन करते हुए कहा गया कि 'इन्स्पेक्टर ऑव म्युनिसिपल कौन्सिल एण्ड लोकल बोर्डज' या 'डिप्टी इन्स्पेक्टर आँव म्युनिसिपल कौन्सिल एण्ड लोकल बॉर्डज' की लिखित अनुमति के बिना कोई भी पंचायत मद्रास लोकल बॉर्ड एक्ट-१९२० की अनुसूचि-५ के उप-नियम ( २ ) या नियम १-ए अन्तर्गत निर्दिष्ट किसी भी बात के लिए व्यय नहीं करेगी
कुछ क्रियात्मक और प्रक्रियात्मक ढाँचा तो १९४४ तक बन गया था , और कुछ सुधार के साथ १९५८ के मद्रास पंचायत कानून के रूप में आज भी वही ढाँचा अस्तित्व में है
स्थानीय संस्थाओं को प्रोत्साहित करने की उत्सुकता एक ही प्रकार की थी
परन्तु १९२० के लोकल बार्ड अपेक्षाकृत कोरी स्लेट के साथ शुरू हुए थे
जब कि १९५८ की पंचायत संस्थाएँ कार्यपद्धति की जटिलता से दबी हुई थीं
१९५८ का लक्ष्य पुराने क्रियात्मक एवं प्रक्रियात्मक ढाँचे से ही सभी प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करना था
१९५८ के कानून के द्वारा त्रिस्तरीय ढाँचा रचा गया , परन्तु उसमें बीच के स्तर को अधिक अच्छा स्थान एवं संसाधन दिए गए
१९५८ के कानून के द्वारा त्रिस्तरीय ढाँचा रचा गया , परन्तु उसमें बीच के स्तर को अधिक अच्छा स्थान एवं संसाधन दिए गए
सन् १९३० के दशक में संयुक्त प्रेसिडेन्सी का केवल एक तिहाई क्षेत्र ही आवृत्त किया गया था
ऐसा होते हुए भी , १९२० से १९४० के दो दशकों में प्राप्त वित्तीय संसाधनों से अधिक संसाधन १९५८ में प्राप्त नहीं थे
सन् १९६१ में प्रवर्तमान ढाँचा पूर्णरूप से विकसित हुआ , और तब से व्यय रू . २९ करोड से ३० करोड के मध्य रहता है , जब कि राज्य का खर्च , १९६४-६५ में बढकर रू . १९५ करोड तक पहुँचा था
प्रस्तुत ग्रन्थ में मद्रास राज्य के पंचायत राज की व्यवस्था और कार्यपद्धति का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है
कुछ चयनित पंचायत और पंचायत संघो का अध्ययन गहराई से किया गया था
निवेश , कार्यक्रम , उसमें जुडे हुए मानव संसाधन और कार्यरत संस्थागत साधनों के रूप में स्थित पंचायत पद्धति के समन्वित प्रभाव का मूल्यांकन सर्वसामान्य रूप में किया गया
११ . पंचायत राज के राज्यव्यापी आयाम पंचायत व्यवस्था का पूर्ण या आंशिक , विस्तृत एवं आलोचनात्मक सर्वेक्षण करने से पूर्व यह जानना अनिवार्य प्रतीत होता है कि प्रवर्तमान पंचायत पद्धति का प्रभाव क्या है , और इस पद्धति द्वारा कुछ प्रत्यक्ष उपलब्धि है या नहीं
प्रशासनिक व्यवस्थायें समग्र राज्य को २१ विकास जिलों में बाँटा गया है
मद्रास को छोड अन्य राजस्व जिलों मे जिला विकास परिषदों की स्थापना की गई है ( जैसे कि नीलगिरि , चेंगलपट्ठ और कन्याकुमारी में एक एक , जब कि अन्य जिलों में दो दो जिला विकास परिषदों की स्थापना की गई है
मद्रास को छोड अन्य राजस्व जिलों मे जिला विकास परिषदों की स्थापना की गई है ( जैसे कि नीलगिरि , चेंगलपट्ठ और कन्याकुमारी में एक एक , जब कि अन्य जिलों में दो दो जिला विकास परिषदों की स्थापना की गई है
प्रत्येक विकास जिले में पंचायत संघों की संख्या को सारिणी १ में दर्शाया गया है
पंचायत संघ का परिक्षेत्र लगभग १०० वर्गमील है और जनसंख्या लगभग ७५ , ००० है
पंचायत संघ का परिक्षेत्र लगभग १०० वर्गमील है और जनसंख्या लगभग ७५ , ००० है
ऐसा होते हुए भी विभिन्न पंचायत संघों के क्षेत्र और जनसंख्या में अत्यधिक भिन्नता या अंतर भी देखे जा सकते हैं
जैसे , पूर्व कोईम्बतूर जिले में सब से विशाल पंचायत संघ है , जिसका क्षेत्रफल १ , ८१ , ८८५ वर्ग मील है तो पश्चिमी कोईम्बतूर जिले में स्थित पंचायत संघ क्षेत्रफल १६ . ४८ वर्ग मील ही है
 ) इस प्रकार संपूर्ण राज्य में लगभग ३७४ पंचायत संघों के द्वारा राज्य की १२ , ८९५ ग्राम पंचायतों की रचना की गई है
जैसे , पूर्व कोईम्बतूर जिले में सब से विशाल पंचायत संघ है , जिसका क्षेत्रफल १ , ८१ , ८८५ वर्ग मील है तो पश्चिमी कोईम्बतूर जिले में स्थित पंचायत संघ क्षेत्रफल १६ . ४८ वर्ग मील ही है
१५ पंचायत सघों में जनसंख्या १ लाख से अधिक है जब कि ८ संघों में ३० , ००० से भी कम
१५ पंचायत सघों में जनसंख्या १ लाख से अधिक है जब कि ८ संघों में ३० , ००० से भी कम
मद्रास से केवल दस मील की दूरी पर स्थित विल्लिवाकम पंचायत संघ की जनसंख्या सब से अधिक लगभग १ , ४७ , ७३७ है
सेलम जिले में स्थित यरकाड संघ में केवल एक ही पंचायत है , जब कि चेंगलपट्ट जिले में उत्तरामेरूर संघ में सबसे अधिक ७३ पंचायतें हैं
सेलम जिले में स्थित यरकाड संघ में केवल एक ही पंचायत है , जब कि चेंगलपट्ट जिले में उत्तरामेरूर संघ में सबसे अधिक ७३ पंचायतें हैं
सामान्य विकास एवं महत्त्व के संदर्भ में भी संघो में पर्याप्त भिन्नता है
किसी भी क्षेत्र का महत्त्व निर्धारित करने के लिए वहाँ टेलिग्राफ कार्यालय है या नहीं , या रेलवे स्टेशन है या नहीं इसकी जानकारी भी आवश्यक है , क्योंकि ये दोनों सुविधाएँ सम्बन्धित क्षेत्र के आर्थिक महत्त्व को दर्शाती हैं
पंचायत संघों के मुख्य केन्द्र सामान्य रूप से तहसील स्थान पर या सब डिविजन के प्रमुख स्थान पर होते हैं
इस कानून के प्रभावी होने के पश्चात् अनेक नगर पंचायतों को नगर पालिकाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई है
सन् १९६५ में ही ९ पंचायतों को नगर पालिकाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई है
तिरूनेलवेली जिले में स्थित सिंगनल्लूर पंचायत संघ के समग्र क्षेत्र को एक नगरपालिका में परिवर्तित कर दिया है
और इस वर्गीकरण के अनुसार उन्हें श्रेणियों में कम अधिक मात्रा में धन दिया जाता है
यह वर्गीकरण स्थानीय उपकर के साथ जुडे हुए अनुदान और शैक्षणिक अनुदान को निश्चित करने के लिए आधाररूप माना जाता है
इस आर्थिक वर्गीकरण की व्यावहारिकता को लेकर सन्देह उपस्थित किया गया था
पुन: यह भी स्पष्ठ किया गया कि कोई ग्राम पंचायत वर्गीकरण के आधार पर सरकार द्वारा दिये गए अनुदान का प्रमुख भाग विकास के लिए व्यय करती है तो सरकार को कोई आपत्ति नहीं है
अत: चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के लिए मार्गनिर्माण विषयक बजेट जब तक नहीं हुआ तब तक इस का निर्णय स्थगित कर दिया गया
' ब्लॉक का वित्तीय वर्गीकरण एक प्रान्तीय व्यवस्था है
ब्लॉक का प्रथम और द्वितीय में किया गया वर्गीकरण मूल रूप में समुदाय के अन्तर्गत खंड की रचना का दिनांक दर्शाने के लिये था
जिलों मे स्तर १ और २ के खंडों की संख्या सारिणी ६ में दर्शाई गई है
 ( १ ) राज्य सरकार द्वारा किया गया परिवर्तन ( २ ) उनके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित किये गये मूल्य यथा ( सरकार द्वारा वैधानिक रूप से निर्धारित किये गये मूल्य के अनुसार ) संग्रह किए जा रहे कर , ड्यूटी आदि है
उल्लेखनीय है कि पिछले तीन वर्षों में विधानसभा द्वारा दी जा रही राशि और पंचायतों द्वारा सीधे प्राप्त किये जा रहे भवन , वाहन एवं व्यवसाय करों में वृद्धि हुई है ( यद्यपि यह राशि पंचायतों के द्वारा ही लिये जा रहे मुद्रा कर की राशि से बहुत कम है
कहीं कहीं शेष राशि का योग प्राप्त की गई राशि के योग से दुगुना था
उल्लेखनीय है कि पिछले तीन वर्षों में विधानसभा द्वारा दी जा रही राशि और पंचायतों द्वारा सीधे प्राप्त किये जा रहे भवन , वाहन एवं व्यवसाय करों में वृद्धि हुई है ( यद्यपि यह राशि पंचायतों के द्वारा ही लिये जा रहे मुद्रा कर की राशि से बहुत कम है
सारिणी ८ में प्रति जिला प्राप्त की गई राजस्व की राशि का विवरण दिया गया है
१९६०-६१ से निरन्तर यह सम्पूर्ण आय का ४० प्रतिशत होता है
१९६३-६४ में सम्पूर्ण आय रू . ५८७ . १५ लाख हुई थी जिसमें व्यवसाय कर तो केवल ५ . २० लाख ही था
१९६३-६४ में सम्पूर्ण आय रू . ५८७ . १५ लाख हुई थी जिसमें व्यवसाय कर तो केवल ५ . २० लाख ही था
इसके अतिरिक्त , पंचायतों के अधिकारी एवं अन्य कर्मचारी तथा प्रचार कार्य के साथ संलग्न सभी व्यक्तियों के प्रशिक्षण के लिए आवश्यक व्यय करना पड़ता है
इस व्यय की राशि १९६१-६२ में १ करोड थी , वह १९६४-६५ में बढ़कर रू . १ करोड ३५ लाख हुई थी
सब से अधिक खर्च स्थानीय निधि अंकेक्षण के लिए किया जाता है
यह राशि १९६१- ६२ में दी गई राशि से दुगुनी है
इसी प्रकार ग्राम अधिकारियों को दिये जानेवाले पंचायत विकास भत्ते की राशि भी १९६१-६२ में रू . १५ लाख से बढ़कर १९६४- ६५ में रू . २६ लाख तक पहुँची है
कृषि पंचायत संघों के द्वारा , पाँच वर्ष के बजट में , तीसरी योजना के ६० महीनों में से पहले ४३ महीनों में कृषि के लिए दी गई रू . ४ . १६ करोड की राशि में से लगभग रू . २ . ३१ करोड की राशि कृषि विकास के लिए खर्च की गई थी
इस कालखंड में कुल २५ , ९४० एकड भूमि को पंचायतों की बागान परियोजना में समाहित कर लिया गया था
कृषि पंचायत संघों के द्वारा , पाँच वर्ष के बजट में , तीसरी योजना के ६० महीनों में से पहले ४३ महीनों में कृषि के लिए दी गई रू . ४ . १६ करोड की राशि में से लगभग रू . २ . ३१ करोड की राशि कृषि विकास के लिए खर्च की गई थी
जैसे कि ग्राम सहायकों के लिए पाँच वर्ष में अनुमानित राशि रू . १ , १२ , ५० , ००० में से केवल रू . ११ , ५६ , ००० व्यय किये गये जो निर्धारित राशि का १० प्रतिशत ही था
जैसे कि ग्राम सहायकों के लिए पाँच वर्ष में अनुमानित राशि रू . १ , १२ , ५० , ००० में से केवल रू . ११ , ५६ , ००० व्यय किये गये जो निर्धारित राशि का १० प्रतिशत ही था
पंचायत संघों द्वारा ४२ महीनों में कुल लगभग रू . १२ , ७९ , ४५१ का व्यय ( ३० सितम्बर १९६४ तक ) इस कार्य में किया गया था
इस राशि में विभिन्न स्थानों पर लगभग २५ पशुचिकित्सालयों के भवन निर्माण के लिए सरकार द्वारा दिये गये रू . ४ लाख को भी समाविष्ट किया गया है
इस लघु सिंचाई योजना की देखभाल के लिए रू . २८ , ५९ , ००० का व्यय भी उस समयावधि में किया गया था
मस्त्योद्योग कार्यक्रम ३१ अक्तूबर १९६४ तक तंजावु जिले में और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ४६ संघों में कुल १८३ मत्स्य पालनकेन्द्र भी शुरू किये गए हैं जब कि अन्य संघों में इसे शुरू किया जाना था
शिक्षा १९६२-६३ में शिक्षा के क्षेत्र में पंचायत संघों ने लगभग ४/९ स्थानिक उपकर शिक्षानिधि में देने के साथ साथ सामान्य निधि से भी लगभग रू . ६४ लाख का खर्च प्राथमिक शिक्षा के लिए किया था
इस प्रकार पंचायत संघों का १९६३-६४ में प्रदान लगभग रू . १०९ लाख तक पहुँच गया था , जो १९६४-६५ तक रू . १३६ लाख होने का अनुमान था
इन संघों ने लगभग १०० विद्यालयों मे पर्यावरणीय स्वच्छता के लिए परियोजना भी शुरू की थी जिसके लिए रू . २ , ०० , ००० का व्यय भी किया गया था
कुल मिलाकर २१ संघों ( प्रत्येक जिले में एक के हिसाब से ) में ७३० प्राथमिक विद्यालय भी आरम्भ किये गए थे
प्रत्येक पंचायत को दिये गए रेडियो सेट के लिए रू . १८० सहायता निधि दी गई थी जब कि पंचायत क्षेत्र सहाय के छोटे कस्बों को तो दूसरे सेट के लिए भी रू . १०० सहायता राशि दी गई थी
उसे प्रतिवर्ष रू . २० शुल्क लेकर ( प्रतिसेट ) पंचायत के रेडियो सेट की देखभाल का दायित्व सौंपा गया था
सारिणी १६ पशुपालन परियोजना के अंतर्गत निर्धारित व्यय और प्रत्यक्ष लक्ष्य प्राप्ति का विवरण ( ३० सितम्बर १९६४ तक ) परियोजना का विवरण उपलब्धि ( संख्या ) व्यय ( रूपये ) १ . सांडों का वितरण १ , ५४२ ५ , ९७ , ६१३ २ . आदानप्रदान के स्तर पर भेडों का वितरण १५ , ८२५ ५ , ६७ , ७१८ ३ . आदानप्रदान के स्तर पर ६४ , १५५ ८ . , ६० , ९७८ मुर्गी बतकों का वितरण ४ . विस्तरण अधिकारी एवं ग्राम सेवकों के लिए ७३१ ७६ , ५९९ प्राथमिक चिकित्सा बक्सा ( पशुपालन ) ५ . ब्लॉक के मुर्गापालन केन्द्र का आरंभ २९ ६४ , ५३२ व्यक्तिगत पालन करनेवाले को दी गई सहायता १ , ८७३ २ , ०६ , ९८५ ६ . पशु चिकित्सालय का मकान - ४ , ०५ , ०२६ परिचर्याखाना सहित ग्राम सुरक्षा दल में लगभग १४ लाख पंजीकृत स्वयंसेवक थे और १० , ३१० मातृसंगम थे ( प्रति संघ ३० का लक्ष्य था
 ) इस ग्रामसुरक्षादल के सदस्यों ने रू . १ , ४५ , ००० दान भी दिया था
सेलम जिले में स्थित दो विकास खण्ड कोली हिल्स और येरकाड को पंचायत संघों के द्वारा प्राप्त होनेवाले सामान्य संसाधन के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा , पाँच वर्ष तक वार्षिक रू . १० लाख से अधिक अनुदान भी दिया गया था
इसके अतिरिक्त १९६३ के अन्त तक तो ग्रामीण उद्योगों के लिए तीन अग्रिम परियोजनाओं को केन्द्र सरकार की अनुमति भी प्राप्त हो गई थी
इन पंचायत संघों के द्वारा जमा किये जा रहे कर का औसत लगभग ३१ पैसे था , जिसके प्रति सरकार ने १९६१-६२ में रू . ८५ , २४ , ००० अनुदान भी दिया था , जो १९६५-६६ में बढकर रु . १ करोड ७० लाख हुआ था
इन पंचायत संघों के द्वारा जमा किये जा रहे कर का औसत लगभग ३१ पैसे था , जिसके प्रति सरकार ने १९६१-६२ में रू . ८५ , २४ , ००० अनुदान भी दिया था , जो १९६५-६६ में बढकर रु . १ करोड ७० लाख हुआ था
उन्होंने पंचायतों की गतिविधियों के विषय में कुछ चिन्ता भी दर्शाई थी
विधानसभा के ये सदस्य सदन में पंचायतों के सम्बन्ध में निश्चित या सामान्य विषयों में सम्बन्धित प्रश्न पूछते थे
इसके अतिरिक्त मद्रास सरकार के विभागों के द्वारा घोषित किये गये वैधानिक नियमों के प्रकाश में ( सहायक विधान समिति ) पंचायतों की गतिविधियों पर निगरानी रखनी है
नियमों की समीक्षा करने की और पंचायत पद्धति में परिवर्तन करने की भी राज्य विधानसभा की वैधानिक सत्ता है
इसके अतिरिक्त , पंचायतों के आर्थिक विषय एवं प्रशासन जैसे विषय में भी प्रश्न पूछे जाते हैं
साथ ही इस समिति का मानना है कि इस निश्चित मामले में नियम जारी करने में अकारण विलंब हुआ था
इस विषय में समिति इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि , ' . . . ऐसी स्थिति में सम्बन्धित समाहर्ता कार्यालयों को प्रशासनिक प्रतिवेदन पहुँचाने में पंचायत संघों की समितियाँ स्वाभाविक ही कानून का पालन सक्षम रूप से नहीं कर पाएँगी
कमिटी ऑन सबोर्डीनेट लेजिस्लेशन ने इस उत्तर को ध्यान में रखते हुए , पूर्व में किये गए अपने निर्देशों के प्रति ध्यान आकर्षित किया था
साथ ही इस समिति का मानना है कि इस निश्चित मामले में नियम जारी करने में अकारण विलंब हुआ था
१९६१-६२ के एक अन्य प्रतिवेदन में समिति ने बताया था कि पंचायत अध्यक्ष , उपाध्यक्ष और पंचायत समिति के अन्य सदस्यों को अधिसूचना नं . १६ जी . ओ . ( एम . एस . ) १२४८ एलए-२६ अप्रैल १९६१ के अनुसार कम से कम रेलवे के दूसरे दर्जे के एक टिकट का मार्गव्यय या स्टीमर का मार्गव्यय देना चाहिए
१९६१-६२ के एक अन्य प्रतिवेदन में समिति ने बताया था कि पंचायत अध्यक्ष , उपाध्यक्ष और पंचायत समिति के अन्य सदस्यों को अधिसूचना नं . १६ जी . ओ . ( एम . एस . ) १२४८ एलए-२६ अप्रैल १९६१ के अनुसार कम से कम रेलवे के दूसरे दर्जे के एक टिकट का मार्गव्यय या स्टीमर का मार्गव्यय देना चाहिए
इस 'कमिटी ऑन सबोर्डीनेट लेजिस्लेशन' के अतिरिक्त विधानसभा की एक अन्य समिति 'लेजिस्लेटिव कमिटी ऑन पब्लिक एस्योरन्सीज' भी है
न्यायिक गतिविधियाँ पंचायत पद्धति के कई विषय कई बार न्यायालय तक पहुँचते हैं
कई बार अविश्वास प्रस्ताव की 'याचिका' द्वारा चुनौती दी जाती है
प्रशिक्षण तमिलनाडु पंचायत संघ ( टीओनपीयु ) द्वारा १९५५ के अंत में पंचायत के सदस्यों को प्रशिक्षित करने की एक परियोजना तैयार की गई थी
अगस्त १९५८ में पुन: टीएनपीयु ने पंचायत सदस्यों के लिए प्रशिक्षण स्थल के विषय में सरकार से अनुमति माँगी थी
अप्रैल १९६२ में प्रशिक्षण शुरू किया गया और एक वर्ष तक चलता रहा
अप्रैल १९६२ में प्रशिक्षण शुरू किया गया और एक वर्ष तक चलता रहा
इसमें लगभग रु . ५० , ००० का खर्च तो कर्मचारियों के वेतन और भत्ते पर हुआ था
अध्ययन शिविर या प्रशिक्षण का जो कार्यक्रम आयोजित किया था वह सामान्य रूप से प्रत्येक समूह के लिए दो से तीन दिन तक चलता था
वह अध्ययन शिविर सरकार के ( ग्रामीण विकास और स्थानिक प्रबन्धन ) रूरल डेवलपमेन्ट एण्ड लोकल एडमिनिस्ट्रेशन - आर . डी . एण्ड एल . ए ) विभाग के विशेष अधिकारी की देखरेख में चलता था
अप्रैल १९६३ तक पंचायतों के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों को मिलाकर कुल २१ , ७३५ प्रशिक्षार्थी ( कुल संख्या ८० प्रतिशत ) इस से लाभान्वित हुए थे
अध्ययन शिविर या प्रशिक्षण का जो कार्यक्रम आयोजित किया था वह सामान्य रूप से प्रत्येक समूह के लिए दो से तीन दिन तक चलता था
प्रशिक्षण की अवधि में प्रत्येक ग्रामसेवक और सेविका को रु . ४० और रु . ४५ प्रतिमाह भत्ता भी दिया जाता है
क्षेत्रीय अधिकारियों को तिरूपति में ( केन्द्रीय मंत्रालय और रिझर्व बेंक द्वारा ) चलनेवाले प्रशिक्षण केन्द्रों में साडे तीन मास का प्रशिक्षण लेना पड़ता है जब कि विस्तरण अधिकारी ( प्रशिक्षण ) के लिए यह समयावधि छह महीने की है
विस्तरण अधिकारी ( कृषि ) को कोयम्बतूर के कृषिमहाविद्यालय में पुनरध्ययन करना होता है , और ऐसा ही पुनरध्ययन वर्ग विस्तरण अधिकारी ( पशुपालन ) को करना होता है
 ) जब कि विकास खण्ड अधिकारियों को ग्रामोद्यो , ऋण एवं कार्यालयीन विषयों में १५ दिन का प्रशिक्षण लेना होता है और जो राजस्व से सम्बन्धित नहीं हैं उन कर्मचारियों को जिला सर्वेक्षक द्वारा एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता है
राजस्व विभागीय अधिकारियों के लिए गाँधीग्राम में पाँच दिन का प्राथमिक पाठ्यक्रम निश्चित किया गया था
राजस्व विभागीय अधिकारियों के लिए गाँधीग्राम में पाँच दिन का प्राथमिक पाठ्यक्रम निश्चित किया गया था
सेवारत ग्रामसेवक एवं ग्रामसेविकाओं के लिए एक से तीन दिन का सेवाकालीन प्रशिक्षण का कार्यक्रम भी है
सेवारत ग्रामसेवक एवं ग्रामसेविकाओं के लिए एक से तीन दिन का सेवाकालीन प्रशिक्षण का कार्यक्रम भी है
केन्द्र के समाज विकास एवं सहकार मंत्रालय द्वारा दर्शाई गई रूपरेखा के अनुसार राज्य में एक भी प्रशिक्षण केन्द्र नहीं है
सेवारत ग्रामसेवक एवं ग्रामसेविकाओं के लिए एक से तीन दिन का सेवाकालीन प्रशिक्षण का कार्यक्रम भी है
यह संघ प्रति दो वर्ष में राज्य सरकार की परिषद का आयोजन भी करता है
सन् १९६४ में आयोजित इस परिषद में कुछ विषयों पर चर्चा की गई थी और अनेक प्रस्ताव भी पारित किये गए थे
तामिलनाडु पंचायत युनियन को तो राज्य सरकार ने १९५२ में ही मान्यता दे दी थी और ५ रु . सदस्यता शुल्क देकर उसका सदस्य बनने के लिए पंचायतों को अनुमति भी दे दी थी
इसमें दर्शाया गया है कि किसी भी बात में पंचायतें अपनी इच्छानुसार निर्णय नहीं ले सकती हैं
पंचायत द्वारा किये गए निवेदनों के प्रकार पंचायतों के संचालन के अलावा राज्य सरकार के कानूनी एवं प्रशासनिक नियंत्रण के संदर्भ में इससे पूर्व चर्चा हो ही चुकी है
पंचायत राज के वास्तविक रूप को समझने के लिए इन इकाइयों के द्वारा उत्पन्न प्रश्न और उसके समाधान के लिए पंचायतों और पंचायत संघों ने जो निवेदन किये हैं इससे ज्ञात होता है
इस संदर्भ में विचित्र दृष्टांत मदुराई जिले की एक पंचायत का ही मिल जाएगा
इसके पश्चात विभागीय पंचायत अधिकारी 'अ' द्वारा त्यागपत्र देने के कारण दर्शाए गये थे जो इस प्रकार हैं; संबंधित सत्ताधीशों ने इस पंचायत २७-११-१९६० के प्रस्ताव २७ की उपेक्षा की है
राज्य की विधानसभा में भी इस पंचायत के संबंध में प्रश्न उठाया गया था और आवश्यक जानकारी प्राप्त कर ली गई थी
सरकार ने सामूहिक त्यागपत्र की बात को स्वीकार भी किया और इसको भी स्वीकार किया कि पंचायत के २१-१२-१९६० के प्रस्ताव के द्वारा वे त्यागपत्र उसे प्राप्त भी हो गये हैं
 ( पंचायत का प्रस्ताव क्रमांक २७ , २७-११-१९६० ) ( २ ) पंचायत संघ के एक सदस्य को यह कहते हुए सदस्यपद से हटा दिया गया था कि उन्होंने दो दिन के लिए प्रतिदिन रु . ५ के हिसाब से सरकार से वेतन लिया है इसलिए वे सदस्यपद के लिए अयोग्य सिद्ध होते हैं
वह सरकार की आरक्षित जमाराशि से दी गई थी
इसके लिए केवल रु . १७ . ५० का मार्गव्यय ही दिया गया था
इतना ही नहीं अन्य किसी भी नेता के चित्र रखने का प्रस्ताव मान्य हुआ परन्तु इसके लिए शर्त रखी थी कि उसका व्यय संघ को उठाना होगा
'कास्केट' खरीदने के लिए होनेवाले व्यय पर रोक लगा दी गई थी
इसी प्रकार सरकार ने अपने आदेश क्र . १९२८ में पंचायत को छोड स्थानीय संस्थाओं को सूचना दी थी जिसके अंतर्गत मद्रास से महामहिम राज्यपाल को दिये गए प्रशस्तिपत्र के लिए रू . २००/- का व्यय मान्य रखा था , परन्तु मंत्रियों के लिए आतिथ्य या 'कास्केट' के लिए किये गये व्यय को अमान्य कर दिया था
इसी प्रकार सरकार ने अपने आदेश क्र . १९२८ में पंचायत को छोड स्थानीय संस्थाओं को सूचना दी थी जिसके अंतर्गत मद्रास से महामहिम राज्यपाल को दिये गए प्रशस्तिपत्र के लिए रू . २००/- का व्यय मान्य रखा था , परन्तु मंत्रियों के लिए आतिथ्य या 'कास्केट' के लिए किये गये व्यय को अमान्य कर दिया था
' ( ८ ) एक निश्चित केन्द्रीय मंत्री की प्रशस्ति के लिए र . २००/- व्यय मान्य किया गया था
२° ( ९ ) एक पंचायत द्वारा अपने मकान में रखे गए छायाचित्रों को सुधारने के लिए रु ६०० का व्यय मान्य किया गया था
 ( १० ) तिरूनेलवेल्ली जिले में स्थित एक पंचायत संघ ने , अपनी कार्यसूची मुद्रित करने के लिए अक्तूबर १९६२ में रू . २६ का व्यय किया था
 ( ११ ) सन् १९६० में मदुराई जिले में हुए ग्रामदान गांवों को ऋण के लिए प्रार्थना की गई थी
 ( १२ ) प्रत्येक जिले के समाहर्ता को सरकार द्वारा बताया गया था कि प्रत्येक पंचायत संघ और जिले के कार्यालय में ( अ ) संचार व्यवस्था ( ब ) प्राथमिक विद्यालय और पेय जल की सुविधा ( क ) स्वास्थ्य सुविधाएँ और ( ङ ) लघु सिंचाई परियोजनाओं को दिखानेवाले चार मानचित्रों को इस तरह रखा जाए , जिससे जनता उन्हें देख सके
पूर्व निर्धारित ५५ पैसोंवाला प्रस्ताव निरस्त किया गया है यह जानकारी विकास आयुक्त , समाहर्ता एवं तहसिलदार को भी दी गई थी
फिर भी उसने प्रस्ताव को निरस्त तो घोषित नहीं किया क्योंकि तुरंत ज्ञात हुआ कि इसके लिए तो मद्रास पंचायत विनियम की धारा ११६ में परिवर्तन करना पडेगा तभी इस प्रस्ताव को रोका जा सकता है
इस लिए समाहर्ता एवं राजस्व अधिकारियों को बताया गया कि पंचायत संघों की परिषदों को ( ५५ पैसे के अधिभार को घोषित करने के प्रस्ताव ) सूचित कीजिए कि संबंधित वित्तीय वर्ष में उन प्रस्तावों को निरस्त नहीं करना चाहिए
क्योंकि सामान्य क्लर्क भी प्रति मील यात्रा-भत्ते के लिए ११ पैसे के अधिकारी हैं जब कि निर्वाचित सदस्यों को प्रति मील केवल ६ . ५ पैसा ही यात्रा-भत्ता दिया जाता है
 ( १५ ) सन् १९६१ के आरंभ में एक जिलाधीश ने सरकार से प्रार्थना करते हुए बताया था कि जिला विकास परिषद की बैठक प्रात: सायं दो सत्रों में चलती है इसलिए रु . ५०/- अल्पाहार के लिए स्वीकृत किये जाएँ
प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के भवनों के प्रकार के लिये १९५० में निर्णय ले लिया गया था , परंतु उस निर्णय की अधिकृत जानकारी भी संबंधित अधिकारियों को अत्यन्त विलंब से १९५८ में दी गई थी
प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के भवनों के प्रकार के लिये १९५० में निर्णय ले लिया गया था , परंतु उस निर्णय की अधिकृत जानकारी भी संबंधित अधिकारियों को अत्यन्त विलंब से १९५८ में दी गई थी
कृषि-विकास जैसी अति महत्त्वपूर्ण बातों के संदर्भ में लिये गए निर्णय भी संबंधित अधिकारी तक पहुँचने में कम से कम एक वर्ष का समय लग जाता है
इस समिति में खण्ड विकास अधिकारी , विस्तरण अधिकारी ( कृषि एवं पशुपालन ) और तीन अनुभवी कृषिकारों को भी सदस्य पद पर नियुक्त करने के लिए सूचित किया गया
इसके छह महीनों के बाद जिलाधीशों को सूचित किया गया कि अपने जिलों में जिसका नाप न किया गया हो ऐसी नहीं जोती गई भूमि के संदर्भ में अपनी टिप्पणियाँ भेजी जाएँ
दिसम्बर ६३ में सरकारी स्तर पर यह प्रश्न उठाया गया कि जिसे नापा न गया हो और जोती न गई हो ऐसी भूमि की सूची सरकार द्वारा क्यों तैयार की जानी चाहिए ? क्यों कि यह कार्य बहुत बृहद है
दिसम्बर ६३ में सरकारी स्तर पर यह प्रश्न उठाया गया कि जिसे नापा न गया हो और जोती न गई हो ऐसी भूमि की सूची सरकार द्वारा क्यों तैयार की जानी चाहिए ? क्यों कि यह कार्य बहुत बृहद है
इतना ही नहीं इसकी क्या आवश्यकता है ? इसके पश्चात् जिन दो जिलों ने इसकी जानकारी नहीं भेजी थी उन्हें बता दिया गया कि अब उन्हें भेजने की आवश्यकता नहीं है
इस तरह १००० पृष्ठों की फाईल पर किसी प्रकार की कारवाई न करने की घोषणा कर दी गई
कन्याकुमारी और अन्य विशेष क्षेत्रों के लिए नियम कन्याकुमारी जिले के ९ पंचायत संघ और ४६ पंचायतें तथा तिरूनेलवेली जिले में अवस्थित शेनकोटा पंचायत संघ एवं येरकाड पंचायत संघ अपने स्वयं के ही बने नियमाधीन ढाँचे में कार्यरत हैं
इसके उपरांत तिरूनेलवेली जिले के कई पंचायत संघ और नीलगिरि जिले के कुछ संघ तथा पंचायतें सामान्य नियमों से हटकर अपनी कारवाई करते हैं
कन्याकुमारी और अन्य विशेष क्षेत्रों के लिए नियम कन्याकुमारी जिले के ९ पंचायत संघ और ४६ पंचायतें तथा तिरूनेलवेली जिले में अवस्थित शेनकोटा पंचायत संघ एवं येरकाड पंचायत संघ अपने स्वयं के ही बने नियमाधीन ढाँचे में कार्यरत हैं
इतना ही नहीं उसमें कई जातियाँ निवास करती हैं
सम्भवत: इसी कारण से इन दोनों जिलों का पंचायत प्रशासन अन्य जिलों से भिन्न प्रतीत होता है
अन्य उल्लेखनीय बात यह है कि तंजावुर , रामनाथपुरम् , कोयम्बतूर और उत्तरी आर्कोट जिलों में स्थित पंचायत संघ और पंचायतों के सम्बन्ध में पूर्ण रूप में शोधकार्य नहीं हुआ है इसलिए उन पंचायतों और पंचायत संघों के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक पक्षों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं किया गया है
कन्याकुमारी जिला और शेनकोटा पंचायत संघ ये दोनों विलम्ब से सन् १९५६ में मद्रास राज्य के अंग बने
इससे पूर्व कन्याकुमारी जिला केरल के साथ जुडा हुआ था
आश्चर्य इस बात का है कि कानूनी ढाँचे में कन्याकुमारी जिले की सभी पंचायतों को नगर पंचायतों के रूप में दर्शाया है परंतु उसमें कई नगरपंचायतों की जनसंख्या केवल ५००० ही है
यह भी स्वीकार करना पडेगा कि मद्रास राज्य की अन्य किसी पंचायत से इस जिले की नगर पंचायतें क्षेत्र एवं जनसंख्या की दृष्टि से बडी हैं
सबसे अधिक जनसंख्या कोलाचल में है ( ३४ , ९६५ ) 
सबसे अधिक जनसंख्या कोलाचल में है ( ३४ , ९६५ ) 
प्रत्येक कस्बे में २० से ३० कस्बों को संलग्न किया गया है
ऐसा होने से उन सभी सदस्यों को अपनी पंचायत परिषद समिति के उपरांत पंचायत संघ की परिषद में भी विचारविमर्श करने का अवसर मिलता है
 ( प्रत्येक संघ में ऐसे कुल मिलाकर ५७-६० सदस्य ही होते हैं
दूसरी बात , प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा तथा विद्यालयों के संचालन के साथ मध्याह्न भोजन परियोजना कन्याकुमारी जिले में स्थित पंचायत या पंचायत संघ के कार्यक्षेत्र में नहीं आती है
यहाँ सरकारी विद्यालय ही अधिक हैं और ऐसे विद्यालय का संचालन सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा ही होता है
उन्हें इस नियम का लाभ नहीं मिलता है
जिस प्रकार , अगस्तीश्वरम् पंचायत संघ के १९६४-६५ के बजट में २ , ८८ , २७१ की आय की तुलना में लगभग रू . २ , ९४ , ९९४ के व्यय का अनुमान रखा गया था
उन्हें इस नियम का लाभ नहीं मिलता है
जब कि अन्य पंचायत संघों के बजट लगभग रु . ६ से ८ लाख तक होते हैं
तीसरी बात , कन्याकुमारी जिले के ( और नीलगिरि जिले के भी ) पंचायत संघों को आर्थिक दृष्टि से ( वर्ग 'घ' में रखा गया है
इसे लेकर उन्हें स्थानीय अधिभार के अनुरूप अनुदान भी अधिक प्राप्त होता है
कन्याकुमारी पंचायत संघों की समितियों की बैठकों में उत्साह रहता है
अधिकांश पंचायतों के पास अपने भवन होते है
उनके बजट बडे होते हैं
१९६४-६५ में प्रत्येक के बजट औसतन लगभग १ लाख के थे
इसमें प्रति व्यक्ति आय रु . ४ से ७ के मध्य थी
उनका वार्षिक संचालन व्यय औसतन लगभग रु . १० , ०००/- था
इससे पूर्व हमने देखा था कि वास्तव में मध्याह्न भोजन परियोजना का दायित्व राज्य के शिक्षा विभाग का है
पंचायत संघों की ओर से दी जा रही राशि के संदर्भ में निरीक्षण करने से ज्ञात हुआ कि १९६४-६५ की समयावधि में पंचायतों ने इस परियोजना में लगभग रु . १०२० से रु . ५१७६ का योगदान संबंधित क्षेत्र विद्यालयों को दिया है
कन्याकुमारी जिले के अधिकांश पंचायत संघों में सरकार ने ग्रामसेवकों के लिए आवास का प्रबंध कर दिया है
ग्राम सेवक को अपने आवास में कृषि विषयक उपकरण , अन्य सामान एवं औजारों के लिए एक खण्ड भी अलग रखना पड़ता था
इसलिए ऐसे आवास असुरक्षित एवं अनुपयोगी भी बने रहते हैं
ये आवास छोटे तो होते ही हैं , परन्तु उसमें कृषि औजार एवं उपकरण के लिए कक्ष अलग रखना पड़ता है इसलिए यह सुविधा इतनी निरर्थक बन जाती है कि ग्रामसेवकों को अपना व्यक्तिगत आवास अलग से रखना पड़ता है
कन्याकुमारी जिले के संघ इस समय क्या कर रहे हैं और भविष्य में क्या करनेवाले हैं , उनके द्वारा वे अपने जिले में सामाजिक , आर्थिक , विद्याकीय एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में क्या प्रदान करना चाहते हैं इसका अध्ययन मद्रास राज्य के अन्य संघों के लिए और समग्र देश के संघों के लिए भी प्रोत्साहक होगा
इस समय कन्याकुमारी जिले में उपलब्ध शिक्षा का उच्च स्तर , जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि एवं कृषिविषयक भूमि का अन्य नगरों के साथ समायोजन अन्य पंचायत संघों के लिए अनुकरणीय बना हुआ है
इतना ही नही , सडकें , पुल , सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश की व्यवस्था , सार्वजनिक भवन , कुँए , तालाब , नालियाँ जैसी सुविधाओं की देखभाल के पीछे हर वर्ष व्यय बढ़ता रहेगा
इतना ही नहीं पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में तो प्रतिस्पर्धा सर्वथा नहीं थी
शेष ११ जिलों के १२ , ०२७ पंचायत अध्यक्षों में से ७७५३ ( ६४ . ०२ प्रतिशत ) निर्विरोध निर्वाचित हुए थे
जब कि पंचायत के सदस्यों के चुनाव में बहुत स्पर्धा देखी गई थी
सारिणी १७ और १८ में पंचायत चुनाव का विस्तृत एवं प्रत्येक जिले का चित्र दर्शाया गया है
मद्रास राज्य में पंचायत विकास का प्रबंधकीय ढाँचा ( अ ) राज्य के स्तर पर 'राज्य के स्तर पर पंचायत विकास' सचिवालय के ग्रामीण विकास एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा चलता है
स्थानीय , प्रबंधक मंत्री 'समाज विकास एवं पंचायत विकास' का कार्यभार संभालता है
इस प्रकार अधिक विकास आयुक्त ( एडीशनल डेवलपमेन्ट कमिशनर ) विभागीय पदाधिकारी और अधिक सचिव ( एडीशनल सेक्रेटरी ) के पद पर सचिवालय में सचिव का कार्यभार भी संभालते हैं
अन्य उपसचिवों में , उपसचिव प्रशासन एवं नगरपालिका प्रशासन , और उपसचिव ( विशेष ) पंचायत संबंधित नियम , कानून एवं विधेयकों का कार्यभार संभालते हैं
मद्रास राज्य में पंचायत विकास का प्रबंधकीय ढाँचा ( अ ) राज्य के स्तर पर 'राज्य के स्तर पर पंचायत विकास' सचिवालय के ग्रामीण विकास एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा चलता है
प्रत्येक विभाग को 'विकास जिला' कहा जाता है
यह समिति विकास परियोजना को कार्यान्वित करने का दायित्व निभाती है
जिला समाहर्ता ( पंचायत विकास ) के निजी सहायक के रूप में , जिला विकास समिति के सचिव पदभार संभालते हैं
ऐसे प्रत्येक 'विकास जिले' के लिए 'जिला विकास समिति' रहती है
खण्ड स्तर पर प्रत्येक विकास खण्ड में ६५ से ६० हजार की जनसंख्या को समाविष्ट कर लिया जाता है
मद्रास पंचायत कानून १९५७ में लागू किया गया
इसके पश्चात् ब्लोक ( खण्ड ) में पंचायत संघ की स्थापना की गई
खण्ड विकास अधिकारी पंचायत संघ के आयुक्त एवं खण्ड विकास अधिकारी का दोहरा दायित्व निभाते हैं
१२ . उदाहरण स्वरूप कतिपय पंचायतों का सर्वेक्षण पंचायतों के गहन अध्ययन के लिए , तंजादुर , रामनाथपुरम् , कोयम्बतुर और उत्तरी आर्कोट जिलों का चयन किया गया था
ऐसा यह अध्ययन तीन रूपों से करना था
 ( १ ) विभिन्न ग्रामीण व्यक्तियों , निर्वाचित सदस्यों एवं अधिकारियों के साक्षात्कार द्वारा ( २ ) प्रशिक्षित संशोधकों के द्वारा इन पंचायतों की कारवाई का छह महीने तक निरीक्षण करते हुए और; ( ३ ) इन संस्थाओं के कार्यालयों में ( पंजीकृत दस्तावेज ) अध्ययन के द्वारा
दूसरी बात , स्थल पर प्राप्त हुए अभिलेख तुलना में असंबद्ध थे
वैसे समूची कार्ययोजना जिस उद्देश्य के साथ आरम्भ की गई थी उस उद्देश्य में कई काणरों से सफलता संभव नहीं हो पाई थी
वैसे समूची कार्ययोजना जिस उद्देश्य के साथ आरम्भ की गई थी उस उद्देश्य में कई काणरों से सफलता संभव नहीं हो पाई थी
इस बारह में से प्रत्येक संघ में आई हुई तीन-तीन ग्राम पंचायतों का असंबद्ध रूप से चयन किया गया था , जिनमें से पाँच पंचायतें थीं
इन ३६ पंचायतों में से , प्रति पंचायत उनकी सूचियों में पंजीकृत किये गये २० व्यक्तियों का चयन साक्षात्कार के लिए किया गया था
इस प्रकार कुल मिलाकर ७२० व्यक्तियों का चयन किया गया था
 ( इनमें से १०० व्यक्तियों का चयन नगर पंचायतों में से किया गया था
इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग २७२ निर्वाचित सदस्यों के एक अन्य प्रश्नोत्तरी के अनुसार साक्षात्कार किये गये थे
जिसमें २६८ अधिकारियों के अलावा ३६ पंचायतों में से प्रत्येक ३ अधिकारी , १२ पंचायती संघोमें से प्रत्येक से १० और शेष ३८ अधिकारियों के साक्षात्कार जिला स्तर पर किये गये थे
इन जिलास्तरीय अधिकारियों में पाँच जिला समाहर्ता का समावेश होता है
इन साक्षात्कारों को पहले लगभग विभिन्न सारिणियों में समाहित किया गया था और बाद में उन्हें लगभग १३० शीर्षकों में वर्गीकृत किया गया
इन साक्षात्कारों को पहले लगभग विभिन्न सारिणियों में समाहित किया गया था और बाद में उन्हें लगभग १३० शीर्षकों में वर्गीकृत किया गया
इस साक्षात्कार में उत्तर देनेवाले अधिकारी एवं निर्वाचित सदस्यों में अधिकांश पुरुष ही थे , जब कि ग्रामीण स्तर पर लगभग ( ७१७ में से २५३ ) महिलाओं के भी साक्षात्कार किये गये थे
यद्यपि , इस बात को स्वीकार करना पडेगा कि ग्रीण स्तर पर साक्षात्कार देनेवालों में से लगभग ४० से ५० प्रतिशत गाँव के लोगों ने या तो उत्तर ही नहीं दिये थे , या उत्तर देने से दूर रहे थे
प्रत्येक उत्तर देनेवालों को ग्रामपंचयात के अस्तित्व के बारे में जानकारी थी ही
अन्य एक ध्यानाकर्षित करने योग्य बात - इन संस्थाओं के साथ जुडे हुए किसी के मन में कोई बडा विवाद या अशांति या अधिकआशा - आकांक्षाओं के दर्शन नहीं हुए थे
अन्य एक बात देखने को मिली कि नगरों में निवास करनेवाले अधिकारी और ग्रामीण लोगों के मंतव्यों के बीच कुछ विसंगति पाई गई थी
इससे विपरीत नगरों में निवास करते अधिकारी एवं पंचायती संघों के अध्यक्षों का कहना था कि गाँव के लोग विशेषकर पंचायतों के चुनाव के संदर्भ में ही अधिक उत्तेजित होते हैं
इसके अलावा प्रत्येक पंचायत के द्वारा लागू किया जानेवाला निवासकर भी उनकी आय का प्रमुख साधन है
भारी बाहन-कर आय का बहुत छोटा साधन है
इसके अलावा प्रत्येक पंचायत के द्वारा लागू किया जानेवाला निवासकर भी उनकी आय का प्रमुख साधन है
इसके उपरांत इसमें भी आय-व्यय की टिप्पणी की दृष्टि से भिन्न भिन्न पद्धति अपनाई हुई प्रतीत होती है
हम जिस दृष्टांत स्वरूप पंचायतों का सर्वेक्षण कर रहे हैं उसमें अन्य पंचायतों ने विकास कर लागू किया हो यह यह जानकारी प्राप्त नहीं होती है
इसके उपरांत इसमें भी आय-व्यय की टिप्पणी की दृष्टि से भिन्न भिन्न पद्धति अपनाई हुई प्रतीत होती है
स्टेशनरी के लिए अधिक खर्च होता है
वह खर्च कभी-कभी रु . १०० से २०० का देखा जाता है
स्टेशनरी के अलावा प्रकाश के प्रबंध के लिए भी पर्याप्त व्यय होता है
जब कि कुछ पंचायतें मध्याहन भोजन के लिए भी समुचित योगदान देती थी
यद्यपि यह खर्च १९६२-६३ और १९६३-६४ में तो पंचायतों की कुल आय का २५ प्रतिशत ही होता था
इसी प्रकार विद्यालय के भवन एवं सार्वजनिक केन्द्रों के निर्माण में भी समुचित खर्च होता था
वृक्षारोपण के लिए भी पंचायतों की ओर से महत्त्वपूर्ण व्यय होता था
उद्यानों पर प्रत्येक पंचायत का व्यय भिन्न-भिन्न था
विभिन्न ग्राम पंचायत की बैठकें भी भिन्न-भिन्न समय पर आयोजित होती थीं
कुछ पंचायतों की बैठक प्रति माह आयोजित होती थी और कुछ पंचायतों की बार बार , जबकि कुछ की वर्ष में केवल चार पाँच बार ही आयोजित होती थी
उनकी कार्यवाही अध्यक्ष के निवास पर ही चलती थी
सामान्यरूप से पंचायतों की प्रत्येक बैठक में कार्यसूची में तीन से पाँच विषय विचारार्थ रहते हैं जिन में से लेखा पारित करनेवाले और पूर्व-बैठक की कार्यवाही पारित करनेवाले विषय अवश्य रहते हैं
सामान्यरूप से पंचायतों की प्रत्येक बैठक में कार्यसूची में तीन से पाँच विषय विचारार्थ रहते हैं जिन में से लेखा पारित करनेवाले और पूर्व-बैठक की कार्यवाही पारित करनेवाले विषय अवश्य रहते हैं
लगभग किसी भी पंचायत के पास निजी भवन नहीं था
इन बैठकों में पंचायत के सदस्यों की उपस्थिति अपेक्षाकृत बहुत अच्छी पाई जाती है
जिन पंचायतों में एकाध ही महिला सदस्य है तो उनकी उपस्थिति बहुत कम पाई जाती है
लगभग किसी भी पंचायत के पास निजी भवन नहीं था
परन्तु कार्यसूची के सूचनापत्र पर ही संबंधित बैठक के विषय में जानकारी दी जाती है
पोलाची ग्राम पंचायत संघ को छोड़ अन्य संघों में सामान्यरूप से उच्च प्राथमिक विद्यालयों में जानेवाले बच्चों की संख्या लगभग ८ , ००० से १० , ००० है
इनमें लडकों की संख्या ५५ से ६५ प्रतिशत जब कि लडकियों की संख्या ३५ से ४५ प्रतिशत रहती है
पोलाची को छोड़ अन्य पंचायत संघों में लगभग २५० से ३०० अध्यापक हैं
जिनमें २५-३० महिला अध्यापिकाएँ हैं
इन बारह संघों में तिरुवायर , नीडमंगलम् , मुथुपेट , साक्कोताई , तिरुपुवनम् एवं पोलाची संघों में रेलवे स्टेशन भी है जब कि वेल्लाकोइल , कांदीली , वांदीवाश और चेयार राज्य के परिवहन एवं राजमार्गों पर है
केवल दो ही संघ , राजसिंगमंगलम् और मोडककुरिची ऐसे हैं जो परिवहन सेवा के साथ जुड़े हुए अवश्य हैं परन्तु उधर सरलता से पहुँच पाना कठिन है
राजसिंगमंगलम् क्षेत्र में तो पेट्रोल पंप भी नहीं है इसलिए जीप में पेट्रोल भरवाने के लिए लगभग २० कि . मी . दूर जाना पड़ता है
राजसिंगमंगलम् क्षेत्र में तो पेट्रोल पंप भी नहीं है इसलिए जीप में पेट्रोल भरवाने के लिए लगभग २० कि . मी . दूर जाना पड़ता है
इसी कारण से ऐसी सभाएँ दो से तीन घण्टे चलती है
तीन वैधानिक समितियाँ , नियुक्ति समिति , ऋण देय समिति और सामान्य विषयों के लिये बनी समिति के अतिरिक्त पंचायत संघों को ( १ ) महिला कल्याण समिति , ( २ ) हरिजन कल्याण समिति ( ३ ) अस्थायी विद्यालय परामर्शक समिति ( ४ ) खण्डस्तरीय समिति का गठन करने के लिए भी सूचित किया गया था
प्रसार अधिकारी ( शिक्षा ) और विद्यालय के उपनिरीक्षक उसके सदस्य होते हैं
इस गहन अध्ययन के लिए चयनित १२ संघों की वैधानिक समितियों के आवर्तन सारिणी-४४ में दर्शाए गये हैं
पंचायत संघों के प्रमुख कार्यवाहक पंचायत संघ के आयुक्त रहते हैं
केन्द्र के समाज विकास मंत्रालय और समाज विकास निगम द्वारा की गई पूछताछ के प्रत्युत्तर में तमिलनाडु सरकार ने परिषद के साथ आयुक्त के संबंधों के विषय में बताया था कि आयुक्त की नियमित कार्यवाही और मद्रास पंचायती कानून के तहत उन्हें सौंपी गई विशेष कार्यवाही को निभाने में पंचायत संघ परिषद को मार्गदर्शन करने का अधिकार आयुक्त को है और परिषद को उचित प्रतीत होता है उस रूप में आयुक्त अपनी सत्ता का उपभोग कर सकेंगे
कृषि ऋण कानून एवं भूमिसुधार ऋण कानून के तहत कृषकों को विभिन्न परियोजनाओं के द्वारा दिये जा रहे ऋण एवं व्यवसाय के लिए ऑयल एन्जिन , नई कुँआ राहत परियोजनाएँ , उत्पादन के लिए सघन परियोजना एवं कृषि औजारों के लिए ऋण जैसी परियोजनाओं के लिए पंचायत के अधिकार में विशेष नियम भी रहते हैं
संघ परिषद के अध्यक्ष एक दिनके अंतराल में आयोजित होनेवाली ऐसी बैठकों में अध्यक्षपद पर रहते हैं
पंचायत संघ के कार्यक्रम और कार्यवाही का सर्वेक्षण करने के लिए प्रति माह एक बैठक का आयोजन होता है , जिसके अध्यक्षपद पर विभागीय अधिकारी रहते हैं
पंचायत संघ के अध्यक्ष एवं राजस्व विभागीय अधिकारी जिला विकास परिषद के सदस्य होते हैं अत: परिषद की बैठक के पूर्व वे आपस में मिलते हैं
पंचायतों की कार्यवाही का नियम वैधानिक कानूनी कारवाई के संदर्भ में दी गई सूचनाओं और सरकार द्वारा दी गई धनराशि द्वारा होता है
वहाँ लगभग प्रतिदिन अस्सी या उससे अधिक डाक आती है और लगभग उतनी ही डाक के प्रत्युत्तर दिये जाते हैं
क्योंकि , नये कर्मचारी की नियुक्ति होकर वह कार्यभार संभालता है तब तक और अपने दायित्व की जानकारी प्राप्त कर लेता है तब तक कई बार कार्यक्रम ही स्थगित हो जाते हैं
इसका उदाहरण उत्तर आर्कोट जिले के समाहर्ता द्वारा १९६३ में दिया गया विवरण है जिस के अनुसार इन पंचायत संघों में अप्रैल १९६२ से विस्तार अधिकारी ( सहयोग ) , विस्तार अधिकारी ( शिक्षा ) , प्रमुख सेविका , खाद सुधार निरीक्षक दो सहयोगकर्ता , एक समाजकल्याण कार्यकर्ता , तीन ग्रामसेवक वर्ग-१ और दो ग्रामसेविकाओं के पद रिक्त थे
सारिणी-४८ में जिन पंचायत संघों से जानकारी प्राप्त हुई है , उन में स्थानांतरण की जानकारी दर्शाई गई है
समाज विकास एवं राष्ट्रीय विस्तार कर्मचारीगण के ( जिनको केन्द्रीय बजट में समाविष्ट नहीं किया जाता है ) बारहों संघों के १९६३-६४ के दौरान हुए व्यय की जानकारी सारिणी ४९ में दी गई है
उसमें देखा जा सकता है कि साक्कोताई , वेल्लाकोइल एवं कांदिली में वह व्यय ६ लाख से कम था , जब कि तिरुवायरु में वह ९ लाख से भी अधिक था
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अध्यापकों का वेतन प्रति माह किसी निश्चित तिथि को नहीं दिया जाता है
कार्यक्रम सडकों का निर्माण , पेय जल की परियोजनाएँ और विद्यालय के भवन , नई सडकों का निर्माण किस स्थान पर कितना करना , पेयजल की सुविधाएँ किस तरह पहुँचाना , और विद्यालयों के नये भवनों के निर्माण आदि के लिए पंचायत संघ स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं
क्योंकि इस समय ऐसी स्थिति का निर्माण हुआ है कि पडौस की ग्रामपंचायत की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण अन्य ग्रामपंचायत अधिक योगदान देना ही नहीं चाहती
इसी कारण पंचायत संघों के वित्तीय वर्गीकरण को अधिक तर्कशुद्ध तरीके से कार्यान्वित करने की आवश्यकता रहती है
एक और महत्त्वपूर्ण बात , पंचायत संघों के द्वारा विभिन्न पंचायतों को ( प्रति व्यक्ति ) दी जानेवाली राशि न्यायिक एवं समान होती है
प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में पंचायतों का सबसे बड़ा दायित्व अध्यापकों को वेतन देने का रहा है
एक और महत्त्वपूर्ण बात , पंचायत संघों के द्वारा विभिन्न पंचायतों को ( प्रति व्यक्ति ) दी जानेवाली राशि न्यायिक एवं समान होती है
कहा जा सकता है कि पंचायत संघों का सबसे अधिक कार्य स्थानांतरण का है
सारिणी-५१ में , जिन पंचायतों से जानकारी प्राप्त हुई है उन के अध्यापकों के निश्चित समयावधि में हुए स्थानांतरण के विषय में जानकारी दी गई है
यद्यपि जिन्हें सरकार से वेतन प्राप्त है ऐसे पंचायत कर्मचारियों के स्थानांतरण की मात्रा सीमित रहती है
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मूलत: राज्य के कृषिविभाग से आयुक्त की नियुक्ति होने से वे पंचायत संघ और कृषिविभाग के बीच सुचारू रूप से सेतु बन सकते हैं
महत्त्वपूर्ण हरी खाद की परियोजना के पीछे जानबूझकर व्यय कम किया गया है , क्योंकि , यह बडा कठिन कार्य है
ग्रामोद्योग ग्रामोद्योग की कार्यवाई के संबंध में नीचे दिये गये अनुच्छेद , चयनित इन १२ संघों के अलावा तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी जिलों के कुछ क्षेत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है
अधिकांश पंचायत संघों ने अपनी औद्योगिक इकाइयों को अपेक्षाकृत विलम्ब से आरम्भ किया था
इसके अतिरिक्त संघों के द्वारा कुछ परियोजनाएँ चलाई जाती हैं और मद्रास खादी एवं ग्रामोद्योग संघ भी कुछ परियोजनाएँ चलाता है
पंचायत संघों के द्वारा कार्यान्वित किये जाने वाले कार्यक्रमों से लाभान्वित होनेवालों की संख्या बहुत सीमित है
जैसे कि सिलाईकला की एक इकाई दो-तीन वर्षों में ३० से ४० महिलाओं को प्रशिक्षित करती है
इसके उपरांत , यह प्रशिक्षण केन्द्र छोड जाने के पश्चात् महिलाएँ उनके द्वारा लिए गए प्रशिक्षण का कितना लाभ उठा पाई हैं इसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई अनुवर्ती कार्यक्रम भी नहीं है
सिलाई एवं कशीदेकारी के इन प्रशिक्षण-केन्द्रों को अधिक स्वतंत्रता और सुविधाएँ प्रदान की जाएँ तो ये प्रशिक्षार्थीयों और प्रशिक्षक के बीच पारस्परिक शिक्षा एवं विचारों के आदान प्रदान के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन सकते हैं
इसी प्रकार बढई एवं लुहारी काम के लिए २० से ३० युवकों को प्रशिक्षण दिया जाता है परन्तु उनके लिए रोजगारी के अवसर अत्यन्त सीमित होते हैं
इस समय अधिकांश केन्द्र , पंचायत संघों के कार्यालय एवं पंचायतों के द्वारा चलाए जा रहे विद्यालय आदि संस्थाओं के लिए उपस्कर बनाते हैं
कुछ सहकारी संस्थाओं को सुचारु ढंग से चलाने के लिए कार्यालय होते हैं
ऐसा होते हुए भी इन संस्थाओं के सदस्यों में या प्रशिक्षार्थियों में अपनेपन की भावना का विकास नहीं हो पाया है
ये केन्द्र कारीगरों के सहायता अवश्य करते हैं , परन्तु इसके पश्चात् वे कारीगर वैयक्तिक रूप से तो उनके दृष्टिपथ से दूर हो जाते हैं
इसके पीछे प्रमुख उद्देश्य तो ग्रामोद्योग द्वारा बडी संख्या में लोगों को सार्थक रोजगारी प्रदान करने का था
संक्षेप में , कारण कोई भी हो , पंचायत संघ ग्रामोद्योग में अधिक रुचि नहीं रखते हैं या उस संदर्भ में नेतृत्व लेकर आरंभ भी नही करते हैं
इसका प्रमुख कारण यह है कि उनकी यह मान्यता रही है कि उन्हें निश्चित परियोजना में दर्शाए गये दायित्व से अधिक कुछ करने की आवश्यकता नही है
परन्तु तकनीकी या निरीक्षण विभाग के सत्ताधीश उसके प्रति हीनभावना से देखते हैं
तेल के देशी कोल्हू के संदर्भ में भी सरकार का एक नियम ऐसा है कि अगर कोल्हू की सहकारी संस्थाएँ निर्धारित संख्या से ( बीस से अधिक ) कर्मचारी रखती हैं तो उन्हें बिक्रीकर देना पडता है
यथा , महिलाएँ और बच्चों के लिए कल्याणकारी परियोजनाएँ , सामाजिक शिक्षा एवं ग्रामीण रुग्णालय तथा प्रसूतिकेन्द्र , इसके लिए सरकारी अनुदानों से प्रति वर्ष रू . १ , ०००/- या रु . ५ , ०००/- तक की राशि भी दी जाती है
यथा , महिलाएँ और बच्चों के लिए कल्याणकारी परियोजनाएँ , सामाजिक शिक्षा एवं ग्रामीण रुग्णालय तथा प्रसूतिकेन्द्र , इसके लिए सरकारी अनुदानों से प्रति वर्ष रू . १ , ०००/- या रु . ५ , ०००/- तक की राशि भी दी जाती है
इसका एक कारण यह रहता है कि उनके पास फुटकर या निश्चित किये गये कार्यों को छोड धन का प्रबंध नहीं होता है जब कि उधर किसी निश्चित कार्य के लिए व्यय के संदर्भ में सरकार की ओर से घोषित विशेष सूचनाओं का पालन अनिवार्य होता है
जिला विकास परिषद पंचायतों के सघन अध्ययन के लिए चयनित पंचायत संघों से पूर्व रामनाथपुरम् के एक ही विकास जिले से चयन किये गये संघों से तीन पंचायते हैं
सामान्य रूप से इस परिषद की बैठक प्रति दो मास आयोजित होती है और उसके अध्यक्ष पद पर जिलाधीश रहते हैं
सामान्य रूप से इस परिषद की बैठक प्रति दो मास आयोजित होती है और उसके अध्यक्ष पद पर जिलाधीश रहते हैं