गांधीजी ९ जनवरी , १९१५ को अपने दक्षिण अफ्रिका प्रवास से वापस देश लौटे
पर तीन दिन में ही गांधीजी और कस्तूरबा इस सबसे ऊब गए
लोगों को शायद ऐसा आभास होता रहा कि उनके कष्टों का निवारण करने के लिए , पृथ्वी का बोझ घटाने के लिए , और जीवन को फिर से सन्तुलित करने के लिए , एक अवतार पुरुष उनके बीच उपस्थित है
गांधीजी के प्रयासों से भारतीय सभ्यता की दासता का दु:ख बहुत कुछ कट ही गया
जेसुइट प्रकार के कुछ ईसाई पंथ के विद्वत्ता की कक्षा अनुसार , ये लोग अपने अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे
भारत के जो साधारण लोग हैं , जिनकी अवस्था को देखकर हम दु:खी होते रहते हैं , और जिनकी भलाई के नाम पर यह सब ताम झाम चलता है , उनकी तो यह सदी नहीं है
देश अपनी अस्मिता के हिसाब से , अपने मानस , चित्त व काल के अनुरूप चलने लगेगा तो हो सकता है इनमें से भी बहुतेरे फिर अपने सहज चित- मानस में लौट आएं
भारतीय मानस को समझने के लिए अपने प्राचीन साहित्य को तो समझना ही पडेगा
अनेक भारतीय विद्या संस्थान विशेष तौर पर भारतीय ग्रन्थों को देखने- समझने के लिए बने हैं , और अनेक ऊंचे विद्वान लम्बे समय से इस काम में लगे हैं
यहां की नीति को , रीति-रिवाजों को , धर्मशास्त्रों को , आयुर्वेद , ज्योतिष और शिल्प जैसी विद्याओं और विधाओं को , इन सबको समझने के प्रयास पश्चिमी विद्वान करते रहे हैं
पश्चिम व विशेषत: लन्दन के उस समय के विद्या संस्थानों के अनुरूप ही भारत के इन नए विद्या संस्थानों का गठन किया गया था , और वहीं की विद्या धाराओं से किसी प्रकार अपनी विद्याओं को जोड़ना ही शायद इनका प्रयोजन था
पर यह तो साफ है कि एंथ्रोपोलोजी के माध्यम से अपने ही समाज का अध्ययन नहीं हुआ करता , न पराजित और खंडित समाजों के विद्वान इस विद्या को उलटा कर विजेता समाजों का अध्ययन करने के लिए इसे बरत सकते हैं
पर भारतीय विद्वान भारतीय सभ्यता पर ही एंथ्रोपोलोजी कर रहे हैं
इसलिए इन सब अनुवादों और संस्करणों आदि से भारतीयता की समझ के प्रखर होने की बजाय आधुनिकता के हिसाब से भारतीय साहित्य का एक भाष्य-सा बनता चला गया है
पर हमें अपनी दृष्टि से अपने को और विश्व को देखने की एक दिशा तो मिल जाएगी , अपना कोई धरातल तो होगा
पर हम क्योंकि अपने मानस व काल की समझ खो बैठे हैं , अपनी परम्परा के साथ जुड़े रहने की कला भूल गए हैं , इसलिए ऐसे सभी प्रश्न हमारे लिए सतत खुले पड़े हैं
पर अपने भद्र समाज में तो हर स्थान पर हर सन्दर्भ में विस्मृति और भ्रान्ति जैसी स्थिति बनी हुई है
और शृंगेरी आचार्य शायद भूल गए थे कि वे किसी राज्य के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं
श्री पुरुषोत्तम दास टंडन देश के बहुत बड़े और विद्वान नेता थे
अपने पड़ोस के मोची को छोडकर बाटा वालों से रबड़ का जूता बनवाने की बात तो अहिंसा और स्वदेशी वाली इस जीवनदृष्टि के न तत्त्व बोध से मेल खाएगी , न सौंदर्य बोध से ही
शायद पांच-सात साल में उसे बदलना पड़ेगा
ये सब तो व्यक्ति के अपने उपक्रम हैं , परमात्मा के दिए सनातन सत्य जैसे तो वे नहीं हो सकते
वैसे हर सभ्यता की सृष्टि की अपनी एक गाथा होती है , और वह गाथा शायद उस सभ्यता की मूल वृत्तियों को बहुत गहराई से प्रभावित किया करती है
सृष्टि का प्रत्येक आवर्तन कृत युग से आरम्भ होता है
पौराणिक गणना के अनुसार कृत का काल १७ , २८ , ००० बरस का है
पर समय के साथ सृष्टि जटिल होती चली जाती है
कृत में धर्म चार पांवों पर स्थिरता से टिका था
त्रेता का एक वेद अब चार में विभाजित हो जाता है और फिर इन चार की भी अनेक शाखाएं बन जाती हैं
कुछ लोग तो द्वापर का प्रारम्भ श्रीराम के अयोध्या के राजसिंहासन पर बैठने के समय से ही मानते हैं
पर द्वापर के राजा लोग तो क्षत्रियोचित आवेश में ही लिप्त हैं
सृष्टि के अनादि अनन्त प्रवाह में मानव और उसके प्रयत्नों की नितान्त क्षुद्रता का भारतीय भाव आधुनिकता से मेल नहीं खाता
किसी भी विश्व व काल दृष्टि का व्यावहारिक पक्ष तो समय सापेक्ष होता है
भारतीय ऋषि-मुनि इत्यादि विभिन्न सन्दर्भों में भारतीय विश्व व काल दृष्टि की विभिन्न व्याख्याएं करते ही रहे हैं
इसके विपरीत जो विद्याएं इस सृष्टि के भीतर रहते हुए दैनन्दिन समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाती हैं , साधारण जीवन-यापन को सम्भव बनाती हैं , वे अपरा विद्याएं हैं और ऐसा माना जाता है कि परा विद्या अपरा विद्याओं से ऊंची है
त्रेता के अन्त और द्वापर के आरम्भ में जब सृष्टि की बढ़ती जटिलता के साथ साथ अनेकानेक कलाकौशलों और विद्या-विधाओं की आवश्यकता पड़ने लगी , उस समय शायद परा-अपरा के इस विभाजन की बात उठी होगी
फिर व्याकरण जैसी विद्याएं तो परा और अपरा दोनों से ही सम्बन्ध रखती हैं
अपरा विद्याएं सब निकृष्ट ही हैं और वास्तविक ज्ञान तो परा ज्ञान ही है ऐसा कुछ भाव भी भारतीय चित्त में बना रहता है
अपरा का सर्वदा परा के आलोक में नियमन करते रहना चाहिए
परा के जो जितना नजदीक है उतना वह ऊँचा है , और जो अपरा से जितनी गहराई से जुड़ा है , उतना वह नीचा है , इसलिए वेदाध्ययन , वेदपाठ आदि करने वाले ब्राह्मण सबसे ऊँचे हो गए , और सामान्य जीवन के लिए आवश्यक विभिन्न विद्याओं , कलाओं और शिल्पों का वहन करने वाले शूद्र सबसे नीचे
पुराणों की व्याख्या से तो ऐसा लगता है कि आरम्भ में सब एक ही वर्ण थे , बाद में काल के अनुसार जैसे जैसे विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की आवश्यकता होती गई , वैसे वैसे वर्ण विभाजित होते गए
जैसे परा अपरा की बात के साथ जोड़ कर , पुराणकारों के समय से ही हमने वर्णों में ऊंच-नीच का विचार बना लिया है , वैसे ही कर्मों में भी ऊँच-नीच की बात आ गई है
कर्म और कर्मफल के इस मौलिक सिद्धांत का इस विचार से तो कोई सम्बन्ध नहीं कि कुछ कर्म अपने आप में निकृष्ट होते हैं और कुछ प्रकार के काम उत्तम
उन कामों में ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें स्वभाव से ही निकृष्ट बनाता हो
वे जानना चाहते हैं कि यह सब क्या है ? गृहिणी उन्हें एक कसाई का नाम बताती है और कहती है कि इस विषय का भेद तो उन्हें वह कसाई ही बता सकता है
और आपकी तपस्या तो तभी नष्ट हो गई थी जब उस चिड़िया पर रुष्ट हुए थे
मद्रास के असिस्टेंट सर्वेयर जनरल कैप्टेन जे . कैम्पबेल ने दक्षिण भारत में तैयार किये जाने वाले चार तरह के भारतीय लोहे का विवरण इंग्लैंड को भेजा
क्योंकि व्याख्याएं तो समय व सन्दर्भ सापेक्ष हुआ करती हैं
चित्त व काल की बात करने का तो अब समय नहीं रहा | कांची कामकोटि पीठम् के श्री जयेन्द्र सरस्वती ही कहते रहते हैं कि पहले तो हम महान थे पर आज की बात मैं नहीं करता
लेकिन इस आधुनिकता के प्रवाह में भारत के साधारणजन और उनकी बची- खुची व्यवस्थाएं , उनके तीज-त्यौहार , उनके जीवन मरण के कर्म आदि सब दब गए हैं
कहा जाता है उस गोष्ठी में किसी यूरोपीय विद्वान का सुझाव था की भारत की समस्याओं का समाधान भारत के ईसाई हो जाने में है
किसी सभ्यता के मानस व चित्त को पूरी तरह मिटाकर वहां एक नए मानस का प्रतिष्ठापन करना शायद संसार में सम्भव ही नहीं है
आधुनकिता के तौर-तरीकों और मुहावरों से छुटकारा पाकर स्वयं अपने को अपने ढंग से समझना पड़ेगा
और इस संकट से उबरने के लिए पर्याप्त साधन , समय व शक्ति जुटाने के प्रयास हमें करने चाहिए
१ . स्वाधीनता से वंचित होने की चिन्ता भारतीय समाज , भारतीय मानस , भारतीय समाज व्यवस्था को तथा यूरोपीय समाज और वहाँ की व्यवस्था और मानस को , पिछले दो-ढाई सौ वर्षों में हुई इन दोनों की टकराहटों को और उससे भारत पर पड़े विभिन्न प्रभावों को समझने का कुछ प्रयास मैं करता रहा हूँ
ईशोपनिषद् की मुख्य प्रार्थना ही है कि चेतना अग्नि ! हमें सुपथ में प्रवृत्त रखो , जटिल पथों से दूर रखो
जब हमने स्वाधीनता फिर से पा ली थी , उसी समय गांधीजी ने किसी को लिखा था कि तत्काल बडे़ परिणामों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए और १५० वर्षो की दासता से जर्जर भारत को पुन:स्वस्थ होने में कम से कम उससे आधे वर्ष तो लगेंगे ही
कुछ ऐसा दिखता है कि समष्टिगत भारतीय मानस और उसके अंगभूत भारतीय व्यक्ति के निजी मानस की स्वाभाविक संरचना , संस्कार और बोध-प्रवृत्ति ही ऐसी है कि भारतीय जन स्वभावत: एक ऐसे विश्व में रहने को तैयार नहीं हो पाते , जिसमें विभिन्न मानव समूहों या विविध क्षेत्रों के लोगों के मध्य परस्पर वैर-भाव एवं युद्ध-स्थिति एक स्थायी लक्षण हो
एक ऐसे संसार में जहां भारतीय शक्ति का निर्णायक प्रभाव हो अथवा कम से कम अपने बारे में भारत स्वावलम्बी एवं पर्याप्त समर्थ हो , पराजय की स्थिति न हो , यह स्थायी भाव एक उदात्त व्यवहार का आधार बनता है
उस स्थिति में यदि पराजित , तेजहत भारतीय चित्त अपने समय और अपने सम्मुख उपस्थित संसार के इस स्थायी वैरभाव को समझ पाने को तैयार न हो , तब उसका स्थायी शांति-भाव तेजहीन होकर एक तरह से स्वयं को ठगने का विचार-जाल रचता है
इस्लाम के अनुयायियों से हजार वर्ष लंबे समय तक सम्बन्ध होते हुए भी इस्लाम के स्वरूप को भी बौद्धिक स्तर पर समझने का कोई प्रयास भारत में पिछले दो सौ-तीन सौ वर्षो में भी नहीं हुआ दिखता है
हाफिज , रूमी आदि की शाइरी पढ़ी
हिन्दु धर्म और भारतीय संस्कृति के वे समर्थ प्रवक्ता संन्यासी बने और शायद आज सबसे अधिक पुस्तकें जिन आधुनिक भारतीय विचारकों की पढी जाती हैं , उनमें प्रमुख हैं विवेकानंद और महात्मा गांधी
हिन्दु धर्म और भारतीय संस्कृति के वे समर्थ प्रवक्ता संन्यासी बने और शायद आज सबसे अधिक पुस्तकें जिन आधुनिक भारतीय विचारकों की पढी जाती हैं , उनमें प्रमुख हैं विवेकानंद और महात्मा गांधी
स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व कई अर्थों में इससे भिन्न था और प्रतिभा , शास्त्र-ज्ञान एवं संवेदना में भी वे अधिक उन्नत थे
' प्रमदादास मित्र ने इसका निराशाजनक उत्तर दिया
निस्ससंदेह तब तक बंगाल दरिद्र और कंगाल किया जा चुका था , परंतु इतनी कम धनराशि उस व्यक्ति के स्मृति-स्थल हेतु न जुट पाये , जिसके पास केशवचंद्र सेन , गिरीशचंद्र घोष , ईशान चंद्र मुखोपाध्याय , बलराम बोस , शंभुनाथ मल्लिक , मणिमोहन मल्लिक जैसे संपन्न लोग आते-जाते थे , तो यह प्रसंग आर्थिक दारिद्र का नहीं , वैचारिक दारिद्र का ही दिखता है
इस दुर्दशा ने विवेकानंद को हिला दिया
अत: पश्चिम में वे तर्कपूर्ण प्रतिपादनों से श्री रामकृष्ण की विचारधारा का प्रसार चाहते हैं
विवेकानंद से तत्काल पूर्व तेजस्वी स्वामी दयानंद को आवश्यक साधन-स्रोत एवं जनाधार मिला था
संस्कृत तथा भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भी पढाई हो , इसका राममोहन राय जैसों ने प्रचंड विरोध किया
केशवचंद्र सेन ने भारत के बारे में ब्रिटेन में ही कहा - 'यदि आप आज भारत को देखें तो आप पायेंगे - दूर-दूर तक फैली मूर्ति-पूजा , एक ऐसी जाति व्यवस्था जैसी और कहीं नहीं मिलेगी , जिज्ञासारहित प्रकृति वाली सामाजिक और पारिवारिक संस्थाएं तथा अत्यन्त जुगुप्साजनक सीमा तक विद्यमान अज्ञान , पूर्वग्रह , दोष और अंधविश्वास
चेतना-विकासवाद की अपनी विशिष्ट अवधारणाओं के फलस्वरूप जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग पश्चिम के चिंतको में सर्वाधिक विकसित चेतना देखते थे और पश्चिम के चिंतकों के अनुगत समाज को सर्वाधिक विकसित समाज
महात्मा गांधी में ऐसा हीनता और ग्लानि का भाव लेशमात्र नहीं था और उनके नेतृत्व में पूरा देश एक होकर उमड पडा
यहां महत्त्वपूर्ण मात्र इतना है कि गांधीजी को भारतीय जन और भारतीय धन के सामर्थ्य पर पूरा भरोसा था तथा उसी दृष्टि से उन्होंने अपने अद्वितीय संगठन और सामर्थ्य के बल पर देश व्यापी विराट संगठन और आंदोलन खडा किया था
अरस्तू ने स्पष्ट कहा है , 'संपत्ति मनुष्य का औजार है और स्वयं औजार मनुष्य की संपत्ति है
इसी दृष्टि के अंतर्गत १६ वीं शती ईस्वी में विविध ईस्ट इंडिया कंपनी बनायी गईं
ब्रिटेन में शिक्षा की दशा का भी स्मरण उपयोगी होगा १३ वीं और १४ वीं शती ईस्वी में ब्रिटेन में आक्सफोर्ड , कैम्बिज एवं एडिनबर्ग विश्वविद्यालय प्रारंभ हुए
१८ वीं शती ईस्वी के अंत तक ब्रिटेन में लगभग ५०० ग्रामर स्कूल थे
तभी जोसेफ लंकास्टर द्वारा प्रयुक्त मानीटोरियल शिक्षणविधि अपनायी गई
अंतिम बार ग्यारहवीं शती ईस्वी में नार्मन जाति ने वहां आक्रमण किया और वहां के समाज को पराजित कर अपने अधीन कर लिया
उन्हीं व्यवस्थाओं का क्रमिक विकास आधुनिक ब्रिटिश साम्राज्य के रूप में हुआ
फिर बाद में राजा ने छल-घात से किसानों को बातचीत के लिए बुलाया और सेना से घिरवाकर कईयों को मरवा डाला तथा विद्रोह को कुचल दिया
२ . यूरोप से टकराव के पूर्व यह स्पष्ट है कि हमारा शक्तिशाली वर्ग भारतीय समाज को जो दिशा देना चाहता है या देने की बात करता रहा है , उसका तर्क और औचित्य वह एक विशिष्ट ऐतिहासिक व्याख्या में देखता है जिसके अनुसार इधर शताब्दियों से हम अंधेरे और अज्ञान में गिरे थे , हमारा अपना राज्य नहीं था , परस्पर सम्बन्ध पर्याप्त नहीं था , हमारी सामाजिक इकाइयां अपने अपने में अलग अलग कटी पड़ी रहती थीं , विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हम बहुत पीछे थे , शिक्षा मुट्ठी भर लोगों तक और विशिष्ट समूहों तक सीमित थी
भारत का एक बड़ा भाग बारहवीं शती ईस्वी से लगातार इस्लाम - अनुयायियों के आक्रमण से टकरा रहा था
कलेक्टरों की रिपोर्ट मिलने पर मद्रास प्रेसीडेन्सी की सरकार ने १० मार्च १८२६ को उनकी समीक्षा की और गवर्नर सर थामस मुनरो ने निष्कर्ष-टिप्पणी की कि '५ से १० वर्ष आयु समूह के प्रेसीडेन्सी के कुल लड़कों का लगभग एक चौथाई हिस्सा स्कूलों में शिक्षा पा रहा है
बंगाल के पांच जिलों को लेकर इस विषय में ऐडम की जो रिपोर्ट है , वह अधिक विस्तृत है और उसमें छात्र , शिक्षक , विषय , पुस्तकें एवं विद्याव्यवस्था से संबंधित सामग्री का विस्तार है
हर ग्रामीण अपने यहां के शिक्षकों को अपने उत्पादन का एक अंश देने में गर्व का अनुभव करता है , यह भी लिटनर ने लिखा है
इससे इस्पात बनने में समय कम लगता है , जबकि ब्रिटेन में प्रचारित पुरानी विधि में १४ से २० दिन लगते हैं
 . . . . भारतीय लोग ढ़ाई घंटे में ही लोहे को इस्पात में ढालने में समर्थ हैं और वह भी इंग्लैंड में प्रयुक्त ताप से कम मात्रा में ताप का प्रयोग करते हुए
यहां स्मरणीय है कि नूजीद क्षेत्र की जनसंख्या १७८६ ईस्वी में एक लाख से ऊपर थी
ब्रिटिश बंगाल सेना के मेजर जेम्स फ्रेंकलिन ने ई . १८२९ के आसपास मध्य भारत में लोहा बनाने की विधियों के बारे में लिखा
ये भट्टियां वजन में हल्की होती थीं और बैलगाड़ी में रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाई जा सकती थीं
१८ वीं शती ईस्वी में भारत में बर्फ बनाने की तकनीक भी विकसित थी
इलाहाबाद जैसे स्थानों पर बर्फ बनाये जाने का विवरण कुछेक तत्कालीन अंग्रेजों ने दिया है
खाद्यान्न , तिलहन , दलहन , फल , सब्जी , वृक्ष , वनोपज , बागवानी आदि की उन्नत प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान भारत में विद्यमान था
सन् १८१० ई . के आसपास के ब्रिटिश भारतीय आंकडों से पता चलता है कि दक्षिणी भारत के जिलों में सूती , रेशमी , आदि कपड़ा बनाने और निवाड आदि तैयार करने के काम आने वाली खड्डियों की संख्या १५ से २० हजार तक प्रति जिले में थी
भारतीय वस्त्रोद्योग के विनाश से ये सब दरिद्र और कंगाल हुए
चरक और सुश्रुत के इस देश में १८ वीं शती में भी आयुर्वेद का पर्याप्त प्रभाव शेष था
चेचक का टीका लगाने की देशी प्रथा भारत के कई हिस्सों में व्यापक थी जब कि इंग्लैंड में चेचक का टीका १७२० ई . के बाद ही चला
अंग्रेजों ने उनकी विधि को अवैज्ञानिक मानकर भारत में तो उसे दबाया , लेकिन ब्रिटेन में इसी भारतीय विधि के आधार पर यूरोपीय मानी जाने वाली शल्य चिकित्सा को विकसित किया
इसी १६ वीं शती में ब्रिटेन में गणित ज्योतिष नितांत अविकसित दशा में था
वहां के लोग जब तक उन लाभों का महत्त्व समझने की बुद्धि से संपन्न न हो जाएं , तब तक वहां कोई वैध आदेश- व्यवस्था लागू करना व्यर्थ होगा
यूरोपीय विस्तारवाद के तरीके को समजने के लिए यह समझना आवश्यक है कि ऐसी समस्त कंपनियां मुख्यत: विविध यूरोपीय राज्यों का औजार थीं
अपने मित्र अर्ल मोर्ले को १८२४-२५ में एमहर्स्ट ने बताया कि मैं संभवत: प्रतिवर्ष पच्चीस हजार के वेतन का आधा बचा पाऊं
ब्रिटिश समाज अपने ऊर्जस्वी और उद्यमी बेटों से यही अपेक्षा करता था कि वे विश्व को ब्रिटिश प्रयोजनों का एक नियंत्रित अधीनस्थ औजार बनाएं
मुगल दरबारों की शाही शानो शौकत की विपुल गाथा गाई गई है
एक सशक्त प्रारंभिक ब्रिटिश गवर्नर जनरल का कहना था कि हिन्दू राजा अपने ऊपर निजी खर्च बहुत कम करते हैं
छत्रम् में यदि किसी की असमय मृत्यु हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार भी किया जाता है
श्री जयप्रकाश नारायण , श्री राम मनोहर लोहिया , श्री कमलादेवी चट्टोपाध्याय , श्री मीराबहन उनके मित्र एवं मार्गदर्शक हैं
चिंगलपेट जिले से संबंधित विवरण १७६०-१७७० ई . के आसपास २ , ००० गाँवों के एक सर्वे से एकत्र किये गये थे
स्पष्टत: यह मात्र आर्थिक प्रबंध नहीं था
जैसे कि वर्नाकुलर स्कूल शिक्षक , मठम् , सिद्धम् , उद्घोषक , बनिया , फकीर , तेल बेचने वाले , बेटिटियान , मस्जिद इत्यादि के लिए
इस हिसाब के अनुसार चिंगलपेट जिले की कुल जोती हुई भूमि का लगभग छठा हिस्सा मान्य भूमि था
इस प्रकार इन आंकड़ों , एवं विवरणों से एक ऐसे राजनीति-तंत्र ( पालिटी ) का रूप उभरता है , जो महात्मा गांधी द्वारा व्याख्यायित उस 'सागरीय वृत्त वाले बोध से मिलता-जुलता दिखता है , जिसमें गांधीजी के विचार से सबसे भीतरी वृत्त सर्वाधिक आंतरिक स्वायतत्ता प्राप्त किये रहता है तथा बाहरी वृत्तों को वैसे वित्तीय , नैतिक तथा अन्य सहायता व समर्थन प्रदान करता रहता है , जो कि उन अन्य बचे हुए कामों की पूर्ति हेतु इन बाहरी वृत्तों के लिए आवश्यक हैं , जो काम स्थानीय स्तर पर संपन्न नहीं किये जा सकते
थामस मुनरो के अनुसार अंग्रेजों द्वारा थोपी गयी राजस्व दरों से यह परंपरागत अंश या कर एक चौथाई से अधिक नहीं होता था
यह प्रवृत्ति १८२० में भी मद्रास प्रेसीडेन्सी में विद्यमान थी
दूसरी ओर यह भी सत्य है कि पश्चिमी यूरोप में १८ वीं शती ई . में वहां के 'लैंड लार्ड भूमि से जो कर लगान वसूलते थे , वह कुल कृषि उपज का ५० से ८० प्रतिशत था
देश के विभिन्न भागों एवं क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व एवं अधिकारों सम्बन्धी भिन्न- भिन्न पद्धतियां रही हैं
किन्तु प्राय: इन सभी व्यवस्थाओं में भूमि पर ग्राम समुदाय को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त थे
संभवत: समुदायम में गांव के सब परिवार नहीं होते थे , अपितु मात्र किसान परिवार और मान्यम पाने वाले परिवार होते थे
वह थी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आधा सेर अनाज
अंग्रेजों ने ही भारत में बंधुआ मजदूरी की शुरुआत की
१७७० ई . से अंग्रेजो द्वारा इसे भारत में फैलाने के आंकडे मिलते हैं
यहां विज्ञान के एक प्रसिद्ध इतिहासकार जार्ज सार्टन के शब्द स्मरणीय हैं - 'पश्चिमी राज्यों ने अपने पूर्वी भाईयों को न केवल लूटा , शोषण किया और दास बनाया अपितु इससे भी बहुत बुरा व्यवहार किया
आज कुल अमेरिका के पुराने निवासियों की जनसंख्या २ से ३ करोड़ तक है
इस्लाम के अनुयायियों के आक्रमण का हमने सतत प्रतिरोध किया
किन्तु यदि स्थायी आक्रमणभाव से सम्पन्न शत्रु लंबे समय तक देश के भीतर जमा-टिका रहे और युद्धरत रहे तथा अधिकांश भारतीय समाज को विनष्ट करने और अवशिष्ट समाज को अपने अनुरूप रूपातंरित करने की दीर्घकालीन वैरनीति पर चल रहा हो , तो ऐसे आक्रमणकारी का सामना करने की क्या-क्या नीतियां , उपाय और व्यवस्थाएं हो सकती हैं , इस पर शायद भारतीय मनीषा ने अभी तक पर्याप्त विमर्श नहीं किया है
ऐसी विखंडन की स्थिति में अंग्रेज भारतीय समाज को , विशेषत: उत्तर भारत में , पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेने में सफल हो गये
अंग्रेजों को सामाजिक विध्वंस तथा बलात् सामाजिक रूपांतरण का , जन-गण को दास बनाने का बहुत लंबा अनुभव था
अत: उन्होंने भारतीय विद्या , विज्ञान , संस्कृति , धर्म , शिल्प , कला , साहित्य , कृषि समेत समस्त साधनों एवं जैव-द्रव्यों ( बायोमास ) तथा बौद्धिक-आध्यात्मिक प्रवृत्तियों को अपने नियंत्रण में लेकर उन्हें अपने अनुरूप ढाला
फिर , साधना और तप से , समझ और पुरुषार्थ से समाज पुन: स्वस्थ हो सकता है तथा उत्कर्ष प्राप्त कर सकता है
संभवत: जापान का उदाहरण भारत के लिए और अधिक उपयोगी हो
ऐसा कहा जाता है कि ५० वर्षों के भीतर जापान में पांच लाख लोगों को ईसाई बना डाला गया
फिर सन् १८८४ ईं . में जापान में तीस खंडों वाली एक दसवर्षीय योजना बनी
हम आज देखते हैं कि आत्मबल एवं इच्छा तथा तदनुरूप खडी की गई व्यवस्था के बल पर जापान सशक्त बनकर उभरा
उनमें भारतीय लोगों के प्रति गहरा ममत्व था , आत्मीयता थी
उनकी दुर्दशा पर गहरी यंत्रणा थी , वेदना थी , विक्षोभ था , पीडा थी
किन्तु अपने बंगाली परिवेश और बंगाल के नवप्रबुद्ध वर्ग की संस्कृति से भी वे स्वाभाविक ही प्रभावित रहे
भारतीय किसानों एवं ग्रामीणों की जीवनदृष्टि और समाजदृष्टि से उनका अपरिचय रहा
परन्तु सामाजिक दृष्टि से उत्तरी भारत में किसी भी सन्त का प्रभाव यहां के शक्तिशाली स्वदेशी अभिजनों में पर्याप्त रहा नहीं दिखता
गांधीजी ने परम्परागत 'मॉडल' की पुनर्रचना की कोशिश की
इस प्रकार विशिष्ट लक्षण प्रमाण-संयुक्त वस्तुतत्त्वों का विवेक ही धर्म के बोध का माध्यम होता है
रेस्पांसेज स्मृति और संस्कार के आधार पर होते हैं
इसीलिए किसी भी घटना , क्रिया या वस्तु का बोध , मात्र बाहरी वस्तुतंत्र का परिणाम नहीं होता , वह आन्तरिक चित्ततंत्र का भी परिणाम होता है
अत: भारत और यूरोप को जानना दो भिन्न भिन्न सभ्यताओं को जानना है
संक्षेप में इन्हें सात मुख्य आधारों के रूप में समझा जा सकता है
इसके विपरीत यूरोपीय चित्त परम्परा के ये मुख्य आधार दिखते हैं - ( १ ) सत्यदूत ( चिन्तक , मैसंजर , प्रभुपुत्र-विशेष आदि ) जिसके माध्यम से ही द ट्रथ , द गुड , द ब्यूटी की सही समझ सम्भव है
पर्यावरण के लिए आधुनिक ढंग से काम करने वाले , उन्नत कृषि , सामाजिक वानिकी , बंजर भूमि विकास , आदि के लिए कार्यरत अनेक संगठन भी पश्चिमीकृत वर्ग की नैतिक शाखाएं बनते जा रहे हैं
सन् १८५० के बाद भारत की स्थिति अधिक बिगड़ी
यूरोप में १९०० ईस्वी के करीब या उसके बाद से बिजली व पेट्रोल से चलने वाली मोटर , लारी , ट्रक , इत्यादि आरम्भ होने पर इनका भी भारत में प्रसार हुआ
सन् १९४७ ई . से अब तक स्वतंत्र भारत में जो हुआ , वह बडी सीमा तक सन् १८५० ई . के करीब अंग्रेजों ने जो यहां आरम्भ किया था , उसी का विस्तार है
सन् १९४७ ई . तक भी यूरोपीय ढंग के उद्योगों या खेती में जो जो परिवर्तन इत्यादि भारत में किये गये , वे यूरोप में हो रहे कार्यो से २० से ५० वर्ष पीछे ही थे
एक विद्वान मित्र की मान्यता है कि बाहर से संकर बीज व उर्वरकों से हम आज जो गेहूँ आदि पैदा करते हैं , वह यूरोप व अमेरिका में तो पशु ही खाते हैं
इनमें से अधिक तो मानसिक दृष्टि से देश के आधे ही नागरिक हैं , उनका चित्त तो विदेशों में ही भटकता है और वहीं कुछ रस पाता है
भारत में १२-१५ करोड़ परिवारों में से केवल दो लाख परिवार ही भारत की हर तरह की व्यवस्था की देखभाल करते हैं , यह कोई निराली बात नहीं है
हो सकता है , भारत के सैकड़ों व हजारों गांवों में जो आग पर चलने की प्रथा आज भी प्रचलित है- आज से सौ वर्ष पहले तो यह उत्सव कम से कम दक्षिण व मध्य भारत के हर क्षेत्र में मनाया जाता था-वह भी दस बीस वर्ष के बाद भारत के अभिजनों के लिये ही रह जाये
एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का , जो भारत के तंत्र और साधनस्रोतों को नियंत्रित करते हैं और दूसरा है उन ९९ . ५ प्रतिशत का ( इनमें से १५-२० प्रतिशत शायद आधे फीसदी के सहायक व नौकर माने जा सकते हैं , और सुरक्षा व अधिकाधिक आमदनी का लोभ इन्हें काफी समय तक बाकी ८०-८५ प्रतिशत से अलग रख सकता है ) , जो केवल अपने सीमित व अवशिष्ट बल पर जी रहे हैं और जिनका किसी भी तरह का बौद्धिक व सामाजिक सम्पर्क भारत के शासक वर्ग व 'आफिसर क्लास' से नहीं है
हर घर में पानी , शौच इत्यादि की उचित व्यवस्था हो , यह भी सोचना होगा
संस्कृति का बोध इतिहास परम्परा , दर्शन- परम्परा समेत समाज जीवन की समग्र परम्परा से होता है , समाज शास्त्र और राजनीति शास्त्र राजनीतितंत्र ( पोलिटी ) के अंग है
यूरोपीय दृष्टि में समस्त मनुष्य तथा अन्य समस्त जीव एवं वनस्पति , वन , भूमि , जल , खनिज इत्यादि साधनस्रोत शासकों के विचार और व्यवहार रूपी सभ्यता के संसाधन हैं
भारतीय किसान के पास अत्यन्त सम्पन्न विद्यासम्पदा एवं विद्या परम्परा है
अत: किसानों की इस विद्यासामर्थ्य का समादर किया जाना चाहिए कि वे बिना ऐसे भारी खर्च के ही यह विद्या सुरक्षित व गतिशील रखे हैं
विद्या के इन विस्तृत विराट रूपों के प्रति सम्मान का अभाव और अवहेलना का भाव रखने के कारण हमारे अभिजनों और शासकवर्ग में विद्याबुद्धि का ह्रास हुआ है , अविद्या और भ्रान्ति बढ़ी है
इनके ज्ञान को जीवंत एवं व्यवस्थित तथा गतिवान रखना प्रमुख राजनैतिक लक्ष्य और कर्तव्य है
अपने राजनीतितंत्र ( पोलिटी ) के पुनर्गठन की प्रक्रिया में हमें समाज की विविध इकाइयों के आज के सम्बन्ध बदलने होंगे तथा अपनी मान्यताएं भी विवेक की कसौटी पर कसते रहनी होंगी
हमारे अभिजनों और शक्तिशाली जनों द्वारा पश्चिम का विमूढ़ अनुकरण एक पीडाप्रद दुर्घटना है
अविवेक और विमूढता की यही स्थिति समाप्त करनी होगी तथा अपने भविष्य के लक्ष्य व दिशा के बारे में राष्टरीय बुद्धि से निर्णय लेना होगा
भारत में १९०५ ई . में स्वदेशी का एक सशक्त आन्दोलन उभरा जो बंगाल के विभाजन के विरोध में उठा था
इस स्वदेशी आन्दोलन की प्रमुख प्रेरणा स्वामी विवेकानन्द थे और इसके सर्वाधिक सक्रिय नेताओं में थे श्री अरविन्द घोष
बाहर से कहाँ से क्या क्या और कहाँ तक सीखना और लेना है यह विचार भी स्वदेशी का अभिन्न अंग है
सम्भवत: उससे ब्रिटेन के लोहे और इस्पात उद्योग ने १९ वीं शताब्दी में बहुत कुछ सीखा
यह तो है कि दिल्ली में बाबा खड्कसिंह मार्ग में हमें देश में बनी कलाकृतियाँ व देसी शिल्प वाली वस्तुयें मिल सकती हैं
वैसे ही जैसे कि पिछले १००-१५० वर्षों में लोहा बनाने वालों के लिए लोहा बनाने के पत्थर ( आग जलाने वाला कोयला ) का मिलना असम्भव कर दिया गया था
गोवंश के प्रति श्रद्धा भाव तो अब भी है , परन्तु गोवंश निरन्तर घट रहा है और उस पर हमारे सभ्य समाज में कोई बेचैनी या चिन्ता नहीं दिखाई पडती
तब ऐसी स्थिति में स्वदेशी की भावना का प्रसार किन शक्तियों के बल पर होगा , यह प्रश्न स्वाभाविक है
तो इससे शायद यह निष्कर्ष भी निकल सकता है कि सुव्यवस्थित प्रयास से वे संस्कार फिर से प्रबल बनाए जा सकते हैं
पर जीवन का कोई भी रूप , जीवन के दूसरे रूपों से इस अर्थ में श्रेष्ठ नहीं है कि एक रूप की रक्षा के लिए दूसरे रूपों को समाप्त कर दिया जाय या पूर्ण अधीनता की दशा में ले आया जाय
इसके साथ ही हमारे यहाँ जीवन को केवल मनुष्य में या कि कुछ प्राणियों में ही सीमित कर के नहीं देखा गया
समग्र सत्ता ही जीवन है
मनुष्य का गौरव सबके प्रति मैत्री , प्रेम तथा करुणा की अभिव्यक्ति और अनुभूति में ही है , हमारी चाक्रवर्त्य की धारणा तक में दूसरों के समक्ष वीरता के प्रदर्शन का भाव ही प्रधान है , उनके गौरव को समाप्त करने का नहीं
भारत में भूमि हो , जल हो , या वन , उस पर वहाँ के निवासियों का ही स्वामित्व रहा है
पवित्र माने जाने वाले पेड़ों और प्राणियों का शिकार भी निषिद्ध था
मर्यादा का महत्त्व और व्यापक धर्म से अनुशासित स्वधर्म की प्रतिष्ठा भारतीय जीवन दृष्टि का केन्द्रीय भाव है
इसके विपरीत यूरोप की , ईसाईयत की विश्वदृष्टि में मनुष्य ही केन्द्रीय सत्ता है
यूरोपीय सम्पर्क जब विश्व के भिन्न-भिन्न देशों से बढ़ा और जब वह धीरे धीरे स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानने लगा , तब से ही आधुनिक पश्चिमी मनुष्य ने मानव जाति की धारणा रची है
प्रमाद और संवेदनशून्यता की अभी की स्थिति तो हमें आत्मक्षय और आत्मविलोप की ओर ही ले जाएगी
लेकिन यह अधिक सम्भव है कि इस दिशा में बढ़ने पर पश्चिम और शेष विश्व पर हमारी निर्भरता आज जैसी ही बनी रहे या बढ़ती जाये तथा हम पश्चिमी जीवन शैली के एक तीसरे दर्जे के अनुयायी ही बने रहें
अपने देश के ८० से ९० प्रतिशत लोगों के प्रति हम अभी की तरह उदासीन बने रहें और उन सब लोगों को घुट-घुटकर जीने के लिये विवश करने वाली अपनी वर्तमान जीवनशैली जारी रखें
अपने देश के ८० से ९० प्रतिशत लोगों के प्रति हम अभी की तरह उदासीन बने रहें और उन सब लोगों को घुट-घुटकर जीने के लिये विवश करने वाली अपनी वर्तमान जीवनशैली जारी रखें
उन्होंने भारतीयता को जहां तहां बांधना चाहा , उसमें स्थिरता और शिथिलता लानी चाही
१९४३-४४ में अपने अलग थलग पड़ जाने का आभास केवल गांधी को ही नहीं रहा , दूसरों को भी हो गया
इस युद्ध में नेहरू पश्चिमी मॉडल के प्रतीक हैं
पर १९४४ के बाद तो इन ताकतों ने गांधीजी को हाशिए पर ठेल दिया
फिर सुभाष चंद्र बोस लाबी मजबूत बनी तो महात्मा गांधी को १९४० में संघ को सस्पेंड करना पड़ा
आजादी बनाम स्वराज का लेख लिखते हैं
अंग्रेजों की श्रेष्ठता मान लेने से बौद्धिक वर्ग ने अंग्रेजों का काम ही आसान किया
जबकि १८ वीं सदी के भारत में ५-७ से ज्यादा जातियां अछूत नहीं थीं
१९१५-१६ में महात्मा गांधी ने यह जो चरखे की बात पकड़ी तो गुजरात में उस वक्त चर्खा का चलन नहीं रहा होगा
नई आर्थिक नीति के खिलाफ उठने वाली आवाजें बज नहीं रहीं
लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध कर रहे हैं ! जैसे आजादी बचाओ आन्दोलन है
पर जब तक यह मानसिकता बरकरार है , तब तक देश का आम आदमी खड़ा नहीं हो सकता
दरअसल यह ५००-६०० साल पुरानी ही है
मानसिकता बदलने का काम उन्होंने १००-१५० साल में किया
भारतीय समाज की परिभाषा के लिए मनुस्मृति उनके माकूल बैठती थी
स्वदेशी और पश्चिम की पूरी अवधारणा को समझने के लिए १८ वीं सदी के अंग्रेजी समाज को समझना जरूरी है ! पश्चिम का विकास का मॉडल केन्द्रीकृत रहा है
कुल मिलाकर पूरी राजनीति , समाज और व्यापार उन अभिजात परिवारों के ही हाथ में था , जो ५०० साल से स्थापित थे
पर पश्चिमी मॉडल हमारी व्यवस्था में बैठ गया है
तमिलनाडु सरकार लोगों को पानी पीने के लिए जो मटके बांटती है , वे भी प्लास्टिक के ही होते हैं
गांधी समय के हिसाब से चीजों को ढालते हैं , यह भुला दिया गया
लोगों ने जब कहा कि अंत्यज शब्द खराब है , इसे बदल देना चाहिए
विकास के स्वदेशी और पश्चिमी मॉडल के बीच का असली फर्क क्या है ? यह फर्क केन्द्रीकृत और विकेन्द्रीकृत मॉडल का है
भारतीय मॉडल सम्पत्ति जोड़ने का नहीं है , उसके बंटवारे का है
श्राद्ध में तो तीन पीढ़ियों तक ही नाम स्मरण चलता है
बसावट अक्सर स्वपूरक समूह के रूप में होती थी
और यह जो बढ़ती धार्मिकता की बात है तो यूरोप में भी विज्ञान के साथ जन्मकुंडली चल रही है
तो जो नया राजनीतिक-सामाजिक उभार आया है , लोगों में आत्मविश्वास झलका है , वह . . . या यह मन्दिरों के इर्द-गिर्द युवा लोगों की त्योहारों पर जो भीड़ बढ़ रही है वह . . . क्या यह वर्ग देश को अपनेपन की ओर ले जाएगा ? मुझे लगता है कि अपनेपन की ओर वापसी का कोई रास्ता बन रहा है
यह आत्मविश्वास पश्चिमीकरण की गति को तेज़ भी कर सकता है
भारतीय विज्ञान समाचार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि नई नीति ‘इच्छाजनित विश्वास’ का वक्तव्य मात्र है
डॉ नायदम्मा ( जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के पूर्व उप कुलपति ) के अनुसार ‘पश्चिमी ढांचे पर आधारित मौजूदा शिक्षा पद्धति ने न तो सही किस्म की मानवीय शक्ति उत्पन्न की , और न ही जनता की शिक्षा के स्तर को उन्नत बनाया
सदस्यों ने आश्चर्य से पूछा कि यह किसके कल्याण के लिये है ? श्री टी . प्रकाशम् ने पूछा , 'यह मुट्ठीभर लोगों के हितसाधन के लिये है या इसमें उन करोड़ों लोगों के भी हित का कहीं विचार है , जो राजस्व और कर देते हैं ? ’ कुछ अन्य लोगों का मत था - ‘गांधीजी का और काँग्रेस का दृष्टिकोण यह रहा है कि भारत का भावी संविधान पिरामिड जैसी संरचना वाला होगा और ग्राम पंचायत उसकी बुनियाद होगी
उसमें प्रतिज्ञा की गयी थी कि सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित होगा - न्याय : सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक
यहां तक कि दिसम्बर १९५३ में भी पंडित जवाहरलाल नेहरू का विश्वास था कि ‘पिछले दो हजार वर्षों के विश्वइतिहास के मानवजीवन को परिवर्तित करने वाला कोई भी तत्त्व , इतना शक्तिशाली नहीं रहा , जितना कि औद्योगिक क्रान्ति और उसकी अनुगामी क्रियाएं
एक अर्थ में , लोगों को फिर सन १९१५ की स्थिति में धकेल दिया गया , जब कि सार्वजनिक सामाजिक जीवन में महात्मा गांधी का उदय हुआ था और तब उन्हें सार्वजनिक जीवन में वापस लाया गया था
यहां यह उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि आधुनिकता की शक्तिशाली धार के दबाव से अप्रभावित अनेक व्यक्ति एवं समूह १९५० में , और आगे भी , भारत में मौजूद रहे हैं ( व्यक्तियों में से कुछएक के नाम गिनाने हों तो राममनोहर लोहिया , जयप्रकाश नारायण और आचार्य विनोबा भावे के नाम लिये जा सकते हैं ) 
किन्तु साथ ही इस प्रक्रिया ने व्यापक पैमाने पर जंगलों का विनाश , भूमि क्षय तथा बाढ़ और सूखे की लगातार वृद्धि भी की है
हमारे आधुनिक मकानों में से अधिकांश का खाका , ( विशेषतः उनका जो साधारण या मध्यमस्तरीय लोगों के लिए बनाये जाते हैं अथवा छात्रावासों , अतिथि निवासों आदि का ) अपनी कुरूपता और असुविधा के साथ इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है , कि हमारे आयोजक और विकासकर्ता सचमुच विवेकशून्य हो चुके हैं
आराम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है , तब भी यदि इस मामले में तनिक भी विचार से काम लिया जाता , तो अकेला यह तथ्य ही इन शौचालयों की स्थापना को रोक देने को पर्याप्त होता है कि इस यूरोपीय ढंग के शौचालयों में बहुत अधिक पानी ‘फ्लश' के लिये जरूरी होता है और पानी मोटे तौर पर हिन्दुस्तान में एक दुर्लभ वस्तु ही है
द्वितीयतः , जो प्रशासनिक पद्धति अंग्रेजों ने मूलतः १७७० से १८३० के दौरान अपने विजित क्षेत्र को शासित करने के लिए रची , उसे बनाये रख कर आगे उसमें प्रचुर वृद्धि तथा विस्तार करते रहे
यह तो हो सकता है कि लगभग पाँच-पचास लाख भारतीय घरों में आज टेलीविजन सेट हों , रेफ्रीजरेटर हों , गैस वा बिजली के चूल्हे हों , शायद दस लाख कारें हों तथा ऐसा ही कुछ और हो , लेकिन इन्हीं ( सत्तावर्गीय ) स्रोतों के अनुसार भारतीय जनता का आधा हिस्सा ‘गरीबी रेखा के नीचे रहता है और ‘गरीबी रेखा से ऊपर वाले लोगों का अधिकांश हिस्सा घंटों तक परिवहन , दूध , चीनी , मिट्टी के तेल , खाद्य पदार्थ आदि के लिए लाईन लगाने में खर्च करने को विवश है
यहाँ तक कि आज का किसान भी नई संकर खेती और उसकी जरूरतों के सन्दर्भ में कम सृजनात्मक और नवाचार में कम समर्थ हो गया है
इस कारण उन्हें भारत की हर वस्तु आदिमकालीन , अतः अपरिष्कृत , संकीर्ण , अंधविश्वास-युक्त इत्यादि प्रतीत होती थी
उनकी प्रशंसा करने और उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के स्थान पर उन्हें वस्तुतः यह बताया गया कि वे निकम्मे हैं
इसमें ‘स्वराज' शीर्षक से अपने लेख में गांधीजी ने स्वराज लोकतंत्र की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था , यह एक सामुद्रिक वृत्त होगा , जिसका केन्द्र होगा व्यक्ति , जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा , गांव ग्रामसमुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा , यही क्रम चलता रहेगा और सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा , जो अपने मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे , सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे , जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं
क्योंकि अन्ततः विकास का मूल अभिप्राय है ‘भीतर के विकास' तथा 'आत्माभिव्यक्ति , आत्मविस्तार , अणु से महत् की ओर बढ़ना’
किन्तु भारत के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए यह स्वीकार करना होगा कि ये नजरिये वगैरह अब प्रासंगिक नहीं हैं और वे वस्तुतः भारतीय समाज के तानेबाने को ही नष्टभ्रष्ट करने वाले हैं
जहाँ यह सच है कि एक ओर हमारी समस्याएं पैंतीस साल पहले की तुलना में अधिक जटिल हुई हैं और उनका दबाव बढ़ा है , दूसरी ओर पहले से बड़ी संख्या में हमारे युवकजन अब और अधिक बौद्धिक तथा व्यावसायिक दक्षता से युक्त हैं तथा शायद उनमें संकल्प , निर्णय और मौलिकता भी है , जिससे वे वांछित परिवर्तन और रद्दोबदल करने में समर्थ हो सकते हैं
यह ध्यान में रखते हुए कि यदि हम चाह भी लें तो भी हम विश्व के दबावों से सहसा अलग थलग पड़कर नहीं रह सकते , यह हो सकता है कि कुछ समय तक हमें दो भिन्न भिन्न रास्तों पर सक्रिय रहना पड़े
प्लेटो या अरस्तू ने यूरोपीय ढांचे में परिवार की जो अवधारणा की थी वह सामंती , अभिजात , व्यापारिक या मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के साहुकार परिवारों से बहुत ज्यादा मिलती-जुलती नहीं दिखाई देती
इस तरह की मान्यताएं बनाने के लिए नई अवधारणाओं और नए मिथकों की जरूरत थी
यह विचार है भौतिक जीवन में व्यक्ति को स्वतन्त्र मानना
यहां चक्रवर्ती राजा की अवधारणा भी रही है
वह अनिवार्य रूप से कुटुंब , गोत्र , जाति और देश से जुड़ा रहा है
राज्य के बड़ी नाजुक स्थिति में होने की यह भावना अंग्रेजों के समूचे शासन काल में बनी रही
तथा १९३०-३१ के नमक सत्याग्रह के दौरान वह काफी गहरी दिखाई देती है
इसलिये हमारे संविधान का प्रारूप भारत पर शासन करने के लिये खड़े किये गये अंग्रेजी ढांचे के आधार पर ही बनाया गया था
भारतीय जरूरतों के लिहाज से यह संविधान बिल्कुल ही बेमेल है और अनजाने ही उसने हमारे राजनैतिक ढांचे को अंग्रेजी शासन वाले जमाने से भी ज्यादा जड़ बना दिया है
वर्ष के अन्त में देश की अपनी कला से सम्बन्धित उत्सव हुए , और इनमें न केवल भारत के कोने कोने के गान , नृत्य , कथायें सामने आईं अपितु निकटवर्ती बौद्ध देशों के विद्वानों और कलाकारों ने भी भाग लिया
१९४७ में हम जाने अनजाने , रुझवेल्ट की इस सोच पर चलने लगे और जैसा पश्चिम चाहता था उसकी ऑरबिट में , छत्रछाया में रहने लगे
पिछले ५० बरस में यूरोपीय वैचारिक प्रभाव में पढ़े लोगों की संख्या व नेतृत्व बढा ही है
यूरोप और अमेरिका की तो प्लेटो और अरस्तू के समय से ही मान्यता है कि दासत्व ही साधारण मानवसमाजों के लिए उचित व्यवस्था है
गाँवों , कस्बों व शहरों के मुहल्लों में नई शुरुआत तो अभी से हो सकती है
इसमें आवश्यकता है कि स्थानीय युवा वर्ग का इस काम में सहयोग मिले
६ से १२-१३ बरस तक की शिक्षा का ध्येय तो यह होगा कि इन बरसों में हमारे बच्चे सृष्टि , प्रकृति और उसमें रहने वाले सब जीवों से परिचित हो जाएँ , उनका जीवन और स्वभाव समझें , उनसे मित्रता बनाएँ और १२-१३ बरस की उम्र में अपने को अपने देश और गाँव , नगर इत्यादि का नागरिक मानने लगें और समाज की वार्ता में बराबर का भाग लेने लगें
यहाँ तक कि इन सब देशों में गौतम बुद्ध का प्रभाव भारत से गया
उन दिनों तो एक तीव्र भावना थी , अच्छे अच्छे ख्याल थे कि स्वाधीन होना है , और स्वाधीन होंगे तो सबको सम्मान से भोजन , कपड़ा , मकान मिलेगा , सामुदायिक जीवन होगा , शान्ति से रहेंगे और विश्व में शान्ति का ही सन्देश देंगे इत्यादि
लेकिन किसी भी स्वप्न या लक्ष्य का स्वरूप , आत्मबोध तथा आत्मचित्र के आधार पर ही निर्धारित होता है
दक्षिण व पूर्व एशिया के लोग स्वभाव से मुख्यत: अहिंसक ही रहे हैं , ऐसा कहा जा सकता है
पहले पुरुषों को अधिक आधुनिक शिक्षा दी गई , तो वे कुछ पश्चिमी उपकरणों , वस्तुओं , साहित्य , मनोरंजन , आदि का उपयोग करने और आनन्द लेने में समर्थ बने
तो इस तरह हिन्दुस्तान को उन्होंने कोरी स्लेट मान लिया था और हमारे भी कुछ लोग तभी से यही मान बैठे थे
जो लोग १९५० के करीब से ग्राम पुनर्रचना , सामुदायिक विकास ( कम्यूनिटी डिवेलपमेंट ) इत्यादि चला रहे थे , उन पर तो और भी अधिक
संयुक्त राज्य अमेरिका में रेड इंडियनों ( वहाँ के मूल निवासियों ) की गणना पुरानी जनगणनाओं में कभी की ही नहीं जाती थी , क्योंकि यूरोप से आए लोग रेड इंडियनों को मनुष्य नहीं मानते थे
मनुष्य पूरी तरह तो वे केवल खुद को मानते हैं , बाकी उनके लिए आदिम , पिछड़े , बर्बर , अविकसित मनुष्य , कमतर मनुष्य हैं
१९४० में महात्मा गांधी , राष्ट्रीय योजना समिति ( नेशनल प्लानिंग कमेटी ) की ग्रामोद्योग उपसमिति ( विलेज इंडस्ट्रीज सबकमिटी ) की वर्धा की बैठक में मौजूद थे
निर्मल कुमार बोस के अनुसार उस समय गांधीजी की सलाह थी कि परम्परागत ( ट्रैडिशनल ) और आधुनिक ( मॉडर्न ) , दोनों आस्थाओं व विचारों के लोग अपनी अपनी समयबद्ध विस्तृत योजना बना लें , और बतलायें कि उनमें से क्या निकलेगा और काम शुरू करें
किसान से लगान वसूली की दर में तिगुनी चौगुनी वृद्धि अंग्रेजों के जमाने में हुई
परन्तु अंग्रेजों ने बढ़ते हुए लगान को , अनाज के बजाय पैसे में लेना शुरू किया
उन्हें पढने से ऐसा लगता है जैसा कि किसी अवतार की प्रतीक्षा हो रही थी
आज शायद यह मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने भारत में जो यह विस्तृत तंत्र खड़ा किया है वह सारे देश से जल्दी जाने वाला नहीं है
श्रीमती इंदिरा गांधी ने स्वयं शायद कहा था कि उनके पिता जवाहरलाल नहेरू ने बड़ी गलती की कि अंग्रजों के बनाये तंत्र को जैसा का तैसा रहने दिया
विदेशों में हमारा सामान ज्यादा से ज्यादा जाये इसमें फँस कर पिछले पचास बरसों में हम अपने हस्तकला उद्योग का विनाश ही कर चुके हैं
ब्रिटेन में पचासों ईसाई सम्प्रदाय हैं जिनसे अलग अलग लोग , पूरे मुहल्ले व गाँव भी सम्बन्धित हैं
प्रारंभ में आये यूरोपीय प्रवासी , यूरोप के राज्यों के कर्मचारी , वैज्ञानिक और शास्त्रज्ञ आदि को तैयार उपयोगी वस्तुएँ-स्वर्ण और हीरा-माणिक के अतिरिक्त कुछ ही वस्तुएँ ध्यान में आई थीं
तुर्किस्तान के ब्रिटिश राजदूत के बालकों के सन् १७२० में हुए सफल टीकाकरण के बाद , उनकी पत्नी ब्रिटेन में उसका आरंभ करने का आग्रह करने लगी
वैद्यकीय व्यवसाय के लोग और आक्सफोर्ड के धर्मशास्त्रों के पंडितों द्वारा कुछ समय तक उसका जोरदार विरोध होने के बावजूद अपेक्षाकृत सफलता प्रमाणित होने पर उसका मूल्य वे समझने लगे और वैद्यकीय क्षेत्र के बहुत से लोगों में अलग अलग देशों में तत्सम्बन्धी पूछताछ प्रारंभ की गई
टीकाकरण विषयक यहाँ दिये गये दो विवरण सन् १७५० से पूर्व की खोज के सुपरिणाम हैं
यूरोप में वपित्र का सर्वप्रथम उपयोग केरिन्थिया ( ऑस्ट्रिया ) के जोसेफ लोकाटेली नामक व्यक्ति ने १६६२ में किया था ऐसा कहा जाता है
उनकी संस्थाएँ , विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आदि ५० अथवा १०० वर्ष पूर्व से पहले थीं , वैसी नहीं रह पाई थीं
इसका विकास लम्बे समय के अंतराल में , सन् १७८० के बाद बहुत जल्दी हुआ था
कुवियर की 'द थियरी ऑफ अर्थ' ( जिसमें कुवियर ने भारतीय कोष्ठकों का मजाक उड़ाते हुए अस्वीकार कर दिया था
भारतीय विविध क्षेत्रों के अठारहवीं शताब्दी के विद्वानों और विशेषज्ञों के बाह्य संपर्कों के अभाव के मूल में संभवत: दो बातें हैं : एक , ( ज्ञान को ) गूढ़ बनाने की अथवा गुप्त रखने की प्रवृत्ति तथा दो , उनकी ( सत्य अथवा असत्य ) मान्यता अथवा उनके सिद्धान्तों के क्लिष्ट तर्क और जटिलताओं को अधिकांश यूरोपीय समझ सकें ऐसी स्थिति का अभाव
 ( प्राचीन हिंदू साहित्य में उसे 'श्वेतद्वीप' कहा गया है
कितनों ने ही यूरोप में व्याप्त जंगलीपन और अज्ञानजन्य अभिप्रायों को सीधे ही मान्यता दे दी; तो अन्यों ने भी यूरोपीयों के मजाक और तिरस्कार का सहज लक्ष्य बनकर यही कार्य किया
 ) इस मेजिस्ट्रेट ने यह प्रतिपादित किया है कि , यह 'भवन साधु-संतों और यात्रियों के विश्रामस्थान के रूप में राजा मानसिंह ने निर्माण करवाया था; परंतु 'वेधशाला राजा जयसिंह ने बनाई थी
' उसके बाद लेखक ने यंत्र आदि के माप विषयक कुछ अधिक अवलोकन प्रस्तुत किये हैं
वेधशाला यदि वास्तव में सन् १७३७ में बनाई गई होती तो , उस समय केवल ३५ वर्ष पुरानी होनी चाहिए , परंतु बार्कर एवं पीयर्स दोनों स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि वह लगभग दो शताब्दी से वहाँ थी
यह युग वास्तविक है या काल्पनिक , अर्थात् तत्कालीन ग्रहों की स्थिति का सचमुच अवलोकन हुआ था अथवा बाद में अधिक आधुनिक कोष्ठकों के कालखण्ड के आधार पर कलियुग की पौराणिक कल्पना के साथ अनुकूलन किया गया है ऐसी पृच्छा के साथ प्रोफेसर प्लेफेर ने प्रारंभ किया है
हिन्दुओं द्वारा प्रयुक्त पद्धति से चेल्डीयन ( Chaldean - बेबिलोन ) इजिप्त या ग्रीक अथवा अन्य किसी भी गणना की पद्धति के परिणाम बहुत भिन्न हुए हैं
पीयर्स को लगा कि , इतनी गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए भारतीयों के पास दूरबीन जैसा यंत्र अवश्य होना चाहिए
शनि के सभी उपग्रह बहुत छोटे हैं और शनि ग्रह भी पृथ्वी से बहुत दूर है , जिससे निरीक्षण हेतु उच्च क्षमता की दूरबीन आवश्यक है
उनमें से कुछ अंशत: अनूदित प्रतियाँ फारसी भाषा में थीं , जो रोयल मिलिट्री कॉलेज के उनके मित्र श्री डाल्बी को वंशगत प्राप्त हुई थीं और उन्होंने सन् १८०० के आसपास इन प्रतियों को रुचि लेनेवाले जिज्ञासुओं तक पहुँचाया था
भारत में शीतला प्रतिरोधक टीके के प्रचलन का सर्वाधिक विस्तृत विवरण जे . जेड . होलवेल का है
उन्होंने उसे विवरण को लंदन की कॉलेज ऑफ फीजिशियन्स हेतु लिखा था
बंगाल , बिहार , उड़ीसा , मद्रास प्रेसीडेन्सी के क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन लाद दिया गया था , उसके बाद लगता है परिस्थिति बदल गई है
परंतु कोलकता के यूरोपीयों को अधिक शहरों में निषेध घोषणाएँ तथा प्रतिबंधों का सहारा लेने पर भी नयी प्रक्रिया लागू करने में बहुत हिचाकिचाहट थी
इसका प्रथम प्रकाशन लंदन में , सन् १७७५ में हुआ था
'जमने की प्रक्रिया हेतु पूर्व तैयारी के रूप में पहले पानी उबालना आवश्यक माना जाता था
मुझे अधिक अच्छे फौलाद का प्रस्ताव मिलेगा तो प्रसन्नता के साथ सहकार दूँगा , परंतु मुझे आजतक प्राप्त फौलाद की अपेक्षा भारत का फौलाद नि:संदेह सर्वश्रेष्ठ है
अध्याय १५ में समाविष्ट विवरण बहुत स्पष्ट बारीकियों से युक्त और विस्तृत हैं , जबकि अध्याय १६ में , कुछ यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने का , भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं की तथा अलग-अलग देशों में प्रवर्तमान प्रचलित क्रमबद्ध जानकारी की तुलना करने का प्रयास किया गया है
परंतु , इस आधार सामग्री का स्थूल अध्ययन सूचित करता है कि मध्य भारत में कच्चे लोहे से शुद्ध लोहे की प्राप्ति का अनुपात और अशुद्ध लोहे का निश्चित अनुपात बनाने के लिए आवश्यक कोयले की मात्रा की स्वीडेन आदि में लोहा और फौलाद बनाने की प्रक्रिया से संबद्ध गुणोत्तर के साथ तुलना की जा सकती है
पन्द्रहवें अध्याय की आधार सामग्री के अनुसार प्रति लोहे की भट्ठी का उत्पादन सप्ताह में आधा टन जितना था
परंतु , भारतीय अर्थशास्त्र के विद्वानों और प्रसिद्ध लेखकों ने इसकी जानकारी होने पर भी अभी तक , विज्ञान तथा तंत्रज्ञान के शिक्षण और प्रचलन के विषय में , कोई आम जागृति पैदा नहीं की है
'१८ वीं शताब्दी' भारत के इतिहास का 'घोर अंधकारमय' समय था ६० आदि काल्पनिक अवधारणाओं के विरुद्ध प्रश्न भी नहीं उठाये हैं
इन प्राचीन खण्डित अंशों का अध्ययन सफलतापूर्वक सूचित करता है कि भारत में कम से कम बीजगणित का अस्तित्व था
भारत में सब कुछ अलंध्य अर्थात् मर्यादाओं से जकड़ा हुआ लगता है , और सत्य तथा क्षतियाँ भी स्थायी बने रहे , इसका ध्यान रखा गया है
'वर्तमान समय में हिन्दू अपने वैज्ञानिक ग्रंथों को बिलकुल भी समझ नहीं पाते हैं
इस लेख में , प्रस्तुत अवतरण से पूर्व प्लेफेर कहते हैं , 'बीजगणित का , १६०२ का समय निर्दिष्ट करनेवाला भाष्य विशेषकर 'गणेश' पद्धति के अनुसार नियमों के स्पष्ट निदर्शन सहित , उसके स्पष्ट अर्थंघटन से युक्त है
प्लेफेर , ला प्लेस , डेलाम्ब्रे , आदि विद्वानों की शंकाएँ और ब्रिटिश सत्ताधारियों के कर्मचारियों में उनके पौर्वात्य समर्थकों ( मिशनरियों सहित ) का बढ़ता जा रहा दल देखते हुए भारतीय विद्वानों तथा विद्वत्ता विषयक मैकाले का निर्णय अनिवार्य था
मैं मानता हूँ कि वर्तमान पद्धति सच्चाई ( सत्यनिष्ठ मंतव्यों ) की प्रगति को नहीं बढ़ाती , परंतु क्षतियों को दूर करने की गति को घटाती है
आलोचना , अवलोकन , धमकियाँ और चिल्लाहट जैसे ऊपरि वर्णित उदाहरणों से भारत विषयक लेख और उपदेश भरे पड़े हैं और मैकाले तथा ( भारत में कम प्रसिद्ध ) उसके पूर्व आदर्श विलियम विल्बरफोर्स और जेम्स मिल द्वारा सूचित शिक्षा पद्धति आज भी उसी दशा में पूर्ववत् चल रही है
परंतु ( प्लेफेर , ला प्लेस , मेकाले आदि की ) ये शंकाएँ और चिल्लाहट अकेले ही अज्ञान और उपेक्षा के लिये उत्तरदायी नहीं हैं
आंशिक रूप से उनका उद्भव राज्य और समाज विषयक एक दूसरे से विरोधी संकल्पनाओं से हुआ है
अंत में , विज्ञान और प्रौद्योगिकी पूर्ण नष्ट हो गई यह विचार भी पूर्ण सत्य नहीं है
वास्तविक परिस्थिति और आपसी संबंधों का द्रोह करते हुए और उन्हें विकृत बनाते हुए ( विशेषकर अठारहवीं - उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप के ) जो असंबद्ध मानक और निर्णय उसे लागू किये गये , वे ही ह्रास के लिये उत्तरदायी हैं
इस पुनरुत्थान की प्रक्रिया ने एक ओर आत्मविश्वास में वृद्धि की तो दूसरी ओर राजकीय तथा सैनिकी ढाँचे को निर्बल बनाया
भारत का विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र , सामान्य जन के जीवन से संबंध रखनेवाली राज्य पद्धति और राजनीति के समान ही सत्वहीन है , ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी
टीका को अंग्रेजी में कहते हैं Vaccine , जो लेटिन शब्द Vaccaसे बना है जिसका अर्थ होता है गाय
सरकार को प्राप्त होनेवाला अनुमानित भूमि कर ५०% निश्चित हुआ था
४४ . वही , पृ . ३६४ ४५ . बाद में शेफिल्ड में लोहे और फौलाद के प्रमुख उत्पादक जे . एम . हीथ ने १८२४ में कहा था , 'इस उद्देश्य के लिए आवश्यक लोहे के विषय में इंग्लैण्ड पूर्णत: विदेशों पर निर्भर है यह सर्वविदित है तथा गत वर्ष मात्र फौलाद बनाने के लिए इंग्लैन्ड में आयात हुआ विदेशी लोहा १२ हजार टन से अधिक था . . . एन्करेजमेन्ट ऑफ आर्ट्स सोसायटी इंग्लैण्ड ने फौलाद बनाने के लिए उपयोगी लोहा निर्माण करने वाले के लिये पारिश्रमिक घोषित किया था किन्तु आज तक किसी ने भी दावा नहीं किया और निम्न प्रकार का ईंधन देखते हुए इस प्रकार का दावा कभी कोई करेगा भी नहीं
आकृति १ में 'क' द्वारा निर्देशित यंत्र में दो विराट चतुर्थ वृत्तांश हैं , जिनकी त्रिज्या नौ फुट दो इंच के आसपास है , उसके ठीक समकोण पर पच्चीस अंश के उत्सेधवाला दर्शक काँटा है - इस प्रकार एक ओर झुकाववाला , टेढ़ा निर्माण करना और फिर सैकड़ों वर्ष तक टिका रहनेवाला निर्माण करना सचमुच स्थपति की निपुणता को सिद्ध करता है
इन यंत्रों का उपयोग उदय या अस्त के समय तारों के कोण तथा दिगंश ज्ञात करने हेतु होता होगा , ऐसा प्रतीत होता है
चंगेज और तैमूर के आक्रमण भी पूर्व में खगोलशास्त्र की प्रगति को रोक नहीं सके
वे अपने साथ एक श्यामी पाण्डुलिपि का सार लाये थे , जिसमें सूर्य और चन्द्र के स्थान निश्चित करने के कोष्ठक और नियम थे
परंतु श्रीयुत् जेन्टिल , जो सन् १७६९ में शुक्र का अधिक्रमण देखने भारत आये थे , जब तक वे लौटकर पेरिस नहीं पहुँचे तब तक उन कोष्ठकों पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया
ये लेख तीन विभिन्न बिन्दुओं की ओर इंगित करते हैं; प्रथम तो , भारतीय खगोलशास्त्र विषयक हम अभी तक जो कुछ भी जानते हैं , विशेषकर आगे उल्लेख किये कोष्ठकों के चार भागों से जो जानकारी मिलती है , उसका संक्षिप्त वृत्त देना; दूसरा इन कोष्ठकों के आधार पर प्राप्त मुख्य तर्क , विशेषकर उनकी प्राचीनता के संदर्भ में प्रस्तुत करना और तीसरा , जिन भौमितिक कौशल्यों के द्वारा इस संपूर्ण खगोलशास्त्रीय प्रणाली की रचना हुई है , उसका आसादन करना , अनुमान लगाना
७ . इन नक्षत्रों के साथ , भारतीय खगोलशास्त्रियों ने हमारी तरह प्राणियों के नाम नहीं जोड़े हैं
७ . इन नक्षत्रों के साथ , भारतीय खगोलशास्त्रियों ने हमारी तरह प्राणियों के नाम नहीं जोड़े हैं
११ उन्होंने इस गति की गणना प्रतिवर्ष ५४'' की है और तदनुसार इन स्थिर तारों का एक चक्र समाप्त करने में २४ , ००० वर्ष लगेंगे
समय के सूक्ष्म विभाजन में , भी भारतीयों का गणित साठ भाग के अनुसार ही चलता है: वे प्रत्येक दिन को ६० घण्टों १२ में , प्रत्येक घण्टे को ६० मिनिट में और उसी प्रकार१४ प्रत्येक स्तर पर क्रमश: ६० भाग करते जाते हैं
इस धारणा में नक्षत्र वर्ष अर्थात् सूर्य के एक राशिचक्र परिभ्रमण का समय ३६५ दिन ६ घण्टे १२ मिनिट ३६ सेकन्ड जितना ग्रहण किया है
श्यामी नियम , जो केवल युति-प्रतियुति की गणना करते हैं , वे भी चन्द्र की केवल एक ही असमता होने की बात कहते हैं
१५ . खगोलीय कोष्ठकों का दूसरा एक समूह , जो अब विज्ञान अकादमी के अधिकार में है , कर्णाटक के किसी 'कृष्णापुरम्' नगर के फादर ड्यू केम्प द्वारा लगभग सन् १७५० में श्रीयुत् द 'लेइस्ली को भेजा गया था
यह वार्षिक संस्कार सभी स्थानों पर सूर्य की गति की असमता के समप्रमाण में होता है और लगभग उसके दसवें भाग जितना होता है
श्रीयुत् बेइली त्रिवेलूर के कोष्ठकों की तुलना कृष्णापुरम् के कोष्ठकों के साथ करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इन दोनों में से प्रथम ( त्रिवेलूर ) का ग्रंथकाल १७ और १८ ४४ फरवरी के बीच की मध्यरात्रि , वर्ष ३१०२ ईसा पूर्व है
श्रीयुत् बेइली त्रिवेलूर के कोष्ठकों की तुलना कृष्णापुरम् के कोष्ठकों के साथ करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इन दोनों में से प्रथम ( त्रिवेलूर ) का ग्रंथकाल १७ और १८ ४४ फरवरी के बीच की मध्यरात्रि , वर्ष ३१०२ ईसा पूर्व है
चन्द्र के उपरोक्त भोग में सुधार को जोड़ने पर कलियुग के प्रारंभ के चन्द्र का सही मध्यम स्थान मिलता है , जो १० राशि -६°-३७' जितना है
इसके साथ ही ३००० वर्षों से भी कम समय के लिए उल्टी गणना करना यह कितना कठिन काम है यह भी पता चलता है
निस्सन्देह कलियुग के प्रारंभ के ग्रंथकाल के लिए उसके मध्यम सूर्य का अंतर १९-३०° और मध्यम चन्द्र का अंतर ६° है; जो अंतर पहले से बहुत कम होते हुए भी इतना अवश्य बता देता है कि भारतीय कोष्ठक तार्तारों के उधार नहीं लिये हैं
निस्सन्देह कलियुग के प्रारंभ के ग्रंथकाल के लिए उसके मध्यम सूर्य का अंतर १९-३०° और मध्यम चन्द्र का अंतर ६° है; जो अंतर पहले से बहुत कम होते हुए भी इतना अवश्य बता देता है कि भारतीय कोष्ठक तार्तारों के उधार नहीं लिये हैं
कोसिनी अपने अभिप्राय में कहते हैं कि ये कोष्ठक क्रियोकोका के नहीं हैं और न ही टोलेमी या और किसी ग्रीक के; क्योंकि उनके द्वारा दिये गये सूर्य और चन्द्र के भूम्युच्च बिन्दुओं के स्थान तथा सूर्य के मंदफल संस्कार उपरोक्त सभी से भिन्न हैं
२६ . चन्द्र के गति प्रवेग के संदर्भ की ओर लौटे तो सीधा सादा सत्य यह है कि जिन कोष्ठकों के प्राचीन होने का दावा करते हैं उनकी चन्द्र की मध्यम गति अभी है उससे बहुत धीमी गति भूतकाल में दर्शानी पडेगी
यह एक ऐसी घटना है , जो श्रीयुत् द' लाप्ला ने गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक सिद्धान्त के आधार पर खोज निकाली है और वह आवश्यक रूप से श्रीयुत् द'ला ग्रान्ज ने खोजी पृथ्वी की कक्षा के उत्केन्द्र से जुडी है; जिससे चन्द्र का प्रवेग दूसरे ढंग से ग्रहों के असर के कारण उद्भूत होता है; जो ऊपर कथित उत्केन्द्रता को एक के बाद एक बढाकर , घटाकर चन्द्र पर अलग अलग मात्रा में ऐसा असर पैदा करते हैं , जिससे सूर्य का जो असर चन्द्र की पृथ्वी का चक्कर लगाती हुई गति को प्रभावित करता है , उसमें परिवर्तन होता है
यह एक ऐसी घटना है , जो श्रीयुत् द' लाप्ला ने गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक सिद्धान्त के आधार पर खोज निकाली है और वह आवश्यक रूप से श्रीयुत् द'ला ग्रान्ज ने खोजी पृथ्वी की कक्षा के उत्केन्द्र से जुडी है; जिससे चन्द्र का प्रवेग दूसरे ढंग से ग्रहों के असर के कारण उद्भूत होता है; जो ऊपर कथित उत्केन्द्रता को एक के बाद एक बढाकर , घटाकर चन्द्र पर अलग अलग मात्रा में ऐसा असर पैदा करते हैं , जिससे सूर्य का जो असर चन्द्र की पृथ्वी का चक्कर लगाती हुई गति को प्रभावित करता है , उसमें परिवर्तन होता है
यह शोध यानी हमारी प्रणाली के सभी विचलन आवर्ती हैं
हमें यह मान लेने की स्वतंत्रता नहीं है कि अयनगति उपर्युक्त गुणोत्तर के अनुसार बढ़ती है अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो संपात बिन्दु समान अनुपात में धीमी गति से पीछे जाते हैं
अब , श्रीयुत द' ला ग्रान्ज ने बताया है उसके अनुसार सूर्य का यह मंदफल संस्कार , पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रता जिस पर वह आधारित है , उसके सहित बारी बारी से वृद्धि और ह्रास का अनुभव करती है और परिणामस्वरूप अनेक युगों से वह घटता जा रहा है और हमारे६४ युग से ३१०२ वर्ष पहले इस संस्कार का मूल्य २°-६'-२८ १/२'' था , जो ब्राह्मणों द्वारा निश्चित किये गये मूल्य से केवल ५' कम है , यदि हम मान लें कि भारतीय खगोलशास्त्र कलियुग के प्रारम्भ से भी पूर्व के अवलोकनों पर आधारित है तो इस संस्कार का निश्चयन अधिक सूक्ष्मता से शुद्धरूप में हो सकेगा
परिणाम स्वरूप ग्रह का सूर्य केन्द्री स्थान प्राप्त होता है
यह सच है कि युति का निश्चित समय खुली आँख के निरीक्षण से जानना संभव नहीं है
४० . इनमें प्रथम संयोग गुरु के सर्वोच्च बिन्दु के साथ संबंध रखता है , जो कोष्ठक के अनुसार २ , ०० , ००० वर्ष में ७४ १५° वक्री गति रखता है , ऐसी धारणा है
ऐसा कदाचित् ही माना जा सकता है कि इस संभवितता ने ही भारतीय खगोलशास्त्र की गलतियों को इतना विलक्षण सौभाग्य दिया जिससे अवलोकनकार अपने समय की आकाशी पिंडों की स्थिति तो खोज नहीं पाये परंतु अपने जन्म से कुछेक हजार वर्ष पूर्व की स्थिति का वर्णन करने में सफल हुए
ब्राह्मणों के द्वारा दिया गया इस समस्या का हल अत्यंत सरल और युक्तिसंगत है
ग्रहण के समय में उस स्थान की क्षितिज पर क्रांतिवृत्त का कौन सा बिन्दु उदित हो रहा है , उसे जानना उनके लिए आवश्यक होने के कारण उन्होंने क्रांतिवृत्त के बिन्दुओं के लिए विषुवांश ( समय में ) जानने के कोष्ठक बनाये हैं , जिसे चरान्तर संस्कार लागू कर प्रत्येक राशि को क्षितिज से नीचे उतरने में कितना समय लगेगा उसकी गणना की जाती है
उनके चरान्तर संस्कार कोष्ठक क्रांतिवृत्त के कुछ बिन्दुओं के लिए हैं , जैसे कि प्रत्येक राशि के प्रारंभ के लिए और वह भी केवल मिनटों में अथवा तो अंश के दसवें भाग में हैं
एक ग्रहण में वे पृथ्वी की छाया का चन्द्र तक के अंतर का छेद चन्द्र व्यास से पाँच गुना अधिक मानते हैं
सूर्य और चन्द्र के दृश्य व्यास उसके कोणीय वेग के साथ कम अधिक होते हैं
धारणा यह है कि ग्रहण के मध्य में सूर्य जिस बिन्दु पर है , उसकी दोनों ओर गोलक का छोटा हिस्सा , उस बिन्दु पर स्पर्श के समतल के साथ सुसंगत है , ऐसा कहा जा सकता है
तब भी उसका अधिकांश हिस्सा उसमें समाहित हो जाता है
यदि ब्राह्मणों के नियम को आधुनिक पृथक्करण पद्धति के अनुसार श्रेणी के स्वरूप में व्यक्त किया जाए तो केसिनी का नियम उस श्रेणी का प्रथम पद होगा
५५ . सूर्य और चन्द्र के संस्कारों के लिए बनाई गई सारिणियों और उनके लिए प्रयुक्त नियमों के बीच भी संपूर्ण सुसंगति नहीं है , क्योंकि इन दोनों में जिसे हम उत्केन्द्रक कोणिकांतर के रूप में मानते हैं , उसी को मध्यम मध्यकेन्द्र माना जाता है
यहाँ शास्त्र के सिद्धान्तों और कोष्ठकों का प्रामाण्य एक दूसरे के विरुद्ध है
जिस कोण को हम उत्केन्द्र कोणिकांतर के रूप में जानते हैं और जिन का भारतीय कोष्ठकों में बहुत उपयोग किया गया है उसका टोलेमी ने बिलकुल भी उपयोग नहीं किया है
यह 'शीघ्रम' संस्कार का साधन सूर्य और ग्रह के मध्यम भोग का अंतर है
इन सभी कोष्ठकों में भूमिति के बहुत से सिद्धान्तों के अलावा कुछ कोष्ठकों में वृत्त के व्यास और परिघ के गुणोत्तर का भी समावेश होता है , परंतु उसका निश्चित मूल्य उनसे प्राप्त करना असंभव लगता है , क्योंकि उसका मूल्य अत्यंत कम है और गणना में उसकी अपेक्षा होना अस्वाभाविक नहीं है
अनुपात १२५० : ३९२७ वृत्त का क्षेत्रफल खोजने के लिए बहुत उपयोगी और निकटस्थ है
इस खगोलशास्त्र में दो अन्य तत्त्व , सूर्य का मंदफल संस्कार और क्रांतिवृत्त की तिर्यकता की जब वर्तमान मूल्यों के साथ तुलना की जाती है तब इस खगोलशास्त्र के प्रारंभ बिन्दु के रूप में १००० से १२०० वर्ष अधिक दूर के बिन्दु की ओर इंगित करते हैं और यह प्रारंभ ईसा से ४३०० वर्ष पूर्व हुआ बताते हैं और इतनी सूक्ष्मता से अवलोकन तथा गणना करने की कला विकसित होने में कलियुग के प्रारंभ होने तक का समय लगा होगा यह तथ्य भी उपर्युक्त निष्कर्ष का समर्थन करता है
हमने यह भी देखा है कि कृष्णापुरम् के कोष्ठक भले ही सन् १४९१ से प्राचीन न होने का दावा करते हों , वे वास्तव में त्रिवेलूर कोष्ठकों-जिनका ग्रंथकाल कलियुग के प्रारंभ का है अथवा उससे भी प्राचीन है
जब ज्ञान की उत्सुकता के कारण बंगाल ने हमारे देशवासियों के बीच एक साहित्य मंडल की रचना की है और सर विलियम जोन्स की क्षमताएँ और विद्वत्तापूर्ण मार्गदर्शन सुलभ हो रहा है , तब ऐसी आशा करना अनुपयुक्त नहीं होगा
उसका स्थान पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और निश्चित पद्धति ने ले लिया है , जो संपूर्ण घटना का सूक्ष्म पृथक्करण करती है और क्रमश: सूर्य , चन्द्र और राहुपात की गतियों की गणना करती है
उसका स्थान पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और निश्चित पद्धति ने ले लिया है , जो संपूर्ण घटना का सूक्ष्म पृथक्करण करती है और क्रमश: सूर्य , चन्द्र और राहुपात की गतियों की गणना करती है
इस खगोलप्रणाली के सूक्ष्मतम विकास के सीमाचिह्न रूप तत्त्व हैं सूर्य , चन्द्र और ग्रहों के मंदफल संस्कार गणना पद्धति की बुनियादी अवधारणा
फिर , कला और विकला पंक्तिबद्ध एक दूसरे के नीचे लिखे हैं , न कि स्तंभ स्वरूप में
चन्द्र के आरोहपात को वे दैत्य अथवा सर्प मानते हैं
श्रीयुत् बेइली कहते हैं , 'ऐसा लगता है कि , दोनों असमताएँ ( मंदफल और वार्षिक कक्षा का लंबन ) दो अलग अलग केन्द्रों से उद्भवित हुई थीं और उनके लिए इन दो केन्द्रों के बीच का अंतर तथा दोनों का स्थान निश्चित करना असंभव है
उसका सर्वप्रथम उल्लेख अरब लेखकों ने किया है
 ( Asiatic Miscel . Vot 1 , पृ . ३४ ) इससे 'सिन्द - हिन्द' इस खगोलशास्त्र के पुस्तक का नाम है , जो हबाश के समय में ( सन् ८१३ ) भारत में अस्तित्व रखती थी और वह नि:शंक रूप से वही पुस्तक है , जिसकी रचना का यश मसौदी ने 'ब्रह्मा' को दिया है
यदि उन्होंने अज्ञान और जड़ता प्रेरित पूर्वाग्रहों से घिरकर इस ज्ञानराशि को 'खो गई' मान लेने की जल्दी नहीं की होती और प्राप्त सामग्री को आरक्षित कर लिया होता तो अभी हम एशिया और यूरोप दोनों के सर्वांगपूर्ण सर्जन के स्वामी होते , विद्वानों को , जो अभी हमारे साथ हैं , उन्हें उससे अधिक पूर्णता की कक्षा में ले गये होते , एशिया की इन अनुकरणीय प्रतिकितियों ने हमारे यहाँ हुई भूमिति की घोर अवगणना और पतन को रोका होता और बीजगणित को जलसमाधि लेने से बचाया होता , साथ ही यूरोप के अधिकांश तात्विक मंडलों के प्रकाशनों के बिगड़े स्वाद तथा बेहद बढ़ी नीरसता को दूर किया होता
ऐसा होने पर भी मिश्र ( इजिप्त ) को "विज्ञान के जन्मदाता' की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है
पिरामिड , अवश्य किसी विशेष खगोलीय उद्देश्य से उत्तर दक्षिण दिशा में स्थापित किये गये हैं
यों भी कहा जाता है कि डेल्हेझेलस ने एक शताब्दी पूर्व सबसे बडे़ पिरामिड की खोज की थी और खगोलीय तथ्य ढूँढ़ निकाले थे , परन्तु इस विषय में मुझे बड़ा संदेह है
जब कि दूसरी ओर इलाम्बर्ट , ओइलर , ला'ग्रान्ज और टीशीयस का मानना है कि इस असर का परिणाम नया विषुववृत्त है , जो नये अक्ष के आसपास भ्रमण करता है
भारत में विज्ञान के विकास का दूसरा कारण यह है कि भारतीय संस्कृति विश्व के अन्य राष्ट्रों से अधिक पुरातन है
यह भी हम जानते हैं कि जो लोग सुसंस्कृत होते हैं उनका झुकाव कलाओं की साधना की ओर स्वत: होता है
न्यूटोनियन कालगणना में ऐसी धारणा है कि शिरोन ने एक गोलक बनाया और उस पर राशि चित्र अंकित किये
वर्तमान आधुनिक ब्राह्मण जिस पद्धति को अपनाते हैं उसे अथवा तो पालन करते हैं उस पद्धति के अवलोकनों पर कोई प्रभाव पड़नेवाला नहीं है , क्यों कि अवलोकन किसी सम्प्रदाय या पंथ के नहीं होते हैं , तथ्यगत होते हैं; वेधशाला चाहे टोलेमी पद्धति की हो या कोपरनिकन पद्धति की , यदि वह संख्या बहुत बड़ी हो और बहुत सावधानीपूर्वक तैयार की गई हो तो वह आधुनिक खगोलशास्त्र की अति महत्त्वपूर्ण सेवा मानी जाएगी; भले ही पृथ्वी को स्थिर माना जा रहा हो या गतिशील
जब स्थान के अक्षांश और सूर्य की क्रान्ति एक ही दिशा में हो और क्रान्ति की अपेक्षा अक्षांश कम हो , जब सौरघड़ी के शंकु का आधार अतिवलयाकार छाया के बहिर्गोल चाप से बाहर ही रहे; परिणामस्वरूप वक्र पर इस बिन्दु पर स्पर्शक रेखा खींची जा सकती है जो दर्शाती है कि छाया पीछे की ओर कब जाएगी , शेष सभी घटनाओं में शंकु हमेशा पूर्ण रूप से शांकव के अंदर ही रहेगा
संक्षेप में , अग्निपूजा यहूदियों की मूर्तिपूजा का एक मुख्य अंग बन चुका है , क्यों कि यह पद्धति उस युग में समग्र भारत में व्याप्त थी और अभी भी मलबार समुद्र तटीय क्षेत्र में है
स्वाभाविक तो यह है कि पुरानी प्रणाली ने लम्बे समय तक निजी रूप में अपना स्थान बनाये रखा होगा , भले ही सार्वजनिक रूप में ब्राह्मण भी शासक के मतानुसार आचरण कर रहे हों
ऐसे नकशे आशीर्वाद रूप नहीं बल्कि अनिष्टरूप हैं; ऐसे नकशे और सर्वेक्षणों को सुधारने की एकमात्र पद्धति है कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं के स्थान खगोलशास्त्रीय पद्धति से निश्चित करना
इस क्षेत्र के विद्वानों को पूछने पर जानकारी प्राप्त हुई कि मंगल का व्यक्तित्व एक योद्धा जैसा है और गुरु की आकृति एक बैठे हुए वृद्ध व्यक्ति की है , जिसके आसपास चार कन्याएँ नृत्य कर रही हैं
उसकी प्रणाली टोलेमी प्रणाली ही है
मूल प्रति श्री पाल्क के पास है
ब्राह्मण ने मुझे एक सौ आठ धूमकेतुओं के कोष्ठकों की प्रतियाँ देने का वचन दिया है और जब मैं बंगाल वापिस लौटूँगा तब वह यदि जीवित होगा तो मैं उससे प्राप्त करने का प्रयास करूगाँ
वह कहता है कि धूमकेतु विविध प्रकार के होते हैं , कुछ की पूंछ सीधी होती है , कुछ की टेढ़ी
मुसलमान मानते हैं कि सूर्य पृथ्वी के आसपास दैनिक एवं वार्षिक गति करता है; परंतु पृथ्वी अपनी धुरी पर बंगाल के उपसागर में स्थित टापुओं में असाधारण ऊँचाई तक सीप एवं अन्य समुद्री उत्पाद फैले हुए दृष्टिगत होते हैं और सैकड़ों फुट की ऊचाँई पर स्थित हरिद्वार के समीप गंगातट चिकने गोल पत्थरों से भरा पड़ा है
मुसलमान मानते हैं कि सूर्य पृथ्वी के आसपास दैनिक एवं वार्षिक गति करता है; परंतु पृथ्वी अपनी धुरी पर बंगाल के उपसागर में स्थित टापुओं में असाधारण ऊँचाई तक सीप एवं अन्य समुद्री उत्पाद फैले हुए दृष्टिगत होते हैं और सैकड़ों फुट की ऊचाँई पर स्थित हरिद्वार के समीप गंगातट चिकने गोल पत्थरों से भरा पड़ा है
पोपवाद और देवतावाद के विभिन्न सिद्धान्त 'ब्रह्मा' और 'बुद्ध' के साथ पर्याप्त साम्य रखते हैं और जिस प्रकार टोलेमी की खगोल प्रणाली के लेखक ब्राह्मण थे , ठीक उसी प्रकार प्रतीत होता है कि कोपर्निकस की प्रणाली एवं आकर्षण सिद्धांत का शोध करनेवाले बौद्ध थे
इतना ही नहीं , वे न्यूटन की जैसी ही विकलन पद्धति से अच्छी तरह परिचिति थे , इसकी पुष्टि में मैं बहुत से प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूँ
द्विपदी प्रमेय के संदर्भ में अपूर्णांक घातांकों के लिए उसका उपयोग कदाचित हमेशा के लिए न्यूटन की विशिष्टता बनी रहेगी; परंतु नीचे दिया गया प्रश्न और उसका हल स्पष्ट रूप से बताता है कि पूर्णांकों के लिए उसका ब्रिग्ज के बिज जैसा ही उपयोग हिन्दु पूर्णत: जानते थे और पास्कल की अपेक्षा अधिक अच्छे ढंग से जानते थे
शेरविन के कोष्ठकों के एक मूल्यवान संस्करण में डॉ . हुरोन ने अंतत: ब्रिग्ज को न्याय किया है
क्योंकि मैंने कुछ खगोलशास्त्रीय अवलोकन तैयार किए हैं; जैसे कि , आराकान्त किनारे पर स्थित टापू से सात मील दूर दक्षिण में स्थित टापू की चट्टान पर , जिसका शिखर सर्वाधिक ज्वार के चिह्न से अठारह फुट ऊँचा था यह सारी चट्टान झींगों की सीपों से भरी पड़ी थी
इस तथ्य को यदि समर्थन की आवश्यकता होगी तो ऐसा समर्थन भास्कराचार्य के दूसरे ग्रंथ 'करण कुतूहल' , जो कि खगोलशास्त्र का प्रायोगिक ग्रंथ है , उसके ग्रंथकाल द्वारा प्राप्त हो जाता है
श्री बेन्टली , जो कि भारतीय खगोलशास्त्रियों को अति प्राचीन मानने के पक्ष में बहुत कम होते हैं उन्होंने ब्रह्मगुप्त द्वारा सिखाई गई खगोल प्रणाली लगभग बारह सौ से तेरह सौ वर्ष जितनी प्राचीन होने के कारण दिये हैं
इससे , यों माना जा सकता है कि आर्यभट्ट का ग्रंथ जिस समय अस्तित्व में था , उसमें निश्चायक पृथक्करण में द्विघात समीकरण का भी समावेश होता था और उसका विस्तार प्रथम कक्षा के अनिश्चायक कूट प्रश्नों तक हुआ था
खलीफा अब्बासादी के शासनकाल में अरब खगोलशास्त्रियों को भारतीय खगोलशास्त्र विषयक जो जानकारी मिली उसके अनुसार , वे जानते थे कि उन दिनों हिन्दुओं में तीन अलग-अलग खगोल प्रणालियाँ प्रचलित थीं और उनमें से एक के साथ आर्यभट्ट का नाम सहज परिवर्तित रूप में भी , सर्वथा अपरिचित नहीं था
जो अरबी अभिव्यक्ति के अनुसार वह अर्जबाहर अथवा 'आर्जभर' भी कहा जा सकता है
इससे , निष्कर्ष यह निकलता है कि अबुल फरीज के प्रमाण के आधार पर , आर्यभट्ट ग्रीक बीजगणितज्ञ डायोफेन्टस जितने ही प्राचीन होने चाहिए , जो सम्राट जुलियन के समय में अर्थात् सन् ३६० में हुए थे
संस्कृत में वर्ण शब्द का दूसरा अर्थ 'अक्षर' भी होता है
डायोफेन्टस ऋणात्मक मूल्य दर्शाने के लिए ellipsis शब्द प्रस्तुत करता है , जिसका अर्थ 'हानि' अथवा 'कमी' होता है
डायोफेन्टस ऋणात्मक मूल्य दर्शाने के लिए ellipsis शब्द प्रस्तुत करता है , जिसका अर्थ 'हानि' अथवा 'कमी' होता है
इस प्रकार , उनके पास यथेच्छ या संक्षिप्ताक्षरी , ज्ञात या अज्ञात मूल्य के लिए या फिर पदों ( steps ) के लिए या प्रक्रियाओं के लिए कोई भी संकेत नहीं है; परंतु वे इन सबके लिए शब्द और शब्द समूहों का पूर्ण विस्तारपूर्वक उपयोग करते हैं
पीजा के लियोनार्डो और उनके शिष्यों ने इसका लेटिन भाषा में भाषान्तर किया 'रेस' और इतालवी में किया 'कोसा'
ऋणात्मक राशियों को धनात्मक राशियों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को अरबों ने नाम दिया है , 'जब्र
भास्कराचार्य के बीजगणित के ग्रंथ में वैविध्यपूर्ण उदाहरण दृष्टिगत होते हैं
जिन विषयों पर हिन्दु बीजगणित ग्रीकों की बीजगणित की तुलना में भिन्न है , उसके कारणों में बहुत अच्छी और सर्वग्राही गणन पद्धति के अतिरिक्त नीचे निर्दिष्ट कतिपय बिन्दु भी हैं - १ . एक से अधिक अज्ञातवाले समीकरणों को व्यवस्थापन ( इसके आधार पर अरबों द्वारा लिखे गये दो प्रकार , जैसे कि सदा और संकुल
४ . खगोलीय छानबीन तथा भौमितिक निदर्शनों में बीजगणित का उपयोग , जिसमें उन्होंने ऐसी वस्तुएँ खोजी थीं , जिनकी बाद में पुन: खोज हुई
दूसरी कक्षा की अनिश्चयात्मक समस्या के हल करने की भास्कराचार्य की पद्धति यथातथ लोर्ड ब्रोंकर के द्वारा फर्मेट के एक चुनौती रूप प्रश्न का उत्तर देने के लिए सन् १६५७ में प्रयुक्त की गई पद्धति जैसी ही है
अधिक स्पष्टता करते हुए वे कहते हैं कि यह युक्तियों से युक्त एक पद्धति है
उसके ( डायोफेन्टस के ) ग्रंथ में बीजगणित का मूलभूत तत्व स्पष्ट रूप से संग्रहीत है
जबकि मुहम्मद अबुलवफा अल बुझानी ने डायाफेन्टस के ग्रंथ के रूपान्तर के साथ में भिन्न स्वरूप में , डायोफेन्टस के सिद्धांतो के उदाहरणों को दिया; इसी व्यक्ति ने खारिझामिते मुहम्मद बिन मूसा के बीजगणित विषयक ग्रंथ की टीका लिखी और दूसरे एक अल्प प्रसिद्ध और बाद में हुए अबी याह्या नामक बीजगणतज्ञ-जिनके भाषणों में बुझानी स्वयं उपस्थिति थे , उनके लेखों की टीका भी लिखी
बीजगणितीय कलनगणित खोज और विकास स्वत: सरल और सहज बन जाएगी , जिससे अंकगणित रूपी नींव को योग्य पोषण प्राप्त होगा
हिन्दुओं ने बहुत पहले से , विशेष कर समय के परम शुद्ध मापन एवं नियमन के हेतु खलोगशास्त्र में अच्छी प्रगति की थी
जिस अवलोकन की ओर ध्यान आकर्षित करने से उन्होंने सभी महत्त्वपूर्ण ताराओं के स्थान विषयक ज्ञान प्राप्त किया और धार्मिक कारणों तथा अंधश्रद्धायुक्त मानसिकता से प्रेरित होकर उन्होंने सूर्य सहोदय और उसके जैसी अन्य अनेक खगोलीय घनटाओं का निरूपण किया
वे विशेषकर बाह्य ग्रहों में सर्वाधिक आकर्षक गुरु ग्रह से अधिक परिचित थे
क्योंकि उसमें जिन तत्त्वों को वे दैवी मानते हैं , वे दूसरे अर्थ में मुक्त क्रियाएँ हैं , जैसा कि उनकी दृश्यमान गति के विषय में
'ग्रहों और ताराओं के निरीक्षण के आधार पर तथा खगोलीय गणनाओं को करने पर पृथ्वी पर घटनेवाली घटनाओं को पहले से ही कहा जा सकता है
' - यह विचार सर्वप्रथम चाहे जब भी आया हो या चाहे जब इस सनक का उदय हुआ हो , एक बात तो निश्चित है कि हिन्दुओं ने ज्योतिषशास्त्र के विषयों के संबंध में अन्य देशों से बहुत कुछ प्राप्त किया है और स्वीकार किया है
प्रत्यक्ष प्रमाण तथा हकारात्मक सत्यता के अभाव में इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि ग्रीकों का अधूरा बीजगणित , जो उनके हाथ में डायोफेन्टस द्वारा सिखाये अनुसार एक अज्ञात के समीकरण के हल से आगे न बढ़ पाया , वह हिन्दुओं तक उनके खगोल का मार्गदर्शन देनेवाले ग्रीक शिक्षकों द्वारा पहुँचा होगा , ऐसा होना संभवित नहीं लगता
परंतु हिन्दु विद्वानों की निपुणता के कारण एक संकेत बहुत फलदायी सिद्ध हुआ और बीजगणित की पद्धति रूपी इस सूक्ष्म अवस्था से परिपक्व होकर उसने एक व्यवस्थित विज्ञान का स्वरूप धारण किया , जिस प्रकार प्रारंभ में आर्यभट्ट ने सिखाया और जिस प्रकार ब्रह्मगुप्त एवं भास्कराचार्य के संग्रहीत ग्रंथो में सुरक्षित था; ये दोनों ही ग्रंथ विद्वानों के अध्ययनार्थ प्रस्तुत हैं
ब्राह्मणों के अभिलेखों के अनुसार कासिम बाजार के रास्ते के लगभग मध्य में गंगा के तट पर अवस्थित एक छोटे से कस्बे चम्पानगर के एक वैद्य धन्वंतरि द्वारा सबसे पहला टीका दिया गया
भारत में टीकाकरण का कार्य विशेष रूप से ब्राह्मण जाति के लोगों द्वारा किया जाता है
इनकी यह टीकाकरण की पद्धति मौसम के अनुसार तथा रोग के प्रकोप के अनुसार अलग अलग समय में निश्चित की जाती है
इस बीमारी से ग्रस्त होने से एक या दो दिन पूर्व मरीज की भूख मरने लगती है , उसे अलग तरह की शिथिलता महसूस होती है तथा मुँह सूखने लगता है
बंगाल के निवासी टीकाकरण करनेवाले ब्राह्मणों की वापसी के समय के बारे में भलीभाँति अवगत होते हैं
वे किसी भी भाग पर किसी प्रकार से टीकाकरण करते हैं लेकिन यदि उनकी पसंद बांया भाग हो तो पुरुषों के लिए बाँह के बाहरी भाग पर कलाई और कुहनी के मध्यभाग को पसंद करते हैं तथा महिलाओं के लिए कुहनी एवं कंधो के मध्यभाग को पसंद करते हैं
मरीज को घर से बाहर निकलने की पूर्ण मनाही होती है
वायुमंडल में विद्यमान हानिकर जंतु , जो कि समस्त रोगजनक कारक होते हैं , तथा अन्य महामारी वाले विकार ब्राह्मणों के इस रोगप्रचारक सिद्धांतो में एकल कारक नहीं होते हैं , तथापि , इससे निकाले गए उनके कुछ निष्कर्ष नितांत उनके अपने होते हैं
इस संबंध में टीकाकरण के कार्य में प्रवृत्त ब्राह्मणों की चेचक के मरीज को बुखार आने तक ठंडे पानी से स्नान कराने की पूर्व की इस सामान्य पद्धति पर कुछ भी कहने के लिए हमें इस प्रथा के कुछ तर्कपूर्ण आधार खोजने होंगे क्योंकि इस बीमारी में इसका उपयोग चिकित्सकीय उपचार के रूप में किया जाता है , जिसकी विधि अत्यंत सरल है
तत्पश्चात बुखार उतरने पर पुन: मरीज पर ठंडे पानी से स्नान की विधि को बीमारी की समाप्ति तक जारी रखते हैं जिसके संबंध में उनकी स्पष्ट धारणा यह है कि इससे रक्त को रोजाना नया प्रवेग प्राप्त होता है , जिसके परिणामस्वरूप रक्त में शेष बचे इस बीमारी के आसन्न कारक तत्त्व मवाद के रूप में बाहर निकल आते हैं
पूर्व के ये वैद्य अत्यंत सादगी के साथ सिराच्छेदन तथा विरेचनशास्त्र की पाश्चात्य पद्धति को बीमारी के किसी भी स्तर पर संदेहास्पद रूप में देखते हैं लेकिन जब इसे रोकना हो या द्वितीय बुखार को कम करना हो तो वे आरोप लगाते हैं कि ऐसा करने से पहली बात तो यह कि प्राकृतिक शक्ति का ह्रास होता है तथा दूसरी बात यह कि यह प्रकृति के नियमों के विपरीत है
जब यह बिल्कुल सूख जाए तो उसे अपने चिनम रस से ब्रश की सहायता से अच्छी तरह से पोत देना चाहिए
समस्त कठोर छालों में बलूत के पेड़ की छाल अन्य छालों से बेहतर होती है
इलाहाबाद में ( जिस स्थान पर मैंने सैद्धांतिक रूप से इस संबंध में जाँच की ) मुझसे संबंधित एक बर्फ निर्माता ने गर्मी के मौसम में उपयोग के लिए सर्दी के मौसम में पर्याप्त मात्रा में बर्फ बनाई
इसके तल में आठ इंच या एक फूट मोटाई की गन्ने या बड़ी भारतीय मक्का के सूखे डंठल बिछाकर गादी बनाई जाती
मौसम जितना साफ , हल्का एवं निरभ्र होगा तो उतना ही वह जमाव के लिए अधिक अनुकूल होगा क्योंकि कई बार हवा की दिशा बदलने पर बादल निश्चित रूप से बाधक स्थिति उत्पन्न कर देते हैं
पात्र संरंध्र होने से उसमें अंदर ठंडी हवा जाने का अवकाश रहता है तथा उनकी स्थिति मैदानी भागों में जमीन के अंदर कुछ फुट होने से उनमें बाहर की हवा नहीं जा पाती अत: जमे हुए खंडो को वियोजित नहीं कर पाती
इनके बीज एक दूसरे के पास में बोने चाहिए ताकि इसका तना खूब ऊँचा बढ़ सके , शाखाएँ कम से कम निकलें और उत्पादन भी बढ़े
इस पर अक्टूबर में फूल आते हैं तथा दिसंबर में इसे काट लिया जाता है
जब ये उत्पाद पुराने होकर रद्दी हो जाते हैं तो इस देश का अधिकांश कागज इसी से बनाया जाता है
निर्माता सन से निर्मित पुरानी रस्सियाँ , कपड़े , टाट , टाट की जालियाँ आदि खरीदता है
इससे वह हौज के पानी को तब तक खँगालता रहता है जब तक वह दूध जैसा और लुगदी के अंश जैसा सफेद न हो जाए तथा लुगदी के अंश तैरने न लगें
वह विस्तारक को निकालकर शीट को स्क्रीन के ऊपरी हिस्से पर लपेटता है जिससे शीट स्क्रीन से अलग हो जाती है
जब ये शीटें पूरी तरह से सूख जाती हैं उन्हें चाकू की सहायता से मानक शीट के चतुर्भुजीय आकार में काट लिया जाता है ( आकृति-७ ) 
१२ . भारतीय कृषि मलबार की कृषि- सामान्यत: हिंदुओ द्वारा की जानेवाली कृषि को यूरोपीय लोगों द्वारा दोषपूर्ण बताया गया है- उनका यह दृष्टिकोण कितना औचित्यपूर्ण है ? उनके हल एवं कृषि के औजार कैसे हैं- वे कृषि के सिद्धांतों को भली भाँति समझते हैं लेकिन पूँजी की कमी तथा यहाँ के लोगों का कंगाल होना इसमें मुख्य बाधा है- लोगों के इस संबंध में विविध मत हैं- उनका फालवाला हल सिचाई एवं प्रतिरोपण गुजरात और दक्षिण की कृषि पर भी चर्चा मालबार कृषि व्यवसाय- धान की फसल तथा विभिन्न लोगों की स्थिति- बडे कृषि जोत , जमीदार , किसान , गुलाम , तथा कृषि श्रमिक , मिट्टी
उनकी जीवनशैली के कारण कृषि उन्हें प्रिय है
कृषि कर्म में हल सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण यंत्र है
उन्हें वह अपनाएगा भी आखिर कैसे ? लेकिन वह ऐसी किसी पद्धति को अपनाने से इंकार नहीं करेगा जो किफायती तो हो; साथ ही , उसमें कम श्रम की आवश्यकता भी होती हो
मुझे याद है कि लगभग चालीस वर्ष पूर्व सेलसते पर स्थानीय लोगों को अंग्रेजी हल तथा कृषियंत्र प्रयोग करने हेतु दिए गए
यह पद्धति भी ऐसा प्रमाण है जिससे इस ढंग से वे इस फसल को पैदा करने में पूर्ण रुप से सफलता प्राप्त करते हैं
धान की फसल पैदा करनेवाले खेतों में पहला प्रयोग अनुपयोगी सिद्ध होता है क्योंकि इनमें सदैव गीलापन रहता है तथा प्राय: पानी एवं कीचड दोनों ही होते हैं
पहला प्रयोग ऐसे खेतों में किया जाता है जहाँ खेत ऊँचे-नीचे न होकर समतल होते हैं और हल जमीन की ऊपरी परत पर रगङकर अच्छी तरह से चल सकता है
भारत के कुछ भागों में घास नहीं पाई जाती जबकि दूसरे भागों में प्रचुर मात्रा में घास पाई जाती है जिसे कृषक किसान सूखी घास के रूप में पर्याप्त मात्रा में संरक्षित करके रख लेता है जो कि कमी के समय में पशुओं को खिलाने के लिए काम आती है
सूखी घास दराँती से न काटी जाकर हँसिया से काटी जाती है
यह तब होता है जब लोग शांति एवं सुरक्षा चाहते हैं
यह देश वास्तव में विविधताओं का ऐसा संपुट है जहाँ इस विशाल देश के विविध प्रांतो में शायद २०० मिलियन से भी अधिक लोग रहते हैं जिनकी विचार धाराएँ अलग अलग हो सकती हैं लेकिन उनमें से कुछ लोग पूरी तरह से बंगाल के बारे में अनभिज्ञ भी हो सकते हैं फिर भी बंगाल का भारत की समग्रता में महत्त्वपूर्ण हिस्सा है
यह देश वास्तव में विविधताओं का ऐसा संपुट है जहाँ इस विशाल देश के विविध प्रांतो में शायद २०० मिलियन से भी अधिक लोग रहते हैं जिनकी विचार धाराएँ अलग अलग हो सकती हैं लेकिन उनमें से कुछ लोग पूरी तरह से बंगाल के बारे में अनभिज्ञ भी हो सकते हैं फिर भी बंगाल का भारत की समग्रता में महत्त्वपूर्ण हिस्सा है
लिथुआनिया में एक ही फसल बार बार पैदा की जाती है
कुछ स्थान उनकी मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता के कारण से बहुत अच्छी फसल पैदा करने के लिए सर्वथा उपयुक्त होते हैं तो कुछ में कृत्रिम श्रम एवं दक्षता का समुचित उपयोग करने के उपरांत भी सकारात्मक परिणाम नहीं मिलते
लेकिन जो मलबार में घाट जैसे स्थान हैं जो वृक्षों से आच्छादित हैं , वहाँ इस प्रथा को अपनाने से विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं; अत: वहाँ इसका उपयोग नहीं किया जाता
ये बच्चे प्राय: किसानों के होते हैं तथा ये ताजा गोबर को डामर या सुखी घास के साथ मिश्रित करके उपले बनाकर उन्हें धूप में सुखा देते हैं
छितराव पद्धति से बीज बोकर खेती करने से उत्पादन एक चौथाई अधिक बढ़ जाता है
वे सिंचाई के लिये उपयोगी नहीं थे
कई बार आवर्तन पद्धति का फसल उगाने में उपयोग किया जाता है लेकिन जहां कछारी भूमि होती है वहाँ आवर्तक फसल उगाना अनावश्यक होता है
उनके द्वारा किए जाने वाले कृषि-प्रबंधन के ब्यौरों से यूरोपीय कृषक लाभ उठा सकते हैं
यह भी सही है कि गुजरात में अधिकांश जमीन अत्यंत उत्पादनक्षम है तथा यहाँ की भूमि को परत भूमि के रूप में खाली रहने देने की अपेक्षा वर्ष प्रति वर्ष नियमित रूप से क्रमश: अच्छी फसलें पैदा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है
मलबार में कृषि महत्त्वपूर्ण और प्रतिष्ठाप्राप्त व्यवसाय है
इस स्थिति में हल चलाने के लिए पशुओं का अधिक उपयोग किया जाता है
मलबार के दक्षिणी भाग उत्तरी भाग की अपेक्षा अधिक उर्वर हैं
पूरे वर्ष का मौसम उर्वरक्षम है
एक ही झलक में एक खेत में रोपाई के दृश्य एक साथ देखे जा सकते हैं एवं दूसरे खेत में पौधों के पानी से ऊपर तक बढ़कर लहलहाने के दृश्य दिखते हैं
उनका हल उनकी जमीन की प्रकृति के अनुसार तथा उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य के अनुसार होगा
किसान सूर्योदय से पहले काम करने के लिए खेत में जाता है और सूर्यास्त तक वहाँ काम करता है
ग्रीक जो कृषि के आविष्कर्ता के रूप में बच्छू को मानते हैं और कहते हैं कि वही पहला व्यक्ति था जो सर्वप्रथम भारत के बैलों को यूरोप में लाया
इस कार्य को पुरुष एवं महिला दोनों करते हैं
सामान आदि ढोने में समग्र श्रम बैलों तथा लोगों द्वारा ही किया जाता है
यह बात स्पष्ट ही है कि जमीन की प्रकृति की कृषक द्वारा फसल के निर्धारण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिक होती है
जहाँ जमीन आधा वर्ष कठोर एवं संसक्तिशील होती है वहाँ इस तरह की उपजाऊ भूमि हो सकती है
इसीलिये उसे 'पार्शि' कहा जाता है
'२६ साथ ही , यह भी समान रूप से उल्लेखनीय है कि मलबार के किसान का यह प्रयोग सर एच . डेवी के दार्शनिक पर्यवेक्षण के समान ही सिद्ध होता है कि , जमीन की उर्वरता उसके द्वारा नमी को अवशोषित करने की शक्ति के ऊपर आनुपातिक रूप से आधारित होती है , जिसे एलुमिना या शुद्ध मिट्टी कहा जाता है
यह देखा गया है कि यद्यपि हिंदू मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन करते हैं वे उद्यान विज्ञान से अत्यंत कम जुडे हुए होते हैं तथा उद्यान भी कम ही लगाते हैं
इससे प्रदर्शित होता है कि भारतीय कृषक आधुनिक कृषि व्यवसाय के अधिकांश प्रबोधित सिद्धांतों का प्रणेता है
१६ . इस दृष्टांत से प्रभावित होकर हमें मानना पड़ेगा कि भारत में मुसलमान घुल मिलकर शांति पूर्वक ढंग से धैर्यपूर्वक रहने की दिशा में प्रवृत्त थे तथा किसी अन्य देश के मुसलमानों द्वारा कहीं भी जाने पर उनके स्वयं को स्थापित करने की मंशा की तुलना में भारत के मुसलमान यहाँ की संस्कृति एवं सुधारवादी स्वरूप में कहीं अधिक रच पच गए थे
मुझे पता चला कि बुवाई के हल का उपयोग यहाँ व्यापक रूप से इन्नाकोंडा जिले में चने के सिवाय सभी फसलों के लिए किया जाता है
इनमें एक हल में बुवाई के हल के समान ही समस्तर फाल होती है
मैं ने कुछ पुस्तकों में पढ़ा है कि पेटेंट किया गया बुवाई का हल त्रुटिपूर्ण है क्योंकि इससे बुवाई के समय बीज जमीन की मिट्टी में समान रूप से नहीं गिरता है
इस हल को पहली बार खरीदने के लिए कुछ शिलिंग ही खर्च करने होंगे जबकि पेटेंट किया गया बुवाई का हल बहुत अधिक महँगा है
आपको कृषि बोर्ड के साथ इस संबंध में पत्राचार करना चाहिए
 ( तीन हलों का सेट लंदन में कृषि बार्ड को विधिवत प्राप्त हुआ तथा इन तीनो हलों के रेखाचित्र ( उपयुक्त विवरण के साथ ) 'कृषि बोर्ड के पत्राचार" ( १७९७ ) के प्रथम खंड में प्रकाशित हुए
मैं इस आलेख को समाप्त करने से पूर्व सन का भी उल्लेख करना चाहूंगा जिसकी उत्कृष्ता कपास से जरा भी कम नहीं है
जंगल के इस सघन भाग में बहुत बडी संख्या में पनई ताड के वृक्ष हैं जहाँ पहले बडे गांव तथा अत्यंत अधिक जनसंख्या होगी
बहुत बडी संख्या में चाँदी एवं ताँबे के व्यवसाय से जुडे लोग थे जो कि अत्यंत समृद्ध थे लेकिन उनके परिवार के अब बचे लोग अत्यंत गरीब हैं तथा अत्यंत दयनीय स्थिति में हैं
इस कच्चे लोह खनिज को बडी आसानी से निकाला जाता है क्योंकि यह गोल पत्थरों के रूप में होता है जो एक दूसरे से अलग होते हैं
कच्चे लोहे की एक टोकरी का एक दब्ब होता है जो कि एक भट्ठी के लिये १२ चाहिये
इसकी कठोरता के कारण इसका उपयोग पिघलाकर स्टील बनाने में किया जाता है
चट्टान को तोड़कर इसे निकाला जाता है लेकिन इसका लोह अयस्क अच्छी किस्म का नहीं होता
कटोला जिले की लोह खदानें पन्ना जिले में हीरे की खदाने हैं तथा जिस क्षेत्र में ये पाई जाती हैं उस क्षेत्र के समीप कटोला की लोह खदानें हैं
इन में से प्रथम एवं द्वितीय ( सं . २४ ) का लोह अयस्क आगे वर्णित देयरा खान के लोह अयस्क जैसा है तथा तीसरी खदान ( सं . २५ ) का लोह अयस्क विभिन्न आकारों के पानी में घिसे पथ्थरों जैसा है जो कि लोहमय बालुई मिट्टी में दबा हुआ है
अत: मैं इस जिले की और अच्छी खदानों , जैसे साईंगढ एवं चंद्रपुरा की खदानों का विवरण प्रस्तुत करूँगा जो कि विंध्याचल पर्वतमाला की चोटी पर हैं तथा उस स्थान के समीप है जहाँ से नदियों का जल अलग होता है
लोह अयस्क शुद्ध करने की पद्धति भी भारत के अन्य भागों जितनी अच्छी नहीं है
ये स्तरित स्फटिक चट्टान से निर्मित पहाडियों की निम्न शृंखला के समीप हैं जिसमें स्पष्ट रूप से फैल्सपर होता है
यह भूरा जल ऑक्साइड होता है जो कि तन्तुमय एवं सघन दोनों तरह का होता है लेकिन इनमें से पहला खूब होता है
इसमें शायद आर्सेनिक होता है अत: इसे अत्यंत सावधानीपूर्वक निकाल कर फैंक दिया जाता है
अपने शोधक कारखानों में वे विशेष रूप से सागौन , मौवा या बाँस का उपयोग करते हैं
भट्टियाँ उनकी पिघलाने वाली भट्टियाँ ऊपर से देखने में बडी अनगढ सी दिखती हैं; परन्तु , आंतरिक संरचना में आनुपातिक दृष्टि से बिल्कुल निश्चित होती हैं
इसकी लम्बाई का औसत बडे हाथ के लिये १९ या २० इंच तथा छोटे हाथ ( क्युबिट ) के लिये १६ इंच होती है
इससे बडे उभार का केंद्रबिंदु बनता है
यह सर्वाधिक उष्णता का बिन्दु होगा; आगे 'ई' से 'फ' तक और छह बिंदु निर्मित होते हैं
गर्मी को सह सकनेवाला एक बडा पत्थर का टुकडा इसके तरे में रखा जाता है
जब इस तरह भट्ठी निर्मित हो जाती है तो इसे सूखने दिया जाता है और इसी बीच अन्य उपांगों की रचना की जाती है जिन्हें भारतीय गुदैरा , पचर , गरेडी एवं अकैरा कहते हैं ( इनके अंग्रेजी भाषा में समतुल्य शब्द नहीं हैं ) विशेष रूप से अकैरा अत्यंत असाधारण उपकरण होता है ( आरेख-१ आकृति-४ एवं-५ एवं आरेख-२ आकृति-१+ ) 
कुछ समय के लिए भट्ठी का कार्य बंद करके उसकी मरम्मत करके पुन: इसका उपयोग किया जा सकता है
अग्रभाग ऊपर से लेकर 'एस एस' रेखा अकैरा से ऊपर तक ( आरेख-घ आकृति - १ खंड ३ ) दीवार बनाई जाती है जिसे छोटे क्युबिट से निश्चित किया जाता है
आकृति - ६ मिट्टी की एक नली हे जिसे शोधकशाला में धोंकनी के अंत में जोड दिया जाता है , आकृति - ७ भी इसी प्रकार की एक नली है जिसे लघु वृत्ताकार भट्टियों में उपयोग किया जाता है
निष्कर्ष इस छोटी भट्ठी की तुलना यूरोप की किसी छोटी भट्ठी से करने की मेरी मंशा थी
यह ( आनुपातिक रूप से ) अधिक मजबूत लोहा था | वह जोवली के लोहे की तुलना में अधिक मजबूत भी था तथा कोमल भी था
उपर्युक्त कथन कैप्टन फॉर्ब्स अधीक्षक भाप इंजन एवं मशीनरी को संबोधित करते हुए लिखे गए थे जिनके लिए मैं ने परीक्षण एवं प्रयोग किए थे
प्रत्येक पँसेरी में ५ सेर होते हैं तथा आठ का एक मन अर्थात् ४० सेर होता है
१० . नोट : प्रगलन की प्रक्रिया करने से पूर्व लोह अयस्क को सेकने के कुछ लाभ भी होते हैं जिन के लिए खर्च तो आता ही है तथा इसकी समग्र सफलताओं के कारणों को मैं निम्मानुसार स्पष्ट कर सकता हूँ : यूरोप में भट्टियों , जहाँ तक मैं जानता हूं , सामान्यत: अभिलम्ब होती हैं तथा इन में लोह अयस्क अभिलम्ब रूप में अंदर गिरता है
२ . इंग्लैंड से भारत को बडे पैमाने पर निर्यात किये जाने वाली चीजों में लोहे का व्यापार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है
अकेले मद्रास को ही प्रति वर्ष १००० टन लोहा भेजा जाता है
३ . ढुलाई पर होने वाले अत्यंत अधिक खर्च की वजह से अंग्रेजी लोहे का उपयोग दक्षिण भारत में नहीं किया जाता
अंग्रेजी पद्धति से लोहे का उत्पादन इंग्लैंड में अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ है; अत: भारत में भी इसी प्रक्रिया के अनुरूप वैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है
परिशोधन की इस प्रक्रिया में एक टन ढला हुआ लोहा तैयार करने के लिए चार से पाँच टन कोयले की खपत होती है
६ . ढले हुए लोहे को सलाखों में परिवर्तित करने के लिए इंग्लैण्ड में सामान्यत: 'परिशोधन' नामक प्रथम प्रक्रिया की जाती है जिसमें लगभग एक टन लोहे को समतल खुली भट्टियों में करीब तीन फीट चौरस रूप में भरकर उसे दो या दो से अधिक घंटे तक गर्म करने की सघन क्रिया की जाती है जिसके कारण इस में काफी गैस उड जाती है
१० . इस तरह से परिशोधन भट्ठी में काठकोयले का उपयोग कर के तैयार किया गया ढलवाँ लोहा , इंग्लैंड के लोहे से अधिक भिन्न नहीं होता है , लेकिन धातु को बह कर बाहर निकलने नहीं दिया जाता
११ . पहले जर्मनी में इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए कभी कभी 'स्ट्यूक ऑफन' नामक भट्ठी का उपयोग किया जाता था जो कि दस से पंद्रह फीट ऊँची तथा तीन फीट व्यास वाली होती थी , जो कोयला भट्ठी जैसी ही होती थी लेकिन क्रिया पूर्ण होने के पश्चात् इसमें एक बडा दरवाजा तोड्कर खोला जाता था , जिस के लिए १२ घंटे का समय लगता था
कभी कभी तो तैयार लोहे से आठ गुना काठकोयला प्रयुक्त होता है
१५ . इन भट्टियों को निर्मित करने के लिए सर्वप्रथम लगभग दो फीट चौरस तथा पाँच इंच मोटा प्लेटफार्म बनाया जाता है
खाल की गर्दन के साथ पाइप का बाहरी भाग कसकर बांधा जाता है जो शंक्वाकार होता है
गुणवत्ता देखने के लिए गर्म होने पर कुल्हाडी से काट लिया जाता है
प्रयोग के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि लोह अयस्क चुम्बकीय ऑक्साइड की विशिष्ट मात्रा के साथ प्राप्त नहीं होता है तो केटलान भट्ठी काम नहीं कर सकती
लेकिन मेरा मानना है कि जर्मन पद्धति की 'स्टॉइक ऑफन' का उपयोग अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगा
इससे एक ही बार में लोह को पिटवाँ लोहे के रूप में परिवर्तित किया जा सकेगा
मैं मानता हूं कि भारत का निम्नतम दर्जे का लोहा भी इंग्लैण्ड के श्रेष्ठत्तम लोहे जितना अच्छा है
इस में छोटे या बडे किलीय दानेदार टुकडे दिखते हैं जो कि स्टील की निहित कठोरता की वजह से होते हैं
जो कील , घोडे़ की नाल , चटखनी , पट्टे , सिब्बल , चिमटे आदि बनाने के लिए उपयुक्त होता है जिस के लिए कोमलता की जरूरत नहीं होती परन्तु अत्यधिक संसक्ति एवं तन्यता आवश्यक होती है
देशी लोहारों का कहना है कि इस प्रकार का लोहा अत्यंत तन्य होता है
इससे अंग्रेजी लुहारों का स्मरण हो आता है क्योंकि स्टील एवं लोहे को साथ साथ मिलाने में सफेद स्फटिक रेत का विपुल मात्रा में उपयोग करते हैं
मुझे लगता है कि मैं उनकी इस रंगाई की एकल पद्धति के बारे में पता लगा चुका हूँ जिसके द्वारा कपडों पर न मिटनेवाला गाढ़ा स्थाई रंग चढ़ाया जाता है और जिसकी वजह से कपडे़ इतने आकर्षक एवं सुंदर दिखते हैं
मैं ने कई बार किरमिग को बनाने का प्रयास किया है लेकिन मेरे सभी परीक्षण त्रुटिपूर्ण रहे हैं
१३ वर्ष पूर्व सलसत्ते में तन्ना के किले के चौक की खुदाई करते हुए कार्मिकों को एक पत्थर की पेटी मिली जिसमें तीन-तीन जुड़ाव वाली ताँबे की प्लेटें थीं जो कि उसी धातु से जोडी गई थीं
उनकी यह कला स्वभात: अत्यंत मसृण है तथा युद्धों या अत्याचारों तथा सरकारों की क्रांतियों को झेल नहीं पातीं
शल्य चिकित्सकीय ओपरेशन अत्यधिक सुस्पष्ट एवं आसानी से समझ में आने लायक हैं
मैं इस रंगाई की कला के लिए अत्यंत उच्चकोटि की सामग्री की आपको सिफारिश कर रहा हूँ जिसका उपयोग हमारे यूरोप के कलाकार कर सकते हैं और जिसका व्यापर भी हो सकता है
सुदीर्घ परिचय के पश्चात् मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि यह पदार्थ सस्ता एवं अच्छा होने के कारण रंगाई तथा अन्य कलाओं में गाल का विकल्प बन सकता है
इस पैकिट में आपको एक 'काट' का टुकड़ा भेज रहा हूं जो नाक को जोडनेवाला सिमेन्ट जैसा पदार्थ है
अत: मैं आपका ध्यान थोडी देर के लिए डामर की ओर आकर्षित करना चाहूँगा जिसकी उपयोगिता वैश्विक है तथा समग्र पूर्वी दुनिया में इसका अत्यधिक उपयोग हो रहा है
श्री फिलिप ने हाल ही में सन की रस्सी डामर लगाकर तैयार की
यह रस्सी यूरोप में बनी हुई किसी भी रस्सी के समान ही थी
इस देश में एक अन्य लसीले वनस्पति पदार्थ का भी उत्पादन किया जाता है जो डामर के विकल्प के रूप में प्रयुक्त होता है , ठीक उसी तरह जैसे हम यूरोप में करते हैं
यह रस्सी को मौसम के प्रभाव से बचाता है
अध्याय ३ . रुबेन बरो द्वारा 'बनारस की वेधशाला विषयक कुछ संकेत' ब्रिटिश संग्रहालय में वारेन हेस्टिंग्स के दस्तावेजों २९२३ में २६३-७६ में है
अध्याय ५ . रूबेन बरो द्वारा लिखित 'हिंदुओ में द्विसंज्ञ प्रमेय प्रचलित होने के साक्ष्य' शीर्षक से 'एशियाटिक रिसर्चेज्ञ' के खंड २ ( १९७० ) के पृ . ४८७-९७ पर सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ
 ( इस प्रकाशन का उपशीर्षक था - 'उन भागों में बीमारियों के उपचार की पद्धतियों पर कुछ पर्यवेक्षण' ) अध्याय ९ . सेंट हेलेना के राज्यपाल महामहिम इस्साक पाइक द्वारा 'ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र मद्रास में उत्कृष्ट मॉर्टर बनाने की पद्धति' इस शीर्षक से 'फिलोसोफीकल ट्रांजेक्शन्स' के खंड ३७ ( सन् १७३२ ) में पृ . २३१-३५ पर पहली बार प्रकाशित हुआ
अध्याय ११ . 'ईस्ट इंडीज में बर्फ-निर्माण की प्रक्रिया' विषयक लेख सर रॉबर्ट बार्कर एफ . आर . एस . द्वारा इसी शीर्षक से फिलोसोफीकल ट्रांजेक्शन्स' के खंड ६५ के पृ . २५२-७ पर पहली बार प्रकाशित हुआ
अध्याय १५ . मेजर जेम्स फ्रैंकलिन द्वारा लिखित 'मध्य भारत में लोह निर्माण की पद्धति' लेख भारत कार्यालय पुस्तकालय ( इण्डिया ऑफिस लाईब्रटी ) में एम एस ई यू आर डी १५४ के रूप में उपलब्ध है , तथा 'मई १९ , १८३५ को सचिव से प्राप्त" टिप्पणी इस पर लिखी हुई है
भारत में वे वारेन हैस्टिंग्स के प्रबल समर्थकों में से एक थे
पीयर्स का निधन गंगा के तट पर १५ जून १७८९ में हुआ
सन् १७३६ से आगे उन्होंने कोलकता में चिकित्सा व्यवसाय आरंभ किया
ईस्ट इंडिया कंपनी की चिकित्सा सेना में वे आए तथा उन्होंने मुख्य रूप से मुम्बई प्रेसीडेन्सी में सेवा की
तीस वर्ष भारत में रहकर वे इंग्लैंड चले गए तथा बाद में उन्होंने चिकित्सा का व्यवसाय आरंभ किया | सन् १८१५ में उन्हें लंदन में चिकित्सकों के महाविद्यालय के लाइसेंसिएट के रूप में प्रवेश मिला था
जब वे भारत में थे तब उन्होंने अरबी , फारसी , तथा संस्कृत की बहुमूल्य पांडुलिपियों का संकलन किया था जिन्हें उनके पुत्र सर विलियम द्वारा सन् १८४५ में बोडलेन , ऑक्सफोर्ड को भेंट किया गया जहां ये विशिष्ट संग्रह के रूप में मौजूद हैं
१९४० में , १८ वर्ष की आयु में उन्होंने खादी पहनना शुरू किया
१९४९ में भारत का विभाजन हुआ
१८४९ में उनका विवाह अंग्रेज युवति फिलिस से हुआ
अरविंद , सावरकर , भगतसिंह , चन्द्रशेखर आजाद जैसे कुछ क्रांतिकारी उनके समय में ऐसे सशस्त्र विरोध के साक्षात प्रतीक रहे हैं
नि:शस्त्र विरोध और प्रतिकार असहयोग , सविनय कानूनभंग और सत्याग्रह के नाम से भलीभांति परिचित है
मुख्यत: , असहयोग और सविनय कानूनभंग के मूल के संबंध में दो मत दिखाई देते हैं
एक आधुनिक लेखक के मतानुसार गांधीजी को थोरो से असहयोग और रस्किन से सहयोग की प्रेरणा मिली थी
उसमें अनेकों विद्वान गांधीजी की प्रेरणा को प्रह्लाद अथवा अन्य प्राचीन महानुभावों के उदाहरणों में देखते हैं
आर . आर . दिवाकर के अनुसार प्रह्लाद , सोक्रेटिस आदि से प्रेरणा लेकर गांधीजी ने नित्यप्रति की समस्याओं के समाधान के लिए एक व्यापक , अर्ध धार्मिक सिद्धान्त अपनाया और उस प्रकार दुष्टता और अन्याय के विरुद्ध अहिंसक रूप से लडने के लिए लोगों को एक नया शस्त्र दिया
महात्मा गांधी के अन्य एक हाल ही के विद्यार्थी के अनुसार , गांधीजी की असहयोग एवं सविनय कानूनभंग की पद्धति सहज रूप से विकसित हुई थी
यह कर्तव्य पूरा न करने पर वह अधिकार से वंचित रहता था
प्राचीन भारतीय राजनीति तथा राजाओं के कर्तव्य तथा उनके अधिकारों पर हुए नवीन कार्य भी भारत के लोगों की सरलता के विचार के साथ असहमति का स्वर निकालते दिखाई देते हैं
आगे बढ़ने से पहले , अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तथा उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत का शासन जिस प्रकार गठित हुआ उसका संक्षिप्त संदर्भ देना उपयोगी होगा
१८५८ में इतना ही परिवर्तन आया कि कम्पनी की बाबूगीरी प्रकार की भूमिका का भी अन्त हो गया और उसका काम अब भारत के लिये राज्य सचिव ( सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इण्डिया ) के विभाग को हस्तान्तरित किया गया
बंगाल राज्य में ब्रिटिश प्रशासन तंत्र का सर्वोच्च प्रमुख गवर्नर जनरल इन काउन्सिल था जो सरकार के अनेक विभागों की सहायता से काम करता था
समाहर्ता तथा न्यायाधीश अपने अधिकार क्षेत्र के अन्दर अपने संबंधित कार्य में स्वतंत्र एवं सर्वोच्च थे
यद्यपि , सर्वोच्च राज्य सत्ता के साथ संबंधित रहने के प्रकार के आधार पर ऐसा लगता है कि उस समय न्यायाधीश समाहर्ता से कुछ अधिक सत्ता का उपभोग करते थे
१८१० में इग्लैंण्ड की सत्ता की सूचना पर बंगाल ( फोर्ट विलियम ) की सरकार ने बंगाल , बिहार , उडीसा , बनारस के प्रांतो में नए कर लादने का निर्णय किया और प्रदेशों को जप्त किया अथवा उन्हें अपने शासन में सम्मिलित कर दिया
 ( सौजन्य : एसेज ऑन डिसओबिडियन्स , वॉर एन्ड सिटीजनशिप ( Essays on Disobedience , War and Citizenship १९७० , पू . ३२ ) महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिशों के विरुद्ध किए असंख्य 'बंध' के विषय में प्रेसिडेन्सी के राजकीय और न्यायिक अभिलेखों में बहुत सी सामग्री १८२०-४० के समय में मिलती है
उस शहर में सरकारी सत्ताधीशों ने इस कारण वहाँ मकान कर लागू करने के लिए तत्काल कदम उठाया यह संभव है
उसकी जानकारी दस्तावेज के रुप में सुरक्षित पत्रव्यवहारों और बनारसवासियों द्वारा कोर्ट में किए गए आवेदन से भी मिलती है
बंगाल और बिहार प्रांतो में तो , पुलिस के लिए खर्च स्टैम्प ड्यूटी और अन्य करों में से किया जाता है , और बनारस में वह भू राजस्व से किया जाता है , तो फिर यह घर कर लागू करने का उद्देश क्या है ? ३ . यदि , शास्त्रों का आधार लिया जाए तो , बनारस शहर और उसके आसपास के पाँच कोस का क्षेत्र धार्मिक स्थल माना जाता है और सरकार के अधिनियम १५ १८१० अनुसार धार्मिक स्थलों को कर से मुक्ति दी गई है
४ . बनारस में लगभग ५० , ००० मकान होगें , जिनमें से १/३ जितने तो हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक स्थल हैं
तथा ये मकान मुसलमानों और हिन्दुओं द्वारा दिए गए दान से बने हैं
अत: कार्यवाहक न्यायाधीश ने दिनांक २५ दिसम्बर को कोलकता में सरकार को सूचित किया कि : 'मुझे सरकार के माननीय गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को जानकारी देनी है कि विनियम १५ , १८१० अनुसार कर लागू करने की व्यवस्था के प्रति नगर के सभी लोगों में अत्यधिक उत्तेजना और विरोध फैलने से स्थिति गंभीर बनी है
उसी बीच कार्यवाहक समाहर्ता को न्यायाधीश ने , कोर्ट ऑव अपील और कोर्ट ऑव सर्किट के वरिष्ठ न्यायाधीश को अपने प्रवास से तत्काल वापस मुख्यालय में लौटने को कहा
उसमें कोई एक पक्ष अथवा वर्ग अधिक उत्साही अथवा अधिक दृढ़ था तो वे लोहार ही थे
दिनांक ४ जनवरी तक परिस्थिति इस हद तक सुधर गई कि कार्यवाहक न्यायाधीश बहुत संतोषपूर्वक स्पष्ट कर सका कि 'इस शहर के निवासी अब सरकार की सत्ता के सामने की स्थिति बनाए रखने के खतरों और आंदोलन की अनुपयोगिता को समझ गए हैं' इसके साथ किस भयावह स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण पाया है इसका निरूपण करते हुए उसने लिखा , 'नगर के सभी प्रकार के लोग अपने अपने वर्गों में नगर के किसी स्थान पर इकट्ठे हो गए थे , अपने अपने वर्गो में विभाजित हो गए थे , उद्देश्य सिद्ध नहीं होने तक वहां से न हटने की सौगंध उन्होंने खाई थी और दिनप्रतिदिन उनकी संख्या बढ़ रही थी और संकल्प दृढ़ होता जा रहा था
दिनांक ४ जनवरी तक परिस्थिति इस हद तक सुधर गई कि कार्यवाहक न्यायाधीश बहुत संतोषपूर्वक स्पष्ट कर सका कि 'इस शहर के निवासी अब सरकार की सत्ता के सामने की स्थिति बनाए रखने के खतरों और आंदोलन की अनुपयोगिता को समझ गए हैं' इसके साथ किस भयावह स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण पाया है इसका निरूपण करते हुए उसने लिखा , 'नगर के सभी प्रकार के लोग अपने अपने वर्गों में नगर के किसी स्थान पर इकट्ठे हो गए थे , अपने अपने वर्गो में विभाजित हो गए थे , उद्देश्य सिद्ध नहीं होने तक वहां से न हटने की सौगंध उन्होंने खाई थी और दिनप्रतिदिन उनकी संख्या बढ़ रही थी और संकल्प दृढ़ होता जा रहा था
समापन में लिखा गया , 'गवर्नर जनरल इन काउन्सिल पूरी संवेदना और सहानुभूति के साथ , कानून का उल्लंघन करने वाले हठी या जिद्दी लोगों को चेतावनी देना चाहते हैं कि उनका ऐसा व्यवहार जारी रहेगा तो वह राजद्रोह माना जाएगा और वे अपने लिए गंभीर स्थिति को निमंत्रित करेंगे
परन्तु ( बनारस के ) सेना के ऑफिसर कमान्डिंग ने बताया था कि जब तक लखनऊ से ज्यादा सैन्य उन्हें प्राप्त नहीं होता तब तक ( प्रशासन तंत्र को ) आवश्यक सहायता प्रदान करने के लिए वे असमर्थ हैं
दो दिन बाद दिनांक २० को न्यायाधीश ने बताया कि परिस्थिति में 'विशेष अन्तर नहीं आया' है इसलिए 'बहुत सुधार की उन्हें बहुत कम आशा' है
इस स्थिति में कुछ पुराने और निष्ठावान सरकारी कर्मचारियों ने अद्भुत सेवा निभाई , जिससे प्रजा की उलझन बढ़ती ही चली और अंतत: उन्होंने बनारस के राजा की सहायता से सरकार की कृपा की मांग की
इस स्थिति में कुछ पुराने और निष्ठावान सरकारी कर्मचारियों ने अद्भुत सेवा निभाई , जिससे प्रजा की उलझन बढ़ती ही चली और अंतत: उन्होंने बनारस के राजा की सहायता से सरकार की कृपा की मांग की
दिनांक ७ फरवरी के दिन बनारस के राजा द्वारा बनारस के निवासियों ने प्रस्तुत किया हुआ आवेदन न्यायाधीश को दिया गया जो उसने सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया था
इस आवेदन को अंतिम आवेदन बताते हुए आवेदन के शब्दों में ही आवेदकों ने हिज़ लॉर्डशिप इन काउन्सिल को अति नम्रतापूर्वक बताया कि कानूनभंग करने की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी
' बनारस के अग्रगण्य निवासियों ने सरकार के इस निर्णय को भाग्य का फल मानकर स्वीकृत किया और उस के विषय में जो आवेदन उन लोगों ने बनारस के राजा के माध्यम से सरकार को भेजा था तथापि वे न्यायाधीश के अभिप्राय के साथ सहमत नहीं थे
इसलिए उसके बाद के रिपोर्ट में समाहर्ता ने आग्रहपूर्वक बताया कि सावधानी के अनिवार्य कदम के रूप में यहां स्थित सैन्य दल से अतिरिक्त दल नहीं आने तक कर की वसूली शुरू नहीं की जा सकती
दूसरा टाउनड्यूटी और कस्टम के कर इतने अधिक हैं कि सौ रूपए कीमत की सम्पत्ति दो सौ रूपए के भाव से खरीदनी पड़ती है
समाज के प्रत्येक वर्ग के और प्रत्येक प्रकार के लोगों में यह व्याप्त हो रहा है
इस सुझाव को सरकार ने दिनांक २२ अक्टूबर को स्वीकार किया था और बोर्ड ऑव् रेवन्यू को बताया भी गया था कि , 'वाइस प्रेसीडेन्ट इन काउन्सिल , विनियम १५ , १८१० की व्यवस्था से मकान पर कर लागू करने का उपाय रोक देने के लिए तैयार हुए हैं और इस संदर्भ में वे सूचना देने के लिए भी सहमत हुए हैं कि प्रथम तो जहाँ भी मकान कर का काम पूरा नहीं हुआ है वहाँ इसे रोक दें
इस सुझाव को सरकार ने दिनांक २२ अक्टूबर को स्वीकार किया था और बोर्ड ऑव् रेवन्यू को बताया भी गया था कि , 'वाइस प्रेसीडेन्ट इन काउन्सिल , विनियम १५ , १८१० की व्यवस्था से मकान पर कर लागू करने का उपाय रोक देने के लिए तैयार हुए हैं और इस संदर्भ में वे सूचना देने के लिए भी सहमत हुए हैं कि प्रथम तो जहाँ भी मकान कर का काम पूरा नहीं हुआ है वहाँ इसे रोक दें
साथ ही इस आदेश में जिला समाहर्ताओं को अपने जिलों की स्थिति के विषय में सरकार को त्वरित सूचित कर देने के लिये बताया गया ताकि 'उनके प्राप्त होते ही जहां बल प्रयोग कर के समग्र या अंश रूप में कर वसूलने को बाध्यता न हो वहां उस कर को पूर्ण रूप से समाप्त कर देने के अन्तिम आदेश प्रसारित किये जा सकें'
उन्होंने तो , कर वसूली के समय उनके ऊपर हुए हमले के संबंध में समाहर्ता ने जो जानकारी दी थी उसे ही सही मान लिया और दिनांक ११ अक्टूबर को उन्हें पहले भेजे गए आदेश को अपनाते हुए एक विस्तृत प्रस्ताव बना लिया , और न्यायाधीश को निलम्बित कर दिया क्योंकि सरकार को लगा कि यदि न्यायाधीश ने मकान कर वसूलने में व्यस्त समाहर्ता को पर्याप्त सहायता भेजी होती और आम शांति बनी रहे इस हेतु से सावधानीपूर्वक कदम पहले से ही उठाये गये होते तो , भागलपुर के स्थानीय निवासियों ने समाहर्ता के प्रति ऐसा अपमानजनक और आक्रामक कृत्य , जो उन्होंने अपने पत्र में बताया था , किया ही न होता , इतना ही नहीं , तो सरकार ने दिनांक २९ अक्टूबर , १८११ को इंग्लैन्ड को लिख भेजा कि न्यायाधीश के पद को संभालने के लिए वहां से , एक अधिक समर्थ और कार्यप्रवण व्यक्ति को भेज दें , साथ ही ऐसी भी इच्छा व्यक्त की कि 'वह व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो कर वसूली के लिए कृतनिश्चयी हो'
इस समय यह उल्लेखनीय है कि यह निवेदन भेजने के केवल चार दिन पूर्व ही इस कर को पूर्ण रूप से नाबूद करने की अनिवार्यता समझ में आ गई थी
फिर भी विरोध को कैसे समाप्त करें या कुचल डालें यह प्रश्न तो स्थानीय सत्ताधीशों के लिये निरन्तर सिरदर्द और चिन्ता का विषय बना हुआ था
जनवरी १८१२ में जानकारी दी गई कि भागलपुर में निवास करनेवाले यूरोपीयों ने यह कर भरने से इन्कार किया था
और एडवोकेट जनरल ने भी बताया था कि संपत्ति जप्त करके भी यह कर वसूल किया जा सकता है या नहीं इस विषय में उन्हें सन्देह है
 ) यह मूल मसौदा इस प्रकार है , 'समग्र विषय पर बहुत विमर्श एवं गंभीर विचार के बाद सब को विश्वास हो गया होगा कि हम मकान कर समाप्त करने की सूचना देना उचित मानते हैं किन्तु संभवत: यह मानकर कि उससे यह भी मान लेने की गलती हो सकती है कि अपनी सरकार अशांति और विद्रोह की स्थिति के सामने झुक गई है
कोलकता की सरकार भी समान रूप से विचार करती थी और चाहती थी कि 'कर-नाबूदी सरकार की सत्ता के साथ बहुत स्पष्ट रूप से समझौता किये बिना ही होनी चाहिये
११ . बनारस के गली मोहल्लों में विरोध प्रदर्शित करनेवाले फलक लगे थे
भागलपुर में भी , जहां समाहर्ता स्थान और समय का होश गंवाकर ब्रिटिश 'जस्टिस ऑव पीस' जैसा ही व्यवहार करने लगा तब बहुत आक्रोशपूर्ण होने पर भी लोग शान्त रहे
लोग अत्यधिक भीरू , अन्तर्मुख और दब्बू बन गये थे
आगे बढ़ने से पूर्व , दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन की ओर से विरासत में प्राप्त हुए वर्तमान राजनीतितन्त्र के दो प्रमुख लक्षणों का निर्देश करना उपयोगी होगा
सन् १९४७ से ही स्वतंत्र भारत में असहयोग और नागरिक अवज्ञा का क्या प्रयोजन है इस विषय पर विवाद चल रहा है
उन्हें ( प्रणेताओं को ) समझ में आयेगा कि सरकार के लिये उनकी ही जिम्मेदारी होने के बावजूद आज जो बीज उन्होंने बोये हैं वे कल ऐसे दीमक बन जाएँगे जिससे छुटकारा पाना असम्भव हो जाएगा
यह नये प्रकार का विरोध और असहमति अधिक जटिल और कम उग्र है
उल्टे इस प्रकार प्रजा की मांग या विरोध का स्वीकार करके उसके अनुरूप बदल करना उनकी स्वयं की और प्रजा की दृष्टि में शासन को अधिक न्यायोचित सिद्ध करता था
केवल प्रजा के द्वारा स्वीकृति और प्रस्थापित न्यायपूर्ण अधिकारयुक्त शासक ही इस प्रकार से प्रजा के प्रति अधीनता दर्शा सकता था या अपनी नीति को वापस ले सकता था
हमारी समग्र वास्तविक ताकत तो अधीन किये गये भारत में यत्र तत्र अवस्थित सेना की यूरोपीय पलटन में है
हमारी सारी सैनिकी या नागरिक देशी संस्थाएँ केवल भाग्य के अधीन है
जिनसे उन्हें पोषण मिलता है उनकी चाकरी अच्छे से करनी चाहिये यह उनका जीवनमूल्य है इसलिये संकटपूर्ण स्थिति में वे निष्ठापूर्ण आचरण भी करते हैं
परिणाम यह था कि यूरोपीय पलटन' और 'अजेयता की छाप' को छोड़कर अन्य किसी भी प्रकार की मान्यता या वैधता नहीं होने से ब्रिटिश किसी भी प्रकार के लोगों के विरोध के सम्मुख झुक भी नहीं सकते थे या कोई राहत भी नहीं दे सकते थे
राज्य का ढांचा गलत नहीं हो सकता ( इसी प्रकार सत्ता और प्रभाव के अन्य केन्द्र भी ) यह सिद्धान्त ब्रिटिशों द्वारा प्रस्थापित किया गया और ब्रिटिश सत्ता के जाने के बाद भारत में आज भी उसी प्रकार से प्रस्थापित है
वह न केवल राज्य और प्रजा के बीच अविश्वास , दुश्मनी और अपरिचय बनाए रखता है अपितु प्रजा को यह मानने के लिये प्रेरित करता है कि बिना हिंसा पर उतर आए उन्हें कोई सुनेगा नहीं
अत: यह स्वीकार किया जाता है कि विदेशी शासन के विरुद्ध में प्रयोग किये जाने के लिये असहयोग और नागरिक अवज्ञा न्यायोचित और तर्कसंगत साधन हैं परन्तु स्वदेशी शासन के विरुद्ध प्रयुक्त किये जाएँ तब वे ऐसे नहीं हैं
इसी सन्दर्भ में भारत के विभिन्न नेता ( इतिहास , राजनीतिशास्त्र आदि का उल्लेख न करें तो भी ) सामान्य रूप से वर्गविहीन और समतावादी समाज और कल्याण राज्य के पक्षधर होते हैं तो भी वर्तमान राज्यव्यवस्था की कोई गलती नहीं होती इसी सिद्धान्त के पुरस्कर्ता जैसा व्यवहार करते हैं
इस प्रकार का सिद्धान्त और उसका समर्थन गांधीजी ने अपने सम्पूर्ण सार्वजनिक जीवन में जो भी कहा उसके विरुद्ध जाता है
स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज के स्वस्थ व्यवहार और सुरक्षा की दृष्टि से भी असहयोग और नागरिक अवज्ञा की उपयोगिता है
१८५७ तक तो ऐसी परिस्थिति थी कि प्रति चार भारतीय एक यूरोपीय था
३ . घटनाओं का अधिकृत वृत्तांत क . बनारस की घटनाएं १ . क . १ बनारस के समाहर्ता का कार्यवाहक न्यायाधीश को पत्र २६-११-१८१० डबल्यू , डबल्यू , बर्ड एस्क . कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस महोदय , विनियम १५ , १८१० के तहत बनारस के मकानों और दूकानों पर कर लागू किया गया है उसकी वसूली के लिये आपके सहयोग की अपेक्षा है , जिससे इस कर के विषय में यथासंभव अधिक मात्रा में प्रचार किया जा सके
आप मुझे नगर तथा उपनगर के थानेदारों के लिए अनुमति भेज दें कि वे सभी समय आने पर मुहम्मद तकी खान तथा उसके साथियों को सहायता तथा सहयोग दें
३ . थानेदारों को ऐसा आदेश भी दिया गया है कि वे मकान के कर का निर्धारण करने के लिए जानेवाले कर्मचारी को अपने अपने वार्डमें अपने स्थानिक अनुभवों के आधार पर जानकारी एकत्रित कर के दें और उन सभी कर्मचारियों को यह भी बता दें कि वे विनियम १५ , १८१० के अनुरूप सरकार के अधिकृत अधिकारी के रूप में अपना कर्तव्य करें
३ . थानेदारों को ऐसा आदेश भी दिया गया है कि वे मकान के कर का निर्धारण करने के लिए जानेवाले कर्मचारी को अपने अपने वार्डमें अपने स्थानिक अनुभवों के आधार पर जानकारी एकत्रित कर के दें और उन सभी कर्मचारियों को यह भी बता दें कि वे विनियम १५ , १८१० के अनुरूप सरकार के अधिकृत अधिकारी के रूप में अपना कर्तव्य करें
१ . क . ४ कार्यवाहक न्यायाधीश , बनारस का सरकार को पत्र २५-१२-१८१० जी . डोड्स्वेल एस्क . सरकार के सचिव न्याय विभाग , फोर्ट विलियम महोदय , मुझे सरकार के माननीय गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को जानकारी देनी है कि विनियम १५ , १८१० के अनुसार कर लागू करने की व्यवस्था के प्रति नगर के सभी लोगों में अत्यधिक उत्तेजना और विरोध फैलने से स्थिति गंभीर बनी है
५ . उस संबंध में ऐसा लगता है कि आवेदकों को कुछ छूट या माफी दी जा सकती है , क्योंकि उनके मकानों पर पुलिस निधि के निमित्त से कर तो लागू है ही
६ . लोगों में भारी जोशखरोशी , रोष और हंगामा प्रवर्तित है; वे दूकानें बंद कर अपने दैनिक व्यापार धंधे को छोड कर भारी संख्या में एकत्रित हो रहे हैं और अपनी मांग तत्काल पूरी करने के लिए मुझ पर दबाव बढा रहे हैं
पूरे नगर में सभी वर्गों के हिन्दू और मुसलमान एकत्रित हुए और जबतक न्यायाधीश समाहर्ता को सीधे मिलकर सभी कर निर्धारक कर्मचारियों को वापस न ले लूं और कर समाप्त होगा ऐसा पक्का आश्वासन न ला दूं तब तक अपने सभी व्यवसाय बन्ध रखने का निर्णय किया
मैंने यह भी कहा कि वे अपने काम पर वापस लौटें और सरकार का निर्णय आने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें
मैने विभिन्न वर्ग के चौधरियों को बुलाकर उनके लोंगो को उस भीडबाजी से वापस लौटने के संबंध में एक आचारसंहिता बना कर उस पर हस्ताक्षर करने को कहा और अपने अपने घर वापस जाकर दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने का अनुरोध किया
३ . इस स्थिति में ऐसा लगता है कि लोगों ने तब तक संघर्ष चालू रखने का निर्णय ले लिया है , जब तक सरकार की ओर से कोई आदेश नहीं आता
अत: आप यदि अब भी वैसा ही सोच रहे हैं तो , इस पत्रका आपकी ओर से प्रत्युत्तर मिलते ही सरकारी रेजिमेन्ट की ६७वीं टुकडी भेजने का आदेश दूँगा
उस विषय में आपको अपनी आवश्यकता के विषय में सभी सूचनाएँ देनी होंगी जिससे प्रस्थान करनेवाले सैनिक बल को आवश्यक सामग्री के साथ भेजने की व्यवस्था करा बनारस आपका आज्ञाकारी दोपहर १२ . ३० जे . मेक्डोनाल्ड दिसम्बर ३१ , १८१० मेजर जनरल १ . क . ७ बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश का सरकार को पत्र २-१-१८११ महोदय , गत दिनांक ३१ के आपको भेजे गए मेरे द्रुतगति पत्र से मान्यवर गर्वनर जनरल इन काउन्सिल यहाँ प्रवर्तमान उस स्थिति से वाकिफ हुए होंगे जिस से तत्काल उस नगर में मुझे नामदार की ६७वीं रेजिमेन्ट मंगवाने की तत्काल आवश्यकता पडी थी
किसी अन्य कारण से एकत्रित हुए लोहारों ने , तुरन्त ही इस षडयन्त्र में प्रमुख भूमिका स्वीकार कर ली और वे पूरे प्रान्त से बडी संख्या में यहां आ पहुंचे हैं
मेरा मानना है कि अब तक इन लोगों को नगर के कुछ प्रमुख लोगों का समर्थन था जो उन लोगों को ईंधन और अनाज किराना ( घर गृहस्थी का सामान ) प्रदान करते रहे , किन्तु उन लोगों का स्रोत भी खाली होने का आभास होते ही नुकसान के प्रति चिन्तित होने लगे हैं और इस प्रकार के व्यवहार से उनके परिवारों को कितना नुकसान होगा यह उनकी समझ में आने लगा है
इस स्थिति का लाभ उठाकर मैंने आन्दोलन के प्रणेताओं के रूप में मैं जिनको जानता था उन अग्रणियों को प्रत्यक्ष बुलाकर , उन्हें बिखर जाने के लिये समझाने का निश्चय किया
बिना हथियार के रहने में ही उन्हें अपनी सुरक्षा लगती है
२ . मेरा गत दिनांक ५ का पत्र आपको अवगत कराएगा कि विनियम १५ , १८१० की व्यवस्था निरस्त न करने का सरकार ने प्रस्ताव पारित किया है
४ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल ने आपने मि . ब्रुक को अपने मुख्यालय में वापस लौटने की प्रार्थना की उसे मान्य रखते हुए अनुमोदन किया है , जिससे वे अपने सम्पूर्ण प्रभाव का उपयोग कर बनारस के राजा और अन्य अग्रणियों को वर्तमान बिगड रही स्थिति को शांत करने के लिए मदद करने के लिए समझाएँ
६ . मान्यवर काउन्सिल को यह भी लग रहा है कि स्वयं सरकार के अधिकारियों के द्वारा कर के सम्बन्ध में की गई घोषणा ही शायद लोंगों के अपने अन्यायी आचरण से परावृत करेगी अथवा इतना तो जरूर उनकी समझ में आएगा कि उसके बाद भी यदि लोग कानून की अवमानना चालू रखेगें तो अपने ही अहित को निमंत्रण देंगे
सरकार प्रत्येक आवेदन पर पर्याप्त ध्यान दे रही है तथा समाज के प्रत्येक वर्ग को पर्याप्त सुरक्षा देने के लिए प्रयत्नशील है यह बात सर्वज्ञात है , परन्तु यह नहीं बर्दाश्त किया जा सकता कि अधिकारियों के सभी उचित प्रयासों की अवमानना कर लोग ऐसे गैरकानूनी जमाव निर्माण करके उपद्रव मचाएं
१ . क . १३ बनारस के कार्यवाहक न्यायाधीश को सरकार का पत्र ११-१-१८११ महोदय , मुझे आपके गत दिनांक ४ के पत्र की रसीद के साथ ही यह भी बताने की सूचना दी गई है कि बनारस का विद्रोह और विरोध अब शान्त हो रहा है यह जानकर मान्यवर गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को अत्यधिक संतोष हुआ है
१ . क . १६ ( ख ) मि . ब्रुक्स के निवासस्थान पर दिनांक १३ जनवरी , १८११ को श्री बर्ड , कार्यवाहक न्यायाधीश बनारस तथा मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड , नगर के कमान्डिग अधिकारी के बीच हुए विचार विमर्श का सारांश जनमानस का सरकार के प्रति मिजाज विधायक नहीं लग रहा है
१ . क . १६ ( सी ) दिनांक १८ जनवरी , १८११ , शुक्रवार को मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड और श्री डब्ल्यू , डब्ल्यू , बर्ड के बीच आयोजित बैठक में श्री बर्ड अगली सुबह सरकार के गत दिनांक , ७ के ऐलान को घोषित करने के बारे में सरकार द्वारा निर्धारित पद्धति से प्रस्ताव रख रहे हैं
मेजर जनरल के मतानुसार खतरा तो बहुत अधिक था क्योंकि यदि ब्राह्मण धार्मिक अग्रणी का रक्त बहता है तो परिणाम गम्भीर हो सकता है
मिस्टर बर्ड , स्वयं गत दिनांक १६ के मेजर जनरल को लिखे पत्र में व्यक्त मंतव्य का पुन: उच्चारण करना उचित समझते हैं
और वे थक नहीं जाते या निराश नहीं हो जाते हैं तब तक स्थिति अनुकूल बनने के और सरकार के आदेश का क्रियान्वयन करने के कोई आसार नहीं लगते हैं
३ . वर्तमान स्थिति को देखते हुए स्वाभाविक ही है कि कर निर्धारण कार्य में नहीं के बराबर प्रगति हो सकती है
सभी के सभी नगरजन योजनापूर्वक अवगणना और अनादर पर उतर आये
१० . यह सारा मामला उपर्युक्त दो व्यक्ति - सैयद अकबर अली खान और अब्दुल कादिर खान - की मध्यस्थता से सफलतापूर्वक निपटाया गया
लोगों को समझाया गया कि राजा माफी प्राप्त करने में मध्यस्थता करेंगे , और स्वयं राजा बाबू शिवनारायण सिंह को मिले खिताब से जोश में आ गए थे और मानते थे कि इस अवसर पर उन्होंने अदा की हुई भूमिका से भारी बहुमान और सरकार का विश्वास जीतने का अवसर मिला है
इसके विपरीत , सार्वजनिक माफी देने की घोषणा से लोगों में सरकार के प्रति आभार की स्थायी भावना का बीज पड़ेगा
१ . क . १८ ( ए ) आवेदन पर कोर्ट ऑव अपील एण्ड सर्किट का आदेश आदेश कोर्ट ऑव अपील या कोर्ट ऑव सर्किट के न्यायाधीशों के अनुसार यह आवेदन संज्ञेय नहीं है
परन्तु मानयवर का मानना है कि ऐसे मुकद्दमे संख्या में अधिक नहीं होने चाहिये
९ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल ने आपके सहायक श्री ग्लीन के कर्तव्यपूर्ण सहयोग की दखल ली है
सामान्य भावना तो कर के विरुद्ध की ही लगती है और लगभग सभी निवासी ऐसे किसी कर के सामने झुकने को तैयार नहीं लगते हैं
फिर भी यह देशहित में उपयोगी होने की बात यदि समझाई जाए तो कदाचित् उसमें सहभागी होने के लिए तैयार हो भी जाए
४ . मैंने इस आवेदन की सूचनाओं के बारे में कुछ भी कहने से अलग रहना ही पसंद किया है , क्योंकि स्पष्ट रूप से ही यह आवेदन ऊँचे अधिकारियों को किया जाता है और मेरे लिए बिना सरकार का रुख जाने आवेदकों द्वारा आपत्ति की जो बातें लिखी गइ हैं उनके बारे में कुछ कहना या लिखना हस्तक्षेप माना जाएगा
वे मानते हैं कि विनियम १५ , १८१० के अन्तर्गत प्रस्थापित नियम की सीमा में ही बदल विषयक कोई बातचीत या विचार हो सकता है
साथ ही विनियम १५ , १८१० के संदर्भ में जो परिवर्तन स्वीकार करने की बात है और फाटकबंदी के बारे में सरकारश्री के गत दिनांक ५ के जो सुझाव आए हैं वे जानने के इच्छुक थे
४ . जब लोग खुले आम कानूनभंग कर राजद्रोह का आचरण करते थे तब ही पूर्वोक्त नोटिस रोके रखने के कदम से मुझे लोगों को समझाने का अवसर मिला , जिसका विरोध भी कम हुआ और सभीने अपने हित में मुझे सुना , लेकिन यह प्रस्ताव धार्मिक नेताओं और निम्नवर्गीय लोगों के लिये लाभकारी था , और यह प्रस्ताव ऐसे समय पर आया जब लोग सरकार से इस कर को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए आवेदन दे रहे थे
४ . जब लोग खुले आम कानूनभंग कर राजद्रोह का आचरण करते थे तब ही पूर्वोक्त नोटिस रोके रखने के कदम से मुझे लोगों को समझाने का अवसर मिला , जिसका विरोध भी कम हुआ और सभीने अपने हित में मुझे सुना , लेकिन यह प्रस्ताव धार्मिक नेताओं और निम्नवर्गीय लोगों के लिये लाभकारी था , और यह प्रस्ताव ऐसे समय पर आया जब लोग सरकार से इस कर को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए आवेदन दे रहे थे
२ . जब समाहर्ता ने निर्धारण कर्मचारियों को भेजा तब इतनी भयानक संकटमय स्थिति उत्पन्न हो गई कि हमें सचेत हो जाना पडा और मेरे लिये सम्भव था वह सब करने के बाद भी सभी दुकानें बंद करा दी गईं
२ . जब समाहर्ता ने निर्धारण कर्मचारियों को भेजा तब इतनी भयानक संकटमय स्थिति उत्पन्न हो गई कि हमें सचेत हो जाना पडा और मेरे लिये सम्भव था वह सब करने के बाद भी सभी दुकानें बंद करा दी गईं
३ . गवर्नर जनरल इन काउन्सिल को नहीं लगता है कि विशेष रूप से यदि ऊपरि निर्दिष्ट पद्धति से कर लागू करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी तो सरन के लोग उसका खुला विरोध करेंगे
ये आवेदन नगरवासियों की भावना का आभास देनेवाले हैं
उनका कहना था कि टाउन ड्यूटी और मकान कर की संभावना के कारण शहर में अनाज के आने पर रोक लगा दी गई है
२ . गत दिनांक ११ जनवरी को गवर्नर जनरल इन काउन्सिल ने बहुत प्रसन्नता के साथ मकान कर वसूली विषयक नियमों में थोड़ा बदल करते हुए अनेक धार्मिक नेताओं और गरीब वर्ग के लोगों को राहत देने की व्यवस्था करने की घोषणा की है
३ . अंतत: कल सुबह मैंने कई अग्रणियों को बुलाकर उन्हें समझाया कि उनका यह व्यवहार कितना गलत था और सरकार के आदेशों का इस प्रकार विरोध करना कितना निरर्थक था
बाद में तुरन्त ही न्यायाधीश को बताकर सैन्य बल मेजर लिटल ज्हॉन के संरक्षण में सेना साधु के मकान पर पहुँचा , जो दोषी है और वही आज की स्थिति भड़काने वाला भी है , उसके पास से मकान कर के रूप में ली जाने वाली राशि लेने पहुंचा
शेष लोग विशेष रूप से निचले वर्ग के लोग तो अनुमान से भी जल्दी से पैसा भर रहे थे
तब बताया गया कि वे वहाँ पर किसी अन्त्येष्टि के लिए एकत्रित हुए थे
अपने सैनिक ड्यूटी की निरन्तरता से , खाना न मिलने से परेशान हो उठते
१ . च . १६ भागलपुर के समाहर्ता को सरकार का पत्र २९-१०-१८११ समाहर्ता , भागलपुर महोदय , मान्यवर वाइस प्रेसिडेन्ट इन काउन्सिल ने आपके नीचे दर्शाए पत्रों और संलग्न पत्रों के मिलने की सूचना देने के लिए सूचित किया है
वापस लौटते समय पागल और शराब पीया हुआ लगनेवाला एक मनुष्य घोड़े पर चढ़ आया
यद्यपि उस पद पर उन्हें स्थायी तौर पर फिर से रखने के लिए निर्णय लेने के संबंध में अधिकार सरकार के पास अबाधित रहेगा
दूसरे मुद्दे पर बताना है कि कार्यवाहक न्यायाधीश ने , समाहर्ता ने मकान कर वसूल करने में शीघ्रता का कार्य करने का आक्षेप करने का कृत्य किया है
पिछले चार पांच दिन से लोगों की भीड़ एकत्रित होती रही इस कारण मैंने ऐसा किया
न्यायाधीश को इसलिए कि सरकार की इच्छा के विरुद्ध प्रतिकार और विरोध के परिणामों को अन्यथा करने का उसके पास वास्तव में कोई साधन या उपाय नहीं होता है
उनको लगा होगा कि श्री यूविंग भयावह संकट में पङ गए हैं इसलिए उनको बचाने के उद्देश्य से वे गुस्से से बेकाबू भीड के बीच अकेले ही घुस गये होंगे और उन्होंने भीड के प्रति आक्रमक व्यवहार भी किया होगा , उसके लिये वे प्रशंसा के पात्र हैं फिर भी उनका यह कार्य विवेकबुद्धि नहीं अपितु जल्दबाजी ही मानी जाएगी
३ . गत २६ अक्टूबर को सरकार की ओर से आपको बताया गया है कि भागलपुर में इस कर के विरोध में हंगामा हुआ और समाहर्ता को अपमानित करनेवाली घटना घटी है
७ . उपर्युक्त परिस्थिति से पता चलता है कि भागलपुर के समाहर्ता ने सरकार के कर समाप्त करने के इरादे की लोगों को जानकारी दे दी है , किन्तु यदि उपर्युक्त सूचना भागलपुर को भी हो सके इस प्रकार से तैयार की जाती तो भी काउन्सिल को लगता है कि समाहर्ता को कर स्थगित करनेवाली जानकारी प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं थी
२ . जब हिज़ मेजेस्टी के प्रजाजनों को पूरे हिन्दुस्तान में सिविल अथवा क्रिमिनल किस्सों में सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्षेत्र में भी नहीं रखा है तब अधिकारियों को अब एक ही सरकार के अधीन रहनेवाले लोगों के विषय में निर्णय लेने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए
इससे हमें लगता है कि कोलाहल या दंगे के कारण से कर की बलि देना उचित नहीं
अत: हमने निश्चित किया है कि बनारस के लोग , जो चौकीदार के लिए और फाटक मरम्मत के लिए अपना योगदान देते ही हैं उन्हें इस कर से मुक्ति दें - ऐसी वसूली बनारस को छोड और कही नहीं होती
४६ . इस प्रकार बनारस में गैरकानूनी ढंग से एकत्रित लोगों की भीड के गठबंधन को बिखेर दिया गया
६३ . समाहर्ता द्वारा कर निर्धारण करने के बाद बोर्ड ऑव रेवन्यू ने कर वसूली शुरू करने की सूचनाएँ दी थीं
इस समय न्यायाधीश ने जनरल मेक्डोनाल्ड को बुलाकर किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने के लिए बता दिया था
वहाँ सरकार के सर्वोच्च सत्ताधीश का निवास है
वह लोगों को पीडादायी लगती थी इसलिए उसे समाप्त कर उसके स्थान पर कर लागू किया था
क्योंकि यदि दुकान का धंधा अच्छा चलता है तो उस स्थान का मूल्य अधिक आंककर सरकार मुनाफे के अनुपात में ५ प्रतिशत के दर से अधिक आय प्रात कर सकती है , किन्तु यदि धंधा कमजोर है तो बेची जाने वाली सामग्री के समग्र सौदे पर आधारित कर की आय भी बढाई जानेवाली दर से मिलनेवाले कर की आय जितनी नहीं होगी
१९ . हम इस अवसर पर आपको एक खास सिफारीश के साथ यहाँ के लोगों के पूर्वाग्रह और विचारों के प्रति उचित ध्यान देने के लिए बता रहे हैं और साथ साथ लोर्ड कॉर्न वालिस ने उनके दिनांक ११ जून १७८० के बोर्ड ऑव रेवन्यू को लिखे पत्र में स्पष्ट बताया है , उस सिद्धान्त पर दृढतापूर्वक लगे रहने का अनुरोध भी करते हैं , जिसमें कहा गया है , 'समय समय पर जरूरी आंतरिक कर लगाना और वसूलना प्राचीनकाल से चली आ रही और सर्वस्वीकृत प्रणाली है अर्थात् सरकार का वह अधिकार है
२१ . जमीन के प्रश्न पर स्थायी समाधान और न्यायिक प्रणाली के शुल्क के रूप में हमें राजस्व की बहुत बडी राशि खर्च करनी पडी है
उनमें अधिकांश सुधार बोर्ड ने मौखिक रूप में किए हैं किन्तु कुछ के संदर्भ में स्पष्टीकरण और विस्तार जरूरी है
अन्त में बोर्ड देश के आन्तरिक सरकारी कस्टम को पूछता है कि टाउन ड्यूटी और आबकारी रेवन्यू जो वर्तमान में है , क्या वह पुरानी वसूली का एक अंश है अथवा उसकी शाखा ही है ? 
५ . आपके पूर्वोक्त मुद्दे में सरकार के किसी कदम का बचाव करना जरूरी नहीं है , फिर भी आप मान्यवर ने कुछ विचार प्रस्तुत किए हैं इस लिए हम अपने विचार आपके चिन्तन हेतु भेज देंगे
इस पुस्तक के ४० पृष्ठों के 'धी डिस्ट्रक्शन ऑफ इण्डियन इन्डीजीनस एज्युकेशन [The Destruction of Indigenons Education ) 'शीर्षक के ३६वें अध्याय में अंग्रेज सरकार के अनेक अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं , जिसमें ३ जून , १८१४ को लंदन से भारत के गवर्नर जनरल को लिख गए पत्र से लेकर , मेक्समूलर के विचार , तथा सन् १९०९ में अंग्रेज श्रमिक नेता कीर हार्डी की टिप्पणियों तक के लगभग सौ वर्ष के कालखंड को ले लिया गया है
फिर भी १८वीं शताब्दी के अन्त तथा १९वीं शताब्दी के प्रारम्भ के वर्षों में भारतीय शिक्षा परंपरा के विषय में पुस्तक का यह अध्याय अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है
नुरुल्ला और नाईक की पुस्तक में १९वी शताब्दी में भारतीय शिक्षाव्यवस्था के विनाश के बारे में ४३ पृष्ठों में चर्चा की गई है
एडम ने अपने विवरण में एक अंग्रेजी सज्जन , एक अंग्रेज अधिकारी के गौरव के अनुरुप सौम्य भाषा का प्रयोग किया है , जबकि लिटनर ऐसी सौम्य भाषा प्रयुक्त कर नहीं पाया है , इसीलिए ही वह 'अंग्रेज सञ्जन' की श्रेणी में नहीं आता है
यह पुस्तक तो १८वीं शताब्दी के अंतिम चरण से १९वीं शताब्दी के प्रारंभिक समय के भारत के यथार्थ चित्र को , भारत के समाज को , उसके रीत रिवाजों को और संस्थाओं को , उनकी सिद्धियों को और मर्यादाओं को यथासंभव समझने का लेखक का एक प्रामाणिक प्रयास मात्र है
जबकि १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैण्ड में पाँच सौ जितनी पाठशालाएँ ( ७८११व १ चलती थीं , किन्तु ज्ञान की क्षितिज केवल उच्च कुल के लोगों तक ही सीमित थीं
 ? १६वीं सदी के मध्य भाग में उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों के कारण इंग्लैण्ड में एक ऐसा कानून बनाया गया जिसमें आदेश था कि गिरजाघरों में अंग्रेजी बाईबल का पठन नहीं हो सकता'
हालांकि सन् १८३४ तक 'राषट्रीय विद्यालयों के पाठ्यक्रम भी धार्मिक शिक्षा , पठन , लेखन तथा अंकज्ञान तक सीमित थे जब कि कई ग्रामीण शालाओं में अनिष्ट परिणामों की आशंका से लेखनकार्य नहीं होता था
लेन्केस्टर टिप्पणी करते हैं कि , "शिक्षक केवल अज्ञानी ही नहीं , शराबी भी थे
जनवरी १७९७ में श्रुसबरी के एक सुप्रसिद्ध विद्यालय में भी छात्रों की संख्या केवल ३ या ४ से अधिक नहीं थी और अनेक प्रयास करने के बाद १७९८ में यह संख्या २० तक हो गई थी
प्रशिष्ट साहित्य में ग्रीक तथा लेटिन भाषा-साहित्य , नैतिक तत्त्वज्ञान , वक्तृत्व कला , तर्कशास्त्र तथा गणित , भौतिक विज्ञान जैसे विषयों का समावेश होता था , और विधि , वैद्यकशास्त्र तथा भूस्तरशास्त्र आदि पर व्याख्यान भी आयोजित किए जाते थे
ऑक्सफोर्ड स्थित महाविद्यालयों में आमदनी के मुख्य स्रोतों में भूमि के स्वरूप में प्राप्त दान तथा छात्रों से प्राप्त आय थी
सन् १८५० में चार वर्ष की शिक्षा के लिए एक विद्यार्थी का औसत व्यय लगभग ६०० से ८०० पाऊँड होता था
१९वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ऑक्सफर्ड में नौ महाविद्यालय तथा पाँच बड़े छात्रालय ( Halls ) थे
इस के फलस्वरूप ही 'ब्रिटिश इन्डोलॉजी' जैसे विषय का जन्म हुआ
भारतीय शास्त्रों के अध्ययन का दूसरा कारण प्रो . मेकनोशी जैसे एडिनबर्ग युनिवर्सिटी के प्रबुद्ध विद्वान का विचार था
दूसरी बात , आंकडों में प्रस्तुत जानकारी का अत्यंत सतर्कता से मूल्यांकन करना आवश्यक है
जैसे कि इंग्लैण्ड में शालाओं की संख्या में वृद्धि वास्तविक स्थिति का निर्देश करनेवाली बात नहीं है , क्योंकि इन आंकडों में कारखानों में चलनेवाले विद्यालयों की संख्या का भी समावेश हो जाता था
केवल मान्यता ही नहीं , बल्कि स्पष्ट रूप से आंकडों की जानकारी पर आधारित ये सर्वेक्षण , भारत में प्रचलित शिक्षा पद्धति , उसमें पढाए जानेवाले विषय , अध्ययन की समयावधि , विभिन्न क्षेत्रों में पाठशालाओं में अध्ययन करनेवाले छात्रों की संख्या और उनके विषय में विभिन्न प्रकार की जानकारी जैसी अनेक बातों पर व्यापक रूप से जानकारी देते हैं
प्रत्येक गाँव में एक पाठशाला की बात से तो अंग्रेज इतने रोमांचित हो उठे थे कि उन्होंने इस सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के और अनेक पहलुओं की ओर ध्यान ही नहीं दिया
परिणाम स्वरूप १ , ०० , ००० शालाएँ होने की बात उनके लिए एक स्थाई समस्या ही बनी रही , जिसका वे किसी प्रकार का स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं कर सके
इन सर्वेक्षणों से प्राप्त जानकारी से यह स्पष्ट होता है कि सन् १८०० में भारत में शालेय शिक्षा प्राप्त करनेवाले का अनुपात इंग्लैण्ड के छात्रों की तुलना में कम नहीं था
विशेष महत्त्वपूर्ण बात तो यह थी कि भारत में सैंकडों वर्षों से प्रचलित शालेय शिक्षा पद्धति के ही अनुसार इंग्लैण्ड में भी उसी पद्धति से शिक्षा देने का प्रयास हुआ था
इसका अर्थतंत्र , समाजजीवन और शिक्षा व्यवस्था पर अत्यन्त विपरीत प्रभाव हुआ
विशाखापट्टनम् , मछलीपट्टनम और तंजावुर इन तीन जिलोंने निर्धारित पत्रक में दर्ज श्रेणियों के अतिरिक्त , एक ज्यादा क्षत्रिय श्रेणी के छात्रों की भी जानकारी दी है
सारिणी ३ से स्पष्ट होता है कि मलबार जिले में द्विज छात्रों की संख्या कुल संख्या के २० प्रतिशत से भी कम थी , किन्तु यह जिला मुसलमानों के आधिक्य का होने से मुस्लिम छात्रों का अनुपात २७ प्रतिशत जितना ऊँचा था , जबकि शूद्र और अन्य जाति के छात्रों का अनुपात ५४ प्रतिशत जितना था
बेल्लारी में २३ मराठी विद्यालय थे
कुछ समाहर्ता पांच वर्ष की आयु प्रवेशयोग्य दर्शाते हैं
ये सभी वेद और शास्त्र संस्कृत में हैं
इन शास्त्रों के प्रगत अध्ययन के लिए इन क्षेत्रों से छात्र काशी या नवद्वीप" उन शास्त्रों के ज्ञाता के पास जाकर शिक्षा प्राप्त करते हैं
राजमुन्द्री जिले को छोड़ अन्य एक भी जिले ने उच्च शिक्षासंस्थाओं में पढ़ाई जानेवाली पुस्तकों की सूची नहीं दी है
मनरो ने इसके साथ यह भी लिखा है कि 'यहाँ भारत में शिक्षा का स्तर हमारे देश के स्तर जितना ही नीचा है
' यहाँ 'प्रवर्तमान' का तात्पर्य १९वीं शताब्दी के आरंभ का समय है
मलबार और विशाखापट्टनम् जिले का जयपुर प्रदेश , इन दो क्षेत्रों को छोड़कर कहीं भी पाठशालाओं में ब्राह्मण , वैश्य और क्षत्रिय जाति की कन्याएँ नहीं जाती थीं; मछलीपट्टम् , मदुरा , तिनेवेली और कोईम्बतूर के समाहर्ताओं के अनुसार उनमें अधिकांश नर्तिकाएँ थीं अथवा मंदिरों में नृत्य करनेवाली देवदासी थीं
' बंगाल और बिहार की तत्कालीन शिक्षापद्धति का एडम का ब्यौरा चेन्नई प्रान्त में किए गए शैक्षणिक सर्वेक्षणों के १३ वर्ष बाद बंगाल प्रांत में भी तत्कालीन भारतीय शिक्षा पद्धति पर आंशिक रूप में सरकारी सर्वेक्षण किया गया था
एडम के ब्यौरे में तीन अलग अलग विवरण हैं
साथ ही एडम को भारत के शिक्षकों के प्रति या भारतीय शिक्षा परंपरा के प्रति जरा भी आदर या सम्मान का भाव नहीं था
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये एडम महाशय सर्वप्रथम १८१२ में एक ईसाई मिशनरी के तौर पर भारत में आए थे
इस हेतु सन् १८०० के बाद प्राप्य सभी स्रोतों का उसने उपयोग किया था
भाषा आधारित विभाजन जिन पांच जिलों में सर्वेक्षण किया गया था उससे यह ज्ञात होता है कि शैक्षणिक संस्थाओं की कुल संख्या २ , ५६६ थी जिसका भाषा आधारित विभाजन इस प्रकार है- बंगाली १०९८ , हिन्दी ३७५ , संस्कृत ३५३ , फारसी ६९४ , अरबी ३१ , अंग्रेजी ८ , कन्या ६ और शिशु १
भाषा आधारित विभाजन जिन पांच जिलों में सर्वेक्षण किया गया था उससे यह ज्ञात होता है कि शैक्षणिक संस्थाओं की कुल संख्या २ , ५६६ थी जिसका भाषा आधारित विभाजन इस प्रकार है- बंगाली १०९८ , हिन्दी ३७५ , संस्कृत ३५३ , फारसी ६९४ , अरबी ३१ , अंग्रेजी ८ , कन्या ६ और शिशु १
विद्यालय शिक्षा के चार स्तर प्राथमिक शिक्षा को एडम निम्नानुसार चार श्रेणियों में विभाजित करता है - ( १ ) प्रथम : १० दिन छात्र जमीन पर सलाई या बांस की पट्टी से अथवा रेत पट्टी पर अक्षर लिखना सीखता था
विद्यालय शिक्षा के चार स्तर प्राथमिक शिक्षा को एडम निम्नानुसार चार श्रेणियों में विभाजित करता है - ( १ ) प्रथम : १० दिन छात्र जमीन पर सलाई या बांस की पट्टी से अथवा रेत पट्टी पर अक्षर लिखना सीखता था
 ( ३ ) तृतीय श्रेणी : २ से ३ वर्ष : इस अवधि में छात्र को केले के पत्तों पर लिखना सिखाया जाता था
सामान्यत: ५ से ८ वर्ष की आयु में शाला प्रवेश होता था और १३ से १६ वर्ष की आयु में छात्रों का अध्ययन पूर्ण होता था
पंजाब के डॉ . लीटनर द्वारा संपन्न सर्वेक्षण एडम के सर्वेक्षण के ४५ वर्ष बाद डॉ . जी . डबल्यू , लीटनर द्वारा पंजाब में पारंपरिक भारतीय शिक्षा पर बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण हुआ था
तथापि इन सब में कहीं भी परंपरागत तंत्रविज्ञान या हस्तकलाकौशल के हुनर के बारे में साधारण संकेत तक नहीं है
भारत में यह शिक्षा विद्यालयों में नहीं अपितु पीढ़ियों तक घरों में ही दी जाती रही यह भी एक यथार्थ है
पीढ़ी दर पीढ़ी दिया जानेवाला इस प्रकार का शिक्षण अपनी जाति के अलावा और किसी जाति को दिया जाता था तो ऐसी शिक्षा देनेवाले को दण्डित कर जाति से बाहर धकेल दिया जाता था
किन्तु १९वीं शताब्दी की शुरुआत में राजस्व घटाने हेतु ऐसे हुनरों की सूची चेन्नई प्रान्त में तैयार की गई थी
'भारत का भविष्य ( ( The Future of India ) विषय पर अपने प्रवचन में गांधीजी ने सर्व प्रथम हिन्दू मुस्लिम समस्या , अस्पृश्यता की समस्या तथा गाँवों में स्थित भारत की ८५ प्रतिशत जनसंख्या की दारुण गरीबी जैसे विषयों का विस्तार से विश्लेषण किया था
गांधीजी ने उसे भारत वापस जाकर और भी स्रोत व प्रमाण भेजने का वचन देकर कहा कि 'मेरे चेथम हाउस में दिए गए प्रवचन में किए गए कथनों के मुझे आवश्यक प्रमाण नहीं मिलेंगे तो मैं अपने कथन वापस ले लूंगा
थोम्प्सन भी हार्टोग के जैसा अभिमत रखता था कि शिक्षा , पद्धति और परंपरागत उद्योगों का अंग्रेजों ने नाश किया है ऐसा गांधीजी नहीं मानते हैं
इन प्रमाणों में मेक्समूलर , लुडलो , जी . एल . प्रेन्डरगास्ट , टोमस मनरो , डबल्यू , एडम , जी . डबल्यू लीटनर आदि की अभिलेखीय सामग्री का समावेश भी था
इतना ही नहीं , यह शिक्षापद्धति इतनी अधिक आसान और प्रभावी है कि यहाँ का कोई भी किसान या छोटा व्यापारी ऐसा नहीं है जो अपना हिसाब ठीक से चौकसीपूर्वक न लिख सकता हो
' बाद में इन्हीं सब लिखित भाषणों का प्रकाशन ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी प्रेस के द्वारा सन् १९३९ में हुआ था
पत्रक अ में , बेल्लारी जिले के बारे में ए . डी . केम्पबेल ने भेजी कुछ साधारण जानकारी के आधार पर , हार्टोग , टोमस मनरो उन कुमार छात्रों की संख्या पर प्रश्नार्थ लगाते हैं
मनरो , एल्फिन्स्टन तथा बेन्टिक ने अपने प्रांतों में शिक्षा के लिए जो कदम उठाए , उससे पूर्व अंग्रेज सरकार ने भारत की प्रचलित परंपरागत शिक्षा-पद्धति की जो उपेक्षा की थी वह बात सही है किन्तु अंग्रेज सरकार ने इस शिक्षा परंपरा का जो जड़ से विनाश कर दिया है ऐसे गांधीजी के कथनों के मुझे कोई प्रमाण मिले नहीं हैं'
इसी संदर्भ में हार्टोग ने लिखा है कि 'एक ईसाई मिशनरी ने ऐसी भविष्यवाणी की थी कि भारत में नया शासन स्थापित होने ( अर्थात् अंग्रेजों से स्वतंत्र होने ) पर शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन आएगा , जो पाश्चात्य प्रकार का नहीं , पर पूर्व की परंपरा के अनुसार होगा
इस प्रकार , भारत पुन: उसकी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा में वापस लौटेगा
गांधीजी की चुनौती के सिलसिले में ही हार्टोग ने व्याख्यान दिए थे
फिर भी यूरोप में चलनेवाले युद्ध के बारे में गांधीजी के विचार पढ़कर हार्टोग प्रभावित हुआ और गांधीजी के प्रति कृतज्ञता भाव व्यक्त करते हुए दिनांक १०-९-१९३९ के दिन उसने जो पत्र लिखा था उसका सारांश है , 'वाइसरॉय के साथ आपकी भेंट और अभी चल रहे युद्ध के बारे में 'टाइम्स' में प्रकाशित आप के विचारों को पढ़कर मैं आपके प्रति कृतज्ञता का भाव रोक नहीं सकता
गांधीजी ने अपने वक्तव्य में अंग्रेजों के शासन में भारतीय समाज जीवन तथा भारतीय संस्थाओं के होनेवाले पतन का व्यापक चित्र प्रस्तुत किया था
सन् १८२०- ३० के वर्षों में भारतीय शिक्षा पद्धति की बड़े पैमाने पर दुर्गति हो गई थी
इससे विपरीत , इस क्षेत्र में स्वयं को स्वभावगत तौर पर तज्ञ माननेवाले सर फिलिप हार्टोग जैसे लोग शब्दों के निहितार्थ के स्थान पर शब्द के वाच्यार्थ के झमेलों में पड़कर मौकापरस्ती का कार्य ही कर रहे थे
कुमार छात्रों की संख्या बढ़कर ३४ . ४ प्रतिशत हुई , जो टोमस मनरो के सन् १८२६ के सर्वेक्षण में ३३ . ३ प्रतिशत कुछ समीप है
पश्चिम के ये दोनों लेखक मानते थे कि भारत के गाँव भी राज्यों के समान एक दूसरे से बिलकुल स्वतंत्र थे
इसे समझने के लिए भारतीय समाज-जीवन के विविध आयाम , उसकी क्षमताओं , उपलब्धियों तथा दुर्बलताओं को जानना अत्यंत आवश्यक है
एच . टी . प्रिन्सेस के द्वारा बताया गया है कि वर्ष १७२० में 'बाजी' श्रेणी से सहायता प्राप्त करने के लिए ७२ , ००० जितने आवेदनपत्र प्राप्त हुए थे
तथापि जिन जिन क्षेत्रों में अंग्रेजों का आधिपत्य पूर्ण रूप से स्थापित हो जाता था वहाँ अंग्रेज ये सहायताएँ देना किसी भी प्रकार से बंद कर देते थे
सन् १७५७-'५८ के बाद बंगाल और बिहार में ऐसी सहायता देना बंद कर दिया गया था और सन् १८०० तक 'चाकरन' और 'बाजी' श्रेणियों से दी जानेवाली सहायता बंद कर दी गई थी
जिनकी सहायता बिलकुल बंद कर दी गई थी , वे तो सर्वथा असहाय बन गए थे और भीख मांगने पर आ गए थे
इस प्रकार ऐसी सहायताएँ बंद करके विरोधियों को वश में रखने की टीपू की योजनाओं का वास्तविक फायदा तो अंग्रेजों ने उठाया था
इस देश की पूंजी को इस देश में ही व्यवसाय हेतु लगाने के खिलाफ कानून से पाबंदी लगाकर इस पूंजी के द्वारा यूरोपीयों के कोष भरने से यहाँ के लोगों की गरीबी में बढ़ोतरी हुई है
अंग्रेजों ने भारत में चाहे कैसे भी अत्याचार किए हों किन्तु भारत के पाश्चात्यीकरण के लिए तो इंग्लैण्ड एक परोक्ष साधन ही है
दासतायुक्त मानसिकतावाले हिन्दुओं की तुलना में शिष्टाचार , चरित्र और शौर्य के मामलों में यूरोप के लोग अत्यंत ऊँचे स्तर के थे
' हिन्दू केवल कपडे़ की बुनाई और रंगाई में , निम्न स्तर के आभूषण बनाने में , रत्नकला कौशल में , स्त्रैण लक्षणों में और वाक्छटा में यूरोपीयों की तुलना में बढ़कर थे
' ( वि . एडम . , पू . ७८ , १९४१ ) ४७ . प्रांत में स्थित १४५ पर्शियन पाठशालाओं में अधिकतर मुस्लिम छात्र आते थे
उनकी जनसंख्या की चौक्साई की है , किन्तु शिक्षा की स्थिति जानने के लिए अत्यंत कम या नहीं के बराबर काम किया है
२ . कई जिलों में पढ़ना लिखना ब्राह्मण तथा व्यापारी वर्ग तक ही सीमित रहा है
२ . कनारा में गूढ़ शास्त्रों के अध्ययन के लिए कोई कॉलेज नहीं है और न तो वहाँ ऐसी कोई निश्चित शालाएँ हैं , न तो उनमें पढ़ाने के लिए शिक्षक हैं
वे १३ से १४ वर्ष के होने तक शाला में रहते हैं
५ . नर्तकियों के रूप में तैयार होनेवाली लड़कियाँ ही शाला में पढ़ती हैं
तंजावुर , नागपट्टम् जे . कोटन २८ जून १८२३ प्रधान समाहर्ता विशेष : छात्र सामान्य रूप से पांच वर्ष विद्यालय में रहते हैं | औसत से मासिक ४ डी फेनम का शुल्क उनसे लिया जाता है | निःशुल्क चलनेवाले विद्यालयों में से १९ मिशन से संलग्न हैं , २१ विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन राजा देते हैं , १ विद्यालय के शिक्षकों का वेतन त्रिवलूर धर्मस्थान देता है , तीन विद्यालयों के शिक्षक बिना वेतन लिए पढ़ाते हैं| व्यक्तिगत रूप से सरकारी अनुदान प्राप्त विद्यालय एक भी नहीं है | केवल मिशन से सहायता प्राप्त होती है | उसके अतिरिक्त एक गांव का सर्वसामान्य होता है जिसका मूल्य १ , १०० रुपये अनुमानित है |
छात्रों के अभिभावक ही शिक्षकों के पोषक होते हैं
हिन्दूभाषा में पढ़नेवाले छात्रों को पाँच वर्ष की आयु में प्रवेश दिया जाता है तथा बारह वर्ष या सत्रह वर्ष पूर्ण होने तक वे अध्ययन करते हैं
दो वर्ष पूर्व इलोरा के जमीनदार वेंकट नरसिंह आप्पाराव ने एक शिक्षक के द्वारा हिन्दू छात्रों के लिए एक धर्मार्थ शाला शुरू करवाई थी
१२ . संलग्न पत्रक के अनुरूप ४ , ८४७ छात्र ४६५ हिन्दू शालाओं में तथा केवल १९९ छात्र ४९ शास्त्रीय महाविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करते हैं
९ . नृत्यांगना के अतिरिक्त शायद ही अन्य जाति की महिलाओं को सार्वजनिक रूप में शिक्षा दी जाती है
शिक्षक विद्यार्थी से श्लोक बुलवाते हैं , जिसमें भगवान से विद्याप्राप्ति , ज्ञानप्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है
तत्पश्चात् चावल पर वह छात्र अपनी अंगुली से भगवान का नाम लिखकर शिक्षा का शुभारंभ करता है
७ . कई मातापिता आर्थिक स्थितिवश या अन्य कारणों से अपने बच्चों को केवल पाँच वर्ष पढ़ाकर शाला से उठा लेते हैं , किन्तु जिनके मातापिता अपनी संतान के मानसिक विकास और संस्कार का ध्यान रखते हैं , वे १४ से १५ वर्ष तक विद्याभ्यास करते हैं
१० . अक्षरज्ञान प्राप्त करने के बाद छात्र संयुक्ताक्षर सीखते हैं
उच्चारण की शुद्धता के लिए उन्हें कुछ कविताएँ कंठस्थ करवाई जाती हैं
परंतु कारीगर वर्ग के परिवारों से आनेवाले छात्रों को इनके अतिरिक्त भी उनके व्यवसाय से संबंधित पुस्तकें जैसे कि नागलिंगायन कथा , विश्वकर्मापुराण , कमलेश्वर कालिकामहत्ता , बसवपुराण , राघवन कंकय्या , गिरिजाकल्याण , अनुभवमूर्ति , चिन्न बसवेश्वरपुराण आदि पवित्र धर्मग्रंथों का अध्ययन करना होता है
छात्र अनेक कविताएँ कंठस्थ बोल सकते हैं
२२ . इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि यहाँ पहले हिन्दू शासक धन स्वरूप में तथा भूमि के रूप में बड़े पैमाने पर दान देकर शिक्षा की सहायता करते थे
२८ . प्रति वर्ष थोडा खर्च करके सरकारी प्रेस में शालाओं के लिए कन्नड और तेलुगु भाषा की पुस्तकें प्रकाशित करके शिक्षा का स्तर ऊँचे ले जाया जा सकता है
छात्रों के लिए शालेय पाठ्यक्रम की अवधि साधारणत: ५ से ७ वर्ष की रहती है
राजमहेन्द्री के समाहर्ता रेवन्यू बोर्ड के प्रति १९-९-१८२३ ( टीएनएसए : बीआरपी : खण्ड ९६३ , का . २-१०-१८२३ , पू . ५२०-२५ क्रमांक २९-३० ) १ . उपसचिव के दिनांक २५ जुलाई १८२२ पत्र में मांगी गई जानकारी के संदर्भ में पत्र के साथ निश्चित पत्रक में इस कचहरी के अधिकार क्षेत्र में स्थित देशी विद्यालय और छात्रों की संख्या की जानकारी सविनय भेजता हूँ
प्रधान समाहर्ता की कचहरी जे . बॉन कालिकट , ५ अगस्त १८२३ प्रधान समाहर्ता राजा झामोरिन की ओर से भेजे गए निवेदन का अनुवाद ( ब ) आरंभ में मलबार के ब्राह्मणों को धर्म विषयक शिक्षा उनके घर के निकट रहनेवाले उस समय के शिक्षकों के द्वारा 'क्षेत्रम्' में दी जाती थी , तथापि ऐसा लगता था कि इस प्रकार की शिक्षा विशेष लाभकर्ता नहीं होगी , उसमें छात्रों की संख्या और भी कम होगी
परिणाम स्वरूप यह निर्धारित किया गया कि इस हेतु एक कॉलेज आवश्यक है , जहाँ धर्म विषयक ज्ञान दिया जाए
हिन्दू शाला में शिक्षा के लिए वार्षिक खर्च तीन रुपया तथा मुस्लिम शाला में वार्षिक खर्च १५ से २० रुपये होता है
इसके अतिरिक्त कानून और खगोल सिखानेवाली शालाएँ भी हैं
यह एक ही भुगतान बताया जा सकता है , क्योंकि लडकों को ही उनके गाँवों में स्थित शालाओं में भेजा जाता है , जो बाद में अपने निवासस्थान में रहते हैं
४ . लगता है कि जिले में जनता द्वारा अनुदान प्राप्त शालाएँ नहीं है या धर्म , कानून , खगोल आदि विषय पढाने का कोई कॉलेज भी नहीं है
हालांकि इस विषय में जो जानकारी प्राप्त होती है , उस के अनुसार १७१ स्थान में धर्मशास्त्र , कानून और खगोल आदि विषय पढाए जाते हैं
इस प्रकार अनुमानत: मासिक औसत चार आने देने पड़ते हैं , जो बढ़कर १ या १ १/२ रुपए तक जाता है , किन्तु उससे अधिक कभी भी नहीं है
फिर भी इन्हें सार्वजनिक संस्था तो नहीं कह सकते क्योंकि वे केवल उस स्थान के यूरोपीय सज्जनों तक ही सीमित हैं
५ . ब्राह्मणों में , बच्चा जब ५-६ वर्ष का होता है तभी से उसकी पढ़ाई शुरू हो जाती है और शूद्रों में ६ से ८ वर्ष के बाद शुरू होती है
फिर , वह उस प्राप्त ज्ञान को अपने पिता की दुकान में बैठकर और भी पक्का करता है
७ . लोगों द्वारा अनुदान प्राप्त करनेवाली कोई शाला या कॉलेज नहीं है
फिर , अपनी ही जाति के व्यक्ति उसे विद्याभ्यास में सहायता करने के लिए तैयार हों तो वह उनके निवास पर जाता है
हालांकि वे स्वयं गरीब होते हैं तो भी छात्रों को भोजन और वस्त्र देने की व्यवस्था करते हैं , क्योंकि ऐसा न करने से उनका बुनियादी आदर्श ही मारा जाता है
वे अत्यंत खुश होकर भिक्षा देते हैं , क्योंकि वह देशी जीवनपद्धति का एक सम्माननीय प्रकार माना जाता है
राजमुंद्री में विज्ञान के लगभग ६९ शिक्षकों के पास दान में प्राप्त जमीन है और इससे पहले जमीनदारों ने दिए धन से १३ को भत्ते मिलते थे
उससे प्रति वर्ष रू . ५१६ की राशि प्राप्त होती है
गंजाम राज्य की ओर से स्थायी आय प्राप्त कोई शालाएँ या महाशालाएँ इस जिले में नहीं हैं
गंजाम राज्य की ओर से स्थायी आय प्राप्त कोई शालाएँ या महाशालाएँ इस जिले में नहीं हैं
केवल दो ही ऐसी शालाएँ हैं जिन्हें वार्षिक ५० रुपए वेतन के रूप में चामुंडा के ज्मीनदार की ओर से मिलते रहे हैं
मुसलमान छात्र शाला में ६ से १५ वर्ष की आयु तक पढते हैं
गुंटुर समाज की सहायता से चलनेवाली एक भी शाला इस जिले में नहीं है | विभिन्न शास्त्र पढानेवाला एक भी कॉलेज नहीं है
गुंटुर समाज की सहायता से चलनेवाली एक भी शाला इस जिले में नहीं है | विभिन्न शास्त्र पढानेवाला एक भी कॉलेज नहीं है
प्रति छात्र दो आने से लेकर दो रुपए तक मासिक शुल्क शिक्षा के लिए लिया जाता है
जो शालाएँ आज हैं , वे छात्रों के अभिभावकों के सहारे चल रही हैं
ये शालाएँ वहाँ यूरोपीय सज्जनों की सहायता से चलती हैं
जो छात्र अपने गुरु के घर पर रहकर निजी तौर पर अध्ययन करते हैं उन्हें धर्मशास्त्र , कानून और खगोल विज्ञान की शिक्षा दी जाती है
चैंगलपट्ट इस जिले में एक भी व्यवस्थित कॉलेज नहीं है
गाँव का शिक्षक ३ रुपए से लेकर १२ रुपए तक मासिक वेतन प्राप्त करते हैं
इनमें २८ महाशालाएँ मठों के द्वारा और मुस्लिम धर्मसंस्थानों के द्वारा चलाई जाती हैं
जिले में स्थित शालाओं में ४४ शालाओं में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है
२१ शालाओं में गुरुजनों को राजाओं की ओर से वेतन प्राप्त होता है और एक शाला के शिक्षकों का निर्वाह खर्च त्रिवेल्लोर पेगाडा धर्म संस्थान के द्वारा किया जाता है
शेष २३ शालाओं में शिक्षक नि:शुल्क अध्यापन करते हैं
१०९ कॉलेज हैं जिनमें ९९ में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है
२१ शालाओं में गुरुजनों को राजाओं की ओर से वेतन प्राप्त होता है और एक शाला के शिक्षकों का निर्वाह खर्च त्रिवेल्लोर पेगाडा धर्म संस्थान के द्वारा किया जाता है
जिन गाँवों में शालाएँ हैं वही गाँव जनसंख्या सूची में बताये गये हैं
अकेले जयलौर तहसील में सात शालाएँ हैं , जिनका निर्वाह वहाँ की स्थानीय राज्यसंस्था करती थी
अकेले जयलौर तहसील में सात शालाएँ हैं , जिनका निर्वाह वहाँ की स्थानीय राज्यसंस्था करती थी
तिन्नेवेली तिन्नेवेली में कोई भी विद्यालय दिखाई नहीं देता
५ वर्ष की आयु में लडकों को शाला में प्रवेश दिया जाता है और वे १३-१४ वर्ष की आयु तक वहाँ रहकर अध्ययन करते हैं
५ वर्ष की आयु में लडकों को शाला में प्रवेश दिया जाता है और वे १३-१४ वर्ष की आयु तक वहाँ रहकर अध्ययन करते हैं
वहाँ अलग अलग शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है
मद्रास ( चेन्नई ) इस टिप्पणी में दो प्रकार की शालाओं का वर्णन किया गया है
एक हिन्दू और मुसलमान बच्चों की शिक्षा हेतु ग्राम्य शालाएँ और दूसरी धर्मार्थ शालाएँ जिनमें अलग अलग धर्म और जाति के छात्रों की शिक्षा होती है
अर्थात् प्रत्येक १ , ००० की जनसंख्या पर एक शाला है , किन्तु बहुत ही कम संख्या में बालिका शिक्षा दिए जाने से हम मान सकते हैं कि ५०० की जनसंख्या पर एक शाला है
इससे उनके गत वर्ष के २१ फरवरी के पत्र द्वारा कई समाहर्ताओं से प्राप्त जानकारी के अनुरूप बोर्ड ने विवरण दिया
यह भी निश्चित है कि घर में लडकों को उनके सगे-संबंधी तथा निजी शिक्षकों के द्वारा पढाने की पद्धति का भी स्वीकार करना चाहिए
इस प्रकार की शाला के निर्माण के लिए चेन्नाई स्थित स्कूल बुक सोसायटी की समिति ने एक प्रस्ताव रखा है
मैं मानता हूँ कि उनके इन प्रस्तावों को सार्थक करने के लिए सरकारी खजाने से मासिक ७०० रु . की राशि प्राप्त करने के वे अधिकारी हैं
क्योंकि उनकी बस्ती का बडा हिस्सा गरीब , मध्यम वर्ग का है और आंशिक हिस्सा ही धनिकों का है , किन्तु उनकी संख्या हिन्दू जनसंख्या की अपेक्षा १/२० जितनी भी नहीं है
यद्यपि सामान्यत: यह सच नहीं है , तो भी इतना तो अवश्य है कि शुद्ध हवा , स्वास्थ्यप्रद भोजन , संयमपूर्ण आचरण और शिक्षा ने असाधारण रूप में शारीरिक सौष्ठव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है
४ . फ्रा पाओलीनो द बार्टोलोमियो भारत में बच्चों की शिक्षा के विषय में सभी ग्रीक इतिहासकार भारत के लोगों को अन्य देशों के लोगों की अपेक्षा बडे कद के और मजबूत गठन के बताते हैं
जब छात्रों ने लेखन में अच्छी प्रगति की होती है तो उन्हें 'इथुपल्ली' नामकी शालाओं में प्रवेश दिया जाता है
शिवजी के रूप में वे अग्नि के उपासक होते हैं
खडे रहकर जाल फेंकने की विद्या ( हस्तिलुथिडम ) , ( गेंद ) खेलने की कला , ( कुन्दर ) ( पंडाकाली ) , शतरंज , ( क्युडरंगम् ) , टेनिस , ( कोलाडी ) तर्कशास्त्र ( तर्कसंग्रह : ज्योतिष , कानून और स्वाध्याय तथा मौन
धर्म के आदेश के अनुरूप मांसाहार का संपूर्ण त्याग , मद्यनिषेध , प्राणियों के शिकार के लिए और अंदर के अवयवों की रचना की जानकारी के लिए होनेवाली चीरफाड पर पाबंदी है
वर्ष में दो बार प्रत्येक शिक्षक को रेशमी कपड़ा दिया जाता है , जिसका उपयोग वे वस्त्रों के लिए करते हैं
जैसे कि ब्राह्मण को बचपन से ही पढने लिखने के व्यवसाय में माहिर कर दिया जाता है और समावर्तन के समय प्रथम उसे उपस्थित रहकर सूर्यग्रहण , चन्द्रग्रहण की गिनती का काम , कानून का अध्ययन , धार्मिक कर्मकाण्ड तथा धर्म संस्कार कराने के लिए इस प्रकार की वेद विहित क्रियाएँ करनी होती हैं
नौ साल की आयु में लडकों को बडे समारोहपूर्वक उनके बाप-दादे के व्यवसाय में दीक्षा दी जाती है
एक भारतीय कारीगर को मैंने पुर्तगाल में बना एक सुंदर लैंप दिया था
जब से विदेशी विजेताओं ने स्थानीय राज्यकर्ताओं को खदेड दिया है तब से कलाओं , और शास्त्रों के अध्ययन में गिरावट आई है , इससे इन्कार नहीं किया जा सकता
विदेशियों के आक्रमण से कई अंचल पूर्ण रूप से उजड गए हैं और कई जातियां परस्पर मिश्रित भी हो गई हैं
जो प्राचीन पुरातन भाषा है और जो अब बोली नहीं जाती उस संस्कृत भाषा में उसकी बुनियाद है
केवल समय का बीतना और राजकीय परिवर्तन ही इसके कारण होते हैं
भारत के मध्य भाग में बसनेवाले लोगों की तुलना में मलबार की शिक्षा अत्यंत सीमित रही है , किन्तु इसके साथ ही अक्षरज्ञान के मामले में वे लापरवाह नहीं रहे है
लगभग २०० वर्ष पूर्व पिटर डेलावेले ने मलबार की शिक्षा पद्धति का एक विवरण प्रकाशित किया है
उसने तक्कट्टे ( नाम स्थान ) से २२ नवम्बर १६२३ में लिखा है - 'जब दण्ड व्यवस्थित रखे जा रहे थे , तब मैं मंदिर के आगे दालान में खडा रहकर कुतूहल पूर्वक देख रहा था कि छोटे बच्चे कुछ विचित्र प्रकार से गणित सीख रहे थे
कागज लकड़ी का स्वाभाविक उत्पादन है
वृक्ष के पत्तों पर संज्ञाएँ उकेरी जाती हैं
विशिष्ट प्रकार का ताडपत्र इसके लिए पसंद किया जाता है जो कुछ सीमा तक कलम की घिसाई सह सके
देश में उस समय लिखे कागज पर मुहर लगाने की पद्धति नहीं थी
नोर्वे और स्वीडन में पहले लोग लकड़ी की पट्टियों पर लिखते या नक्काशी करते थे
इन लकड़ी की पट्टियों को 'स्टेव' कहा जाता है
सन् १४४२ में अब्दुल रज्जाक ने उसके सफर के दौरान यह पद्धति बिशनगढ में देखी थी
यहां के ग्रामवासी सरल हैं , निष्कपट हैं
चिन्सुरम के एक मिशनरी लिखते हैं कि विद्वान और अनपढ सभी , अब हमारे बच्चों को शिक्षा के महान आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं , ऐसा कहकर एक दूसरे को बधाई देते है
लोग अपने धर्म की मान्यताओं और रहस्यों से परिचित भी हैं
जमीनदार , जिनका बस्ती में सम्मान का स्थान माना गया है और अंचल की सत्ता तथा संपत्ति जिनके हाथ में है , उन्होंने शिक्षा , जिज्ञासा और स्वातंत्र्य के उत्साह को विशेष प्रभावित किया है
मलबार के लोगों में स्वयं ही लिखाई करने का एक स्वतंत्र ढांचा या परंपरा है
उन्हें सी कर नहीं वरन् डोरी से बांधकर योग्य आकार के ग्रन्थ तैयार किये जाते हैं
स्त्री-पुरुष साथ साथ बैठते हैं
किसी यांत्रिक साधन का उपयोग नहीं किया गया था
यह अंदाज बालक ७ वर्ष की आयु में विद्यालय जाना प्रारम्भ करता है , इस तथ्य पर आधारित है
वर्तमान परिस्थिति में विद्यालय शिक्षा हेतु कोई महत्त्वपूर्ण साधन बनने की सम्भावना नहीं है
उनका मान सम्मान नहीं रह पाता
यह प्रक्रिया एक वर्ष तक चलती है
किन्तु नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में आभासी , क्षतियुक्त शिक्षा प्राप्त होती हैं
छात्र साहित्यिक और मौखिक विषयों , व्यक्तिगत गुणवृद्धि और सामाजिक दायित्व के क्षेत्रों में अशिक्षित जैसे ही रहते हैं
अलग अलग शिक्षकों के कथनानुसार विद्यालय में बिताया समय ५ से १० वर्ष का प्रतीत होता है
कागबारिया के दो परिवारों के पाँच बच्चे धाराइता के विद्यालय में पढ़ते हैं
अमीन ग्रामवासियों और जमींदारों के झगडे निपटाना , जमीन का नाप करना आदि कार्य करता है और उसे तीन से चार रूपये मासिक वेतन मिलता है
उसे भी पाँच रूपये वेतन मिलता है
दी जा रही शिक्षा का ब्यौरा देखने से पता चलता है कि समग्र जिले में कोई नहीं जानता कि ग्रामवासियों के लिये प्रादेशिक भाषा में छपी पुस्तकों का उपयोग किया जा सकता है
इन विद्यालयों में शिक्षकों द्वारा लिखी हुई और शुभंकर के नियमों के अनुसार शब्दरचना वाली एक अन्य उक्ति भी वंदना के लिये उपयोग की जाती है
ऐसा कहा गया है कि बंगाल में शिक्षा के चार स्तर हैं
यहाँ तक तो केवल शब्दोच्चार और अक्षरों के आकार को ध्यान में न लेते हुए विद्यार्थियों का परीक्षण किया जाता है
प्रदेश के अन्य भागों की शालाओं में जाति , नदियों , पहाडों आदि के तथा व्यक्तियों के नाम लिखना सिखाया जाता है
कृषि से संबंधित हिसाब किताब की अन्य बातें इस जिले में नहीं सिखाई जातीं
ग्राम्य शालाओं के बच्चे जब लिखना सीखते हैं तभी उन्हें पता चलता है कि मात्र वाचन से ही नहीं वरन् वाचन और लेखन से ही उन्हें वास्तविक शिक्षा ( ज्ञान ) प्राप्त हो सकती है
उन्होंने पहले जो लिखा होता है उसे वे शिक्षक या वरिष्ठ विद्यार्थी को दिखाते हैं जिससे हाथ , आँख , कान आदि सभी इंद्रियाँ शिक्षा में सहभागी बनती हैं
उन्होंने पहले जो लिखा होता है उसे वे शिक्षक या वरिष्ठ विद्यार्थी को दिखाते हैं जिससे हाथ , आँख , कान आदि सभी इंद्रियाँ शिक्षा में सहभागी बनती हैं
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारतीय विद्यालयों में नेतृत्व करने वाला वरिष्ठ विद्यार्थी ( मानीटर प्रकार का ) होता है और वही स्थिति बंगाल के विद्यालयों में भी है
जिस प्रथा का मैंने वर्णन किया है उसका जोर व्यावहारिकता पर ज्यादा है और यदि योग्यरूप से समग्रता में शिक्षा कार्य होता है तो वह छात्र को गाँव के कामधंधों के लिये पूर्ण रूप से योग्य बना सकती है
उनमें २३ छात्र पढते हैं
उनमें साढे चार वर्ष से तेरह वर्ष तक की आयु के बालकों को प्रवेश दिया जाता है और वे बारह से सत्रह वर्ष की आयु तक शिक्षा प्राप्त करते हैं
बंगाली शालाओं के शिक्षकों की अपेक्षा यहाँ के शिक्षकों का स्तर ऊँचा है फिर भी अपेक्षित स्तर की गुणवत्ता नहीं है
यह वेतन उन्हें एक या अधिक कुटुम्बों के द्वारा दिया जाता है और जीवनावश्यक वस्तुएँ जैसे कि अनाज , नहानेधोने की सामग्री , ( लगभग ढाई से छह रूपये मूल्य की ) तथा अन्य व्यक्तिगत खर्च की राशि एक परिवार से अथवा जो माता पिता मासिक भत्ता नहीं देते , उनके द्वारा दी जाती है
सामान्य शिक्षा प्रणाली में कोई स्तर विभाजन नहीं है
विवाह से संबंधित सादी की एक पुस्तक 'गुलिस्तान' भी पढाई जाती है जिसमें विवाह जीवन की रीतिनीति सिखाई जाती है
सुंदर लेखन कला एक बडी सिद्धि मानी जाती है और जो लोग इस काम से जुडे होते हैं वे रोज तीन से छ घंटे लेखन कार्य करते हैं
सुंदर लेखन कला एक बडी सिद्धि मानी जाती है और जो लोग इस काम से जुडे होते हैं वे रोज तीन से छ घंटे लेखन कार्य करते हैं
पहले विभाग में वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग किया जाता है जो इकाई , दहाई , सैकडा , सहस्र आदि संख्या का लेखन दर्शाता है
व्यक्तिगत शिक्षक भी होते हैं जिन्हें 'सेन्सर मोइम' या 'अतालिक' कहा जाता है जो घरेलू बडे नौकर के समान होते हैं
समग्र फारसी शिक्षा जो जिले में जहाँ जहाँ भी अपूर्ण हालत में दिखाई दी और फिलहाल प्रचलित है , वह बंगाली शिक्षा की तुलना में अधिक समझदारीवाली और मुक्त , उदारवृत्तिवाली है
ऐसी ११ शालायें हैं और उनमें ४२ विद्यार्थी हैं
उसके लिये २ आने से १ रूपये तक रकम मिलती है
अन्य एक उदाहरण में आश्रयदाता शिक्षक को आवास , भोजन तथा वस्त्र प्रदान करता है परंतु उसे कोई वेतन या शुल्क नहीं मिलता
ग्राम्य मानस पर उनका निश्चित प्रभाव है जिसका प्रमाण है मौलवियों को प्राप्त होनेवाली धन राशि और सम्मान , शिक्षक के रुप में प्राप्त होनेवाला वेतन एवं विद्यालय स्थापित करने हेतु किया जाने वाला खर्च
इस प्रकार विद्यार्थियों को उनका निश्चित अध्ययन जारी रखने के लिये नि:शुल्क शिक्षा और शिक्षकों की निरसता दूर करने के लिये उन्हें निवासस्थान , धान्य आदि , कभी कभी वस्त्रदान के रूप में जमीनदारों और अन्य लोगों की ओर से स्थायी आय होती रहे इसलिये जमीन के स्थायी पट्टे के अलावा विवाह या मृत्यु तथा अन्य अवसरों पर समूह भोजन की व्यवस्था की जाती है
डॉ . बुशनन को दिनाजपुर जिले में १६ विद्यालय मिले , जबकि पडोस के पूर्णिया जिले में लगभग ११९ जितनी ऐसी संस्थायें हैं
मुझे जो भी तथ्य प्राप्त हुए हैं उन से कहा जा सकता है कि बंगाल के प्रत्येक जिले में ऐसी लगभग १०० संस्थायें हैं
सन् १८१८ में श्री वोर्डने कोलकता में हिन्दुओं की २८ शालाएँ दर्शाई हैं जिनमें १७३ छात्र अध्ययन करते थे
सन् १८१८ में श्री वोर्डने कोलकता में हिन्दुओं की २८ शालाएँ दर्शाई हैं जिनमें १७३ छात्र अध्ययन करते थे
व्याकरण का यह ज्ञान प्राप्त करने के बाद जब विद्यार्थी स्वयं वाचन में और काव्य समझने में , कायदे-कानून और दर्शनशास्त्र की पुस्तकें समझने में पारंगत हो जाता है तब वह इस प्रकार का अध्ययन स्वयं करने लगता है और व्याकरण का बाकी अध्ययन स्वयं कर लेता है
जिनके विवरण जिस से पूर्वोक्त अधिकांश जानकारी प्राप्त हुई है , से ऐसा अंदाज लगता है कि १ लाख ब्राह्मणों में से १ हजार ब्राह्मण संस्कृत व्याकरण सीखते हैं इनमें से ४००-५०० लोग काव्य रचना के अमुक अंश पढ सकते हैं और ५० अलंकार शास्त्र के कुछ अंश पढते हैं
इन में से दस जितने ब्राह्मण खगोलशास्त्र का अध्ययन करते हैं तथा अन्य दस से कुछ अधिक इसका अधूरा ज्ञान रखते हैं
बिजली की चमक , बादलों की गर्जना , गुरू शिष्य के बीच में से वाचन के समय कोई निकल जाए , किसी विशिष्ट माननीय व्यक्ति के आगमन पर , सरस्वती पूजन त्यौहार के तीन दिन , वर्षाऋतु के कुछ दिन ( कुछ भागों में ) , दुर्गापूजा के अवसर पर दो महीनों में तथा अन्य त्यौहारों के समय महाशालाओं का अध्ययन स्थगित रहता है
ये राजा या जमींदार शिक्षा को प्रोत्साहन देने को उत्सुक रहते हैं और छात्र को सम्मानित करने के लिए उसे कीमती वस्त्र देते हैं और तिलक करते हैं
ऐसा माना जाता है कि पश्चिम के प्रान्तों में नीचे के भाग में अनेक मुस्लिम शालायें प्रारंभ हुई हैं और कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर उनका संचालन करते हैं
छात्र की सफलता का आधार उसकी अपनी उद्यमशीलता पर होता है
किसी भी पक्ष पर कोई अंकुश नहीं लगाया जाता तथा उनके बीच कोई अन्य बंधन भी नहीं होता
ये छात्र अनेक बार शिक्षक के घर पर ही निवास करते हैं तथा अन्य कुछ अपने परिवारों के साथ रहते हैं
इस प्रकार स्थान ( शिक्षक ) बदलते हुए जब वे पत्रलेखन में निपुण हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी शिक्षा पूरी हो गई है और उससे वे मुंशी का पद प्राप्त कर सकते हैं तब वे स्थायी आय के लिये धंधे की खोज में निकलते हैं और कंपनी के कार्यालयों में वे चपरासी की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं
मौलवी अपने घर पर ही कुछ छात्रों को रखकर उन्हें फारसी और अरबी पढ़ाते हैं
हेमिल्टन के अनुसार सन् १८०१ में कुल मिलाकर १५० निजी विद्यालय थे जिनमें पंडित हिन्दू कानून के मूल सिद्धांतों की शिक्षा देते थे
प्रत्येक विद्यालय में ५ से २० तक छात्र होते थे
हाजी मोहम्मद के दान से हुगली में चल रहे विद्यालय के अलावा एक अन्य सीतापुर के विद्यालय की जानकारी मिलती है
सन् १८२४ के विवरण के अनुसार पांडुआ में कुछ जमीन थी जिसकी आय से मदरसों को सहायता मिलती थी , परंतु अब इस आय का हेतु बदल गया है
सन् १८१८ के सितम्बर में बर्दवान के जिलाधीश से रामबल्लभ भट्टाचार्य और उनकी धार्मिक संस्था एवं सभा के लिये ६० रूपये वार्षिक पैंशन के दावे की पूछताछ की गई
सन् १८१८ के सितम्बर में बर्दवान के जिलाधीश से रामबल्लभ भट्टाचार्य और उनकी धार्मिक संस्था एवं सभा के लिये ६० रूपये वार्षिक पैंशन के दावे की पूछताछ की गई
इस स्थिति में रेवेन्यू बोर्ड ने दावेदारों के जीवन काल तक पूरी पेन्शन चालू रखने का प्रस्ताव पारित किया तथा कहा कि निष्ठापूर्वक मूल हेतु का पालन हो इसका ध्यान रखा जाए
इस स्थिति में रेवेन्यू बोर्ड ने दावेदारों के जीवन काल तक पूरी पेन्शन चालू रखने का प्रस्ताव पारित किया तथा कहा कि निष्ठापूर्वक मूल हेतु का पालन हो इसका ध्यान रखा जाए
मार्च १८१९ में बर्दवान के जिलाधीश ने रेवेन्यू बोर्ड को आवेदन दिया था
इससे जिलाधीश ने अपने अमीन को भेजकर यह जानने को कहा कि यह संस्था किस हद तक कार्यरत है
उस अमीन ने गाँववालों पर विश्वास कर विवरण दिया कि संस्था कार्यरत है
नदिया मुसलमानों की विजय के समय नदिया हिन्दुओं की राजधानी थी और फिलहाल वह ब्राह्मण शिक्षा का प्रमुख स्थान है
बंगाल के राजकुमारों और नदिया के राजाओं ने विद्यार्थियों के निभाव और शिक्षा के लिये कुछ शिक्षकों को जमीन दी थी
सरकार और नदिया के लिये नियुक्त अस्थायी कमेटी ऑफ सुप्रिन्टेन्डेन्ट के बीच हुए पत्र व्यवहार में बताया गया है कि उस समय लगभग ३८० विद्यार्थी थे और उनकी आयु २५ से ३० वर्ष के बीच थी
श्री वोर्ड ने सन् १८१८ में नदिया में ३१ विद्यालय बताये हैं जिनमें ७४७ विद्यार्थी थे
श्री वोर्ड ने सन् १८१८ में नदिया में ३१ विद्यालय बताये हैं जिनमें ७४७ विद्यार्थी थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
रामशरण न्यायवागीश के पास १५ छात्र थे
न्याय शिक्षा के महाविद्यालय शिवनाथ विद्यावाचस्पति के पास १२५ छात्र थे
गंगाधर शिरोमणि के पास २५ छात्र थे
पंडित ( शिक्षक ) यहाँ नहीं रहते थे किन्तु प्रात: जल्दी आकर सूर्यास्त तक कार्य करते थे
नदिया की शिक्षा व्यवस्था का सबसे अच्छा चित्रण विल्सन की टिप्पणी से प्राप्त होता है
सन् १८१८ में विद्यालय ३१ तथा विद्यार्थी ७४७ थे
सन् १८१८ में विद्यालय ३१ तथा विद्यार्थी ७४७ थे
नवंबर १८१९ में एक प्रार्थनापत्र श्री राम शिरोमणि ने नदिया के जिलाधीश के माध्यम से रेवन्यू बोर्ड को दिया जिसके अनुसार नदिया में गुरुकुल चलाने हेतु वार्षिक ३६ रूपये स्वीकार किये गये थे
सामान्यत: वे उसके कर्जदार ही बने रहते थे , तथा प्रभावशाली ब्राह्मण वर्ण के कारण वह विद्यार्थियों के साथ धोखेबाजी नहीं कर पाता था
श्री वोर्ड के अनुसार कुमारहारा और भाटपारा गाँवों में सात आठ अस्थायी कामचलाऊ शालायें चलती थीं
बाकरगंज इस जिले में एक भी ग्रामशाला या महाविद्यालय नहीं है
हेमिल्टन ने जो बताया वह सत्य प्रतीत होता है कि यहाँ किसी नियमित शाला या गुरुकुल में हिन्दू या मुस्लिम धर्मशास्त्र या कानून की शिक्षा दी जाती हो ऐसा नहीं लगता
संपूर्ण जिले को १९ परगना और छ टप्पों में बाँटा गया था और इन २५ विभागों में हिन्दू शास्त्र की शिक्षा देने वाले ५०-६० विद्यालय होंगे
सिलहट इस जिले की शिक्षा से संबंधित जानकारी बहुत कम है
यह पेंशन उनके पिता जयराम न्यायपंचानन को चकला राजाशाही के जमींदार स्व . महारानी भवानी की ओर से हिन्दू विद्यालय चलाने के लिये मिलती थी
दिसंबर १८१८ में मुर्शिदाबाद के जिलाधीश के माध्यम से कालिकान्त शर्मा की ओर से रेवेन्यू बोर्ड को एक याचिका दायर की गई जिसमें ५ रूपये मासिक पेन्शन चालू रखने की प्रार्थना की गई थी
हाल में प्रार्थी कार्यालयीन कार्य करने में समर्थ नहीं है
सन् १८२० में सर्वानंद नामक एक हिन्दू ने वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपने उत्तराधिकार का दावा किया और स्थानीय अधिकारी के माध्यम से सरकार को ५००० रूपये की सहायता भेजने की प्रार्थना की , जिससे जिले में एक ग्राम्यशाला स्थापित की जा सके
सन् १८२० में सर्वानंद नामक एक हिन्दू ने वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपने उत्तराधिकार का दावा किया और स्थानीय अधिकारी के माध्यम से सरकार को ५००० रूपये की सहायता भेजने की प्रार्थना की , जिससे जिले में एक ग्राम्यशाला स्थापित की जा सके
यह जमीन , ८ , ३४८ बीघा है तथा ३९ गावों से देवदान में प्राप्त हुई है
परंतु सरकार की सहायता से चलनेवाली दो शालाओं के अतिरिक्त किसी अन्य का उल्लेख मुझे नहीं मिला
उनकी पेंशन जारी रखनी चाहिए और उनके वारिस यदि वे यह संस्था ब्रिटिश सरकार के स्थानीय प्रतिनिधि की देखरेख में चला सकते हों , तो उन्हें भी पेंशन जारी रखनी चाहिए
कानूनगो से प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार जिले के ९ उपविभागों में ४१ शालायें संस्कृत की शिक्षा देती हैं , जिनमें ५ से लेकर २५ तक विद्यार्थी होते हैं जिन्हें व्याकरण , सामान्य साहित्य , काव्यशास्त्र , तर्कशास्त्र , कानून , पौराणिक काव्य , खगोल तथा आगमशास्त्र की शिक्षा दी जाती है
पहले तो जो विद्वान ब्राह्मण इन्हें पढ़ाते हैं उनकी उदारता से , दूसरे धार्मिक त्यौहारों पर आमंत्रित होने पर प्राप्त भेटों से , घरों के साथ के सम्बन्धों से और भिक्षाटन से जब अन्य साधन विफल होते हैं तब दूसरे का सहारा लिया जाता है
विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से अपनी आजीविका अर्जित कर सकें ऐसी शिक्षा दी जाती है
दीनाजपुर जिले के २२ विभागों में से १५ में विद्यालय नहीं हैं और शेष ७ विभागों में केवल १६ विद्यालय हैं
दीनाजपुर जिले के २२ विभागों में से १५ में विद्यालय नहीं हैं और शेष ७ विभागों में केवल १६ विद्यालय हैं
वैद्यों और कुछ संपन्न कायस्थों को संस्कृत विद्वानों द्वारा निश्चित किया हुआ हिस्सा तथा साहित्य का कुछ अंश पढाया जाता है
जिले में शिक्षक और पंडितों की संख्या २४७ थी
डॉ . बुशनन ने शिक्षा की विविध शाखाओं की कुछ जानकारी दी है
आज वह बासठ वर्ष का है और अपना अतिरिक्त समय अपने दो भतीजों को शिक्षा देने में बिताता है
उपस्थित न होने से मैं उनके साथ बातचीत नहीं कर सका , लेकिन उनके पडोसियों ने उनकी अंदाजित आमदनी क्रमश: आठ , दस और बारह रूपये बताई
 ( एक पुस्तक का ) संस्कृत से बंगाली में अनुवाद किया गया है जिसमें क्षेत्रों के लक्षण और उपचार बताये गये हैं और रोगोपचार के लिये देशी दवाओं की मात्रा का भी वर्णन है
उपस्थित न होने से मैं उनके साथ बातचीत नहीं कर सका , लेकिन उनके पडोसियों ने उनकी अंदाजित आमदनी क्रमश: आठ , दस और बारह रूपये बताई
वह यह कि प्रशिक्षित चिकित्सक आत्मविश्वासपूर्वक निश्चित औषध देते हैं जबकि अल्पज्ञाता अनुवाद की पूर्ण समझ न होने से अनिश्चिततापूर्वक औषध देते हैं
वनस्पतिजन्य तथा खनिज व क्षारयुक्त दो प्रकार की औषधियां दी जाती हैं
वनस्पतिजन्य दवाएँ छिलका , पत्ते , मूल एवं फलों से बनती हैं और दवा की दुकानों से कपूर , लौंग , इलायची आदि के रूप में भी उपलब्ध रहती हैं
गंगा के तटवर्ती क्षेत्र का यह जिला है
वर्षाऋतु में विपुल मात्रा में आनेवाला जल सांपो के बिलों में भरने से वे बाहर आ जाते हैं
यदि आवश्यकता होती तो मैं प्रत्येक गाँव के मदारियों की संख्या बता सकता था , परंतु पत्रक की तालिका में इनकी संख्या दिये बिना भी मैंने उनकी संख्या तय कर ली है
कुछ गाँव ऐसे भी हैं जहाँ एक भी मदारी नहीं है तो कुछ गाँवों में लगभग १० मदारी हैं
गाँव में होने वाले झगडे की भविष्यवाणी , उसके निराकरण आदि यह मदारी अन्य लोगों की अपेक्षा शीघ्र कर देता है
जो भी यह जादू सीखता है वह उसका अभ्यास करता रहता है
परन्तु इनके मूल में नीतिभ्रष्टता और दुर्गुण हैं ऐसा कोई चिह्न दिखाई नहीं देता
अन्य प्रान्तों में जिन्हें प्रशासन का अनुभव प्राप्त हुआ ऐसे श्रेष्ठ अधिकारियों के प्रामाणिक और सद्भावना युक्त प्रयासों और सरकार के उदार प्रयासों के बावजूद पंजाब की वास्तविक शिक्षा कुचल गई , विकास रुक गया और अंतत: वह नष्ट हो गई
ऐसे अनेक शिक्षित लोग थे जो समय आने पर अपने साथियों को इश्वरीय लीला मानकर पढ़ाते थे
किसी एक व्यक्ति को इसके लिये दोषी नहीं माना जा सकता
विद्यार्थियों की संख्या कम से कम गणनानुसार ३ , ३० , ००० थी जो आज १ , ९० , ००० रह गई है
इन विद्यार्थियों को शाला में लिखना , पढ़ना और गिनना सिखाया जाता था
सारे वातावरण में शिक्षा के प्रति बड़ा पवित्र भाव था , चरित्र और धर्माचरण में वह उपयोगी थी
सरकारीकरण ने सारी मान , श्रद्धा और पवित्रता की भावना को नष्ट कर दिया है
आप मुझे यह बताने के लिए क्षमा करें कि आपने जो कहा है कि जो पंजाब में हुआ है वही पूरे देशमें भी हुआ होगा , ऐसा कहना गलत है
भारत में सबसे बडे दो राज्य , कश्मीर और हैदराबाद , में शिक्षा का स्तर इतना नीचा क्यों है यह मैंने जब पूछा तब आपने बताया कि वहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है यह इसका कारण हो सकता है
341 श्री एम . के . गांधी ८८ , नाईट्सब्रिज , डबल्यू , प्रिय श्री गांधी , आप के २३ अक्टूबर के पत्र के उत्तर में मैंने २७ अक्टूबर को आपको एक पत्र भेजा है परन्तु आपने जिन सन्दर्भों के विषय में मुझे बताया था ( पंजाब प्रशासन अहवाल और 'यंग इण्डिया' के लेख ) और गत ५० वर्ष में ब्रिटिश भारत में शिक्षा और साक्षरता का ह्रास हुआ है ऐसे आपके कथन का जो आधार है वह मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है
प्रजा के निम्न ( या सामान्य ) वर्ग के लिए ग्रामशालाएँ पूरे देशभर में व्याप्त थीं जिनमें कारीगरों , कृषकों और जमीनदारों के बच्चों को अच्छी प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी
मस्जिद और दरगाहों के साथ विद्यालय जुडे हुए थे और राज्य की ओर से या निजी उदारता की ओर से भूमि या धन के रूप में उन्हें अनुदान प्राप्त होता था
सँडलर कमिशन ने दर्ज किया है कि 'इन विद्यालयों के विकास हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया
ओरिएण्टल कॉलेज और सरकारी कॉलेज , लाहौर के प्रिन्सिपाल डा . लिटनर ( कुछ समय वे शिक्षा विभाग के निदेशक भी थे ) ने पंजाब की देशी शिक्षा की स्थिति के विषय में विस्तृत सर्वेक्षण करवाया था
होशियारपुर जैसे पिछड़े जिले में भी १८५२ के 'सेटलमेंट रिपोर्ट के अनुसार १९६५ पुरुषों की जनसंख्या पर एक विद्यालय था , जब कि आज ९ , ०२८ जनसंख्या पर एक सरकारी अथवा सरकारी अनुदान युक्त विद्यालय है और २ , ८१८ . ७ की जनसंख्या पर एक विद्यालय है जिस में पूरे प्रदेश के देशी विद्यालयों का भी समावेश होता है
इससे भी कम समय में इंग्लैण्ड में पूरे के पूरे जनसमाज के लिये शिक्षा की व्यवस्था हुई , इससे बहुत कम समय में संस्कृति और ज्ञान की कोई पार्श्वभूमि न होने पर भी अमेरिका में पूरे जनसमाज के लिये शिक्षा की व्यवस्था हुई , जपान अपना भाग्यविधाता बन सका
गांव की पंजी से 'शिक्षक का खेत' और 'रक्षक का खेत' कभी मिटता नहीं था
पंजाब के प्रत्येक गांव में किसी न किसी प्रकार का विद्यालय था और उसमें एक एक बालक को व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकताओं को पूर्ण करनेवाली प्रारम्भिक शिक्षा या तो नि:शुल्क या अत्यन्त अल्प मासिक शुल्क पर दी जाती थी
आज जिस प्रकार सब की बुद्धि को एक स्तर पर लाया जाता है और कम बुद्धिवाले की खातिर बुद्धिमान को नीचे लाया जाता है वैसा करने के लिये बाध्य करनेवाली समूहशिक्षा उस समय नहीं चलती थी
पंजाब के प्रथम प्रशासन बोर्ड ने शिक्षा की इस समृद्ध परंपरा , जो उन्हें ह्रासग्रस्त और बिखरे हुए सिख संविधान से प्राप्त हुई थी , उसे मान्यता दी
वे यह भी नहीं बताते हैं कि डा . लिटनर पंजाब प्रान्त की शिक्षा की तुलना मध्य प्रान्त और बंगाल की शिक्षा के साथ कर रहे हैं
फिर भी , आपको एफ . ई . की के ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी प्रेस द्वारा १९१८ में प्रकाशित 'एन्श्यण्ट इण्डियन एज्यूकेशन : Ancient Indian Education के पू . ५१ , ५७ , १०७ पर डा . लिटनर के 'हिस्ट्री ऑव इंडिजीनस एज्यूकेशन इन पंजाब : History of Indigenous Education in Punjab ) के पू . १५४ और २१ १८८२ के पंजाब सरकार के रिपोर्ट में , ए . पी . होवेल के 'एज्यूकेशन इन ब्रिटिश इण्डिया प्रायर टर १८५४ : Education in British India Prior to 1854' में और लुडलो के 'ब्रिटिश इण्डिया :British India' में प्रमाण मिलेंगे
परंतु मुझे अधिकाधिक मात्रा में प्रतीति हो रही है कि जहां तक सामान्य शिक्षा का प्रश्न है हमने इन दस बारह वर्ष में अपने आप को बधाई दे सकें ऐसा शायद ही कुछ किया है
 ( देखें इण्टरनेशनल अफेअर्स की जर्नल , नवम्बर १९६१ , पृ . ७२७ , ७२८ , ७३४ , ७३५ ) उस सन्दर्भ में मैंने श्री गांधी की मुलाकात करने के लिये पत्र लिखा था
अग्नि के निकट एक सोफा पर शाल लपेटे वे लेटे हुए थे
मैंने उनसे जो कहा था कि ८ और २९ दिसम्बर के 'यंग इण्डिया' में प्रकाशित दौलत राम गुप्ता के लेखों में साक्षरता के आंकडे नहीं थे; डॉ . लिटनर की पुस्तक 'हिस्ट्री ऑव इन्डिजीनस एज्यूकेशन इन पंजाब' १८८२ में लिखी गई थी इसलिये ५० वर्षों में पंजाब की शिक्षा की प्रगति या अवनति के विषय में कोई जानकारी उसमें प्राप्त नहीं हो सकती थी
' मैंने इस राजकीय चर्चा को आगे बढ़ाना या ब्रिटिश जब भारत में आये तब राजकीय क्षेत्र में कितनी अराजकता थी उसकी ओर ध्यान आकर्षित करना उचित नहीं समझा क्योंकि मेरा मुख्य उद्देश श्री गांधी से चैथम हाऊस का अपना वक्तव्य वापस लिवाना था
मैंने श्री गांधी को कहा कि मैं उनका यह सुझाव स्वीकार नहीं कर सकता कि सार्वत्रिक प्रारम्भिक शिक्षा आवश्यक रूप से बहुत हल्की होनी चाहिये और यह भी कि मेरी कमिटि ने जो १९ करोड रुपये अतिरिक्त आवर्ती खर्च का प्रावधान किया था उससे लगभग ८० प्रतिशत बालक बालिकाएँ प्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत आ जायेंगे
मैंने श्री गांधी को कहा कि मैं उनका यह सुझाव स्वीकार नहीं कर सकता कि सार्वत्रिक प्रारम्भिक शिक्षा आवश्यक रूप से बहुत हल्की होनी चाहिये और यह भी कि मेरी कमिटि ने जो १९ करोड रुपये अतिरिक्त आवर्ती खर्च का प्रावधान किया था उससे लगभग ८० प्रतिशत बालक बालिकाएँ प्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत आ जायेंगे
परन्तु भारतीय विद्यालयों का मेरा अनुभव मुझे कहता है कि उपस्थिति और साक्षरता में बहुत अन्तर है
शरत चैटरजी मुझे कहते थे कि १९२१ में उनके उपन्यास के बारह आनेवाले संस्करण से उन्हें बारह हजार रुपए रॉयल्टी के रूप में प्राप्त हुए थे , जिसका अर्थ है कि उसकी दो लाख प्रतियों की बिक्री हुई थी
स्थानीय भाषा पढने तक की बात में तो विद्यालय दर्शाते हैं उससे बहुत अधिक संख्या में लोग पढ सकते हैं
हम अपने आप को अनुचित शाबाशी देते रहते हैं
उन्होंने तुरन्त ही मुझे 'जनसामान्य की शिक्षा का ह्रास' विषयक दौलत राम गुप्ता के ८ दिसम्बर और २९ दिसम्बर के 'यंग इण्डिया' में प्रकाशित दो लेखों की टंकित प्रतिलिपि भेज दी
मैं आपको सत्य का खोजी मानता हूं इसलिये या तो मेरे वक्तव्य की सत्यता के प्रमाण देकर और नहीं तो मेरा वक्तव्य वापस लेकर और उसे प्रसिद्धि देकर आपको सन्तुष्ट करने के लिये उत्सुक हूं
महात्माजी ने 'यंग इण्डिया' के दो लेख आपको भेजे थे , परन्तु आपको वह पर्याप्त नहीं लगता है
ब्रिटिशरों के आगमन के पूर्व के बंगाल की शिक्षा की स्थिति के विषय में सरकारी अभिलेख और मिशनरियों के अहवाल का आधार लेकर मैक्समूलर कहते हैं कि बंगाल में उस समय ८० , ००० विद्यालय थे , या ४०० की जनसंख्या पर एक विद्यालय था
"विद्यार्थियों की संख्या कम से कम गणनानुसार ३ , ३० , ००० थी जो आज १ , १९० , ००० रह गई है
मैं अभी दूसरे कामों में बहुत व्यस्त हूं , परन्तु विगत सौ वर्षों में बंगाल की शिक्षा की स्थिति के विषय में तीन लेखों की सामग्री मैंने संकलित की है
दूसरी ओर आपको लगता है कि विद्यालयों की संख्या प्रतिशत के लिये मार्गदर्शक संख्या है
उन लेखों को मेरी पुस्तक 'सम आस्पेकट्स ऑव इण्डियन फ्लॉष्ठादेग्न , पास्ट एण्ड प्रेझन्ट में समाविष्ट किया गया है
आप मुझे उनके विषय में बताने की कृपा करेंगे ? पी . जे . एच प्राध्यापक के . टी . शाह २ मई १९३९ ४५ , चौपाटी रोड मुंबई ( ७ ) प्रिय प्राध्यापक शाह , कुछ सप्ताह पूर्व मैंने ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक 'सम आस्पेक्ट्स ऑव् इण्डियन एज्यूकेशन , पास्ट एण्ड ( Some Aspects of Indian Education , Past and Present ) ' की प्रति भेजी थी
गोपनीय सर फिलिप हार्टोग को महात्मा गांधी के पत्र की प्रतिलिपि ( १६ अगस्त १९३९ की डाक की मुहरवाले लिफाफे में भेजी हुई; पत्र में लिखा दिनांक पढा नहीं जाता
इसके पश्चात् कुछ ही महीनों में , देश के प्रत्येक राज्य द्वारा रचित कानून द्वारा ऐसी संस्थाओं का आरम्भ हुआ
इस के साथ ही , भारतीय राज्य व्यवस्था में पंचायतों के स्थान के सन्दर्भ में भारत की संविधान सभा में १९४७ से १९४९ के कालखण्ड में हुई चर्चाओं का अध्ययन 'एवार्ड' द्वारा आरम्भ हुआ
एवार्ड' के पूर्व के अध्ययन और 'भारतीय राज्यव्यवस्था की आधारशिला पंचायत राज' के प्रकाशन ने , १९५८ के बाद के पंचायत राज कार्यक्रमों के विषय में गहन अध्ययन करने की प्रेरणा दी
सन् १९६४ के आरम्भ में शुरू किया गया अध्ययन सन् १९६५ में सम्पन्न हुआ
१९६५ के उत्तरार्ध में 'मद्रास पंचायत पद्धति' ( The Madras Panchayat System ) लिपिबद्ध हुई और जनवरी १९६६ में उसका अन्तिम प्रारूप तैयार हुआ
१९६५ के उत्तरार्ध में 'मद्रास पंचायत पद्धति' ( The Madras Panchayat System ) लिपिबद्ध हुई और जनवरी १९६६ में उसका अन्तिम प्रारूप तैयार हुआ
१९६५ के उत्तरार्ध में 'मद्रास पंचायत पद्धति' ( The Madras Panchayat System ) लिपिबद्ध हुई और जनवरी १९६६ में उसका अन्तिम प्रारूप तैयार हुआ
उसके अध्याय ५ - 'समस्या [The Problem ) में निर्दिष्ट , १८वीं शती के अन्त और १९वीं शती के प्रारम्भकाल के भारत और उस समय के अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई नीति विषयक सामग्री की जाँच भी तमिलनाडु राज्य अभिलेखागार द्वारा की गई थी ! अगस्त-सितम्बर १९६५ में लेखक को लन्दन जाना पडा , उस समय इन्डिया ऑफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिश लाइब्रेरी , लन्दन में सन् १८०० के सन्दर्भ में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला
स्वन्तत्र भारत के संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव १३ दिसम्बर १९४६ को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया था
परन्तु , संविधान सभा का सचिवालय नहीं था
इस समिति में निम्न सदस्य थे : १ . श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर २ श्री एन . गोपालस्वामी आयंगर ३ . डॉ . बी . आर आम्बेडकर ४ . श्री क . मा . मुनशी ५ श्री सैयद महंमद सादुल्ला ६ . श्री बी . एल मित्तर ७ . श्री डी . पी . खैतान अन्वीक्षण समिति ( 3 0088 ) द्वारा संशोधित प्रारूप ४ नवेम्बर १९४८ को पुन: संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया
प्रारूप अन्वीक्षण समिति को सोंपा गया था उन पन्द्रह महीनों के दौरान संशोधित प्रारूप प्रकाशित एवं प्रसारित किया गया
पाण्डुलिपि के द्वितीय पठन के आरम्भ से , अन्वीक्षण समिति की ओर से वक्तव्य देते हुए नवम्बर १९४८ को श्री टी . टी . कृष्णमाचारी ने कहा था कि , 'इसके साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय जो महत्त्वपूर्ण बात थी कि - संविधान की रचना करने के लिए प्रारूप समिति ने ( 09 007168 ) आवश्यक ध्यान नहीं रखा है - इस सदन को सम्भवत: जानकारी है ही कि आपके द्वारा नियुक्त किये गए सात सदस्यों में से एक ने त्यागपत्र दिया था इसलिए उसके स्थान पर नई नियुक्ति हुई थी
संविधान सभा के सचिवालय ने मुझे और अन्य कुछ सदस्यों को अप्रैल में सूचना दी थी कि आपने ( सदन ने ) तय किया है कि संघीय अधिकार समिति ( Union Power Committee ) , संघीय संविधान समिति और प्रान्तीय संविधान समिति के सदस्य एवं कुछ चयनित लोगों ने मिलकर सदन के सदस्यों और जनसामान्य की ओर से सूचित विभिन्न संशोधनों के विषय में विचारविमर्श को स्थान दिया जाए
और मैंने देखा है कि समिति द्वारा निर्दिष्ट कुछ सिफारिशों को लेकर डॉ . आम्बेडकर और माधवराव के बीच मुलाकात हुई थी और उन्होंने निर्दिष्ट संशोधनों को ध्यान में रखते हुए कुछ निर्देश दिए थे , परंतु तकनिकी दृष्टि से वह प्रारूप समिति नहीं थी
प्रत्येक आँख के प्रत्येक अश्रुबिंदु को पोंछने की 'हमारे युग के एक महानतम व्यक्ति की इच्छा अभी अपूर्ण है
जब तक आँसू और व्यथाओं का अस्तित्व बना रहता है तब तक हमारा कार्य अपूर्ण रहेगा
१५ अगस्त १९४७ को जिसकी संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ . राजेन्द्रप्रसाद ने स्पष्ट व्याख्या नहीं की थी - और गांधीजी के रहते उसकी बहुत आवश्यकता भी नहीं थी - उस 'हमारे स्वप्न के भारत का निर्माण करने के लिये भारतीय जन की सहायता करने का अवसर' अभी भी हमारे पास है
केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों मे ही 'स्वराज्य' सीमित न रहते हुए उसका प्रसार सभी स्तर पर होने से अपेक्षित विकास सम्भव हो पाएगा
इसके साथ ही मैं यह समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमारे देश के समाज या राज्य के लिए यह प्रस्ताव किस प्रकार के जीवन को प्रस्तुत करता है
मैं महात्मा गाँधी की बात कर रहा हूँ ( हर्षनाद ) 
आज रूस में जो दिखाई देता है वह उसे तानाशाह और असहिष्णु शासन की ओर ले जानेवाला है
हमारे युग की प्रमुख समस्या यही है कि क्या राज्य लोगों का स्वामी होगा या लोग राज्य के स्वामी होंगे
यद्यपि जब तक प्रत्येक नागरिक में समय आने पर जान की बाजी लगाकर भी संविधान की रक्षा करने के लिए आवश्यक अंत:स्फुरणा पैदा नहीं होती तब तक कोई भी संविधान कर्तव्यनिष्ठा उत्पन्न नहीं कर सकता
पंडित जवाहरलाल नेहरू ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) ( चर्चा का उत्तर देते हुए ) 'हम संविधान तैयार करेंगे और मुझे विश्वास है कि हमारा संविधान अच्छा होगा , लेकिन इस सदन का कोई सदस्य क्या ऐसी भी कल्पना कर सकता है कि स्वतन्त्रता के उदय के पश्चात् स्वतन्त्र भारत किसी भी बन्धन को , इस सदन के द्वारा उनके लिए निश्चित की गई है ऐसी किसी भी बात को स्वीकार करेगा ? स्वतन्त्र भारत तो एक समर्थ राष्ट्र की चेतना का विस्फोट देखनेवाला है
पंडित जवाहरलाल नेहरू ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) ( चर्चा का उत्तर देते हुए ) 'हम संविधान तैयार करेंगे और मुझे विश्वास है कि हमारा संविधान अच्छा होगा , लेकिन इस सदन का कोई सदस्य क्या ऐसी भी कल्पना कर सकता है कि स्वतन्त्रता के उदय के पश्चात् स्वतन्त्र भारत किसी भी बन्धन को , इस सदन के द्वारा उनके लिए निश्चित की गई है ऐसी किसी भी बात को स्वीकार करेगा ? स्वतन्त्र भारत तो एक समर्थ राष्ट्र की चेतना का विस्फोट देखनेवाला है
निस्सन्देह ग्रामसमूह ऐसी स्थिति में भी बने रहे जहाँ कुछ भी बच पाना सम्भव नहीं था , परन्तु ग्रामसमूहों के प्रति गौरव का अनुभव करनेवाले वे लोग यह सोचते नहीं है कि देश के कामकाज या उसके भविष्य की दृष्टि से उन्होंने कितनी नगण्य भूमिका निभाई है
देश के इतिहास में ग्रामसमूहों ने ऐसी भूमिका निभाई है इस बात से अवगत होने के पश्चात् हमारे हृदय में उनके प्रति कितना गौरव उत्पन्न होता है ? यह वस्तुस्थिति है कि उत्थान एवं पतन के कालखण्ड में उन्होंने अपना अस्तित्व बनाये रखा है , परन्तु केवल बचे रहना अर्थहीन है
जैसा कि मैंने बताया , हमारे संविधान का ढाँचा अपने पैरों पर नहीं बल्कि शीर्षासन की स्थिति में खडा है ऐसा उसे देखकर प्रतीत होता है
ऐसी स्थिति में , संविधान द्वारा घोषित मूलभूत अधिकारों में काम के अधिकार एवं रोजगारी के अधिकार को समाविष्ट करते हुए देश के लोगों को दो जून रोटी और शरीर के लिए वस्त्र का प्रबन्ध करना आवश्यक था
उनका संदेश था कि भारत नगरों में नहीं बल्कि सात लाख गाँवों में बसता है . . . ! प्रा . शिब्बनलाल सक्सेना ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) ' . . . उन्होंने ( श्री दामोदर स्वरूप सेठ ने ) कहा कि इस संविधान में गाँवो का कोई प्रभाव नहीं है . . . श्री एस . एन . अग्रवाल ने भी महात्मा गाँधी द्वारा सूचित संविधान की रूपरेखा दी थी
उनका संदेश था कि भारत नगरों में नहीं बल्कि सात लाख गाँवों में बसता है . . . ! प्रा . शिब्बनलाल सक्सेना ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) ' . . . उन्होंने ( श्री दामोदर स्वरूप सेठ ने ) कहा कि इस संविधान में गाँवो का कोई प्रभाव नहीं है . . . श्री एस . एन . अग्रवाल ने भी महात्मा गाँधी द्वारा सूचित संविधान की रूपरेखा दी थी
हम मूलभूत शक्ति की ओर से दृष्टि हटा लेंगे तो और कुछ दिखेगा ही नहीं
राजधानी के दरबारी न्यायालयों के पास न्यायिक अधिसत्ता थी और वे समग्र देश के न्यायतन्त्र का संकलन करते थे
विदेशी शासकों ने हमारे गाँवो को जानबूझकर भूखों मारा है , उनका गला घोंटा है और एसे अधम कृत्य में नगरनिवासियों ने स्वेच्छा से साथ दिया है
मैंने बताया है कि गाँधीवादी और कोंग्रेस के दृष्टिकोण ने हमें सिखाया है कि संविधान पिरामिड आकार का और ग्रामपंचायतों पर आधारित होना चाहिए
परंतु मुझे ऐसा भी लगता है कि सभी प्रदेशों में पंचायतों का निर्वाचन होने के पश्चात् एक या दूसरे दौर में संविधान में उनके अस्तित्व को स्वीकृति देनी ही पडेगी , क्योंकि दीर्घकाल में गाँव की स्वायत्तता ही इस देश में भविष्य की विशेष स्वायत्तता की आधारशिला बननी चाहिए
आज स्थानीय सत्ताधिकरण आश्चर्यजनक मात्रा में दयनीय स्थिति का सामना कर रहा है
केन्द्र को अमर्यादित रूप से दृढ बनाया गया है और उनकी ( प्रदेशों की ) सत्ता को छीन लिया गया है , ऐसी शिकायत करनेवाले प्रदेशों ने स्वयं ही सत्ता के मद में , स्थानीय संस्थाओं की सत्ता को हस्तगत कर लिया है और अनुचित संचालन की आड लेकर आज पचास प्रतिशत स्थानीय संस्थाओं को प्रादेशिक सरकारों ने 'सुपरसीङ' किया है
इन संस्थाओं को ग्रामीण लोगों के विकासार्थ अत्यन्त उपयोगी उपकरण बनाने का कोई स्पष्ट आदेश संविधान द्वारा प्रादेशिक सरकारों को यदि नहीं दिया जाता है तो जनतन्त्र के नाम पर तैयार की गई इस पाण्डुलिपि का कोई अर्थ नहीं है
ये संस्थाएँ स्वायत्त संचालन की सत्ता का उपयोग कर सकेंगी , क्योंकि सविधान ने स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं के विकास के पथ में संकट नहीं बिछाये हैं , अवरोध पैदा नहीं किये हैं
पंडित बालकृष्ण शर्मा ( संयुक्त प्रांत : सामान्य ) . . . नि:संदेह , कहा जा सकता है कि संविधान में ग्रामपंचायतों के लिए किसी धारा का प्रावधान नहीं है
मुझे विश्वास है कि उनके जैसे विचार सदन के किसी सदस्य के मन में नहीं होंगे
संविधान के प्रारूप के अनुसार राज्यसभा सदन का चुनाव परोक्ष रूप से प्रान्तीय विधानसभाओं के द्वारा होगा
ग्रामपंचायतों को राज्यसभा को निर्वाचित करने की स्वतन्त्रता देंगे तो व्यापक प्रतिनिधित्ववाला सदन प्राप्त होगा
 . . . नगरनिवासी गाँव से , ग्रामीण जीवन से कोसों दूर हैं , अत: हम सोचते हैं कि गाँवों मे कुछ भी अच्छा नहीं है
मैं गाँव का निवासी हूँ , किसान के घर में जन्मा और पला हूँ इसलिए स्वाभाविक रूप से ही वह सभ्यता मेरे रोम रोम में उतरी है और यह मुझे प्रिय है
गाँवों के जमींदार , जागीरदार , महाजन एवं आर्थिक लेनदेन करनेवाले सूदखोर वर्ग के लिए तुलना में कम सुसंस्कृत , अशिक्षित , गरीब समुदाय को लूटने एवं उनका शोषण करने के लिए यह पद्धति सहायक बनेगी
श्रीमती दाक्षायणी वेलायुधन ( मद्रास : सामान्य ) . . . भारत को प्रथम स्तर की शक्तिशाली इकाई बनाने के लिए दो मार्ग हैं
परन्तु शिष्ट भाषा में जिसे जनतान्त्रिक पद्धति कहा जाता है वैसी संसदीय पद्धति के द्वारा ही केन्द्रीकरण सम्भव होना चाहिए
एक महान संस्कृति और विश्व के एक सर्वोत्कृष्ट महापुरुष के उदात्त सिद्धान्तों और उपदेशों से युक्त , तीस करोड की जनसंख्या वाले इस देश के सामने हम ऐसा संविधान प्रस्तुत कर रहे हैं जो पूर्णत: विदेशी है
प्रो . एन . जी . रंगा ( मद्रास : सामान्य ) . . . डॉ . आम्बेडकर ने ग्रामपंचायतों के विषय में जो कुछ कहा इससे मुझे बहुत दु:ख हुआ है
मैं इस सदन को याद दिलाना चाहता हूँ कि हम जिस नए जनतन्त्र को प्रस्थापित करने जा रहे हैं , हमारे ग्रामवासी भी दूढ मताधिकार के आधार पर अपने दायित्वों को उचित रूप से निभायें , इसके लिए आवश्यक महत्तम अनुभव उन्हें प्राप्त हो , वे समर्थ बनें इस उद्देश्य से महत्तम राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना करना आवश्यक है
कोंग्रेसी होने के नाते हम विकेन्द्रीकरण के लिए प्रतिबद्ध हैं और समग्र विश्व भी आज विकेन्द्रीकरण का पक्षधर है
परन्तु क्या यह जरूरी नहीं है कि हम एक निर्देश में स्पष्ट रूप से यह कहें कि हमारे संविधान के शिखर ढांचे के लिये आधारशिला बनने हेतु सामाजिक , आर्थिक और राजकीय स्वायत्तता प्राप्त करने हेतु तथा ग्रामजनों में स्वशासन का प्रशिक्षण प्राप्त करने में सहायता करने हेतु गांव या गांव समूहमें पंचायत की स्थापना करना राज्य का कर्तव्य है ऐसी स्पष्ट सूचना हम निर्देशों में ही समाविष्ट कर दें ? ( संविधान के ) इस उद्देश्य को लेकर कहना पडेगा कि गाँवों में निवास करनेवाले लोगों के प्रति उदासीनता दर्शाई गई है
डॉ आम्बेडकर ने गाँवों को अज्ञान का घर' कहा
सदन चाहता है कि गाँव भी आगे आकर राष्ट्र के पुनर्गठन में संपूर्ण भूमिका प्रदान करें
ऐसी इच्छा प्रामाणिक है और इसलिए सदन से मेरा नम्र निवेदन है कि वे संविधान में ही चुनाव प्रक्रिया का विस्तार से निरूपण करें
श्री विश्वम्भर दयाल त्रिपाठी ( संयुक्त प्रान्त: सामान्य ) एक बात मुझे चुभती है - भारत की भूमि जनतन्त्र के लिऐ अनुकूल नहीं है ऐसे डॉ . आम्बेडकर के कथन का मैं विरोध करता हूँ
श्री किशोरीमोहन त्रिपाठी ( मध्य प्रान्त एवं वराड ) दूसरे एक प्रश्न के प्रति ध्यान दिया जाए , . . . वह है गाँवों को चुनाव का . . . गाँवों के विषय में बहुत कुछ कहा गया है
हमने संविधान की रचना में प्रान्त एवं गाँवों को अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया है इसीलिए ऐसे प्रश्न उपस्थित हुए हैं
मुझे लगता है कि अगर ग्रामीण समाज को पुन: प्राणवान बनाया जाए , उसे सत्ता के प्रति सतर्क किया जाए तो वह न केवल राज्य का स्तम्भ बन सकेगा अपितु राज्य की शक्ति का प्रमुख स्रोत बन सकने की क्षमता भी सिद्ध करेगा
डॉ . आम्बेडकर के कटु विचार उनके अपने अनुभव पर आधारित थे
अर्थात ३० प्रतिशत गाँवों में कार्यकर्ता नियमित रूप से मिलते रहते हैं , पंचायत के करों का संग्रह किया गया है , गाँववासियों की स्वैच्छिक सेवाओं के द्वारा गाँव की साप्ताहिक स्वच्छता का कार्य किया है , बच्चों को टीका लगवाने की दिशा में भी उचित कदम उठाए गए हैं
अर्थात ३० प्रतिशत गाँवों में कार्यकर्ता नियमित रूप से मिलते रहते हैं , पंचायत के करों का संग्रह किया गया है , गाँववासियों की स्वैच्छिक सेवाओं के द्वारा गाँव की साप्ताहिक स्वच्छता का कार्य किया है , बच्चों को टीका लगवाने की दिशा में भी उचित कदम उठाए गए हैं
एक अवसर पर उन्होंने कहा था कि 'अधिकांश कोंग्रेसी यदि गाँवों से आते हैं तो वे , सभी दृष्टि से , गाँवों को स्वच्छता का मूर्त रूप प्रदान करने में लगने चाहिए
व्यापक रूप से अफसरशाही की प्रशासनिक पकड नहीं है वहाँ कुछ छोटी रियासतों मे मुझे उल्लेखनीय रूप से आत्मनिर्भर ग्रामीण प्रजा के संगठित प्रयास दिखाई दिए हैं
व्यापक रूप से अफसरशाही की प्रशासनिक पकड नहीं है वहाँ कुछ छोटी रियासतों मे मुझे उल्लेखनीय रूप से आत्मनिर्भर ग्रामीण प्रजा के संगठित प्रयास दिखाई दिए हैं
श्री टी . प्रकाशम ( मद्रास : सामान्य ) . . . श्री माधवराव ने बताया कि हमारे पूर्वज मतपेटिका एवं मतपत्र से अनभिज्ञ थे
श्री विश्वम्भर दयाल त्रिपाठी ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) मान्यवर , मेरी समझ में नहीं आता कि वे किस सरकार की बात कर रहे हैं
सदन के सम्माननीय सदस्यों में से एक मित्र ने कुछ दिन पूर्व मुझसे कहा कि ''ग्रामस्वराज जैसी बात के लिए आप इतनी उग्र चर्चा क्यों कर रहे हैं ? बैलगाडी के वे दिन बीत गये हैं , और वह युग पुन: वापस लौटनेवाला नहीं है
उनमें से कुछ लोगों ने हमसे कहा , ''महोदय , जब आप वापस लौटें तब खाद्यसामग्री के दाम कम हो और हमारे साथी निवास के लिए थोडीसी जगह की माँग करें तो वह उन्हें प्राप्त हो इसका ध्यान रखें
ग्राम संगठन देश में शान्ति प्रस्थापित करेंगे
हमारे और विश्व के इतिहास से विमुख हो जाने के कारण हम इस बात को घृणा की दृष्टि से देखें यह ठीक नहीं है
इसलिए मेरे दक्षिण के मित्रों को बात समझाने के लिए थोडा बहुत अंग्रेजी का प्रयोग करूँगा अन्यथा मैं अपनी हिन्दी में बोलने की परम्परा बनाये सदन में संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते समय अपने भाषण में डॉ . आम्बेडकर ने गाँवों के बारे में कुछ टिप्पणियाँ कीं , इससे मुझे , और मेरा मानना है कि सदन के अधिकांश सदस्यों को , बहुत पीडा हुई थी
प्रत्येक प्राचीन देश में स्थिति ऐसी नहीं थी
हेनरी मेने द्वारा रचित प्राचीन कानून , बेडन पोवेल द्वारा रचित 'भारत का ग्रामसमाज' एवं श्री बी . सी . पाल द्वारा रचित 'भारत की मूलभूत एकता ( Fundamental Unity of India ) में हमारे प्राचीन ग्रामसंगठनों का वर्णन उपलब्ध है
महात्मा गाँधी ने देश के जनजीवन के अन्य सभी पक्षों में जिस प्रकार से क्रान्ति उत्पन्न की थी , उसी प्रकार से ग्रामजीवन में भी क्रान्ति पैदा हुई
उन्होंने एक गाँव में निवास करना शुरू किया
इसलिए यदि संविधान में गाँवों का उल्लेख नहीं करेंगे तो स्थिति दयनीय मानी जाएगी
वास्तव में दो या तीन आदरणीय सदस्यों - श्री रंगा , श्री अनन्तशयनम आयंगर-का संशोधन सूचित करता है कि राजनीतिक एवं आर्थिक अधिकारों के प्रभावशाली विकेन्द्रीकरण की बडी आवश्यकता है
मा . श्री के . संतानम आदरणीय सदस्य का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि स्वराज्य केवल राजनीतिक नहीं है , वह आर्थिक एवं आध्यात्मिक भी हो सकता है
वस्त्र-उत्पादन भी मिलों पर अवलम्बित मत रखिए , चरखा चलाइए , स्वयं खाद्यान्न उत्पन्न कीजिए
इन गाँवों में न्यूनाधिक मात्रा में भी अस्पृश्यता में विश्वास रखनेवाली जातियाँ नहीं होंगी
उनका विचार था कि विकेन्द्रीकरण होना चाहिए एवं गाँव आर्थिक इकाई बनना चाहिए
प्रस्ताव पारित हुआ , धारा ३१ ए संविधान में संलग्न की गई
श्री लक्ष्मीनारायण साहू ( उडिसा : सामान्य ) . . . भारत गाँवों का देश है
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
मुंबई सरकार ने पंचायत कानून की रचना की है , मध्य प्रदेश सरकार ने जनपद कानून बनाया है , संयुक्त प्रान्त सरकार ने गाँव पंचायत कानून और बिहार सरकार ने ग्राम पंचायत राज बनाया है
मुंबई सरकार ने पंचायत कानून की रचना की है , मध्य प्रदेश सरकार ने जनपद कानून बनाया है , संयुक्त प्रान्त सरकार ने गाँव पंचायत कानून और बिहार सरकार ने ग्राम पंचायत राज बनाया है
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रान्त केवल अस्थिपंजर जैसे हैं
इन करोडों लोगों की ब्रिटिश शासन में उपेक्षा हुई थी
महात्मा गाँधी ने कोंग्रेस के नाम से देश को संगठित करना शुरू किया तब , उनको स्पष्ट रूप से पता था कि इस देश को उसके करोडों लोगों के लिए किस प्रकार सहायता की जा सकती है
इसलिए , देश को स्वतंत्रता दिलवाने के हेतु जिन्होंने महान बलिदान दिया है ऐसे , इस सदन के आदरणीय सदस्यों से मैं कहना चाहता हूँ कि जब कभी इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया गया कि महात्मा गाँधी की योजना ही समुचित है तब हर बार समग्र सदन ने एक स्वर में पंचायत पद्धति की माँग की थी , परन्तु बहुत देर हो जाने से , हम जिस संविधान की रचना कर रहे हैं उसमें उसे समाविष्ट नहीं कर पाए
मुझे प्रसन्नता है कि मार्गदर्शक सिद्धातों मे पंचायत पद्धति को समाविष्ट किया गया है
मुझे ज्ञात है कि उत्तरप्रदेश में पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के प्रशासन ने ग्राम पंचायतों की रचना की है , आसाम में तो इससे पूर्व उसकी रचना की गई है
एक क्रान्तिकारी आन्दोलन की फलश्रुति के रूप में इस संविधान की रचना की गई है , इसलिए उसमें क्रान्तिकारी प्रजा की आशा आकांक्षाओं का प्रतिघोष गूंजना चाहिए
श्री शंकरराव देव ( मुंबई : सामान्य ) संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाले सदस्यों की नियुक्ति करते समय हम संविधान के पंडितों का ज्ञान और बहुश्रुत संवैधानिक विशेषज्ञों की सटीकता की अपेक्षा उत्सुकता से करते थे और यह बात उसमें विपुल मात्रा में है . . . परन्तु हमने बुद्धिचातुर्य से युक्त और व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञों का चयन नहीं किया , और न हीं संविधान में क्रान्ति की भावना को साकार रूप देना स्वीकार किया , क्योंकि संविधान सभा १९४६ में गठित हुई , उस के पूर्व क्रान्तिकारी संघर्ष के निकष पर संविधान के वर्तमान रचनाकारों में से कोई भी परखे नहीं गये हैं
श्री शंकरराव देव ( मुंबई : सामान्य ) संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाले सदस्यों की नियुक्ति करते समय हम संविधान के पंडितों का ज्ञान और बहुश्रुत संवैधानिक विशेषज्ञों की सटीकता की अपेक्षा उत्सुकता से करते थे और यह बात उसमें विपुल मात्रा में है . . . परन्तु हमने बुद्धिचातुर्य से युक्त और व्यवहारकुशल राजनीतिज्ञों का चयन नहीं किया , और न हीं संविधान में क्रान्ति की भावना को साकार रूप देना स्वीकार किया , क्योंकि संविधान सभा १९४६ में गठित हुई , उस के पूर्व क्रान्तिकारी संघर्ष के निकष पर संविधान के वर्तमान रचनाकारों में से कोई भी परखे नहीं गये हैं
परन्तु जैसा कि मैंने पहले कहा , यह गलती किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं हुई है
आज अत्यन्त केन्द्रीकरणवाले संविधान की आधारशिला पर सृजन करेंगे तो हमारे जनजीवन और समाज का पुन: संस्करण हम कभी नहीं कर पाएँगे
महात्मा गाँधी की इच्छा को सम्मान देने के लिए हम ऐसा खतरा उठाने के लिये तैयार हुए हैं
उसमें कहा गया है कि 'राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और वे स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें इसके लिए उन्हें आवश्यक शक्ति और अधिकार देगा
हमारे प्राचीन राजनीतिक संगठन का सिद्धांत था कि राज्य का दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक की प्राथमिक आवश्यकताओं को वह पूरा करे
परन्तु हमारे संविधान में अति विनम्रता दर्शाते हुए 'जहाँ तक सम्भव हो' और 'राज्य की क्षमता के अनुसार' जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए हमारे वचनबद्धता की मर्यादा हम स्पष्ट करते हैं और इस प्रकार लोगों के प्रति हमारे यथार्थ दायित्व को संकुचित बनाते हैं
श्री अलगु राय शास्त्री ( संयुक्त प्रान्त : सामान्य ) कुछ आगे बढ़ने पर हमें प्रतीत होता है कि कथित मार्गदर्शक सिद्धांत जिसमें हमारे देश के आदर्शों को और जनता के अधिकारों को समाविष्ट किया गया है , उसकी भाषा बहुत आकर्षक , मनभावन और चमक दमकवाली है , परन्तु उसमें कहीं पर भी यह नहीं कहा गया है कि राज्य जनता को अन्न और वस्त्र देने का दायित्व पूर्ण करेगा और जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा
श्री अमीयकुमार घोष ( बिहार : सामान्य ) . . . हमने पंचायत पद्धति को राम राम कर दिया है , इतना ही नहीं परन्तु समन्वय और उत्तम प्रशासन के नाम पर राज्यों को केवल आज्ञापालक , हाँ में हाँ मिलानेवालों के स्तर पर उतार दिया है
परन्तु वह ( असन्तोष ) सरलता से बाहर निकल सकता है क्योंकि उसमें कई संकेत और बीज तो पडे हुए हैं ही
गाँधीजी ने हमें जो सिखाया था उसके बीज संविधान में हैं और संविधान को उचित रूप से कार्यान्वित किया जाए तो वे बीज अंकुरित होंगे
श्री एस . वी . कृष्णमूर्ति राव ( मैसूर राज्य ) ऐसा आरोप हुआ है कि गाँधीवादी सिद्धांतो की बलि चढाई गई है
इस संविधान में श्रेष्ठ परंपराएँ , अन्य देशों के राजनीतिक एवं संवैधानिक अनुभव एवं गाँधीवादी आदर्शों का सुविचारित मिश्रण है
श्री उपेन्द्रनाथ बर्मन ( पश्चिम बंगाल : सामान्य ) . . . भविष्य में रचे जानेवाले वास्तविक ढाँचे के बारे में कुछ कहने से पूर्व मैं सदस्यों को बताऊँगा कि वे संविधान में समाविष्ट एक मार्गदर्शक सिद्धांत के प्रति ध्यान दें
श्री पी . के . सेन ( बिहार : सामान्य ) राष्ट्रपिता द्वारा अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की हुई पुरानी विचारधारा को मानते हुए आधारभूत रूप से पंचायत पद्धति को कार्यान्वित करना चाहिए , इस विषय पर अपेक्षित चर्चा हुई है
भुमि को उपजाऊ बननेवाली खाद , हड्डियाँ आदि रूप में रही खाद , विदेश व्यापार के नाम पर निर्यात होती थी
लार्ड लिनलिथगो का आगमन हुआ और उन्होंने बैलों के उत्तम पालनपोषण के लिए प्रभावी प्रयोग आरम्भ किए , जो एक वर्ष तक चलते रहे
सेना के लिए , ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए , देश के उत्तम 'पशुओं' को मार दिया गया
उन गाँवों का ब्रिटिश शासन के केन्द्रों ने विनाश किया और समग्र भारत की स्थिति , उनकी आवश्यकताओं के सन्दर्भ में भिखारी जैसी बना दी थी
उन गाँवों का ब्रिटिश शासन के केन्द्रों ने विनाश किया और समग्र भारत की स्थिति , उनकी आवश्यकताओं के सन्दर्भ में भिखारी जैसी बना दी थी
आज विश्व उथलपुथल एवं विसंगतियों से पीडित है
संविधान में ऐसा कुछ भी स्पष्ट शब्दों में समाविष्ट नहीं किया गया है , फिर भी उन्हें ये सभी प्राप्त हो और उनकी आपत्तियाँ शीघ्रता से दूर हों इस प्रकार के संविधान को हम कार्यान्वित कर सकते है
गाँधीजी ने अपने जीवनकाल में निरन्तर सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर ही बल दिया था , परन्तु हमारा संविधान उलटी राह पर अर्थात् अधिकाधिक केन्द्रीकरण की ओर मुडा है
गाँधीजी ने अपने जीवनकाल में निरन्तर सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर ही बल दिया था , परन्तु हमारा संविधान उलटी राह पर अर्थात् अधिकाधिक केन्द्रीकरण की ओर मुडा है
सरदार सोचेत सिंह ( पटियाला एवं पूर्व पंजाब संघ ) . . . केवल नारों एवं निरर्थक सूत्रों की संतुष्टि के लिए अत्यधिक केन्द्रीकरण का वैभव हमें अनुकूल नहीं होगा . . . श्री टी . जे . एम विल्सन ( मद्रास : सामान्य ) देश के प्रत्यक्ष शासन में व्यक्ति की परिणामकारी साझेदारी ही जनतंत्र का सारतत्त्व है
वे कहते थे कि प्रभावी जनतंत्र चोटी से नहीं अपितु मूल से ऊपर उठता है
सत्ता और अधिकार चोटी पर केन्द्रित नहीं करने के बजाय समाज के नीचले स्तर पर निवास करनेवाले सुदूर के समाज में वितरित करना चाहिये
श्री कमलापति त्रिपाठी ( संयुक्त प्रान्त: सामान्य ) . . . संविधान की पहली आधारभूत न्यूनता यह है कि वह अति केन्द्राभिमुखी है
मैं आपना ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ कि ग्रामीण प्रजा और सामान्य मनुष्य ऐसा कोई विश्वास संविधान में खोज नहीं पाएगा . . . मेरे सहित सभी लोग जानते हैं कि भारत गाँवों का देश है और हमारी प्रजा गाँवों मे निवास करती है
इसके उपरांत मुझे यह भी अनुभव होता है कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है
मैं सदन के सदस्यों से पूछता चाहता हूँ कि क्या वे इन अवधारणाओं पर आधारित राज्य की रचना करने जा रहे हैं ? महात्मा गाँधी विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे
उनके विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत के साथ 'रामराज्य' का प्रगाढ सम्बन्ध था . . . केवल अहिंसक समाज में ही सभी हिंसक तत्त्वों को दूर करने से विकेन्द्रीकरण का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा
जहाँ तक युद्धपिपासु राष्ट्रों का अस्तित्व बना हुआ है तब तक विकेन्द्रीकरण का हम विचार भी नहीं कर सकेंगे
मुझे आशा है कि भारत की भूमि इतनी बाँझ नही है कि वह ऐसे नेता को जन्म नहीं दे पाएगी जो संविधान को मुखरित करने के लिए उसके वर्तमान ढाँचे में प्राण फूंक सके . . . वह मुखरित हो सके . . . यदि हम निम्नलिखित प्रावधान उसमें संलग्न करें . . . संविधान के प्रावधानों के अधीन रहकर कोई भी नागरिक अपने व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए , सरकारी तिजोरी या व्यक्तिगत प्रयास से सामान्य वेतनधारी व्यक्ति से अधिक वेतन , लाभांश या मत्ते नहीं लेगा
मैं अधिकांश मित्रों के साथ सहमत नहीं हूँ - विशेषकर प्राचीन हिन्दु राज्य प्रशासन में प्रजातान्त्रिक शासनपद्धति अर्थात प्रजातन्त्र ( स्वायत्त इकाइयाँ ) के अस्तित्व के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से प्रस्तुतिकरण करनेवाले मित्रों के साथ मेरा तर्क है कि हमारे निम्न स्तरीय वर्ग , हमारे समाज की हलकी जातियाँ जिन्हें हम हरिजन कहते हैं उन्हें निरन्तर दलित एवं दबी हुई स्थिति में ही रखा , और उसके सहज परिणामस्वरूप जनतन्त्र उस समय था ही नहीं
संविधान का सम्बन्ध सरकार के अंग-कार्यकारिणी , विधायिका , न्यायपालिका के साथ होता है और विभिन्न स्तर पर उनके बीच आपसी सम्बन्ध होते हैं
उदाहरणत: केनेडा और दक्षिण आफ्रिका के संविधानों में केन्द्र और प्रान्त हैं , परन्तु अमेरिका के संयुक्त राज्यों ( U . S . A ) और ऑस्ट्रेलिया के संविधान प्रमुख रूप से केन्द्र पर बल देते हैं और राज्यों के ढाँचे के साथ उनका कदाचित ही कोई सम्बन्ध होता है
संघ राज्य में समाविष्ट या निर्दिष्ट ऐसी सभी सत्ताएँ और कार्य या संघ राज्य की जन्मजात या निहित या उसमें से उत्पन्न होनेवाले शासन और प्रशासन के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे; और जिसमें सार्वभौम स्वतंत्र भारत की सभी सत्ताएँ और अधिकार , उसके घटक और सरकारी विभाग प्रजा से प्राप्त होंगे; और जिसमें कानून तथा सार्वजनिक नीतिमत्ता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठ , अवसरों और कानून के समक्ष समानता; विचार अभिव्यक्ति , मान्यता , आस्था , पूजापद्धति , व्यवसाय , संगठनों की रचना करने और काम करने का स्वातंत्र्य संरक्षित एवं सुरक्षित होगा; जिसमें अल्पमतावलम्बियों , पिछडे और आदि जाति क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछडे वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त होगी; और जिसमें जनतांत्रिक एकता और अखण्डितता तथा भूमि , समुद्र और आकाश क्षेत्र के उसके अधिकारों की न्यायोचित एवं सदस्य राष्ट्रों के कानून द्वारा देखभाल की जाएगी; और यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना न्यायपूर्ण आदरयुक्त स्थान प्राप्त करेगी तथा विश्वशांति और मानवकल्याण के लिए अपना स्वैच्छिक योगदान देगी
संघ राज्य में समाविष्ट या निर्दिष्ट ऐसी सभी सत्ताएँ और कार्य या संघ राज्य की जन्मजात या निहित या उसमें से उत्पन्न होनेवाले शासन और प्रशासन के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे; और जिसमें सार्वभौम स्वतंत्र भारत की सभी सत्ताएँ और अधिकार , उसके घटक और सरकारी विभाग प्रजा से प्राप्त होंगे; और जिसमें कानून तथा सार्वजनिक नीतिमत्ता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठ , अवसरों और कानून के समक्ष समानता; विचार अभिव्यक्ति , मान्यता , आस्था , पूजापद्धति , व्यवसाय , संगठनों की रचना करने और काम करने का स्वातंत्र्य संरक्षित एवं सुरक्षित होगा; जिसमें अल्पमतावलम्बियों , पिछडे और आदि जाति क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछडे वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त होगी; और जिसमें जनतांत्रिक एकता और अखण्डितता तथा भूमि , समुद्र और आकाश क्षेत्र के उसके अधिकारों की न्यायोचित एवं सदस्य राष्ट्रों के कानून द्वारा देखभाल की जाएगी; और यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना न्यायपूर्ण आदरयुक्त स्थान प्राप्त करेगी तथा विश्वशांति और मानवकल्याण के लिए अपना स्वैच्छिक योगदान देगी
संघ राज्य में समाविष्ट या निर्दिष्ट ऐसी सभी सत्ताएँ और कार्य या संघ राज्य की जन्मजात या निहित या उसमें से उत्पन्न होनेवाले शासन और प्रशासन के अधिकारों का उपयोग कर सकेंगे; और जिसमें सार्वभौम स्वतंत्र भारत की सभी सत्ताएँ और अधिकार , उसके घटक और सरकारी विभाग प्रजा से प्राप्त होंगे; और जिसमें कानून तथा सार्वजनिक नीतिमत्ता के अधीन रहते हुए भारत के सभी लोगों को सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठ , अवसरों और कानून के समक्ष समानता; विचार अभिव्यक्ति , मान्यता , आस्था , पूजापद्धति , व्यवसाय , संगठनों की रचना करने और काम करने का स्वातंत्र्य संरक्षित एवं सुरक्षित होगा; जिसमें अल्पमतावलम्बियों , पिछडे और आदि जाति क्षेत्रों और दलित तथा अन्य पिछडे वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त होगी; और जिसमें जनतांत्रिक एकता और अखण्डितता तथा भूमि , समुद्र और आकाश क्षेत्र के उसके अधिकारों की न्यायोचित एवं सदस्य राष्ट्रों के कानून द्वारा देखभाल की जाएगी; और यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना न्यायपूर्ण आदरयुक्त स्थान प्राप्त करेगी तथा विश्वशांति और मानवकल्याण के लिए अपना स्वैच्छिक योगदान देगी
दूसरी ओर , भारत के अधिकांश विद्वानों के मतानुसार "पंचायत' शब्द का ऐसा अर्थ कभी नहीं था; पंचायतों का कार्यक्षेत्र ग्रामीण या अन्य स्तरों पर दीवानी या फौजदारी याचिकाओं में न्यायिक संस्थाओं के रूप में दायित्व निभाने के साथ साथ विभिन्न प्रकार के सम्प्रदाय और कर्मकांड विषयक विवादों का हल निकालने तक सीमित था
तीसरे विषय का विशेष सम्बन्ध मद्रास के प्रशासक या कोलकाता की इम्पीरीयल गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया के ( उस समय ऐसा ही कहा जाता था ) के प्रशासकों के साथ नहीं था
विख्यात 'रीपन प्रस्ताव' और प्रत्येक कानून के प्रारम्भ में एक सिद्धांत निवेदन ( statement of principles ) रखने तक ही सीमित रहा
कुछ मात्रा में जिला परिषदों में सामान्य रूप से अधिकार प्रस्थापित करने का एक प्रकार जिलाधीश या अध्यक्ष के एक या दूसरे निर्णय की , विशेषकर जिला परिषद के किसी कर्मचारी को की गई सजा की अवमानना करने का था
ढाँचे में तब सचमुच ही अस्थिरता पैदा होने की स्थिति निर्माण हो गई
सन् १९०७ के रायल डिसेन्ट्रलाइजेशन कमिशन ने भारत की सरकारों के ( उप जिलों से लेकर राज्य की राजधानी तक के ) प्रशासनिक ढाँचे के परीक्षण के प्राथमिक कार्य के अतिरिक्त लोकल बोर्ड एवं ग्राम पंचायतों की समस्या में भी रुचि ली
लगभग उसी समय में ग्राम पुस्तकालय एवं वाचनालय को नियंत्रित करने के लिए भी एक नियम सरकार ने जारी किया
वास्तव में सन् १९४६ से १९५८ का कालखण्ड सभी छोटी मोटी बातों में सन् १९०७ से १९२० के कालखण्ड से तुलना करने योग्य है
लगभग १९४० तक मद्रास क्षेत्र की स्थानीय संस्थाओं का व्यय कुल मिलाकर १६ से २० करोड रूपयों का था
सन् १९६१ में प्रवर्तमान ढाँचा पूर्णरूप से विकसित हुआ , और तब से व्यय रू . २९ करोड से ३० करोड के मध्य रहता है , जब कि राज्य का खर्च , १९६४-६५ में बढकर रू . १९५ करोड तक पहुँचा था
 ) इस प्रकार संपूर्ण राज्य में लगभग ३७४ पंचायत संघों के द्वारा राज्य की १२ , ८९५ ग्राम पंचायतों की रचना की गई है
नीलगिरि में ४ संघ हैं , जब कि दक्षिणी सेलम में २९ हैं
सारिणी -१ विकास संघो की संख्या विकास संघो की संख्या जिला जिला उत्तर वेलोर १९ पूर्वी रामानाथपुरम् २१ दक्षिणी वेलोर १७ पश्चिमी रामनाथपुरम् ११ उत्तर कडलूर १६ उत्तरी सेलम २२ दक्षित कडलूर १९ दक्षिणी सेलम २९ चेंगलपट्ट २७ पूर्वी तंजावुर १९ पूर्वी कोयम्बतूर २० पश्चिमी तंजावुर १७ पश्चिमी कोयम्बतूर २१ उत्तरी तिरूचिरापल्ली २१ कन्याकुमारी ९ दक्षिणी तिरूपलापल्ली १८ उत्तरी मदुराई १५ उत्तरी तिरुनेलवेली १६ दक्षिणी मदुराई १९ दक्षिणी तिरुनेलवेली १५ निलगीरी ४ प्रत्येक पंचायत संघ के साथ संलग्न पंचायतों की संख्या भी भिन्न भिन्न होती है
सारिणी ४ नगर जिला रचना की तिथि अरुवनकाडु नीलगिरि १४-४-१९६३ मदुक्कराई कोयम्बतूर १४-४-१९६३ अन्नामलाई युनि . परिसर दक्षिणी आर्कोट १४-४-१९६३ शंकरनगर तिरुनेलवेली १४-४-१९६३ हरवईपट्टी मदुराई १४-४-१९६३ मणिमुतार तिरुनेलवेली १४-४-१९६३ वलपरई कोयम्बतूर १४-४-१९६३ हाईवे मदुराई १-१०-१९६४ महाबलिपुरम् चेंगलपट्ट १-११-१९६४ अम्बत्तूर चेंगलपट्ट १-१०-१९६५ कन्याकुमारी कन्याकुमारी १-१०-१९६५ प्रत्येक जिले के गाँव और ग्राम पंचायतों की संख्या में इतनी अधिक असमानता है कि , उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती
महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि जिले का क्षेत्रफल , या उसकी जनसंख्या या राजस्व गाँव की संख्या किसी भी जिले की ग्राम पंचायतों या नगर पंचायतों की संख्या को निर्धारित करने के लिए मूल आधार नहीं मानी जा सकतीं
अर्थ व्यवस्था पंचायतों की अर्थ व्यवस्था का महत्त्व भी उसकी भौगोलिक एवं भौतिक स्थिति से जरा भी कम नहीं है , क्योंकि इन संघों का गठन होने के कारण उनके हाथ में जो आर्थिक संचालन आया उसकी मात्रा पर भी उन पंचायतों का महत्त्व निर्भर करता है
अर्थ व्यवस्था पंचायतों की अर्थ व्यवस्था का महत्त्व भी उसकी भौगोलिक एवं भौतिक स्थिति से जरा भी कम नहीं है , क्योंकि इन संघों का गठन होने के कारण उनके हाथ में जो आर्थिक संचालन आया उसकी मात्रा पर भी उन पंचायतों का महत्त्व निर्भर करता है
जैसा कि प्रथम खण्ड में दर्शाया गया है , सरकार द्वारा निर्मित संविधान नीति के अनुसार , पंचायत संघों को आर्थिक दृष्टि से चार भागों में विभाजित किया गया है
अत: चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के लिए मार्गनिर्माण विषयक बजेट जब तक नहीं हुआ तब तक इस का निर्णय स्थगित कर दिया गया
परिणाम स्वरूप सरकार ने निर्णय लिया कि वित्तीय वर्गीकरण के लिए केवल खण्ड की ही आर्थिक स्थिति पर ध्यान केन्द्रित किया जाए
साथ ही कर वसूल करते समय ग्रामजनों को परेशान किया जाने का वृत्त भी प्राप्त हुआ था
सारिणी ९ में विभिन्न प्रकार के करों के द्वारा प्राप्त होनेवाली राशि तुलनात्मक महत्त्व के अनुसार दर्शाई गई है
ग्राम पंचायत में प्रशासनिक अधिकारी और लिपिक के अतिरिक्त ग्राम अधिकारी भी पंचायतों की गतिविधियों के सहभागी होते हैं
सारिणी १४ में पंचायतों के एवं पंचायतसंघों में कार्यरत सभी कर्मचारियों का वर्गीकरण दिया गया है
उपलब्धियाँ सरकार ने राज्य विधानसभा में बताया था कि पचायतों के विकास कार्यो में सर्वाधिक प्राथमिकता पेय जल , संलग्न सडकें और प्रत्येक गाँव को विद्यालय प्राप्त करवाने के प्रति ही है
मस्त्योद्योग कार्यक्रम ३१ अक्तूबर १९६४ तक तंजावु जिले में और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ४६ संघों में कुल १८३ मत्स्य पालनकेन्द्र भी शुरू किये गए हैं जब कि अन्य संघों में इसे शुरू किया जाना था
इन संघों ने लगभग १०० विद्यालयों मे पर्यावरणीय स्वच्छता के लिए परियोजना भी शुरू की थी जिसके लिए रू . २ , ०० , ००० का व्यय भी किया गया था
इस रेडियो सेट की संरक्षा के लिए , पंचायत रेडियो मेन्टेनन्स कार्पोरेशन की स्थापना की गई थी
पंचायतों मे सदस्य कई बार विधानसभा एवं विधान परिषद में प्रश्न उठाते ही रहते हैं
मद्रास पंचायत कानून ( १९५८ ) और जिला विकास परिषद कानून ( १९५८ ) पारित किए गये वैधानिक नियमों का परीक्षण विधानसभा सबोर्डीनेट लेजिस्लिटिव समिति द्वारा होता है
उनमें अधिकांश तो चुनाव में निषेधाज्ञा माँगनेवाली याचिकाएँ होती हैं जो कुछ व्यक्तियों द्वारा अपने निजी असन्तोष के कारण भी अंकित की जाती हैं
यद्यपि यह वाद १९६४ में पंचायतों के नये चुनाव होने तक लटका ही रहा था
पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों को दिए जा रहे इस प्रशिक्षण में लगभग रु . ७० , ८४४ का व्यय हुआ
ग्रामसेवकों के लिए प्रशिक्षण का प्रबन्ध सात ग्रामीण क्षेत्रों के केन्द्रों पर किया जाता है
प्रमुख सेविका के लिए प्रशिक्षण १० मास १५ दिन का है
स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को सामूहिक रूप में , पूनामल्ली में स्थित प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षण लेना होता है
प्रमुख सेविका के लिए प्रशिक्षण १० मास १५ दिन का है
यह प्रशिक्षण ५०-५० के समूह में दिया जाता है
जब कि ग्रामसेवक और ग्रामसेविकाओं में प्रशिक्षित लोगों की संख्या क्रमश: १७ प्रतिशत और ४ प्रतिशत थी , जो अपर्याप्त थी
राज्यस्तरीय अन्य संस्थाओं में मद्रास राज्य पंचायत संघ तमिलनाडु पंचायत संघ के रूप में विख्यात है
सन् १९६४ में आयोजित इस परिषद में कुछ विषयों पर चर्चा की गई थी और अनेक प्रस्ताव भी पारित किये गए थे
 ( ५ ) कुछ निवदनों एवं अनुसंधानों पर सरकार द्वारा विचारविमर्श करते हुए स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं को अपने कार्यालयों में पू . बापू और राष्ट्रपतिजी की तसवीरें रखने के लिए रु . ५० का व्यय करने की अनुमति दी थी
इससे पूर्व उस क्षेत्र के आयुक्त ने ५५ पैसों का अधिभार निर्धारित किया था
 ( १४ ) दिसम्बर १९६१ में एक पंचायत परिषद ने प्रस्ताव पारित कर संघ की परिषदों के अध्यक्ष , उपाध्यक्ष एवं सदस्यों को यात्रा भत्तों के संदर्भ में उसके अधिनियम २७ के अनुसार दी गई सूचनाओं का विरोध किया
सरकार द्वारा किसी नीतिविषयक निर्णय लेने के पश्चात् संबंधित अधिकारियों को आदेश द्वारा बताने में लगभग एक वर्ष का समय बीत जाता है
तिरूनेलवेली जिले की अक्षरज्ञान की औसत दशकों से राज्य औसत से अधिक है
नीलगिरि जिला तो पूर्ण रूप से पर्वतीय क्षेत्र है
केवल कन्याकुमारी जिले में अवस्थित पंचायत संघ और पंचायतों की कारवाई के निश्चित भेद जानने का प्रयास किया गया है
साथ ही इसका भी अध्ययन किया गया है कि यह अन्तर वैधानिक एवं प्रशासनिक कदम के कारण किस सीमा तक पडा है , उसका प्रभाव कारवाई और कार्यक्रम पर कितना पडा है
आश्चर्य इस बात का है कि कानूनी ढाँचे में कन्याकुमारी जिले की सभी पंचायतों को नगर पंचायतों के रूप में दर्शाया है परंतु उसमें कई नगरपंचायतों की जनसंख्या केवल ५००० ही है
जिले की ९ , ९६ , ९१५ की जनसंख्या में से ७ , ०७ , २७५ व्यक्ति गाँवों में बसते हैं
राज्य की अन्य पंचायतों के अध्यक्ष ही संघ की परिषदों के सदस्य पद पर होते हैं , जब कि इस पंचायत संघ में संघ के साथ जुडी हुई सभी पंचायतों के सारे सदस्य , सदस्यपद पर हैं
यद्यपि इन पंचायतों में सदस्यों की संख्या सीमित ही होती है
ऐसा होते हुए भी राज्य के कुछ पंचायत संघ , जैसे कि कोयम्बतूर जिले के वल्लाकोइल संघ में केवल २० से ३० कस्बे हैं
इसका एक कारण यही रहता है कि संघ के अधिकार क्षेत्र की सभी पंचायतों के निर्वाचित सदस्य चर्चा में भाग लेते हैं
इसमें से ३० से ५० प्रतिशत व्यय कर संग्रह कर्ताओं पर होता था
अन्य पंचायतों ने जिसकी उपेक्षा की थी वह बात थी कि कन्याकुमारी जिले में संघ मध्याह्न भोजन परियोजन के लिए अपनी ओर से भी पर्याप्त योगदान देते हैं
पंचायत चुनाव १९६५ कुछ समय तक निलंबित होते रहने के पश्चात् जनवरी १९६५ में समग्र राज्य में एक साथ पंचायत चुनाव आयोजित हुए
इसके तीन महीने पश्चात् अप्रैल १९६५ में पंचायत संघों के अध्यक्ष , पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों के चुनाव हुए
यद्यपि विकास आयुक्त प्रत्यक्ष रूप से समाज विकास एवं पंचायत विकास की कारवाई नहीं करते हैं
ग्रामीण विकास और स्थानीय संचालन विभाग को सचिवालय के स्तर पर , कार्यक्रम प्रशाखा और लेखा एवं वित्तीय प्रशाखा , प्रशासनिक शाखा एवं नगर पालिका प्रशासनिक प्रशाखा के रूप में विभाजित किया जाता है
इन समितियों की बैठक वर्ष में दो बार होती है
ऐसे प्रत्येक 'विकास जिले' के लिए 'जिला विकास समिति' रहती है
 ( १ ) तिरूवैयुर ( २ ) नीडमंगलम् ( ३ ) तंजावुर जिले में स्थित मुथुपेट ( ४ ) साक्कोताई ( ५ ) राजसिंगमंगलम् ( ६ ) रामनाथपुरम् जिले में स्थित तिरुपावान्नम् ( ७ ) पोल्लाची ( ८ ) वेल्लाकोइल ( ९ ) कोयम्बतुर जिले में स्थित मोडाकुरी ( १० ) कान्डीली ( ११ ) वांदीवाश और ( १२ ) उत्तरी आर्कोट जिले में स्थित चेट्यार
इसके द्वारा इन पंचायतों का विस्तार , जनसंख्या , पंचायती बोर्ड की सबसे पहले हुई रचना , उनकी कुल आय एवं खर्च का विवरण सारिणी ४१ में दर्शाया गया है
इस प्रकार कुल मिलाकार ६७२ अधिकारियों के साक्षात्कार किये गये थे
इसके लिए पंचायती संघ परिषद के अधिकांश सदस्यों के पास अपने संघ में कितनी ग्रामपंचायतें हैं इसकी भी जानकारी थी
ग्रामीण लोग पंचायती स्तर के चुनाव के स्थान पर संसद के चुनावों को अधिक महत्त्व देते थे
मानो , पंचायती संघ या सरकार के द्वारा किसी निश्चित निर्माण के उद्देश्यों के लिए दिया जानेवाला अनुदान पंचायतें अपनी बहियों में आय के रूप में दर्शाती हैं
इसी तरह डाक-व्यय एवं यात्रा-व्यय भी अल्प सा रहता है
लगभग किसी भी पंचायत के पास निजी भवन नहीं था
सामान्यरूप से कुल सदस्यों के २/३ सदस्यों की उपस्थिति अंकित हुई है
यह प्रक्रिया गलत नहीं है , क्योंकि संबंधित कार्यसूची के बिना सदस्यों को बुलाना कठिन होता है
नमूने के पंचायत संघ नमूने के चयनित १२ पंचायती संघों के क्षेत्रफल , जनसंख्या आदि सहित संलग्नित ग्राम पंचायतों एवं उनके कार्यक्षेत्र की सूची सारिणी ४२ में दी गई है
इनमें लडकों की संख्या ५५ से ६५ प्रतिशत जब कि लडकियों की संख्या ३५ से ४५ प्रतिशत रहती है
प्रत्येक संघ में ४ से ६ हाईस्कूल हैं , जो काफी बडी हैं
प्रत्येक संघ में नगर की एक नगरपालिका भी है
लगभग प्रत्येक संघ में एक या अधिक सिनेमागृह भी हैं
केवल दो ही संघ , राजसिंगमंगलम् और मोडककुरिची ऐसे हैं जो परिवहन सेवा के साथ जुड़े हुए अवश्य हैं परन्तु उधर सरलता से पहुँच पाना कठिन है
आगे सारणियों में दर्शाये गये भू राजस्व के आंकडों के अनुसार मोडक्कुरिची , तिरुवैयार , नीडमंगलम् , मुथुपेट , तिरुप्पुवनम् और चेरिया सब से अधिक उपजाऊ हैं
पोलाची को छोड़ अन्य पंचायत संघों में लगभग २५० से ३०० अध्यापक हैं
साक्कोताई एवं पोल्लाची पंचायत संघों को छोड़ अन्य संघों में बड़े पोलिटेकनिक एवं कोलेज भी हैं
एक पूर्व बैठक की कार्यवाही की स्वीकृति और दूसरा फुटकर खर्च को स्वीकृति
अंतिम दो समितियाँ विशेषरूप से अधिकारियों की बनी होती है जब कि विद्यालय परामर्शक समिति के अध्यक्ष के पद पर पंचायत संघ के आयुक्त रहते हैं
नमूने के पंचायत संघों में से एक पंचायत संघ कमिश्नर द्वारा लिखी गई टिप्पणी आयुक्त अपने दायित्व के प्रति कैसा रुख अपनाते हैं यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है| खण्ड विकास अधिकारी ( ब्लक डेवलपमेन्ट फिसर ) और पंचायत संघ आयुक्त के कार्यों के विषय में टिप्पणी
पंचायत के दायित्व में हरिजन कल्याण की परियोजनाएँ , समाजकल्याण केन्द्रों के लिए सामग्री उपकरण आदि के लिए किये गये व्यय को समाविष्ट किया जाता है
आयुक्त के रूप में आयुक्त पंचायत संघों के प्रमुख कार्यवाहक अधिकारी होते हैं
पंचायत निधि से जिन कर्मचारियों को वेतन दिया जाता है , उन सब की नियुक्ति , दंड या नौकरी से निष्कासन आदि की सम्पूर्ण सत्ता कमिश्नर के अधिकार में रहती है
सरकार द्वारा निर्दिष्ट नियमों के अधीन रहकर पंचायती परिषद द्वारा पारित किये गये प्रस्तावों को कार्यान्वित करने का दायित्व उनका है
इसके अतिरिक्त पंचायत संघों के लिए एक्सटेन्शन ( अलग कर्मचारी ) प्रति पखवाडा मिलते हैं
पंचायत संघ के कार्यक्रम और कार्यवाही का सर्वेक्षण करने के लिए प्रति माह एक बैठक का आयोजन होता है , जिसके अध्यक्षपद पर विभागीय अधिकारी रहते हैं
अन्य बैठकों के अध्यक्ष पद पर आयुक्त रहते हैं
इसके अलावा प्रति दो माह राजस्व विभागीय अधिकारी के कार्यालय पर पंचायत संघों के अध्यक्ष मिलकर , भूमिकर के संदर्भ में उनसे विचारविमर्श करते हैं
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अध्यापकों का वेतन प्रति माह किसी निश्चित तिथि को नहीं दिया जाता है
जिन ग्राम पंचायतों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है उनको इस धनराशि में कुछ मुक्ति भी दी जाती है
विभिन्न कार्यक्रमों ( परियोजनाएँ ) के लिए पंचायत संघों के द्वारा ग्रामपंचायतों को आरक्षित धनराशि से दी जानेवाली प्रतिव्यक्ति राशि का अनुमान १ . २ का ही रहता है
इसके अलावा पंचायत संघ के स्तर पर एवं उसकी सहायता से कार्यरत विद्यालयों के संबंध में अन्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जो पंचायत नया विद्यालय खोलना चाहती है उसे राज्य के शिक्षा विभाग के नियमों को ध्यान में रखना पडेगा
इस प्रकार पंचायत संघों की परिषद का प्रमुख कार्य नये विद्यालयों की शुरूआत , नये अध्यापकों की नियुक्ति और कार्यरत अध्यापकों के स्थानांतरण का रहता है
यद्यपि नये विद्यालयों को आरम्भ करना और नये अध्यापकों की नियुक्ति करने कार्य निरन्तर नहीं करना पड़ता है
यद्यपि इन स्थानांतरणों की अनुमानित संख्या और मात्रा विभिन्न संघों सें भिन्न भिन्न होती है
कृषि , पशुपालन एवं मत्स्योद्योग कृषि , पशुपालन एवं मत्स्योद्योग के संबंध में शोध कर्ताओं के द्वारा अधिक खोज नहीं हो पाई है
इस संदर्भ में संघ आयुक्त और संघ के अध्यक्ष का भी ध्यान आकर्षित किया गया था
साथ ही , अधिकांश संघों ने ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण एवं उसके उत्पादन के लिए कुछ औद्योगिक नीतियों को कार्यान्वित कर दिया था , परन्तु १९६१ से ६५ तक के पांच वर्ष की समयावधि के लिए दी हुई लगभग रु . ५० , ००० की राशि को इन संघों ने १९६३-६४ तक ही व्यय कर दिया था
इसके अतिरिक्त संघों के द्वारा कुछ परियोजनाएँ चलाई जाती हैं और मद्रास खादी एवं ग्रामोद्योग संघ भी कुछ परियोजनाएँ चलाता है
इसके साथ ही संघ अपने जिलास्तरीय कार्यालयों द्वारा कई ग्रामोद्योगों को सहायता देता है
प्रशिक्षण के लाभ या रोजगारी और सेवा की सुविधाएँ उस वस्ती तक ही सीमित रहती हैं
हिसाब के बहीखाते समुचित रूप से तैयार किये जाते हैं
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जो व्यक्ति ऐसे प्रशिक्षण केन्द्र चलाते हैं या उन पर निगरानी रखते हैं वे अपने दायित्व को केवल संख्या की दृष्टि से और यांत्रिक रूप से देखते हैं
इसके स्थान पर जिन ग्रामपंचायत संघों के पास अधिक धनराशि है और वे अपने आप ऐसे कार्यक्रम चलाते हैं तो उन्हें आगे बढने के लिए समुचित अवसर एवं प्रोत्साहन देना चाहिए
